एक मास्साब क्लास में बच्चों को रंगो के बारे में पढ़ा रहे थे.उन्होने मास्साबों की चिर परिचित इस्टाईल में पूछा कि “बच्चो रंगो के बारे में तुम लोग क्या जानते हो? “.
अब हमारे जमाने के बच्चे होते तो चुप होकर नीचे देखने लगते कि कहीं मास्साब से नजर मिली और उन्होने उठा कर पूछ लिया तो !! और मन ही मन सोचते कि अरे जानते ही होते तो तेरी क्लास में क्या झक मारने आते….पर आजकल के बच्चे बड़े समझदार हैं.इधर मास्साब ने सवाल पूछा और उधर जबाब हाजिर इसीलिये समझदार मास्टर लोग आजकल सवाल  पूछने का जोखिम ही नहीं उठाते.

एक बच्चा उठा और बोला जी “रंगबाजी” वो होती है जिसमें सामने वाले को अपने सारे रंग तब तक दिखाये जाते हैं  जब तक कि वो डर के मारे कोई भी रंग ना देखने की कसम ना खाले. मैने रंगबाजी नहीं केवल रंग के बारे में पूछा था.मास्टर ने बच्चे को जबरदस्ती बैठाते हुए कहा.मास्टर ने सोचा अब तो कोई बता नहीं पायेगा और फिर अपनी विद्वता का चोला ओड़ वो बच्चों को समझायेगा.गलती यहीं हो गयी मास्टर से… मास्टर पुराने जमाने का था बच्चे नये जमाने के.

एक और बच्चा उठा और बोला जी रंग वो होता है जो आमिरखान बसंती से मांगते है (सन्दर्भ : रंग दे बसंती .. रंग दे बसंती ).बसंती कौन ..?? मास्टर ने पूछा ..अरे वही धन्नो की मालकिन,वीरु की माशूका और कौन… किसी ने पीछे से ज्ञान वर्धन करते हुए कहा…. और सर रंग वो होता है जो बादलों में भरा रहता है ( सन्दर्भ : रंग भरे बादल में) और जब वह बरसता तो और कुछ भी नहीं भीगता सिर्फ चुनर वाली गोरी ही भीगती है ( सन्दर्भ : रंग बरसे ..भीगे चुनर वाली ).

बच्चा कुछ और ज्ञानवर्धन करता मास्टर ने उसे बैठाते हुए कहा अरे रंग जैसे हरा..पीला..लाल… एक बच्चा बोला जी जैसे सर “लाल किला” ..जहां झंडा फहराने का सपना हर कोई नेता देखता है. ..”लाल बत्ती” जो हर नेता की जरूरत है… और आजकल तो सर ये रंग और भी फेमस हो रहा है ..”लाल मस्जिद” की वजह से…अब सर लाल मस्जिद के मदरसों में पढ़ रहे लाल ऎसा ही तो करेंगे ना कमाल ..

मास्साब ने बीच में किसी तरह बोलने की कोशिश की और कहा कि रंगो के अंग्रेजी नाम होते है जैसे ग्रीन , रैड , ब्लू …जी हां अमिताभ अंकल अंग्रेजी में ही रंग मांगते है कहते है “गिव मी रैड” ..मांगने के मामले में आमिर खान और अमिताभ अंकल समान हैं.. बच्चा बोलता रहा …और ब्लू ये तो मेरा फैवरिट कलर है… दिल्ली सरकार का भी ये फैवरिट कलर होता था जब उन्होने रैड लाइन बसें हटाकर ब्लू लाइन बसें चलायी.. इस फैवरेटिज्म को बरकरार रखने के लिये कई बसे पुलिस वालों ने खरीद ली कुछ अपने रिश्तेदारों को भी खरीदवा दी.. अब शीला जी कह रही हैं कि “मैं ब्लू लाइन बस की बजाय पैदल जाना पसंद करुंगी”..वो तो करेंगी ही ..अब पैदल चलेंगी तो रास्ते में सब लोग फूलों से स्वागत करेंगे..हो सकता है कोई एकाध गिफ्ट भी पकड़ा दे .. ब्लू लाइन बस में क्या मिलेगा ..?? उलटा कंडक्टर पैसे और मांग लेगा टिकट नहीं देगा .. कोई भद्र इंसान चिंकोटी काट देगा या धक्का लगा देगा… ज्यादा ही कोई मेहरबान हुआ तो पर्स पर हाथ साफ कर लेगा.. अब इत्ते से के लिये क्यों बस में जाना..?? हाँ यदि आपकी किस्मत अच्छी हुई और बस ने किसी को टक्कर मार दी तो हो सकता है कि आपको बीच रास्ते उतरना पड़े ताकि आपकी जनता बस को तोडने फोड़ने का काम सुचारू रूप से संपन्न कर सके… और फिर आपकी पैदल चलने की लालसा पूरी हो सकती है…लेकिन ये तो किस्मत के ऊपर डिपेंड करता है … और किस्मत का रिस्क क्यों लेना वैसे ही अभी अभी चुनावों में किस्मत ऎन वक्त पर धोखा देके भाग गयी थी…ना जी ना …आप तो पैदल ही चलिये….

लेकिन ब्लू लाइन ..मास्साब ने अपनी कोई बात रखने की कोशिश की .. एक बच्चे ने बात को उसी तरह काटते हुए अपनी बात जारी रखी जैसे संसद में अध्यक्ष की बात काटते हुए सांसद जारी रहते हैं…देखिये सर अभी सरकार को ब्लू रंग से थोड़ी चिढ़ हो रही है .क्योकि जैसे ब्लू फिल्में बैन है (सिर्फ बैन हैं अनुपलब्ध नहीं ..पीछे बैठा लड़का कल रात की देखी हुई फिल्म को याद कर धीरे से बोला) ..सरकार ब्लू लाइन को भी बंद करने जा रही है ..अब कोई नया रंगा आई मीन रंग आयेगा और नये ढंग से पब्लिक की सेवा करेगा ..इसी को कहते है सर.. सरकार की रंगबाजी …

मास्साब कुछ बोलते इससे पहले ही घंटी बज गयी और मास्साब अपना रजिस्टर उठा कर बाहर निकल गये….

 

कल जब मित्र समीरलाल जी ने “मोटों की महिमा” छापी तो अपने मोटापे पर आती जाती शरम फिर गायब हो गयी और एक पुरानी पढी कविता याद आ गयी.. लीजिये कविता प्रस्तुत है…

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आराम करो

आराम करो

एक मित्र मिले, बोले, “लाला, तुम किस चक्की का खाते हो?
इस डेढ़ छँटाक के राशन में भी तोंद बढ़ाए जाते हो।

क्या रक्खा है माँस बढ़ाने में, मनहूस, अक्ल से काम करो।
संक्रान्ति-काल की बेला है, मर मिटो, जगत में नाम करो।”
हम बोले, “रहने दो लेक्चर, पुरुषों को मत बदनाम करो।
इस दौड़-धूप में क्या रक्खा, आराम करो, आराम करो।

आराम ज़िन्दगी की कुंजी, इससे न तपेदिक होती है।
आराम सुधा की एक बूंद, तन का दुबलापन खोती है।
आराम शब्द में ‘राम’ छिपा जो भव-बंधन को खोता है।
आराम शब्द का ज्ञाता तो विरला ही योगी होता है।
इसलिए तुम्हें समझाता हूँ, मेरे अनुभव से काम करो।
ये जीवन, यौवन क्षणभंगुर, आराम करो, आराम करो।

यदि करना ही कुछ पड़ जाए तो अधिक न तुम उत्पात करो।
अपने घर में बैठे-बैठे बस लंबी-लंबी बात करो।

करने-धरने में क्या रक्खा जो रक्खा बात बनाने में।
जो ओठ हिलाने में रस है, वह कभी न हाथ हिलाने में।
तुम मुझसे पूछो बतलाऊँ — है मज़ा मूर्ख कहलाने में।
जीवन-जागृति में क्या रक्खा जो रक्खा है सो जाने में।

मैं यही सोचकर पास अक्ल के, कम ही जाया करता हूँ।
जो बुद्धिमान जन होते हैं, उनसे कतराया करता हूँ।
दीए जलने के पहले ही घर में आ जाया करता हूँ।
जो मिलता है, खा लेता हूँ, चुपके सो जाया करता हूँ।

मेरी गीता में लिखा हुआ — सच्चे योगी जो होते हैं,
वे कम-से-कम बारह घंटे तो बेफ़िक्री से सोते हैं।

अदवायन खिंची खाट में जो पड़ते ही आनंद आता है।
वह सात स्वर्ग, अपवर्ग, मोक्ष से भी ऊँचा उठ जाता है।
जब ‘सुख की नींद’ कढ़ा तकिया, इस सर के नीचे आता है,
तो सच कहता हूँ इस सर में, इंजन जैसा लग जाता है।

मैं मेल ट्रेन हो जाता हूँ, बुद्धि भी फक-फक करती है।
भावों का रश हो जाता है, कविता सब उमड़ी पड़ती है।

मैं औरों की तो नहीं, बात पहले अपनी ही लेता हूँ।
मैं पड़ा खाट पर बूटों को ऊँटों की उपमा देता हूँ।

मैं खटरागी हूँ मुझको तो खटिया में गीत फूटते हैं।
छत की कड़ियाँ गिनते-गिनते छंदों के बंध टूटते हैं।

मैं इसीलिए तो कहता हूँ मेरे अनुभव से काम करो।
यह खाट बिछा लो आँगन में, लेटो, बैठो, आराम करो।

- गोपालप्रसाद व्यास

 

पिछ्ली पोस्ट में मैने पूजा का दर्द आपके सामने रखने की कोशिश की थी.

उस घटना का वीडियो देखिये..क्या यह शर्मनाक नहीं है ??

कुछ साथियों के कहने के बाद यह वीडियो हटा दिया गया है.

 

कल के टाइम्स ऑफ इंडिया में पूजा की तसवीर पहले पन्ने पर थी.चित्र नीचे देंखें ..खबर पढ़ी तो दिल दहल गया और साथ ही मन ही मन पूजा के साहस की प्रसंशा भी की.आज मसिजीवी ने जब इस पर लिखा और फिर सुजाता जी ने भी इसे छुआ तो रहा ना गया..और कुछ शब्दों की आड़ी तिरछी रेखाऎं पूजा के रूप में बोलने लगीं…

(1)
तुम्हें याद है
अपना वो समय
जब किसी को
निकाल दिया जाता था
सिर्फ बेटी पैदा करने के जुर्म में.
मार दिया जाता था
भविष्य की जननियों को.
सिर्फ इसलिए कि वो आपकी
मर्दानगी का विरोध नहीं कर सकती,
लेकिन क्या मार पाओगे तुम,
एक मां की ममता को
सुखा पाओगे क्या
उसके आंचल का दूध
कल वही  भय तुम्हे घेरेगा
जब तुम्हारा पुरुषवादी व्यक्तित्व
तुम्हारा बेटा
ढूंढने निकलेगा
एक अदद लड़की।

(2)
ना करती प्रतिरोध तो क्या करती?
सहती …???
और रहती उन भेडिय़ों के साथ.
आप की सभ्य दुनिया,
जो नंगेपन की आदी है
क्या देखती है नंगई सिर्फ मेरी
दुनिया को क्यों नहीं दिखायी देता
इन मर्द रूपी नामर्दों का नंगा नाच. 

(3)

हा हा हा …
अब मेरे प्रतिरोध को हवा देने
तुम भी आ गये
कहां थे तुम ??
जब जल रहीं थी बहू बेटिंयां
दहेज के नाम पर,
सताया जा रहा था उन्हें,
खून किया जा रहा था
उनके मासूम सपनों का.
तब तुम भी शायद
किसी राशन की दुकान में लगे
कैरोसीन ले रहे थे.

(4)
सुखी हैं सब परदे के पीछे
ढंक गये हैं घाव पट्टियों से.
अब उन पर मक्खियां नहीं भिनभिनाती
वो गन्दा सा घाव ढंक दिया गया है.
लेकिन दर्द !!
वो तो अभी भी है …
बल्कि गहरा गया है
उसके साथ
अब मन का दर्द जो जुड़ गया है.

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(5)

कितना घिनौना है ये सच!!
निकलना पड़ता है जब
एक मजबूर लड़की को
घर से …
इस तरह की हालत में
और तुम आतो हो साथ साथ
स्कूटर से,साइकिल से
साथ देने नहीं
मजे लेने के लिये…

 

कल योगेश जी ने बताया कि पूजा की अर्ध-नग्नता के पीछे किसी मीडिया वाले का हाल था.यदि ये सच है तो निन्दनीय है. सच जो भी हो मुझे आश्चर्य इस बात का है कि कैसे मीडिया इस बात को इतना बढ़ा चढा कर पेश कर सकता है.टाइम्स ऑफ इंडिया ने पूजा की अनसैंसर्ड चित्र को अपने मुख पृष्ठ पर छापा. क्या ये सही है??

image आप गूगल पर पूजा चौहान के बारे में खोजें आपको ना जाने कितनी साइट उसके चित्रों से भरी मिलेंगी…मुझे एक झटका सा लगा जब कुछ पॉर्न ब्लौग और साइट पर पूजा के चित्रों को चट्खारे ले के पेश किया गया. कुछ लोगों ने इसे भारत  से भी जोड़ा ..उनका कहना है कि भारत में ऎसी घटनाऎं बढ़नी चाहिये ताकि वो कुछ और ऎसी तसवीरें देख सकें…

इंटरनैट के लिखे को आप मिटा नहीं सकते.कुछ दिनों बाद जब पूजा के परिवार वाले या उसकी खुद की बेटी जब इंटरनैट पर ये सब देखेगी तो उस पर क्या बीतेगी? कैसे जियेगी वो इस तथाकथित सभ्य समाज में? क्या विरोध का ये तरीका ठीक है?? क्या पूजा की नग्नता में मुख्य सवाल कहीं छुप गया है? क्या हम ऎसे ही चटखारे लेकर इस समाचार को छापते रहेंगे और पढ़ते रहेंगें…??

कल अपनी कुछ कविताओं में भी कुछ ऎसे ही प्रश्न उठाने की कोशिश की थी मैने …पर बहुत से लोगों की नजर वहां पर शायद नहीं पड़ी…

मेरी कल की पोस्ट यहां पढें…

पूजा का वीडियो यहां देखें ..

क्या जबाब है आपके पास इन सवालों का !!

 

[ये पोस्ट अजदक की पोस्ट से प्रेरित है..]

पुराने टॉर्च पर नये सैल लगा के टटोलता टटोलता आगे बढ़ने की कोशिश करता रहा.जंगल तो नहीं था पर माहौल जंगल जैसा ही था… घुप्प अन्धेरा … सांय सांय बोलता सन्नाटा. दिन में हुई बारिस से जमीन भी गीली थी.पेड़ो से बीच बीच में गिरती बूंदें ..टप टप टप … अपने को फिसलने से बचाने के लिये संभल संभल कर चल रहा था.
पुराने शब्द …आहा क्या पुराने शब्द ..अब जब पुरनिया हो ही गये तो डर काहे का..उसी आह्लाद में बोझिल उनींदी आंखें…फिरे कोई प्रयास उन भूले पुराने शब्दों को खोज के लाने का..पुराने शब्द ? कौन से पुराने शब्द…अन्दर से आवाज आई.. शब्द कभी बूढ़े नहीं होते .. उनके चेहरे पर कभी झुर्रियां नहीं पड़ती…भुला दिये जायें ये और बात है.. पर तलाश कभी खतम नहीं होती ..कोई शब्द तलाशता है तो कोई अर्थ..

चर चरा रहे थे अधखुले किवाड़ भी ..सांय सांय में चर्र चर्र की बेहतरीन जुगलबंदी..भय कम होने की बजाय और बढ़ गया.. अधखुले किवाड़ ही तो है जो अभी अन्दर आने का रास्ता खुला रखे हैं.. गुमनाम बनके भी गुजर जायें तो भी पहचान लें शायद..लेकिन मेरी तलाश तो पहाड़ की थी उसी नीले पहाड़ की जो शब्दों के बोझ को ढोते ढोते बूढ़ा हो गया. मैं अधखुला दरवाजा छोड़ आगे बढ़ गया.. बूंदा-बांदी फिर शुरु हो गयी थी.. अपने चश्में में पड़ते छीटों को पोंछ्ता …हाथ से पगडंडी में आयी झाड़ियों को हटाता आगे बढता रहा…

नदी कहीं आसपास ही थी.. पानी का शोर बढ़ता रहा ..क्या बाढ़ आ जायेगी?? ..क्या डूब जाउंगा मैं ??..अनेक प्रश्न मन के सागर में गोते लगाने लगे…अचानक जोर की आवाजें आने लगी ..फिर कहीं से रोशनी भी आने लगी.. दूर कहीं कुछ लोग बदहवास भागे जा रहे थे… हाथों में मशाल लिये ..उनकी मशाल के आगे मेरी टॉर्च फीकी थी… वो चिल्ला रहे थे ..हिन्दी हिन्दी …अपनी हिन्दी…मेरी हिन्दी ..तेरी हिन्दी …वो और करीब आ गये..शायद उन्होने मुझे देख लिया था…वो मेरी ओर ही आ रहे थे.. मशाल उठाये…मेरे माथे पर पसीने की बुंन्दे चुंहचुंहा गयी ..क्या पता ये मुझे मार दें….??  

तभी अचानक जैसे आंख खुली …अचकचा कर उठ बैठा ..कानों में हिन्दी हिन्दी …चिन्दी चिन्दी का शोर अभी भी सुनायी दे रहा था….

ओह ये सिर्फ सपना था….!! 

 

ये तो आपको मालूम ही है कि हिन्दी ब्लॉग की दुनिया के एकमात्र पंगेबाज ने 6 जुलाई को संन्यास लेने की घोषणा की थी.ये एक बड़ी घटना थी कम से कम उन लोगों के लिये जो पंगेबाज के पंगों से परिचित थे.हर एक ब्लॉगर से पंगे लेने वाला बन्दा  ऎसा कैसे कर सकता है.हमने तुरंत काकेश ब्यूरो ऑफ इंवेस्टिगेसन (KBI) के कुछ जाबांज सिपाहियों को काम पर लगा दिया कि वो पता कर के आयें कि आखिर बात क्या है.उन्होने जो रपट भेजी उसी के आधार पर प्रस्तुत है ये विशेष रिपोर्ट एक्सक्लूसिबली इसी ब्लॉग पर. आइए उस पूरे घटनाक्रम पर नजर डालें…लेकिन पंगेबाज वापस लौटे या नहीं ये हम आपको बतायेंगे एक छोटे से नॉन कॉमर्शियल ब्रेक के बाद. अभी आप पूरी घटना पर एक नजर डालें.

जब पंगेबाज ने अपना पोस्ट लिखा तब वो बहुत बैचैन थे ..अब वह भले ही कहते हों कि उन्होने केवल नारद से जाने का फैसला लिया है लेकिन उनकी पोस्ट देखिये क्या कहती है…

ब्लोग की दुनिया के दोस्तो को पंगेबाज का नमस्कार
दोस्तो,ब्लोग बनाते समय मजाक मजाक मे ले लिया गया नाम एक पहचान बन जायेगा,एक मजाक से शुरु हुई पंगेबाज की ये यात्रा इतना खुबसूरत मोड लेकर यहा पहुचेगी कभी सोचा ना था,पर हुआ .आप सब लोगो का असीम प्यार का हकदार बना मै.आज दिनांक ६ जुलाई को मै पंगेबाज आप सब को अलविदा कहते हुये आप सब से विदा ले रहा हू.
आप सब से मिले प्यार दुलार का बहुत बहुत धन्यवाद,शुक्रिया,
आपका
पंगेबाज

यानि वो ब्लौग की दुनिया से जाने का मन बना चुके थे ..उस समय उन्होने अपनी नारद वाली चिट्ठी भी नहीं चिपकायी थी… हमारी आदत है कि हम सुबह सुबह बिना किसी ऎग्रीग्रेटर की मदद लिये कुछ चुनिंदा ब्लौग जरूर खोल के देखते है .. उनका ब्लॉग देखा तो वो एक संन्यासी की तरह सब कुछ छोड़ छाड़ कर जाने की घोषणा कर चुके थे…तुरंत लगा कि या तो वो नाटक कर रहें हैं या फिर रात की अभी तक उतरी नहीं ..इसिलिये हम तो टिपिया भी दिये.. लेकिन उधर से कोई जबाब आता नहीं दिखायी दिया… तो तुरंत फोन लगाया गया कि आखिर बात क्या है…??

उनकी आवाज सुनके ही लगा कि चोट कहीं गहरी लगी है.. वही निर्विकार भाव और वही बच्चों जैसी बातें….कि नहीं रहना मुझे यहां .. क्या होगा ये सब ब्लॉग लिख कर … फालतू की बातें करते हैं सब… एक दूसरे को गाली देने के अलावा कुछ काम ही नहीं रह गया है …..क्या समझता है वो @#$ अपने आपको …

हम ध्यान पूर्वक उनको सुनते रहे …ये तो साफ हो गया कि रात कि चढ़ी हुई तो नहीं ही है…. कुछ और बात है …वो बदस्तूर जारी थे..

मैं अपने काम में मन लगाउंगा ..ये करुंगा वो करुंगा …सारी की सारी पोस्टे डिलीट कर दुंगा…

हमने उन्हें समझाया …जैसे शराबी फिल्म में अमिताभ बच्चन को उनके छोटे भाई समझाते हैं… कि भैया पोस्ट डिलीट करके क्या होगा..उलटा आपकी पोस्ट को कोई कॉपी कर लेगा (कुछ लोग इसमें बहुत माहिर हैं) ..फिर अपने ब्लॉग पर छापकर अपनी हिटास बुझायेगा…. अब तो लोगों की चिट्ठा जगत के सक्रियता क्रम पर भी नजर है भाई …

तो उस समय तो मान गये कि नहीं वो पोस्ट डिलीट नहीं करेंगे …हम अपनी सफलता पर वैसे ही  खुश नजर आये जैसे माननीय प्रतिभा पाटिल को देख के शिव सेना वाले खुश होते हैं…. लेकिन मन तो खिन्न था ही कि आखिर क्या हो रहा है हिन्दी चिट्ठा जगत को….तुरंत एक पोस्ट चढ़ायी जिसको शुरु तो किया था अपनी यात्रा के बारे में बताने के लिये पर उसके बीच में ही हमने भी इन सब झमेलों से दूर रहने की घोषणा कर दी….  

पंगेबाज से दिन में फिर वार्तालाप का दूसरा राउंड हुआ ..हमने उनसे कहा कि आप भले ही पंगेबाज नाम से ना लिखें या फिर ब्लॉग ही ना लिखें पर लिखना बन्द मत करें …माशाअल्लाह अच्छा लिखते हैं…!! अब अपनी तारीफ सुनकर नाग भी काटना छोड़कर नाचना शुरु कर देता है ..वो भी पिघल ही गये … :-) बोले नहीं नहीं लिखना बन्द नहीं करेंगे ….क्यों करेंगे इन @#$@ के लिये ..??? हम लिखेंगे और तुमको दे देंगे…तुम अपने ब्लॉग पर छाप देना….

हमने मन ही मन सोचा कि इतना अच्छा भी नहीं लिखते कि हम अपने ब्लॉग पर छाप दें.. :-) पर इनसे कहा ….नहीं नहीं इसकी क्या जरूरत है ..हम आपके लिये एक नया ब्लॉग बना देंगे .. और ये ब्लॉग बना भी दिया…

कल अपनी पोस्ट चढ़ायी  और फिर इन्हें फोन लगाया और जनाब इनको पूरे 35 मिनट झेला..अब तक सारा सीन बदल चुका था ..वे घोषणा कर चुके थे ….

तो भाइ जी हम,हम है कह दिया तो कह दिया,हम पंगेबाज पर ही है और चिट्ठा जगत,ब्लोगवाणी तथा हिंदी ब्लोग पर भी होगे पर नारद पर नही परसो सुबह शायद ..अगर आप मिलना चाहे तो आ जाईयेगा

और फिर हमारी 11 सड़ी हुई कविताओं के बदले उन्होने पूरी की पूरी 12 अच्छी कविताऎं भी टिप्पणी में डाल दी…लीजिये वो भी देखिये….

धड़-धड़-धड़-धड़,
बम बम बम बम,
काहे लडें हम,
मौका देखा,
रणछोड़ चले हम.

आबाद करेंगे हम जहा नया,
ये यहा बरबाद करेंगे.
निपटा लेगे जब ये सब को
सब भस्मासुर को
याद करेंगे,

हर दम लेना तू,
ऐसे ही पंगा हमसे,
जवाब मिलेगे
पूरे दम से.

भाड़ में जाये,
तेरी दुनिया
तेरी उलझन
तेरी पलटन,
हम तो हैं,
भइ मन के राजा
जहा बैठ गये
वही पे मधुबन.

हम तो चले यहा से बच्चे
अब तू है और तेरे चच्चे
गली गली में नाला बहता,
बदबू से चाहे सर फटता,
पर कीड़ों की मौज हुई है,
गूंगा कहता,बहरा सुनता.

आओ राजा, आओ रानी,
सुन लो, सुन लो, नयी कहानी,
एक गली में कुत्ता बोला,
मेरी ब्लोगिंग बडी पुरानी.

धाक धिनक धिन,
ताक तिनक तिन,
इस्को भोकू,उस्को काटू
प्लानिंग मे
कट जाये दिन.

अब तो कर ले,
अपने मन की.
जल्द ही होगा सारा चौपट,
तू तो है ही घोषित सनकी.

लगा रहेगा
जाना जाना,
ऐसे ही बस कसते रहना
हाथ मे लेकर के तू पाना

आग लगाई
भागो ज्ञानी
नारद की बस
यही कहानी

इस जंग से तू,
क्या पायेगा,
खाली टप्पर
रह जायेगा,

बिन सोचे तू
लेता पंगे
फ़िसल पडे
तो हर हर गंगे

पंगेबाज

यानि वो वापस आने का मन बना चुके थे …और अभी अभी सूत्रों से पता चला है कि वो फिर आ रहे हैं …नहीं जी आ गये हैं……

 


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

कल आपकी टिप्पणीयों से कुछ तो साहस मिला कि कुछ भी लिखें पर लिखना चाहिये…वैसे मेरा भी मानना यही रहा है कि किसी भी चीज को छोड़ के भागने की प्रवृति ठीक नहीं है ..इसलिये अभी पंगेबाज जी को भी मनाने में लगे हैं कि वो भी वापस आ ही जायें… देखिये मान जायें तो आप तक खबर पहुंचायी जायेगी….

इधर बाल कविताओं का सीजन चल रहा है ..अभय जी ने इब्नबतूता फिर हल्लम हल्लम हौदा कविता चढ़ायी ..और और आज देवाषीश जी भी कविता कर बचपन को याद करने लगे … उसी के देखा देखी कुछ बड़े बच्चों के लिये कविता हमने भी लिखने की सोची … पर कविता तो आती ही नहीं लिखनी ..इसलिये कुछ तो बना ..क्या बना पता नहीं ..आप ही बताइये….

धड़-धड़-धड़-धड़,
बम बम बम बम,
चलो लड़ें हम,
काहे का गम.

आबाद करें ना,
बरबाद करेंगे.
भस्मासुर को
याद करेंगे,

ना लेना तू,
पंगा हमसे,
हम ठनके हैं
पूरे सर से.

भाड़ में जाये,
तेरी उलझन,
हम तो हैं,
थाली के बैगन.

गली गली में नाला बहता,
बदबू से चाहे सर फटता,
पर कीड़ों की मौज हुई है,
ना ये सुनता ना वो सुनता.

आओ राजा, आओ रानी,
सुन लो, सुन लो, नयी कहानी,
एक गली में कुत्ता बोला,
बिल्ली रानी बड़ी सयानी.

धाक धिनक धिन,
ताक तिनक तिन,
चूं, चूं, चूं  में
कट जाये दिन.

कर ले कर ले,
अपने मन की.
चेला चौपट,
गुरु जी सनकी.

लगी रहेगी
आनी जानी,
ले आओ बस
थोड़ा पानी.

आग बुझा के
पानी पीलो,
छोटी जिनगी
पूरी जी लो,

इस जग से तू,
क्या पायेगा,
खाली खप्पर
रह जायेगा,

कैसी लगी ये लाइनें ..बताना जरूर ..मेरे हुजूर !!

 

पिछ्ले कुछ दिनों से दिल्ली से बाहर था..इस शोर शराबे,भीड़ भड़ाके से दूर.. शांत पहाड़ की वादियों में. एक वरिष्ठ चिट्ठाकार ने भी वादा किया था कि वे जुलाई के प्रथम सप्ताह में मेरे साथ पहाड़ आयेंगे उसी हिसाब से सारा कार्यक्रम बनाया था पर फिर वो नहीं आये..फिर मैं ही अपने परिवार को लेके चल पड़ा ..कुछ  दिन हल्द्वानी रहा फिर मेरे अपने शहर अल्मोड़ा में भी जाना हुआ. वही अल्मोड़ा जो मेरे बचपन का साक्षी रहा है.वही अल्मोड़ा जिसने मुझे जीवन की आपाधापी से जूझना सिखाया..वहीं जहां मैने सुनहले भविष्य के सपने देखे..जिसकी पटाल वाली बाजार में दोस्तों के साथ घूमा ..जहां गोलू देवता,भोलेनाथ और नंदादेवी को वहां की मान्यताओं के हिसाब से पूजा. .. अभी कई सालों बाद वहां गया तो पाया कि कितना बदल गया है मेरा अल्मोड़ा… पटाल वाली बाजार के सारे पत्थर बदल दिये गये हैं  कोई नये पत्थर लगाये गये हैं. ..जो पहले जैसी शोभा नहीं देते.. नये नये मकान बन गये हैं कई नये होटल खुल गये हैं… और भी बहुत कुछ बदल गया है इस शहर में…

इधर हिन्दी चिट्ठाजगत में भी बहुत कुछ घट गया है …घट रहा है…अभी पंगेबाज ने अलविदा कहा.. पहले धुरविरोधी अलविदा कह चुके हैं… मेरा मन भी पिछ्ले कुछ विवादों से बोझिल सा हो गया है… कुछ लोग होते हैं इस चिट्ठाकारी में… जो केवल खुद ही लिखते हैं बिना इस बात की परवाह किये हुए कि उनके आसपास क्या हो रहा है ..कौन क्या कर रहा है.. मैने हमेशा से ही अपने आसपास के विषयों को छुआ ..इसी कारण मेरी दूसरी ही पोस्ट विवादों में घिर गयी… मुझे खुद के लेखन से ज्यादा दूसरों का लेखन प्रभावित करता रहा है..इसलिये उन्ही सब से प्रेरणा ले के लिखता रहा हूँ.. जब से ये “नारद विवाद” हुआ तब से लिखने की इच्छा खतम सी हो गयी .. ना मालूम  किस बात का कोई गलत मतलब निकाल ले….

लेकिन ना तो मैं अलविदा कह रहा हूँ ना ही चिट्ठा बन्द करने की धमकी दे रहा हूँ.. :-) बस अभी कुछ दिनों से जो कर रहा हूँ वही करुंगा ..यनि सिर्फ चिट्ठों को पढ़ुंगा और टिपियाउंगा…

इधर ब्लॉगवाणी भी अवतरित हुई है… पहला प्रारूप काफी अच्छा लगता है …हांलांकि वो कह रहे हैं कि अभी परीक्षण चल रहा है ..पर परीक्षण भी काफी अच्छा है… आगे देखिये और क्या क्या होता है….

कहीं कुछ दरक गया लगता है,
कोई थक के लुढ़क गया लगता है.
साहिलों के करीब ही था मेरा माझी,
लेकिन तूफान फिर लिपट गया लगता है.

बदलते रास्ते हैं, फिर भी जिन्दा हैं,
टूटे अहसास हैं , फिर भी जिन्दा हैं,
आप समझो इसे या ना समझो.
हम तो आज तलक शर्मिन्दा हैं.

राह से तेरी नहीं गुजरना अब,
वक्त मेरा बदलने वाला है.
रात काली जरूर थी मेरे हमदम,
अब तो सूरज निकलने वाला है…

काकेश

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