हमारे सपनों का सच
खोया पानी में जहां हास्य और व्यंग्य के नायाम ज़ुमले हैं वहीं उसमें जीवन का फलसफा भी बिखरा पड़ा है. आइये तीसरे भाग की शुरुआत ज़िन्दगी के इसी फ़लसफे से करें.आप पायेंगे कि यूसूफ़ी साहब ने कितनी सच्ची बात इन शब्दों में उतार दी है.
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हर व्यक्ति के मन में ऐश्वर्य और भोग-विलास का एक नक़्शा होता है। ये नक़्शा दरअस्ल उस ठाट-बाट की नक़्ल होता है जो दूसरों के हिस्से में आया है, परन्तु जो दुख आदमी सहता है वो अकेला उसका अपना होता है, बिना किसी साझेदारी के, एकदम निजी, एकदम अनोखा। हड्डियों को पिघला देने वाली जिस आग से वो गुजरता है, उसका अनुमान कौन लगा सकता है। नर्क की आग में यह गर्मी कहां। जैसा दाढ़ का दर्द मुझे हुआ है, वैसा किसी और को न कभी हुआ, न होगा। इसके विपरीत ठाट-बाट का ब्लू-प्रिंट हमेशा दूसरों से चुराया हुआ होता है। बिशारत के दिमाग़ में ऐश्वर्य और विलास का जो सौ-रंगा और हजार पैवंद लगा चित्र था, वो बड़ी-बूढ़ियों की उस रंगारंग रल्ली की भांति था जो वो भिन्न-भिन्न रंगों की कतरनों को जोड़-जोड़ कर बनाती हैं। उसमें, उस समय का जागीरदाराना दबदबा और ठाट, बिगड़े रईसों का जोश और ठस्सा, मिडिल-क्लास दिखावा, क़स्बाती-उतरौनापन, नौकरी- पेशा हुस्न, सादा-दिली और नदीदापन सब बुरी तरह गडमड हो गये। उन्हीं का कहना है कि बचपन में मेरी सबसे बड़ी इच्छा थी कि तख़्ती फेंक-फांक, किताब फाड़-फूड़ मदारी बन जाऊं, शहर-शहर डुगडुगी बजाता, बंदर, भालू, जमूरा नचाता और “बच्चा लोग” से ताली बजवाता फिरूं। जब जरा अक़्ल आई अर्थात बुरे और बहुत बुरे की समझ पैदा हुई तो मदारी की जगह स्कूल मास्टर ने ले ली और जब धीरजगंज में सच में मास्टर बन गया तो मेरी राय में अय्याशी की चरम-सीमा ये थी कि मक्खन जीन की पतलून, दो-घोड़ा बोस्की की क़मीज, डबल कफ़ों में सोने के छटांक-छटांक भर के बटन, नया सोला हैट और पेटेंट लैदर के पम्प-शूज पहनकर स्कूल जाऊं और लड़कों को केवल अपनी ग़जलें पढ़ाऊं। सफ़ेद सिल्क की अचकन जिसमें बिदरी के काम वाले बटन गले तक लगे हों, जेब में गंगा-जमनी काम की पानों की डिबिया, सर पर सफ़ेद किमख़्वाब की रामपुरी टोपी, तिरछी मगर जरा शरीफ़ना ढंग से, लेकिन ऐसा भी नहीं कि निरे शरीफ़ ही हो के रह जायें। छोटी बूटी की चिकन का सफ़ेद कुर्ता जो मौसम के लिहाज से हिना या खस की ख़ुशबू में बसा हो। चूड़ीदार पाजामे में सुंदर लड़की के हाथ का बुना हुआ रेशमी कमरबंद। सफ़ेद सलीमशाही जूता। पैरों पर डालने के लिये इटालियन कम्बल, जो फ़िटन में जुते हुए सफ़ेद घोड़े की दुम और उससे दूर तक उड़ने वाले पेशाब-पाखाने के छींटों से पाजामे को सुरक्षित रखे। फ़िटन के पिछले पायदान पर ‘‘हटो! बचो!’’ करते और उस पर लटकने का प्रयास करने वाले बच्चों को चाबुक़ मारता हुआ साईस। जिसकी कमर पर जरदोजी के काम की पेटी और टखने से घुटने तक खाकी नम्दे की पट्टियां बंधी हों। बच्चा अब सयाना हो गया था। बचपन विदा हो गया था, पर बचपना नहीं गया था।
बच्चा अपने खेल में जिस उत्साह और सच्ची लगन के साथ तल्लीन होता है कि अपने-आप को भूल जाता है, बड़ों के किसी मिशन और मुहिम में इसका दसवें का दसवां भाग भी दिखाई नहीं पड़ता। इसमें शक नहीं कि संसार का बड़े-से-बड़ा दार्शनिक भी किसी खेल में मग्न बच्चे से अधिक गंभीर नहीं हो सकता। खिलौना टूटने पर बच्चे ने रोते-रोते अचानक रौशनी की ओर देखा तो आंसू में इंद्रधनुष झिलमिल-झिलमिल करने लगा। फिर वो सुबकियां लेते-लेते सो गया। वही खिलौना बुढ़ापे में किसी जादू के जोर से उसके सामने लाकर रख दिया जाये तो वो भौंचक्का रह जायेगा कि इसके टूटने पर भला कोई इस तरह जी-जान से रोता है। यही हाल उन खिलौनों का होता है, जिनसे आदमी जीवन भर खेलता रहता है। हां, उम्र के साथ-साथ यह भी बदलते और बड़े होते रहते हैं। कुछ खिलौने अपने-आप टूट जाते हैं, कुछ को दूसरे तोड़ देते हैं। कुछ खिलौने प्रमोट होकर देवता बन जाते हैं और कुछ देवियां दिल से उतरने के बाद गूदड़ भरी गुड़ियां निकलती हैं। फिर एक अभागिन घड़ी ऐसी आती है, जब वो इन सबको तोड़ देता है। उस घड़ी वो खुद भी टूट जाता है।
‘‘तराशीदम, परस्तीदम, शिकस्तम’’
(मैने तराशा, मैने पूजा मैने तोड़ दिया )
आज इन बचकानी इच्छाओं पर स्वयं उनको हँसी आती है। मगर यह उस समय की हक़ीक़त थीं। बच्चे के लिये उसके खिलौने से अधिक ठोस और अस्ल हक़ीक़त पूरे ब्रह्मांड में कुछ और नहीं हो सकती। सपना, चाहे वह आधी रात का सपना हो या जागते में देखा जाने वाला सपना हो, देखा जा रहा होता है तो वही और केवल वही उस क्षण की एकमात्र वास्तविकता होती है। यह टूटा खिलौना, यह आंसुओं में भीगी पतंग और उलझी डोर, जिस पर अभी इतनी मार-कुटाई हुई, यह जलता-बुझता जुगनू, यह तना हुआ ग़ुब्बारा जो अगले पल रबड़ के लिजलिजे टुकड़ों में बदल जायेगा, मेरी हथेली पर सरसराती यह मखमली बीरबहूटी, आवाज की रफ़्तार से भी तेज चलने वाली यह माचिस की डिब्बियों की रेलगाड़ी, यह साबुन का बुलबुला-जिसमें मेरा सांस थर्रा रहा है, इंद्रधनुष पर यह परियों का रथ-जिसे तितलियां खींच रही हैं इस पल, इस क्षण बस यही और केवल यही हक़ीक़त है।
जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]
[उपन्यास खोयापानी की तीसरे भाग “स्कूल मास्टर का ख़्वाब से " ]
किताब डाक से मंगाने का पता:
किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857
पेज -350 (हार्डबाऊंड)
कीमत-200 रुपये मात्र

