कुछ दिनों पहले मैने आपके सामने “खोया-पानी” नामक व्यंग्य उपन्यास का जिक्र किया था. फुरसतिया जी ने बताया कि यह उपन्यास उन्होने भी मँगवा लिया है. उन्होने इसे नैट पर डालने की इच्छा भी जताई. जब से मैने इस उपन्यास को पढ़ना शुरु किया है तब से मेरी भी यही इच्छा थी.मुझे आप सबको [आगे पढ़ें.....]
अभी अभी चिट्ठाजगत डॉट इन की आचार संहिता पढ़ी. मेरे विचार से हर संस्था को ये हक है कि वो अपनी आचार संहिता बनाये. ये उस संस्था से जुड़े लोगों को सोचना है कि वो उस आचार संहिता को माने या ना मानें. चिट्ठाकारी या ब्लॉगिंग एक अलग तरह का माध्यम है जिसका चरित्र [आगे पढ़ें.....]
अशोक पांडे जी कबाड़खाने के कर्ताधर्ता कबाड़ी हैं. जाने कहाँ कहाँ से कबाड़ उठा के ले आते हैं और पटक देते हैं.एक दिन इसी कबाड़खाने में हम पहुंचे तो हम भी इस दुकान के हिस्सेदार बन गये.यहाँ तक तो ठीक था. लेकिन देखते क्या हैं पिछ्ले कुछ दिनों से हमारे ब्लॉग पर जो लोग [आगे पढ़ें.....]
आज जब अनिल जी ने अपनी पोस्ट लिखी तो मुझे लता जी का गाया एक बंगाली गाना याद आ गया. ” एक बार बिदाई दे माँ घूरे आशी”. यह गाना जब पहली बार सुना था तो बहुत कुछ समझ में नहीं आया था लेकिन फिर भी आंखों में आंसू थे. उसके बाद तो यह [आगे पढ़ें.....]
आजकल ब्लॉगजगत में कम्यूनिज्म पर बहस जोरों पर है. कोई इसे बाल विवाह से जोड़ रहा है तो कोई तलाक से.इसी बहाने आज कुत्ताज्ञान ब्रह्मज्ञान भी मिल गया.
मैं जब कम्यूनिज्म पर कुछ पढ़ता हूँ या फिर किसी के मुँह से कुछ सुनता हूँ तो कुछ भी कह पाने की स्थिति [आगे पढ़ें.....]
आलोक जी-9-2-11 के बारे में दो चीजें सबको मालूम ही होंगी. एक कि वो अक्सर टेलीग्राफिक पोस्ट लिखते हैं और दूसरा वो कहीं भी गलत हिन्दी देखते हैं तो टोक जरूर देते हैं. लेकिन आज सुबह से उनका एक और रूप सामने आ रहा है.आपने भी नोट किया हो. वो रूप है एक सफल [आगे पढ़ें.....]
समीर जी का उत्साह बढ़ाने में कोई सानी नहीं. कल की पोस्ट पर उन्होने एक अच्छी सी टिप्पणी की जिससे फिर से ऊर्जा मिली कि बांकी भाग को भी टाइप कर आप तक पहुंचाऊं.
थक गये हैं, थोड़ा विश्राम प्राप्त करें मित्र.
कार्य इतना उत्तम हैं कि यह कह पाना संभव नहीं कि थक गये हैं [आगे पढ़ें.....]
कल नगई महरा का पहला भाग प्रस्तुत किया था. आज पेश है उसी का दूसरा भाग.कृपया पूरी कविता पढ़ें आप निश्चित ही कविता के मर्म में उतर पायेंगे.य़ह एक कविता है जिसके अन्दर समाज की एक कहानी भी साथ साथ चल रही है और दिख रहा है समूचा गाँव.आइये आनन्द लें.
तब मेरी उमर [आगे पढ़ें.....]
‘नगई महरा’ त्रिलोचन की एक सशक्त रचना है.पहलू में त्रिलोचन की कविताओं में भी इस कविता का जिक्र हुआ था. यह एक लंबी कविता है जिसे दो भागों में पेश कर रहा हूँ. इस कविता में ग्रामीण जीवन अपने पूरे यौवन के साथ उतर गया है. गांव के आम शब्द इस कविता में इतने [आगे पढ़ें.....]
दुखी होना आपकी सामाजिक चेतना का लक्षण है. अवसरवादी के लिये दुख लाभ प्राप्ति का मार्ग है.आप अपनी सुविधानुसार दुखी हो सकते हैं.यदि आपके पास एक अदद नौकरी है तो इस बात पर दुखी होइये कि आपका बॉस आपको बहुत परेशान करता है.सुबह से शाम तक आपको एक कोल्हू के बैल की तरह काम [आगे पढ़ें.....]
आपके सदविचार