Jul 242007
 

पिछ्ली पोस्ट में आपको समकाल में छपे लेख के बारे में बताया था. बहुत से लोगों ने उसे पढ़ा या पढ़ने की कोशिश की. लेकिन शिकायत यह रही कि रिजोल्यूशन ठीक ना होने के कारण बहुत से लोग पढ़ नहीं पाये. इधर इस लेख के मूल लेखक संजय तिवारी जी ने मुझसे संपर्क किया और उन्होने इस लेख को मेरे को भेज दिया. तो प्रस्तुत है ये लेख आप सभी के लिये.इसके लिये संजय जी धन्यवाद के पात्र है. आशा है अब सब लोग पढ़ पायेंगे. एक भूल सुधार …यह पत्रिका दिल्ली से ही निकलती है.

ब्लाग की दुनिया

संजय तिवारी

सोमवार 21 अप्रैल 2003. समय रात के 10 बजकर 21 मिनट . इसी दिन और इसी समय सूचना संचार जगत में हिन्दी का पहला ब्लाग कम्प्यूटर पर अवतरित हुआ था. इसका नाम था 9.2.11 डॉट ब्लागस्पाट डॉट काम . इसे बनानेवाले आलोक कुमार ने पहली बार पोस्टिंग करते हुए लिखा है- “चलिए अब ब्लाग बना लिया तो कुछ लिखा जाए. वैसे ब्लाग की हिन्दी क्या होगी , पता नहीं.” इन शब्दों से शुरू हुआ हिन्दी ब्लागिंग का सफर चार साल बाद कई बाधाएं पार करते हुए लगातार आगे बढ़ रहा है. देश -विदेश में ऐसे 700 ब्लागर हैं जो हिन्दी में काम कर रहे हैं. कहानी-कविता और धर्म आध्यात्म से लेकर निवेश सलाह तक सबकुछ धीरे -धीरे हिन्दी ब्लागिंग के दायरे में आता जा रहा है. भाषा की सबसे बड़ी समस्या अभी भी पूरी तरह से हल नहीं हो सकी है लेकिन माइक्रोसाफ्ट और सर्च इंजन गूगल के अपने स्तर पर किये जा रहे प्रयासों का परिणाम है कि आज इंटरनेट पर हिन्दी में काम करना मुश्किल नहीं है . हिन्दी का पहला ब्लाग बनाने वाले आलोक कुमार अब भाषा विकास के काम में लग गये हैं और अब एक पूरी जमात खड़ी हो गयी है जो अपने-अपने स्तर से ब्लागिंग की दुनिया में हिन्दी को स्थापित कर रहे हैं . लेकिन सवाल यह है कि क्या ब्लाग उस रास्ते पर है जिसपर उसे होना चाहिए ?

यह बात सही है कि अब ब्लाग हिन्दी के स्पर्श से चिट्ठा बन गया है. और हिन्दी में ब्लाग लिखनेवाले चिट्ठाकार के नाम से सुशोभित किये जाते हैं. लेकिन चिट्ठाकारिता की इस नयी शब्दावली ने अभी तक वह कमाल नहीं किया है जिसकी उम्मीद उससे की जा सकती है. हिन्दी फान्ट के आविष्कारकों में से एक मैथिली गुप्त दिल्ली में रहते हैं और फिलहाल वे हिन्दी ब्लागरों की संख्या बढ़ाने के अभियान पर काम कर रहे हैं . उनका कहना है कि “एक लिहाज से यह दुनिया अभी बहुत छोटी है. औसत 100 नयी रचनाएं प्रतिदिन हिन्दी में कम्प्यूटर पर उभरते हैं . और लगभग 300 लोग ही हैं जिन्हें हम सक्रिय चिट्ठाकार कह सकते हैं. इस लिहाज से अभी तुरंत आवश्यकता यह है कि ज्यादा से ज्यादा लोग इस माध्यम को जानें और इसका उपयोग करें .” नये चिट्ठाकारों के सामने सबसे बड़ी समस्या आज भी तकनीकि की है. हालांकि वीकिपीडिया, केफे हिन्दी , ई-पंडित, जैसी कुछ साईट हैं जहां हिन्दी में काम करने के लिए आवश्यक जानकारी और सहयोग मिल जाता है फिर भी तकनीकि की जटिलता , हिन्दी की-बोर्ड और शब्दावली का नयापन नये हिन्दी ब्लागरों की राह में सबसे बड़ी बाधा है.

इंटरनेट की दुनिया में ब्लाग की शुरूआत हुई अगस्त 1999 में जब सैन फ्रांसिस्को में पीरा लैब्स के तीन दोस्तों ने इस नयी विधा का परीक्षण शुरू किया जो लेखक को पाठक से जोड़ता था . यानी लिखे हुए को आप अपनी सहमति-असहमति से अवगत करा सकते थे. अपना स्वतंत्र पृष्ठ बना सकते थे और वेब बनाने की झंझटो में पड़े बिना आप अपना इंटरनेट का पन्ना संचालित कर सकते थे . थोड़े दिनों तक यह कंपनी अपने सीमित संसाधनों से लोगों को इंटररेक्टिव वेब की सुविधा मुहैया कराती रही और इसका दायरा अमरीका के बाहर नहीं था. लेकिन 2002 में अचानक ही इस विधि को नया आयाम मिल गया. इंटरनेट जगत के जाने पहचाने नाम गूगल ने ब्लागर कंपनी को खरीदने का प्रस्ताव कर दिया. भला इन तीनों को क्या ऐतराज हो सकता था . इसके बाद ब्लागर गूगल का एक हिस्सा हो गया और दुनियाभर में इसकी सेवाओं के साथ जोड़ दिया गया. ब्लागर आज दुनिया की 36 भाषाओं में लिखने-पढ़ने की सुविधा देता है. इसके लिए गूगल में एक अलग विभाग बना दिया गया है जो इन सेवाओं को नियमित अपडेट रखता है .

ब्लागर के अलावा वर्डप्रेस डॉट काम दूसरी ऐसी बड़ी सर्विस प्रोवाईडर है जो हिन्दी में ब्लाग बनाने की सुविधा प्रदान करता है. वर्डप्रेस डाटकॉम नये आगन्तुक को 50 एमबी की जगह मुहैया कराता है और अगर आपको इससे अधिक जगह की जरूरत है तो आप वर्डप्रेस से सस्ते में खरीद सकते हैं. वैसे भारत में सुलेखा डॉट काम भी ब्लाग की सुविधा मुहैया कराता है लेकिन वह हिन्दी के लिहाज से उपयुक्त स्थान नहीं है . अंग्रेजी ब्लागरों के लिए सुलेखा उत्तम स्थान है. कई सारी डॉट-काम कंपनियां अपनी साईट पर ब्लाग की सुविधा दे रही हैं जहां आप मुफ्त में अपना वेब पेज बना सकते हैं वैसे ही जैसे आप अपना ई -मेल एकाउण्ट बनाते और चलाते हैं. खुद माइक्रोसाफ्ट कारपोरेशन ने माई-स्पेसेश के नाम से अपनी वेबसाईट पर ब्लाग की सुविधा दी है जो हाटमेल के ई -मेल अकाउण्ट से चालू किया जा सकता है. लेकिन दो समस्याएं हैं. पहली भाषा और की बोर्ड की और दूसरी पाठकों की .

इस समस्या का समाधान भी कुछ हिन्दी प्रेमियों ने ही खोज निकाला. कुवैत में निजी व्यवसाय करनेवाले जीतेन्द्र चौधरी और उनके कुछ भारतीय मित्रों ने मिलकर एक ऐसी वेबसाईट की कल्पना की जो हिन्दी में लिखे जा रहे चिट्ठों को एक जगह पर प्रदर्शित करे . इस वेबसाईट का नाम रखा गया- नारद. इंटरनेट की शब्दावली में इस तरह की वेबसाईट को फीड-एग्रीगेटर कहा जाता है जिसका मतलब है कि अगर आप नारद के सदस्य हैं तो आप अपने चिट्ठे पर जो कुछ लिखते हैं थोड़ी ही देर में वह उस साईट पर दिखने लगता है. उस एग्रीगेटर पर एक लिंक होता है जिसपर क्लिक करने से आप सीधे उस ब्लाग पर पहुंच जाते हैं जिसका लिंक नारद पर आपने देखा था . इस विधि ने चिट्ठाकारों को बहुत मदद की क्योंकि अब किसी नये पाठक को एक वेबसाईट का पता बताते हैं और वह चिट्ठासंसार का चक्कर लगा आता है. नारद की तरह कई और उन्नत फीड एग्रीगेटर अब वेबसाईट पर उपलब्ध हैं . मसलन हिन्दीं में पहला चिट्ठा लिखनेवाले आलोक कुमार ने अपने दो मित्रों के साथ मिलकर एक नये फीड एग्रीगेटर की शुरूआत की है जिसका नाम है – चिट्ठाजगत . इसके अलावा अलग-अलग प्रकार के ब्लाग्स के लिए हिन्दी ब्लाग्स डॉट काम है जो प्रतीक पाण्डेय चलाते हैं. अमेरिका में रहनेवाले देवाशीष हिन्दी ब्लाग्स डॉट आर्ग के कर्ता -धर्ता हैं. एक और फीड-एग्रीगेटर ब्लागवाणी आने की तैयारी में है जिसके विकास में मैथिली गुप्त लगे हुए हैं .

वैसे इंटरेक्टिव वेबसाईट आज सहज-सुलभ है. इसके पीछे काम करनेवाली तकनीकि कोई दुर्लभ चीज नहीं है. डाटकाम कंपनियों के लिए भी यह तकनीकि काम की है क्योंकि इससे पाठकों का सीधा रिश्ता सर्विस आपरेटर के साथ जुड़ता है . कई ऐसी सोशल नेटवर्किंग साईट धड़ल्ले से चल रही हैं जो आपको इंटरनेट पर आपको एक प्लेटफार्म देती हैं. रूपर्ट मर्डोक की माई स्पेश 16 अरब डॉलर बाजार मूल्य की कंपनी बन गयी है क्योंकि इससे 8 करोड़ लोग जुड़े हुए हैं. गूगल की सोशल नेवर्किंग साईट आर्कुट भी खासी चर्चा में रहता है . लेकिन अभी यहां भाषा बड़ी बाधा है. जहां हिन्दीवालों की जमात से आपकी मुलाकात हो सकती है वह ब्लागर और वर्डप्रेस ही हैं. मतलब साफ है कि हिन्दी में ब्लाग की यह नयी दुनिया तेजी से लोगों को आकर्षित कर रही है . रोज नये-नये ब्लाग अस्तित्व में आ रहे हैं. और जैसा हर काम के शुरूआत में होता है यहां भी कुछ लोग हिन्दी साहित्यवाली राजनीति , विचारधारा की गाली-गलौज आदि करते रहते हैं. हिन्दी के एक ब्लागर अरुण कहते हैं ” यह अभी शैशवकाल है. धीरे-धीरे इसमें बदलाव आयेगा.” मैथिली गुप्त भी अनुमान लगाते हैं कि “जैसे ही यह संख्या तीन-चार हजार पार करेगी तो उससे एक प्रतिस्पर्धा का निर्माण हो जाएगा. इसके बाद ब्लागजगत में सुधार अपने -आप दिखने लगेंगे.”

बड़ा सवाल यह है कि क्या ब्लाग वैकल्पिक मीडिया बन सकता है? जवाब है हां. यहां आप अपने काम को लेकर स्वतंत्र हैं . और इसके लिए आपको कुछ भी पूंजी-निवेश नहीं चाहिए. थोड़ा सा तकनीकि ज्ञान और मन में लिखने-पढ़ने की लगन . जब यह दौर शुरू होगा, सही मायने में इसके बाद ही हिन्दी ब्लाग जगत का असली लाभ लोगों को मिलेगा. फिलहाल तो यह प्रयोगों के दौर में है , जैसे-जैसे इंटरनेट का विस्तार होगा, और नये लोग जुड़ते जाएंगे, इस विधा में निखार आयेगा .

बाक्स

कैसे बनाएं अपना हिन्दी ब्लाग

सबसे पहले अगर आपके पास जी-मेल का एकाउण्ट है तो आप सीधे ब्लागर से जुड़ सकते हैं. आपको ब्लागर का एक रजिस्ट्रेशन करना होता है जहां आपका ई -मेल ही आपकी कुंजी है.

अगर आपके पास जी-मेल नहीं है तो आप वर्ड-प्रेस पर हिन्दी में अपना ब्लाग बना सकते हैं.

अब आपको अपने कम्प्यूटर पर विन्डोज एक्सपी में रीजनल लैग्वैंज और सेटिंग्स में हिन्दी को शुरू करना चाहिए जिसके बाद आप इंटरनेट पर हिन्दी में काम कर सकते हैं.

ध्यान रहे आपको नये तरह के की-बोर्ड पर काम करना होगा जिसे फ्योनिटिक की-बोर्ड कहते हैं. इसका आविष्कार भारत सरकार की सी -डैक नामक कंपनी ने किया है और हिन्दी लिखने के लिए यही की-बोर्ड पूरी दुनिया में प्रयुक्त हो रहा है क्योंकि माइक्रोसाफ्ट ने भी यही की -बोर्ड स्वीकार किया है.

अगर आपके पास अपना कम्प्यूटर नहीं है और ब्लाग लिखना चाहते हैं तो आप ब्लागर के साथ जुड़िये. यह आपको रोमन लिपी में लिखने की सुविधा देता है और अपनेआप उसे हिन्दी में बदल देता है .

किसी भी तरह की मदद के लिए हिन्दी वीकिपीडिया, अक्षरग्राम, ई-पंडित, देवनागरी, हिन्दी कैफे आदि के वेबपेजों का अवलोकन किया जा सकता है.

संजय तिवारी
www.visfot.com

संजय जी को पुन: धन्यवाद.

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: हिन्दी, ब्लॉगिंग, प्रिंट मीडिया, चर्चा

Jul 242007
 

आजकल चिट्टाकारी की चर्चा प्रिंट मीडिया में जोरों पर है. कुछ दिनों पहले हिन्दी की प्रतिष्ठित पत्रिका कादम्बिनी की आवरण कथा भी हिन्दी चिट्ठाकारी पर थी. जिसमें अविनाश जी ने भी अपना योगदान दिया था. अविनाश जी कथादेश में हिन्दी चिट्ठाकारी पर नियमित लिखते रहे हैं. पिछ्ले दिनों मुम्बई से निकलने वाली पत्रिका समकाल में भी  हिन्दी ब्लॉगिंग पर एक लेख छ्पा था. जिसे लिखा था विस्फोट चिट्ठा चलाने वाले संजय तिवारी ने. इसमें जीतू जी , अरुण जी , मैथिली जी ,आलोक जी,प्रतीक पांडे के नाम भी शामिल हैं.

आप भी पढ़ें. (बड़ा करने के लिये चटका लगायें).बहुत से लोगों ने शिकायत की है कि वो इसे नहीं पढ़ पा रहे हैं इसलिये यह लेख यहां पर डाल दिया गया है.

blog

Jul 232007
 

एक मिठाई खाने वाली खबर ये है कि हिन्दी चिट्ठाजगत में व्यंग्य के सुपरस्टार और हमारे सह ब्लॉगर आलोक पुराणिक की पुस्तक का आज विमोचन हुआ. आप सोच रहे होंगे कि पक्का कोई “प्रपंच तंत्र” टाईप व्यंग्य-पुस्तक होगी. यही सोच रहे हैं ना ..आप सोचिये ..सोचने में क्या है ..हम भी कुछ दिनों पहले राष्ट्रपति बनने की सोच ही रहे थे ना.. जी नहीं यह कोई व्यंग्य पुस्तक नहीं है… यह पुस्तक है आर्थिक-पत्रकारिता पर. 

लीजिये पेश है एक रिपोर्ट -एक्सक्लूसिवली फॉर हिन्दी चिट्ठाजगत…

kitab -vimochan

पुस्तक विमोचन

मैथिलीशरण गुप्त बजट की बहस कविता में करते थे

23 जुलाई, 2007 सोमवार को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आलोक पुराणिक की पुस्तक-आर्थिक पत्रकारिता का विमोचन हुआ, इसमें तमाम रोचक जानकारियों के साथ यह तथ्य भी प्रकाश में आया कि प्रख्यात कवि मैथिलीशरण गुप्त संसद में बजट की बहस में अपना पक्ष कविता के जरिये ही रखते थे। प्रभात प्रकाशन दिल्ली द्वारा प्रकाशित यह किताब आजादी के बाद हिंदी की आर्थिक पत्रकारिता को देखने –परखने का प्रयास करती है। आजादी के बाद के करीब साठ सालों की यात्रा में बहुत कुछ बदला है, पर पर बहुत कुछ ऐसा भी है, जो नहीं बदला है। किताब यह रेखांकित करने की कोशिश करती है कि आजादी के बाद के वर्षों में आर्थिक पत्रकारिता की मुख्य प्रवृत्तियां क्या रही हैं। आजादी के ठीक पहले हिंदी अखबारों में उद्योगों, कृषि मंडियों और बाजारों की रिपोर्टें, सर्राफा बाजार की रिपोर्टों होती थीं। इसके अलावा भारत-ब्रिटिश आर्थिक संबंधों पर लेख भी हिंदी अखबारों में दिखायी पड़ते थे। खाद्यान्न से जुड़े मसलों को खासा महत्व दिया जाता था। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक पर समाचार लेख छापे जाते थे। आजादी के बाद के एक दशक में परिदश्य कुछ बदला।

1947 से 1956 की अवधि में हिदी की आर्थिक पत्रकारिता की व्याख्यात्मक भूमिका सामने आयी। अर्थव्यवस्था से जुड़े नये –नये कानून बन रहे थे। नये नियम आ रहे थे, उनकी व्याख्या करने का काम भी अखबार कर रहे थे। बजट कवरेज में आम आदमी से जुड़े आइटमों की चिंता लगातार की जाती थी। खाद्यान्न से जुड़े मसलों पर अखबार बहुत संवेदनशील थे। योजना से जुड़े मसलों पर कौतूहल का भाव तो था ही, साथ ही इसका विश्लेषण भी लगातार चल रहा था। समाजवाद, निजी उपक्रम बनाम सार्वजनिक उपक्रम जैसी बहसों की शुरुआत इस दशक में हुई। 1

इस दौर की हिंदी पत्रकारिता में ठेठ हिंदी के ठाठ भी देखने में आते थे। उदाहरण के लिए -हिंदुस्तान 7 मार्च, 1956 पहला पेज दो कालम की खबर है, जिसमें प्रख्यात कवि मैथिलीशरण गुप्त ने कवितामय अंदाज में बजट से जुड़े सवाल पूछे हैं-

आह कराह न उठने दे जो शल्य वैद्य है वही समर्थराष्ट्रकवि की दृष्टि में बजट- हमारे संवाददाता द्वारा नई दिल्ली 6 मार्च, राज्य सभा में साधारण बजट पर चर्चा में भाग लेते हुए राष्ट्रकवि श्री मैथिलीशरण गुप्त ने निम्नलिखित कविता पढ़ी-

धन्यवाद हे धन मंत्री को करें चाय सुख से प्रस्थान,

हम सब पानी ही पी लेंगे, किंतु खान पहले फिर पान

मिटे मद्य कर लोभ आपका अधिक आय का वह अभिशाप ,

दे देकर मद मोह स्वयं ही फिर प्रबोध देते हैं आप।

कर लेते हैं आप , आपके गण लेते हैं धन युत मान,

थाने क्या निज न्यायालय ही जाकर देखें दया निधान।

खोलें एक विभाग आप तो यह धर्षण हो जाये ध्वस्त,

जांच करे अधिकारी वर्ग की गुप्त भाव से वह विश्वस्त।

पहले ही था कठिन डाक से ग्रंथों द्वारा ज्ञान प्रसार,

पंजीकरण शुल्क बढ़ाकर अब रोक न दें विद्या का द्वार।

किन्तु नहीं पोथी की विद्या पर कर गत धन सी अनुदार,

साधु, साधु, श्रुति पंरपरा का आप कर रहे हैं उद्धार।

सुनते थे उन्नत देशों में कुछ जन नंगे रहते हैं,

स्वस्थ तथा स्वाभाविक जीवन वे इसको ही कहते हैं।

नया वस्त्र कर देता है यदि आज वही संकेत हमें,

तो हम कृतज्ञता पूर्वक ही उसे किसी विधि सहते हैं।

मक्खन लीज छाछ छोड़िए देश भक्ति यह सह लेगी,

पारण बिना किन्तु जनता क्या व्रत करके ही रह लेगी।

यह यथार्थ है यत्न आपके हैं हम लोगों के ही अर्थ,

आह कराह न उठने दे, जो शल्य वैद्य है वही समर्थ।

लोगों की चिंता थी जाने जीवन पर भी कर न लगे,

मर कर भी कर जी कर भी कर, डर कर कोई कहां भगे।

एक जन्म कर ही ऐसा है, जिस पर कुछ कुछ प्यार पगे,

और नहीं तो जन संख्या ही संभले, संयम भाव जगे।

कवि की कविता का जवाब भी कविता में मिला है, इसे भी हिंदुस्तान ने अपनी रिपोर्ट में दर्ज किया है।

हिंदुस्तान 9 मार्च, 1956 पहले पेज पर सिंगल कालम खबर

वित्तमंत्री का नया तराना

हमारे विशेष संवाददाता द्वारा

नई दिल्ली-राज्य सभा में साधारण बजट पर हुई बहस का उत्तर देते हुए वित्त मंत्री श्री चिंतामन देशमुख ने राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के कवितामय भाषण का कविता में ही जवाब दिया, जो इस प्रकार है-

भारत भू के कायाकल्प का

आज सजा है पावन याग

स्नेह भरे कर लगा कमर को

बांध पटसे ले कवि भाग

सकल निगम और शिशु नर नारी

स्व-स्व पदोचित करके त्याग

चलें जुड़ाकर कर में कर को

दृढ़ता पग में नयनों जाग

यही पारणा यही धारणा

यही साधना कवि मत भाग

नया तराणा गूंज उठावो

नया देश का गावो राग

कुल मिलाकर हिंदी का आर्थिक पत्रकारिता ने यथासंभव खुद को आम आदमी के मसलों से जोड़कर रखा है। बैंकों के राष्ट्रीयकरण, बीमा के राष्ट्रीयकरण से जुड़े मसलों पर हिंदी अखबारों में जमकर बहस चली। दिनमान ने आर्थिक पत्रकारिता के नये आयाम पेश किये। खास तौर पर अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक मसलों पर दिनमान ने बेहतरीन कवरेज दी। राष्ट्रीय सहारा के विशिष्ट परिशिष्ट हस्तक्षेप ने आर्थिक मसलों पर विशिष्ट विश्लेषण पेश करके अपने समय में महत्वपूर्ण तरीके से हस्तक्षेप किया।

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वर्तमान स्थितियों में आर्थिक पत्रकारिता नयी चुनौतियों का सामना कर रही है। मुचुअल फंड, कामोडिटी एक्सचेंज, शेयर बाजार की कवरेज को बेहतर कैसे किया जाये, इस पर शोध-विश्लेषण किये जाने की आवश्यकता है।

इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता, भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष जी.एन.रे, और माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति और वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्र मौजूद थे।

kitab vc mcrpsv 

किताब कैसे खरीदें इस बारे में आप पुराणिक जी से संपर्क करेंगे. कुछ दिनों में इस पुस्तक की एक समीक्षा भी प्रस्तुत करने का प्रयास किया जायेगा.

Jul 192007
 

कल प्रियंकर जी के चिट्ठे पर एक मासूम सा सवाल उठा “ये त्रिलोचन कौन है?” जिसका उत्तर अपने संस्मरणों के साथ पहलू में दिया गया. फिर बोधिसत्व जी ने थोड़ा जीवन परिचय देते हुए दो कविताय़ें भी छाप दी. उसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए पेश हैं त्रिलोचन की कुछ कविताऎं.

कुछ बातें जो मैं जानता हूँ त्रिलोचन के बारे में.

नागार्जुन, शमशेर और त्रिलोचन की त्रयी आधुनिक हिंदी कविता का आधारस्तंभ मानी जाती है. इस त्रयी के त्रिलोचन हरिद्वार के ज्वालापुर इलाके में लोहामंडी की एक तंग गली के मकान में अपनी बीमारी से जूझ रहे हैं. त्रिलोचन भारतीय सॉनेट के अहम हस्ताक्षर रहे हैं.उन्होने सॉनेट को भारतीय परिवेश दिया .उन्होने 500 से ज्यादा सॉनेट लिखे हैं. सॉनेट चौदह लाइन की कविता होती है जिसे शेक्सपियर ने अपनी रचनाओं में बखूबी प्रयोग किया.

त्रिलोचन के कुछ सॉनेट

जनपद का कवि

उस जनपद का कवि हूँ जो भूखा दूखा है,
नंगा है, अनजान है, कला–नहीं जानता
कैसी होती है क्या है, वह नहीं मानता
कविता कुछ भी दे सकती है। कब सूखा है
उसके जीवन का सोता, इतिहास ही बता
सकता है। वह उदासीन बिलकुल अपने से,
अपने समाज से है; दुनिया को सपने से
अलग नहीं मानता, उसे कुछ भी नहीं पता
दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँची; अब समाज में
वे विचार रह गये नही हैं जिन को ढोता
चला जा रहा है वह, अपने आँसू बोता
विफल मनोरथ होने पर अथवा अकाज में।
धरम कमाता है वह तुलसीकृत रामायण
सुन पढ़ कर, जपता है नारायण नारायण।

भीख मांगते उसी त्रिलोचन को देखा कल

भीख मांगते उसी त्रिलोचन को देखा कल
जिस को समझे था है तो है यह फ़ौलादी
ठेस-सी लगी मुझे, क्योंकि यह मन था आदी
नहीं; झेल जाता श्रद्धा की चोट अचंचल,
नहीं संभाल सका अपने को । जाकर पूछा
‘भिक्षा से क्या मिलता है। ‘जीवन।’ ‘क्या इसको
अच्छा आप समझते हैं ।’ ‘दुनिया में जिसको
अच्छा नहीं समझते हैं करते हैं, छूछा
पेट काम तो नहीं करेगा ।’ ‘मुझे आप से
ऎसी आशा न थी ।’ ‘आप ही कहें, क्या करूं,
खाली पेट भरूं, कुछ काम करूं कि चुप मरूं,
क्या अच्छा है ।’ जीवन जीवन है प्रताप से,
स्वाभिमान ज्योतिष्क लोचनों में उतरा था,
यह मनुष्य था, इतने पर भी नहीं मरा था ।

कुछ अन्य कवितायें.

आत्मालोचन

शब्द
मालूम है
व्यर्थ नहीं जाते हैं

पहले मैं सोचता था
उत्तर यदि नहीं मिले
तो फिर क्या लिखा जाए
किन्तु मेरे अन्तर निवासी ने मुझसे कहा-
लिखा कर
तेरा आत्मविश्लेषण क्या जाने कभी तुझे
एक साथ सत्य शिव सुन्दर को दिखा जाए

अब मैं लिखा करता हूँ
अपने अन्तर की अनुभूति बिना रँगे चुने
कागज पर बस उतार देता हूँ ।

आछी के फूल

मग्घू चुपचाप सगरा के तीर
बैठा था बैलों की सानी पानी कर
चुका था मैंने बैठा देखकर
पूछा,बैठे हो, काम कौन करेगा.
मग्घू ने कहा, काम कर चुका हूं
नहीं तो यहां बैठता कैसे,
मग्घू ने मुझसे कहा,
लंबी लंबी सांस लो,
सांस ले ले कर मैंने कहा,सांस भी
ले ली,
बात क्या है,
आछी में फूल आ रहे हैं,मग्घू ने कहा,अब
ध्यान दो,सांस लो,
कैसी मंहक है.
मग्घू से मैंने कहा,बड़ी प्यारी मंहक है
मग्घू ने पूछा ,पेड़ मैं दिखा दूंगा,फूल भी
दिखा दूंगा.आछी के पेड़ पर जच्छ रहा करते हैं
जो इसके पास रात होने पर जाता है,उसको
लग जाते हैं,सताते हैं,वह किसी काम का
नहीं रहता.
इसीलिये इससे बचने के लिये हमलोग
इससे दूर दूर रहते हैं

पीपल

मिट्टी की ओदाई ने
पीपल के पात की हरीतिमा को
पूरी तरह से सोख लिया था
मूल रूप में नकशा
पात का,बाकी था,छोटी बड़ी
नसें,
वृंत्त की पकड़ लगाव दिखा रही थी
पात का मानचित्र फैला था
दाईं तर्जनी के नखपृष्ठ की
चोट दे दे कर मैंने पात को परिमार्जित कर दिया
पीपल के पात में
आदिम रूप अब न था
मूल रूप रक्षित था
मूल को विकास देनेवाले हाथ
आंखों से ओझल थे
पात का कंकाल भई
मनोरम था,उसका फैलाव
क्रीड़ा-स्थल था समीरण का
जो मंदगामी था
पात के प्रसार को
कोमल कोमल परस से छूता हुआ.

Jul 172007
 

(ये रचना, व्यंग्य की तोप,हमारे सह ब्लॉगर श्री आलोक पुराणिक जी पर नहीं है.)

एक मास्साब थे,काफी सेंसिबल टाइप थे.सारे मास्साब सैसिबल हों ये जरूरी नहीं पर वो थे.लेकिन वो थे थोड़ा पुराने जमाने के मास्साब …यानि पुराणिक टाइप …अभी भी बच्चों को पढ़ाकर उन्हे आदमी बनाने की पुरानी सोच रखते थे.दुनिया कहाँ से कहाँ पहुंच रही है बच्चे अपने मास्साब को इंसान बनाने की सोच रहे हैं और ये बेचारे..खैर …

ऎसा नहीं था कि इस बात को समझते नहीं थे कि दुनिया बदल रही है इसीलिये दुखी भी थे लेकिन अपना दुख वो कभी भी जाहिर नहीं करते थे दुनिया के सामने उनके बत्तीसी लगातार चमकती रहती थी.हाल ही उनकी एक पुरानी डायरी मेरे हाथ लग गयी.उसी के कुछ अंश पेश कर रहा हूँ.हिन्दी के मास्साब हैं इसलिये शब्द कहीं कहीं अंग्रेजीनुमा हो गये हैं.

आज सुबह उठा तो सुबह अभी भी सोयी ही पड़ी थी.देर रात तक पार्टी किये लोग अभी किसी स्वप्न नगरी की अट्ठालिकाओं में विचरण कर रहे थे.काम करने वाली बाइयों ने अपने घर के काम निपटाने चालू कर दिये ताकि उनके मालिकान उठें तो वो उनके काम निपटा सकें.अलसायी गायें अपने दूहे जाने के लिये तैयार हो रही थी.कुछ कुत्ते नये सुर में भौकने का रियाज कर रहे थे.गधे लदे जाने के लिये मन बना रहे थे. मैंने भी सोचा कुछ लिखने पढ़ने का काम करूं.लेकिन मेरे आसपास की घटनाऎं मेरे दिल को बोझिल कर रही हैं. परिवार में एक अदद मोटी पत्नी और दो अदद खोटे बच्चों के बोझ को नव-श्रवण कुमार की तरह ढो रहा हूँ.आजकल कोई मेरे को नहीं पूछ्ता. ना परिवार वाले ना शिष्यगण.क्या जमाना था जब गुरु को पूरा आदर व सम्मान दिया जाता था. गुरु और भगवान में पहले गुरु के पांव छूने की परम्परा थी.परसों जब बेटे को किसी के पांव छूने को बोला तो कहता है “व्हाट ए नॉन हाइजीनिक ट्रेडीसन” कहता है “डैड यू नो पांव छूने से ना जाने कितने डैंजरस जर्म्स ट्रांसफर हो सकते हैं”.वो हमें पाठ सिखा कर चला गया.क्या करें आजकल हर कोई एक दूसरे को पाठ पढ़ाने में लगा है.पहले तो केवल कवि और लेखकों की पत्नियां ही अपने पतियों को सुनाया करती थी कि तुम कुछ काम धाम नहीं करते अब मैं तुम्हारी कविताओं का अचार बनाऊं या लेखों की चपातियां.घर तुम्हारी कविताओं से नहीं चलता.इन्ही तानों के डर बहुत से प्रतिभावान लेखकों ने या तो लिखना छोड़ दिया या उन्होने कुंवारा रहना स्वीकार किया.इन्ही तानों के डर से हम भी अपना लेखन का काम, जो भी अगड़म-बग़ड़म लिखते हैं, मुँह अन्धेरे ही कर लेते हैं जब पत्नी जी सोयी रहती हैं.हम खुश थे कि हमें लेखकों वाले ताने भी नहीं सुनने पड़ते और लेखन भी हो जाता है.जैसे बहुत से हिन्दी सेवीजन न्यूयार्क के सम्मेलनों में भाग लेने इसलिये जाते हैं ताकि हिन्दी की सेवा भी हो जाये और न्यूयार्क दर्शन भी.

हम ताने ना खाने की खुशफहमी में थे कि कल हमारी पत्नी जी बोली कि  कैसे मास्टर हो जी आजतक इस किराये के मकान में हमें रखे हुए हो वो बगल की बहन जी को देखो उनके नाम कितनी प्रापर्टी है कोई बोल रहा था कि करोड़ों की है.कुछ करते क्यों नहीं ? मैने कहा क्या करूं तो कहती हैं तीन-चार घोटाले ही कर दो.

गुरु शिष्य परंपरा भी पतन की ओर है.जब मैं अपने एक शिष्य को गुरुकुल के बारे में समझाता हूँ तो वो कहता है “कूल!!.. गुरू कूल …!! टैंशन लेने का नहीं गुरू!!.. टैंशन देने का” और वो ढेर सारा टैंशन मेरे को दे बाइक में अपनी महिला मित्र को लेकर फुर्र हो जाता है.

बच्चों को तुलसीदास के बारे में बताता हूँ तो कहते हैं कि आपको नहीं मालूम तुलसी पुरुष नहीं वरन स्त्री हैं.चाहें तो घर घर में पूछ लें आपको सब जगह तुलसी के एक ही कहानी सुनने को मिलेगी. कुछ दिनों पहले जब अपने एक और शिष्य अरुण को एक पंक्ति “बंदउ गुरु पद पदुम परागा । सुरुचि सुबास सरस अनुरागा॥ ” का अर्थ बताने लगा तो वो कहता है कि इसका अर्थ है कि अपने टीच्रर यानो सो-कॉल्ड गुरु को पैरों से बांधकर कहीं बंद कर दो ..खुद पान पराग खाओ..मुँह से अच्छी सुगंध भी आयेगी और अच्छा रस भी मिलेगा. फिर उसने मेरा ज्ञान बढ़ाते हुए कहा लेकिन तुलसी की ये लाइन अब आउटडेटेड है आजकल पान पराग से ज्यादा रजनीगंधा का जमाना है और तुलसी तो साथ है ही.

मेरी समझ में नहीं आता कि मैं आउटडेटेड हूँ या बच्चे अपडेटेड.कुछ दिनों पहले तक मैं समझता था कि ‘डेट’ मतलब ‘दिनांक’ या ‘तारीख’ होता है लेकिन जब शिष्या ‘शर्मीली’ किसी को बता रही थी कि वो कल डेट पर जा रही है तो समझा कि ये तारीख से भी ऊंची कोई चीज होती है. किसी ने बताया कि ‘डेट’ भविष्य की किसी तारीख में मुकदमे का अनुकूल फैसला हो जाने के लिये लगायी जाने वाली तारीख है.मुझे कानून की तो जानकारी ज्यादा नहीं है किसी कानूनविद से पूछुंगा कि ये क्या बला है.

आज का दिन फिर उन्ही लड़ाई झगड़ों में बीत गया जो आजकल आम होते जा रहे हैं.मिसेज गुप्ता अपनी किटी पार्टी में कोई नया गहना पहन कर आयी तो मेरी पत्नी ने भी एक नये गहने की मांग कर डाली.ना मानने पर उन्होने भूख हड़ताल करने की घोषणा की है..भूख हड़ताल-यानि कि वो खाना नहीं बनायेंगी और मेरे को भूखा रहना पड़ेगा.इसीलिये परेशान हूँ सोच रहा हूँ कि पत्नी की बात मान ही लूँ ..यानि एक आध घोटाला कर ही डालूँ.

काकेश

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Jul 162007
 

पिछ्ली बार जब हरिशंकर परसाई जी कि एक रचना प्रस्तुत की थी तो युनुस भाई ने कहा था

“परसाई जी की और रचनाएं लाएं”

आज पेश उनकी एक और रचना.

सुबह की डाक से चिट्ठी मिली, उसने मुझे इस अहंकार में दिन-भर उड़ाया कि मैं पवित्र आदमी हूं क्योंकि साहित्य का काम एक पवित्र काम है. दिन-भर मैंने हर मिलने वाले को तुच्छ समझा. मैं हर आदमी को अपवित्र मानकर उससे अपने को बचाता रहा. पवित्रता ऐसी कायर चीज है कि सबसे डरती है और सबसे अपनी रक्षा के लिए सचेत रहती है. अपने पवित्र होने का एहसास आदमी को ऐसा मदमाता है कि वह उठे हुए सांड की तरह लोगों को सींग मारता है, ठेले उलटाता है, बच्चों को रगेदता है. पवित्रता की भावना से भरा लेखक उस मोर जैसा होता है जिसके पांव में घुंघरू बांध दिए गए हों. वह इत्र की ऐसी शीशी है जो गंदी नाली के किनारे की दुकान पर रखी है. यह इत्र गंदगी के डर से शीशी में ही बंद रहता है. वह चिट्ठी साहित्य की एक मशहूर संस्था के सचिव की तरफ से थी. मैं उस संस्था का, जिसका लाखों का कारोबार है, सदस्य बना लिया गया हूं. स्थायी समिति का सदस्य हूं. यह संस्था हम लोगों को बैठकों में शामिल होने का खर्च नहीं देती क्योंकि पैसा साहित्य के पवित्र काम में लगे हुए पवित्र पदाधिकारियों के हड़पने में ही खर्च हो जाता है. सचिव ने कि साहित्य भवन के सामने एक सिनेमा बनाने की मंजूरी मिल रही है. सिनेमा बनने से साहित्य भवन की पवित्रता, सौम्यता और शांति भंग होगी. वातावरण दूषित होगा. हम मुख्यमंत्री को सिनेमा निर्माण न होने देने के लिए ज्ञापन दे रहे हैं. आप भी इस पर दस्तखत कर दीजिए. इस चिट्ठी से मुझे बोध हुआ कि साहित्य पवित्र है, हम साहित्यकार पवित्र हैं और साहित्य की यह संस्था पवित्र है. मेरे दुष्ट मन ने एक शंका भी उठाई कि हो सकता है किसी ऐसे पैसेवाले ने, जिसे उस जगह दुकान खोलनी है, हमारे पवित्र साहित्य के पवित्र सचिव को पैसा खिला दिया हो कि सिनेमा न बनने दो. पर मैंने इस दुष्ट शंका को दबा दिया. नहीं, नहीं, साहित्य की संस्था पवित्र है, सिनेमा अपवित्र है. हमें अपवित्रता से अपना पल्ला बचा लेना चाहिए.

शाम की डाक से संस्था के विपक्षी गुट के नेता की चिट्ठी आई जिसमें संस्था में किए जा रहे भ्रष्टाचार का ब्यौरा दिया गया था.इस पत्र ने मुझे झकझोरा. अपनी पवित्रता पर मुझे शंका हुई. साहित्य के काम की पवित्रता पर शंका हुई. साहित्य की संस्था की पवित्रता की मेरी उठान शांत हुई और मैं नॉर्मल हो गया. इतने साल साहित्य के क्षेत्र में हो गए. मैं कई बार पवित्र होने की दुर्घटना में फंसा, पर हर बार बच गया. मुझे लिखते जब कुछ ही समय हुआ था, तभी बुजुर्ग साहित्यकार मुझसे कहते थे- आपने साहित्य रचना का कार्य अपने हाथ में लिया है. माता वीणा-पाणि के मंदिर की पवित्रता बनाए रखिए. मैं थोड़ा फूलता था. सोचता था, सिगरेट पीना छोड़ दूं क्योंकि इस धुंए से देवी के मंदिर के धूप की सुगंध दबती होगी. पर मैं उबर आया. वे बुजुर्ग कहते- मां भारती ने आपके सामने आंचल फैलाया है. उसे मणियों से भर दीजिए. (वैसे कवि ‘अंचल’ उस दिन कह रहे थे कि हम तो अब ‘रजाई’ हो गए). जी हाँ, मां भारती के अंचल में आप कचरा डालते जाएं और उसी में मैं मणि छोड़ता जाऊं. ये पवित्र लोग और पवित्र ही लिखने वाले लोग बड़े दिलचस्प होते हैं. एक मुझसे बार-बार कहते- आप अब कुछ शाश्वत साहित्य लिखिए. मैं तो शाश्वत साहित्य ही लिखता हूं. वे सट्टे का फिगर रोज नया लगाते थे, मगर साहित्य शाश्वत लिखते थे. वे मुझे बाल्मीकि की तरह दीमकों के बमीठे में दबे हुए लगते थे. शाश्वत साहित्य लिखने का संकल्प लेकर बैठने वाले मैंने तुरंत मरते देखे हैं. एक शाश्वत साहित्य लिखने वाले ने कई साल पहले मुझसे कहा था- अरे, आप स्कूल मास्टर होकर भी इतना अच्छा लिखते हैं. मैं तो सोचता था, आप प्रोफेसर होंगे. उन्होंने स्कूल-मास्टर लेखक की हमेशा उपेक्षा की. वे खुद प्रोफेसर रहे. पर आगे उनकी यह दुर्गति हुई कि उन्हें कोर्स में लगी मेरी ही रचनाएं कक्षा में पढ़ानी पड़ीं. उनका शाश्वत साहित्य कोर्स में नहीं लगा. सोचता हूं, हम कहां के पवित्र हैं. हममें से अधिकांश ने अपनी लेखनी को रंडी बना दिया है, जो पैसे के लिए किसी के भी साथ सो जाती है. सत्ता इस लेखनी से बलात्कार कर लेती है और हम रिपोर्ट तक नहीं करते. कितने नीचों की तारीफ मैंने नहीं लिखी. कितने मिथ्या का प्रचार मैंने नहीं किया. अखबारों के मालिकों का रुख देखकर मेरे सत्य ने रूप बदले हैं. मुझसे सिनेमा के चाहे जैसे डायलाग कोई लिखा ले. मैं इसी कलम से बलात्कार की प्रशंसा में भी फिल्मी गीत लिख सकता हूं और भगवद् भजन भी लिख सकता हूं. मुझसे आज पैसे देकर मजदूर विरोधी अखबार का संपादन करा लो और कल मैं उससे ज्यादा पैसे लेकर ट्रेड-यूनियन के अखबार का संपादन कर दूं. इसी कलम से मैंने पहले ‘इंदिरा गांधी जिंदाबाद’ लिखा था, फिर ‘इंदिरा गांधी मुर्दाबाद’ लिखा था, और अब फिर ‘इंदिरा भारत है’ लिख रहा हूं. क्या हमारी पवित्रता है? साहित्य भवन की पवित्रता को सिनेमा भवन क्या नष्ट कर देगा? पर होता तो है पवित्रता, शराफत, चरित्र का एक गुमान. इधर ही एक मुहल्ले में सिनेमा बनने वाला था, तो शरीफों ने बड़ा हल्ला मचाया- यह शरीफों का मोहल्ला है. यहां शरीफ स्त्रियां रहती हैं और यहां सिनेमा बन रहा है. गोया सिनेमा गुंडों के मोहल्ले में बनना चाहिए ताकि इनके घरों की शरीफ औरते सिनेमा देखने गुंडों के बीच जाएं. मुहल्ले में एक आदमी रहता है. उससे मिलने एक स्त्री आती है. एक सज्जन कहने लगे- यह शरीफों का मुहल्ला है. यहां यह सब नहीं होना चाहिए. देखिए, फलां के पास एक स्त्री आती है. मैंने कहा- साहब, शरीफों का मुहल्ला है, तभी तो वह स्त्री अपने पुरुष मित्र से मिलने बेखटके आती है. क्या वह गुंडों के मुहल्ले में उससे मिलने जाती?

पवित्रता का यह हाल है कि जब किसी मंदिर के पास से शराब की दुकान हटाने की मांग लोग करते हैं, तब पुजारी बहुत दुखी होता है. उसे लेने के लिए दूर जाना पड़ेगा. यहां तो ठेकेदार भक्ति-भाव में कभी-कभी मुफ्त भी पिला देता था. मैं शाम वाले पत्र से हल्का हो गया. पवित्रता का मेरा नशा उतर गया. मैंने सोचा, साहित्य भवन के सचिव को लिखूं- मुझे दूसरे पक्ष का पत्र भी मिल गया है जिसमें बताया गया है कि अपनी संस्था में कितना भ्रष्टाचार है. अब तो सिनेमा-मालिक को ही मांग करनी चाहिए कि यह साहित्य की संस्था यहां से हटाई जाए, जिससे दर्शकों की नैतिकता पर बुरा असर न पड़े. इसमें बड़ा भ्रष्टाचार है.

कैसी लगी!!

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: हरिशंकर परसाई, हास्य व्यंग्य
Jul 132007
 
चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: हास्य व्यंग्य

नये युग के बच्चे अब नये तरीके सीखना चाहते हैं.उन्हे अब पुराने तरीको से कोई मतलब नहीं.नये युग के कुछ बच्चों को इतिहास पढ़ाना चाह रहा था.ताकि वो भी समझे कि उनके पूर्वजों ने कितने कितने त्याग किये.कितने दिन सुनहले होते होते रह गये और रातें काली हो गयी.लेकिन बच्चों की इच्छा अब इस चवन्नी छाप इतिहास जैसे विषयों में कहाँ रही.वह रातों रात प्रसिद्ध होना चाहते हैं-येन केन प्रकारेण.भले ही उसके लिये उन्हें किसी को गरिया कर उसकी वाट लगानी पड़े या फिर मालिक के सामने कुत्ते की तरह दुम हिलानी पड़े. प्रसिद्ध होने की राह यदि बदनामी के मोहल्ले से भी गुजरती हो तो भी स्वीकार्य है.

मैं बच्चों को जैनुइनली इतिहास पढ़ाना चाहता था. मैने सोचा की चलो उन्हे कोई कहानी सुनाऊं..नये जमाने के बच्चे थे ‘कहानी घर घर की’ में इंट्रस्ट रखते थे इतिहास में नहीं.मैने उन्हे पढ़ाते हुए कहा कि एक राजा था जो… एक बालक बोल उठा कि ‘ये राजा क्या होता है..??’. मैने कहा राजा याने किंग.बच्चे आजकल जो बात हिन्दी में नहीं समझते वो अंग्रेजी में आसानी से समझ जाते हैं. वो बोला अच्छा किंग यानि किंग खान यानि शाहरुख खान…मैं बोला अरे वो किंग खान नहीं बादशाह,शहंशाह..मैने उर्दूमय होना चाहा पर मनमोहनमय होकर रह गया.लड़के ने कड़कके पलटके जबाब दिया ..वो इतना जोर से बोला कि एक पल को तो मै भी ऎसे हिल गया जैसे करुणानिधि की धमकी से मनमोहन सरकार हिल जाती है…वो बोला देख बे मास्टर ठीक ठीक बता राजा मतलब बादशाह यानि शाहरुख या शहंशाह यानि अमिताभ बच्चन ….दोनों में कौन है राजा.. ? ये तो अपने आपमें एक बहस का मुद्दा था कि कौन है राजा और मैं लैफ्ट पार्टी की तरह मुद्दों में नही उलझना चाहता था.तो मैं अपने को संयत करते हुए बात को दूसरी तरफ ले गया और मेरी सरकार गिरते गिरते बची…मैं बोला कि अरे राजा.. समझो जैसे हमारे देश के राजा मनमोहन सिंह ..अरे तो बोल ना राजा मतलब बिना पैंदी का लोटा होता है.जिसकी जमीन का पता नहीं लेकिन आसमान में उड़ता है,व्यर्थ ही कुड़ता है ...मैं वाद-विवाद को संसद के नेताओं की तरह खींचना नहीं चाहता था इसलिये मैने मान लिया हाँ हाँ वही…

तो एक भूतपूर्व राजा था… भूतपूर्व बोले तो …पहले वो राजा था आजकल नहीं है ..आजकल कौन है ? किसी ने सवाल किया ..आजकल कौन है वो कहानी का हिस्सा नहीं है… ये राजा केवल नाम का राजा था यानि कि भारत की स्वतंत्रता के बाद का राजा …सरकार से कुछ रकम मिलती थी उसी से गुजर बसर होती थी..थोड़ा बहुत कमाई अपने शहर की प्रजा से लिये गये चंदे के ब्याज से हो जाती. लेकिन ठाठ बाठ वही राजाओं वाले ..यानि कड़क के बोलता मगर हड़क के रहता था.. और मूछें रखता था ..कभी कभी उन पर ताव भी देता था…

ताव मने ..?? मैने ताऊ तो सुना था ..क्या ताव और ताऊ एक ही है ?? एक जिज्ञासु बालक ने शंका जाहिर की. मैने उस बच्चे के शब्द ज्ञान की तारीफें करते हुए कहा कि नहीं बेटा ताव मतलब जैसे कभी कभी गुस्सा हो जाना …गुस्से में अंट शंट बक देना जैसे बाल ठाकरे जी बोल देते है कभी कभी..बच्चा समझ गया या फिर उसने मुझे आगे छेड़ना उचित नहीं समझा पता नहीं पर हमने अपनी कहानी आगे बढ़ायी.

एक बार राजा को जिद सवार हुई की मेरा थोबड़ा टी वी पर आना चाहिये.क्यों आना चाहिये ये नही मालूम पर आना चाहिए.अब राजा की जिद थी… आना है तो आना है..राजा भले ही भूतपूर्व था पर उसके कुछ पुराने चमचे टाइप लोग थे जो हर समय उसके साथ रहते और उसकी हर इच्छा पूरी करने की कोशिश करते.ये चमचे टाइप लोग भी अजीब होते हैं. राजा ने कहा रात है तो चमचों ने भी कहा रात है..राजा ने कहा सुहानी रात है चमचों ने भी कहा सुहानी रात है और ये सुबह सुबह की बात है..  अब राजा की औकात चमचों से थी या चमचों की औकात राजा से या फिर दोनों की कोई औकात ही नहीं थी इस बात का पता लगाना बड़ा कठिन था. 

चमचों ने इधर उधर हाथ पांव मारे.. अच्छे अच्छे चैनल के कच्चे पक्के पत्रकारों को पटाने की कोशिश की आखिर चमचों की मेहनत रंग लायी और एक पत्रकार पट ही गया..पत्रकारों को कैसे पटाया जाता है ? एक बच्चे ने जानना चाहा.. ये किसी और क्लास में पढ़ाया जायेगा.मैने उसे चुप कराया..हां तो चमचों ने पता लगाया कि अधिकतर टी वी चैनल दिल्ली में हैं तो राजा को दिल्ली जाना पड़ेगा… दिल्ली नेताओं की नगरी तो थी ही अब चैनल नगरी भी हो गयी थी….राजा पूरी तैयारियों के साथ दिल्ली पह्ंचा और उसके थोबड़े के टीवी में आने की उल्टी गिनती शुरु हो गयी. 

इस कहानी से हमें क्या शिक्षा मिलती है बच्चों ने जो उत्तर दिये उनमें से प्रमुख थे.

1.हर भूतपूर्व अभूतपूर्व नहीं होता.

2.ये  चमचे बड़े काम की चीज होते हैं.इसलिये हर व्यक्ति को चमचे रखने चाहिये.
3. यदि सही तरीका अपनाया जाये तो पत्रकारों को पटाना आसान काम होता है..

काकेश

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लंगी लगाने की विशुद्ध भारतीय कला

Jul 132007
 

हिन्दी चिट्ठाजगत की दुनिया आजकल शोधमय भी है और हिटास के प्रति जागरूक भी.कोई हिट होना सिखा रहा है तो कोई हिट करना.हिट पर आधारित सभी चीजें हिट हैं.हिट की हीट का ये असर है कि लोग हिट की चाह में लेखन कर रहे हैं.भले ही आप कहें कि हिट के लिये न लिखो खुद के लिये लिखो लेकिन इसका परोक्ष लाभ भी है कि हिन्दी में ‘कुछ’ लिखा जा रहा है. सारा लिखा स्तरीय ना भी हो तो कूड़ा भी नहीं है.

विषयों की विविधता भी बढ़ी है. विविधता चुनाव का अवसर देती है और बने बनाये परिवार या गुट से अलग होने का अवसर भी. वो दिन धीरे धीरे खतम हो रहे हैं जब आपको किसी भी लेख को पढ़कर ना चाहते हुए भी “अच्छा है अच्छा है” कहना पड़ता था. अभी आप “पीठ खुजाने” के बोरिंग काम से ऊपर उठकर विमर्श के लिये तैयार हो पाते है या हो पायेंगे. टिप्पणीयों में विमर्श हो या लेखों में विमर्श किसी भी तरह का काम हिन्दी के लिये अच्छा ही है. हाल में हुए विवादों ने भले ही किसी के लिये व्यक्तिगत रूप से भला किया हो या ना हो हिन्दी और हिन्दी चिट्ठाजगत का जरूर भला किया है.लोग अपने विचार खुलकर रखने लगे है. चाहे उसकी परिणति भड़ास के रूप में हो या परिवर्तित पंगेबाज के रूप में.

ये परिवर्तन मैने भी खुद में भी महसूस किया है.मेरा भी हिन्दा चिट्ठाजगत से पारिवारिक मोह भंग हुआ है और मेरी अन्य विषयों के प्रति सोच विस्तृत हुई है. पहले मैं सोचा करता था कि शायद में किसी चिट्ठाकार से ना मिलूं या उससे बातें ना करूँ ..गुमनाम रहकर ही लिखते रहूँ ऎसी सोच थी..यह मेरे अन्दर के भय के कारण था या मेरे अंतर्मुखी व्यक्तित्व के कारण ..नहीं मालूम ..पर अब वो सोच नहीं रही.. प्रमोद जी ने मेरे किसी लेख पर अपनी टिप्पणी में कहा था कि “डरो मत अब बड़े हो गये हो”…मुझे लगता है कि मैं सचमुच बड़ा हो गया हूँ..ये अहसास मुझे दूसरों को समझने के लिये उकसाता है.. फालतू की बातों में उलझ कर समय व्यर्थ ना करूं ऎसी सोच देता है.. इसलिये मैं इसे चिट्ठाजगत की उपलब्धि मानता हूँ …कम से कम अपने लिये…

नये फीड संयोजको का आना शुभ संकेत है आने वाले समय इनकी जरूरत और भी महसूस की जायेगी..इनका स्वरूप भी बदलेगा और इनसे होने वाली अपेक्षाऎं भी ..

आशा करें हम हिन्दी का रोना रोने वाले लोग हिन्दी के नाम पर खुश भी हो सकेंगे..

Jul 122007
 

नेतागिरी स्कूल में भर्ती होने वाले कुछ दुहारू (दूसरों को दूहने में माहिर) छात्रों की परीक्षा चल रही थी.वहां के प्रश्नपत्र में आये निबंध पर एक मेघावी और भावी इतिहास पुरुष छात्र का निबंध.

लंगी लगाना भारतीय मूल की प्रमुख कला है.लंगी लगाना यानि किसी बनते बनते काम को लास्ट मूमेंट में रोक देना.जैसे आप अपनी प्रेमिका को फोन लगाने के लिये मन बनायें और आपकी बीबी पीछे से आपको आवाज दे दे.वैसे बीबीयाँ ही लंगी लगायेंगी ये जरूरी नहीं ये काम आपके चिर परिचित हें हें हें या नॉन हें हें हें टाइप मित्र भी कर सकते है.हर बात पर क्रांति की धमकी देने वाले नये क्रांतिकारी भी और सामाजिक सरोकारों से जुड़े रहने वाले महान बुद्धिजीवी भी इस कला में माहिर होते हैं. अब वो चाहें लल्लू हों या चिरकुट लंगी लगाने के मामले में हम भारतीय जन्मजात एक्सपर्ट होते हैं.एशियाई खेलों में कबड्डी में स्वर्ण पदक हमारी इसी जन्मजात प्रतिभा का कमाल है. कुछ विश्वस्त सूत्रो ने खबर दी है कि भारत सरकार लंगी लगाने की इस विशुद्ध भारतीय कला का पेंटेट कराने की भी सोच रही है.नहीं तो क्या पता कोई विदेश में रहने वाला चौधरी, जो इस मामले में पहले से ही बदनाम है,इसका भी पेटेंट करवाले.

यह कला आजकल ही सामने आयी है यह कहना उचित नहीं होगा. इतिहास गवाह है कि यह कला तो युगों पुरानी है. किसी भी चीज का इतिहास उस चीज से भी ज्यादा महत्वपूर्ण होता है,हालांकि इतिहास झूठ को सच और सच को झूठ करने की सफल कोशिश का नाम  भी है फिर भी इतिहास ही किसी भी चीज को समझने का पैमाना भी है.

त्रेता युग में रामचन्द्र जी के साथ ऎसा ही हुआ था.जब रामचन्द्र जी को सारा राजपाट मिलने की तैयारियां हो रही थी तो उनकी सौतेली माता कैकयी ने लंगी लगा दी और बेचारे राम को 14 वर्ष जंगलों की धूल छाननी पड़ी.वैसे उन्होने भी शूर्पनखा के लखन जी से और रावण के सीता से विवाह करने के  सपनों पर लंगी लगाकर बदला चुकाने की कोशिश की पर वो खुद ओरिजिनल भुक्त भोगी थे.

द्वापर युग में लंगी लगाने के अनेक हिट सीन हुए हैं.जिन पर आज भी दर्शक चवन्नी फैंक के ताली बजा सकता है.अर्जुन घूमती मछली की आंख पर निशाना साध कर (जिसके लिये वो बचपन से प्रैक्टिस कर रहे थे) द्रोपदी को जीतकर लेकर घर आ रहे थे और सुहागरात के सपनों में  खोये हुए थे कि माता कुंती ने लंगी लगा दी और द्रोपदी को पांचो पांडवों में बांट दिया. युधिष्ठिर को राजपाट मिलने की बातें पक्की होने वाली थी कि दुर्योधन ने लंगी लगा दी और उन्हें वनवास में भिजवा दिया.द्रोपदी का चीर हरण हो रहा था.दु:शाशन नग्न द्रोपदी को देखने के सपनों में खोया था.सभा के अन्य लोग भी भारतीय जनता की तरह शांत हो तमाशा देख रहे थे कि कृष्ण जी ने लंगी लगा दी.कुछ लोगों के अनुसार कृष्ण को इतिहास के प्रमुख लंगीबाजों में शामिल किया जा सकता है. अर्जुन जब युद्ध से विमुख हो कुछ भला काम करने की सोच रहा था तो उसे गीता का उपदेश देकर युद्ध में भिजवाने की लंगी मारने में भी कृष्ण जी का ही हाथ था.

कलियुग में भी ऎसी कई घटनाऎं मिल जायेंगी,जैसे जयचन्द का पृथ्वीराज चौहान को लंगी मारना. आधुनिक भारत में ऎसी कई मिसाल ढुंढी जा सकती हैं जैसे सोनिया गाधी को कोई अदृस्य लंगी लगना जिसकी वजह से उनका पी एम बनने से रह जाना.वैसे भी लंगी मारक क्रियाओं और नेतागिरी में चोली दामन का साथ है. लैफ्ट पार्टियां इस कला की जीतीजागती मिसाल पेश करते ही रहती हैं.कुछ लोगों का तो यहाँ तक कहना है कि CPI(L) का L और CPI(M) का M मूलत: क्रमश: लंगी और मारने के लिये ही प्रयुक्त होते है.लेखक इस बारे में और गहन शोध कर रहे हैं.

कुछ लोग “लंगी लगाना” की तुलना “लकड़ी करना”,”बांस करना”,”डंडा करना” या “टांग अड़ाना” जैसे अन्य विशुद्ध भारतीय क्रियाओं से करते हैं पर मेरा मानना है कि ये सब अलग अलग क्रियाऎं है और अलग अलग मौकों पर प्रयुक्त की जाती है.

लंगी लगाने की क्रिया में कैटेलिस्ट यानि उत्प्रेरक का भी बहुत बड़ा योगदान होता है. कई बार इन कैटेलिस्टों के बारे में हमें जानकारी रहती है कभी नहीं रहती लेकिन अधिकतर मामलों में कोई ना कोई कैटेलिस्ट होता ही है. कुछ प्रमुख इतिहास प्रसिद्ध कैटेलिस्ट है कुबड़ी दासी  मंथरा, मामा शकुनि आदि.

तो इससे हमें पता चलता है कि लंगी मारना एक विशुद्ध भारतीय कला है इस का अधिक से अधिक उपयोग कर हमें इस (विलुप्त होती ..हो नहीं रही कहीं हो ना जाये ..वैसे चांसेज कम ही हैं पर क्यों रिस्क लें)कला को डूबने से बचाना चाहिये.तो क्यों ना आज से लंगी मारना प्रारम्भ करें.

काकेश

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चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: हास्य व्यंग्य
Jul 112007
 

रविवार 8 जुलाई को  अंग्रेजी के प्रमुख समाचार पत्र टाइम्स ऑफ इंडिया में एक लेख छ्पा था ” Blogging straight from the heartland” . हाँलाकि मैं इस समाचार पत्र को पढ़ता हूँ पर मेरी नजर इस लेख पर नहीं पड़ी.शाम को श्रीश जी ने बातचीत के दौरान इस लेख के बारे में बताया. तुरंत खोज कर पढ़ा ..लेख पढ़ कर लगा कहीं कुछ अधूरा सा है .. हिन्दी चिट्ठाकारी [पल्लवी जी,जिन्होने ये लेख लिखा था, ने कहा है कि ये लेख हिन्दी चिट्ठाकारी पर नहीं वरन हिन्दी और अंग्रेजी चिट्ठाकारी दोनों पर था] पर लेख और उल्लेख केवल कुछ ही चिट्ठों का!! बात कुछ हजम नहीं हुई ..श्रीश जी से इस बाबत बात हुई हाँलाकि नाम छपने से श्रीश जी खुश तो थे  पर थोड़ा निराश लगे कि इसमें नारद, सर्वज्ञ आदि का नाम नहीं आया. उनका कहना था कि उन्होने इस का उल्लेख तो लेखिका से किया था पर ना जाने छ्पा क्यों नहीं. 

नारद,हिन्दी ब्लॉग्स डॉट कॉम और सर्वज्ञ का हिन्दी चिट्ठाजगत में एक महत्वपूर्ण स्थान रहा है…. और हिन्दी चिट्ठाजगत पर  लेख बिना इनके अधूरा सा लगता है.. इसके अलावा और भी कई महत्वपूर्ण स्तंभ (चिट्ठाकार) हैं हिन्दी चिट्ठाजगत में जिनके बारे में इस लेख में कोई जिक्र नहीं था.

वैसे बता दूँ कि इस लेख में किस किस का उल्लेख है.इसमें उल्लेख है यमुनानगर के श्रीश जी का, रतलाम के रवि जी का, जालन्धर के गोपाल अग्रवाल का, नागपुर के संतोष मिश्रा का, कोल्हापुर के नवीन तिवारी का. [मैने रवि जी और श्रीश जी के अलावा बांकी महानुभावों का चिट्ठा नहीं देखा है.यदि आपको मालूम हो तो टिप्पणी द्वारा बतायें ताकि लिंक दिया जा सके..पल्लवी जी ने अपने ई-पत्र में बताया है कि बांकी के चिट्ठाकार हिन्दी के नहीं वरन अंग्रेजी के हैं]. लेख में छ्पी रवि जी की फोटो बहुत अच्छी थी वो क्या कहते ना झक्कास. वैसे रवि जी ने इसका श्रेय अपनी पत्नी रेखा जी को दिया है. अब उनकी अच्छी फोटो में रेखा जी का हाथ कैसे है ये तो नहीं मालूम पर हाँ यदि कभी हमारी कोई खराब फोटो (जाहिर है खराब ही होगी) छपे तो (वैसे संभावना कम ही है) हम भी कहेंगे कि इसमें हमारी पत्नी का ना सिर्फ हाथ है वरन और भी बहुत कुछ है..आखिर उन्होने ही तो खिला पिला के इतना मोटा किया है कि अब तो आइने में भी पूरा मुँह नहीं समाता :-) खैर ये तो विषयातंर हो रहा है. लेख पर आते हैं.

पूरे लेख का चित्र देवाशीष जी के सौजन्य से यहां मौजूद है.

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लेख पढ़ने के बाद मैने उसी समय लेख की लेखिका पल्लवी जी को ई-पत्र लिखा और धन्यवाद सहित उन्हे सुझाया कि कुछ और प्रमुख हिन्दी चिट्ठाकारों के नामों को लेख में शामिल किया जा सकता था.मैने प्रमुख चिट्ठों के पते जानने के लिये उन्हे चिट्ठा जगत डॉट कॉम की सकियता सूची को देखने की भी सलाह दी. ताकि वो अपने अगले लेख में अधिकाधिक हिन्दी चिट्ठाकारों को सम्मिलित कर सकें.

पल्लवी जी ,जो टाइम्स ऑफ इंडिया की विशेष संवाददाता है,से मुझे किसी उत्तर की अपेक्षा नहीं थी लेकिन कल  मेरे पास जब उनका जबाब आया तो सुखद आश्चर्य हुआ. उन्होने अपने ई-पत्र में जो कहा उससे में सहमत होता दिखा.इसलिये आपकी जानकारी के लिये उसका सार आप तक पहुंचा रहा हूँ.

उनका कहना था कि उनका ये लेख हिन्दी चिट्ठाकारी पर नहीं वरन छोटे शहरों में रहने वाले हिन्दी चिट्ठाकारों पर केन्द्रित था जो तकनीक की बहुत अच्छी सुविधाऎं ना होने के बाबजूद चिट्ठाकारी कर रहे हैं. इसीलिये रतलाम के चिट्ठाकार रवि जी और यमुनानगर के चिट्ठाकार श्रीश जी और अन्य को चुना गया. (गौरतलब है कि तकनीक की अच्छी सुविधाऎं ना होने के बाबजूद दोनों चिट्ठाकारों का चिट्ठा तकनीकी विषयों पर ही आधारित है)

पल्लवी जी ने वादा किया है कहा है कि शीघ्र यदि वो एक लेख हिन्दी चिट्ठाजगत पर भी लिखेंगी तो मुझसे भी संपर्क करेंगी..जिसमें अधिकाधिक चिट्ठाकारों को शामिल किया जा सकेगा. आप लोग अभी से मुझे अपने बधाई संदेश भेज सकते हैं..हो सकता है फोटो देखने के बाद ना भेजें… :-)

तो प्रतीक्षा कीजिये पल्लवी जी के अगले लेख की और इस लेख के लिये उन्हे पुन: धन्यवाद.