हिन्दी के कई चिट्ठाकार अब तकनीकी रूप से कुशल हो गये हैं. अपने चिट्ठों में तरह तरह के विजेट और चित्र लगाने लगे हैं. यह एक सुखद परिवर्तन है. इधर कुछ चिट्ठाकारों ने अपने चिट्ठों में मधुर संगीत प्रदान करने वाला कोई विजेट भी लगाया है. जो चिट्ठा खुलते ही मधुर संगीत से आपका स्वागत करता है. स्वागत करना अच्छी बात है लेकिन मुझ जैसे कई लोगों को इससे परेशानी का सामना करना पड़ सकता है.

मैं कई चिट्ठे ऑफिस में पढ़ता हूँ. और जब कभी इस तरह के चिट्ठे पर जाता हूँ तो जो संगीत बजता है वो मेरे अलावा भी कई लोगों को सुनायी पड़ जाता है.तो तुर्ंत वह चिट्ठा बन्द कर देना पड़ता है. हर बार अपने स्पीकर को म्यूट करना संभव नहीं हो पाता. इससे कई बार अटपटा भी लगता है. इसलिये मेरा ऎसे संगीतप्रेमी चिट्ठाकारों से निवेदन है कि वो अपने स्वागतगीत को स्वत:चालित ना रखें. हमारे पास विकल्प हो कि यदि हम चाहें तो आपके स्वागत गीत का आनंद ले सकें.

आशा है आप लोग ध्यान देंगे.

चलिये अब आपने इतना पढ़ ही लिया है तो एक मुक्तिबोध की कविता भी पढ़ लें.ताकि आपको ये ना लगे की बेकार ही यहाँ आये.

नाश देवता

घोर धनुर्धर, बाण तुम्हारा सब प्राणों को पार करेगा,
तेरी    प्रत्यंचा  का  कंपन  सूनेपन  का  भार   हरेगा
हिमवत, जड़, निःस्पंद हृदय के अंधकार में जीवन-भय है
तेरे तीक्ष्ण बाणों की नोकों पर जीवन-संचार करेगा ।

तेरे क्रुद्ध वचन बाणों की गति से अंतर में उतरेंगे,
तेरे क्षुब्ध हृदय के शोले उर की पीड़ा में ठहरेंगे
कोपुत तेरा अधर-संस्फुरण उर में होगा जीवन-वेदन
रुष्ट दृगों की चमक बनेगी आत्म-ज्योति की किरण सचेतन ।

सभी उरों के अंधकार में एक तड़ित वेदना उठेगी,
तभी सृजन की बीज-वृद्धि हित जड़ावरण की महि फटेगी
शत-शत बाणों से घायल हो बढ़ा चलेगा जीवन-अंकुर
दंशन की चेतन किरणों के द्वारा काली अमा हटेगी ।

हे रहस्यमय, ध्वंस-महाप्रभु, जो जीवन के तेज सनातन,
तेरे अग्निकणों से जीवन, तीक्ष्ण बाण से नूतन सृजन
हम घुटने पर, नाश-देवता ! बैठ तुझे करते हैं वंदन
मेरे सर पर एक पैर रख नाप तीन जग तू असीम बन ।

— गजानन माधव मुक्तिबोध

कल एक महान विचारक की पुरानी डायरी हाथ लग गयी. यह सोच के डायरी खोली कि शायद उसमें किसी घोटाले की चर्चा होगी लेकिन उसमें तो महान चिंतन के अद्भुत सूत्र थे.प्रस्तुत हैं उसी डायरी के कुछ अंश..

दुखी होना मेरी मजबूरी ही नहीं मेरा पेशा भी है. मैं अक्सर अपनी सुविधानुसार दुखी हो जाता हूँ. दुखी होना मेरे लिये एक अदद सुख का टुकड़ा अपने नाम कर लेने का माध्यम है. आजकल जो ज्यादा दुखी है वो उतने ही अधिक सुख के टुकड़े नये नये फ्लैट्स के माध्यम से अपने नाम बुक करा रहा है. दुखी होना सुख-सुविधा नामक चिड़िया को संवेदना के ढेले से मार अपने बैक बैलेंस जैसे किसी पिजरे में कैद कर लेने में सहायक भी है. आप जितना ज्यादा सुखी हों आपको दुखी होने के उतने ही ज्यादा अवसर भी मिलेंगे और कारण भी. हर नया दुख आपके लिये सुख के नये द्वार खोलेगा.

ये अच्छा समय है जब आप किसी भी स्थिति , परिस्थिति , विषय , घटना पर दुखी हो सकते हैं. आप अच्छी तरह से अंग्रेजी बोल सकते हों तो आप हिन्दी की दशा-दिशा पर आंसू बहा सकते हैं.अंग्रेजी में भाषण देके हिन्दी के प्रति अपने प्रेम का इज़हार कर सकते हैं. अपनी खराब हिन्दी को अपनी व्यवसायिक मजबूरी की आड़ में छिपा सकते हैं. अंग्रेजी के शब्दों को अपनी बोलचाल में शामिल कर आप अपनी विद्वता का ढोल पिटवा कर अपने हिन्दी दुख का प्रदर्शन कर सकते हैं.जितना दुख आप प्रदर्शित करेंगे उतना ही हिन्दी सेवा का मेवा आप प्राप्त कर सकते हैं. पिछले कई सालों से लोग ऎसा कर रहे हैं और आने वाले कई सालों तक लोग ऎसा करते रहेंगे.

दुखी होना और सहानुभूति बटोरना एक ही क्रिया के दो अलग अलग रूप हैं. या यूँ कहें कि एक क्रिया है तो दूसरी प्रतिक्रिया. लेकिन दोनों का अस्तित्व बहुत महत्वपूर्ण है. आप का दुखी होने का अभिनय उतना ही सफल है जितनी सहानुभुति आप अर्जित कर पा रहे हैं. आप के दुखी होने का फल लोगों के सहानुभूति के प्रदर्शन में हैं. जितनी सहानुभूति आप अर्जित कर पायेंगे उतना ही खुद को सुख के करीब पायेंगे.

दुनिया का हर व्यक्ति दुखी होने की योग्यता रखता है. आप दलित हैं तो सवर्णो को गाली दे सकते हैं उनके व्यवहार पर दुखी हो सकते हैं. उनके पूर्वजों द्वारा आपके पूर्वजों पर किये गये अत्याचारों का बदला आप आरक्षण की तलवार से आने वाली कई पीढ़ियों तक ले सकते हैं.हर अवसर पर सवर्णों को लतियाना और अपने हर दुख का कारण सवर्णों द्वारा की गयी किसी गलती पर थोपना आपके व्यक्तित्व के दो प्रमुख लक्षण होने चाहिये. आप सवर्ण है तो आरक्षण के खिलाफ बोलकर दुखी हो सकते हैं.आप सहित आपके जितने भी अयोग्य रिश्तेदार सरकारी नौकरी प्राप्त करने में असफल रहे उन सबका का ठीकरा आप आरक्षण के सर पर फोड़ सकते हैं.आप आरक्षण के खिलाफ मोर्चा भी खोल सकते हैं,आत्मदाह की धमकी भी दे सकते हैं.

आप महिला हैं तो पुरुषों द्वारा किये जा रहे हर अच्छे और बुरे काम को कोसकर दुखी हो सकती हैं. आपकी हर परेशानी के मूल में कोई ना कोई पुरुष है. आप उस पुरुष को ढूंढ निकालिये और उसकी कारिस्तानियों पर दुखी होकर सहानुभूति की बेल पर चढ़ सुख सुविधा के नये नये फलों का स्वाद चखिये. आपके लड़की होने से आपको अतिरिक्त लाभ है.दुखी होने की कला हर औरत को विरासत में मिलती है. दुखी होना हर औरत का जन्मसिद्ध अधिकार है इसलिये आपके आंसू आपके आंखो के एकदम किनारे पर निवास करते हैं जिन्हे आप बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के अपनी इच्छानुसार जब चाहें तब निकाल सकती हैं. आधे से ज्यादा पुरुष आपके दुखी होने का अभिनय करने से पहले ही अपनी संवेदनाओं के रुमाल ले के सहानुभूति प्रदर्शन के लिये तैयार बैठे रहते हैं.कुछ अन्य ,जो अपने पुरुषत्व के अहम के कारण अपने मन को मार कर अपनी संवेदनाओं के प्रदर्शन में संकोच करते हैं, वो भी आपकी आंसुओं की अनवरत धारा को देखकर अपने रुमालों को अपनी जेबों में नहीं रख पायेंगे.आपके लिये बाजी जीतना आसान है लेकिन ध्यान रहे आप लक्ष्य केवल रुमाल हासिल करना नहीं है इसलिये भावनाओं के अतिरेक में ना बहें.अपनी नजर पुरुष की जेब के उस पर्स पर बनाये रखें जिसमें सुख-सुविधा रूपी गहने रखे गये हैं. यदि आप पुरुष है तब भी आप महिलाओं की स्थिति पर दुखी हो सकते हैं. घर में पत्नी को पीट कर हुई खुशी को महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों पर भाषण देकर मिटा सकते हैं.   

कल भी जारी रहेगा……….

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: हास्य, हास्य व्यंग्य, काकेश

धीरे धीरे ठंड बढ़ने लगी है. देश के खाये पिये लोग खुश हैं.वे ठंड का इंतजार करते हैं. ठंड उन्हे अच्छे कपड़े पहनने का अवसर देती है. ठंड में आपकी पाचन क्षमता बढ़ जाती है तो कुछ लोग इसी को और अधिक खाने का अवसर बना लेते हैं.वैसे खाने वाले लोग किसी भी मौसम में खाने का तरीका ढूंढ ही लेते हैं. जैसे पीने वाले लोग किसी भी अवसर पर पीने का बहाना ढूंढते हैं. खाने-पीने वाले लोग हर मौसम को एक दृष्टि से देखते हैं पर ठंड उन्हे अपनी दृष्टि को और व्यापक बनाने की प्रेरणा देती है. कुछ अपने बढ़े हुए वजन से इसी ठंड में निजात पाना चाहते हैं. ठंड बहुत अच्छी है जो हमें इस तरह के अवसर देती है.

धीरे धीरे ठंड बढ़ने लगी है.वो लोग जो अभी तक किसी भी फुटपाथ,किसी भी डिवाइडर या किसी भी पुल के नीचे चैन से सो जाते थे उन्हे अब नया घर तलाशना होगा. वो अधनंगे लोग जो किसी तरह से गुदड़ियों में अपनी इज्जत बचाये घूम रहे हैं उन्हे अब इज्जत के साथ साथ खुद को भी बचाना होगा. ठंड उनके शरीर पर अब फिर से वार करेगी वैसे ही जैसे पिछ्ले कई सालों से कर रही है.वैसे ही जैसे कुछ दिनों पहले तक सावन कर रहा था , बारिश कर रही थी , बाढ कर रही थी. उन्हे फिर से रात भर जागना होगा,सुबह कोई काम तलाशने से पहले.

धीरे धीरे ठंड बढ़ने लगी है. बजार में कितनी नई नई तरह के गरम कपड़े आये हैं. नये तरह के कोट , जैकेट , उनी स्वेटर , मफ़लर , टोपी और भी ना जाने क्या क्या. लोग ठंड के लिये अभी से खरीदकारी करने निकल चुके हैं. अपने क्रेडिट कार्ड का उपयोग कर आज वो कोई इम्पोर्टेड जैकेट लेने की सोच रहे हैं.टोपी से सर को ढंककर,मफ़लर से कानों को ढंककर वो जब ऑफिस को निकलेंगे तो कितना मजा आयेगा.पिछ्ले साल उनको इस तरह देख कर मुन्नू कितने तो प्यार से बोला था ‘पापा आप तो बिल्कुल उल्लू लग रहे हैं’ और वो कितने खुश हुए थे, असली मजा तो ठंड का ही है. देश प्रगति पर है. गीजर के गरम पानी से नहाने का सुख तो आप ठंड में ही उठा सकते हैं.

धीरे धीरे ठंड बढ़ने लगी है.कुछ लोगों की चिंताऎं भी इसके साथ साथ बढ़ने लगी है. अपने चार महीने के बच्चे को इस ठंड से बचाने के लिये वो अधनंगी औरत चिंतित है. वो दो साल पहले की घटना को दुहराना नहीं चाहती जिसमें उसका एक बच्चा इसी तरह की ठंड की भेंट चढ़ गया था. वो कपड़े इकट्टा कर रही है.कुछ पुरानी फटी धोतियां शायद उसकी मालकिन दे देगी. वो इस बार मालकिन को बोलेगी कि कोई पुराना ऊनी कपड़ा भी दे दे.वो ठंड के बारे में सोच कर दुखी हो रही है. सुबह सुबह ठंडे पानी से रात के जूठे बर्तन बर्फ जैसे ठंडे पानी से जब वह मांजती है तो पूरा शरीर सिहर जाता है. हाथ अकड़ जाते हैं. लेकिन उसे मालकिन के उठने से पहले बर्तन मांजने होंगे नहीं तो कहीं मालकिन नाराज होकर हमेशा की तरह चिल्लाने लगेंगी तो फिर उसे ऊनी कपड़े नहीं देंगी.

धीरे धीरे ठंड बढ़ने लगी है.गाजर का हलवा,गजक,मूंगफली आहा ये सब ठंड के ही तो तोहफे हैं.गुनगुनी रजाई के अन्दर बैठकर प्लाज्मा टी.वी पर पिक्चर देखना कितना सुखद है. जिनके शरीर पर स्वेटर है,जेब में पैसे है, खाने का पर्याप्त स्कोप है उसे ठंड से खूबसूरत कोई मौसम नहीं लगता. वह इस मौसम में कविता भी करता है. बिरयानी और व्हिस्की की पर्याप्त व्यवस्था होने पर इस ठंड के ऊपर किसी भी कॉंफ्रेंस में भाषण भी दे सकता है.

धीरे धीरे ठंड बढ़ने लगी है.हमेशा की तरह रात सिर्फ सुबह उगने वाले सूरज की आशा में काटी जायेगी.वही सूरज, जिसे गरमी में जी भर कोसा करते थे ,अभी एकमात्र सहारा है.घुटनों को छाती से चिपकाकर बैठने से ठंड को कम करने का प्रयास किया जायेगा.एक अदद अलाव जलाने के लिये सूखी लकड़ियों की तलाश की जायेगी. कड़कड़ाती ठंड का किटकिटाते दांतो और बंधी हुई मुट्ठी के जरिये ही सामना करना होगा. वो प्रार्थना कर रहे हैं कि काश इस बार फिर चुनाव हो जाते. दो साल पहले जब चुनाव हुए थे किसी नेता ने कंबल बांटे थे.वो कंबल कितने अच्छे थे वो नेता कितना अच्छा था. सुना है वो जीत गया इसीलिये तब से दिखायी नहीं दिया. खैर चुनाव हो जायें तो वो फिर आयेगा और कंबल बांटेगा.

धीरे धीरे ठंड बढ़ने लगी है.एक ही मौसम कितने रूप दिखाता है ना. दोष किसका है क्या मौसम का ?

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: हास्य व्यंग्य, काकेश

बिस्तरा    है   न   चारपाई    है,
जिन्दगी   खूब  हमने  पायी   है।

कल अंधेरे में जिसने सर काटा,
नाम  मत  लो  हमारा   भाई है।

ठोकरें  दर-ब-दर  की थी हम थे,
कम नहीं हमने मुँह की खाई है।

कब  तलक  तीर  वे  नहीं   छूते,
अब  इसी  बात  पर   लड़ाई   है।

आदमी    जी  रहा  है  मरने को
सबसे    ऊपर    यही  सचाई है।

कच्चे ही हो अभी त्रिलोचन तुम
धुन कहाँ वह सँभल के आई है।

– त्रिलोचन ( “गुलाब और बुलबुल” से )

कुछ सॉनेट ‘दिगंत’ से

सिपाही और तमाशबीन

घायल हो कर गिरा सिपाही और कराहा।
         एक तमाशबीन दौड़ा आया। फिर बोला,
        ‘‘योद्धा होकर तुम कराहते हो, यह चोला
एक सिपाही का है जिस को सभी सराहा

करते हैं, जिस की अभिलाषा करते हैं, जो
         दुर्लभ है, तुम आज निराशावादी-जैसा
        निन्द्य आचरण करते हो।’’ कहना सुन ऐसा
उधर सिपाही ने देखा जिस ओर खड़ा हो

उपदेशक बोला था। उन ओठों को चाटा
सूख गए थे जो, स्वर निकला, ‘‘प्यास !’’ खड़ा ही
    सुनने वाला रहा। सिपाही पड़ा पड़ा ही
करवट हुआ, रक्त अपना पी कुछ दुख काटा—
        ‘‘जाओ चले, मूर्ख दुनिया में बहुत पड़े हैं।
         उन्हें सिखाओ हम तो अपनी जगह अड़े हैं।’’

सॉनेट का पथ

इधर त्रिलोचन सॉनेट के ही पथ पर दौड़ा;
        सॉनेट, सॉनेट, सॉनेट, सॉनेट; क्या कर डाला
        यह उस ने भी अजब तमाशा। मन की माला
गले डाल ली। इस सॉनेट का रस्ता चौड़ा

अधिक नहीं है, कसे कसाए भाव अनूठे
        ऐसे आएँ जैसे क़िला आगरा में जो
        नग है, दिखलाता है पूरे ताजमहल को;
गेय रहे, एकान्विति हो। उस ने तो झूठे
ठाटबाट बाँधे हैं। चीज़ किराए की है।
    स्पेंसर, सिडनी, शेक्सपियर, मिल्टन की वाणी
    वर्ड्सवर्थ, कीट्स की अनवरत प्रिय कल्याणी
स्वर-धारा है, उस ने नई चीज़ क्या दी है।

    सॉनेट से मजाक़ भी उसने खूब किया है,
    जहाँ तहाँ कुछ रंग व्यंग्य का छिड़क दिया है।
 

प्यार

जब भौंरे ने आकर पहले पहले गाया
        कली मौन थी। नहीं जानती थी वह भाषा
        इस दुनिया की, कैसी होती है अभिलाषा
इस से भी अनजान पड़ी थी। तो भी आया

जीवन का यह अतिथि, ज्ञान का सहज सलोना
        शिशु, जिस को दुनिया में प्यार कहा जाता है,
        स्वाभिमान-मानवता का पाया जाता है
जिस से नाता। उस में कुछ ऐसा है टोना

जिस से यह सारी दुनिया फिर राई रत्ती
        और दिखाई देने लगती है। क्या जाने
        कौन राग छाती से लगता है अकुलाने,
इंद्रधनुष सी लहराती है पत्ती पत्ती।

        बिना बुलाए जो आता है प्यार वही है।
        प्राणों की धारा उस में चुपचाप बही है।

 

त्रिलोचन श्रंखला के कुछ और लेख…

1. त्रयी के त्रिलोचन की कवितायें.

2. चम्पा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती:त्रिलोचन

कवि त्रिलोचन बीमार हैं. उनके बारे में ब्लॉग जगत में लिखा भी जा रहा हैं. कुछ दिनों पहले मैने एक पोस्ट लिखी थी जिसमें त्रिलोचन की कुछ कविताऎं प्रस्तुत की थी. कल अतुल ने उसी पोस्ट पर टिप्पणी कर त्रिलोचन के बारे में फणीश्वर नाथ रेणु के संस्मरण के बारे में बताया.उसे पढ़ा और फिर त्रिलोचन की कविताऎं जैसे नजर के सामने घूम गयीं.

जब से पहलू में त्रिलोचन की कविताओं के बारे में पढ़ा था तब से ही ‘नगई महरा ‘ और ‘चंपा काले-काले अक्षर नहीं चीन्हती’ कविताऎं दिमाग में थी.फिर चन्द्रभूषण जी ने  इन कविताओं का अनुरोध भी कर दिया था.

अब अगर मौका मिले तो ‘चंपा काले-काले अक्षर नहीं चीन्हती’ और ‘नगई महरा’ की मुंहदिखाई भी करा दो…

बोधी भाई का अनुरोध था

हो सके तो “बिस्तरा है न चारपाई है” भी छापें ।

तो कल शाम को जब मन त्रिलोचन-मय था तो ये तीनों कविताऎं ढूंढने का खयाल आया…और घर में ही तीनों कविताऎं मिल गयी.. तो लीजिये आज प्रस्तुत है ‘चंपा काले-काले अक्षर नहीं चीन्हती’ बांकी दो कविताऎं भी जल्दी ही लाता हूँ.

चम्पा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती
मैं जब पढ़ने लगता हूँ वह आ जाती है
खड़ी खड़ी चुपचाप सुना करती है
उसे बड़ा अचरज होता है:
इन काले चिन्हों से कैसे ये सब स्वर
निकला करते हैं.

चम्पा सुन्दर की लड़की है
सुन्दर ग्वाला है : गाय भैसे रखता है
चम्पा चौपायों को लेकर
चरवाही करने जाती है

चम्पा अच्छी है
         चंचल है
न ट ख ट भी है
कभी कभी ऊधम करेती है
कभी कभी वह कलम चुरा देती है
जैसे तैसे उसे ढूंढ कर जब लाता हूँ
पाता हूँ – अब कागज गायब
परेशान फिर हो जाता हूँ

चम्पा कहती है:
तुम कागद ही गोदा करते हो दिन भर
क्या यह काम बहुत अच्छा है
यह सुनकर मैं हँस देता हूँ
फिर चम्पा चुप हो जाती है

उस दिन चम्पा आई , मैने कहा कि
चम्पा, तुम भी पढ़ लो
हारे गाढ़े काम सरेगा
गांधी बाबा की इच्छा है -
सब जन पढ़ना लिखना सीखें
चम्पा ने यह कहा कि
मैं तो नहीं पढ़ुंगी
तुम तो कहते थे गांधी बाबा अच्छे हैं
वे पढ़ने लिखने की कैसे बात कहेंगे
मैं तो नहीं पढ़ुंगी

मैने कहा चम्पा, पढ़ लेना अच्छा है
ब्याह तुम्हारा होगा , तुम गौने जाओगी,
कुछ दिन बालम सँग साथ रह चला जायेगा जब कलकत्ता
बड़ी दूर है वह कलकत्ता
कैसे उसे सँदेसा दोगी
कैसे उसके पत्र पढ़ोगी
चम्पा पढ़ लेना अच्छा है!

चम्पा बोली : तुम कितने झूठे हो , देखा ,
हाय राम , तुम पढ़-लिख कर इतने झूठे हो
मैं तो ब्याह कभी न करुंगी
और कहीं जो ब्याह हो गया
तो मैं अपने बालम को संग साथ रखूंगी
कलकत्ता में कभी न जाने दुंगी
कलकत्ता पर बजर गिरे।

– त्रिलोचन ( उनकी पुस्तक धरती से जो 1945 में प्रकाशित हुई थी)

[ री-कैप : "खोया पानी" यह है उस व्यंग्य उपन्यास का नाम जो पाकिस्तान के मशहूर व्यंग्यकार मुश्ताक अहमद यूसुफी की किताब आबे-गुम का हिन्दी अनुवाद है. इस पुस्तक के अनुवाद कर्ता है 'लफ़्ज' पत्रिका के संपादक श्री 'तुफैल चतुर्वेदी' जी. पुस्तक क्या है हास्य का पटाख़ा है और इतना महीन व्य़ंग्य की आपके समझ आ जाये तो मुँह से सिर्फ वाह वाह ही निकलती है. इस उपन्यास की टैग लाइन है "एक अद्भुत व्यंग्य उपन्यास" जो इस उपन्यास पर सटीक बैठती है.]

khoya_pani_front_cover पिछ्ले भाग में आपको बताया था कि यह उपन्यास ऎसे अनगिनत जुमलों से भरा है जो आपको सोचने पर बाध्य कर देते हैं. आइये कुछ और पढ़ें.

एक मजेदार पात्र हैं किबला.देखिये कैसे हैं.

किबला मुंहफट, बदतमीज़ मशहूर ही नहीं थे, थे भी। वो दिल से, बल्कि बेदिली से भी, किसी की इज़्जत नहीं करते थे। दूसरे को ज़लील करने का कोई-न-कोई कारण ज़ुरूर निकाल लेते। मिसाल के तौर पर अगर किसी की उम्र उनसे एक महीना भी कम हो तो उसे लौंडा कहते और अगर एक साल ज़ियादा तो बुढ़ऊ।

वो हमेशा मेरे कुछ ना कुछ लगते थे।जिस जमाने में मेरे ससुर नहीं बने थे तो फूफा हुआ करते थे और फूफा बनने से पहले मैं उन्हें चचा हुजूर कहा करता था। इससे पहले भी वो मेरे कुछ और जुरूर लगते होंगे, मगर उस वक़्त मैंने बोलना शुरु नहीं किया था। हमारे यहाँ मुरादाबाद और कानपुर में रिश्ते-नाते उबली हुई सिवइयों की तरह उलझे और पेच-दर-पेच गुंथे हुए होते हैं।

किबला के बारे में बताते हुए वह आगे कहते हैं.

मिज़ाज,ज़बान और हाथ, किसी पर काबू न था, हमेशा गुस्से से कांपते रहते। इसलिए ईंट,पत्थर, लाठी, गोली, गाली किसी का भी निशाना ठीक नहीं लगता था 

एक बार किबला के मकान की जांच करने के लिये जब अधिकारी आता है तो देखिये किबला उससे कैसे निपटते हैं.

अफसर ने कहा. ‘बड़े मियां सुना नहीं? एलॉटमेट आर्डर दिखाओ।’ किबला ने बड़ी शांति से अपने बायें पैर का सलीम-शाही जूता उतारा और उतने ही आराम से कि उसे, खयाल तक न हुआ कि क्या करने वाले हैं, उसके मुंह पर मारते हुए बोले ‘यह है यारों का एलॉटमेंट आर्डर! कार्बन कॉपी भी देखेंगे?’ उसने अब तक, यानी ज़लील होने तक, रिश्वत-ही-रिश्वत खायी थी, जूते नहीं खाये थे। फ़िर कभी इधर का रुख नहीं किया।

उनकी कहानी ‘हवेली’ का कथानक कोई 60-70 साल पहले का है. उस समय की परिस्थिति का वर्णन कहते हुए युसूफ़ी साहब कहते हैं.

जहां तक हमें याद पड़ता है, उन दिनों कुर्सी सिर्फ दो अवसरों पर निकाली जाती थी। एक तो जब हकीम, वैद्य,होम्योपैथ, पीर, फ़क़ीर और सयानों से मायूस हो कर डाक्टर को घर बुलाया जाता था। उस पर बैठ कर वो जगह-जगह स्टेथेस्कोप लगा कर देखता कि मरीज़ और मौत के बीच जो खाई थी, उसे इन महानुभावों ने अपनी दवाओं और ताबीज़, गंडों से किस हद तक पाटा है। उस समय का दस्तूर था कि जिस घर में मुसम्मी या महीन लकड़ी की पिटारी में रुई में रखे हुए पांच अंगूर आयें या सोला-हैट पहने डाक्टर और उसके आगे-आगे हटो-बचो करता हुआ तीमारदार उसका चमड़े का बैग उठाये आये तो पड़ोस वाले जल्दी-जल्दी खाना खा कर खुद को शोक व्यक्त करने और कन्धा देने के लिये तैयार कर लेते थे।


यह भी देखने में आया है कि कई बार ख़ानदान के दूर-पास के बुज़ुर्ग छठी-सातवीं क्लास तक फ़ेल होने वाले लड़कों की, संबंधें की निकटता व क्षमता के हिसाब से अपने निजी हाथ से पिटाई भी करते थे, लेकिन जब लड़का हाथ-पैर निकालने लगे और इतना सयाना हो जाये कि दो आवाज़ों में रोने लगे यानी तेरह, चौदह साल का हो जाये तो फिर उसे थप्पड़ नहीं मारते थे, इसलिये कि अपने ही हाथ में चोट आने और पहुंचा उतरने का अन्देशा रहता था, केवल चीख-पुकार, डांट से काम निकालते थे। हर बुज़ुर्ग उसकी सर्टिफाइड नालायकी की अपने झूठे शैक्षिक रिकार्ड से तुलना करता और नई पौध में अपनी दृष्टि की सीमा तक कमी और गिरावट के आसार देख कर इस सुखद निर्णय पर पहुंचता कि अभी दुनिया को उस जैसे बुज़ुर्ग की ज़ुरूरत है। भला वो ऐसी नालायक नस्ल को दुनिया का चार्ज देकर इतनी जल्दी कैसे विदा ले सकता है।

कुछ और मोती चुनिये इस किताब के.

विज्ञापन में मौलवी सैय्यद महुम्मद मुज्जफर ने जो कि स्कूल के संस्थापक, व्यवस्थापक, संरक्षक, कोषाध्यक्ष और ग़बनकर्ता का नाम था, सूचित किया था कि उम्मीदवार को लिखित आवेदन करने की आवश्यकता नहीं, अपनी डिग्री और नेकचलनी के दस्तावेशी सुबूत के साथ सुब्ह आठ बजे स्वयं पेश हो। बिशारत की समझ में न आया कि नेकचलनी का क्या सुबूत हो सकता है, बदचलनी का अलबत्ता हो सकता है। उदाहरण के लिये चालान, मुचलका, गिरफ्तारी-वारंट, सत्ता के आदेश की नक़्ल या थाने में दस-नम्बरी बदमाशों की लिस्ट। पांच मिनट में आदमी बदचलनी तो कर सकता है नेकचलनी का सुबूत नहीं दे सकता।

अपनी ग़ज़लों और शेरों का चयन.उन्होंने दिल पर पत्थर बल्कि पहाड़ रख कर किया था। शेर कितना ही घटिया और कमज़ोर क्यों न हो उसे स्वयं काटना और रद्द करना उतना ही मुश्किल है जितना अपनी औलाद को बदसूरत कहना या जंबूर से खुद अपना हिलता हुआ दांत उखाड़ना। ग़ालिब तक से ये पराक्रम न हो सका।

कभी अपने बुज़ुर्ग या बॉस या अपने से अधिक बदमाश आदमी को सही रास्ता बताने की कोशिश न करना।उन्हें ग़लत राह पर देखो तो तीन ज्ञानी बंदरों की तरह अंधे बहरे और गूंगे बन जाओ!

युसूफी साहब जब किसी स्थिति का वर्णन करते हैं तो उसमें सहज ही हास्य आ जाता है. उनके वर्णन इतने मजेदार हैं कि पूरा का पूरा दृश्य आपके आंखों के सामने से गुजर जाता है.देखिये उनका कलात्मक वर्णन. बिशारत जब इंटरव्यू के लिये प्रतीक्षा कर रहे थे तो देखिये क्या होता है…

नीम की छांव में एक उम्मीदवार जो खुद को इलाहाबाद का एल.टी. बताता था, उकडूं बैठा तिनके से रेत पर 20 का यंत्र बना रहा था। जिसके ख़ानों की संख्यायें किसी तरप़फ से भी गिनी जाये, जोड़ 20 आता था। स्त्री-वशीकरण तथा अफसर को प्रभावित करने के लिये यह यंत्र सर्वोत्तम समझा जाता था। कान के सवालिया निशान `?´ के अन्दर जो एक और सवालिया निशान होता है, उन दोनों के बीच उसने खस के इत्र का फाया रखा था। ज़ुल्फे-बंगाल हेयर ऑयल से की हुई सिंचाई के रेले, जो सर की तात्कालिक आवश्यकता से कहीं ज़ियादा थे, माथे पर बह रहे थे। दूसरा उम्मीदवार जो कालपी से आया था, खुद को अलीगढ़ का बीएड –बी.टी. बताता था। धूप का चश्मा तो समझ में आता था, मगर उसने गले में सिल्क का लाल स्कार्फ़ भी बांध रखा था जिसका इस चिलचिलाती धूप में यही उद्देश्य मालूम पड़ता था कि चेहरे से टपका हुआ पसीना सुरक्षित कर ले। अगर उसका वजन 100 पौंड कम होता तो वो जो सूट पहन कर आया था, बिल्कुल फ़िट आता। क़मीज के नीचे के दो बटन तथा पैंट के ऊपर के दो बटन खुले हुए थे सिर्फ़ सोलर हैट सही साइज़ का था।

उसी तरह जब उन्हे उपहार में चार तरबूज दिये जाते हैं तो ….

उतरती गर्मियों में चार तरबूज़ फटी बोरी में डलवा कर साथ कर दिये। हर क़दम पर निकल-निकल पड़ते थे। एक को पकड़ते तो दूसरा लुढ़क कर किसी और राह पर बदचलन हो जाता। जब बारी-बारी सब तड़क गये तो आधे रास्ते में ही बोरी एक प्याऊ के पास पटक कर चले आये। उनके बहते रस को एक प्यासा सांड, जो पंडित जुगल किशोर ने अपने पिताजी की याद में छोड़ा था, तब तक चाव और तल्लीनता से चाटता रहा जब तक एक अल्हड़ बछिया ने उसका ध्यान उत्तम से सर्वोत्तम की ओर भटका न दिया।

शायरों को लपेटने की इस किताब में विशेष व्यवस्था की गयी है.देखिये.

शेरो-शायरी या नॉविलों में देहाती ज़िन्दगी को रोमेंटिसाइज़ करके उसकी निश्छलता, सादगी, सब्र और प्राकृतिक सौन्दर्य पर सर धुनना और धुनवाना और बात है लेकिन सचमुच किसी किसान के आधे पक्के या मिट्टी गारे के घर में ठहरना किसी शहरी इन्टेलेक्चुअल के बस का रोग नहीं। किसान से मिलने से पहले उसके ढोर-डंगर, घी के फ़िंगर प्रिन्ट वाले धातु के गिलास, जिन हाथों से उपले पाथे उन्हीं हाथों से पकाई हुई रोटी, हल, दरांती, मिट्टी से खुरदुराये हुए हाथ, बातों में प्यार और प्याज़ की महक, मक्खन पिलायी हुई मूंछें सबसे एक ही वक़्त में गले मिलना पड़ता है।

फरमाया कि शायरों से यतीमखाने और स्कूल के चंदे के लिये अपील जरुर कीजियेगा। उन्हे शेर सुनाने में जरा भी शर्म नही आती, तो आपको इस पुण्यकार्य में काहे की शर्म।

कुछ और प्यास बुझा लें.

जो व्यक्ति हाथी की लगाम की तलाश करता रह जाये, वो कभी उस पर चढ़ नहीं सकता। जाम उसका है, जो बढ़कर खुद साकी को जाम-सुराही समेत उठा ले।

विदेश घूमने और देश से दूर रहने का एक लाभ ये देखा कि देश और देशवासियों से प्यार न केवल बढ़ जाता है, बल्कि अहैतुक हो जाता है-

गाली, गिनती और गंदा लतीफा तो अपनी मादरीजबान में ही मजा देता है।

पाकिस्तान की अफवाहों में सबसे बड़ी खऱाबी ये है कि सच निकलती हैं।

पाकिस्तान में जो लड़के पढ़ाई में फिसड्डी होते हैं, वो फौज में चले जाते हैं और जो फौज के लिए मेडिकली अनफिट होते हैं, वो कालिजों में प्रोफेसर बन जाते हैं।

हमारा ख्याल है कि इक्के का आविष्कार किसी घोड़े ने किया होगा, इसीलिये इसके डिजाइन में इस बात का ध्यान रखा गया है कि घोड़े से अधिक सवारी को परेशानी उठानी पड़े।

वस्तुत रास्ते नहीं बदलते इंसान बदल जाता है। सड़क कहीं नहीं जाती वो तो वहीं की वहीं रहती है मुसाफिर खुद कहां से कहां पहुंच जाता है। राह कभी गुम नहीं होती राह चलने वाले गुम हो जाते हैं।

कुछ और जुम्लों और यूसूफी साहब के बारे में जानने के लिये पिछ्ली पोस्ट देखें. यदि आप पुस्तक मगांना चाहें तो नीचे दिये पते से मंगा लें. पुस्तक की खूबियों को देखते हुए पुस्तक का मूल्य काफी कम है. मंगाते समय इस पोस्ट का ज़िक्र भी कर दें तो क्या पता ‘तुफ़ैल’ साहब कुछ विशेष डिस्काउंट की व्यवस्था कर दें यदि ना भी करें तब भी किताब खरीद कर पढ़ने योग्य तो है ही. 

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किताब डाक से मंगाने का पता:

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

 

 

पिछ्ले दिनों मैने आपको एक विमोचन समारोह पर आधारित कार्यक्रम के बारे में बताया था.खैर वो तो व्यंग्य था आज उस दिन खरीदी गई पुस्तक की समीक्षा करते हैं.

“खोया पानी” यह है उस व्यंग्य उपन्यास का नाम जो पाकिस्तान के मशहूर व्यंग्यकार मुश्ताक अहमद यूसुफी की किताब आबे-गुम का हिन्दी अनुवाद है. इस पुस्तक के अनुवाद कर्ता है ‘लफ़्ज’ पत्रिका के संपादक श्री ‘तुफैल चतुर्वेदी’ जी. पुस्तक क्या है हास्य का पटाख़ा है और इतना महीन व्य़ंग्य की आपके समझ आ जाये तो मुँह से सिर्फ वाह वाह ही निकलती है. इस उपन्यास की टैग लाइन है “एक अद्भुत व्यंग्य उपन्यास” जो इस उपन्यास पर सटीक बैठती है.

Mushtaq_Yusufi-1हिंदी में हास्य-व्यंग्य पढ़ने वालों के मुश्ताक अहमद यूसुफी एक अनजाना नाम है. लेकिन पाकिस्तान में मुश्ताक अहमद को श्रेष्ट व्यंग्यकारों की श्रेणी में रखा जाता है. मुश्ताक अहमद यूसुफी का जन्म 4 अगस्त 1923 को टोंक , राजस्थान में हुआ. उनके पिता अब्दुल करीम खान युसुफी जयपुर नगरपालिका के अध्यक्ष रहे थे.मुश्ताक अहमद यूसुफी की प्रारंभिक शिक्षा राजस्थान में हुई. बी.ए. उन्होने राजस्थान से किया जबकि दर्शन शास्त्र में एम.ए. और एल.एल.बी. अलीगढ़ युनिवर्सिटी से की. भारत के विभाजन के पश्चात उनका परिवार करांची,पाकिस्तान चला गया.उनका विवाह इदरीस फातिमा से हुआ. उनके दो पुत्र अरशद, सरोश और दो पुत्रियां रुकसान और सीमा हैं.

उनकी अब तक चार किताबें  प्रकाशित हुई हैं. चिराग़ तले (1961), ख़ाक़म-ब-दहन (1969), ज़रगुज़स्त (1976),आबे-गुम (1990). उन्हे पाकिस्तान में सितारा-ए-इम्तियाज, और हिलाल-ए-इम्तियाज पुरुस्कार मिले हैं.

आइये अब बात करते हैं “आबे-गुम” की. 1990 में प्रकाशित इस किताब का अनुवाद “तुफैल चतुर्वेदी” ने “खोया पानी” नाम से किया है. “तुफैल” एक पत्रिका “लफ़्ज” निकालते हैं.ये उपन्यास ‘लफ़्ज’ के अंक एक से बारह में पहले छ्प चुका है. यह उपन्यास एक ओर जहां हास्य से भरा है वहीं तत्कालीन समाज khoya_pani_front_coverकी विभिन्न स्थितियों परिस्थितियों पर तीखे व्य़ंग्य के माध्यम से विहंगम दृष्टि भी डालता है. इस उपन्यास के पात्र आम जनता के पात्र हैं.उनके विचार,सोच,स्थितियां आम नागरिक की जैसी ही हैं.हाँ कहीं कहीं लेखक ने अपनी फंतासी से ऎसे रंग जरूर भरे हैं जिससे स्थितियां हास्यास्पद बन जाती हैं लेकिन यह अटपटा नहीं लगता वरन कथानक का हिस्सा ही लगता है. व्य़ंग्य लेखन में अतिशयोक्ति युक्त वर्णन होना व्य़ंग्य उभारने में सहायक होता है.कुछ ऎसे ही वर्णन इस उपन्यास में भी हैं लेकिन वो भी काफी सहज लगते हैं. ऎसा नहीं लगता कि उनके लिये कोई अतिरिक्त मेहनत की गयी हो. उपन्यास की भाषा में जो रवानगी है उसमें पाठक बस बह जाता है. उपन्यास का अनुवाद भी कुछ इस ढंग से किया गया है कि लगता ही नहीं कि ये मूल रूप से यह उर्दू का उपन्यास है. ऎसा लगता है कि यह हिन्दी में लिखा उपन्यास ही है.  

अपनी भूमिका में व्यंग्यकार ज्ञान चतुर्वेदी लिखते हैं “युसुफ़ी साहब का यह उपन्यास तो जुम्लों का नायाब खजाना है और किसी भी व्यंग्यकार के लिये एक टेक्स्ट बुक की तरह भी है कि हम विश्लेषित करें कि कैसे ‘कही’ को ‘बतकही’ बनाया जा सकता है.” यह बात इस उपन्यास पर बिलकुल सही बैठती है. यह उपन्यास हिन्दी के पाठकों और व्यंग्य लेखको को किस्सागोई के नये तरीको से परिचित करवाता है.

युसुफ़ी साहब ने अपने जीवन का एक अरसा भारत में बिताया था. आजादी के बाद उन्हें पाकिस्तान जाना पड़ा. इस उपन्यास मे उनका विभाजन के समय का दर्द भी झलकता है और नॉस्टैलेजिया भी.वह इसका यथार्थपरक वर्णन भी करते हैं. एक बानगी देखिये.

पाकिस्तान बनने से पहले जिन पाठकों ने दिल्ली या लाहौर का रेलवे स्टेशन का नक़्शा देखा है, वो इस छीना-झपटी का बखूबी अंदाज़ा कर सकते हैं। 1945 में हमने देखा कि दिल्ली से लाहौर आने वाली ट्रेन के रुकते ही जैसे ही मुसाफिर ने अपने जिस्म का कोई हिस्सा दरवाज़े या खिड़की से बाहर निकाला, कुली ने उसी को मज़बूती से पकड़ कर पूरे मुसाफिर को हथेली पर रखा और हवा में उठा लिया और उठाकर प्लेटप़फार्म पर किसी सुराही या हुक़्के की चिलम पर बिठा दिया लेकिन जो मुसाफिर दूसरे मुसाफिरों के धक्के से खुद-ब- खुद डिब्बे से बाहर निकल पड़े उनका हाल वैसा ही हुआ जैसा उर्दू की किसी नई-नवेली किताब का आलोचकों के हाथ होता है। जो चीज़ जितनी भी, जिसके हाथ लगी सर पर रखकर हवा हो गया। दूसरे चरण में मुसाफिर पर होटलों के दलाल और एजेंट टूट पड़ते। सफेद कोट-पतलून, सफेद क़्मीज़, सफेद रूमाल, सफेद कैनवस के जूते, सफेद मोज़े, सफेद दांत मगर इसके बावजूद मुहम्मद हुसैन आज़ाद (19वीं शताब्दी के महान लेखक) के शब्दों में हम ये नहीं कह सकते कि चमेली का ढेर पड़ा हँस रहा है।

इस उपन्यास में पांच कहानीनुमा निबंध हैं. “हवेली” की कहानी एक क्रोधी ‘किबला’ और उसके द्वारा छोड़ी गयी पुरानी हवेली की कहानी है. “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा” एक छोटे से कस्बे धीरजगंज के समाज,वहां स्थित एक स्कूल और उसके नये टीचर और पुराने व्यव्स्थापक का किस्सा है. “स्कूल मास्टर का ख्वाब” एक घोड़े और एक मुशी की कहानी है. जहाँ घोड़ा दुखी है और मुंशी समझदार मूर्ख. “शहरे दो किस्सा” एक सनकी आदमी का चरित्र चित्रण है जिसने अपनी ज़िंदगी के पिचहत्तर साल एक छोटे से कमरे में बिता दिये. “कार,काबुली वाला और अलादीन बेचिराग” एक रेखाचित्र है जिसमें एक अनपढ़ पठान है, एक खटारा कार है और एक ड्राइवर है.

अपनी भूमिका में डिस्क्लेमर देते हुए युसुफ़ी साहब कहते हैं.

“इस उपन्यास में जो कुछ आप पढ़ेंगे,उसका मेरे दोस्तों के जीवन की घटनाओं या उनके साथियों ,बुजुर्गों और मिलने वालों से कोई संबंध नहीं है.विनम्र निवेदन है कि फिक्सन को फिक्सन ही समझ कर पढ़ा जाये…..लगभग सारी घटनाऎं और चरित्र फ़र्जी हैं.अलबत्ता जिन प्रसिद्ध लोगों का जिक्र कहीं बुराई या आलोचना के लिये आया है.उसे झूठ ना समझा जाये.”

तत्कालीन राज्य व्यवस्था पर भी युसुफ़ी साहब चोट करते हैं. तरीका एकदम साफ़गोई का है जो सीधे दिल पर चोट करता है.

लीडर भ्रष्ट, विद्वान लोग स्वार्थी,जनता भयभीत-आतंकित और हर आदेश का पालन करने वाली.जब संस्थान खोखले और लोग चापलूस हो जायें तो जनतंत्र धीरे-धीरे डिक्टेटरशिप को रास्ता देता जाता है.

या फिर

मेरे राज्य में बोलने,छ्पने और छापने पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है.मतलब ये कि जिसका जी चाहे ,जिस छ्न्द या विधा में स्तुति लिखे और पढ़े. बल्कि स्तुति-काव्य छ्न्द,बुद्धि से परे भी हो तो कोई बात नहीं.

इसे बदनसीबी ही कहना चाहिये कि जिन बड़े और कामयाब लोगों को निकट से देखने का अवसर मिला, उन्हे मनुष्य के रुप में बिल्कुल अधूरा और हल्का पाया।

य़ुसुफी साहब अरसे तक लंदन में भी रहे अंग्रेजो और लंदन के बारे में टिप्पणी भी वो अपनी भूमिका में करते हैं.

अच्छाई,सुन्दरता और शालीनता में अंग्रेजों का जबाब नहीं. धर्म.राजनीति और सैक्स पर किसी और कैसी भी सभा में बात करना अशिष्टता और परले दर्जे की बुराई समझते हैं, सिवाय पब और बार के.गंभीर और आवश्यक विषयों पर बातचीत सिर्फ नशे की हालत में ठीक समझते हैं. बेहद हमदर्द , कारवाले इतने शिष्ट कि इकलौते पैदल चलने वाले को रास्ता देने के लिये अपनी और दूसरों की राह खोटी करके सारा ट्रैफिक रोक देते हैं.

यूं लंदन बहुत दिलचस्प जगह है और इसके अलावा इसमें कोई खराबी नजर नहीं आती कि गलत जगह पर स्थित है।

एशियाई समाज से वो भलीभांति परिचित है. वो पूरी एशियाई समाज के बारे में अपनी राय देते हुए कहते हैं.

कभी कभी कोई समाज भी अपने ऊपर अतीत को ओढ़ लेता है. गौर से देखा जाये तो एशियाई ड्रामे का असल विलेन अतीत है. जो समाज जितना दब,कुचला और कायर हो उसे अपना अतीत उतना ही अधिक उज्जवल और दुहराये जाने लायक दिखायी देता है. हर परीक्षा और कठिनाई की घड़ी में वो अपने अतीत की ओर उन्मुख होता है और अतीत वो नहीं जो वस्तुत: था बल्कि वो जो उसने अपनी इच्छा और पसंद के अनुसार तुरंत गढ़ कर बनाया है.

वो व्यंग्य या व्यंग्यकार को क्या मानते हैं वो उनके इस वाक्य में झलकता है.

समय से पहले निराश हो जाने का एक लाभ यह पाया कि नाकामी और सदमे का डंक और डर पहले ही निकल जाता है. कई नामवर पहलवानों के घरानों में यह रीत है कि होनहार लड़के के बुजुर्ग उसके कान बचपन में ही तोड़ देते हैं ताकि आगे चलकर कोई प्रतिस्पर्धी पहलवान तोड़ने की कोशिश करे तो तकलीफ ना हो.व्यंग्य को मैं बचाव का मैकेनिज्म समझता हूँ.यह तलवार नहीं उस व्यक्ति का कवच है जो बुरी तरह से घायल होने के इसे पहन लेता है.  

उपन्यास ‘खोया-पानी’ बेहतरीन ज़ुमलों से भरा हुआ उपन्यास है. ऎसे ऎसे ज़ुमले की हँसी भी आये और व्य़ंग्य का ज़ायका भी मिले.

सच तो यह है कि जहां चारपाई हो वहां किसी फ़र्नीचर की न ज़रूरत है ,न गुंजाइश और  न तुक। इंग्लैंड का मौसम अगर इतना ज़लील न होता और अंग्रेज़ों ने वक़्त पर चारपाई का आविष्कार कर लिया होता तो न सिर्फ ये कि वो मौजूदा फर्नीचर की खखेड़ से बच जाते, बल्कि फिर आरामदेह चारपाई छोड़ कर उपनिवेश बनाने की खातिर घर से बाहर निकलने को भी उनका दिल न चाहता। `ओवरवर्क्ड’ सूरज भी उनके साम्राज्य पर एक सदी तक हर वक़्त चमकते रहने की ड्यूटी से बच जाता।

बहुत-सी तवायफों ने हर रात अपनी आबरू को ज़ियादा से ज़ियादा असुरक्षित रखने के उद्देश्य से इनको बतौर “पिम्प´´ नौकर रख छोड़ा था।

कई जुमले हैं

ऎसे ही जुमलों से रुबरू होंगे कल अगली पोस्ट में. यदि आप पुस्तक मगांना चाहें तो नीचे दिये पते से मंगा लें. पुस्तक की खूबियों को देखते हुए पुस्तक का मूल्य काफी कम है. मंगाते समय इस पोस्ट का ज़िक्र भी कर दें तो क्या पता ‘तुफ़ैल’ साहब कुछ विशेष डिस्काउंट की व्यवस्था कर दें यदि ना भी करें तब भी किताब खरीद कर पढ़ने योग्य तो है ही. 

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किताब डाक से मंगाने का पता:

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

 

(आज फिर से व्यंग्य लिख रहा हूँ.मधुशाला की दुकान कोई खास चल नहीं रही.इससे पहले कि बाकि बचे ग्राहक भी लौट कर चले जायें और हमें दुकान समेटनी पड़े हमने सोचा कि चलो फिर से अपनी ऑकात पे आ ही जाते हैं.)

बच्चू सिंह जो कल तक मुँह उठाये घूम रहे थे आज मुँह छुपाये घूम रहे हैं.ऎसा नहीं कि उन्होने पहली बार मुँह की खायी है. लेकिन इस बार ये वाकिया तब हुआ जब अभी कुछ ही दिनों पहले उनकी बहू-यानि की उनके सुपुत्र मुन्ना सिंह की पत्नी- की मुँह दिखायी हुई थी.क्या कहेंगे वो लोग जिनके सामने उन्होने अपनी मूंछे उठा कर कहा था “अब हमका कोनो डर नाँही अब हमरो बिटवा कोतवाल हुई गवा.”

मुन्ना सिंह वल्द बच्चू सिंह बचपन से ही पढ़ने में पैदल और लड़ने में माहिर थे.जहाँ बातों से काम चल जाता वहां गाली दे देते. जहां गाली से काम हो सकता था वहाँ डंडा चला देते.कई बार डंडे की आवश्यकता वाली सिचुएसन में कट्टा (देशी तमंचा) भी चला चुके थे. लोगों को डरा धमकाकर अपनी बात मनवाना उनकी छोटी सी गाली का खेल था.आधे लोग उनकी गाली सुनने से पहले ही उनकी बात मान लेते जो नहीं मानते उनके लिये मुन्ना सिंह के पास गालियों का अच्छा खासा खजाना था. यदि मुन्ना सिंह क्रिकेट खेलने जाते तो कोई भी अम्पायर बनने को तैयार नहीं होता था.वो खुद अम्पायर बनने की पेशकश करते तो कोई खेलने को तैयार नहीं होता था. इसीलिये मुन्ना सिंह क्रिकेट नहीं सीख पाये.सीख तो वो फुटबाल भी नहीं पाये थे लेकिन उनको लगता था कि फुटबाल के वह अच्छे खिलाड़ी हैं. वह जगह जगह लात लगाने में माहिर थे और वो फुटबाल को भी ऎसा ही कुछ समझते थे जिसमें सिर्फ लात ही लगायी जाती है.हॉकी को वो डंडा चलाना जैसा मानते थे और उनका विचार था कि इसमें भी वो माहिर हैं हालाँकि इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि वो डंडा चलाने में सचमुच माहिर थे.

गांवो में अक्सर लोग पैदा होते ही नौकरी के बारे नहीं सोचने लगते. शहरों के बच्चों की तरह अनेक योग्यताओं को हासिल कर लेना भी वहाँ की संस्कृति में शामिल न था.शहरों में तो लोग अपने बच्चों को इतनी चीजें इसलिये सिखा देते हैं कि बच्चे ये ना सही तो वो तो बन ही जायें यानि क्रिक्रेटर ना बन पाये तो एक्टर ही बन जायें,एक्टर ना बन पाये तो सिंगर ही बन जायें,सिंगर नहीं तो डॉक्टर बन जाये. कुछ नहीं बन पाये तो नौकर तो बन ही जायें यानि कहीं नौकरी कर लें और हर महीने की पहली तारीख को वेतन के रूप में पूरनमासी का चांद देख लें. मुन्ना सिंह इन सब चिंताओ से दूर थे. वो प्रकृति के साथ साथ बढ़ रहे थे.बैल,भेड़,गधे,कुत्ते सभी उनके सहचर थे और इन सभी की कुछ आदतें भी मुन्ना सिंह को ज्वर की भांति लग गयी थी. कुसंग का ज्वर भयानक होता है लेकिन वो भयानक होते हुए भी किसी के लिये मददगार साबित हो सकता है इसका पता लोगों को तब तक ना था जब तक कि मुन्ना सिंह का नौकरी का बुलावा ना आ गया.

मुन्ना सिंह ऎसे होनवार विरवान थे कि उनके चिकने पातों का पता दूसरे गांवो तक के लोगों को बहुत पहले ही लग गया था. लोग कहते थे कि मुन्ना सिंह एक दिन जरूर नाम करेगा. उनके उज्जडपने,आवारागर्दी और किसी से भी कुछ भी छीन लेने की प्रवृति से प्रभावित होकर लोग कहते थे कि या तो मुन्ना सिंह पुलिस बनेगा या डाकू.मुन्ना सिंह का विश्लेषण था कि जब से घोड़ों का प्रचलन लूटपाट के लिये कम और रेसकोर्स के लिये ज्यादा होने लगा है और जब से लोगों ने सोना चांदी खरीदना छोड़ शेयर खरीदना चालू किया हैं तब से डाकू बनना कोई प्रॉफिटेबल बिजनेस नहीं रहा.और फिर जब वैसी ही लूटने की खुली छूट और सुविधाऎं पुलिस के पास भी हों तो कोई डाकू क्यों बने पुलिस ही न बने? क्यों कोई दस-बीस साल लूट-मार कर अपनी प्रतिभा का परिचय देने के बाद समर्पण कर नेता बनने का इंतजार करे?

पुलिस विभाग में एक सिपाही भी बनने की सोचना जितना आसान होता है बनना उतना ही कठिन.ऎसा ना होता तो देश का हर नागरिक पुलिस विभाग में ही होता. लेकिन मुन्ना सिंह, जो किताब का मुँह देखे बिना मात्र नकल के भरोसे ग्रेजुएट पास हो गये थे, उनके लिये कुछ भी कार्य कठिन नहीं था. उनके लिये यह कुछ पैसों और सही लोगों तक उन पैसों को पहुचाने का ही खेल मात्र  था.अपनी इसी अद्भुत योग्यता के कारण वो पुलिस की भर्ती में चुन लिये गये. सारे गांव में खुशी की लहर तैर गयी. बच्चू सिंह की मूंछे ऊंची हो गयीं. आसपास के गांव के लोग अपनी विवाह योग्य और विवाह अयोग्य कन्याओं के रिश्ते मुन्ना सिंह से जोड़ने के जोड़तोड़ में लग गये.दहेज की मांग का बढ़ना तो जायज था पर अब उसमें कन्या के सुन्दर,सुशील और सुसंस्कृत होने की मांग भी जुड़ गयी.       

जोड़तोड़ जहाँ हो वहाँ कुछ ना कुछ हासिल होता ही है. इस परंपरा से ही विगत कई सालों से देश का शासन चल रहा है. उसी तरह के जोड़तोड़ के फलस्वरूप मुन्ना सिंह की शादी भी पक्की हो गयी. बरात के दिन दहेज के साथ साथ  दारू की नदियां कुछ इस तरह बहीं जिस तरह जिस तरह अपने देश में कभी दूध की नदियां बहती होंगी.चारों ओर उत्सव का माहौल था. मुन्ना सिंह ने शादी के दिन भी पुलिस की वर्दी पहनी और सेहरे के बदले सर पे पुलिसिया टोपी लगायी.उनका कहना था इससे इम्प्रेशन बराबर पड़ता है….और इम्प्रेशन सही पड़ा भी. रास्ते में वसूली करते हुए कुछ अतिरिक्त दहेज का  जुगाड़ भी कर लिया. इस तरह विवाह संपन्न हुआ.

गांव वालों ने चैन की सांस ली.उन्हे शुकून हुआ कि अब गांव की लड़कियाँ बिना मुन्ना सिंह से डरे हुए आ जा सकेंगी क्योंकि अब स्थायी रूप से मिसेज मुन्ना सिंह आ गयी थी.मिसेज मुन्ना सिंह ने ससुराल में आकर अपनी गायन कला से सबको प्रभावित करने के लिये गाया. ‘सैंया भये कोतवाल अब डर काहे का’.ये अलग बात है कि उन्हें खुद ही अपने सैया यानि मुन्ना सिंह से डर लगता था. बात बात पर उसे घुड़क देते और वो निरीह जनता की तरह कुछ कह भी नहीं पाती थी.लेकिन फिर भी उन्हें संतोष था कि वो एक पुलिस वाले की धर्मपत्नी हैं.  

कुछ दिन अपनी पत्नी के साथ हँसी खुशी रह मुन्ना सिंह नौकरी करने शहर लौट आये.सब कुछ सही जा रहा था.लेकिन होनी को कौन टाल सकता है.प्रदेश में सरकार बदल गयी और जैसा अक्सर होता है कि सरकार बदलने पर तबादले करने की परम्परा का पालन किया जाता है पूर्ववर्ती सरकार के बनाये नियमों को भ्रष्टाचार की आड़ में  बदल दिया जाता हैं वैसा ही कुछ हुआ.सरकार को पता लगा कि पुलिस की भर्ती में जमकर धांधली हुई है हाँलाकि सभी जानते थे कि ऎसी धाधली हमेशा से होती आयी है लेकिन इस बार आदेश हुआ कि कई पुलिस वालों को निकाला जायेगा.संयोग या दुर्योग से मुन्ना सिंह का नाम भी निकाले जाने वालों में शामिल था.मुन्ना सिंह बेरोजगार हो गये. सारे घर में कोहराम मच गया. मिसेज मुन्ना सिंह को अपना पुराना बेरोजगार प्रेमी याद आने लगा. हाँलाकि मुन्ना सिंह आश्वस्त थे कि अगली भर्ती में भी वो पुलिस के लिये चुन लिये जायेंगे. उनको अपनी योग्यता और भर्ती करने वालों के चरित्र पर पूरा भरोसा था. लेकिन एक बार के लिये तो बेइज्जती खराब हो ही गयी थी.इसी बात का दुख था उन्हें. वो रह रहकर बड़े शौक से सिलवायी हुई अपनी नयी वर्दियों को देख रहे थे.रह रहकर उनके सामने रिश्वत लेकर जेब में रखने के सपने आते रहते लेकिन क्या किया जा सकता था. दुखी मन से मुन्ना सिंह गांव जाने वाली ट्रेन में सवार हो गये.

[कुछ पाठकों ने मेल भेज कर कहा कि मैं 'उमर खैयाम'  के जीवन-वृत के बारे में विस्तार से लिखुं. तो उन सभी सुधी पाठकों से कहना चाहुंगा कि 'उमर' के बारे में नैट पर पहले से ही बहुत जानकारी उपलब्ध है.हाँलाकि अधिकतर जानकारी अंग्रेजी में है फिर भी उसी जानकारी का अनुवाद कर यहां पेश करना एक तरह का दुहराव ही होगा. मेरा प्रयास 'उमर' की रुबाइयों को हिन्दी अनुवादकों की नजर से देखना और उस पर अपने विश्लेषण को नैट पर डालना मात्र है. जिन पुस्तकों की बात मैं इस आलेख में कर रहा हूँ उनमें से अधिकांश अब दुकानों में उपलब्ध नहीं है.इसलिये उनकी झलक नैट पर डालना मैं समझता हूँ अधिक श्रेयस्कर होगा. उमर के जीवन पर मौलाना सुलेमान नदवी की एक पुस्तक है "खैयाम" जो दारुल्मुसन्नफीब,आजमगढ़ से प्रकाशित हुई थी.मूल पुस्तक उर्दू में थी लेकिन इसका हिन्दी अनुवाद भी छ्पा था. यदि ज्यादा मांग रही तो फिर कभी इस विषय पर विस्तार से लिखुंगा.अभी तो आप मूल आलेख ही पढें]

पिछ्ले अंको में आपने पढ़ा कि उमर खैयाम की रुबाइयों का अनुवाद श्री रघुवंशलाल गुप्त ने 1938 में किया था. यह पुस्तक किताबिस्तान,इलाहाबाद से छ्पी थी.इसमें भूमिका के रूप में उमर खैयाम का एक वृहत जीवन परिचय भी है.खैयाम के बारे में प्रचलित एक अंग्रेजी पद का सुन्दर अनुवाद रघुवंश जी ने इसी भूमिका में किया है.  raghuvansh_cover

Khayyam, who stitched the tents of science,
Has fallen in grief’s furnace and been suddenly burned,
The shears of Fate have cut the tent ropes of his life,
And the broker of Hope has sold him for nothing!

जो खैयाम सिया करता था “हिकमत” के खेमे अनमोल,
गिरा वही दुख की भट्टी में,अनायास हा गया फफोल.
काल-कतरनी ने दी उसकी ,अल्प आयु की डोरी काट,
“किस्मत” के दलाल ने उसको बेच दिया मिट्टी के मोल.

आइये अब अनुवाद की चर्चा करें. रघुवंश जी ने भी अपनी इस पुस्तक में उमर की रुबाइयों वाले छंद का ही प्रयोग किया है. हाँलाकि पुस्तक की भूमिका के अनुसार उन्होने फिट्जराल्ड की पुस्तक ही अनुवाद के लिये प्रयोग की थी.लेकिन ऎसा लगता है कि रघुवंश जी को उर्दू का काफी अच्छा ज्ञान था. अपनी भूमिका में भी वो उर्दु के एक अनुवाद की चर्चा करते हुए कहते हैं

” उर्दु में खैयाम की मूल रुबाइयों का अनुवाद हमने देखा है;परंतु यह बहुत अच्छा नहीं. न तो इसमें फारसी भाषा का प्राकृतिक पद लालित्य है और न मूल रुबाइयों का प्रसाद गुण”

इसी तरह परिशिष्ट में भी वह खैयाम की पारसी रुबाइयों का हवाला देते हैं. एक बानगी देखिये (चित्र:परिशिष्ट का एक पन्ना).तो लगता है कि उन्होने मूल फारसी को भी पढ़ा था.

raghuvansh_apendix आइये अब कुछ पद देखें.

कवि को जल्दी है कि कहीं जीवन की रात ना हो जाये इससे पहले कि ऎसा हो वो मधु के प्याले में डूब जाना चाहता है.

पौ फटते ही मधुशाला में , गूँजा शब्द निराला एक,
मधुबाला से हँस हँस कर यों कहता था मतवाला एक-
“स्वाँग बहुत है रात रही पर थोड़ी; ढालो,ढालो शीघ्र
जीवन ढल जाने के पहिले ढालो मधु का प्याला एक.”[2]

कवि कहता है कि तू अपने ज्ञान को भूल जा और बस मधुरस का पान किये जा.यह तेरा यौवन थोड़ा ही है इसे जी ले.

ला,ला,साकी! और,और ला;फिर प्याले पर प्याला ढाल;
धर रख ,गूढ़-ज्ञान गाथा को ,व्रत विवेक चूल्हे में डाल.
सिखला रहा ‘त्याग’ की पट्टी,कैसा ज्ञानी है तू मित्र!-
नहीं सूझता क्या तुझको यह यौवन,यह मधु,यह मधुकाल [8]

कवि हर रोज सोचता है कि वो पीना छोड़ देगा लेकिन आज तो बसंतोत्सव है और कवि छ्क कर पीना चाहता है.

यों तो मैं भी नित्य सोचता हूँ अब खाऊंगा सौगन्ध -
इस प्याले का मोह तजूँगा ,पीना कर दूंगा अब बन्द.
किंतु आज तक प्रकृति-प्रिया है आई सज फूलों का साज,
आज बसंतोत्सव है प्रियतम,आज न पीऊँ तो सौगन्ध.[9]

कवि कहता है ये जीवन नश्वर है.इसलिये तेरे-मेरे का चक्कर छोड़ और जीवन को पूरी तरह जीने का माध्यम बन.

नित्य रहेगा नहीं यहाँ, प्रिय, जीवन का यह डेरा कुछ;
प्राण-बटोही उठ जायेंगे करके रैन बसेरा कुछ.
यहाँ पड़े सोते हो जब तक करते हो “तेरा”-”मेरा”,
जीवन-स्वप्न टूट जाने पर, मेरा रहे ना तेरा कुछ.[11]

कवि कहता है असली स्वर्ग तो यहीं इसी धरती पर है.उसके लिये भविष्य की प्रतीक्षा करने की क्या आवश्यकता. इन पदों में देखिये दो मुहावरों “नौ नकद ना तेरह उधार” तथा ” दूर के ढोल सुहावने” का कितना सुन्दर उपयोग किया गया है.

दो मधूकरी हों खाने को , मदिरा हो मनमानी जो,
पास धरी हो मर्म-काव्य की पुस्तक फटी पुरानी जो,
बैठ समीप तान छेड़े, प्रिय, तेरी वीणा-वाणी जो,
तो इस विजन-विपिन पर वारूँ,मिले स्वर्ग सुखदानी जो.[14]

कोई स्वर्ग-लोक के सुख को कहता है अतोल, अनमोल;
कोई राजपाट के ऊपर करता है मन डाँवाडोल ;
गाँठ बाद ले मूर्ख नक़द के नौ, तेरह उधार के छोड़-
यों तो लगते हैं सुहावने सबको सदा दूर के ढोल. [15]

कवि कहता है.चाहे वो राजा हो या रंक सब की मंजिल एक ही है.सबको इस दुनिया को छोड़ जाना ही है.दुख-सुख तो आते जाते रहते हैं. इसलिये इन सब की चिंता में समय मत गंवा और भविष्य की चिताओं की मत सोच. बस यह वर्तमान है इसका जी भर सुख लूट ले.

वह कंगाल जिसे जीवन में जुटे न दाने भी दो सेर-
राजा जो न खर्च कर पाया ,भरे खजानों के भी ढेर,
दोनों ‘माटी’ मिले , किसी का बना न कोई सोना,जो कि
एक बार के गड़े हुए को कोई खोद निकाले फेर.[20]

कब तक, कब तक,मित्र ! फिरोगे जिस-तिस की चिंता में व्यस्त?
कब तक, क्ब तक और रहोगे, दीन और दुनिया में ग्रस्त?
आओ,लो,प्याला भर दो फिर, दो दिन खुल खेलो खैयाम,
सुख-दुख का शशि तो यों ही नित होता अस्त ,उदय ,फिर अस्त.[34]

लो प्याला भर भर दो फिर फिर ,फिर फिर कहने का क्या फल?
हाथों से निकला जाता है लाख लाख का इक इक पल.
बीत चुका जो ‘कल’ होना था ,क्या जाने होगा क्या ‘कल’
आज चैन से कटती है तो ‘कल’ के हित क्यों हो बेकल
[ 46]

यह प्रकृति का नियम है कि जो आया है उसे एक ना एक दिन जाना ही है. यह तो सदियों से पूछा जाने वाला प्रश्न है कि मैं कौन हूँ ? कहाँ से आया हूँ ? कहाँ जाउंगा? लेकिन इन सबका उत्तर आखिर जानता कौन है. यह धर्म,रीति-रिवाज सब बेकार हैं. मैं तो बस मदिरा में डूब जाना चाहता हूँ ताकि सदियों से अनुत्तरित प्रश्नों को भी भूल जाऊं.

हा इस क्रूर चक्र के आगे चलता है कोई ना उपाय
अन्त भाग्य के हाथों ही में ,रहता हार जीत का न्याय
कौन,कहाँ से,क्यों आया था ? जान कहाँ, और क्यों,अन्त?
प्रश्न जानता हूँ मै भी सब,उत्तर कौन बताये हाय.[
55]  

बैर ना धर्म से हैं कुछ ,न कुछ विशेष पाप से प्रीति ,
न कुछ बुरी ही लगती मुझको , प्रिय,बे-बात लोक की रीति.
मैं जो प्याले पर मरता हूँ ,सो बस इसी लिये खैयाम,
एक घड़ी को बिसर जाय यह नियति चक्र की निर्मम नीति.[66]

हमारे हाथ में कुछ भी नहीं है सब किसी अदृश्य सत्ता के हाथ में हैं यदि यह हमारे हाथ में होता तो हम एक नयी सृष्टि की रचना करते जहाँ मन की आशाऎं पूरी हो पातीं.

प्रियतम ! हम-तुम कर पाते जो कहीं नियति नटनी से मेल,
अपने हाथों में होता जो जीवन का यह दुखमय खेल.
तो फिर इसे मिटाकर फिर से रचते ऎसी सृष्टि नवीन
मन की साधें पुजती जिसमें,फलती जहँ आशा की बेल.[71]

इस पुस्तक के द्वितीय संस्करण में कुल 72 छंद हैं.अगले अंक में चर्चा करेंगे सुमित्रानंदन पंत की पुस्तक “मधुज्वाल” की…

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क्रमश:…………………………

इस श्रंखला के पिछ्ले लेख.

1. खैयाम की मधुशाला.. 2. उमर खैयाम की रुबाइयों के अनुवाद.. 3. मधुशाला में विराम..टिप्पणी चर्चा के लिये 4. उमर की रुबाइयों के अनुवाद भारतीय भाषाओं में  5. मैथिलीशरण गुप्त का अनुवाद

 

जैसा कि बताया जा चुका है कि मैथिलीशरण गुप्त और रघुवंश गुप्त दोनो ने उमर की रुबाइयों का हिन्दी अनुवाद किया था. आइये पहले मैथिलीशरण गुप्त के अनुवाद की चर्चा करें.

गुप्त जी अपनी भूमिका में लिखते हैं कि उन्हें उमर की रुबाइयों का हिन्दी अनुवाद करने के लिये राय कृष्णदास जी ने प्रेरित किया था. मैथिली जी फारसी नहीं जानते थे इसलिये उनका अनुवाद जान फिट्जराल्ड के अंग्रेजी अनुवाद पर आधारित था. उन्होने फिट्जराल्ड के अनुवाद का शब्दश: अनुवाद ना कर भावानुवाद ही किया जिसमें कुछ वाक्य उन्होने अपनी ओर से भी बढ़ाये. उनकी इस पुस्तक में कुल 75 छ्न्द हैं. उन्होने भी छंद रचना में उमर के छंद को ही प्रयुक्त किया है. मदिरा , जो कि उमर की रुबाइयों का मूल तत्व है उसके लिये मैथिली जी मधु, अंगुरी, द्राक्षा,द्राक्षा-रस आदि का प्रयोग किया है.आइये कुछ पंक्तियां देखें. mathily_cover

आओ, मधुर बसंत विभा में मधु ढालो,भर दो प्याला,
अनुतापों के शिशिर-वसन से बढ़े होलिका की ज्वाला.
समय विहंगम को थोड़ा ही मार्ग पार करना है अब,
फैला दिये पंख लो, उसने,है वह उड़ने ही वाला.[7]

जीवन की नश्वरता के बारे में मैथिली जी लिखते हैं.

सांसारिक लिप्साऎं, जिन पर आशा करते हैं हम लोग,
मिट्टी में मिल जाती हैं सब पाकर सौ विघ्नों के रोग.
कहीं फूलती फलती भी हैं तो बस घड़ी दो घड़ी ही,
ज्यों मरु के धूसर मुख पर हो हिमकण की आभा का योग.[14]

उमर की रुबाइयां जीवन और मृत्यु के बीच झूलते मानव को बार बार अहसास कराती हैं कि इस जग में जो भी है वो क्षणिक है.चाहे आप जीवन में कितना भी पालें सब एक ना एक दिन छूटना ही है. इसी बात को मैथिली जी कहते हैं.

यह प्राचीन पथिकशाला है,अहो-रात्र जिसके दो द्वार,
खुलते और बन्द होते हैं बारी बारी बारंबार.
कितनी तड़क भड़क से इसमें आये हैं कितने सम्राट
एक द्वार से  घुसे, घड़ी भर ठहरे,हुए अन्य से पार.[16]

भूमंडल के मध्य भाग से उठकर मैं ऊपर आया,
सातों द्वार पार कर ऊंचा ,शनि का सिंहासन पाया.
कितनी ही उलझने मार्ग में सुलझा डाली मैने , किंतु
मनुज मृत्यु की और नियति की खुली न ग्रंथिमयी माया.[
31]

कब तक, किया करोगे कब तक इससे उससे वाद विवाद?
कब तक,बना रहेगा कब तक, यह चिर यत्नों का उन्माद ?
मरते हो किस फल के पीछे , वह कटु है या मिथ्या है,
अच्छा तो है यही ,छोड़ सब लो उस अंगूरी का स्वाद.[39] 

यह उलटा प्याला है , जिसको आसमान कहते हैं हम,
जिसके नीचे मरते-जीते कसे गँसे रहते हैं हम .
है बेकार हाथ फैलाना ,किसी लिये इसके आगे,
पड़ा उसी चक्कर में यह भी ,विवश जिसे सहते हैं हम.[52]

हाँ मेरे बुझते जीवन को द्राक्षा-रस से दीप्त करो,
और उसी से मृत शरीर को धोकर उस की धूलि हरो
द्राक्षा-दल का कफन बनाकर उसमें मुझे लपेटो फिर ,
और किसी उद्यान-पार्श्व में गर्त बनाकर गाड़ धरो.[67]maithily_picture

पिछ्ले अंक में मैने बताया था कि उमर की रुबाइयों पर कई लोगों ने चित्र भी बनाये थे.मैथिली जी की इस पुस्तक में भी बीच में कुछ दर्जन भर चित्र भी हैं. ये सारे चित्र काशी के रामप्रसाद जी ने बनाये हैं. उमर की रुबाइयों पर आमतौर पर जो चित्र बनाये गये वो या तो फारस की सभ्यता की तड़क भड़क है या फिर जीवन के ऎहिक या श्रांगारिक तात्पर्य की अभिव्यक्ति.  अपने दर्जन भर चित्रों और 75 छ्न्दों के साथ जब यह पुस्तक प्रकाशित हुई तो हाथों हाथ बिक गयी.

अगले अंक में चर्चा करेंगे रघुवंश गुप्त के अनुवाद की.

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क्रमश:…………………………

श्रंखला के पिछ्ले लेख. 1. खैयाम की मधुशाला.. 2. उमर खैयाम की रुबाइयों के अनुवाद.. 3. मधुशाला में विराम..टिप्पणी चर्चा के लिये 4. उमर की रुबाइयों के अनुवाद भारतीय भाषाओं में

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