Archive for October, 2007

नगई महरा: त्रिलोचन

‘नगई महरा’ त्रिलोचन की एक सशक्त रचना है.पहलू में त्रिलोचन की कविताओं में भी इस कविता का जिक्र हुआ था. यह एक लंबी कविता है जिसे दो भागों में पेश कर रहा हूँ. इस कविता में ग्रामीण जीवन अपने पूरे यौवन के साथ उतर गया है. गांव के आम शब्द इस कविता में इतने सहज [...]

दुखिया दास कबीर है

दुखी होना आपकी सामाजिक चेतना का लक्षण है. अवसरवादी के लिये दुख लाभ प्राप्ति का मार्ग है.आप अपनी सुविधानुसार दुखी हो सकते हैं.यदि आपके पास एक अदद नौकरी है तो इस बात पर दुखी होइये कि आपका बॉस आपको बहुत परेशान करता है.सुबह से शाम तक आपको एक कोल्हू के बैल की तरह काम करना [...]

सभी संगीतप्रेमी चिट्ठाकारों से निवेदन

हिन्दी के कई चिट्ठाकार अब तकनीकी रूप से कुशल हो गये हैं. अपने चिट्ठों में तरह तरह के विजेट और चित्र लगाने लगे हैं. यह एक सुखद परिवर्तन है. इधर कुछ चिट्ठाकारों ने अपने चिट्ठों में मधुर संगीत प्रदान करने वाला कोई विजेट भी लगाया है. जो चिट्ठा खुलते ही मधुर संगीत से आपका स्वागत [...]

दुखी होने के फायदे

कल एक महान विचारक की पुरानी डायरी हाथ लग गयी. यह सोच के डायरी खोली कि शायद उसमें किसी घोटाले की चर्चा होगी लेकिन उसमें तो महान चिंतन के अद्भुत सूत्र थे.प्रस्तुत हैं उसी डायरी के कुछ अंश..
दुखी होना मेरी मजबूरी ही नहीं मेरा पेशा भी है. मैं अक्सर अपनी सुविधानुसार दुखी हो जाता [...]

धीरे धीरे ठंड बढ़ने लगी है

धीरे धीरे ठंड बढ़ने लगी है. देश के खाये पिये लोग खुश हैं.वे ठंड का इंतजार करते हैं. ठंड उन्हे अच्छे कपड़े पहनने का अवसर देती है. ठंड में आपकी पाचन क्षमता बढ़ जाती है तो कुछ लोग इसी को और अधिक खाने का अवसर बना लेते हैं.वैसे खाने वाले लोग किसी भी मौसम में [...]

बिस्तरा है न चारपाई है:त्रिलोचन

बिस्तरा    है   न   चारपाई    है,जिन्दगी   खूब  हमने  पायी   है।
कल अंधेरे में जिसने सर काटा,नाम  मत  लो  हमारा   भाई है।
ठोकरें  दर-ब-दर  की थी हम थे,कम नहीं हमने मुँह की खाई है।
कब  तलक  तीर  वे  नहीं   छूते,अब  इसी  बात  पर   लड़ाई   है।
आदमी    जी  रहा  है  मरने कोसबसे    ऊपर    यही  सचाई है।
कच्चे ही हो अभी त्रिलोचन तुम धुन [...]

चम्पा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती:त्रिलोचन

कवि त्रिलोचन बीमार हैं. उनके बारे में ब्लॉग जगत में लिखा भी जा रहा हैं. कुछ दिनों पहले मैने एक पोस्ट लिखी थी जिसमें त्रिलोचन की कुछ कविताऎं प्रस्तुत की थी. कल अतुल ने उसी पोस्ट पर टिप्पणी कर त्रिलोचन के बारे में फणीश्वर नाथ रेणु के संस्मरण के बारे में बताया.उसे पढ़ा और फिर [...]

गाली,गिनती और गंदा लतीफा तो अपनी मादरीजबान में ही मजा देता है

[ री-कैप : "खोया पानी" यह है उस व्यंग्य उपन्यास का नाम जो पाकिस्तान के मशहूर व्यंग्यकार मुश्ताक अहमद यूसुफी की किताब आबे-गुम का हिन्दी अनुवाद है. इस पुस्तक के अनुवाद कर्ता है 'लफ़्ज' पत्रिका के संपादक श्री 'तुफैल चतुर्वेदी' जी. पुस्तक क्या है हास्य का पटाख़ा है और इतना महीन व्य़ंग्य की आपके समझ [...]