Archive for September, 2007
मैं एक महीने से भी ज्यादा सक्रिय ब्लॉगिंग से दूर रहा. उसके बाद आया तो सोचा कि हिन्दी ब्लॉगिंग के बारे में ना सोच/लिख कर केवल अपनी बात ही लिखुंगा.लेकिन कुछ बातें हैं जो दिमाग में उमड़ घुमड़ रही हैं. सोचा लिख ही डालूं.
पिछ्ले आठ नौ महीने में हिन्दी चिट्ठाजगत में कई परिवर्तन हुए [...]
September 28th, 2007 | Posted in बहस, मेरी बात | 11 Comments
मुन्नू को आज फिर डांट पड़ी.उसे ये डांट रोज ही पड़ती है जब भी वो क्रिकेट खेल के घर आता है.उसके पापा कहते कि उसे क्रिकेट पर ध्यान ना देकर पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिये. वो युवराज सिंह की तरह बनना चाहता है पर उसके पापा उसे कुछ और ही बनाना चाहते हैं. आज फिर [...]
September 28th, 2007 | Posted in हास्य व्यंग्य | 4 Comments
सारा जमाना एस.एम.एस का है. “इंडियन आइडल” में एस.एम.एस. से सात करोड़ से भी ज्यादा वोट पड़े.लोग बोल रहे हैं इंडियन सही में आइडल बैठे हैं. वेल्ले बैठे हैं ..काम धाम है नहीं इसलिये मार एस.एम.एस पर एस.एम.एस कर रहे हैं. लेकिन इन लोगों को ये नहीं मालूम जब एस.एम.एस नहीं था तब भी हम [...]
September 26th, 2007 | Posted in हास्य व्यंग्य | 17 Comments
पिछले दिनों नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर जाना हुआ.टिकट काउंटर के पास ही एक विश्रामालय है. उसके पास खड़े रह कर प्रतीक्षा कर रहा था कि सामने एक बोर्ड लगा हुआ देखा. पहले हिन्दी में पढ़ा फिर सोचा शायद मैं गलत समझ रहा हूँ.फिर अंग्रेजी में पढ़ा. मतलब तो वही निकलता था हिन्दी वाला [...]
September 25th, 2007 | Posted in बहस | 9 Comments
देश चकाचक प्रगति कर रहा है.सैंसैक्स नयी ऊंचाइयां छू रहा है.पहले लखपति बहुत बड़े माने जाते थे अब करोड़पति की भी कोई औकात नहीं है.चारों और प्रगतिमय माहौल है.जितने पैसे पहले पांच दिन के मैच को जीतने पर भी नहीं मिलते थे उससे ज्यादा बीस ओवर के मैच को जीतने के मिल रहे हैं.जितने पैसे [...]
September 25th, 2007 | Posted in हास्य व्यंग्य | 4 Comments
समीर भाई ने लिखा
” अगर मैं कहूँ कि ९८ प्रतिशत भारत की आबादी को, जिसमें मैं भी शामिल हूँ, को न तो धन्यवाद देना आता है और न ही स्वीकारना आता है और न ही किसी का अभिनन्दन या प्रशंसा करना या फिर अपना अभिनन्दन या प्रशंसा स्वीकार करना, तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं [...]
September 24th, 2007 | Posted in बहस, मेरी बात | 4 Comments
वो आजकल परेशान थे.वो आजकल बेरोजगार थे.वो रह रह कर देश के बारे में सोचने लगते. देश के बारे में सोचने से उन्हे अच्छा लगता. उनका खुद का दु:ख कुछ कम हो जाता. पनवाड़ी की दुकान पर सिगरेट के कश लगाते लगाते वो सामने से गुजरते यातायात को देख रहे थे.स्कूल बसों में जाते हुए [...]
September 24th, 2007 | Posted in हास्य व्यंग्य | 5 Comments
[इससे पहले भी हरिशंकर परसाई जी की कृतियां आपके सामने ला चुका हूँ. आज पेश है एक और व्यंग्य लेख
पूर्व लेख : पवित्रता का दौरा:हरिशंकर परसाई
क्रांतिकारी की कथा : हरिशंकर परसाई]
निंदा में विटामिन और प्रोटीन होते हैं. निंदा खून साफ करती है, पाचन-क्रिया ठीक करती है, बल और स्फूर्ति देती है. निंदा से [...]
September 22nd, 2007 | Posted in हास्य व्यंग्य | 2 Comments