Oct 302007
 

कुछ दिनों पहले मैने आपके सामने “खोया-पानी” नामक व्यंग्य उपन्यास का जिक्र किया था. फुरसतिया जी ने बताया कि यह उपन्यास उन्होने भी मँगवा लिया है. उन्होने इसे नैट पर डालने की इच्छा भी जताई. जब से मैने इस उपन्यास को पढ़ना शुरु किया है तब से मेरी भी यही इच्छा थी.मुझे आप सबको यह बताते हुए खुशी है इस पुस्तक के अनुवादक श्री तुफ़ैल चतुर्वेदी से मेरा पत्राचार हुआ था और उन्होने मुझे इसे नैट पर डालने की अनुमति दे दी है (कुछ शर्तों के साथ).शीघ्र ही मैं इसे आपके सामने पेश करुंगा.ताकि आप सभी इस अदभुत व्यंग्य उपन्यास को पढ़ सकें.

आपको एक जानकारी और देता चलूँ. तुफ़ैल चतुर्वेदी जो विनय कृष्ण चतुर्वेदी के नाम से भी जाने जाते हैं हिन्दी व्यंग्य और ग़ज़लों की एक पत्रिका निकालते हैं जिसका नाम है “लफ़्ज़”.

lafz2 यह पत्रिका हास्य व्यंग्य , ग़ज़लों कविताओं की एक त्रैमासिक पत्रिका है. इसी पत्रिका के अंक एक से बारह में मुस्ताक़ अहमद यूसुफ़ी साहब की किताब ‘आबे गुम’ का अनुवाद छ्पा था. मुस्ताक साहब का ही दूसरा उपन्यास “ज़रगुज़िस्त’ , “धनयात्रा” के नाम से लफ्ज़ के अंक तेरह से धारावाहिक रूप से छ्प रहा है.ये दोनों उपन्यास पहली बार लफ़्ज़ के माध्यम से ही हिन्दी पाठकों के बीच अनुदित और चर्चित हुए. इसके अलावा लफ्ज़ में नये और पुराने व्यंग्य नियमित रूप से छ्पते रहते हैं.

लफ्ज़ समकालीन गज़लों की एक प्रतिनिधि पत्रिका है. इसमें आप ताजा तरीन और पूरी तरह ग़ज़ल के पैमाने पर कसी अच्छी अच्छी ग़ज़लों का आनन्द ले पायेंगे. 

तुफैल जी के अनुसार इस पत्रिका का स्थायी कोष बनाया गया है। इसमें आप संरक्षक अथवा आजीवन सदस्य बनकर अपना योगदान दे सकते हैं। आजीवन सदस्यता 1100 रुपये में तथा संरक्षक सदस्यता 5000 रुपये देकर प्राप्त की जा सकती है। इसी प्रकार तीन वर्ष का अनुबंध डाक व्यय सहित 300 रुपये में होगा। विदेशों से आजीवन सदस्यता 250 डॉलर तथा संरक्षक सदस्यता 1000 डॉलर देकर प्राप्त की जा सकती है। इसी प्रकार 3 वर्ष का अनुबंध डाक व्यय सहित 100 डॉलर में होगा।  अपनी धनराशि आप संपादक के पते पर मनीऑर्डर या ड्राफ्ट द्वारा `लफ़्ज´के नाम जो नोएडा अथवा दिल्ली में देय हो भेजा सकते है।

मुख्य संपादक
विनय कृष्ण चतुर्वेदी
(तुफ़ैल चतुर्वेदी)
फ़ोन : +91-9810387857

निवास व पत्र व्यवहार का पता
पी- 12 नर्मदा मार्ग, सेक्टर- 11,
नोएडा – 201301

मैने तो यह पत्रिका तीन साल के लिये मँगा ली है.आप भी चाहें तो मँगा लें.

Oct 302007
 

अभी अभी चिट्ठाजगत डॉट इन की आचार संहिता पढ़ी. मेरे विचार से हर संस्था को ये हक है कि वो अपनी आचार संहिता बनाये. ये उस संस्था से जुड़े लोगों को सोचना है कि वो उस आचार संहिता को माने या ना मानें. चिट्ठाकारी या ब्लॉगिंग एक अलग तरह का माध्यम है जिसका चरित्र ही है कि आप अपने नाम से लिखने या ना लिखने के लिये स्वतंत्र हैं.यह परंपरा अग्रेजी जगत में तो है ही हिन्दी जगत में भी है.इससे पहले भी इस विषय पर मेरे द्वारा और अन्य लोगों द्वारा लिखा गया है.

आचार संहिता कहती है कि वह फर्जी नाम से चितित है.मैं चिंतित हूँ कि नाम फर्जी है या नहीं ये कौन कैसे तय करेगा क्या हमें अपना पैन कार्ड या राशन कार्ड भी देना होगा :-) तो क्या फर्जी नाम वाले चिट्ठे चिट्ठाजगत.इन से हट जायेंगे.कुछ तो ये होंगे ही.

1. मसिजीवी

2. फुरसतिया

3. उड़नतस्तरी

4. ई-स्वामी

5. घुघूती-वासूती

5. बोधिसत्व

6. आलोचक

7. चौपटस्वामी

8. काकेश

9. सृजन शिल्पी

10. अजदक

11. अनामदास

और भी ना जाने कितने होंगे.

कल मैने एक टिप्पणी की थी लगता है वो सही ही है.

हम हैं तो लफड़े हैं
लफड़े हैं तो बातें हैं
बातें हैं तो तर्क है
तर्क है तो वितर्क है
वितर्क है तो गाली है
गाली है तो कड़वाहट है
कड़वाहट है तो मध्यस्थ है
मध्यस्थ है तो मलहम है
मलहम है तो समाधान है
समाधान है तो दोस्ती है
दोस्ती है तो हम है
हम हैं तो लफड़े हैं

चलिये देखते हैं कि ये लफड़ा कब तक चलता है..

Oct 282007
 

अशोक पांडे जी कबाड़खाने के कर्ताधर्ता कबाड़ी हैं. जाने कहाँ कहाँ से कबाड़ उठा के ले आते हैं और पटक देते हैं.एक दिन इसी कबाड़खाने में हम पहुंचे तो हम भी इस दुकान के हिस्सेदार बन गये.यहाँ तक तो ठीक था. लेकिन देखते क्या हैं पिछ्ले कुछ दिनों से हमारे ब्लॉग पर जो लोग सर्च इंजन से आ रहे हैं उनमें से कम से कम एक प्रतिदिन “ashok pande” को खोज कर आ रहे हैं. ऎसा पिछ्ले दस दिनों से हो रहा है. मैने भी इसी शब्द से जब गूगल में खोजा तो उसमें मेरा ब्लॉग कहीं नजर भी नहीं आया फिर लोग क्यों मेरे ब्लॉग में पांडे जी को खोजते हुए आ रहे हैं. मेरे तो समझ में नहीं आया आपके आया हो तो बतायें और कबाड़खाने पर जायें कुछ अच्छा कबाड़ बटोरें.

अभी तो कबाड़खाने का एक उम्दा कबाड़ पेश करता हूँ… 

Wednesday, October 24, 2007


`समोसे´ :वीरेन डंगवाल

हलवाई की दुकान में घुसते ही दीखे
कढाई में सननानाते समोसे
बेंच पर सीला हुआ मैल था एक इंच
मेज पर मक्खियाँ
चाय के जूठे गिलास
बड़े झन्ने से लचक के साथ
समोसे समेटता कारीगर था
दो बार निथारे उसने झन्न -फन्न
यह दरअसल उसकी कलाकार इतराहट थी
तमतमाये समोसों के सौन्दर्य पर
दाद पाने की इच्छा से पैदा
मूर्खता से फैलाये मैंने तारीफ में होंट
कानों तलक
कौन होगा अभागा इस क्षण
जिसके मन में नहीं आयेगी एक बार भी
समोसा खाने की इच्छा|

Oct 272007
 

आज जब अनिल जी ने अपनी पोस्ट लिखी तो मुझे लता जी का गाया एक बंगाली गाना याद आ गया. ” एक बार बिदाई दे माँ घूरे आशी”. यह गाना जब पहली बार सुना था तो बहुत कुछ समझ में नहीं आया था लेकिन फिर भी आंखों में आंसू थे. उसके बाद तो यह गाना सैकड़ों बार सुना और हर बार यह मन को द्रवित ही कर गया.

यह गाना लता जी का गाया हुआ है और इस गाने में क्रांतिकारी खुदीराम बोस फाँसी से पहले अपनी माँ से अनुमति मांग रहे हैं. बोल कुछ इस तरह से हैं.

एक बार बिदाई दे माँ घूरे आशी
एक बार बिदाई दे माँ घूरे आशी
हाँसी हाँसी पोरबो फांसी देखबे भारतवासी
आमी ई हाँसी हाँसी पोरबो फांसी देखबे भारतवासी
एक बार बिदाई दे माँ घूरे आशी…..

गाने में संगीत के नाम पर पीछे एकतारा बजता है.बाउल संगीत पर आधारित यह गाना दिल को जैसे तोड़ कर रख देता है.
आप भी सुनिये. (प्ले बटन पर क्लिक करें)

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इसका भाव कुछ इस प्रकार है.

माँ बस एक बार मुझे विदाई दे दे …मैं जरा घूम आऊँ.
मैं हँसते हँसते फाँसी के फन्दे को पहन लुंगा
और सारे भारतवासी देखेंगे.
माँ बस एक बार मुझे विदाई दे दे ..मैं जरा घूम आऊँ.

माँ मैं बम तैयार कर रास्ते के किनारे खड़ा था
मुझे बड़े लाट साहब को मारना था
मैने मार दिया माँ उस इग्लैंड वासी देशद्रोही को
माँ बस एक बार मुझे विदाई दे दे …मैं जरा घूम आऊँ.

शनिवार को दस बजे के बाद जज कोर्ट में जन समूह उमड़ेगा
जब एक ओर अभिराम का दीप जलेगा
तभी खुदीराम को फाँसी हो जायेगी माँ
माँ बस एक बार मुझे विदाई दे दे …मैं जरा घूम आऊँ.

माँ!! तेरे तो तैतीस करोड़ बारह लाख बेटा-बेटी अभी जिन्दा हैं
उनके साथ तू आराम से रहना माँ …बस मुझे जाने की अनुमति दे दे
माँ बस एक बार मुझे विदाई दे दे ….मैं जरा घूम आऊँ

दस माह दस दिन बाद मैं फिर जन्म लुंगा मौसी के घर में
यदि तू मुझे पहचान ना पाये तो देखना मेरे गले में फाँसी का निशान
और मुझे पहचान लेना माँ!!… पहचान लेना
माँ बस एक बार मुझे विदाई दे दे …मैं जरा घूम आऊँ.

कैसा लगा आपको बताइयेगा टिप्पणीयों से.

Oct 262007
 

आजकल ब्लॉगजगत में कम्यूनिज्म पर बहस जोरों पर है. कोई इसे बाल विवाह से जोड़ रहा है तो कोई तलाक से.इसी बहाने आज कुत्ताज्ञान ब्रह्मज्ञान भी मिल गया. :-)

मैं जब कम्यूनिज्म पर कुछ पढ़ता हूँ या फिर किसी के मुँह से कुछ सुनता हूँ तो कुछ भी कह पाने की स्थिति में नहीं होता. कुछ भी कहने के लिये मेरी अज्ञानता आड़े आ जाती है.मैने लोगों को इस वाद की बड़ाई करते भी सुना है और इस वाद के घोर विरोधी भी देखे हैं. इसलिये अभी तक इस मामले में अज्ञान ही हूँ कि यह असल में है क्या.

बचपन में इतिहास की किताबों में मार्क्स और लेनिन के बारे में पढ़ा था.उसे पढ़ने के बाद उसकी समझ उतनी ही बनी जितनी इतिहास की किताबें पढ़ने के बाद बच्चों की आम तौर पर बनती है ..यानि नासमझ के नासमझ ही रहे.कॉलेज में जब था तब कुछ नेता टाइप के लोग कभी कभी कुछ पर्चे बांटते थे जिनमें एक दाढ़ी वाले इंसान की फोटो के साथ कुछ कविताऎं या लेख रहते थे. लेकिन तब कोर्स की किताबें पढ़ने का इतना जुनून था कि ध्यान ही नहीं दिया कि उन पर्चियों में क्या लिखा रहता है.

409px-Kapital_titel_bd1 बाद में जब नौकरी के सिलसिले में बंगाल में रहा तो फिर कम्यूनिज्म से सामना हुआ.आये दिन बंगाल बंद होते रहते थे इसलिये मुझे यह कुछ दिनों बहुत भाया.मेरे कुछ बंगाली मित्र मुझे कम्यूनिज्म को समझने के लिये उकसाते रहे और मैं हमेशा किसी ना किसी बहाने कन्नी काटता रहा.कुछ लोगों ने मुझे ‘दास कैपिटल’ पढ़ने की सलाह दी. उन दिनों पुस्तक मेलों में रशियन किताबों का बहुत बोलबोला था.इन स्टालों पर भीड़ भी बहुत लगती थी. वो इसलिये कि यहाँ मोटी मोटी हार्डबाउन्ड किताबे बांकी किताबों के मुकाबले काफी सस्ती मिल जाती थी. जहाँ तक याद पढ़ता है दो रशियन प्रकाशक मीर पब्लिशर और प्रोग्रेसिव पब्लिशर की बहुत सी किताबें बहुत सस्ते में मिल जातीं थी. उसी दौरान वही से हार्ड बाउंड अन्ना कैरेनीना, वार एंड पीस,चेखव की कहानिया , चेखव के नाटक इत्यादि खरीदे. ‘दास कैपिटल’ पहली बार में नहीं खरीदी क्योकि लगा कि पढ़ नहीं पाउंगा. लेकिन एक मित्र थे जो इसी बात को लेकर मित्र-मंडली में मुझे मजाक मजाक में मूर्ख साबित करने की कोशिश करने लगे. हाँलाकि और भी कई लोग थे जिन्होने ‘दास-कैपीटल’ नहीं पढ़ी थी लेकिन टार्गेट केवल मैं ही होता था. उनका टार्गेट बनने से बचने के लिये अगले पुस्तक मेले में मैने दास-कैपीटल खरीदने का निर्णय किया. यह किताब तीन मोटे मोटे वोल्यूम में थी मुझे लगा कि काफी मँहगी होगी लेकिन तीनो वॉल्यूम मात्र 120 रुपये के मिल गये. मैने बड़े शान से तीनो वॉल्यूम अपनी मेज पर सजाये. वो मित्र भी आये तो बड़े खुश हुए. मुझसे एक एक कर तीनों वोल्यूम माँग कर भी ले गये. अब मित्र-मंडली में वो मेरी तारीफ भी करने लगे थे.वह मुझे प्रगतिशील समझने लगे थे. यह घटना दस साल पुरानी है. इन दस सालों में मैने अभी तक दास-कैपीटल का एक पन्ना भी नहीं पढ़ा लेकिन ये मेरी अलमारी में अभी भी अलग से शोभायमान है.

मैं बंगाल में जब था तो एक मित्र ने एक बार कम्यूनिज्म पर एक टिप्पणी की थी. उनका कहना था ” यदि कोई पच्चीस साल की उम्र तक कम्यूनिस्ट नहीं बना तो उसके पास दिल नहीं है और यदि कोई पच्चीस साल की उम्र के बाद भी कम्यूनिस्ट बना रहा तो उसके पास दिमाग नहीं है”

आलोक पुराणिक जी ने अपनी टिप्पणी में बताया है कि यह टिप्पणी शायद बर्नार्ड शॉ की है. धन्यवाद आलोक जी. बर्नार्ड शॉ की टिप्पणी कुछ इस तरह है. “Any man who is not a communist at the age of twenty is a fool. Any man who is still a communist at the age of thirty is an even bigger fool.”

  

(चित्र विकीपिडिया से साभार) 

Oct 252007
 

आलोक जी-9-2-11 के बारे में दो चीजें सबको मालूम ही होंगी. एक कि वो अक्सर टेलीग्राफिक पोस्ट लिखते हैं और दूसरा वो कहीं भी गलत हिन्दी देखते हैं तो टोक जरूर देते हैं. लेकिन आज सुबह से उनका एक और रूप सामने आ रहा है.आपने भी नोट किया हो. वो रूप है एक सफल टिप्पणीकार का. जिस भी चिट्ठे पर देखो आज आपको आलोक जी की टिप्पणी जरूर मिलेगी.समीर जी को भी शायद अब खतरा नजर आ रहा होगा. आलोक जी के इसी रूप के दर्शन आज हमारे चिट्ठे पर भी हो गये. हम तो धन्य हो गये जी. समीर जी भले ही कहें (और ठीक कहें) कि वो टिप्पणी पढ़ कर देते हैं ( मेरी पिछ्ली पोस्ट पर उनकी टिप्पणी देखें) लेकिन आलोक जी ने बकायदा पोस्ट को पढ़ कर कुछ कठिन शब्दों का अर्थ भी पूछ लिया.

थोड़ा शब्दार्थ बताने का कष्ट करेंगे तो बड़ी अनुकंपा होगी।
मँड़हे
अलक्ष
उबहनी
मँड़ई
खाँची फाँदना
ढखुलाही
डाँड़-बाँध

विनीत,
आलोक

अब आदिपुरुष पूछें और हम जबाब ना दें तो कैसे बात बने. तो लीजिये आलोक जी के लिये शब्दों के अर्थ.आप भी जान लें और कोई शब्द कठिन लगा हो तो पूछ लें कोशिश की जायेगी कि उसका अर्थ बताया जाय.

मड़हा- मिट्टी से बना हुआ छोटा घर, भुना हुआ चना

अलक्ष - अज्ञेय, अदृश्य, जो देख ना पड़ता हो. यहाँ पर मतलब उस स्थान से है जहाँ से उसने रमायण उठाई थी(मंदिर).[ रामायण वाला प्रसंग इस पोस्ट में आया था ]

उबहनी- इसका अर्थ तो होता है रस्सी पर यहाँ पर लट (बाल) से मतलब है.

मँड़ई- पर्णशाला, छोटी कुटी या झोपड़ी

खाँची फाँदना- खाँची (कीचड़), यहाँ पर मिट्टी सानने से मतलब है.

ढखुलाही - त्रिपाल, किसी वस्तू उपर फैलाकर नीचे की वस्तु को छिपाना.

डाँड़-बाँध- अर्थदंड, हरजाना

दुआ करें कि आलोक जी के इसी रूप के दर्शन हर दिन हों.

Oct 252007
 

समीर जी का उत्साह बढ़ाने में कोई सानी नहीं. कल की पोस्ट पर उन्होने एक अच्छी सी टिप्पणी की जिससे फिर से ऊर्जा मिली कि बांकी भाग को भी टाइप कर आप तक पहुंचाऊं.

थक गये हैं, थोड़ा विश्राम प्राप्त करें मित्र.

कार्य इतना उत्तम हैं कि यह कह पाना संभव नहीं कि थक गये हैं तो जाने दिजिये.

बहुत आभार इस पेशकश का. हमारे पास ताप के ताये हुए दिन होती तो जरुर मदद कर देते आपकी, यह तो आप जानते ही हैं. :)

धन्यवाद समीर जी.

लीजिये प्रस्तुत है अंतिम भाग. पहले दो भाग आपने ना पढ़े हों तो वो यहाँ और यहाँ हैं. निवेदन यही कि पहले उन दोनों भागों को पढ़ लें.

मँड़हे से निकला मैं, वह भी साथ था
पूछ पड़ा, किसके लड़के हो
मैंने शिक्षा जैसी थी अलक्ष को प्रणाम किया
कहा, जगरदेवसिंह मेरे पिता थे
बैरागी बाबू, पूछा उसने
मैंने कहा, उनका यह भी नाम है
उसने कहा, अब ऐसे आदमी दिखाई नहीं पड़ते
धरम जानकर रहे धरम किया

मैं बाहर निकला तो सोचता हुआ निकला
आज जो हुआ वह केवल आज ही हुआ है
और मैंने आज के उड़ंछू शब्दों को
पकड़ पाने के लिए अपने मन को
उद्यत कर दिया
ऐसा कम होता है बहुत कम
जब शब्द किसी समय जी से बतियाने लगें
बुआ से मैंने सबकुछ कहा फिर पुछा
उसका नाम क्या है
बुआ ने कहा नगई
महरिन के माथे से उबहनी लटकाए
मैंने घर जाते देखा था
उधर वही घर था
मुड़ते भी देख लिया उनको
उसी ओर
कई दिनों बाद
गया नगई की मँड़ई पर

नगई खाँची फाँदे बैठा था
हाथों में वही काम
आँखें उन हाथों का
हथवट चिताती हुई
खाँची में लगी एक आँख मुझे भी देखा
और कहा बैठो उस पीढे पर
साफ है मैंनें कुछ पहले ही धोया है
बैठने पर मुझसे कहा
अच्छा बाँच लेते है रमायन
तुम्हारे बाबू कहते थे जैसे
अब कोई क्या कहेगा
उनकी भीतर की आँख खुली थी
सुर भी क्या कण्ठ से निकलता था
जैसे आषाढ़ के मेघ की गरज
मैने कहाँ महरा
मैं तो अभी सीख रहा हूँ
नगई ने कहाँ कितने होंगे
जो जानते हैं वही कुछ सीखना है
बाबू की तपस्या का फल
तुम्हें मिला है मिलेगा
मैं इस सनेहिल असीस से
चुपाया रहा
नगई ने हाथ चलाते चलाते फिर कहा
दुनियां है दुनियां का ज्ञान है आदमी है
आदमी को क्या क्या नहीं जानना है
देखते-सुनते और करते ज्ञान होता है
अपनी जब होती है समझ नयी होती है
मेरे लिए समझ पाना कठिन था
पर रुक रुककर निकले बोल ये
कहीं ठहर गये थे मेरे मन में
अर्थ बहुत बाद में कुछ कुछ पाया
धारणा बेकार में बोझ ढोना ही नहीं है
आदमी बात से व्यवहार से
पहचाना जाता है
समझ ही
आदमी को आदमी से जोड़ती है

वर्ष बीत जाने के बाद, शायद
एक दिन नगई की ओर जा निकला
इतने जन वहाँ मैंने नहीं देखे थे
अपना कुछ काम था फिर भी में रुक गया
नगई की दृष्टि मुझ पर पड़ी
काम रोककर मेरे पास आ गया
और कहा, भात है बिरादरी को न्योता है
दिन परसों निश्चित है
आप कहाँ जाते हो
मैंने कहा काम से
उसने कहा मुझे भी बुझाव है
परसों आना
इज्ज्त मैं क्या दुंगा
फिर भी दसों नँह जोड़े
खड़ा ही मिलूँगा
सेवक हूँ और सेवा करना मेरा काम है

मैं आगे बढ़ गया
उस दिन बडी भीड़ थी
बड़े-बड़े चूल्हे जगाये गये
जिन पर हण्डे कड़ाह चढ़े थे
कहीं भात कहीं दाल और कहीं
तरकारी पकती थी
लकड़ियों की कोई कमी नहीं थी
जंगल के बीच थे चिरानीपट्टी की बस्ती
दोने पत्तल पहले से बनाकर
ठिकाने से रखे थे
ढखुलाही कोई छोटी नहीं थी
ढाक के पेड़ ही पेड़ थे
बड़े और अच्छे पत्ते जिन पर छाये थे
जंगल में क्या कमी
जंगल जिसका हो
उससे कह कर ले लेना था
रोक टोक कोई खास नहीं थी
कई बार आ जाकर
रंग वहाँ का देखा
जो भी मिला काम से लगा मिला
ऐसे लोग भी मिले
जो करते थे कम और बोलते बहुत रहते हैं
आवाज ऊँची से ऊँची हो आती है।
ध्यान इधर उधर जाता है आसपासवालों का
कुछ लोग फिरकी से फिरते हुए
इनके पास उनके पास जाते थे
काम को देखकर बताते थे
ऐसे करो वैसे करो
मैंने सुना, एक कहाँ रहा था, कैसे भला
लेकिन सचेत पाँव कान से कुछ दूर थे
मुँह किसी और हाथ से कुछ कह रहा था

कोई दस बार पाँत बैठी थी
हर बार पत्तलें पचास ऊपर लगती थी
नगई ने तीन बीस का हिसाब रखा था
भोजन करने वाले तुष्ट थे
गाँजा, तमाखू, सुरती, बीड़ी, और पान का
प्रबन्ध था
जब जो जिसे चाहिए
जाकर ले लेता था
कुछ बूढ़े और आदर मान पाने वाले ही
अपनी जगह जमे थे
उनकी सेवा नौजवान करते थे
बार-बार यहाँ या वह पूछकर
सराहना हो रही थी
नगई के यहाँ वहाँ
बड़े लोग भी प्रबन्ध ऐसा
नहीं कर पाते
नगई पर कृपा है भगवान की
इस तरह मान दिया
भार हल्का कर दिया

पंचायत बैठी थी जाजिम पर
पीपल के नीचे
दिन दो घड़ी शेष था
कोतवाल, सिपाही और गोड़इत
जाति के ही लोग थे
बरौछीदार-चँवरदार मक्खियाँ उड़ाते थे
बैठे हुए लोगों को बचाते
हवा पट पड़ी थी इसी कारण
पंखे का प्रबन्ध था पसीना चल रहा था
और बड़े-बड़े पंखे तीन चार हाथों से
हवा को लहराते थे
मैं उभरी पीपल की सोर पर जरा हटकर
बैठा था, मेरी आँखों के लिए
पहली पंचायत थी
चौकीदार ने पुकारा
नगई और लखमनी
दोनों हाथ जोड़े सिर झुकाए हाज़िर हुए
फिर उनका दोस बतलाकर पूछा गया
अपने दोस मानते हो
मानते हैं—दोनों ने साथ कहा
पूछा गया, डाँड़-बाँध तुमको मंजूर है
सिर माथे हमको मंजूर है—दोनों बोले
पंचों ने कहा, दस रुपये की डाँड़ है, भात देना होगा
यह भी मंजूर है
फिर महरिन जल लायी, सबको दिया पीने को
नगई ने हुक्का पिया और बारी-बारी सबको दिया
पंचों ने हुक्म दिया अब तुम दोनों साथ रहो
पंचायत तो मानो पंचपरमेसर है
नगई हाथ जोड़े अब खड़ा हुआ
बोला, जाति गंगा ने मुझे पावन कर दिया
धन्य हुआ
और फिर भोज हुआ
नाच और नाटक हुए.

[‘ताप के ताये हुए दिन’ से]

त्रिलोचन श्रंखला के कुछ और लेख…

1. त्रयी के त्रिलोचन की कवितायें.

2. चम्पा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती:त्रिलोचन

3. बिस्तरा है न चारपाई है:त्रिलोचन

4. नगई महरा: त्रिलोचन

5. नगई महरा- 2 : त्रिलोचन

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: कविता, काकेश, त्रिलोचन, गांव, नगई महरा, नगई, ताप के ताये हुए दिन

Technorati Tags: कविता, काकेश, त्रिलोचन, गांव, नगई महरा, नगई, ताप के ताये हुए दिन, poem, hindi blogging, hindi poem, trilochan, village, nagai mahara, kakesh

Oct 242007
 

कल नगई महरा का पहला भाग प्रस्तुत किया था. आज पेश है उसी का दूसरा भाग.कृपया पूरी कविता पढ़ें आप निश्चित ही कविता के मर्म में उतर पायेंगे.य़ह एक कविता है जिसके अन्दर समाज की एक कहानी भी साथ साथ चल रही है और दिख रहा है समूचा गाँव.आइये आनन्द लें.

तब मेरी उमर जैसी छोटी थी
समझ भी छोटी थी
शब्द याद रह गये
अर्थ वर्षों बाद खुला जब
समाज के पर्दे खुलने लगे

चार भाई थे—नगई, बैरागी, बित्तू
और कोई और
बैरागी को मैने देखा था जब तब
चिरानीपट्टी कभी-कभी आता था
बैरागी का बियाह महजी से हुआ था
महजी इस महरिन की कोख से जनमी थी
बैरागी-महजी के नाते से
कभी कदा नगई की चर्चा चल जाती थी

चर्चा कमजोर थी
कहारों में
किसी को छोड़कर दूसरे को कर लेना
चलता था
और अब भी चलता है
नर या नारी का बिसेख कोई नहीं था
जोड़े में जब कोई नहीं रहा
दूसरे को लाने में बाधा कुछ नहीं थी
जरा ऊँच-नीच का विचार तो यहाँ भी था
जातियों के आपसी भेद थे
कोई जाति कुछ ऊँची
कोई जाति कुछ नीची
स्त्री-पुरुष भिन्न-भिन्न शाखा के हुए
तो मुश्किल पड़ जाती थी
लेकिन पंचायत थी
डाँड़-बाँध करती थी
जिसे मानना ही था
और फिर भोज भात चलता था
भोज भात खाया भागे नहीं
आपसी बतियाव, खेला, गाना, नाच-रंग
नाटक, तमाशा, सभी होता था
इसी समय सबके गुन खुलते थे

नगई ने अपने सगे भाई की सास को
घर में बैठाया था
उसी घर में माँ-बेटी
जेठानी-देवरानी थीं
सम्बन्धों की छीछालेदार
घर में ना हो गाँव-भर में होती थी
बाप दादों का कुटका
बछैया छोड़कर नगई ने छोड़ दिया
मँडई डाल ली चिरानीपट्टी में आकर

मैने एक दिन उधर
पेड़ों के सहारे एक मड़ई खड़ी देखी
पास ही बँसवट थी
जिसमें बहुत साँप सुने जाते थे
और कुछ कदम पर डँड़ियबा का मसान था
गाँव में गाँव से अलग छनिहर
कौन यहाँ रहता है
देखने के लिए गया
आँखें जो देखती थीं मेनेजर को बताती थीं
मुँह मेरा बन्द था

नगई ने जेंवरी बरते पूछा, पढ़ते हो
हाँ कहने को खुला
फिर नगई ने पूछा
रमायन बाँच लेते हो
हाँ अटक अटककर
सुन कर हँसा नगई खुलकर बोला
बाँचना अटक अटक कर
और इसे बूझना बूझने की बात है
मेरे कान नगई के कहन-रस में पगे
अब उसने फिर कहा
लाऊँ मैं, बाँचोगे,
ले आओ मैंने कहा
मन में गुना अब तक तो
अपने आप बाँचता था
आज किसी और के लिए मुझे बाँचना है
यहाँ नयी बात थी
और नयी बात में अनकुस होता ही है
मन हाल रहा था
बात को फैलाव से बचाने के लिए मै
नगई का नाम बार-बार दे रहा हूँ
लेकिन मुझे उस दिन
उसका नाम मालूम नहीं था
बातों से बात चली
अलगाव दूर था लगाव पास पास था
और लगाव को कोई नाम देने से
काम बहुत नहीं बनता
नाम एक निश्चित निश्चय उगाता है
अर्थ सम्बन्धों के सहारे चला करते हैं
यानि अर्थ का उदगम छिपा रह जाता है
नगई ने बेठन को खोलकर पोथी को
माथे से लगा लिया
फिर उसे खाट कि सिरहाने रखा
लोटे में पानी लेकर मुझसे कहा
चरण मुझे धोने दो
और उसने मेरे दोनें पैरों को
घुटनों तक धो दिया अच्छी तरह
फिर लोटे को माँजा धोकर पानी लिया
और कहा, चलो हाथ मुँह भी धुला दूं

मैं उठा पानी वह ढालता रहा
मैने हाथ-मुँह फरचाए
पास के मँड़हे में कुशासन एक अलग था
उसकी गर्द झाड़कर मुझे बैठने को कहा
मेरे बैठ जाने पर पोथी मुझे सौंप दी
फिर मुझे बड़े भक्ति-भाव से प्रणाम किया
कुछ हटकर हाथ जोड़कर सामने ही
भूमि पर बैठ गया

मैने पोथी खोल ली
पूछा, कहाँ पढूं
उसने कहा सुन्दरकाण्ड
मैंने साँस चैन की ली
सुन्दरकाण्ड कई बार पढ़ा था
पढने को,अर्थ कौन ढुँढता
ध्वनी अपनी मुझे अच्छी लगती थी
जहाँ-जहाँ अर्थ झलक जाता था
वहाँ आनन्द मुझे मिलता था
जनक सुता के आगे ठाढ़ भएउ कर जोरि
पढकर मैं रुका प्रति दोहे पर जैसे
वैसे ही उसने इस दोहे पर
भक्ति भाव से कहा
सियाबर रामचन्द्र की जय
फिर मुझ से कहा अब विश्राम
कुशा खण्ड पतला सा मेरी ओर करके कहा
चिह्न रख दो पोथी में
मैंने चिह्न लगाकर पोथी को बन्द किया
उसने अब पूछा था कल भी आओगे इस ओर
मैने कहा, आऊँगा
जब मैं खड़ा हुआ चलने को
उसने भक्ति भाव से मुझे फिर प्रणाम किया

[‘ताप के ताये हुए दिन’ से]

क्रमश:……………….

कविता अभी समाप्त नहीं हुई. लेकिन मेरी उंगलिया अब टाइप कर पाने मे असमर्थ पा रही हैं खुद को. चलिये तो शीघ्र ही आता हूँ एक और भाग के साथ जो इस कविता का अंतिम भाग होगा.

त्रिलोचन श्रंखला के कुछ और लेख…

1. त्रयी के त्रिलोचन की कवितायें.

2. चम्पा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती:त्रिलोचन

3. बिस्तरा है न चारपाई है:त्रिलोचन

4. नगई महरा: त्रिलोचन

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Oct 232007
 

‘नगई महरा’ त्रिलोचन की एक सशक्त रचना है.पहलू में त्रिलोचन की कविताओं में भी इस कविता का जिक्र हुआ था. यह एक लंबी कविता है जिसे दो भागों में पेश कर रहा हूँ. इस कविता में ग्रामीण जीवन अपने पूरे यौवन के साथ उतर गया है. गांव के आम शब्द इस कविता में इतने सहज भाव से आ जाते हैं कि समझने के लिये अतिरिक्त प्रयास नहीं करना पड़ता.गांव के जीवन का एक शब्द चित्र सी खींचती है यह कविता. जाति-पाति,पंचायत, और समाज सभी कुछ तो है इसमें.आप भी आनंद लीजिये.

नगई महरा

गाँव वाले इधर उधर कहते थे
नगई भगताया है
सामना हो जाने पर कहते थे
नगई भगत

नगई कहार था
अपना गाँव छोड़कर
चिरानीपट्टी आ बसा
पूरब की ओर
जहाँ बाग या जंगल था
बाग में
पेड़ आम,जामुन या चिलबिल के
जंगल में मकोय, हैंस, रिसबिल की बँवरें
झाड़ियां झरबेरी की
और कई जाति की
ढ़ेरे, कटार,ढ़ाक, आछी,
बबूल और रेवाँ के
पेड़ भी जहाँ तहाँ खड़े थे

सूखे पत्ते वहाँ बहुत सारे थे
नगई ने भाड़ बैठा दिया
दिन में साँस मिलने पर
भाड़ को जगाता था
दूर दूर से भुँजानेवाले आ जाते थे
संझा के पहले ही
भाड़ बन्द होता था
नगई का परिवार
छोटा था
घरनी और एक बच्ची
बच्ची गोहनलगुई थी
घरनी सेंदुर से मिली नहीं थी
धरौवा कर लिया था

घरनी फुर्तीली थी
चुस्त काम काज में
बोल बात में हँसमुख
कभी उसका चेहरा मुरझाया हो
याद नहीं आता मुझे
बात पर बात ऐसे जड़ती थी
जहाँ समझ लड़ती थी
और ये दुर्लभ है
नगई ने गाँव के
तीन-चार घरों का
पानी थाम लिया था
कभी वह भरता था
कभी घरनी भरती थी
कुछ खेत मिले थे इसके लिए
और घर घर से
कलेवा मिल जाता था
नगई नहीं खाता था
माँ-बेटी खाकर कुछ करती थी

पूरा परिवार मैंने देखा
पैरों पैरों है
हाथों ने काम कोई लिया, किया
हो जाने का ही काम
हाथों में आता था
रस्सियाँ भी नगई बरा करता था
सुतली को कातकर बांध भी बनाता था
कहता था, दैव ने मुँह चीर दिया है
उसमें कुछ देने को हाथ तो चलाना है
मैने इस घर में
टुन्न पुन्न नहीं देखी
घरनी को महरिन मैं कहता था
मैं ही नहीं कोई मुँह-मुँह देखे
क्योंकि नगई महरा थे
सबके लिए
केवल बड़े-बूढ़े बखरीवाले
नगई बुलाते थे
कभी नगई कभी महरा
जो भी जबान पर चढ़ गया
कहने की झोंक में

नगई को बैठने और उठने का
बोलने-बतियाने का सहूर है
यह अनमोल बाबा कहते थे
अनमोल बाबा की आँख
इन्ही बातों पर पड़ती थी
अच्छी तरह जानता हूँ
मुझ पर जब चिढ़ते थे
कहते थे तू कैसे
बेटा बैरागी का हो गया
भलमनई की कोई चाल नहीं
नगई की चर्चा
निन्दकों को प्रिय नहीं थी
गाँव में निन्दक कम नहीं थे
कहाँ नहीं होते वे
जहाँ वृद्दि पाते हैं
खुचड़ खोज-खोजकर दिखाते हैं

बहुतों के पाँव अपनी डगर पर
निन्दा की कहीं छिपी कहीं उभरी
अढ़ुकन से ठोकर खा जाते हैं
उबेने पाँव चलना कठिन होता है
हर डग का ऊँच खाल
देखे और तोले बिना
काम नहीं चलता
अपना शरीर बेसम्हार होता है
एक दिन अपने द्वारे
इमली के पेड़ तले मैं था
घेउरा बुआ था महरिन पानी भरने आ गयी
बुआ ने बुलाया महरिन
महरिन आ गई पास
बुआ ने, अब मैं समझता हूँ,
कुछ प्यार से कुछ तिरस्कार से
कहा होगा— महरिनिया
तू दमाद के घर
क्यों बैठ गयी
महरिन का जवाब पहले का तैयार लगा
बूआ, अपनी ओर ही निगाह करो
दूसरों की बूझने से पहले अपना ही बूझना
कहीं अच्छा होता है
और वह इज्जत बचाती हुई
घर में चली गयी
छूछा जोर लेकर बाहर निकली
बिल्कुल चुप
बुआ भी चुप ही रहीं
उसके इनारे की ओर चले जाने पर
आप ही आप कहा
कौन नीच जाति के मुँह लगे.

[‘ताप के ताये हुए दिन’ से]

क्रमश:……………………………………..

त्रिलोचन श्रंखला के कुछ और लेख…

1. त्रयी के त्रिलोचन की कवितायें.

2. चम्पा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती:त्रिलोचन

3. बिस्तरा है न चारपाई है:त्रिलोचन

Oct 192007
 

दुखी होना आपकी सामाजिक चेतना का लक्षण है. अवसरवादी के लिये दुख लाभ प्राप्ति का मार्ग है.आप अपनी सुविधानुसार दुखी हो सकते हैं.यदि आपके पास एक अदद नौकरी है तो इस बात पर दुखी होइये कि आपका बॉस आपको बहुत परेशान करता है.सुबह से शाम तक आपको एक कोल्हू के बैल की तरह काम करना पड़ता है. बदले में आपको वेतन के रूप में जो पैसे मिलते हैं वो आपकी योग्यता व काम के हिसाब से बहुत कम हैं. यदि आप भारत के अधिकांश युवाओं की तरह पढ़े लिखे अयोग्य हैं तो दुखी होने का पहला हक आपका है. आप बेरोजगारी की समस्या का रोना रोते हुए सरकार को जी भर कोस सकते हैं.आप जगह जगह जा कर कह सकते हैं कि इस देश में योग्य व्यक्ति की कोई पूछ नहीं है. ज्यादा दिनों तक नौकरी ना मिले तो कहिये कि अरे नौकरी की क्या है मिलने को तो कितनी ही मिल जायेंगी लेकिन हम अपनी शर्तों पर काम करना चाहते हैं.आजकल हर जगह भ्रष्टाचार है.लोगों का नैतिक पतन हो चुका है.क्या होगा देश का. ऎसा प्रकट करें कि जैसे सारे देश का भार आपके ऊपर ही है.कुछ दिनो में कुछ ले-दे के एक अदद नौकरी का जुगाड़ हो गया तो कहिये कि क्या करें… सोचा है कि सिस्टम को कोसने से बेहतर है कि सिस्टम में रहकर उसके खिलाफ लड़ें.आजकल कोई देश के बारे में सोचता ही नहीं. यकीन मानिये लोगों की सहानुभूति आपके साथ होगी. 

यदि आप कवि हैं तो भगवान ने आपको एक कलम दी है जिसे कुछ बड़े बूढ़ों ने तलवार से भी ज्यादा मारक बताया है. ये बड़े बूढ़े वही रहे होंगे जो किसी राजा के जमाने में युद्ध के लिये मिसफिट घोषित कर दिये गये होंगे. कवि दुखी होकर उस तलवार से जिस पर चाहे उस पर वार कर सकता है.कवि के दुखी होने का अपना ही एक इश्टाइल होता है जिससे दुखी होने का नाटक कर दूसरों लोगों को पर्याप्त दुखी कर सकता है.इस तरह वह माहोल को दुखमय बना देश व समाज की प्रगति में योगदान देता है.कवि की दुखी होने और करने की विभिन्न क्षमताओं के आधार पर ही उसे तरह तरह पुरुस्कार प्रदान किये जाते हैं.साहित्य के क्षेत्र के जितने भी बड़े बड़े पुरुस्कार हैं वह अधिकतर कवियों को ही दिये जाते है. व्यंग्यकारों को अपनी दुखी न कर पाने की असमर्थता के कारण कोई पुरुस्कार नहीं मिलता.यदि किसी एक आध व्य़ंग्यकार को पुरुस्कार मिला भी हो तो मान लीजिये कि उसने अपनी रचनाओं से लोगों को पर्याप्त दुख दिया होगा.

दुखी होने के मामले में नेता लोग आत्मनिर्भर होते हैं. उन्हें दुखी होने के लिये कोई खास मसक्कत नहीं करनी पड़ती. वो किसी भी मुद्दे पर घड़ियाली आंसू बहा सकते हैं.कैमरे के सामने आते ही वो पूरी तरह चेहरे को लटकायमान बनाते हुए किसी भी मुद्दे पर दुख प्रकट कर सकते हैं. यह सार्वभौमिक सत्य है कि किसी भी नेता द्वारा प्रकट दुख का कारण विपक्षी पार्टी ही होती है.

जिस तरह से दुख के संवेदना जुड़ी हुई है उसी तरह सुख के साथ जलन का रिश्ता है. यदि कोई दुखी है तो आप उससे हमदर्दी जतायेंगे जबकी यदि कोई सुखी है तो आपको उससे हमेशा जलन होगी.इसलिये ज्ञानी लोग अपना सुख कभी प्रकट नहीं करते. वे आपको जलने का कोई अवसर नहीं देते. पेट भरा हो तो आप पेट में गैस की शिकायत कीजिये. पेट खाली हो तो देश में भोजन की समस्या पर विस्तार से भाषण दे डालिये जब तक की आपके लिये भोजन की व्यवस्था ना हो जाये.यदि आप सिंगापुर से शौपिंग करके लौटे हैं तो कहिये ‘क्या करें ऑस्ट्रेलिया नहीं जा पाये इस बार’ और यदि लोगों की सहानुभूतियों के बल पर ऑस्ट्रेलिया चले ही गये तो कहिये ‘यू.एस. जाने की इच्छा थी लेकिन क्या करें’…. और यदि यू. एस. भी पहुंच जायें तो अपने गांव को याद कर रोने लगिये. यानि आपको कोई मौका नहीं जाने देना है दुखी होने का.

किसी पुराने कवि ने कहा है.

सुखिया सब संसार है , खाये और सोये
दुखिया दास कबीर है , जागे और रोये

इन पंक्तियों का सार यही है कि जिन्होने दुखी होने का पर्याप्त अभ्यास कर लिया वह अब सुखी हो गये और अब वह चैन से खा-पी कर सो रहे हैं. लेकिन कबीर दास जी जो अभी इस क्षेत्र में नये हैं वो जाग जाग कर दुखी होने का अभ्यास कर रहे हैं ताकि वह भी सुख को प्राप्त कर खा-पी कर आराम से सो सकें.

इसलिये मेरा निवेदन है कि दुनिया के सभी लोग दुखी हों. आमीन.

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: हास्य, हास्य व्यंग्य, काकेश