Sep 282007
 

मैं एक महीने से भी ज्यादा सक्रिय ब्लॉगिंग से दूर रहा. उसके बाद आया तो सोचा कि हिन्दी ब्लॉगिंग के बारे में ना सोच/लिख कर केवल अपनी बात ही लिखुंगा.लेकिन कुछ बातें हैं जो दिमाग में उमड़ घुमड़ रही हैं. सोचा लिख ही डालूं.

पिछ्ले आठ नौ महीने में हिन्दी चिट्ठाजगत में कई परिवर्तन हुए हैं.मेरे विचार से इन परिवर्तनों की रफ्तार उन सभी परिवर्तनों से कहीं ज्यादा है जो हिन्दी चिट्ठाकारी में पिछ्ले तीन चार सालों से हो रहे है. आज हमारे पास नये ऎग्रीगेटर हैं, पोस्ट भी चटपट ऎग्रीगेटरों पर आ जाती हैं,किसी को गरियाना नहीं पड़ता :-) . एक हजार से ज्यादा चिट्ठाकार हैं जिनमें सक्रिय चिट्ठाकारों की संख्या भी पहले से ज्यादा हुई. आपकी पोस्ट  थोड़ी देर में ऎग्रीगेटरों के पहले पन्ने से गायब हो जाती है.चिट्ठाकार मिलन भी पिछ्ले कुछ समय से ज्यादा ही हो रहे हैं.हर कोई अपना अलग मीट पका रहा है. लेकिन एक आम चिट्ठाकार को इससे क्या फायदा हुआ? क्या उसके पाठक बढ़े हैं?क्या उसके चिट्ठे पर टिप्पणीयां बढ़ी हैं?क्या टिप्पणीयों के माध्यम से आपस में विमर्श बढ़ा है?

मैं खुद के चिट्ठे पर जितना देख रहा हूँ या दूसरों के चिट्ठों पर टिप्पणीयों की संख्या देख कर अनुमान लगा रहा हूँ..मुझे तो हिट और टिप्पणीयों की संख्या में कमी होती ही जान पड़ती है.कुछ धुरंधरों जैसे फुरसतिया जी या समीर जी को टिप्पणीयों के मामले में अपवाद मान लें और सारथी जी को हिट्स के मामले में तो कमोबेश यही कहानी है. ऎसा नहीं है कि हिन्दी में स्तरीय नहीं लिखा जा रहा लेकिन हम सब (मैं भी) पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं. हम अक्सर उन्ही चिट्ठों पर जाना पसंद करते हैं जिन्हे हम जानते हैं..भले ही केवल ब्लॉग से ही जानते हों. ऎसे में जो नये चिट्ठाकार अच्छा लिख रहे हैं क्या उनको पढना और प्रोत्साहित करना जरूरी नहीं हैं. 

मुझे लगता है कि हिन्दी चिट्ठाकारी में भी परोक्ष गुट हैं या बनते जा रहे हैं.ऎसे में सब अपने अपने गुट के चिट्ठाकारों को ही पढ़ना और वहीं टिपियाना पसंद करते हैं. चिट्ठाकारी मुद्दों और मन की भावना को उठाने का मंच नहीं,सलेक्टेड टार्गेट ऑडियंस तक अपनी बात पहुंचाने का माध्यम रह गया है. सबकी अपनी अपनी दुकान है और अपने अपने ग़्राहक. मैं यह नहीं कह रहा कि ये गलत है या सही है..लेकिन ऎसा होता जा रहा है. ऎसे में क्या हिन्दी चिट्ठाकारी सच में कुछ कर पायेगी? क्या जो लोग चिट्ठाकारी को वैब पत्रकारिता, वैकल्पिक पत्रकारिता या फिर नये मुद्दों पर विमर्श का माध्यम मानते हैं  उनके सपने पूरे हो पायेंगे.

क्या ये सही है? मैं नहीं जानता..पर जानना जरूर चाहता हूँ…आप कुछ सहायता करेंगे?

Sep 282007
 

मुन्नू को आज फिर डांट पड़ी.उसे ये डांट रोज ही पड़ती है जब भी वो क्रिकेट खेल के घर आता है.उसके पापा कहते कि उसे क्रिकेट पर ध्यान ना देकर पढ़ाई पर  ध्यान देना चाहिये. वो युवराज सिंह की तरह बनना चाहता है पर उसके पापा उसे कुछ और ही बनाना चाहते हैं. आज फिर वही हुआ यानि आने के बाद वही डांट और वही लैक्चर. उसके पापा ने समझाया बेटा यदि पढ़ोगे लिखोगे नहीं तो जिन्दगी में कुछ नहीं कर पाओगे. केवल क्रिकेट खेलने से कुछ नहीं होगा.उन्होने एक पुरानी कहावत भी बोली ” खेलोगे कूदोगे बनोगे खराब,पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नबाब“. पापा के सामने बोलने की हिम्मत मुन्नू की नहीं थी लेकिन उसे पापा की बात कुछ समझ नहीं आयी. उसके लिये ‘नबाब’ नया शब्द था तो वो समझ नहीं सका कि वो पढ़ लिख भी लेगा तो आखिर बनेगा क्या.उसने अपने दादा से पूछा कि ये ‘नबाब’ क्या होता है. दादा ने बताया कि आजकल नबाब नहीं होते. नबाब पहले के जमाने में होते थे. उसकी समझ में आ गया कि इसका मतलब आजकल कोई पढ़ता लिखता नहीं है. वो सोने चला गया. वो दुखी था. 

पापा की डांट मुन्नू के कानों में गूंज रही थी.”नबाब” शब्द भी बारबार दिमाग में आ जाता. वो उलझन में था.

“खेलोगे कूदोगे बनोगे खराब,पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नबाब”…. उसे ध्यान आया कि उसने सुना था कि वीरेन्द्र सहवाग को “नजफगढ़ का नबाब” कहा जाता है. पर दादा जी तो कह रहे थे कि नबाब आजकल नहीं होते. क्या चक्कर है?? यही सोचते सोचते उसे नींद आ गयी. 

उसे लगा कि एक बड़े स्टेडियम में पहुंच गया है.चारों ओर से दर्शक उसे देख रहे हैं.रंग बिरंगे कपड़े. बाउंड्री के किनारे तरह तरह के वाद्यों की धुन पर नाचते कुछ लड़के लड़्की.वो मैदान में है.वो क्रीज पर बैटिंग कर रहा है.दर्शक उसे उत्साहित कर रहे हैं. मुन्नू ….मुन्नू…..मुन्नू…… चारों और से आवाजें आ रही थी. “चक दे इंडिया” वाला गाना भी बज रहा था. उसके सामने दूसरे देश का बॉलर था.मुन्नू बहुत खुश हो रहा था. अगली गैंद पर उसने एक छ्क्का जड़ दिया. तालियों का शोर बढ़ता गया. इसी खुशी में उसने एक एक करके छ:ह छ्क्के मार दिये. उसने ईश्वर को धन्यवाद देने के लिये आसमान की ओर देखा. देखता क्या है कि आसमान एकदम काला है. चारों ओर काले घने बादल हैं.काले बादलों के बीच कुछ कुछ सफेद कपड़े पहने टोपी लगाये आकृतियां जैसी भी दिखायी दी. वो डरने लगा उसे लगा कि शायद वो भूत हैं तभी उसे ध्यान आया उसने ऎसे ही कपड़े पहने कुछ लोग किसी जुलूस में देखे थे. पापा से पूछने पर उन्होने बताया था कि ये हमारे देश के नेता हैं ये लोग देश चलाते हैं. उसे समझ नहीं आया कि देश चलाने वाले लोग अपना काम धाम छोड़कर  बादलों के बीच में बैठकर क्रिकेट में क्यों झांक रहे हैं. वो कुछ समझ पाता अचानक बारिश होने लगी. वो खुद को भीगने से बचाने के लिये भागना ही चाहता था कि उसे पता चला कि पानी तो बरस ही नहीं रहा बल्कि रुपये-पैसे बरस रहे हैं.उसके समझ में कुछ नहीं आ रहा था.उसने आसमान से नजरें हटा कर दर्शकों की ओर देखना चाहा. उसे लगा की दर्शकों की आंखों की जगह टी वी के कैमरे हैं. जो उसे ही देख रहे हैं.

मुन्नू बुरी तरह डर गया था. उसने भागना चाहा. उसे लगा कि उसका घर पास ही है.लेकिन उसके घर के जाने के सारे रास्ते भीड़ से भरे हुए हैं.चारों ओर एक विशाल जन समूह है और वो लोगों से घिरा हुआ है.धन-वर्षा अभी भी हो रही थी.लोग नाच रहे हैं गा रहे हैं.शोर ही शोर है. टी वी वाले है. पटाखे फूट रहे हैं. वहीं उसे वो सफेद कपड़े पहने आकृतियां भी दिखी. वो लोग भी खुश थे. मुन्नू जल्दी से जल्दी अपनी मां के पास पहुंचना चाहता था. लेकिन इतनी भीड़ से घिरा होने के कारण उसका घर पहुंचना लगभग मुश्किल था. उसे पसीना आ गया.वो रोने लगा. …तभी उसकी आंख खुल गयी. सामने माँ खड़ी थी.

उसे थोड़ा आराम मिला…पर उसके कानों में अभी भी शोर गूँज रहा था.. “चैक दे ..चैक दे.. इंडिया” ..

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: क्रिकेट, काकेश, हास्य व्यंग्य

Sep 262007
 

सारा जमाना एस.एम.एस का है. “इंडियन आइडल” में एस.एम.एस. से सात करोड़ से भी ज्यादा वोट पड़े.लोग बोल रहे हैं इंडियन सही में आइडल बैठे हैं. वेल्ले बैठे हैं ..काम धाम है नहीं इसलिये मार एस.एम.एस पर एस.एम.एस  कर रहे हैं. लेकिन इन लोगों को ये नहीं मालूम जब एस.एम.एस नहीं था तब भी हम आइडल ही बैठे थे. इसलिये इसके लिये एस.एम.एस को दोष देना ठीक नहीं है. इनको ये भी नहीं पता कि एस.एम.एस की क्या महत्ता है. इनको ये भी नहीं मालूम कि हम केवल इंडियन आइडल चुनने के लिये ही एस.एम.एस नहीं करते बल्कि वॉयस ऑफ इंडिया, लाफ्टर चैम्पियन, नच जोड़ी और भी ना जाने क्या चुनने के लिये भी एस.एम.एस करते हैं. इन्हें ये भी नहीं मालूम कि हम किसी मुद्दे पर अपने विचार प्रकट करने, लोन लेने, नयी प्रॉपर्टी खरीदने, करोड़पति बनने की संभावना तलाशने और भी ना जाने क्या क्या के लिये  भी एस.एम.एस करते हैं.कुछ दिनों में हम अपने प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को चुनने के लिये भी एस.एम.एस ही करने वाले हैं.

कुछ लोग मोबाइल फोन के घटते दामों और सब्जियों और अनाज के बढ़ते दामों पर भी चिंता जताते हैं.उन्हे शायद ये नहीं मालूम कि वैज्ञानिक एक नयी खोज में लगे हैं कि कैसे रोटी ,चावल के बदले केवल एस.एम.एस खाके काम चलाया जाय. ये सरकार की दूरदर्शिता है कि वो अभी से मोबाइल फोन के दाम कम कर रही है.ताकि जब तक वैज्ञानिक अपनी खोज में सफल हों तब तक एक मोबाइल सैट की कीमत एक टाइम के खाने की कीमत से कम हो जाये.

एस.एम.एस की भविष्य में बहुत संभावनाऎं हैं. आजकल के युवक युवतियों की विशेषकर युवकों की ये शिकायत है कि आजकल प्रेम करना और उसके बाद शादी करना बहुत खर्चीला होता जा रहा है. वो जमाना और था जब स्वयंबर रचाये जाते थे. आजके जमाने में यदि राजा जनक स्वयंबर रचाते तो ना तो सीता को अपनी काल सैंटर की जॉब से छूट्टी मिलती ना राम को अपनी एम एन सी कंपनी से. फिर कैसे होता स्वयंबर. इसलिये भविष्य में प्रेम और विवाह (हालांकि दोनों विपरीत चीज है लेकिन जैसे सुख-दुख , जन्म-मृत्यु , लाभ-हानि ,जय-पराजय एक साथ आते हैं वैसे प्रेम-विवाह भी एक साथ ही रखने का प्रचलन है) भी एस.एम.एस के जरिये ही होंगे.आप अपने एस.एम.एस जोक,शायरी,कविता और गुड मॉर्निंग,गुड नाइट वाले मैसेज अपने दोस्तों को फॉरवर्ड करते भेजते रहिये यदि किसी सुन्दरी को पसंद आ गया तो वो भी बदले में आपको मैसेज भेज देगी.फिर इसी तरह संदेशो का आदान-प्रदान करें जब आपको लगे कि जो मैसेज आप फॉरवर्ड करने की सोच रहे थे वो अगली ने पहले ही आपको फॉरवर्ड कर दिया तो समझ लीजिये कि आप दोनों के विचार कितने मिलते है और बस आइ लव यू वाला मैसेज भेज डालिये.तो लो जी हो गया प्यार.अपना प्रेम जारी रखें और फिर इसी तरह के लाखों प्रेम संदेशों के आदान प्रदान के बाद जब आपको लगे कि कि …जी बहुत हो गया प्रेम अब शादी कर लेनी चाहिये तो डॉंट वरी …डेट डिसाइड कीजिये और भेज दीजिये अपने सारे दोस्तों को एस.एम.एस.पंडित जी को भी एस.एम.एस कर दें. जिस दिन आपकी शादी हो उस दिन पंडित जी एस.एम.एस कर मंत्र भेजते रहेंगे और जब वो बोलें आप अपने मोबाइल के चारों और चक्कर लगा कर सात फेरे लगा लें और पंडित जी को एस.एम.एस करें. वो आपको फायनल मंत्र एस.एम.एस कर देंगे और हो गयी आपकी शादी.आपके सारे दोस्त और परिवार वाले अपनी शुभकामनाऎं और आशीर्वाद आपको एस.एम.एस के जरिये भेज देंगे.बाद में अपने फेरों का (हनीमून का नहीं) एम.एम.एस. बना के अपने सारे दोस्तों और परिवार वालों को एस.एम.एस कर दें. तो हो गयी ना सस्ते में शादी.

सबसे ज्यादा सरप्राइज तो आपको तब होगा जब आपका हनीमून आपकी मोबाइल कंपनी द्वारा स्पॉंसर्ड होगा. हनीमून के लिये वो आपको झुमरी तलैया भेजेंगे या स्विटजरलैंड वो इस बात पर निर्भर करेगा कि आप लोगों ने कितना प्रेम किया था. यानि कितने एस.एम.एस भेजे थे अपने प्रेम-पीरियड के दौरान. जितने ज्यादा एस.एम.एस भेजे होंगे उतने ज्यादा ब्राइट चांस होंगे आपके स्विटजरलैंड जाने के.तो ज्यादा से ज्यादा एस.एम.एस भेजें और हनीमून के लिये जायें स्विटजरलैंड.

(अभी मैने टिप्पणी एस.एम.एस से लेने का प्रावधान नहीं किया है इसलिये एस.एम.एस ना भेज के टिप्पणी कर दें. )

Sep 252007
 

पिछले दिनों नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर जाना हुआ.टिकट काउंटर के पास ही एक विश्रामालय है. उसके पास खड़े रह कर प्रतीक्षा कर रहा था कि सामने एक बोर्ड लगा हुआ देखा. पहले हिन्दी में पढ़ा फिर सोचा शायद मैं गलत समझ रहा हूँ.फिर अंग्रेजी में पढ़ा. मतलब तो वही निकलता था हिन्दी वाला :-)

क्या मैं सही समझ रहा हूँ कि रेलवे एक्ट के हिसाब से रेल यात्री टैक्सी या ऑटो के लिये मोलभाव नहीं कर सकते यानि वो जिस भी भाव में ले जायेगा जाना पड़ेगा या फिर आप दंड के भागी होंगे.आप भी देखिये. ज्ञान जी इस पर थोड़ा प्रकाश डालें तो बेहतर है.

railway_notice

Sep 252007
 

देश चकाचक प्रगति कर रहा है.सैंसैक्स नयी ऊंचाइयां छू रहा है.पहले लखपति बहुत बड़े माने जाते थे अब करोड़पति की भी कोई औकात नहीं है.चारों और प्रगतिमय माहौल है.जितने पैसे पहले पांच दिन के मैच को जीतने पर भी नहीं मिलते थे उससे ज्यादा बीस ओवर के मैच को जीतने के मिल रहे हैं.जितने पैसे में पूरे महीने के राशन आता था उतने में एक बार का खाना आ रहा है. जो साइकिल चलाता था वो मारुति 800 चला रहा है. जो आवारा था वो मंत्री है. जो भैस दूहता था वो भी मंत्री है. जो गुंडा था…जेल में था वो अभी संसद में है. प्रगति ही प्रगति.मैं किसी अर्थशास्त्री से पूछ रहा हूँ कि क्या कारण है इतनी प्रगति हो रही है. वो मुझे समझा रहा है कि ऎसा इसलिये है कि भारत का लेबर बहुत सस्ता है और भारत का बाजार बहुत बड़ा है.मैं समझने का प्रयास कर रहा हूँ.

भारत का लेबर बहुत सस्ता है यानि आपको कुछ भी काम करने के लिये सस्ते में आदमी मिल जाते हैं.आप गैरकानूनी काम करना चाहें आप पुलिस को खरीद सकते हैं.सरकार से कुछ करवाना है सरकार के बाबू को खरीद सकते हैं.सरकार बनानी है दलबदलू नेता को खरीद सकते हैं.मंत्री को खरीद सकते हैं.लेबर बहुत सस्ता है जी.लेकिन भारत में कुछ भी काम करने के लिये लोग तो हमेशा से मिलते रहे हैं. भगवान राम  ने भी रावण के साथ लड़ाई में सस्ते लेबर का प्रयोग किया.लड़ाई करने के लिये कितने सारे बंदर मिल गये.ये और बात है कि देश में लड़ने के लिये बंदरों की कमी कभी भी नहीं रही.जब जरूरत हो जुटा लो.पिछ्ले दिनों खबर थी कि ‘संसद में बंदरों का आतंक’.खैर ..राम की सेना में दो बहुत बड़े सिविल इंजीनियर थे ..नल और नील.उन्होने समुद्र पर पुल बना दिया. उस समय लेबर बहुत सस्ता रहा होगा क्योंकि पुल टाइमली बन गया. आज के जमाने में कुछ भी टाइमली नहीं बनता. जितनी देर में राम ने पुल बनवा दिया आज उतनी देर में तो टैंडर भी नहीं निकलते.खैर हम बात कर रहे थे सस्ते लेबर की. ऎसा ही सस्ता लेबर विश्वकर्मा के पास भी रहा होगा जिन्होने ना जाने कितने नये महल और शहर बना डाले.तब भी लेबर सस्ता था लेकिन तब का लेबर उतना जागरूक नहीं था जितना आज का है. उसे मालूम नहीं था कि अपनी तनख्वाह में एक कुर्सी मेज भी ना आ पाये तो कैसे इम्पोर्टेड फर्नीचर का जुगाड़ करें. राशन खरीदने के पैसे ना होने पर व्हिस्की की विद चिकन व्य्वस्था कैसे करें. बच्चों के फीस के पैसे ना होने के बाबजूद डोनेशन कैसे दें.लेबर के सस्ते होने के साथ जुगाड़ी होना भी देश की प्रगति के लिये अच्छा है. 

debt_cartoon_lgभारत का बाजार बहुत बड़ा है. यहाँ सबकुछ बिकता है सबकुछ मिलता है. आत्मा बिकती है,परमात्मा बिकता है, ईमान बिकता है,इंसान बिकता है,रिश्ते बिकते हैं,इज्जत बिकती है, नेता बिकता है,अभिनेता बिकता है,दूल्हा बिकता है,दूल्हन बिकती है, मामला बड़ा बिकाऊ किसम का है.आप कहेंगे कि ये कुछ उपदेश टाइप हो गया.तो आपको बता दूँ कि बड़े बाजार का यही तो फायदा है..आप मिनरल वाटर बेच सकते हैं दूध के भावों में.पचास ग्राम आलू का चिप्स बेच सकते हैं एक किलो चीनी के भाव में. एक बर्गर बेच सकते हैं दो बार के खाने के भावों में. बजार है… तो सब है.बजार है ..तो तरक्की है.बजार है …तो विकास है. 

मुझे देश की प्रगति का फंडा समझ में आ रहा है.आपको भी आ रहा है ना !!

Sep 242007
 

समीर भाई ने लिखा

” अगर मैं कहूँ कि ९८ प्रतिशत भारत की आबादी को, जिसमें मैं भी शामिल हूँ, को न तो धन्यवाद देना आता है और न ही स्वीकारना आता है और न ही किसी का अभिनन्दन या प्रशंसा करना या फिर अपना अभिनन्दन या प्रशंसा स्वीकार करना, तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी. “ 

उनका कहना ठीक तो लगता है.लेकिन ये सोचनीय है कि ऎसा आखिर है क्यों और फिर भारत में ही क्यों? हालाँकि उन्होने धन्यवाद देने को टिप्पणीयों से जोड़ा जिससे मैं सहमत नहीं क्योकि ऎसा होता तो अंग्रेजी चिट्ठों में, जिसे तथाकथित वो लोग पढते हैं जो धन्यवाद संस्कृति में विश्वास करते हैं तो उनमें टिप्पणीयां ज्यादा होतीं. लेकिन सच तो यह हैं कि अंग्रेजी चिट्ठों मे हिट्स के मुकाबले टिप्पणीयां बहुत कम होती हैं. यानि हिट्स और टिप्पणीयों का अनुपात हिन्दी चिट्ठों में अंग्रेजी चिट्ठों के मुकाबले कहीं ज्यादा है.

अब आते हैं मूल प्रश्न पर क्यों आम भारतीय धन्यवाद देने या स्वीकारने में हिचकते हैं.मेरा मानना है कि हर देश और समाज के अपने अपने संस्कार होते हैं.भारत के मूल संस्कार भी आत्मसात के हैं ना कि प्रदर्शन के. किसी फिल्म में सुना था ‘इन फ्रैडशिप ..नो सॉरी ..नो थैंक्यू “. मुझे यह सही लगता है. जब हम किसी के अच्छे काम के लिये धन्यवाद या थैंक्यू बोल देते हैं तब हम उसके अच्छे कार्य का मोल चुकता सा कर देते हैं.आपने हमारे लिये ये किया हमने धन्यवाद बोल दिया. हिसाब बराबर. यदि हम धन्यवाद ना देकर उसे आत्मसात कर लें कि आपने हमारे लिये यह अच्छा किया हम भी मौका पड़ने पर आपके लिये अच्छा करेंगे तो आप उस संबंध को और मजबूत करते हैं.यहाँ हम प्रकट में भले ही धन्यवाद ना कहें लेकिन दिल में आभार का भाव जरूर रखते हैं. ठीक यही बात सॉरी के लिये भी लागू होती है.आपने कुछ गलत किया (जानबूझ कर या अनजाने में) और सॉरी बोल दिया. हो गया हिसाब बराबर.जब आप गलत काम कर सॉरी बोल देते हैं तो आप अपनी गलती पर विचार नहीं करते और फिर से उसी तरह की गलती करने के लिये खुद को स्वतंत्र पाते हैं. इसके बजाय यदि आप अपनी गलती पर विचारें और मन ही मन लज्जा का अनुभव करें तो बहुत संभव है कि आप उस गलती को दोहरायेंगे नहीं. 

जैसे हमारी पुरानी पीढियों में प्रदर्शन का उतना चलन नहीं था. तब पति पत्नी भी शायद जीवन भर एक दूसरे को “आइ लव यू” ना बोलते हों. लेकिन तब का प्रेम सही मायनों मे प्रेम था. जैसे जिम और डेला का प्रेम. जहां प्रेम आपकी जुबान पर नहीं होता वरन आपके एक्शन में,आपकी सोच में, आपके दिल में होता है. आज की पीढ़ी के लोग दिन में ना जाने कितनी बार आप “आइ लव यू” बोलते होंगे लेकिन फिर भी प्रेम की कमी है.किसी ने कहा भी है “सच्चा प्रेम वह है जब आप एक दूसरे को ये भी ना बता सकें कि आप एक दूसरे को कितबा प्रेम करते हैं “. प्रेम बताने का नहीं अनुभव करने की चीज है.पश्चिम में जहां लोग ना जाने कितने बार और कितने तरीको से “आइ लव यू” बोलते हैं फिर भी वहाँ का प्रेम कुछ कम ही लगता है.ये वहाँ होने वाले तलाकों से जाहिर होता है. इसीलिये शायद उन्हे वैलंटाइंस डे, फादर्स डे और मदर्स डे मनाने की जरूरत है. वो थैंक्स गिविंग डे भी मनाते है जहां वो ऑपचारिक रूप से लोगों को कार्ड्स वगैरह भेज के धन्यवाद ज्ञापित करते हैं.भारत में यह सब नहीं मनाये जाते…शायद इन चीजों की आवश्यकता ही नहीं है हमें.  

प्रश्न उठता है.क्या सदैव धन्यवाद या “आइ लव यू” कहने वाले पश्चिम के लोग भी आपस में उतना ही प्रेम करते हैं जितना भारत के धन्यवाद या “आइ लव यू” ना कहने वाले लोग?क्या वहाँ भी रिश्तों की गरमाहट उतनी ही है जितनी भारत में ? क्या धन्यवाद कहने वाले वो लोग एक दूसरे के प्रति उतने ही संवेदनशील है जितने भारत के लोग? दोनों समाजों के अध्ययन से ये बात साफ हो सकती है. लेकिन मेरा मानना है मुँह मे दिखावटी धन्यवाद की बजाय दिल मे धन्यवाद होना ज्यादा जरूरी है. हाँ दिल के साथ साथ ये मुँह पर भी आ जाये तो अच्छा है.लेकिन हम तो यही कहेंगे. “नो सॉरी ..नो थैक्यू ”

[मेरा यह मत चिट्ठों में टिप्पणी को लेकर नहीं है क्योकि में टिप्पणी को धन्यवाद का पर्याय नहीं मानता]

समीर जी के चिट्ठे पर राजीव जी की टिप्पणी भी विचारणीय है.

कहीँ पर मुझे विरोध लगता है

अमरीकी / भारतीय शिष्टाचार की तुलना बहुत जायज़ नहीं। भिन्न संस्कृति, भिन्न परिस्थितियाँ (सामाजिक, आर्थिक, ऐतिहासिक) तो उस पर यह तुलना और मापदण्ड भी उन्हीं के – फिर भी कम से कम सिद्धांत रूप में, कहीँ हम आगे तो कहीँ वे। हम किन्हीँ कार्यों में कर्तव्य और अधिकार समझते और देते भी हैं – वे किन्हीँ और कार्यों में । हम आज के आधा तीतर आधा बटेर भारतीय+पाश्चात्य समाज में ज़रूर दोहरी मानसिकता अपनाते हैं, तो गड़बड़ होती है, कौन से मानक लगायें? याद करें पिछले वर्ष 2006 जुन-जुलाई का रीडर्स डाइजेस्ट का शिष्टाचार सम्बन्धी सर्वेक्षण और उसमें प्रयोग किये गये बेतुके और पाश्चात्य मानक! जिनमें मुंबई को निम्न दर्ज़े का माना गया.

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: बहस, धन्यवाद संस्कृति, काकेश, मेरी बात

Sep 242007
 

वो आजकल परेशान थे.वो आजकल बेरोजगार थे.वो रह रह कर देश के बारे में सोचने लगते. देश के बारे में सोचने से उन्हे अच्छा लगता. उनका खुद का दु:ख कुछ कम हो जाता. पनवाड़ी की दुकान पर सिगरेट के कश लगाते लगाते वो सामने से गुजरते यातायात को देख रहे थे.स्कूल बसों में जाते हुए बच्चे,डी.टी.सी. बसों में ऑफिसकर्मी,ऑटो के इंतजार में खड़ी कुछ महिला ऑफिसकर्मी,बस को पकड़ने के लिये पीछे पीछे भागते कुछ लोग. उनकी आंखों के सामने ही सब कुछ हो रहा था लेकिन उनका दिल कहीं और था. वो नेताओं की तरह सब कुछ देख के भी उसे देख नहीं पा रहे थे.

सिगरेट का आखरी कश लगाकर उसके फिल्टर को अपनी पैरों तले उन्होने ऎसे कुचला जैसे वो ही उनकी सारी समस्याओं की जड़ हो.जर्दे के पान को मुँह में डालते हुए बोले ‘ये देश रसातल में जा रहा है.कानून व्यवस्था पूरी तरह ठप हो गयी है.देश आतंक की छाया में पल रहा है.आतंकवादी हमारे घर तक घुस आये हैं.कुछ करना होगा.शीघ्र ही कुछ करना होगा.” उनके चेहरा तना हुआ था.मुट्ठियां भिच गयी थी.लगा जैसे पान के साथ साथ पूरे देश को भी चबा जायेंगे.पान वाले को उनका वाक्य कुछ समझ आया कुछ नहीं.लेकिन इतना जरूर समझ में आया कि इस महीना भी वो उधार में ही पान खायेंगे. जब भी वो देश और समाज की चिता करते हुए इस तरह के डायलॉग बोलते पनवाड़ी समझ जाता कि आजकल धंधा कुछ मंदा चल रहा है.

बात को आगे बढाने के लिये पान वाला बोला.तो बाबू साहब सरकार कुछ क्यों नहीं करती?

क्या करेगी सरकार?? ये सरकार निकम्मी है.

वो तो सारी ही होती हैं.इसमें नयी बात क्या है. पान वाला सहजता से बोला.

नहीं ये सरकार विशेष रूप से निकम्मी है. कहीं कुछ नहीं होता.पिछ्ले दिनों लग रहा था कि मध्यावधि चुनाव हो जायेंगे पर उसका भी अभी कोई स्कोप नहीं दिखता.ये लैफ्ट वाले अन्दर ही अन्दर सरकार से मिले हैं.केवल धमकी देते हैं कुछ करते नहीं.भाजपा वाले भी सरकार के साथ ही मिल गये हैं.सब मिल बांट के खा रहे हैं.किसी को देश की चिता नहीं है.

आप किस पार्टी के साथ हैं.पान वाले ने जिज्ञासा व्यक्त की.

अरे हम किसी पार्टी के साथ नहीं है.हम तो मुद्दों पर बोलते हैं.देश के बारे में सोचते हैं.कोई मुद्दा ही नहीं है आजकल. सब लोग शांत बैठे हैं.सब जगह स्टेटस को है.

लेकिन शांति होना तो अच्छी बात है ना.देश में शांति है.देश विकास कर रहा है.

अरे ऎसी शांति से क्या फायदा. क्या होगा इस शांति से. ना कोई जुलूस,ना भाषण बाजी.ना कोई रैली, ना कोई लाठी चार्ज. ना अफवाहें, ना कर्फ्यू.ना आगजनी, ना लूटपाट. ना हडताल, ना मारपीट. ना तालाबंदी, ना घेराव.ना सीलिंग, ना चीटिंग.ना चंदा, ना धंधा अरे इन सब के बिना देश तरक्की नहीं कर सकता.

वो सही बोल रहे थे. देश शांत था.इसलिये वे बेरोजगार थे. उनकी क्षमताओं का उपयोग नहीं हो पा रहा था.देश प्रगति करता तो वो भाषण देते.किसी जुलूस का नेतृत्व करते.कुछ सरकारी बसों मे आग लगाते. कुछ दुकानें लूट कर घर का सामान ले आते. उनके घर का टी वी और फ्रिज पुराना हो गया था. इस बार जाड़ों से पहले वो गीजर भी घर ले आने की तमन्ना रखते थे.उनकी इन्ही क्षमताओं की वजह से ही उनको रॉयल चैलेंज व्हिस्की और दू जून का चिकन नसीब हो जाता.     

वो पनवाड़ी को देश की तरक्की से अवगत करा ही रहे थे,कि उनके एक साथी ने आके उनके कान में कुछ कहा. उनके चेहरे पर मुस्कान तैर गयी.

मैं कहता था ना कि भाजपा वाले जरूर कुछ करेंगे.

क्यों क्या हुआ.

अरे हमारी आस्था का प्रश्न है.राम हमारे आराध्य हैं.हमारी आस्था का केन्द्र हैं.आस्था का कोई प्रमाण नहीं होता. हम राम सेतू बचा कर रहेंगें.

उनकी आवाज उंची होती चली गयी. उनके चारों ओर भीड़ बढ़ने लगी.

पानवाला भी खुश था.उसे तसल्ली हुई कि वो जल्दी ही अपना बकाया चुकता कर देंगे. उन्हे रोजगार मिल चुका था.

,हिन्दी

Sep 222007
 

[इससे पहले भी हरिशंकर परसाई जी की कृतियां आपके सामने ला चुका हूँ. आज पेश है एक और व्यंग्य लेख

पूर्व लेख : पवित्रता का दौरा:हरिशंकर परसाई

क्रांतिकारी की कथा : हरिशंकर परसाई]

निंदा में विटामिन और प्रोटीन होते हैं. निंदा खून साफ करती है, पाचन-क्रिया ठीक करती है, बल और स्फूर्ति देती है. निंदा से मांसपेशियां पुष्ट होती हैं. निंदा पायरिया का तो शर्तिया इलाज है. संतों को परनिंदा की मनाही होती है, इसलिए वे स्वनिंदा करके स्वास्थ्य अच्छा रखते हैं. ‘मौसम कौन कुटिल खल कामी’- यह संत की विनय और आत्मग्लानि नहीं है, टॉनिक है. संत बड़ा कांइया होता है. हम समझते हैं, वह आत्मस्वीकृति कर रहा है, पर वास्तव में वह विटामिन और प्रोटीन खा रहा है. स्वास्थ्य विज्ञान की एक मूल स्थापना तो मैंने कर दी. अब डॉक्टरों का कुल इतना काम बचा कि वे शोध करें कि किस तरह की निंदा में कौन से और कितने विटामिन होते हैं, कितना प्रोटीन होता है. मेरा अंदाज है, स्त्री संबंधी निंदा में प्रोटीन बड़ी मात्रा में होता है और शराब संबंधी निंदा में विटामिन बहुत होते हैं. मेरे सामने जो स्वस्थ सज्जन बैठे थे, वे कह रहे थे- आपको मालूम है, वह आदमी शराब पीता है?

मैंने ध्यान नहीं दिया. उन्होंने फिर कहा- वह शराब पीता है. निंदा में अगर उत्साह न दिखाओ तो करने वालों को जूता-सा लगता है. वे तीन बार बात कह चुके और मैं चुप रहा, तीन जूते उन्हें लग गए. अब मुझे दया आ गई. उनका चेहरा उतर गया था. मैंने कहा- पीने दो. वे चकित हुए. बोले- पीने दो, आप कहते हैं पीने दो?

मैंने कहा- हां, हम लोग न उसके बाप हैं, न शुभचिंतक. उसके पीने से अपना कोई नुकसान भी नहीं है. उन्हें संतोष नहीं हुआ. वे उस बात को फिर-फिर रेतते रहे. तब मैंने लगातार उनसे कुछ सवाल कर डाले- आप चावल ज्यादा खाते हैं या रोटी? किस करवट सोते हैं? जूते में पहले दाहिना पांव डालते हैं या बायां? स्त्री के साथ रोज संभोग करते हैं या कुछ अंतर देकर?

अब वे ‘हीं-हीं’ पर उतर आए. कहने लगे- ये तो प्राईवेट बातें हैं, इनसे क्या मतलब. मैंने कहा- वह क्या खाता-पीता है, यह उसकी प्राईवेट बात है. मगर इससे आपको जरूर मतलब है. किसी दिन आप उसके रसोईघर में घुसकर पता लगा लेंगे कि कौन-सी दाल बनी है और सड़क पर खड़े होकर चिल्लाएंगे- वह बड़ा दुराचारी है. वह उड़द की दाल खाता है. तनाव आ गया. मैं पोलाइट हो गया- छोड़ो यार, इस बात को. वेद में सोमरस की स्तुति में 60-62 मंत्र हैं. सोमरस को पिता और ईश्वर तक कहा गया है. कहते हैं- तुमने मुझे अमर बना दिया. यहां तक कहा है कि अब मैं पृथ्वी को अपनी हथेलियों में लेकर मसल सकता हूं.(ऋषि को ज्यादा चढ़ गई होगी.) चेतन को दबाकर राहत पाने या चेतना का विस्तार करने के लिए सब जातियों के ऋषि किसी मादक द्रव्य का उपयोग करते थे.

चेतना का विस्तार. हां, कई की चेतना का विस्तार देख चुका हूं. एक संपन्न सज्जन की चेतना का इतना विस्तार हो जाता है कि वे रिक्शेवाले को रास्ते में पान खिलाते हैं, सिगरेट पिलाते हैं, और फिर दुगने पैसे देते हैं. पीने के बाद वे ‘प्रोलेतारियत’ हो जाते हैं. कभी-कभी रिक्शेवाले को बिठाकर खुद रिक्शा चलाने लगते हैं. वे यों भी भले आदमी हैं. पर कुछ मैंने ऐसे देखे हैं, जो होश में मानवीय हो ही नहीं सकते. मानवीयता उन पर रम के ‘किक’ की तरह चढ़ती-उतरती है. इन्हें मानवीयता के ‘फिट’ आते हैं- मिरगी की तरह. सुना है मिरगी जूता सुंघाने से उतर जाती है. इसका उल्टा भी होता है. किसी-किसी को जूता सुंघाने से मानवीयता का फिट भी आ जाता है. यह नुस्खा भी आजमाया हुआ है. एक और चेतना का विस्तार मैंने देखा था. एक शाम रामविलास शर्मा के घर हम लोग बैठे थे(आगरा वाले रामविलास शर्मा नहीं. वे तो दुग्धपान करते हैं और प्रात: समय की वायु को ‘सेवन करता सुजान’ होते हैं). यह रोडवेज के अपने कवि रामविलास शर्मा हैं. उनके एक सहयोगी की चेतना का विस्तार कुल डेढ़ पेग में हो गया और वे अंग्रेजी बोलने लगे. कबीर ने कहा है- ‘मन मस्त हुआ तब क्यों बोले’. यह क्यों नहीं कहा कि मन मस्त हुआ तब अंग्रेजी बोले. नीचे होटल से खाना उन्हीं को खाना था. हमने कहा- अब इन्हें मत भेजो. ये अंग्रेजी बोलने लगे. पर उनकी चेतना का विस्तार जरा ज्यादा ही हो गया था. कहने कहने लगे- नो सर, नो सर, आई शैल ब्रिंग ब्यूटीफुल मुर्गा. ‘अंग्रेजी’ भाषा का कमाल देखिए. थोड़ी ही पढ़ी है, मगर खाने की चीज को खूबसूरत कह रहे हैं. जो भी खूबसूरत दिखा, उसे खा गए. यह भाषा रूप में भी स्वाद देखती है. रूप देखकर उल्लास नहीं होता, जीभ में पानी आने लगता है. ऐसी भाषा साम्राज्यवाद के बड़े काम की होती है. कहा- इंडिया इज ए ब्यूटीफुल कंट्री. और छुरी-कांटे से इंडिया को खाने लगे. जब आधा खा चुके, तब देशी खाने वालों ने कहा, अगर इंडिया इतना खूबसूरत है, तो बाकी हमें खा लेने दो. तुमने ‘इंडिया’ खा लिया. बाकी बचा ‘भारत’ हमें खाने दो. अंग्रेज ने कहा- अच्छा, हमें दस्त लगने लगे हैं. हम तो जाते हैं. तुम खाते रहना. यह बातचीत 1947 में हुई थी. हम लोगों ने कहा- अहिंसक क्रांति हो गई. बाहर वालों ने कहा- यह ट्रांसफर ऑफ पॉवर है- सत्ता का हस्तांतरण. मगर सच पूछो तो यह ‘ट्रांसफर ऑफ डिश’ हुआ- थाली उनके सामने से इनके सामने आ गई. वे देश को पश्चिमी सभ्यता के सलाद के साथ खाते थे. ये जनतंत्र के अचार के साथ खाते हैं.

फिर राजनीति आ गई. छोडि़ए. बात शराब की हो रही थी. इस संबंध में जो शिक्षाप्रद बातें ऊपर कहीं हैं, उन पर कोई अमल करेगा, तो अपनी ‘रिस्क’ पर. नुकसान की जिम्मेदारी कंपनी की नहीं होगी. मगर बात शराब की भी नहीं, उस पवित्र आदमी की हो रही थी, जो मेरे सामने बैठा किसी के दुराचार पर चिंतित था. मैं चिंतित नहीं था, इसलिए वह नाराज और दुखी था. मुझे शामिल किए बिना वह मानेगा नहीं. वह शराब से स्त्री पर आ गया- और वह जो है न, अमुक स्त्री से उसके अनैतिक संबंध हैं.

मैंने कहा- हां, यह बड़ी खराब बात है.

उसका चेहरा अब खिल गया. बोला- है न?

मैंने कहा- हां खराब बात यह है कि उस स्त्री से अपना संबंध नहीं है.

वह मुझसे बिल्कुल निराश हो गया. सोचता होगा, कैसा पत्थर आदमी है यह कि इतने ऊंचे दर्जे के ‘स्कैंडल’ में भी दिलचस्पी नहीं ले रहा. वह उठ गया. और मैं सोचता रहा कि लोग समझते हैं कि हम खिड़की हवा और रोशनी के लिए बनवाते हैं, मगर वास्तव में खिड़की अंदर झांकने के लिए होती है. कितने लोग हैं जो ‘चरित्रहीन’ होने की इच्छा मन में पाले रहते हैं, मगर हो नहीं सकते और निरे ‘चरित्रवान’ होकर मर जाते हैं. आत्मा को परलोक में भी चैन नहीं मिलता होगा और वह पृथ्वी पर लोगों के घरों में झांककर देखती होगी कि किसका संबंध किससे चल रहा है. किसी स्त्री और पुरुष के संबंध में जो बात अखरती है, वह अनैतिकता नहीं है, बल्कि यह है कि हाय उसकी जगह हम नहीं हुए. ऐसे लोग मुझे चुंगी के दरोगा मालूम होते हैं. हर आते-जाते ठेले को रोककर झांककर पूछते हैं- तेरे भीतर क्या छिपा है?

एक स्त्री के पिता के पास हितकारी लोग जाकर सलाह देते हैं- उस आदमी को घर में मत आने दिया करिए. वह चरित्रहीन है. वे बेचारे वास्तव में शिकायत करते हैं कि पिताजी, आपकी बेटी हमें ‘चरित्रहीन’ होने का चांस नहीं दे रही है. उसे डांटिए न कि हमें भी थोड़ा चरित्रहीन हो लेने दे. जिस आदमी की स्त्री-संबंधी कलंक कथा वह कह रहा था, वह भला आदमी है- ईमानदार, सच्चा, दयालु, त्यागी. वह धोखा नहीं करता, कालाबाजारी नहीं करता, किसी को ठगता नहीं है, घूस नहीं खाता, किसी का बुरा नहीं करता. एक स्त्री से उसकी मित्रता है. इससे वह आदमी बुरा और अनैतिक हो गया. बड़ा सरल हिसाब है अपने यहां आदमी के बारे में निर्णय लेने का. कभी सवाल उठा होगा समाज के नीतिवानों के बीच के नैतिक-अनैतिक, अच्छे-बुरे आदमी का निर्णय कैसे किया जाए. वे परेशान होंगे. बहुत सी बातों पर आदमी के बारे में विचार करना पड़ता है, तब निर्णय होता है. तब उन्होंने कहा होगा- ज्यादा झंझट में मत पड़ो. मामला सरल कर लो. सारी नैतिकता को समेटकर टांगों के बीच में रख लो.

Sep 202007
 

हमारे पड़ोस के झा जी सरकारी कर्मचारी हैं. कल ट्रैफिक जाम को झेलते,कोसते घर पहुंचे ही थे कि उनकी धर्मपत्नी जी आ के खड़ी हो गयी और पूछ्ने लगी. आप कितना घूस लेते है जी? इस हमले के लिये वो तैयार ना थे.उन्होने थूक को निगलते हुए,स्थिति को संभालते हुए हिम्मत कर पूछा. लेकिन तुम क्यों पूछ रही हो? तो पत्नी ने बताया कि मिसेज चावला पूछ रही थी कि तुम्हारे पति कितना घूस खाते हैं.इससे पहले कि वो कुछ बोलते और अपनी घूस ना खा पाने की नग्नता को ईमानदारी की चादर से ढंकने की कोशिश करते वो बोल पड़ीं. देखिये आप खूब घूस खाइये क्योंकि हमे अगले महीने स्विटजरलैंड जाना है.पता है मिसेज चावला पिछ्ले हफ्ते ही स्विटजरलैंड घूम कर आयी है.उनकी ये पूरी ट्रिप उनके विभाग के एक कॉंट्रेक्टर द्वारा स्पॉंसर थी. झा जी को अल्टीमेटम दे दिया गया. अब झा जी परेशान है. अपनी ये परेशानी उन्होने हमें भी बता डाली.   

हमने उनसे कहा तो इसमें क्या है घूस लेना शुरु कर दीजिये. झा जी थोड़ा ज्यादा सैंसिबल नहीं थे.पुराने विचारों के आदमी थे और डरपोक टाइप थे.जो सरकारी कर्मचारी घूस नहीं लेता वो पुराने विचारों का ही होगा ना.मॉडर्न जमाने के लोग तो इस संकट में पड़ते ही नहीं हैं. हमने उन्हें उपदेश देना शुरु किया. 

Bribe देखिये झा जी, डरने से कुछ नहीं होता.घूस खाना भ्रष्टाचार का नहीं शिष्टाचार का लक्षण है.जरा सोचिये यदि घूस ना होती तो क्या होता.फाइलें पड़ी रहती.उनको आगे खिसकाने वाला कोई नहीं होता.तो कैसे होते आपके,हमारे इतने सारे काम? घूस है तो दुनिया चल रही है. आप ये ना समझे केवल सरकारी कर्मचारी ही घूस लेते हैं.ये प्रथा तो सदियों पुरानी है. क्या आपने कभी भगवान को घूस नहीं दी.आप जब अपनी मन्नत पूरी करने के लिये भगवान को प्रसाद चढ़ाते हैं या कोई और चीज करते हैं तो भी घूस ही है ना. और सरकार खुद भी घूस लेती है.सरकार फ्लाईओवर बनाती है.पहले उसे बनाने के लिये टैक्स लेती है और फिर बनाने के बाद टॉल टैक्स.स्कूल वाले पढ़ाने के लिये फीस तो लेते ही हैं लेकिन साथ में डोनेसन भी लेते हैं. रेलवे टिकट के पैसे तो लेती है.टिकट को तत्काल करवाने के लिये पैसे भी लेती.पहले केवल सरकारी कर्मचारी ही घूस लेते थे अब सरकार भी लेती है. गाजियाबाद में भी म्युनिसपालिटी पन्द्रह परसैट लेती है.

घूस खाना स्टेटस सिंबल है.यदि आप घूस नहीं खाते तो आप पिछ्ड़े हैं ऎसे पिछ्ड़े कि आपको आरक्षण भी नहीं मिल सकता. देखिये आपके विभाग में पहले भी लोग घूस ले रहे थे अब भी ले रहे हैं और आगे भी लेते रहेंगे. आपके लेने या ना लेने से कोई फरक नहीं पड़ता.आप नहीं लेंगे तो आपका हिस्सा कोई और लेगा. आप घूस नही लेंगे तो आप पर कोई विश्वास नहीं करेगा.सब सोचेंगे जो आदमी घूस नहीं लेता वो काम क्या करेगा.घूस आपकी पुरानी किताब पर लगा हुआ नया कवर है. घूस सार्वभौमिक सत्य है. घूस वर्तमान है.घूस उज्जवल भविष्य है. घूस आश्वाशन है. घूस भ्रष्टाचार की लहलहाती फसल को पोषने वाली खाद है. घूस लेना आपका कर्तव्य है.घूस लेना आपका अधिकार है. घूस देना आपकी मजबूरी. यदि आप घूस दे सकते हैं तो घूस ले क्यों नहीं सकते.

मेरे उपदेशों का झा जी पर कुछ असर सा हुआ. लेकिन यदि कभी पकड़े गये तो?उन्होने पूछा. देखिये झा जी अव्वल तो घूस लेने वाले यदि अपने ऊपर वालों को खुश रखें तो पकड़े ही नहीं जाते और यदि पकड़े भी गयी तो घूस तो है ही ना. घूस दे के तुरंत छूट भी जाते हैं. 

मेरी बातें अब उन्हें पूरी तरह समझ में आ गयी थी.उनके चेहरे पर दृढ़ता थी. उन्होने मुझे धन्यवाद किया और बिना कुछ बोले चल दिये.

सुना है अगले महीने झा जी गोवा जा रहे हैं. कल मिसेज झा ने क्लब में गाना भी गाया ” घूस खायें सैंया हमारे”.

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: हास्य व्यंग्य, काकेश

Sep 192007
 

चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

सबको लिंकित करने वाली नीलिमा जी,हम को न लिंकित करने की चूक कर, बता रही हैं कि हिन्दी ब्लॉगिंग में  विमर्श की नयी परंपराऎं बन रही हैं. अब कोई शोधार्थी यह कहे तो अपन की क्या विसात कि उससे सहमत ना हो. इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए हमने सोचा कि इस विमर्श के नये मंच पर हम भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा दें वरना क्या पता हमारा नाम इतिहास में आते आते रह जाये.[ बात दरअसल यह है कि पिछ्ली पोस्ट में हमने गणेश जी को एक ऎप्लीकेशन भेजा था जो अभी तक अप्रूव नही हुआ तो सोचा क्यों ना नयी पोस्ट लिख डालें ]

वैरागी जी ने प्रश्न उठाया कि हमारी युवा पीढ़ी की ‘कैरीयरिस्‍ट’ सोच के कारण हम मानवीय मूल्यों को खोते जा रहे हैं. दूसरी ओर बोधिस्तव जी कह रहे हैं कि हर कोई चल रहा है भाग रहा है ..इसलिये चलो !!.. चलो तो सही पर कहाँ? कहाँ हैं मंजिल? वो पूछ्ते हैं “क्यों लिखते हो। इतना जो लिख रहे हो उसके पीछे कोई उद्देश्य है या ऐसे ही लिख रहे हो। मेरा सिर्फ इतना ही कहना है कि लिखो खूब लिखो पर तय कर तो कि क्यों लिख रहे हो और अगर तय कर लिया है तो मेरे इस उपदेश पर कान मत दो।”दोनों प्रश्न एक जैसे ही हैं पर समाधान क्या है?

एक ओर हम निजी बैकों की तारीफ करते है और दूसरी ओर उनकी आक्रामक विपणन शैली को कोसते हैं.एक ओर हम सरकारी कामकाज को देखते हैं तो कहते हैं कि सारा सिस्टम धीमा है..काम ही नहीं करता दूसरी ओर यदि कोई तेज काम कर अच्छे परिणाम देता है और कैरियर में आगे बढ़ता है तो कहते हैं कि मानवीय संवेदना खो गयी है. आगे बढ़ना जरूरी है.मानव जीवन की कहानी आगे बढ़ने की कहानी है.’आक्रामक’ होना जरूरी है ..नहीं तो मिटने के लिये तैयार होना पड़ेगा. ‘सर्वाइवल ऑफ फिटेस्ट’ का सिद्धांत मानव पर भी उतना ही लागू होता है जितना जानवरों पर.ये सच है कि इस समस्त प्रक्रिया में हम कुछ संवेदनाऎं खो देंगे लेकिन ये नियति की सतत प्रक्रिया है.आप इससे बच नहीं सकते. आपको चलना ही होगा.

जीवन एक अबूझ पहेली है. हर चीज जो हो रही है या घट रही है ना वो हमारे हाथ है ना उसका परिणाम ही हमारे हाथ है.हम चल रहे हैं या लिख रहे हैं क्यों? ये वैसा ही प्रश्न है जैसे कि कोई कहे कि मैं कौन हूँ.हम कोई भी काम करते हैं जो हमारी नजर में हमें लगता है कि हमारे लिये करना ठीक होता है. सिगरेट पीने वाला जानता है कि ये सिगरेट हमको नुकसान पहुंचा रही है फिर भी पीता है. लेकिन वो सिगरेट तब भी पीता है क्योकिं उसे सिगरेट पीना अच्छा लगता है.हमारी जीवन शैली हमारे मस्तिष्क के किसी भाग से निर्धारित होती है.जिसे ही शायद ‘मन’ कहते हैं.जिसे ही नियंत्रित करने को ही हमारे ऋषि मुनि तपस्या किया करते थे.क्योंकि सब कुछ जो भी है वो मन ही निर्धारित करता है. आप दु:ख से भरे क्षण में भी सहज हो सकते हैं और खुशी के क्षण में भी असहज हो सकते हैं.

किसी ने सही कहा है..मन के हारे हार है और मन के जीते जीत. जीत-हार,जय-पराजय, खुशी-ग़म,लाभ-हानि,अच्छा-बुरा,मेरा-तेरा,अपना-पराया,धरम-अधरम सब कुछ मन ही तो निर्धारित करता है. तो इसे साधने से क्या सब कुछ ठीक हो जायेगा?इस प्रश्न का उत्तर तो वही दे पायेगा जिसने इसे साधा हो. आप बतायें क्या करें ? मन को साधें कि बढ़े चले जायें.