लिखना जरूरी क्यों है?

creativity जब से ब्लॉगिंग से अल्पविराम(?) लिया है तब से कई मित्रों, पाठकों, शुभचिंतकों ने कई तरीकों से उलाहना दिया है कि मैं लिखता क्यों नहीं। बीच में ऐसे ही कुछ उलाहने सुनने के बाद आने का मन बना लिया था लेकिन एक पोस्ट लिखने के बाद मन बना ही नही।

इधर अतुल भाई कई बार जगाने का प्रयास कर चुके हैं और खुद भी कुम्भकर्णी नींद सो लेने के बाद पुन: नये ठिकाने पर अवतरित हो चुके हैं। चिट्ठाजगत में एक दीदी (लिंक नहीं लगा रहा हूँ) ने एक दिल को छू लेनी वाली लंबी मेल भेज कर ढेर सारा ज्ञान दे डाला।

सही है कि महानगरों में जीवन बड़ा ही दुरूह है…जीवन यापन के लिए लोग कोल्हू के बैल बन्ने को बाध्य हैं..दिन रात कितना संघर्षशील रहना पड़ता है भीड़ के बीच अपने को साबित करने के लिए , खुद को सरवाइव कराने के लिए. समय सबसे मूल्यवान है,क्योंकि सदा इस की कितनी किल्लत रहती है…पर यह भी सत्य है न कि जीवन हमें एक ही मिला है…वह समय कभी नहीं आएगा ,जब सारे जद्दोजहद समाप्त हो जायेंगे और अलग से एकदम निश्चिन्त समय मिलेगा आपको लेखन कार्य करने के लिए..तो क्या कर रहे हैं ???? जीवन के चूहे दौड़ में जीवन खपा देना,सही है क्या???दिन हमेशा चौबीस घंटों का ही रहेगा और इसीमे से जैसे सबको समय दे रहे हैं आप वैसे ही इसके लिए भी समय निकलना पडेगा…

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आपसे विनती है कि ब्लॉग पर लिखना पुनः आरम्भ कर दें..कोई आवश्यक नहीं कि दिन भर में चार पोस्ट डाली जाय..महीने में एक पोस्ट भी ऐसी जो सचमुच किसी ह्रदय को छूकर उसमे सकारात्मक कुछ जोड़ सके,डाली जाय तो बहुत है..आशा है आप मेरे आग्रह पर गंभीरता से विचार करेंगे..

उनसे वादा किया कि कुछ लिखता हूँ। तो फिर लिखने बैठ गया।अब चुंकि लिखने का वादा किया है तो गाहे-बगाहे लिखते रहेंगे। अभी तो जँग लग चुकी कलम को तेज करने की कोशिश में हैं।

दरअसल लिखने की प्रक्रिया में आपका लिखा आपके मस्तिष्क से शुरु होते हुए कलम या की-बोर्ड के माध्यम से लोगों के सामने आता है। तो लिखने की इस प्रक्रिया में हमारी सोच का बहुत बड़ा योगदान है। ऐसा नहीं कि लिखने के लिये विषय़ों की कुछ कमी हो या फिर व्यस्तता इतनी ज्यादा हो गयी हो कि लिखने के थोड़ा सा समय भी ना निकाला जा सके। लेकिन कई बार यह प्रश्न उठता है कि आखिर लिखें तो लिखें क्यों? क्या होगा लिख कर?

अजदक जी छुट्टी के दिन इसी प्रश्न से दो-चार होते हैं, आखिर लिखना चाहते क्यों हैं? प्रत्यक्षा जी को तो अन्दर की किसी "इल्यूसिव चीज" को पकड़ने की तमन्ना है। ऐसी ही तमन्ना सभी को होती होगी। अब ना जाने उनको कुछ मिला कि नहीं यह तो पता नहीं लेकिन साहित्य के राजमार्ग पर जाने की न तो अपन की इच्छा है और ना ही हम इतने काबिल हैं कि इस भीड़ भरे राजमार्ग पर राजनीति की कीचड़ में सनते-सनाते, उसे लांघते आगे बढ़ सकें। अपन तो किसी तरह पहाड़ की टेड़ी-मेड़ी, उतराती-गहराती पगडंडियों से ही पार पा लें तो बहुत है। 

हाँ अन्दर एक अजीब तरह की बेचैनी तो है ही जो कुछ लिखने को …कुछ कह जाने को….कुछ रच जाने को प्रेरित करती है। यह रचनात्मकता किसी भी रूप में हो सकती है, जरूरी नहीं इसकी परिणति एक ब्लॉग पोस्ट के रूप में ही हो।

कभी कभी हम किसी एक कहानी, एक विचारधारा, एक दृश्य से इतने प्रेरित हो जाते हैं कि हम दुनिया को सिर्फ एक ही चश्में से देखने लगते हैं। इसलिये भी लिखना शायद जरूरी है कि हम दुनिया को एक से अधिक कहानी दे सके..इसको नये नये रंगों में ढाल सकें.. समय को पकड़ने की कोशिश कर सकें। वरना पहाड़ के बारे में बात करने में आप पहाड़ को सिर्फ मंगलेश डबराल की गरीब वाली दृष्टि से ही देखेंगे। आपकी दृष्टि में शायद वह नराई ना होगी जो शायद किसी पहाड़ के रहने वाले को लगती होगीवही लेखन, शिवानी के माध्यम से, कम से कम यह तो बताता है कि पहाड़ में रोटी के ऊपर रखकर पालक की सब्जी खायी जाती है भले ही हम यह ना जान पायें कि और भी बहुत कुछ खाया जाता है। तो लेखन की यही महत्ता है।

 

आइये एक वीडियो देखें। यह भी कुछ ऐसा ही कहता है, लेखन ना होता तो दुनिया कितनी एकरंगी होती। यथार्थ व सच्चाई से दूर केवल काल्पनिक दुनिया। आप क्या कहते हैं?

 

महबूबा ..महबूबा ..

यदि इस पोस्ट का टाइटल पढ़कर आपको फिल्म शोले की याद आ जाये तो इसमें मेरा कोई कसूर नहीं है, लेकिन मैं ना तो आज आपको फिल्म शोले का गाना सुना रहा और ना ही अपनी महबूबा के बारे में बता ‘सच का सामना‘ कर अपने एक अदद पत्नी को परेशान ही कर रहा हूँ। मैं तो उस महबूबा की बात कर रहा हूँ जिसने अपने एक कदम से एक ओर यह बतलाया  कि लोकतंत्र की जड़ें कैसे मजबूत की जा सकती हैं और दूसरी ओर नारी की स्थिति को लेकर निंदित चिंतित लोगों को शुकुन की सांस लेने का मौका दिया। मैं बात कर रहा हूँ कश्मीर में विपक्ष की नेता महबूबा मुफ्ती सईद की, जिन्होंने विधानसभा में स्पीकर के ऊपर माइक फैंक कर यह बता दिया कि वीरांगनाऐं घर में पति पर ही बेलन नहीं चला सकती वरन अपने इस कौशल का प्रदर्शन विधानसभा में भी कर सकती हैं।

mahbooba-mufti-saeed अपने इस वीरता भरे कृत्य से उन्होंने ना जाने कितनी चीजें स्पष्ट कर दीं। मैं उन्हें तहे दिल से धन्यवाद देना चाहता हूँ कि उन्होंने ऐसा किया, वरना नेता लोग तो सिर्फ बोलते ही हैं करते कुछ नहीं हैं। अब मेरा विश्वास इस देश पर, इस देश के लोकतंत्र पर, इस देश की महिलाओं पर मजबूत हुआ है। जो लोग बोलते थे कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है उनकी इस बात को लोग अब गंभीरता से लेने लगे हैं।  

एक चीज जो स्प्ष्ट हो गयी कि जम्मू-कश्मीर में भी अब लोकतंत्र आ गया है। हमेशा से हम सुना करते थे कि हमें जम्मू-कश्मीर में लोकतंत्र की जड़ें मजबूत करनी है। यह और बात है कि इस देश में जहां जहां लोकतंत्र की जड़ें मजबूत हुई हैं वहाँ रुपये पैसों के पेड़ भी लहलहाये हैं जो नेताओं को पुष्प-फल देते रहे हैं। आम जनता उन जड़ों को इस उम्मीद में खाद-पानी देती है कि जब नेताओं से सात पीढ़ियों का इन्तजाम हो जायेगा तो जनता को भी फल चखने को मिल सकते हैं। तो अब यह साबित हो गया है कि जम्मू-कश्मीर में लोकतंत्र आ गया है। वरना हम तो यही लोकतंत्र के चैम्पियन के नाम पर तमिलनाडू, महाराष्ट्र या यू.पी. को रखते जहां जूते-चप्पल से लेकर माइक फैक कर लोकतंत्र के मजबूत होने का प्रमाण दिया जाता रहा है।

दूसरी ओर जब तमिलनाडू में इस तरह की घटना हुई थी तो महामहिम (उनके वजन के हिसाब से लिखना पड़ रहा है) जयललिता के साथ अभद्रता की गयी थी और उनकी ओर जूते-चप्पल, माइक फैंके गये थे। मैं तब से हैरान था कि माइक फैकने के वीर कर्म में कोई महिला कैसे पीछे रह सकती है, और वो भी किसी पुरुष पर। महिला की इस जन्मजात प्रतिभा का प्रदर्शन केवल घर तक ही सीमित रह जाय यह तो रीतिकालीन बात हुई। आज जब महिलायें हर मामले में पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं….। वैसे जिन्होंने यह मुहावरा गढ़ा होगा मुझे उनके मांनव-ज्ञान पर हमेशा से ही शक रहा है। महिला और पुरुषों की ऊंचाई में हमेशा से ही अंतर रहा है, एक आध अपवाद छोड़ दें तो महिलाओं की ऊंचाई हमेशा ही कम रही है, तो फिर  कंधे से कंधा मिला कर कैसे चला जा सकता है। होना चाहिये था महिलायें हर मामले में पुरुष के साथ कंधे से सर मिलाकर चल रही हैं…खैर…जाने दीजिये…. तो महिला महबूबा ने पुरुष स्पीकर पर माइक फैक कर यह जता दिया कि अब महिलायें केवल घर की चहारदीवारी तक ही सीमित नहीं रही हैं। वह अब बाहर निकल रही हैं। मुझे लगता है कि मुलायम सिंह यादव, शरद यादव और लालू यादव जैसे लोगों को इस बात का खूब अनुभव रहा होगा। इसीलिये वह राजनीति में महिलाओं के 33% आरक्षण का विरोध करते रहते हैं। शरद यादव ने तो आत्महत्या करने तक की धमकी दे दी थी। घर के अंदर बेलन झेलना और सार्वजनिक रूप से माइक झेलने में अंतर होता है। शरद-यादव ऐसी स्थिति आने से पहले ही दुनिया से कूच करना चाहते हैं तो क्या गलत चाहते हैं।

तीसरी चीज जो लोग जम्मू-कश्मीर का तालिबानीकरण करना चाहते हैं। महिलाओं को केवल बुर्के पहना घर के अंदर बैठा देना चाहते हैं, यह माइक उनके लिये भी एक करारा तमाचा है। हम खुश है कि ऐसी सोच वाले लोगों को महबूबा ने सही सबक सिखाया है।

तो क्या हमें महबूबा को धन्यवाद नहीं देना चाहिये। मैंने तो जब से यह समाचार सुना है तब से ही गा रहा हूँ…महबूबा..महबूबा…और अब तो उमर अब्दुल्ला भी निकल लिये। तो उन पर चर्चा कल करेंगे। आज इतना ही…

रुका हूँ …चुका नहीं हूँ…

इस ब्लॉग पर कुछ भी लिखे हुए एक साल से ऊपर हो गया है। इस बीच ना जाने कितने नये ब्लॉग आ गये होंगे.. कितने इस ब्लॉगजगत से उकता कर जा चुके हौंगे..लेकिन मैं ना तो उकताया हूँ ना ही ब्लॉग से बोर हुआ हूँ। हाँ… कुछ दिनों के लिये अपने दूसरी जिम्मेवारियों को निभाने में लगा हुआ हूँ। मुझे खुशी है कि इस बीच कई मित्रों ने फोन पर मुझे फिर से ब्लॉग पर लिखने के लिये कहा। कई लोगों ने मेल पर या टिप्पणीयों के माध्यम से यही निवेदन किया। अब चुंकि मंदी की मार भी कम हो रही है और गर्मी की भी- हाँ ब्लॉग-जगत की गर्मी का मुझे कोई अन्दाजा नहीं है- तो मैने सोचा है कि सप्ताह में कम से कम एक बार तो इस ब्लॉग पर दर्शन दे ही दूँ।

इस बीच कुछ ब्लॉगों को अनियमित पढ़ता रहा लेकिन ब्लॉग पर ना लिखने से हिन्दी की किताबें पढ़ने और खरीदने में कमी आयी। पिछ्ली बार जो किताबें खरीदी थी अभी उनमें से कई पढ़नी बाँकी है। सोचता हूँ कि एक बार ब्लॉग पर लिखना प्रारम्भ कर दुंगा तो फिर से यह सिलसिला भी शुरु हो जायेगा।

एक साल ना लिखने के बाबजूद मेरे ब्लॉग पर लोगों की आवजाही चलती रही। आँकड़े बताते है कि दो प्रमुख श्रेणियां जो सबसे ज्यादा पढी गयी वह थी व्यंग्यउत्तराखंड..तो अब अधिकतर इन्ही पर लिखुंगा…लेकिन लिखना क्या पहले से निर्धारित किया जा सकता है..देखिये की-बोर्ड क्या लिखवा दे। 

चलिये अभी इतना ही..जल्दी ही कुछ लिखता हूँ..

कोई दीवार सी गिरी है अभी

कोई दीवार सी गिरी है अभी

कुछ देर बाद मौलाना आते हुए दिखाई दिये। कीचड़ में डगमग-डगमग करती ईंटों पर संभल-संभल कर क़दम रख रहे थे। इस डांवाडोल पगडंडी पर इस तरह चलना पड़ता था जैसे सरकस में करतब दिखाने वाली लड़की तने हुए तार पर चलती है। लेकिन क्या बात है, वो तो अपने आप को खुली छतरी से संतुलित करती रहती है। जरा डगमगा कर गिरने लगती है तो दर्शक पलकों पर झेल लेते हैं। मौलाना ख़ुदा जाने बिशारत को देखकर बौखला गये या संयोग से उनकी खड़ाऊं ईंट पर फिसल गई, वो दायें हाथ के बल जिसमें नमाजियों की फूकें मारे हुए पानी का गिलास था-गिरे। उनका तहबंद और दाढ़ी कीचड़ में लथपथ हो गई और हाथ पर कीचड़ की जुराब-सी चढ़ गई। एक बच्चे ने बिना क़लई के लोटे से पानी डालकर उनका मुंह हाथ धुलाया, बिना साबुन के। उन्होंने अंगोछे से तस्बीह, मुंह और हाथ पोंछकर बिशारत से हाथ मिलाया और सर झुका कर खड़े हो गये। बिशारत ढह चुके थे, इस कीचड़ में डूब गये। अनायास उनका जी चाहा कि भाग जायें, मगर दलदल में इंसान जितनी तेजी से भागने का प्रयास करता है उतनी ही तेजी से धंसता चला जाता है।

उनकी समझ में न आया कि अब शिकायत और चेतावनी की शुरुआत कहां से करें, इसी सोच एवं संकोच में उन्होंने अपने दाहिने हाथ से जिससे कुछ देर पहले हाथ मिलाया था, होंठ खुजाया तो उबकाई आने लगी। इसके बाद उन्होंने उस हाथ को अपने शरीर और कपड़ों से एक बालिश्त की दूरी पर रखा। मौलाना आने का उद्देश्य भांप गये। ख़ुद पहल की। यह मानने के साथ कि मैं आपके कोचवान रहीमबख़्श से पैसे लेता रहा हूं-लेकिन पड़ोसन की बच्ची के इलाज के लिये। उन्होंने यह भी बताया कि मेरी नियुक्ति से पहले यह नियम था कि आधी रक़म आपका कोचवान रख लेता था। अब जितने पैसे आपसे वसूल करता है, वो सब मुझ तक पहुंचते हैं। उसका हिस्सा समाप्त हुआ। हुआ यूं कि एक दिन वो मुझसे अपनी बीबी के लिये तावीज ले गया। अल्लाह ने उसका रोग दूर कर दिया। उसके बाद वो मेरा भक्त हो गया। बहुत दुखी आदमी है। मौलाना ने यह भी बताया कि पहले आप चालान और रिश्वत से बचने के लिये जब भी उसे रास्ता बदलने का आदेश देते थे, वो महकमे वालों को इसका एडवांस नोटिस दे देता था। वो हमेशा अपनी इच्छा, अपनी मर्जी से पकड़ा जाता था। बल्कि यहां तक हुआ कि एक बार इंस्पेक्टर को निमोनिया हो गया और वो तीन सप्ताह तक ड्यूटी पर नहीं आया तो रहीम बख़्श हमारे आफ़िस में ये पता करने आया कि इतने दिन से चालान क्यों नहीं हुआ, खैरियत तो है? बिशारत ने कोचवान से संबंधित दो-तीन प्रश्न तो पूछे, परंतु मौलाना को कुछ कहने सुनने का साहस अब उनमें न था। उनका बयान जारी था, वो चुपचाप सुनते रहे।

मेरे वालिद के कूल्हे की हड्डी टूटे दो बरस हो गये। वो सामने पड़े हैं। बैठ भी नहीं सकते। चारपाई काट दी है। लगातार लेटे रहने से नासूर हो गये हैं। पड़ोसी आये दिन झगड़ता है कि ‘‘तुम्हारे बुढ़ऊ दिन भर तो ख़र्राटे लेते हैं और रातभर चीख़ते-कराहते हैं, नासूरों की सड़ांध के मारे हम खाना नहीं खा सकते।

वो भी ठीक ही कहता है। ख़ाली चटाई की दीवार ही तो बीच में है। चार माह पहले एक और बेटे ने जन्म लिया। अल्लाह की देन है। बिन मांगे मोती मिले, मांगे मिले न भीख। जापे के बाद ही पत्नी को Whiteleg हो गई। मौला की मर्जी! रिक्शा में डालकर अस्पताल ले गया। कहने लगे, तुरंत अस्पताल में दाखिल कराओ, मगर कोई बेड ख़ाली नहीं था। एक महीने बाद फिर ले गया। अब की बार बोले-अब लाये हो, लम्बी बीमारी है, हम ऐसे मरीज को दाखिल नहीं कर सकते। फ़ज्र और मग़रिब की नमाज से पहले दोनों का गू-मूत करता हूं। नमाज के बाद स्वयं रोटी डालता हूं तो बच्चों के पेट में कुछ जाता है। एक बार नूरजहां ने मां के लिये बकरी का दूध गर्म किया तो कपड़ों में आग लग गयी थी। अल्लाह का लाख-लाख शुक्र है, मेरे हाथ-पांव चलते हैं।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार/शनिवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की तीसरे भाग “स्कूल मास्टर का ख़्वाब से " ]

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

इस भाग की पिछली कड़ियां

1. हमारे सपनों का सच 2. क़िस्सा खिलौना टूटने से पहले का 3. घोड़े को अब घोड़ी ही उतार सकती है 4. सवारी हो तो घोड़े की 5. जब आदमी अपनी नजर में गिर जाये 6. अलाहदीन अष्टम 7. शेरे की नीयत और बकरी की अक़्ल में फ़ितूर 8.महात्मा बुद्ध बिहारी थे 9.घोड़े का इलाज जादू से 10.कुत्तों के चाल चलन की चौकीदारी 11. कौन किसका खाना है? 12.मुगल वंश हो तो ऐसा

पहला और दूसरा भाग

नराई हरेले की

कका बालकनी में बैठे हुए सामने पार्क में खेलते हुए बच्चों को देख रहे थे.साथ ही पातड़ा (पंचाग) भी देख रहे थे. मैने उनसे पूछा.

"कका.. पंचाग में क्या देख रहे हो..? "

"अरे देख रहा था हरेला कब है. भोल (कल) हरेला है."

"ओ..कल है! कका बताइये कल क्या क्या करना है. "

"अरे यहां शहर में क्या हुआ. पहाड़ में होते तो कल बोया हुआ हरेला काटते,सर में हरेला लगाते, डिकारे बनाते, मातृका पट्टा पूजते. यहां ये सब जो क्या होने वाला ठहरा. बस शगुन का बड़ा बना देंगें. अपनी ईजा को बोल कि कल बड़ा बनाने के लिये रात से मास (उड़द की दाल) भिगो देना."

कका की बातों से थोड़ी निराशा झलक रही थी. मैने उनसे पूछा.

harela

"कका बताओ ना… ये हरेला क्या होता और पहाड़ में हरेला कैसे मनाते है. "

कका तो जैसे तैयार ही बैठे थे.

"अब क्या बताऊं भुला.पहाड़ की बात ही कुछ और हुई. हरेला साल में तीन बार मनाया जाने वाला हुआ. एक तो चैत (चैत्र) के महीने में,दूसरा सौण (श्रावण) में और तीसरा असोज (आस्विन) में. जिस दिन हरेला होता है उसके नौ-दस दिन पहले पांच या सात प्रकार के बीजों को एक टोकरी,थाली या पुराने मिठाई के डब्बे में मिटटी डाल के बो दिया जाता है."

"कका ये कौन कौन से बीज होते हैं."

"अरे घरपन जो बीज मिल गये सबको बो दिया जाने वाला हुआ. जैसे गेहूं, धान, जौ, भट्ट,जुनाव (मक्का),मादिरा, राई, गहत, मास (उड़द),चना, सरसों. जो हाथ पड़ गया.इसका कोई खास विधान नहीं हुआ. लेकिन यह विषम संख्या पांच या सात होने चाहिये. फिर इन सबके ऊपर मिटटी डाल के उस टोकरी या थाली को घर में ही द्याप्ताथान (मन्दिर) में रख दिया जाता है. हर दिन पूजा करते समय थोड़ा थोड़ा पानी छिड़का जाता है. तीन-चार दिन के बाद उन बीजो में से अंकुर निकल जाते है.इन्हे ही हरयाव (हरेला) कहा जाता है.नौवे या दसवे दिन इनको काटा जाता है.जैसे चैत वाला हरेला चैत के पहले दिन बोया जाता है और नवमी को काटा जाता है. सौण का हरेला सौण लगने से नौ दिन पहले अषाड़ में बोया जाता है और दस दिन बाद काटा  जाता है. असोज (आश्विन) वाला हरेला नवरात्र के पहले दिन बोया जाता है और दशहरे  के दिन काटा जाता है."

"ओ…लेकिन हरेला मनाया क्यों जाता है कका."

"भुला हमारी लोक-संस्कृति में बहुत सी चीजें.. वो क्या कहते हैं… साइंटिफिक तरीके से बनायी गयी ठहरी."

"वाह कका आप तो अंग्रेजी भी बोलने लगे."

"तीन हरेले तीन मौसमों के आने की सूचना देने वाले हुई. चैत का हरेला मतलब गरमी आ गयी,सौण का हरेला मतलब बरसा का मौसम आ गया और असोज का हरेला मतलब …"

"ठंड का मौसम शुरु हो गया."

"बिल्कुल सही."

"लेकिन आप कह रहे थे ना आप लोग डिकारे बनाते थे. वह क्या होता है कका."

"बताता हूँ चेला वह भी बताता हूँ. पहले अपनी ईजा को बोल ना एक गिलास चहा बणै दे."

"ठीक है."… मैंने माँ को चाय बनाने को कहा और आकर फिर कका के पास बैठ गया.

"सौण (श्रावण) महीने के हरेले का विशेष महत्व होने वाला हुआ. यह महीना तो शंकर जी का महीना हुआ. इसलिये इस हरेले को कही कही हर-काली के नाम से भी जाना जाता है.तो सौण वाले हरेले में मिट्टी से शिव ज्यू का पूरा परिवार बनाया जाने वाला हुआ और फिर उसकी पूजा की जाने वाली हुई."

"मिट्टी से! ..मिट्टी से कैसे."

"अरे डिकारे का मतलब ही हुआ प्राकृतिक चीजों का प्रयोग कर मूर्तियाँ बनाना…. तो डिकारे ऐसी ही चीजों के बनाये जाने वाले ठहरे.बचपन में हम लोग लाल मिट्टी लेकर आने वाले ठहरे और फिर महीन कर उसमें रुई मिला कर सानने वाले हुए.उसे थोड़ी देर छोड़ देने वाले हुई. फिर उसी मिट्टी से शिव ज्यू, पार्वती ज्यू और गणेश बनने वाले हुए.बांकी तो लोग अपनी मर्जी से देवी-देवता बना लेने वाले हुए.कुछ लोग केले के तने और पत्तों से भी मूर्ति बनाने वाले हुए. डिकारे बनाकर उनको हलकी धूप या छाया में सुखाया जाने वाला हुआ ताकि उसके चटकने का डर ना हो.सूखने के बाद चावल के विश्वार (घोल) से हल्के सफेद रंग का लेप करने वाले हुए.कई बार गोंद मिले रंग भी लगाये जाने वाले हुए. पहले से तो रंग भी घर में बन जाने वाले हुए.ये रंग किलमोड़े के फूल, अखरोट व पांगर के छिलकों से बनने वाले हुए.काला रंग बनाने के लिये कोयला पीस देने वाले हुए.आजकल तो बाजार में मिलने वाले सिन्थेटिक रंग ही प्रयोग में लाये जाते हैं.फिर उन रंगों से देवी-देवताओं के आंख,नाक,मुँह बनाने वाले हुए."

"तो फिर डिकारों में नाक,मुँह बनाने के लिये कोई ब्रश वगैरह यूज करते हैं क्या." ..मुझे जिज्ञासा हुई.

"बुरुश कहां मिलने वाला हुआ.हम या तो लकड़ी की तीलियों से रंग करने वाले हुए या माचिस की तीली में रुई लगाकर उससे रंग भरने वाले हुए."

"और हरेले के दिन क्या क्या होता है ?"

"हरेले वाले दिन घर में पूरी,पकवान जैसे पुआ,बड़ा बनाये जाते हैं.हरेला काटने के बाद इसमे अक्षत-चंदन डालकर भगवान को लगाया जाता है.मंत्रोच्चार किया जाता है रोग शोक निवारणार्थ प्राण रक्षक वनस्पते, इदा गच्छ नमस्तेस्तु हर देव नमोस्तुते. फिर घर के सभी सदस्यों को हरेला लगाया जाता है. हरेला लगाने के लिये सर व कान पर हरेले के तिनके रखे जाते है.एक दूसरे को "जी रया, जागि रया यो दिन यो मास भेटने रैया" कह के आशीर्वाद दिया जाता है. छोटे बच्चो को हरेला पैर से ले जाकर सर तक लगाया जाता है."

"हाँ मुझे याद है जब में छोटा था तो आमा ऐसे ही लगाती थी और साथ में कुछ मंत्र जैसा भी कहती थी."

"हाँ सबके दीर्घायू होने की कामना की जाती है और कहा जाता है."

लाग हरेला, लाग बग्वाई,
जी रए, जाग रए.
स्याव जस बुद्धि हैजो, सूर्ज जस तरान हैजो 
आकाश बराबर उच्च है जै, धरती बराबर चकाव है जै
दूब जस फलिये
हिमाल में ह्यूं छन तक, गंग ज्यू में पानी छन तक
सिल पिसि भात खाये, जांठि टेकि झाड़ जाये

"इसका मतलब क्या हुआ कका."

इसका मतलब हुआ कि "तुझे यह हरेला मिले,जीते रहो,जागरूक रहो,तुम्हारी सियार के समान तेज बुद्धि हो,सूर्य के समान त्राण हो,तुम आकाश के समान ऊंचाइयां छुओ, पृथ्वी के समान धैर्ययुक्त बनो, दूर्वा के तृणों के समान पनपो,जब तक हिमालय में हिम रहे गंगा नदी में पानी रहे तब तक जियो,इतने दीर्घायु हो कि तुम्हें भात भी पीस कर खाना पड़े (दांत टूट जाने पार) और शौच जाने के लिए भी लाठी का उपयोग करना पड़े."

"वाह यह तो बहुत अच्छी कामना है."

"और हरेले के पीछे एक मतलब और भी है कि हम प्रकृति का सम्मान करें,आदर करें.कुछ इलाकों में हरेले के दिन नये पेड़ लगाये जाते हैं.हरेला वैसे तो कुमाऊं का मुख्य त्यौहार है लेकिन यह गढ़वाल में भी मनाया जाता है,वहां इसे हरियाली पर्व कहा जाता है."

"मुझे याद है बेटा… बचपन में तो हरेले के दिन गोठ के जानवरों को भी हम हरेला लगाने वाले हुए.अपने नाते-रिश्तेदारों को लिफाफे में सूखा पिठ्या,अक्षत और हरेले के तिनड़े (तिनके) भेजने वाले हुए.साथ में लिखने वाले हुए "आज हरेला भेज रहे हैं सिरोधार्य करना".चिट्ठी मिलने पर हरेला सिर पर रखने वाले भी हुए.हरेले के दिन कान में हरेला लगा कर बढ़े-बूढ़ों का आशीर्वाद लेकर स्कूल जाने वाले हुए."

तब तक चाय आ गयी.कका चाय लेकर पीने लगे और पुरानी यादों में खो गये.मैं भी कका को उन यादों के साथ छोड़कर चल दिया.मुझे हरेले के बारे में कई नई बातें पता चल गयीं थी. 

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आप सभी को हरेले की शुभकामनाऐं.

मुगल वंश हो तो ऐसा

समुद्र तल और ग़रीबी रेखा से नीचे

आये दिन के चालान, तावान से वो तंग आ चुके थे। कैसा अंधेर है। सारे देश में यही एक जुर्म रह गया है! बहुत हो चुकी। अब वो इसका दो टूक फ़ैसला करके छोड़ेंगे। मौलाना करामत हुसैन से वो एक बार मिल चुके थे और सारी दहशत निकल चुकी थी। पौन इंच कम पांच फ़ुट का पोदना! उसकी गर्दन उनकी कलाई के बराबर थी। गोल चेहरे और तंग माथे पर चेचक के दाग़ ऐसे चमकते थे, जैसे तांबे के बर्तन पर ठुंके हुए खोपरे। आज वो घर का पता मालूम करके उसकी खबर लेने जा रहे थे। पूरा डायलॅाग हाथ के इशारों और आवाज के उतार-चढ़ाव के साथ तैयार था। उन्हें मौलाना करामत हुसैन की झुग्गी तलाश करने में काफ़ी परेशानी हुई। हालांकि बताने वाले ने बिल्कुल सही पता बताया था कि झुग्गी बिजली के खंबे नं.-23 के पीछे कीचड़ की दलदल के उस पार है। तीन साल से खंबे बिजली के इंतजार में खड़े हैं। पते में उसके दायीं ओर एक ग्याभिन भैंस बंधी हुई बतायी गयी थी। सड़कें, न रास्ते, गलियां, न फुटपाथ। ऐसी बस्तियों में घरों के नंबर या नाम का बोर्ड नहीं होता। प्रत्येक घर का एक इंसानी चेहरा होता है, उसी के पते से घर मिलता है। खंबा तलाश करते-करते उन्हें अचानक एक झुग्गी के टाट के पर्दे पर मौलाना का नाम सुर्ख़ रोशनाई से लिखा नजर आया। बारिश के पानी के कारण रोशनाई बह जाने से नाम की लकीरें खिंची रह गई थीं। चारों ओर टख़नों-टख़नों बजबजाता कीचड़, सूखी जमीन कहीं दिखायी नहीं पड़ती थी। चलने के लिये लोगों ने पत्थर और ईंटें डालकर पगडंडियां बना लीं थीं। एक नौ-दस साल की बच्ची सर पर अपने से अधिक भारी घड़ा रखे अपनी गर्दन तथा कमर की हरकत से पैरों को डगमगाते पत्थरों और घड़े को सर पर संतुलित करती चली आ रही थी। उसके चेहरे पर पसीने के रेले बह रहे थे। रास्ते में जो भी मिला, उसने बच्ची को संभल कर चलने का मशवरा दिया। थोड़ी-थोड़ी दूरी पर पांच-छः ईंटों का ट्रैफ़िक आईलैंड आता था, जहां जाने-वाला आदमी खड़े रह कर आने-वाले को रास्ता देता था। झुग्गियों के भीतर भी कुछ ऐसा ही नक़्शा था। बच्चे, बुजुर्ग और बीमार दिन भर ऊंची-ऊंची खाटों और खट्टों पर टंगे रहते। क़ुरान-शरीफ़, लिपटे हुए बिस्तर, बर्तन-भांडे, मैट्रिक के सर्टिफ़िकेट, बांस के मचान पर तिरपाल तले और तिरपाल के ऊपर मुर्ग़ियां। मौलाना करामत हुसैन ने झुग्गी के एक कोने में खाना पकाने के लिये एक टीकरी पर चबूतरा बना रखा था। एक खाट के पाये से बकरी भी बंधी थी। कुछ झुग्गियों के सामने भैंसे चड़ में धंसी थीं और उनकी पीठ पर कीचड का प्लास्टर पपड़ा रहा था। यह भैंसों की जन्नत थी। इनका गोबर कोई नहीं उठाता था। क्योंकि उपले थापने के लिये कोई दीवार या सूखी जमीन नहीं थी। गोबर भी इंसानी गंदगी के साथ इसी कीचड़ में मिल जाता था। इन्हीं झुग्गियों में टीन की चादर के सिलेंडर नुमा डिब्बे भी दिखायी दिये। जिनमें दूध भरने के बाद सदर की सफ़ेद टाइलों वाली डेरी की दुकानों में पहुंचाया जाता था। एक लंगड़ा कुत्ता झुग्गी के बाहर खड़ा था। उसने अचानक ख़ुद को झड़झड़ाया तो उसके घाव पर बैठी हुई मक्खियों और अध-सूखे कीचड़ के छर्रे उड़-उड़ कर बिशारत की क़मीज और चेहरे पर लगे।

मुग़ल वंश का पतन

बिशारत ने झुग्गी के बाहर खड़े होकर मौलाना को आवाज दी। हालांकि उसके ‘अंदर’ और ‘बाहर’ में कुछ ऐसा अंतर नहीं था। बस चटाई, टाट और बांसों से अंदर के कीचड़ और बाहर के कीचड़ के बीच हद बंदी करके एक काल्पनिक एकांत, एक संपत्ति की लक्ष्मण रेखा खींच ली गई थी। कोई जवाब न मिला तो उन्होंने हैदराबादी अंदाज से ताली बजायी, जिसके जवाब में अंदर से छः बच्चों का तले ऊपर की पतीलियों का-सा सेट निकल आया। इनकी आयु में नौ-नौ महीने से भी कम का अंतर दिखायी दे रहा था। सबसे बड़े लड़के ने कहा, मग़रिब की नमाज पढ़ने गये हैं। तशरीफ़ रखिये। बिशारत की समझ में न आया, कहां तशरीफ़ रखें। उनके पैरों-तले ईंटें डगमगा रही थीं। सड़ांध से दिमाग़ फटा जा रहा था। ‘‘जहन्नुम अगर इस धरती पर कहीं हो सकता है तो, यहीं है, यहीं है, यहीं है।’’

वो दिल-ही-दिल में मौलाना को डांटने का रिहर्सल करते हुए आये थे-यह क्या अंधेर है मौलाना? किचकिचा कर मौलाना कहने के लिये उन्होंने बड़े कटाक्ष और कड़वाहट से वह स्वर कम्पोज किया था-जो बहुत सड़ी गाली देते समय अपनाया जाता है, लेकिन झुग्गी और कीचड़ देखकर उन्हें अचानक ख़याल आया कि मेरी शिकायत पर इस व्यक्ति को अगर जेल हो भी जाये तो इसके तो उल्टे ऐश हो जायेंगे। मौलाना पर फेंकने के लिये लानत-मलामत के जितने पत्थर वो जमा करके आये थे, उन सब पर दाढ़ियां लगाकर नमाज की चटाइयां लपेट दी थीं ताकि चोट भले ही न आये, शर्म तो आये-वो सब ऐसे ही धरे रह गये। उनका हाथ जड़ हो गया था। इस व्यक्ति को गाली देने से फ़ायदा? इसका जीवन तो ख़ुद एक गाली है। उनके गिर्द बच्चों ने शोर मचाना शुरू किया तो सोच का सिलसिला टूटा। उन्होंने उनके नाम पूछने शुरु किये। तैमूर, बाबर, हुमायूं, जहांगीर, शाहजहां, औरंगज़ेब, या अल्लाह! पूरा मुग़ल वंश इस टपकती झुग्गी में ऐतिहासिक रूप से सिलसिलेवार उतरा है। ऐसा लगता था कि मुग़ल बादशाहों के नामों का स्टॉक समाप्त हो गया, मगर औलादों का सिलसिला समाप्त नहीं हुआ। इसलिये छुटभैयों पर उतर आये थे।

मिसाल के तौर पर एक जिगर के टुकड़े का प्यार का नाम मिर्जा कोका था जो अकबर का दूध-शरीक भाई था, जिसको उसने क़िले की दीवार पर से नीचे फिंकवा दिया था। अगर सगा भाई होता तो इससे भी कड़ी सजा देता यानी समुद्री डाकुओं के हाथों क़त्ल होने के लिये हज पर भेज देता या आंखें निकलवा देता। वो रहम की अपील करता तो भाई होने के नाते दया और प्रेम की भावना दिखाते हुए जल्लाद से एक ही वार में सर क़लम करवा कर उसकी मुश्किल आसान कर देता।

हम अर्ज यह कर रहे थे कि तैमूरी ख़ानदान के जो बाक़ी कुलदीपक झुग्गी के अंदर थे, उनके नाम भी तख़्त पर बैठने, बल्कि तख़्ता उलटने के क्रम के लिहाज से ठीक ही होंगे, इसलिये कि मौलाना की स्मरणशक्ति और इतिहास का अध्ययन बहुत अच्छा प्रतीत होता था। बिशारत ने पूछा तुममें से किसी का नाम अकबर नहीं? बड़े लड़के ने जवाब दिया, नहीं जी, वो तो दादा जान का शायरी का उपनाम है।

बातचीत का सिलसिला कुछ उन्होंने कुछ बच्चों ने शुरू किया। उन्होंने पूछा, तुम कितने भाई-बहन हो? जवाब में एक बच्चे ने उनसे पूछा, आपके कितने चचा हैं? उन्होंने पूछा, तुम में से कोई पढ़ा हुआ भी है? बड़े लड़के तैमूर ने हाथ उठा कर कहा, जी हां, मैं हूं। मालूम हुआ यह लड़का जिसकी उम्र तेरह-चौदह साल होगी, मस्जिद में बग़दादी क़ायदा पढ़ कर कभी का निबट चुका। तीन साल तक पंखे बनाने की एक फ़ैक्ट्री में मुफ़्त काम सीखा। एक साल पहले दायें हाथ का अंगूठा मशीन में आ गया, काटना पड़ा। अब एक मौलवी साहब से अरबी पढ़ रहा है। हुमायूं अपने हमनाम की भांति अभी तक आवारागर्दी की मंजिल से गुजर रहा था। जहांगीर तक पहुंचते-पहुंचते पाजामा बार-बार हो रहे राजगद्दी परिवर्तन की भेंट चढ़ गया। हां! शाहजहां का शरीर फोड़ों, फुँसियों पर बंधी पट्टियों से अच्छी तरह ढंका हुआ था। औरंगज़ेब के तन पर केवल अपने पिता की तुर्की टोपी थी। बिशारत को उसकी आंखें और उसे बिशारत दिखायी न दिये। सात साल का था, मगर बेहद बातूनी। कहने लगा, ऐसी बारिश तो मैंने सारी जिंदगी में नहीं देखी। हाथ पैर माचिस की तीलियां, लेकिन उसके ग़ुब्बारे की तरह फूले हुए पेट को देखकर डर लगता था कि कहीं फट न जाये। कुछ देर बाद नन्हीं नूरजहां आयी। उसकी बड़ी-बड़ी आंखों में काजल और कलाई पर नजर-गुजर का डोरा बंधा था। सारे मुंह पर मैल, काजल, नाक, और धूल लिपी हुई थी। केवल वो हिस्से इससे अलग थे जो अभी-अभी आंसुओं से धुले थे। उन्होंने उसके सर पर हाथ फेरा। उसके सुनहरे बालों में गीली लकड़ियों के कड़वे-कड़वे धुएं की गंध बसी हुई थी। एक भोली-सी सूरत का लड़का अपना नाम शाह आलम बता कर चल दिया। आधे रास्ते से लौट कर कहने लगा कि मैं भूल गया था। शाह आलम तो बड़े भाई का नाम है। ये सब मुग़ल शहजादे कीचड़ में ऐसे मजे से फचाक-फचाक चल रहे थे जैसे इनकी वंशावली अमीर तैमूर के बजाये किसी राजहंस से मिलती हो। हर कोने-खुदरे से बच्चे उबले पड़ रहे थे। एक कमाने वाला और यह टब्बर! दिमाग़ चकराने लगा।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार/शनिवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की तीसरे भाग “स्कूल मास्टर का ख़्वाब से " ]

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

इस भाग की पिछली कड़ियां

1. हमारे सपनों का सच 2. क़िस्सा खिलौना टूटने से पहले का 3. घोड़े को अब घोड़ी ही उतार सकती है 4. सवारी हो तो घोड़े की 5. जब आदमी अपनी नजर में गिर जाये 6. अलाहदीन अष्टम 7. शेरे की नीयत और बकरी की अक़्ल में फ़ितूर 8.महात्मा बुद्ध बिहारी थे 9.घोड़े का इलाज जादू से 10.कुत्तों के चाल चलन की चौकीदारी

पहला और दूसरा भाग 11. कौन किसका खाना है?

"दैनिक भास्कर" में "विस्फोट"

कुछ समय पहले समकाल में संजय तिवारी जी का लेख छ्पा था जिसमें उन्होने हिन्दी ब्लॉग जगत के बारे में लिखा था. उसके बाद भी वह कुछ समय तक समकाल में लिखते रहे. पिछ्ले कई महीनों से वह अपने अलग डोमेन पर चले गये हैं और अपनी पत्रिका विस्फोट के द्वारा कई सामयिक मुद्दों को उठाते रहे हैं.

कल दैनिक भास्कर (इन्दौर) ने उनकी इस पहल की सराहना की है. आप भी पढ़ें.

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कौन किसका खाना है?

अकेलेपन का साथी

इस क़िस्से से हमने उन्हें सीख दिलायी। क़िबला ने दूसरे पैंतरे से घोड़ी खरीदने का विरोध किया। वो इस बात पर ग़ुस्से से भड़क उठते थे कि बिशारत को उनके चमत्कारी वजीफ़े पर विश्वास नहीं। वो ख़ासे गलियर थे। बेटे को खुल कर तो गाली नहीं दी। बस इतना कहा कि अगर तुम्हें अपना वंश चलाने के लिये पेडिग्री घोड़ी ही रखनी है तो शौक़ से रखो, मगर मैं ऐसे घर में एक मिनट नहीं रह सकता। उन्होंने यह धमकी भी दी कि जहां बलबन घोड़ा जायेगा वो भी जायेंगे।

क़िस्सा दरअस्ल यह था कि क़िबला और घोड़ा एक दूसरे से इस हद तक घुल-मिल चुके थे कि अगर घर वाले न रोकते तो वे उसे ड्राइंग रूम में अपनी चारपाई के पाये से बंधवा कर सोते। वो भी उनके पास आकर अपने-आप सर नीचा कर लेता ताकि वो उसे बैठे-बैठे प्यार कर सकें। वो घंटों मुंह-से-मुंह भिड़ाये उससे घर वालों और बहुओं की शिकायतें और बुराइयां करते रहते। बच्चों के लिये वो जीता-जागता खिलौना था। क़िबला कहते थे जब से यह आया है, मेरे हाथ का कंपकंपाना कम हो गया है और बुरे सपने आने बंद हो गये हैं। वो अब उसे बेटा कहने लगे थे। सदा के रोगी से अपने-पराये सब उकता जाते हैं। एक दिन वो चार-पांच घंटे दर्द से कराहते रहे, किसी ने खबर न ली। शाम को घबराहट और मायूसी अधिक बढ़ी तो रसोइये से कहा कि बलबन बेटे को बुलाओ। बुढ़ापे और बीमारी के भयानक सन्नाटे में यह दुखी घोड़ा उनका अकेला साथी था।

इक तर निवाले की सूरत

घोड़े को जोत नहीं सकते, बेच नहीं सकते, मरवा नहीं सकते, खड़े खिला नहीं सकते, फिर करें तो क्या करें। जब ब्लैक मूड आता तो अंदर-ही-अंदर खौलते और अक्सर सोचते कि सेठ, सरमायेदार, वडेरे, जागीरदार और बड़े अफ़सर अपनी सख़्ती और करप्शन के लिये जमाने-भर में बदनाम हैं। मगर, यह “अत्याचार वाले” दो टके के आदमी किससे कम हैं। उन्हें इससे पूर्व ऐसे प्रतिक्रियावादी और आक्रांतकारी विचार कभी नहीं आये थे। उनकी सोच में इंसानों से परेशान व्यक्ति की झुंझलाहट उतर आयी। ये लोग तो ग़रीब हैं, दुःखी हैं, मगर यह किसको छोड़ते हैं। संतरी बादशाह भी तो ग़रीब है, वो रेहड़ी वाले को कब छोड़ता है और ग़रीब रेहड़ी वाले ने कल शाम आंख बचाकर एक सेर सेबों में दो दाग़दार सेब मिलाकर तोल दिये। उसकी तराजू एक छटांक कम तोलती है। केवल एक छटांक इसलिये कि एक मन कम तोलने की गुंजाइश नहीं। स्कूल मास्टर दया और आदर के योग्य हैं। मास्टर नजमुद्दीन बरसों से चीथड़े लटकाये जालिम समाज को कोसते फिरते हैं। उन्हें साढ़े-चार सौ रुपये खिलाये, तब जा के भांजे के मैट्रिक के नंबर बढ़े और रहीमबख़्श कोचवान से बढ़कर बदहाल कौन होगा? जुल्म, जालिम और जुल्म सहने वाले दोनों को खराब करता है। जुल्म का पहिया जब अपना चक्कर पूरा कर लेता है और मजलूम की बारी आती है तो वो भी वही सब करता है जो उसके साथ किया गया था। अजगर पूरे का पूरा निगलता है, शार्क दांतों से ख़ूनम-ख़ून करके खाती है। शेर डॉक्टरों के बताये नियमों के अनुसार अच्छी तरह चबा-चबा के खाता है। बिल्ली, छिपकली, मकड़ी और मच्छर अपनी-अपनी हिम्मतानुसार ख़ून की चुस्की लगाते हैं। वो यहां तक पहुंचे थे कि सहसा उन्हें अपने इन्कमटैक्स के डबल बहीखाते याद आ गये और वो अनायास मुस्कुरा उठे। भाई मेरे! छोड़ता कोई नहीं, हम सब एक-दूसरे का खाना हैं। बड़े जतन से एक-दूसरे को चीरते-फाड़ते हैं। ‘तब नजर आती है इक लुक़्म-ए-तर की सूरत’

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार/शनिवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की तीसरे भाग “स्कूल मास्टर का ख़्वाब से " ]

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

इस भाग की पिछली कड़ियां

1. हमारे सपनों का सच 2. क़िस्सा खिलौना टूटने से पहले का 3. घोड़े को अब घोड़ी ही उतार सकती है 4. सवारी हो तो घोड़े की 5. जब आदमी अपनी नजर में गिर जाये 6. अलाहदीन अष्टम 7. शेरे की नीयत और बकरी की अक़्ल में फ़ितूर 8.महात्मा बुद्ध बिहारी थे 9.घोड़े का इलाज जादू से 10.कुत्तों के चाल चलन की चौकीदारी

पहला और दूसरा भाग

कुत्तों के चाल चलन की चौकीदारी

एक घोड़ा भरेगा कितने पेट ?

जिस दिन से दाढ़ी वाले मौलाना नियुक्त हुए, रहीमबख़्श हर चौथे-पांचवें दिन आ के सर पे खड़ा हो जाता। “चंदा दीजिये।“ परन्तु ढाई – तीन रुपये या अधिक-से-अधिक पांच में आयी बला टल जाती। उससे जिरह की तो पता चला कि कराची में तांगे अब केवल इसी इलाक़े में चलते हैं। तांगे वालों का हाल घोड़ों से भी खराब है। उन्होंने पुलिस और ‘‘अत्याचार’’ वालों का नाम-मात्र को महीना बांध रखा है, जो उनकी गुजर बसर के लिये बिल्कुल अपर्याप्त है। उधर नंगे, भूखे गधा गाड़ी वाले मकरानी सर फाड़ने पर उतर आते हैं। घायल गधा, पसीने में तर-ब-तर गधागाड़ी वाला और फटे हाल ‘‘अत्याचार’’ का इंस्पेक्टर। यह निर्णय करना मुश्किल था कि इनमें कौन अधिक बदहाल और जुल्म का शिकार है। यह तो ऐसा ही था जैसे एक सूखी-भूखी जोंक, दूसरी सूखी-भूखी ज़ोंक का ख़ून पीना चाहे। नतीजा यह कि ‘‘अत्याचार वाले’’ तड़के ही इकलौती मोटी आसामी यानी उनके तांगे की प्रतीक्षा में गली के नुक्कड़ पे खड़े हो जाते और अपने पैसे खरे करके चल देते। अकेला घोड़ा सारे स्टाफ़ के बाल-बच्चों का पेट पाल रहा था। लेकिन करामत हुसैन (दाढ़ी वाले मौलाना का यही नाम था) का मामला कुछ अलग था। वो अपने हुलिये और फटे-हाल होने के कारण ऐसे दिखायी पड़ते थे कि लगता था उन्हें रिश्वत देना पुण्य का काम है और वो रिश्वत लेकर वास्तव में रिश्वत देने वाले को पुण्य कमाने का अवसर प्रदान कर रहे हैं। वो रिश्वत मांगते भी ऐसे थे जैसे दान मांग रहे हों। ऐसा प्रतीत होता था कि उनके भाग का सारा अन्न घोड़े की लंगड़ी टांग के माध्यम से ही उतरता है। ऐसे फटीचर रिश्वत लेने वाले के लिये उनके भीतर न कोई सहानुभूति थी न डर।

कुत्तों के चाल चलन की चौकीदारी

दोस्तों ने सलाह दी कि घोड़े को इंजेक्शन से ठिकाने लगवा दो, लेकिन उनका मन नहीं मानता था। क़िबला तो सुनते ही रुआंसे हो गये। कहने लगे आज लंगड़े घोड़े की बारी है, कल अपाहिज बाप की होगी। शरीफ़ घरानों में आयी हुई दुल्हन और जानवर तो मर कर ही निकलते हैं। वो स्वयं तीन दुल्हनों के जनाज़े निकाल चुके थे, इसलिये घोड़े के बारे में भी ठीक ही कहते होंगे। रहीम बख़्श भी घोड़े की हत्या कराने का कड़ा विरोध करता था। जैसे ही बात चलती, अपना तीस वर्ष के अनुभव बताने बैठ जाता। यह तो हमने भी सुना था कि इतिहास अस्ल में बड़े लोगों की बायोग्राफ़ी है परंतु रहीमबख़्श कोचवान की सारी आटोबायोग्राफ़ी दरअस्ल घोड़ों की बायोग्राफ़ी थी। उसके जीवन से एक घोड़ा पूरी तरह निकल नहीं पाता था कि दूसरा आ जाता। कहता था कि उसके तीन पूर्व-मालिकों ने ‘‘वैट’’ से घोड़ों को जहर के इंजेक्शन लगवाये थे। पहला मालिक तीन दिन के भीतर चटपट हो गया। दूसरे का चेहरा लक़वे से ऐसा टेढ़ा हुआ कि दायीं बांछ कान की लौ से जा मिली। एक दिन ग़लती से आईने में ख़ुद पर नजर पड़ी तो घिग्घी बंध गयी। तीसरे की पत्नी जॅाकी के साथ भाग गई। देखा जाये तो इन तीनों में-जो तुरंत मर गया, उसीका अंत सम्मानजनक मालूम होता है।

उन्हीं दिनों एक साईस ने सूचना दी कि लड़काना में एक घोड़ी तेलिया कुमैत बिलकुल मुफ़्त यानी तीन सौ रुपये में मिल रही है। बस वडेरे के दिल से उतर गई है। गन्ने की फ़स्ल की आमदनी से उसने गन्ने ही से लम्बाई नाप कर एक अमरीकी कार ख़रीद ली है। आपकी सूरत पसंद आ गई तो हो सकता है मुफ़्त ही दे दे। इसका विरोध पहले हमने और बाद में क़िबला ने किया। उन दिनों कुत्ते पालने का नया-नया शौक़ हुआ था। हर बात उन्हीं के संदर्भ में करते थे। कुत्तों के लिये अचानक मन में इतना आदर-भाव पैदा हो गया था कि कुतिया को मादा-कुत्ता कहने लगे थे।

हमने बिशारत को समझाया कि ख़ुदा के लिये मादा घोड़ा न ख़रीदो। आमिल कालोनी में दस्तगीर साहब ने एक मादा-कुत्ता पाल लिया है। किसी शुभचिंतक ने उन्हें सलाह दी थी कि जिस घर में कुत्ते हों, वहां फ़रिश्ते, बुजुर्ग और चोर नहीं आते। उस जालिम ने यह न बताया कि फिर सिर्फ़ कुत्ते ही आते हैं। अब सारे शहर के बालिग़ कुत्ते उनकी कोठी का घेराव करे पड़े रहते हैं। शहजादी स्वयं शत्रु से मिली हुई है।

ऐसी तनदाता नहीं देखी। जो ब्वॅाय स्काउट का ‘‘मोटो’’ है-वही उसका-Be Prepared-मतलब यह कि हर आक्रमणकारी से सहयोग के लिये पूरे तन-मन से तैयार रहती है। फाटक खोलना असंभव हो गया है। महिलाओं ने घर से निकलना छोड़ दिया। पुरुष स्टूल रखकर फाटक और कुत्ते फलांगते हैं। दस्तगीर साहब इन कुत्तों को दोनों वक़्त नियमित रूप से खाना डलवाते हैं, ताकि आने-जाने वालों की पिंडलियों से अपना पेट न भरें। एक बार खाने में जहर डलवा कर भी देख लिया। गली में मुर्दा कुत्तों के ढेर लग गये। अपने ख़र्च पर उनको दफ़्न किया। एक साहब का पालतू कुत्ता जो बुरी संगत में पड़ गया था, उस रात घर वालों की नजर बचा कर सैर-तमाशे को चला आया था, वो भी वहीं खेत रहा। इन चंद कुत्तों के मरने से जो रिक्त-स्थान पैदा हुआ, वो इसी प्रकार पूरा हुआ जैसा साहित्य और राजनीति में होता है। हम तो इतना जानते हैं कि स्वयं को Indispensable समझने वालों के मरने से जो रिक्त-स्थान पैदा होता है, वह वास्तव में केवल दो गज जमीन में होता है, जो उन्हीं के पार्थिव शरीर से उसी समय पूरा हो जाता है। ख़ैर! यह एक अलग क़िस्सा है। कहना यह था कि अब दस्तगीर साहब सख़्त परेशान हैं। ख़ानदानी मादा है। नीच जात के कुत्तों से वंशावली बिगड़ने का डर है। मैंने तो दस्तगीर साहब से कहा था कि इनका ध्यान बंटाने के लिये कोई मामूली जात की कुतिया रख लीजिये ताकि कम-से-कम यह धड़का तो न रहे, रातों की नींद तो हराम न हो। इतिहास में आप पहले व्यक्ति हैं जिसने कुत्तों के चाल-चलन की चौकीदारी का बीड़ा उठाया है।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार/शनिवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की तीसरे भाग “स्कूल मास्टर का ख़्वाब से " ]

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

इस भाग की पिछली कड़ियां

1. हमारे सपनों का सच 2. क़िस्सा खिलौना टूटने से पहले का 3. घोड़े को अब घोड़ी ही उतार सकती है 4. सवारी हो तो घोड़े की 5. जब आदमी अपनी नजर में गिर जाये 6. अलाहदीन अष्टम 7. शेरे की नीयत और बकरी की अक़्ल में फ़ितूर 8.महात्मा बुद्ध बिहारी थे 9.घोड़े का इलाज जादू से

पहला और दूसरा भाग

घोड़े का इलाज जादू से

जादू मंत्र द्वारा उपचार

रिश्वत और मालिश की रक़म अब घोड़े की क़ीमत और उनकी सहनशक्ति की सीमा को पार कर चुकी थी। पकड़-धकड़ का सिलसिला किसी प्रकार समाप्त होने में नहीं आता था। तंग आकर उन्होंने रहीम बख़्श की जबानी इंस्पेक्टर को यह तक कहलाया कि तुम मेरी दुकान में उगाही की नौकरी कर लो। तुम्हारी तनख़्वाह से अधिक दूंगा। उसने कहला भेजा “सेठ को मेरा सलाम बोलना और कहना कि हम तीन हैं।“ उन्होंने घोड़ा-तांगा बेचना चाहा तो किसी ने सौ रुपये भी न लगाये। अंततः अपने वालिद से इस बारे में बात की। वो सारा हाल सुनकर कहने लगे “इसमें परेशानी की कोई बात नहीं। हम दुआ करेंगे। तांगे में जोतने से पहले एक गिलास फूंक मारा हुआ दूध पिला दिया करो। अल्लाह ने चाहा तो लंग जाता रहेगा और चालानों का सिलसिला भी बंद हो जायेगा। एक बार वजीफ़े का असर तो देखो। आदरणीय ने उसी समय रहीमबख़्श से बिस्तर पर हार्मोनियम मंगाया। वो धोंकनी से हवा भरता रहा और आदरणीय कांपती-कंपकंपाती आवाज में हम्द (ईश्वर की स्तुति) गाने लगे। आंख जहां पड़ती, वहां उंगली नहीं पड़ रही थी और जिस पर्दे पर उंगली पड़ती, उस पर पड़ी ही रह जाती। एक पंक्ति गाने और बजाने के बाद यह कहकर लेट गये कि इस हार्मोनियम के काले पर्दे के जोड़ अकड़ गये हैं। मास्टर बाक़र अली ने क्या ख़ाक मरम्मत की है!

दूसरे दिन आदरणीय की चारपाई ड्राइंग रूम में आ गई। क्योंकि यही ऐसा कमरा था जहां घोड़ा रोज सुब्ह अपने माथे पर "अल्लाह" लिखवाने और फ़ूंक मारने के लिये अंदर लाया जा सकता था। तड़के आदरणीय ने नमाज के बाद गुलाब जल में उंगली डुबो कर घोड़े के माथे पर "अल्लाह" लिखा और खुरों को लोबान की धूनी दी। कुछ देर बाद उस पर साज कसा जाने लगा तो बिशारत दौड़े-दौड़े क़िबला के पास आये और कहने लगे घोड़ा दूध नहीं पी रहा। क़िबला हैरान हुए। फिर आंखें बंद करके सोच में पड़ गये। कुछ पलों के बाद आंखें अधखुली करके बोले, कोई हरज नहीं कोचवान को पिला दो, घोड़ा दांतों के दर्द से पीड़ित है। इसके बाद यह नियम बन गया कि दुआ पढ़कर फ़ूंका गया दूध रहीमबख़्श पीने लगा। ऐसी अरुचि के साथ पीता जैसे उन दिनों यूनानी दवाओं के पियाले पिये जाते थे अर्थात् नाक पकड़ के, मुंह बना बना के। दूध के लिये न जाने कहां से धातु का बहुत लम्बा गिलास ले आया जो उसकी नाभि तक पहुंचता था। क़िबला के उपचार का प्रभाव पहले ही दिन नजर आ गया। वह इस प्रकार कि उस दिन चालान एक दाढ़ी वाले ने किया। रहीमबख़्श अपना लहराता हुआ चाबुक़ हाफ़ मास्ट करके कहने लगा “सरकार! बावजूद धर लिया” फिर उसने विस्तार से बताया कि एक दाढ़ी वाला आज ही जमशेद रोड के हल्क़े से तबादला होकर आया है। बड़ा ही दयालु, अल्लाह-वाला व्यक्ति है। इसलिए केवल साढ़े तीन रुपये लिये, वह भी चंदे के तौर पर। पड़ोस में एक विधवा के बच्चे के इलाज के लिये, आप चाहें तो चल के मिल लीजिये। मिल के बहुत ख़ुश होंगे। हर समय भीतर ही भीतर जाप करता रहता है। अंधेरी रात में सिजदे के निशान से ऐसी रौशनी निकलती है कि सुई पिरो लो। (अपने बाजू से तावीज खोलते हुए) घोड़े के लिये ये तावीज दिया है।

कहां पच्चीस रुपये, कहां साढ़े तीन रुपये! क़िबला ने रिश्वत में कमी को अपने आशीर्वाद और उसके चमत्कार का परिणाम समझा और कहने लगे कि तुम देखते जाओ। इंशाल्लाह चालीसवें दिन “अत्याचार” के इंस्पेक्टर को घोड़े की टांग नजर आनी बंद हो जायेगी। उनकी चारपाई के चारों ओर उनका सामान भी ड्राइंग रूम में सजा दिया गया। दवायें, बैडपैन, हुक़्क़ा, सिलफ़्ची, हार्मोनियम, आग़ा हश्र के ड्रामे, एनीमा का उपकरण और कज्जन एक्ट्रेस का फ़ोटो। ड्राइंग रूम अब इस योग्य नहीं रहा था कि उसमें घोड़े, क़िबला और इन दोनों का पाख़ाना उठाने वाली मेहतरानी के अतिरिक्त कोई और पांच मिनट भी ठहर सके। बिशारत के दोस्तों ने आना छोड़ दिया परंतु वो घोड़े की ख़ातिर क़िबला को सहन कर रहे थे।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार/शनिवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की तीसरे भाग “स्कूल मास्टर का ख़्वाब से " ]

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

इस भाग की पिछली कड़ियां

1. हमारे सपनों का सच 2. क़िस्सा खिलौना टूटने से पहले का 3. घोड़े को अब घोड़ी ही उतार सकती है 4. सवारी हो तो घोड़े की 5. जब आदमी अपनी नजर में गिर जाये 6. अलाहदीन अष्टम 7. शेरे की नीयत और बकरी की अक़्ल में फ़ितूर

पहला और दूसरा भाग