Jun 262007
 

पिछ्ले लेख पर ज्यादा प्रतिक्रियाऎं तो नहीं आयी लेकिन जो  भी आयीं उन्होने कुछ नये प्रश्न खड़े कर दिये.प्रमोद जी बोले

यह दिल्‍ली ही नहीं, मुंबई- कमोबेश किसी भी बड़े भारतीय शहर की अंदरूनी डायरी है. इस अनुभव से नतीजा क्‍या निकलता है? एक तो वह जिसे आप समूहबद्धता की सहूलियत का सीधा, आसान-सा नाम देकर छुट्टी पा सकते हैं. और देखना चाहें तो (मुझे हर जगह वही प्रभावी दीखता है)- कि ऊपरी तौर पर आधुनिकता के दिखावटी हो-हल्‍ले के बावजूद किस तरह यह हमारी एंटी-शहरी, घेटोआइज़्ड और अपनी पहचानी सामूहिकता से बाहर किसी भी अजनबीयत से भारी भय की मानसिकता है! आपको-हमको उतना न दिखे, मगर किसी भी अनजानी व नयी जगह में अल्‍पसंख्‍यक जिसकी सबसे ज्‍यादा तक़लीफ़ें व अलगावपन झेलते व जीते हैं.

 

यानि वो मानते है कि मेरे अनुभव मात्र मेरे अनुभव ही नहीं हैं उनका एक सार्वजनिक सरोकार है.लेकिन वो उन अनुभवों के नतीजे से खुश नहीं उनका कहना है ये नतीजा उतना सहज नहीं जितना मानने की भूल मैं कर रहा हूँ. वरन ये काफी ज़टिल है और इसके मूल में कहीं ना कहीं हमारे अल्पसंख्यक होने पर भय की मानसिकता भी है….मैं उनसे पूरी तरह से सहमत हूँ कि जब हम अल्पसंख्यक होते हैं तो अजनबीयत हमें एक मानसिक भय का अहसास करा देती है… ठीक इसी तरह का भय घुघूती जी की नायिका भी महसूस करती है किन्ही और अर्थों और संदर्भों में…यही भय हमें समूहबद्ध होने के लिये बाध्य करता है…

मसिजीवी जी बोले

काकेश थोड़ा सरलीकरण किए जा रहे हैं, जरा थमिए:
आप दिल्‍ली के बारे में जो कह रहे हैं वह पूरी तरह निराधार नहीं है पर आप बसावट के अधिकांश उदाहरण पेशेगत व क्षेत्र के देकर इसे स्‍वाभाविक कहे दे रहे हैं- जाति की भी भूमिका है उसे नजरअंदाज न करें और धर्म की भी- पर विशेष बात यह कि ये दिल्‍ली की प्रकृति उस रूप में नहीं है जैसी रवीश बता रहे हैं (अगर सच है तो)और फिर ‘अपने जैसे’ लोगों के इकट्ठे होने में जो सेल्‍फ व अदर की गहरी निर्मिति है वही तो ‘दंगे’ की शुरूआत है।
एक नजर ताज एपार्टमेंट (गीता कालोनी) पर भी डाल आएं और स्‍पष्ट हो जाएगा। ये जो अल्‍पसंख्‍यकों में भय-मनोवृत्ति होती है, महानगर उसका निषेध करता है या कहें आदर्श रूप में उसे करना चाहिए पर यदि वह उसका पोषण करने लगे तो ये महानगर का ग्रामीकरण है जो ‘गुजरातों’ को जन्‍म दे सकता है- देता है।

यानि वो भी मान रहे हैं जो मैने कहा वो निराधार नहीं है.वो इस बात से सहमत नहीं हैं कि समूह से जुड़ने में केवल पेशा या क्षेत्र ही महत्वपूर्ण नही होते वरन जाति की भी एक अहम भूमिका होती है.

अभय जी ने चिप्पी लगायी.

मियाँ काकेश, आप की पोस्ट से ज़्यादा आप की पोस्ट पर टिप्पणीकारों से सहमत हुआ जाता हूँ.. आशा है आप बुरा न मानेंगे..प्रमोद जी और मसिजीवी ने पते की बात कही है..

तो वो भी इस बात से सहमत है कि ये चीजे तो हैं ही.तो इस बात पर तो सहमति बनती है कि हम समूहबद्ध होते हैं और इसमें कहीं ना कहीं हमारे मानसिक भय का भी हाथ होता है, हमारे समूहबद्ध होने के कई कारण हो सकते हैं.उन्ही कारणों पर प्रकाश डालने के लिये आपको कुछ अनुभव और सुनाता हूँ.

[ पिछ्ली बार जब अभय जी से मिला था तो अभय जी ने कई अच्छी अच्छी बातें बतायीं थी,जिसे प्रमोद जी ने कहा कि काकेश शिष्यत्व भाव से सुनते रहे.उन्ही बातों में एक थी कि आपको अपने अनुभवों को अपने लेख में लिखना चाहिये. उसी का अनुकरण कर कुछ अनुभव आप से बांटे थे और आज भी बांट रहा हूँ ]

मेरा बचपन एक छोटे शहर में गुजरा.वैसा ही जैसा की भारत एक छोटे कस्बे का जीवन होता है ठीक वैसा ही जीवन था वहां.शहर जो कई मुहल्लों से मिलकर बना था.वहां एक क्रिकेट टूर्नामेंट होता था.जिसमें सभी मुहल्लों की टीमें रहती थी. लोग अपने अपने मुहल्ले की टीमों का समर्थन करते.हम भी अपने मुहल्ले की टीम के समर्थन में रहते.बड़ा ही जबर्दस्त माहौल होता जब अपनी अपनी टीमों के लिये लोग नारे लगाते.  ज़ीतने पर बड़ी ही शान से जुलुस निकालते.लोग समूहबद्ध होते थे और उस समूह का केन्द्र होता था मोहल्ला.

इसी तरह एक और ट्रॉफी वहां होती थी “हिल टॉप ट्रॉफी” वहां आसपास के शहरों की टीमें रहती थी ठीक वैसा ही माहौल होता जैसा पहले वाले टूर्नामेंट में था बस समूहबद्ध होने का कारण बदल जाता हम मुहल्ले की बजाय अपने शहर को समर्थन देने लगते.

जब इंजीनियरिंग के लिये दूर दूसरे शहर में गया तो लगता कि कितने दूर आ गये हैं.. अपना पहाड़ लगता कि छूट गया है.. मैदान का जीवन पहाड़ से बहुत से क्षेत्रों में अलग होता है.. उस समय यदि कोई भी पहाड़ का व्यक्ति मिल जाता तो लगता कि हाँ ये अपना ही तो है.. बड़े ही अपनेपन की फीलिंग होती एक ऎसा व्यक्ति जो अपने ही जैसे माहौल से आया..तो हॉस्टल में सारे पहाडियों का एक ग्रुप होता..इसी तरह से कुछ लोग नॉर्थ ईस्ट (असम,मेघालय) से आये हुए होते थे ..उनका अपना एक ग्रुप था..इस तरह के बहुत से ग्रुप थे..ऎसा नहीं था कि इन ग्रुपों में आपस में कोई वैर भाव हो या किसी भी प्रकार की प्रतियोगिता या जलन.. पर  फिर भी ग्रुप थे..मतलब यहाँ भी हम समूह बद्ध हुए ..समूह का कारण था हमारा क्षेत्र यानि पहाड़ …

फिर नौकरी के लिये बंगाल जाना पड़ा.. पहली बार आप बंगाल जाओ जब आप बंगाली संस्कृति और भाषा को ठीक से नहीं जानते तो आपको सब कुछ अजनबी सा लगता है…सारे बंगाली लोग मिलते ..वहां उस समय यदि कोई हिन्दी भाषी मिलता तो लगता कि अपना ही है…वहां अक्सर जब लोग मिलते तो पूछ्ते “तुमि बंगाली ना हिन्दुस्तानी ?” ..”तुम बंगाली हो या हिन्दुस्तानी? ” पहले पहले तो समझ में नहीं आया..कि क्या पूछा जा रहा है..क्या बंगाल हिन्दुस्तान में नहीं है ? फिर ऎसा प्रश्न क्यो कि मैं बंगाली हूँ या हिन्दुस्तानी.. लेकिन फिर लगा कि लोग हिन्दी भाषियों को हिन्दुस्तानी कहके बुलाते हैं… तो एक सहज जुड़ाव उन लोगों से हो गया जो हिन्दी भाषी थे…  कोई यदि कहता मॆं यू पी का हूँ या फिर बिहार का हूँ तो लगता हाँ ये अपना ही तो है… समूहबद्ध होने का कारण हमारी मातृ भाषा बन गयी थी….

एक बार ऑफिस के काम से लंदन जाना पड़ा .. वहाँ पहुंच कर भी एक अजनबियत की फीलिंग हुई ..लगा कि कहां आ गये ..कोई अपना जैसा नहीं …सब के सब अंग्रेज .. भाषा भी सामान्य अंग्रेजी नहीं ..बहुत ध्यान से सुनना पड़ता.. भोजन भी अलग… तौर तरीके भी अलग और संस्कृति भी अलग … वहां लगता कि काश कोई भारतीय मिल जाये..और यदि कोई मिल जाता तो बहुत ही अपना सा लगता ..चाहे फिर वह दक्षिण भारतीय हो या फिर उत्तर भारतीय..कोई गुजराती हो या फिर कोई बंगाली… कोई  यूपी का हो या कश्मीर का ..सब अपने लगते.. ऎसे ही एक बार एयरपोर्ट पर एक अंग्रेज से दिखने वाले एक व्यक्ति ने पूछा ..”आर यू इंडियन ? ” तो मैने जबाब दिया “यस” ..फिर तो वो बहुत ही प्यारी उर्दू मिश्रित हिन्दी में शुरु हो गये ..अपने बारे में बताने लगे..पता लगा कि वो कश्मीरी हैं.. तो यहां हमारी समूहबद्धता का कारण था भारत…

इसी तरह से यदि एक से ज्यादा ग्रह होते जहां जीवन होता तो दूसरे ग्रह में जाके हम किसी पृथ्वी वासी को सहजता से अपना लेते…

तो मेरी समूहबद्धता की शुरुआत मोहल्ले से शुरु हुई और देश तक गयी.. ऎसी ही हम सबकी होती है..हां इसमें धर्म भी रहता है जाति भी…कभी हम धर्म के नाम पर एकत्रित होते हैं तो कभी जाति के नाम पर ..कभी क्षेत्र के नाम पर तो कभी भाषा के नाम पर .. कभी पेशे के नाम पर तो कभी रुचियों के नाम पर .. ये एक प्राकृतिक स्वाभाविक प्रक्रिया है ..जो दिल्ली में भी उतनी ही है जितनी अहमदाबाद में ..बंगाल में भी उतनी ही है जितनी लंदन में….इसके लिये किसी एक शहर को ये कहके अलग कर देना कि नहीं इस शहर में ही इस तरह की बातें हैं तो ये मेरे हिसाब से गलत है..हाँ हर एक शहर अपनेआप अलग है..हर शहर की अपनी मानसिकता है..कहीं ..कोई चीज प्रधान है कहीं कोई और… जैसा मसिजीवी ने कहा कि ये दंगो का आमंत्रण है तो ये भी पूरी तरह से ठीक नहीं लगता.. कि जाति या धर्म के आधार पर समूह हैं तो वो आपस में लड़ेगे ही.. लड़ने के लिये केवल समूह ही जिम्मेवार नहीं अन्य कई कारण भी जिम्मेवार होते हैं…

अंत में घुघुती जी की प्रतिक्रिया जो मेरे को मेरे विचारों के करीब लगती है.

बहुत सी बातें ऐसी होती हैं जो हमें स्वाभाविक व व्यवहारिक लगती हैं किन्तु जो पोलिटिकली करेक्ट नहीं होतीं। मान लीजिये मैं शाकाहारी हूँ और मेरा पूरा परिवार शाकाहारी है तो यदि मैं शाकाहारी लोगों के बीच रहूँगी तो मेरा जीवन सरल हो जाएगा। मैं रात दिन पड़ोसियों के घर से आती माँस पकने की गन्ध से बच जाऊँगी। मैं स्वयं माँस पकाती हूँ पर मुझे भी वह गन्ध असह्य लगती है।

इसी तरह यदि किसी सोसायटी में केवल वृद्ध रहते हों तो वे पार्टियों व संगीत की ऊँची आवाज से भी बच जाएँगे और युवाओं को टोकने से भी। पर यही सब बात जब धार्मिक या जातीय स्तर पर कही जाती है तो स्वाभाविक रूप से बुरी लगती है। यदि मैं किसी माँसाहारी ब्राह्मण को घर किराये पर देने से मना करती हूँ तो उसे बुरा नहीं लगेगा, पर यदि किसी अन्य धर्म वाले , या जाति वाले को माँसाहार के आधार पर मना करूँगी तो उन्हें निश्चय ही लगेगा कि मैं धार्मिक या जातीय भेदभाव कर रही हूँ। यह साधारण सा मनोविज्ञान है।

हाँ, यह भी सही है कि जितनी अधिक विविधता किसी मौहल्ले में होगी उतना ही वह हमें सहनशील व औरों के अधिकारों व भावनाओं के प्रति जागरुक बनायेगी।

 तो मैने तो अपने अनुभव आप से बांट दिये ..अब आप भी अपनी प्रतिक्रियाऎं दे ही दें….

Jun 252007
 

पहले रवीश जी की पोस्ट आयी अहमदाबाद के जातिवाद के बारे में.पढ़कर बहुत आश्चर्य हुआ. अब रवीश जी जैसा सम्मानित पत्रकार जब स्पेशल रिपोर्ट कर रहा है तो फिर शक की गुंजाइस तो थी नहीं फिर भी मन नहीं माना.अपने एक मित्र से संपर्क किया जो अहमदाबाद में रहे हैं तो उन्होने  भी इस तरह की किसी जातिवाद की समस्या से इनकार किया.लेकिन वो मित्र तीन वर्ष पहले ही अहमदाबाद छोड़ चुके थे इसलिये उनकी बात पर पूरी तरह से यकीन ना किया गया.एक तरफ रवीश जी थे..एन डी टी वी था दूसरे ओर हमारे नॉन गुजराती मित्र ..अंतत: एडवांटेज रवीश जी को ही दिया गया और हम बेसब्री से उस स्पेशल रिपोर्ट की प्रतीक्षा करने लगे.पता चला कि अभी फिलहाल वह रपट स्थगित कर दी गयी है. फिर योगेश शर्मा जी का लेख आया उससे स्थिति थोड़ी साफ सी हुई.उस लेख को पढ़कर मेरी भी हिम्मत हुई कि मैं भी अपने इसी तरह के अनुभव आप सब के सामने रखूँ. क्योकि जो बात योगेश जी के हिसाब से अहमदाबाद में सच है वही बात कमोबेश दिल्ली के लिये भी सच है कम से कम मेरे अनुभव तो यही कहते है.

तकरीबन ड़ेढ़ बरस दिल्ली आया तो मकान की समस्या से दो चार होना पड़ा. लोगों ने सुझाया की सस्ता मकान किराये पर चाहिये तो या तो नौएडा में लो या फिर गुड़गांव में. तो हमने खोज प्रारम्भ की. नोएडा में एक मकान पसन्द आया जिसमें नीचे के हिस्से में मकान मालिक का परिवार रहता था और उपर का हिस्सा किराये के लिये था.यह मकान हमें एक प्रोपर्टी डीलर ने दिखाया.मकान मुझे पसन्द आ गया तो डीलर बोला चलिये फिर मकान मालिक से मिल लेते हैं.मकान मालकिन से मिले पहले तो उसने इधर उधर की बहुत सी बातें पूछी मसलन घर में कौन कौन है.क्या क्या शौक है वगैरह बगैरह ..हमने सारे सवालों के सही सही जबाब दिये और सोचने लगे कि अब ये मकान किराये के लिये मिल ही जायेगा..इसी सोच में डूबे थी कि मकान मालकिन ने पूछा … कि पंजाब में किधर घर पड़ता है आपका.. उनकी बात मेरे समझ में नहीं आयी.मैने कहा जी मेरा घर पंजाब में नहीं है..तो वो चौंक सी गयी..तो फिर आप पंजाबी नहीं है..मैने कहा नहीं तो.. तो वो सीधे बोली तब तो आपको हम ये किराये पर नहीं दे सकते क्योंकि हम केवल पंजाबियों को ही किराये पर मकान देते हैं..

इसी तरह की बहुत सी अन्य बातें भी पता चलीं.. इसी मकान खोज के दौरान. जैसे एक प्रोपर्टी डीलर ने एक विशेष सोसायटी के बारे में बताया जिसमें अन्य सोसाइटियों के मुकाबले किराया काफी कम था.पूछ्ने पर उसने कहा कि उस सोसायटी में केवल नीची जाति के लोग रहते हैं इसलिये किराया कम है.इसी तरह कि कई अन्य बातें भी ज्ञात हुईं….वो बातें भी सोसायटियों से संबंधित थी ठीक उसी तरह जिस तरह योगेश जी ने अहमदाबाद के बारे में बताया. दिल्ली में भी आपको बहुत सी सोसायटीज ऎसी मिलेंगी जहां आपको एक ही तरह के लोग मिल जायेंगे. 

यदि आप दिल्ली में आइ पी एक्सटेंशन या मयूर विहार की ओर जायें, जहां हमने सर्वाधिक खोज की थी किराये के एक अदद फ्लैट की, तो इस तरह के बहुत से सच सामने आयेंगे..जैसे आपको मिलेगा “काकातिया अपार्टमेंट” जहां आप आप को सिर्फ दक्षिण भारतीय लोग ही मिलेंगे और यदि आप दक्षिण भारतीय नहीं हैं तो आप वहां किराये पर मकान नहीं ले सकते. इसी तरह “हिमालय अपार्टमेंट” में ग़ढवाली और “हिम विहार” में आपको केवल कुमाउंनी लोग मिलेंगें. “तरंग” अपार्टमेंट में केवल एन आई सी में काम करने वाले लोग हैं तो “कानूनगो अपार्टमेंट” में केवल कानून विद . इसी तरह से आपको “प्रेस अपार्टमेंट” और “इंजीनियर्स स्टेट” भी मिल जायेंगे.

कहने का मकसद है कि एक तरह के लोगों का समूहबद्ध होना एक प्राकृतिक प्रक्रिया है ना कि केवल जातिवादी प्रक्रिया.हम सभी अपने अपने पसंद व रुचि के हिसाब से समूहबद्ध होते हैं…और ये एक स्वाभाविक प्रकिया सी लगती है. मेरे हिसाब से इसमें ज्यादा चिंतित होने वाली बात नहीं लगती.. वैसे भी धीरे धीरे बाजार इन सभी आभासी ढांचों को तोड़ रहा है. जैसा कि परसाई जी ने कहा है ” अर्थशास्त्र जब धर्मशास्त्र के ऊपर चढ़ बैठता है तब गोरक्षा आन्दोलन के नेता जूतों की दुकान खोल लेते हैं.” …ठीक वैसी ही स्थिति है. आप मकान उसे देंगे जो आपको ज्यादा पैसे देगा बिना इस बात कि चिंता किये कि वो किस जाति का है.

ये लेख अहमदाबाद की तथाकथित समस्या पर मेरे विचार नहीं है वरन दिल्ली में मुझे हुए अनुभवों का वर्णन है.रवीश जी की स्पेशल रिपोर्ट की अभी भी प्रतीक्षा है.

Jun 212007
 

आजकल हिन्दी ब्लॉगजगत में क्रांति का माहोल है,हाँलाकि कुछ लोगों का मानना है कि चिट्ठे क्रांति नहीं ला सकते…पर फिर भी कोशिश जारी है.कुछ लोग जन्मजात क्रांतिकारी होते है और कुछ लोग किताबें पढ़कर क्रांतिकारी हो जाते हैं.आज आपके सामने हरिशंकर परसाई का एक व्यंग्य प्रस्तुत है.जो एक “क्रांतिकारी की कथा” है. इसमें “चे-ग्वेवारा” का नाम भी आया है तो इन महानुभाव के बारे में थोड़ा बता दूं. अर्जेंटीना में जंन्मे “चे-ग्वेवारा” मार्क्सवादी क्रातिकारी थे.पेशे और पढ़ाई से वो डॉक्टर थे लेकिन उन पर मार्क्स साहित्य का गहरा प्रभाव पढ़ा और वे फीदेल कास्त्रो की क्रातिकारी सेना में सम्मिलित हुए.उन्होने कई पुस्तकें भी लिखी जो मूलत: स्पैनिश में थी पर उनके अंग्रेजी तथा अन्य भाषाओं में भी खासे अनुवाद हुए.तो ये तो था चे-ग्वेवारा का परिचय.अब आप व्यंग्य का आनन्द लें.

क्रांतिकारी की कथा : हरिशंकर परसाई

‘क्रांतिकारी’ उसने उपनाम रखा था। खूब पढ़ा-लिखा युवक। स्वस्थ,सुंदर। नौकरी भी अच्छी। विद्रोही। मार्क्स-लेनिन के उद्धरण देता, चे-ग्वेवारा का खास भक्त। कॉफी हाउस में काफी देर तक बैठता। खूब बातें करता। हमेशा क्रांतिकारिता के तनाव में रहता। सब उलट-पुलट देना है। सब बदल देना है। बाल बड़े, दाड़ी करीने से बढ़ाई हुई। विद्रोह की घोषणा करता। कुछ करने का मौका ढूंढ़ता। कहता- “मेरे पिता की पीढ़ी को जल्दी मरना चाहिए। मेरे पिता घोर दकियानूस, जातिवादी, प्रतिक्रियावादी हैं। ठेठ बुर्जुआ। जब वे मरेंगे तब मैं न मुंडन कराऊंगा, न उनका श्राद्ध करूंगा। मैं सब परंपराओं का नाश कर दूंगा। चे-ग्वेवारा जिंदाबाद।”

कोई साथी कहता, “पर तुम्हारे पिता तुम्हें बहुत प्यार करते हैं।”

क्रांतिकारी कहता, “प्यार? हॉं, हर बुर्जुआ क्रांतिकारिता को मारने के लिए प्यार करता है। यह प्यार षडयंत्र है। तुम लोग नहीं समझते। इस समय मेरा बाप किसी ब्राह्मण की तलाश में है जिससे बीस-पच्चीस हजार रुपये लेकर उसकी लड़की से मेरी शादी कर देगा। पर मैं नहीं होने दूंगा। मैं जाति में शादी करूंगा ही नहीं। मैं दूसरी जाति की, किसी नीच जाति की लड़की से शादी करूंगा। मेरा बाप सिर धुनता बैठा रहेगा।”

साथी ने कहा, “अगर तुम्हारा प्यार किसी लड़की से हो जाए और संयोग से वह ब्राह्मण हो तो तुम शादी करोगे न?”

उसने कहा, “हरगिज नहीं। मैं उसे छोड़ दूंगा। कोई क्रांतिकारी अपनी जाति की लड़की से न प्यार करता है, न शादी। मेरा प्यार है एक कायस्थ लड़की से। मैं उससे शादी करूंगा।”

एक दिन उसने कायस्थ लड़की से कोर्ट में शादी कर ली। उसे लेकर अपने शहर आया और दोस्त के घर पर ठहर गया। बड़े शहीदाना मूड में था। कह रहा था, “आई ब्रोक देअर नेक। मेरा बाप इस समय सिर धुन रहा होगा, मां रो रही होगी। मुहल्ले-पड़ोस के लोगों को इकट्ठा करके मेरा बाप कह रहा होगा ‘हमारे लिए लड़का मर चुका’। वह मुझे त्याग देगा। मुझे प्रापर्टी से वंचित कर देगा। आई डोंट केअर। मैं कोई भी बलिदान करने को तैयार हूं। वह घर मेरे लिए दुश्मन का घर हो गया। बट आई विल फाइट टू दी एंड-टू दी एंड।”

वह बरामदे में तना हुआ घूमता। फिर बैठ जाता, कहता, “बस संघर्ष आ ही रहा है।”

उसका एक दोस्त आया। बोला, “तुम्हारे फादर कह रहे थे कि तुम पत्नी को लेकर सीधे घर क्यों नहीं आए। वे तो काफी शांत थे। कह रहे थे, लड़के और बहू को घर ले आओ।”

वह उत्तेजित हो गया, “हूँ, बुर्जुआ हिपोक्रेसी। यह एक षडयंत्र है। वे मुझे घर बुलाकर फिर अपमान करके, हल्ला करके, निकालेंगे। उन्होंने मुझे त्याग दिया है तो मैं क्यों समझौता करूं। मैं दो कमरे किराए पर लेकर रहूंगा।”

दोस्त ने कहा, “पर तुम्हें त्यागा कहां है?”

उसने कहा, “मैं सब जानता हूं- आई विल फाइट।”

दोस्त ने कहा, “जब लड़ाई है ही नहीं तो फाइट क्या करोगे?”

क्रांतिकारी कल्पनाओं में था। हथियार पैने कर रहा था। बारूद सुखा रहा था। क्रांति का निर्णायक क्षण आने वाला है। मैं वीरता से लडूंगा। बलिदान हो जाऊंगा। तीसरे दिन उसका एक खास दोस्त आया। उसने कहा, “तुम्हारे माता-पिता टैक्सी लेकर तुम्हें लेने आ रहे हैं। इतवार को तुम्हारी शादी के उपलक्ष्य में भोज है। यह निमंत्रण-पत्र बांटा जा रहा है।”

क्रांतिकारी ने सर ठोंक लिया। पसीना बहने लगा। पीला हो गया। बोला, “हाय, सब खत्म हो गया। जिंदगी भर की संघर्ष-साधना खत्म हो गयी। नो स्ट्रगल। नो रेवोल्यूशन। मैं हार गया। वे मुझे लेने आ रहे है। मैं लड़ना चाहता था। मेरी क्रांतिकारिता! मेरी क्रांतिकारिता! देवी, तू मेरे बाप से मेरा तिरस्कार करवा। चे-ग्वेवारा! डियर चे!”

उसकी पत्नी चतुर थी। वह दो-तीन दिनों से क्रांतिकारिता देख रही थी और हँस रही थी। उसने कहा, “डियर एक बात कहूँ। तुम क्रांतिकारी नहीं हो।”

उसने पूछा, “नहीं हूँ। फिर क्या हूँ?”

पत्नी ने कहा, “तुम एक बुर्जुआ बौड़म हो। पर मैं तुम्हें प्यार करती हूँ।”

( कैसी लगी ये रचना ..टिप्पणी के द्वारा बतायें)

Jun 202007
 


बहुत हो गया.अब लगता है ज्यादा चुप नहीं बैठा जायेगा.साथी लोग उकसा रहे हैं… भय्या काहे चुप बैठे हो कुछ तो बोले …कोई तो पक्ष लो…कह रहे हैं… चारों ओर हल्ला गुल्ला है और तुम चुपचाप बैठे हो.यह सब सुन कर बचपन की एक घटना याद आ गयी.एक बार बंदरों का झुंड हमारे मोहल्ले में आया.जाड़ों के दिन थे.हमारे जैसा एक मोटा बंदर धूप में आराम से लेटा धूप सेक रहा था.सारे बंदर कभी इस डाल तो कभी उस डाल मस्ती कर रहे थे.तभी उन में आपस में ना मालूम किस बात पर झगड़ा हुआ. सारे बंदर एक दूसरे पर खों खों करके टूट पड़े..लगता था सब एक दूसरे को गाली दे रहे हों…मोटे बंदर को कोई फरक नहीं पड़ा वो अभी भी धूप सेकने में मस्त था.सारे बंदर उसे बीच बीच में छेड़ के चले जाते.शायद उसे अपने गुट में शामिल करने की कोशिश कर रहे थे.पर उसे कोई फरक नहीं पड़ा वो वैसे ही सोया रहा… थकहार के सारे बंदर इधर उधर हो गये…वो तो बंदर थे उन्होने उस मोटे बंदर को बख्स दिया … यदि वो इंसान होते तो !!… शायद पूरी कोशिश करते की वो उनके गुट में शामिल हो जाये.ना शामिल होने पर गाली भी देते …उसे हिन्दू विरोधी या हिन्दू हितैषी की संज्ञा भी दे डालते पर थैंक गॉड !! वो तो महज बंदर थे …इंसान नहीं..

आजकल लोग चिंतित हैं.लोगों की चिंता गालियों के समाजशास्त्र को ले के भी है.. गालियों के राजनीतिशास्त्र पर कोई नहीं बोलता …समाजशास्त्र की चिंता की जा रही है….कोई कह रहा है शीतल हवा आने को है ..कोई कहता है लू (अंग्रेजी वाला)की बदबू है या लू (हिन्दी वाली) की गर्मी है … तुमने तो सब कुछ सड़ा ही दिया ..इतना ना सड़ाओ भय्या ..ये रिलांयस फ्रैश का जमाना है..कुछ फ्रैश फ्रैश बातें करो.. बाल्टियों पानी बहाया जा चुका है ..सारे नारे अपनाये जा चुके हैं.. लोग गुस्से में हैं.. वैसे ही ना लाइट का भरोसा है ना पानी का …जब साला कोई इम्पोर्टेंट मेल लिखनी होती है या पोस्ट तो बिजली बिना बताये चली जाती है और लोग हमें गलत समझने लगते हैं .. हम यह ही सोचते रह जाते है कि किसकी तानाशाही है..? किसे गरियायें….? तानाशाही नहीं चलेगी ..? ठीक है भाई नहीं चलेगी .. अब क्या करें ..? आत्महत्या कर लें .. ? नौकरी से इस्तीफा दे दें ? घर से बाहर निकलना बंद कर दें और कहें आपातकाल जैसी स्थिति है ? क्या करें ? पुरानी कविताऎं गुनगुनाने लगें ? गड़े मुर्दे उखाड़ने लगें ? क्या करें ?? पता नहीं आप भी ना .. बेचारे जीव को कितना सताते हैं.. क्या कहा ? बकर बकर ना करें ….तो क्या करें ? क्या ?? सिर्फ मेल कर दें ?? कर देंगे भाई मेल भी कर देंगें ..आजकल हर कोई सिर्फ एक मेल की दूरी पर ही तो है फिर भी साला आपस में मेल नहीं..पहले सालों बाद मेले में ही मिलते थे फिर भी मेलभाव था …आजकल मेल का कोई भाव नहीं रहा.. पता नहीं क्या हो गया है..

आप भी सोच रहे होंगे कि मैं इतना अनर्गल प्रलाप क्यों कर रहा हूँ .. एकच्यूअली आजकल भौत टेनसन है यार ..हर कोई गुमनामी से उठकर लाइम लाइट में आ जा रहा है ..अब हमारे राष्ट्रपति के कैंडिडेट्स को ही देख लें… कल हम को ले के भी खींचातानी होने लगी कि आप भी अपना पर्चा दाखिल कर ही दो… हमने पहिले तो सोचा कि क्या करें लेकिन फिर साफ मना कर दिया ..ना जी ना हमें नहीं बनना राष्ट्रपति …एक पत्नी के पति तो बन नहीं पाये ठीक से.. क्या खाक राष्ट्रपति बनेंगे… और फिर केवल रबर स्टैम्प बनके क्या फायदा ..कोई बम-गोला बनना होता तो ठीक भी था.. हिन्दी ब्लॉगजगत के ही काम आ जाते .. और फिर राष्ट्रपति बन के ढेर सारे शास्त्रीय संगीत की महफिलों में बैठना पड़ेगा ..ना जाने किस किस की जुगलबंदी सुननी पड़ेगी .. हम तो तैयार नहीं हैं.. तो हमने तो अपना निर्णय सुना दिया .. क्या फालतू के राष्ट्रपति बनने के चक्कर में एक हफ्ता ब्लॉग नहीं लिख पाये ..यदि बन ही जाते तो … ?? ना जी ना हम तो अपने ब्लॉग में ही मस्त हैं.. कल से लिखते हैं फिर कुछ … राष्ट्रपति पद के बाँकी सारे उम्मीदवारों को बैस्ट ऑफ लक जी …

Jun 142007
 

मन जब उद्विग्न हो तो ना जाने क्या क्या सोचने लगता है.रोटी और पैसे के सवालों से जूझना जीवन की सतत आकांक्षा है पर उसके अलावा भी तो हम हैं..क्या सिर्फ रोटी पैसा और मकान ही चाहिये जीने के लिये…यदि वो सब मिल गया तो फिर क्या करें??? …कैसे जियें? क्या इतना काफी है जीने के लिये ? संवेदना किस हद तक सूनी हो सकती है.?.और फिर उस संवेदना को पकड़ना भी कौन चाहता है..? कितनी महत्वपूर्ण है वो संवेदना..? क्या हम संवेदनशील हैं…? क्या उगता सूरज देखा है आपने..और फिर डूबता भी देखा ही होगा .. क्या कोई अन्तर पाया..?? दोनों लाल ही होते हैं ना… आकाश वैसा ही दिखता है गुलाबी… चलिये फिर ध्यान से देखें उन रंगो को ..

मै कविता नहीं जानता ..कुछ लिखा है..आप भी पढ़ लें…

(1)

बदलते समय और भटकते मूल्यों के बीच ,
धँस गया हूँ ,
दूसरों की क्या कहूँ,
खुद को ही लगता है कि,
फँस गया हूँ.

(2)

समय के अनवरत बढ़ते चक्र
को थामने की कोशिश बेमानी है,
पर जीवन के इस रास्ते पर
अब चलने में हैरानी है..

(3)

दीवार अब खिड़की से
उजाले के बाबत
सवाल पूछ्ती है
आग अब जलने के लिये
मशाल ढूंढती है.

(4)

टेड़ा-मेड़ा,भारी-भरकम
कैसा भी हो ,
पर है उत्तम
जीवन पथ है.

(5)

बनकर मीठा,
अब तक सहकर,
जीवन रीता,
सारा बीता.

(6)

नहीं कमी है,
फिर क्यों खाली ?
तेरी मेरी उसकी थाली !!

(7)

बदल जरा तू ,
संभल जरा तू ,
मिल जायें तो ,
बहल जरा तू.

पा जायेगा…
राह नवेली..
ये झूठी है…
आह अकेली.

(8)

चाहे चुककर,
चाहे झुककर,
बस चलता जा,
बस जलता जा,
कभी मिलेंगी,
प्यारी-प्यारी ,
ये खुशियाँ
कब तलक करेंगी
अपने मन की… !!
आंख मिचौनी …

Jun 132007
 

अभय जी ने कहा कि

“ काकेश जी.. आपके व्यंग्य बाण की राह हम देख रहे हैं”

.. जी नहीं आज व्यंग्य की विधा में बात नहीं करुंगा .. थोड़ी गंभीर बात करनी है …और दिन में कभी कभी तो मैं गंभीर बात करता ही हूँ…

अभय जी ने आज अपनी पोस्ट में कहा कि मैने (काकेश ने) भी अपनी पोस्ट में कुछ लोगों के बारे में लिखा था इसलिये नारद द्वारा कारवाई तो मुझ पर भी होनी चाहिये थी…. अब नारद किस तरह से कारवाई का निर्णय लेता है उससे मेरा कोई सरोकार नहीं है और मैं इस बात पर अपने विचार भी नहीं रख रहा हूँ कि अभी नारद द्वारा जो निर्णय लिया गया वो सही है या गलत. …मैं तो सिर्फ अपनी बात रख रहा हूँ…

मुझे खुशी है कि अभय जी ने मुझे गंभीर और शालीन इंसान बताया .. (हूँ नहीं :-) ) .. धन्यवाद!! .. लेकिन जहां तक मेरी पोस्ट को लेकर उन्होने कहा कि नारद को मेरे ऊपर कारवाई करनी चाहिये थी (यदि किसी और पर की है तो ..क्योकिं मेरा अपराध भी कमोबेश वही था जो इन महाशय का है) तो उससे मैं सहमत नहीं हूँ… व्यक्तिगत लांछ्न और व्यंग्य में फरक होता है … जब हम किसी पर व्यंग्य करते हैं तो उसके कुछ विचार कुछ आदतों कुछ क्रिया कलापों या कुछ विशेष पक्षों पर एक मजाकिया नजर डालते हैं .. ये कोई व्यक्तिगत द्वेष नहीं है ना ही इसमें कोई वैमनस्य की भावना होती है.. हाँ वैचारिक मतभेद होता है … होना भी चाहिये..यदि ब्लौगजगत में वो भी ना करें तो क्या करें ..? जिस तरह आपने कहा “ क्या आपके जनतांत्रिक समाज मे मनुष्य के पास यह हक़ नहीं होगा..? और फिर ऐसी भाषा..? ” ..जी हाँ हमें भी पूरा हक है आप पर कटाक्ष करने का … (आपको भी है पर आप करते ही नहीं …हम तो तैयार बैठे रहते हैं :-) ) और यहां पर बात सिर्फ भाषा की ही नहीं है ..भाषा में निहित अर्थों की भी है… भाषा तो महत्वपूर्ण है ही … कहा भी गया है “ सत्यं ब्रूयात , प्रियम ब्रूयात “ .. आप सत्य को किस भाषा में कह रहे हैं वो भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना की सत्य….

हमारी हिन्दी की आम बोलचाल में बहुत से लोग गालियों का निर्बाध प्रयोग करते हैं .. हम लोग हॉस्ट्ल में थे तो कहते थे कि आप गाली उसी को देते हैं जो या तो आपका कट्टर दुश्मन होता है या फिर आपका जिगरी दोस्त. वही गाली दो अलग अलग व्यक्तियों को दो अलग अलग अर्थ दे जाती है .. आपने शायद पुराणिक जी का व्यंग्य पढ़ा होगा .. जहाँ आप हरामी शब्द की नयी व्याख्या पाते हैं

“अगर हरामी शब्द के टेकनीकल मतलब को छोड़ दिया जाये, तो अब यह शब्द प्यार और सम्मान का सूचक है।“

और ये बात किन्ही अर्थों में सही भी है… आप चाहें इस पोस्ट पर लोग़ों ने क्या क्या टिप्पणी की हैं ..जो देखा जाये तो कुछ नहीं सिर्फ गालियाँ है पर एकदम दूसरे अर्थों में…..

अभय जी ने मेरी दो पोस्टों का हवाला दिया… मुझे खुशी है इसी बहाने कुछ लोगों ने वो पोस्ट पढ़ लीं :-) पर जरा आप भी इन पोस्टों को ध्यान से देखें … इन पोस्टों में किसी भी ब्लौग का किसी भी तरह का लिंक या किसी व्यक्ति विशेष पर कोई सीधे आक्षेप है ??…नहीं है … किसी व्यक्ति का नाम भी सीधे तौर पर नहीं आया है… सब कुछ प्रतीकों के जरिये दिखाने,समझाने की कोशिश की गयी है .. हाँलाकि जो चिट्ठाजगत की गतिविधियों से अवगत हैं उन्हें ये प्रतीक समझ आ भी जायेंगे और यही मकसद भी था/है ..लेकिन यदि हम किसी को नाम लेकर या लिंक देकर कोई पोस्ट लिखते हैं ..तब आप उस पर सीधे आक्षेप लगाते हैं लेकिन जब हम प्रतीकों के जरिये अपनी बात रख रहे हैं तो इसमें व्यक्ति गौण हो जाता है और उसके कुछ क्रिया कलाप प्रमुख .. और फिर यदि चिट्ठाजगत के बाहर का व्यक्ति उसे पढॆ (आज या आज से दस साल बाद भी) तो उसे वो पोस्ट सिर्फ उन्ही अर्थों में परिपूर्ण लगेगी जिन अर्थों में वो दिखती है .. यानि उस पोस्ट का महत्व चिट्ठाकारी के इतर भी है … इन पोस्टों की चिंता स्थानीय होते हुए भी सार्वजनिक हैं…. आइये एक उदाहरण के साथ बताता हूँ …

अभय जी ने लिखा

“उन्होने मेरे और अविनाश के बीच चले एक विवाद को दो कुत्तो की लड़ाई के समकक्ष रखा.. ऐसी एक तस्वीर डाल के.. अविनाश की तुलना वे एक पागल कटखन्ने कुत्ते से पहले ही कर चुके थे..”

यहीं अभय जी से मेरा मतांतर है.. यदि मैं कहूँ कि “क्यों कुत्तों की तरह लड़ रहे हो ? “ तो ये टिप्पणी लड़ने वाले व्यक्तियों पर नहीं वरन उनके द्वारा किये जा रहे “लड़ने” की क्रिया पर है.. यदि इसी वाक्य को इस तरह से कहें कि “ क्यों कुत्ते… क्यों लड़ रहे हो ? “ तो ये लांछन है … जहां दो लड़ने वाले व्यक्तियों की तुलना कुत्तों से की गयी है … इसी तरह से जब वह कहते हैं “अविनाश की तुलना वे एक पागल कटखन्ने कुत्ते से पहले ही कर चुके थे “ तो ये भी गलत है ..क्योकि मैने अविनाश जी की तुलना कभी भी नहीं की..पर हाँ मेरा विरोध या मतभेद उनके मोहल्ले ब्लौग पर किये जा रहे कुछ दुष्प्रचार पर था ..और उस क्रिया को मैने अपने व्यंग्य में निशाना बनाया .. ये व्यक्तिगत रूप से अविनाश जी पर की गयी टिप्पणी नहीं थी… ( वैसे आज मैने अविनाश जी को ई-पत्र लिखकर अपनी इस टिप्प्णी पर खेद भी प्रकट किया है… यदि वो इससे आहत हुए हों तो… …लेकिन जिन बातों पर मेरा वैचारिक मतभेद था …वो तब भी था और आज भी है … भविष्य का पता नहीं .. ) .. ठीक इन्ही अर्थों में अन्य प्रतीक जैसे कौवे,गधे,सुअर भी प्रयोग किये गये हैं… तो मेरा अनुरोध कि इन तुलनाओं को व्यक्तिगत तुलना ना माना जाये…

अभय जी मेरे पसंदीदा चिट्ठाकारों में हैं ..जब मैं यह कहता हूँ तब मेरा मतलब सिर्फ और सिर्फ उनके लेखन से होता है . मैं उनके बारे में व्यक्तिगत रूप से ज्यादा नहीं जानता तो व्यक्तिगत रूप से उन पर टिप्पणी करना मेरे लिये ठीक भी नहीं है…. इसलिये मैं सिर्फ उनको पढ़ता हूँ और मन हुआ तो अपनी प्रतिक्रिया टिप्पणी के माध्यम से देता भी हूँ.. ..तो एक पाठक के नाते ही जब मेरा ये अधिकार बनता है कि मैं उनके लिखे पर टिप्पणी करूं तो ये भी बनता है कि मैं उनके विचारों से सहमत ना होकर उन पर व्यंग्य लिखूं …

तो ये थी मेरी बात …

वैसे शायद आपके मालूम हो उन्होने अपने ब्लौग से गुलाबी गमछे वाली फोटो हटा दी है और दाड़ी वाली फोटो लगा दी है .क्योकि मैने अपने दोनों ही पोस्टों में उनकी गुलाबी गमछे वाली फोटो का ही प्रयोग किया था ..इसीलिये वो थोड़ा घबरा गये और दाड़ी बढ़ाने लगे :-) .तो अगला व्यंग्य उनकी दाढ़ी वाली फोटो के माध्यम से होगा .. यदि वो आहत ना होने का वादा करें तो…. :-)

Jun 122007
 

ज़िस्म

अपनी पिछ्ली पोस्ट में मैं कुछ उधेड़बुन में था कि ब्लौग क्या बिना उद्देश्य के भी लिखा जा सकता है … आप लोगों की टिप्पणीयों से साहस बंधा कि मुझे इस प्रश्न पर सर खपाने की बजाय लिखते रहना चाहिये …. इसलिये अब अपने सारे पूर्वाग्रह और दुराग्रह छोड़ के फिर से उपस्थित हुआ हूँ .

अभी कुछ दिनों से टीवी पर ऎसे विज्ञापनो की संख्या बढ़ गयी है जिसे आप अपने पूरे परिवार के बीच नहीं देख सकते…या देखकर शर्म महसूस कर सकते हैं… पहले ऎसे विज्ञापन केवल कॉंडोम या अन्य गर्भनिरोधकों के ही होते थे. मुझे याद है ..बचपन में जब केवल दूरदर्शन ही एकमात्र चैनल हुआ करता था तब रात के हिन्दी समाचारों के बाद गर्भनिरोधकों जैसे “निरोध” या “माला-डी” का विज्ञापन आता था और जब भी हिन्दी समाचार समाप्त होने को होते और मुख्य समाचारों की बारी आती तो हमारे घर में टी वी की आवाज कम कर दी जाती. हाँलाकि उस समय इन विज्ञापनों में अश्लील कुछ भी नहीं होता था फिर भी इन्हें परिवार के बीच देखना गवारा नहीं समझा जाता था. और आजकल तो विज्ञापन ही ऎसे आ गये हैं जो द्र्श्य और श्रव्य दोनों ही रूपों में अश्लीलता की श्रेणी में आते हैं… और ये विज्ञापन खुले आम हमारे घरों में प्रवेश भी कर गये हैं… अभय जी अपनी पोस्ट में यौन कुंठा की बात कही उनका इशारा आजकल बन रही फिल्मों के बारे में था.. फिल्म देखने के लिये तो तब भी आपके पास एक विकल्प (ऑप्सन )होता है कि आप फिल्म देखें या नहीं लेकिन विज्ञापन तो कोई विकल्प भी नहीं देते… ये तो बस आपके टी.वी. पर आ जाते हैं जब तक आप इसकी शीलता या अश्लीलता समझे तब तक ये समाप्त हो चुके होते हैं और आप सोफे में बैठ नजरें कहीं और ग़ड़ाये चुप रहते हैं ये साबित करने के लिये कि आपका ध्यान तो कहीं और था.

Amul Macho2

अब “अमूल माचो” नामक अंडरवियर के विज्ञापन को ही लें.. ये किस तरह की फंतासी का निर्माण आपके अन्दर करता है .. जब नयी नवेली दुल्हन तालाब के किनारे अपनी पति के अंतर्वस्त्र को धो रही होती है तब वो और वहां पर जलती भुनती अन्य औरतें क्या सोच रही होती हैं… और वो नयी नवेली दुलहन सारी लोकलाज त्याग कर घुटनों तक अपनी साड़ी उठा कर, अजीब अजीब से मुँह बनाकर अंतर्वस्त्र धोने लगती है .. आप भी देखना चाहते हैं तो देखिये क्या है यह ?.. एक फंतासी के जरिये उत्पाद बेचने की कोशिश .. और ये ही बिक भी रहा है.. समाचारों के मुताबिक इस ब्रांड की बिक्री में इस विज्ञापन के बाद 30 प्रतिशत की वृद्धि हुई है.. अंडरवियर के ऎसे बहुत से विज्ञापन आजकल दिखाये जा रहें हैं.. कुछ लोगों के मुताबिक ये सृजनात्मकता (क्रियेटिविटी) है .. लेकिन यदि क्रियेटिविटी क्या केवल अश्लील ही होती है…

इसी तरह के एक अन्य विज्ञापन में एक अर्धनग्न बाला बड़े ही सिड्यूसिंग तरीके से कहती है … “निकालिये ना ……. कपड़े “. ये क्यों?? इस तरह द्विअर्थी वाक्य तो पहले दादा कोंडके की फिल्मों में होते थे .. आपको “ अन्धेरी रात में दिया तेरे हाथ में” या “खोल दे मेरी…… जबान “ तो याद ही होंगे ना..तब लोग इन फिल्मों को कोसते थे और ये फिल्में “ए” सार्टिफिकेट के साथ हॉल में आती थीं .. लेकिन आजकल के विज्ञापन बिना किसी सेंसर के हमारे ड्राइंग रूम में आ रहे हैं… इसी तरह का एक द्विअर्थी विज्ञापन था रीडिफमेल का ..जिसमें लड़कियां एक छोटे राजू के बड़े साइज के बारे में बात कर रही होती हैं.. यहाँ तक की राजू का बॉस भी शौचालय में अपनी दृष्टि राजू के शरीर पर ही गड़ाये रखता है … और अंत में एक बेशरम मित्र पूछ ही लेता है क्या ये सचमुच बहुत बड़ा है .. तो राजू कहता है कि ये बड़ा ही नहीं वरन अनलिमिटेड है .. तब पता चलता है कि वो लोग राजू के मेल बॉक्स के साईज के बारे में बात कर रहे होते हैं…

अब कॉडोम के “बिन्दास बोल” या फिर दिल्ली सरकार के “कॉडोम हमेशा साथ रखिये” से तो बच्चे बहुत कुछ सीख ही रहे थे… अब आने वाले समय में और भी ना जाने क्या क्या सीखेंगे …

Jun 092007
 


आज कई दिन बाद फिर से अवतरित हुआ हूँ इस ब्लौग में… इस बीच ना जाने कितने नये ब्लौग आ चुके होंगे और नयी पोस्ट तो और भी ज्यादा होंगी ..लेकिन मैं कुछ भी पोस्ट करने का साहस नहीं जुटा पा रहा था ..एक तो समय की कमी और दूसरी मन में ब्लौग को लेकर चलती उधेड़बुन.. पिछ्ली पोस्ट लिखी तो ज्ञानदत्त जी ने उसे ऑर्गेनिक कैमस्ट्री का नाम दिया था ..तब बात समझ नहीं आयी लेकिन उन्होने अपनी पोस्ट में उसे स्पष्ट करने का प्रयास भी किया . उन्होने कहा कि “काकेश; लगता हैं बड़े मंजे ब्लॉगर हैं। ” [इससे हमें आपत्ति है ..क्योकि पहले तो हम खुद को खिलाड़ी कहकर खिलाड़ियों का अपमान नहीं करना चाहते ... हाँ भारतीय टीम के क्रिकेट खिलाड़ी कहते तब भी ठीक था और फिर मँजे हुए ... मँजने के बाद ही धुलने का नम्बर आता है ..तो अब हमारी धुलाई होने वाली है उस बात से थोड़ा घबरा भी गये :-) ] …फिर जब उन्होने अपने जुनून की बात की तब टिप्पणीयों के द्वारा पता चला कि चिट्ठाकारी का कोई उद्देश्य भी होना चाहिये … हम तो यूँ ही चिट्ठाकारी करने में लगे थे कि मन हुआ तो कुछ लिख दिया नहीं तो पढ़ते रहो… टिपियाते रहो…लेकिन अब कोई कह रहा है कि कोई उद्देश्य भी होना चाहिये .. तो हम जैसे उद्देश्यहीन व्यक्ति क्या करें … ब्लौग लिखें या नहीं….??

फिर कुछ दिन पहले एक चिट्ठाकार से बात हुई तो यूँ ही जब उन्हे हमारी उम्र पता लगी तो कहने लगे ..अरे आप इतने बड़े हैं आपके लेखन से तो लगता था कि आप कोई 20-25 साल के ही होंगे… अब इसमें वैसे खुश होने की बात तो थी नहीं कि मेरे चेहरे से मेरी उम्र का पता ही नहीं चलता टाइप … क्योंकि उनसे तो सिर्फ वर्चुअल मुलाकात हुई थी … हम सोचे कि हम इतना घटिया लिखते हैं इसीलिए इन महाशय को लगा होगा कि कोई पढ़ा-लिखा समझदार परिपक्व आदमी तो ऎसा लिख ही नहीं सकता ..वैसे यहां ये भी बता दें कि हम पढ़े,लिखे,समझदार,परिपक्व हैं भी नहीं … इसलिये कोई विशेष अनुभूति नहीं हुई..उलटे अच्छा ही लगा …

फिर जब निर्मलानंद जी से मिले तो वो बोले अरे आप तो इतनी कम उम्र के हैं ..हम तो आपको ..खैर उन्होने जो भी कहा वो उसका बिल्कुल उलटा था जो पहले चिट्ठाकार ने कहा था… मेरी उधेड़बुन और बढ़ गयी .. आजकल प्रमोद भाई अपने को पहचानने की बात करने लगे हैं… और आज ज्ञानदत्त जी ने भी एक तरह की पहचान की बात छेड़ दी …मेरा तो कनफ्यूजन बढता ही जा रहा है … मैं अनेक सवालों से दो चार हो रहा हूँ ..क्या मेरा लेखन (ही) मेरी पहचान नहीं है ? क्या किसी के लेखन से उसकी उम्र और उसके व्यक्तित्व का पता चलता है ..या फिर चलना भी चाहिये क्या ?? क्या एक ही तरह का लेखन दो अलग अलग व्यक्तियों को दो अलग अलग अर्थ दे सकता है ? यदि हाँ तो क्या इसमें लेखक का दोष है या फिर पढने वाले का या कि किसी का नहीं… क्या व्यक्ति के विचार समझने के लिये व्यक्ति को जानना आवश्यक है .. ?? ज्ञानदत्त जी ने कहा ” लोग ब्लॉग पर अपने प्रोफाइल में आत्मकथ्य के रूप में हाइपरबोल में लपेट-लपेट कर न लिखें. अपने बारे में तथ्यात्मक विवरण दें. अपने को न तो महिमामण्डित करें और न डीरेट ” वो लोग जिंन्होने अपने प्रोफाइल में कुछ नहीं लिखा या बढ़ा चढ़ा कर लिखा है तो उससे उनका लेखन अच्छा या बुरा हो सकता है ..??

मैं इन्ही प्रश्नों से दो चार होता हूं ..आप कुछ सुझायें ताकि हम कुछ नया लेकर आपके सामने आयें…