[किबला की दुकान तो चल गयी लेकिन अचानक उन्हे पाकिस्तान जाना पड़ा. फिर देखिये आगे क्या क्या हुआ.]

माशूक के होंठ

अब के दुकान चली और ऐसी चली कि औरों ही को नहीं स्वयं उन्हें भी आश्चर्य हुआ। दुकान के बाहर उसी शिकार की जगह यानी केबिन में उसी ठस्से से गाव तकिये की टेक लगा कर बैठते, मगर आसन पसर गया था। पैरों की दिशा अब फ़र्श के मुकाबले आसमान की ओर अधिक हो गयी थी। जेल में रहने से पहले क़िबला ग्राहक को हाथ से निवेदन करने वाले इशारे से बुलाते थे अब सिर्फ़ तर्जनी के हल्के से इशारे से तलब करने लगे। उंगली को इस तरह हिलाते जैसे डावांडोल पतंग को ठुमकी देकर उसकी दिशा दुरुस्त कर रहे हों। हुक़्का पीते कम गुड़गुड़ाते ज़ियादा थे। बदबूदार धुऐं का छल्ला इस तरह छोड़ते कि ग्राहक की नाक में नथ की तरह लटक जाता। अक्सर कहते “वाजिद अली शाह, जाने-आलम पिया ने, जो खूबसूरत नाम रखने में अपना जोड़ न रखते थे, हुक़्के का कैसा प्यारा नाम रखा था….. लबे-माशूक़ (माशूक़ के होंठ )”. जो व्यक्ति कभी हुक्के के पास से भी गुजरा है वो अच्छी तरह समझ सकता है कि जाने-आलम पिया का पाला कैसे होठों से पड़ा होगा। चुनांचे अपदस्थ होने के बाद वो सिर्फ हुक़्का अपने साथ मटियाबुर्ज ले गये। परीखाने के सारे माशूक़ लखनऊ में ही छोड़ दिये, चूंकि माशूक़ को नली पकड़ के गुड़गुड़ाया नहीं जा सकता।

बल्ली पे लटका दूंगा

कुछ दिन बाद उनका लंगड़ा दुश्मन यानी पहलवान सेठ दुकान बढ़ा कर कहीं और चला गया। क़िबला बात बेबात हरेक को धमकी देने लगे कि साले को बल्ली पे लटका दूंगा। आतंक का यह हाल कि इशारा तो बहुत बाद की बात है, क़िबला जिस ग्राहक की तरफ़ निगाह उठा कर भी देख लें, उसे कोई दूसरा नहीं बुलाता था। अगर वह खुद से दूसरी दुकान में चला भी जाये तो दुकानदार उसे लकड़ी नहीं दिखाता था। एक बार ऐसा भी हुआ कि सड़क पर यूं ही कोई राहगीर मुंह उठाये जा रहा था कि क़िबला ने उसे उंगली से अंदर आने का इशारा किया। जिस दुकान के सामने से वह गुजर रहा था, उसका मालिक और मुनीम उसे घसीटते हुए क़िबला की दुकान में अंदर धकेल गये। उसने रुआंसा हो कर कहा कि मैं तो मूलगंज पतंगों के पेच देखने जा रहा था।

वो इंतज़ार था जिसका, ये पेड़ वो तो नहीं

फिर यकायक उनका कारोबार ठप हो गया। वो कट्टर मुस्लिम लीगी थे। इसका असर उनके बिज़नेस पर पड़ा। फिर पाकिस्तान बन गया। उन्होंने अपने नारे को हक़ीकत बनते देखा और दोनों की पूरी क़ीमत अदा की। ग्राहकों ने आंखें फेरलीं, दोस्त, रिश्तेदार जिनसे वो तमाम उम्र लड़ते झगड़ते और नफ़रत करते रहे, एक-एक करके पाकिस्तान चले गये, तो एक झटके के साथ यह खुला कि वो इन नफ़रतों के बगै़र ज़िंदा नहीं रह सकते, और जब इकलौती बेटी और दामाद भी अपनी दुकान बेच के कराची सिधरे तो उन्होंने भी अपने तम्बू की रस्सियां काट डालीं। दुकान औने-पौने एक दलाल के हाथ बेची। लोगों का कहना था कि “बेनामी´ सौदा है। दलाल की आड़ में दुकान दरअसल उसी लंगड़े पहलवान सेठ ने ख़रीद कर उनकी नाक काटी है। हल्का सा शक तो क़िबला को भी हुआ था मगर

अपनी बला से, बूम (उल्लू) बसे या हुमा* रहे(*वह चिड़िया जो किसी के सर पर साया कर दे, वह राजा हो जाता है ) वाली स्थिति थी। एक ही झटके में पीढ़ियों के रिश्ते नाते टूट गये और क़िबला ने पुरखों की जन्मभूमि छोड़ कर सपनों की ज़मीन की राह ली। सारी उम्र शीश महल में अपने मोरपंखी अभिमान का नाच देखते-देखते क़िबला कराची आये तो न सिर्फ ज़मीन अजनबी लगी, बल्कि अपने पैरों पर नज़र पड़ी तो वो भी किसी और के लगे। खोलने को तो मार्किट में हरचंद राय रोड पर लश्तम पश्तम दुकान खोल ली, मगर बात नहीं बनी। गुजराती में कहावत है कि पुराने मटके पर नया मुंह नहीं चढ़ाया जा सकता। आने को तो वह एक नई हरी-भरी ज़मीन में आ गये, मगर उनकी बूढ़ी आंखें पिलखन को ढूंढ़ती रहीं। पिलखन तो दूर उन्हें कराची में नीम तक नज़र न आया। लोग जिसे नीम बताते थे, वह दरअस्ल बकाइन थी, जिसकी निंबोली को लखनऊ में हकीम साहब पेचिश और बवासीर के नुस्ख़ों में लिखा करते थे।

कहां कानपुर के देहाती ग्राहक, कहां कराची के नखरीले सागौन खरीदने वाले। वास्तव में उन्हें जिस बात से सबसे ज़ियादा तकलीफ़ हुई वो ये कि यहां अपने आस-पास, यानी अपने कष्ट की छांव में एक व्यक्ति भी ऐसा नज़र नहीं आया जिसे वो अकारण और निर्भय होकर गाली दे सकें। एक दिन कहने लगे “यहां तो बढ़ई आरी का काम ज़बान से लेता है। चार-पांच दिन हुए, एक बुरी ज़बान वाला, धृष्ट बढ़ई आया। इक़बाल मसीह नाम था। मैंने कहा अबे परे हट कर खड़ा हो। कहने लगा ईसा मसीह भी तो तुरखान थे। मैंने कहा, क्या कुफ्र बकता है? अभी बल्ली पे लटका दूंगा। कहने लगा, ओह लोक वी ऐही, कहंदे सां! (वो लोग भी ईसा से यही कहते थे!)

जारी………………        ===========================================

पिछले अंक : 1. खोया पानी-1:क़िबला का परिचय 2. ख़ोया पानी 2: चारपाई का चकल्लस 3. खोया पानी-3:कनमैलिये की पिटाई 4. कांसे की लुटिया,बाली उमरिया और चुग्गी दाढ़ी़ 5. हवेली की पीड़ा कराची में 6. हवेली की हवाबाजी 7. वो तिरा कोठे पे नंगे पांव आना याद है 8. इम्पोर्टेड बुज़ुर्ग और यूनानी नाक 9. कटखने बिलाव के गले में घंटी 10. हूँ तो सज़ा का पात्र, पर इल्ज़ाम ग़लत है 11. अंतिम समय और जूं का ब्लड टैस्ट 12. टार्जन की वापसी

===========================================

khoya_pani_front_coverकिताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

 

 

Technorati Tags: पुस्तक चर्चा, समीक्षा, काकेश, विमोचन, हिन्दी, किताब, युसूफी, व्यंग्य, humour, satire, humor, kakesh, hindi blogging, book, review, mustaq, yusufi, hindi satire, book review

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: पुस्तक चर्चा, समीक्षा, काकेश, विमोचन, हिन्दी, किताब, युसूफी, व्यंग्य

आज सुबह जब पोस्ट लिखी (सुबह सुबह चार बजे उठ कर) तो यह अन्दाजा नहीं था कि यह एक बहस का रूप ले लेगी.हाँलाकि मंशा तो थी ही कि एक बहस हो. लेकिन आशा के विपरीत लोग आये और उन्होने बिना किसी पूर्वाग्रह के अपने विचार लिखे. कुछ लोगों ने जहाँ मेरी सोच से सहमति दिखायी वहीं अनुनाद जी ने और कुछ अन्य ने खुल कर असहमति दिखायी. मैं इस असहमति का स्वागत करता हूँ. मैं मानता हूँ कि हमारे लक्ष्य एक ही हैं …हाँ मार्ग अलग अलग. मैं भी यही चाहता हूँ कि हमारे देश का सारा तंत्र हिन्दी में चले लेकिन मेरे चाहने से कुछ नहीं होने वाला इसलिये जो परेशानी मैने झेली है कम से कम आने वाली पीढियां वह परेशानियाँ ना झेलें. इसलिये मेरा मानना अभी भी यही है कि वर्तमान परिस्थितियों में बिना अंग्रेजी सीखे अंग्रेजी का खात्मा नहीं किया जा सकता.

अनुनाद जी के विचारों से भी आप परिचित हों.जो उन्होने पिछ्ली पोस्ट पर दिये थे.

आपकी ये दोनो सोच

१) कि बारहवीं के बाद विज्ञान की पढ़ाई अंग्रेजी में इसलिये होती है कि हिन्दी में किताबें नहीं हैं;

२) कि हिन्दी में किताबें उपलब्ध कराने में पचास वर्ष और लग जायेंगे

दोनो से भी सहमत नहीं हुआ जा सकता। लगता है कि आप क्रमश:-विकास-प्रक्रिया (इवोलूशन) के मूल कांसेप्ट को ही नहीं समझते हैं।

अंग्रेजी में किताबें नहीं हैं क्योंकि उनकी मांग नहीं है (अर्थशास्त्र का सरल सिद्धान्त यहाँ काम कर रहा है) ; मांग इसलिये नहीं है कि हिन्दी के बजाय अंग्रेजी में पढ़ना अनिवार्य कर रखा गया है। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि यदि हिन्दी में विषयों का पढ़ना अनिवार्य कर दिया जाय तो एक महीने के भीतर किसी भी विषय की पुस्तकें बाजार में होंगी।

आपका यह भी मानना कि हिन्दी के वजह से बच्चे पिछड़ जाते हैं, तथ्यों से दूर है। मैने भी बारहवीं तक पूर्णत: हिन्दी में पढ़ाई की। मुझे कभी भी नही लगा कि मै हिन्दी के कारण कभी पिछड़ गया।

[ मुझे बार बार यह लगता रहा है कि मैं हिन्दी के कारण पिछ्ड़ गया ]

कोई भी हिन्दी के कारण पिछड़ता नहीं है, अंग्रेजी के कारण पिछड़ता है। और इसी दुराचार का विरोध होना चाहिये। इस देश को आगे बढ़ाना है तो व्यक्ति के विषय के ज्ञान की परीक्षा ली जाय, न कि अंग्रेजी के ज्ञान की परीक्षा, जो कि आज हो रही है।

अंग्रेजी की पढ़ाई एक भाषा के रूप में करायी जाय ; जिसको जरूरी हो उसी को पढ़ायी जाय (किसी को राजदूत के रूप में रूस या चीन जाना है तो उसके लिये रूसी या चीनी महत्वपूर्ण है, न कि अंग्रेजी); चापरासी पद के लिये अंग्रेजी, क्लर्क के लिये अंग्रेजी, सैनिक के लिये अंग्रेजी… क्यों जरूरी है? क्या आपने सोचा है कि पूरा देश ज्ञान अर्जन के बजाय डिक्शनरी का रट्टा क्यों लगा रहा है? इसमें कितना करोड़ मानव-घंटा बर्बाद हो रहा है? कुछ शब्द आ गये तो ग्रामर का चक्कर, ग्रामर आ गया तो ‘फर्राटे अंग्रेजी बोलने’ का चक्कर, फर्राटे अंग्रेजी भी बोलना आ गया तो अमेरिकन या ब्रिटिश एक्सेंट में बोलने का चक्कर.. ये दुष्चक्र है जिसमें पूरे देश को झोंक दिया गया है।

और हाँ, यदि किसी ने अंग्रेजी के बल पर नौकरी हासिल कर ली (जैसा कि पूरे देश में हो रहा है) तो इसको देश का विकास के रूप में समझने की भूल मत कीजिये। इसका केवल इतना अर्थ है कि किसी ने किसी दूसरे का हक गलत बहाने (अंग्रेजी के ज्ञान) के कारण छीन लिया। विकास तब होता है जब इन्नोवेशन होता है; नागरिक विभिन्न छेत्रों में रचनात्मकता से भरपूर होते हैं। दूसरे देश के लोगों से पहले कुछ नया कर लिया जाता है आदि। और ये सब तभी सम्भव है जब लोग अपनी भाषा में सोचें, पढ़े, विचार-विमर्श करें। विदेशी भाषा (अंग्रेजी) में होते हुए हजारों सेमिनार मैने देखे हैं; लोग विचार-विनिमय के बजाय प्रश्न पूछने और उत्तर देने से भागते हुए नजर आते हैं। ऐसे सेमिनारों से खाक फायदा होगा?

इस देश को अंग्रेजी की गुलामी करते करीब दो सौ साल हो गये। किसी दूसरे देश से तुलना करते हुए विकास के आंकड़े तो बताइये। केवल रटे-रटाये मुहावरे दोहराने से काम न चलाइये।

आशा है आप लोग इस बहस को जारी रखेगें.

पिछली पोस्ट से शायद यह लगा कि मैं कोई हिन्दी-अंग्रेजी विवाद उत्पन्न करना चाहता हूँ जो कि बकौल ज्ञान जी हिन्दी वालों का प्रिय शगल रहा है. लेकिन मेरा लक्ष्य यह नहीं था.मैं तो अपने अनुभव आपसे बांटना चाहता था.मैं अग्रेजी का विरोध नहीं करता बल्कि मैं तो अंग्रेजी की वकालत करता हूँ और कहता हूँ कि आज कि वर्तमान परिस्थितियों में बिन अंग्रेजी सब सून.

अधिकतर हम लोग केवल समस्या की बात करते हैं समाधान की नहीं. समस्या तो हम सब जानते ही हैं लेकिन आज की परिस्थिति में इसका समाधान क्या है. मेरे विचार से हमें दो मुँही रणनीति ( Two Pronged Strategy) से काम करना चाहिये. 1. अंग्रेजी को अनिवार्य करें और 2. हिन्दी को बढ़ावा दें. आपको मेरी बात में विरोधाभास लग रहा होगा. आइये समझते हैं इसे.

अंग्रेजी को अनिवार्य करें : आज के युग में अंग्रेजी के बिना काम नहीं किया जा सकता. यदि आप उच्च शिक्षा की बात करें तो वहाँ अधिकतर किताबें हिन्दी में उपलब्ध नहीं है. इसलिये वर्तमान परिस्थितियों में अंग्रेजी के बिना काम किया जाना मुश्किल है. तो अंग्रेजी तो अनिवार्य है ही. और यह बात हम सभी जानते हैं इसीलिये जिसके पास पैसा है वो अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा दिलवाता है. जो गरीब है वो अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में भेजता है. ऎसे में अंग्रेजी अमीर की है हिन्दी गरीब की. इसलिये गरीब गरीब ही बना रहता है और अमीर और अमीर होता जाता है.यदि हम सरकारी स्कूलों में भी अग्रेजी अनिवार्य कर दें तो हम काफी हद तक यह खाई पाट सकते हैं. यही भाषा का साम्यवाद है.

हिन्दी को बढ़ावा दें: आज हिन्दी में समस्या यह है हम हिन्दी हिन्दी का नारा तो लगाते हैं लेकिन हमारा सारा काम होता है अग्रेजी में. उच्च शिक्षा के लिये आज हिन्दी में किताबें उपलब्ध नहीं हैं और हम इसे सरकार की गलती मान कर चुप बैठ जाते हैं.यदि हम अंग्रेजी को अनिवार्य कर दें तो हमारे पास ऎसे लोग बहुतायत में होंगे जो दोनों भाषाऎं जानते होंगे तब बहुत सारा अनुवाद हिन्दी में किया जा सकेगा.विश्व में भारत आज एक बहुत बड़ा बाजार है. हिन्दी को बाजार की भाषा बनायें. जब हिन्दी समाचार बिकते हैं, हिन्दी सीरियल बिकते हैं, हिन्दी फिल्मे बिकती है तो हिन्दी भी बिकाउ भाषा होगी. तब लोगों की रुचि भी हिन्दी में बढेगी.

कुछ और बिन्दु हैं जिन पर हमें विचार करना होगा.

1. अंग्रेजी बोलना ना ही गुलामी का परिचायक है ना ही अंग्रेजी बोलने वाला श्रेष्ठ है.

2. हिन्दी बोलने वाला ना तो किसी मायने में हीन है ना ही हिन्दी में काम करना देशभक्ति ही है.

3. हिन्दी का समर्थन अंग्रेजी का विरोध नहीं और ना ही अंग्रेजी का समर्थन हिन्दी का विरोध है.

4. आप ना तो हिन्दी बोलने में संकोच करें ना ही अंग्रेजी बोलकर अपने को श्रेष्ठ माने.

5. अंग्रेजी बोलने में शंर्म ना करें.यह ना सोचें कि आप कुछ गलत बोल देंगे.

6. सब कुछ सरकार पर ना छोड़े. अपने स्तर पर प्रयास करें.अनुवाद ज्यादा से ज्यादा हों. उसके लिये जरूरत है कि दोनों भाषाओं के जानकार बढ़ें.

7. ग्राही बने. दूसरी भाषा के शब्दों को अपनायें.हर शब्द का हिन्दी अनुवाद ढूंढने की कोशिश ना करें. 

8. हिन्दी का बाजार बनायें.

9. व्याकरण पर ज्यादा ध्यान ना देकर संप्रेषण पर ध्यान दें.

10. शब्दों को मरने से बचायें. जितना हो सके अपनी भाषा के पुराने शब्द ढूंढें और उनको प्रयोग करें.

11. यह समझ लें कि आप हिन्दी में काम कर रहे हैं तो हिन्दी की सेवा नहीं कर रहे हैं ना ही आप अतिरिक्त रूप से देश भक्ति का पाठ पढ़ा रहे हैं.

12. अपनी हीन भावना से लड़ें.

13. भाषा को विवाद का विषय ना मान कर संप्रेषण का माध्यम मानें और जितनी अधिक भाषाऎं सीख सकें सीखें.

और अंत में आलोक जी ने जो कहा.

14. सही गलत अंगरेजी की चिंता ना करें, जैसी अंगरेजी अधिकांश भारतवासी बोलेंगे, वही सही मानी जायेगी। अंगरेजी अब एक भारतीय भाषा है, जो ब्रिटेन वाले भी बोल लेते हैं। पचास करोड़ भारतवासी जैसी अंगरेजी बोलेंगे, वही मानक हो जायेगी।

तो ये तो थे मेरे कुछ बिन्दु जो हमें समाधान की ओर ले जा सकते हैं.

अंत में क्या आप बता सकते है “घी (ghee)” की अंग्रेजी क्या है? Confused

संबंधित पिछ्ले लेख :

भारत की राष्ट्रभाषा अंग्रेजी क्यों नहीं है??

सागर भाई की उलझन और रचना जी की माफी

अंग्रेजी व हीन भावना

किबला के जेल जाने से मानवीय संवेदनाऎं किबला के पक्ष में हैं. ज्ञान जी ने भी कहा कि अब किबला का दुख देखा नहीं जाता. लेकिन किबला इसे दुख माने तब ना.किबला तो जेल में मस्त हैं. दो साल की सजा हुई है. सब सोच रहे हैं कि अब शायद किबला बदल जायेंगे. हो सकता है अब उनके व्यवहार में परिवर्तन हो जये.शायद अब वह लोगों से तमीज से बात करने लगेगें. पाठकों भी यही आस है. देखिये किबला लौटे तो क्या करते हैं. क्या होता है उनकी दुकान का. कैसे पेश आता है बगल वाला दुकानदार. तो आप भी आनन्द लीजिये टार्जन की वापसी का.

===========================================

टार्जन की वापसी

दो साल तक दुकान में ताला पड़ा रहा। लोगों का विचार था कि जेल से छूटने के बाद छुपते-छुपाते कहीं और चले जायेंगे। क़िबला जेल से छूटे, जरा जो बदले हों। उनकी रीढ़ की हड्डी में जोड़ नहीं थे। जापानी भाषा में कहावत है कि बन्दर पेड़ से ज़मीन पर गिर पड़े, फ़िर भी बन्दर ही रहता है, सो वह भी टार्जन की तरह।। Auuaauuu चिंघाड़ते जेल से निकले। सीधे अपने ख़ानदानी कब्रिस्तान गये। पिता की कब्र की पायंती की मिट्टी सर पर डाली। फातिहा (दुआ) पढ़ी और कुछ सोच कर मुस्कुरा दिये। दूसरे दिन दुकान खोली, केबिन के बाहर एक बल्ली गाड़ कर उस पर एक लकड़ी की टांग बढ़ई से बनवा कर लटका दी। सुब्ह शाम उसको रस्सी से खींच कर इस तरह चढ़ाते और उतारते थे, जिस तरह उस ज़माने में छावनियों में यूनियन जैक चढ़ाया उतारा जाता था। जिन्होंने दो साल से पैसा दबा रखा था उन्हें धमकी-भरे ख़त लिखे और अपने हस्ताक्षर के बाद ब्रेकेट में सजायाफ्ता (सजा पाया हुआ) लिखा। जेल जाने से पहले पत्रों में खुद को बड़े गर्व से “नंगे-असलाफ़” (पूर्वजों के अपमान का कारण) लिखा करते थे। किसी की मजाल न थी कि इससे असहमत हो। असहमत होना तो दूर की बात है, मारे डर के सहमत भी नहीं हो सकता था। अब अपने नाम के साथ “सजा-याफ्ता” इस प्रकार लिखने लगे जैसे लोग डिग्रियाँ या सम्मानसूचक शब्द लिखते हैं। कानून और जेल की झिझक निकल चुकी थी।

क़िबला जैसे गये थे, वैसे ही जेल काट कर वापस आ गये। तनतने और आवाज़ के कड़ाके में जरा अंतर न आया। इस बीच अगर ज़माना बदल गया तो उसमें उनका कोई दोष न था। उनका कहा हुआ विश्वसनीय तो पहले ही था अब अंतिम सत्य भी हो गया। काले मखमल की रामपुरी टोपी और अधिक तिरछी हो गयी, यानी इतनी झुका कर टेढ़ी ओढ़ने लगे कि दायीं आंख ठीक से नहीं खोल सकते थे। बीबी कभी घबरा के कहतीं ‘अब क्या होयेगा?’ तो वह ‘देखते हैं’ की जगह ‘देख लेंगे’ और ‘देखती जाओ’ कहने लगे। रिहाई के दिन नज़दीक आये थे तो दाढ़ी के बाल भी गुच्छेदार मूंछों में मिला लिये थे। जो अब इतनी घनी हो गयी थीं कि एक हाथ से पकड़ कर उन्हें उठाते, तब कहीं दूसरे हाथ से मुंह में खाने का कौर रख पाते थे। जेल उनका कुछ बिगाड़ न सकी। कहते थे यहीं तीसरी बैरक में एक मुंशी फ़ाजिल (B.A. पास) जालिया है, फ़साहत खान। ग़बन और धोखाधड़ी में तीन साल की कैद काट रहा है, बामुशक्कत। पहले ‘शोला’ अब `हज़ीं´ उपनाम रखा है। चक्की पीसते समय अपनी ही ताज़ा ग़ज़ल गाता रहता है। मोटा पीसता है और पिटता है अब यह कोई शायरी तो है नहीं। तिस पर खुद को ग़ालिब से कम नहीं समझता। हालांकि एक जैसी बात सिर्फ इतनी है कि दोनों ने जेल की हवा खायी।

खुद को रुहेला बताता है। होगा, लगता नहीं। कैदियों से भी मुंह छुपाये फिरता है। अपने बेटे से कह रखा है कि मेरे बारे में कोई पूछे तो कह देना कि अब्बा कुछ दिनों के लिये बाहर गये हैं। जेल को कभी जेल नहीं कहता, ज़िंदा कहता है। (जेल के लिये फारसी शब्द ) अरे साहब! ग़नीमत है कि जेलर को अज़ीज़े-मिश्र (मिश्र का बादशाह ) नहीं कहता। उसे तो चक्की को आसिया (चक्की के लिये अरबी शब्द) कहने में भी हिचक न होती मगर मैं जानूं पाट की अरबी मालूम नहीं। अरे साहब! मैं यहां किसी की जेब काट के थोड़े ही आया हूं। शेर को पिंजरे में क़ैद कर दो तब भी शेर ही रहता है। गीदड़ को कछार में आज़ाद छोड़ दो, और ज़ियादा गीदड़ हो जायेगा। अब हम ऐसे भी गये गुजरे नहीं कि जेल का घुटन्ना (घुटनों तक की निकर) पहनते ही स्वभाव बदल जाये। बल्कि हमें तो क़िबला की बातों से ऐसा लगता था कि फटा हुआ कपड़ा पहनने और जेल जाने को सुन्नते-यूसुफी समझते हैं उनके स्वभाव में जो टेढ़ थी वह कुछ और बढ़ गयी। कव्वे पर कितनी तकलीफें गुज़र जायें, कितना ही बूढ़ा हो जाये, उसके पर काले ही रहते हैं। खुर्रे, खुर्रे , खुरदरे, खरे या खोटे, वह जैसे कुछ भी थे, उनका बाहर और अंतर्मन एक था।

तन उजरा मन गादला, बगुला जैसा भेक

ऐसे से कागा भले, बाहर भीतर एक

कहते थे खुदा की करम है मैं मुनाफ़िक (पाखंडी) नहीं। मैंने गुनाह को हमेशा गुनाह समझकर किया।

दुकान दो साल से बंद पड़ी थी। छूट कर घर आये तो बीबी ने पूछा:

“अब क्या होयेगा?”

“बीबी, जरा तुम देखती जाओ”।

जारी………………

===========================================

पिछले अंक : 1. खोया पानी-1:क़िबला का परिचय 2. ख़ोया पानी 2: चारपाई का चकल्लस 3. खोया पानी-3:कनमैलिये की पिटाई 4. कांसे की लुटिया,बाली उमरिया और चुग्गी दाढ़ी़ 5. हवेली की पीड़ा कराची में 6. हवेली की हवाबाजी 7. वो तिरा कोठे पे नंगे पांव आना याद है 8. इम्पोर्टेड बुज़ुर्ग और यूनानी नाक 9. कटखने बिलाव के गले में घंटी 10. हूँ तो सज़ा का पात्र, पर इल्ज़ाम ग़लत है 11. अंतिम समय और जूं का ब्लड टैस्ट

===========================================

khoya_pani_front_coverकिताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

Technorati Tags: पुस्तक चर्चा, समीक्षा, काकेश, विमोचन, हिन्दी, किताब, युसूफी, व्यंग्य, humour, satire, humor, kakesh, hindi blogging, book, review, mustaq, yusufi, hindi satire, book review

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: पुस्तक चर्चा, समीक्षा, काकेश, विमोचन, हिन्दी, किताब, युसूफी, व्यंग्य

जब मैने पिछ्ला लेख लिखा था तब कोई इरादा नहीं था कि मैं कोई विवाद खड़ा करूं लेकिन ना जाने कुछ लोगों को वो पोस्ट विवादगर्भा लगी. खैर जाने दीजिये आप तो मेरी कहानी सुनिये जिसका वादा मैने अपनी पोस्ट में किया था. बचपन से अंग्रेजी ना जानना आपको कदम कदम पर परेशान करता है. जब मैं निचली कक्षाओं में था यानि कक्षा सात-आठ में तब कई मित्र ऎसे थे जो कक्षा पांच तक अंग्रेजी माध्यम से पढकर आये थे. उनके घर में अंग्रेजी माहौल भी था. यानि उनके माता पिता भी अंग्रेजी जानते थे.घर में अंग्रेजी अखबार आता ..अंग्रेजी पत्रिकाऎं आती.वो लोग अंग्रेजी गाने भी सुनते. तो कई बार बातों बातों में वो अंग्रेजी से संबंधित किसी बात की चर्चा करते तो मुझे कुछ भी समझ नहीं आता. वो लोग “हम्पटी डम्पटी सैट ऑन ऎ वॉल” या “बाबा बाबा ब्लैक शीप” जैसी पोयम की चर्चा करते तो वो सारी बातें अपने सर के ऊपर से निकल जाती. हम तो “चंदा मामा दूर के” या “ढोल बजाता भालू आया ढम ढम ढम” जैसी बाल कविताऎं जानते थे लेकिन उनकी चर्चा ही नहीं होती. उस समय मन को चोट लगती और एक हीन भावना का अहसास होता.

बचपन से ही लगा कि अपनी अंग्रेजी सुधारनी चाहिये.लेकिन सुधारें तो कैसे? घर में तो कोई खास अंग्रेजी जानता नहीं था. अंग्रेजी को सुधारने के लिये लोगों ने सलाह दी कि अंग्रेजी न्यूजपेपर पढ़ो. उसके ऎडिटोरियल पढो. लोगों की सलाह पर सप्ताह में एक बार अंग्रेजी समाचार पत्र भी लेना प्रारम्भ किया. लेकिन पूरे सप्ताह समाचार या ऎडिटोरियल पढ़ना या समझना तो दूर किसी एक लेख को लेकर ही लगे रहते. उसके कठिन शब्दों का डिक्सनरी से अर्थ निकाल कर एक कॉपी में नोट करते रहते.आधे अर्थ मिलते आधे नहीं.जो शब्द मिलते भी उसके भी तीन-चार अर्थ होते.तो यह समझ में नहीं आता कि कौन सा अर्थ कहाँ फिट बैठेगा. इसलिये आधी बातें समझ में आती आधी नहीं. हुआ यह कि इन शब्दों से तीन चार कॉपियाँ तो भर गयीं लेकिन अंग्रेजी ना सुधरनी थी ना सुधरी. 

फिर किसी ने सलाह दी कि “रेन एंड मार्टिन” की ग्रामर पढो. वह किताब भी उस छोटे शहर में नहीं मिली. किसी तरह उसे अन्य शहर से मंगवाया गया. मुझे अभी भी याद है लाल रंग के कवर में वह चमकीले कवर वाली किताब. वह मिली तो लगा अब तो सारी मुरादें पूरी हो जायेंगी और हम भी फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने लगेंगें. लेकिन उसे पढने से भी बहुत ज्यादा फायदा नहीं हुआ. ग्रामर के तो कई सारे नियम पता चल गये लेकिन अंग्रेजी बोलने समझने में कोई फरक नहीं पढ़ा उलटा हुआ यह कि अब अंग्रेजी में कुछ भी लिखने या बोलने से पहले यह सोचना पड़ता कि यह किस टैंस में हैं. यहाँ पर कौन सा वर्व है …कौन सा नाउन. तब लगा कि अंग्रेजी सचमुच बहुत कठिन है. अंग्रेजी बोलने वाले सारे लोग मुझे महान व भाग्यवान नजर आने लगे. मुझे लगने लगा कि शायद मैं कभी भी अंग्रेजी  लिख या बोल नहीं पाउंगा.

उन दिनों इंजीनियरिंग के लिये प्रवेश परीक्षाऎं अंग्रेजी में ही होती थीं.तब आज की तरह गली गली में इंजीनियरिंग कॉलेज नहीं थे. आई.आई.टी, रुड़की और एम.एन.आर. इन तीन परीक्षाओं में से किसी को पास करना इंजीनियरिंग में जाने वालों के लिये स्वप्न हुआ करता था. हमने भी यह तीनों परीक्षाऎं दी बारहवीं के बाद. उस समय तीनों अंग्रेजी में ही थी. और हुआ यह कि मैं इन तीनों में से किसी में भी पास नहीं हो पाया. इधर उसी साल बी.एस.सी में भी ऎडमीशन लिया था. लेकिन ध्यान तो सारा इंजीनियरिंग में था और फिर बी.एस.सी में भी अंग्रेजी में ही सब कुछ होना था. नतीजा यह हुआ कि जीवन में पहली बार फेल हो गया बी.एस.सी में .अगले साल सौभाग्य से एम.एन.आर की परीक्षा हिन्दी व अंग्रेजी दोनों में हुई. मैने हिन्दी माध्यम चुना और उसी वर्ष मैने उसे पास कर लिया और मेरा सलेक्सन इंजीनियरिंग में हो गया था.   

चलिये एक किस्सा और. इंजीनियरिंग में काफी हद तक अंग्रेजी ठीक ठाक हो गयी. अब अंग्रेजी समझ आने लगी. लिखना भी ठीक ठाक सा हो गया.( हालांकि इसके लिये काफी मेहनत करनी पड़ी पर वह कभी और….). लेकिन बोलने में अभी भी कई बार सोचना पड़ता. फायनल ईयर में कैम्पस के लिये कई कंपनियाँ आई. उस समय वोल्टाज कंपनी में नौकरी मिलना सौभाग्य माना जाता था. क्योकि उनकी चयन प्रक्रिया काफी लंबी होती थी. वो लोग दो बार पहले लिखित परीक्षा लेते उसके बाद साक्षात्कार होते. दोनों लिखित परीक्षाओं को मैने पास कर लिया. अब बारी साक्षात्कार की थी. मैं टाई वाई लगा के तैयार था. साक्षात्कार में पहुंचा तो अंग्रेजी में साक्षात्कार शुरु हुआ. शुरु की कई चीजें तो कई बार शीशे के सामने खड़े होकर रटी हुई थी तो वो तो फटाफट बता दीं. लेकिन जब बात आगे बढ़ीं तो मैने अटकना चालू कर दिया. उसी अटकन भटकन में सारी बातें भूलता गया. मैने उनसे हिन्दी में बोलने की इजाजत भी मांगी जिसे उन्होने मना कर दिया. किसी तरह से साक्षात्कार समाप्त हुआ. मैने परिणाम की प्रतीक्षा भी नहीं की. मैं सीधा हॉस्टल आ गया और अपने कमरे को बंद कर रोने लगा. उस दिन फिर मुझे अहसास हुआ कि अंग्रेजी ना जानने की कितनी बड़ी सजा मैं भुगत रहा हूँ.

आज मैं आराम से अंग्रेजी लिख,बोल सकता हूँ लेकिन इस अंग्रेजी की वजह से सब कुछ जानते हुए भी कितनी बार मुझे नीचा देखना पड़ा यह मैं ही जानता हूँ. मैने तो उन सब परिस्थितियों का मुकाबला कर लिया लेकिन कितने ही ऎसे लोग होंगे जो अंग्रेजी ना जानने की हीन भावना के कारण आगे ही नहीं बढ़ पाते होंगे.

अगले लेख में मैं अपने विचार रखुंगा मेरे विचार में इसका समाधान क्या. अभी तो बहुत पका दिया ना. खैर कोई नहीं लिखते लिखते बहुत कुछ लिख गया.  

मेरी पिछ्ली पोस्ट पर काफी अच्छे कॉमेंट आये.सागर जी और रचना जी के कॉमेंट प्रस्तुत हैं.

english-cocacolaसागर भाईसा बोले काकेश जी , इस लेख में तो विषयांतर हुआ कोई बात नहीं पर इस लेख की अगली कड़ी में उसे भी पूरा करें। क्यों कि मुझे यह लग रहा है कि आप मेरी कहानी लिख रहे हैं।
मैने हिन्दी माध्यम से ११वीं तक पढ़ाई की। बच्चों का भी यही हाल है। वे पहले राजस्थान में हिन्दी माध्यम से पढ़े।अब हम हैदराबाद में हैं, हिन्दी माध्यम की स्कूल पास ना होने की वजह से अंग्रेजी स्कूल में बच्चों को दाखिला दिलवाया। अब उनकी वह हालत है कि ना तो वे सही अंग्रेजी जानते हैं ना ही हिन्दी! रोज हम सब इस वजह से तनाव में जीते हैं क्यों कि मैं भी व्यवसाय में अंग्रेजी ना जानने की वजह से सफल नहीं हो पा रहा ना बच्चे अध्ययन में। बहुत कुछ कहना है पर और कभी,…

सागर भाई आपके अनुरोध पर इस लेख की अगली कड़ी में अपनी पूरी कहानी लिखुंगा. आप भी वादा करें उसके बाद अपनी कहानी लिखेंगे.  

रचना जी ने कहा

सबसे पहले मैं इस कमेन्ट में श्री सागर चंद नाहर जी से क्षमा मांगना चाहती हूँ क्योकि एक बार ईमेल पर उन्होने मुझसे कहा था की उन्हे इंग्लिश नहीं आती और मै हिन्दी में मेल दूं। मैने इस बात को सच नहीं माना क्योकि मुझे लगा की वह मुझे हिन्दी में लिखने को मजबूर करना चाहते है । तब मैं इस हिन्दी ब्लॉगिंग में नयी थी, और कई बार उसके बाद सागर जी के ब्लॉग पर गयी पर क्षमा मांगने का कोई अवसर नहीं मिला। आज मिला है तो सागर भाई क्षमा कर दे।english-of-india

अब बात इंग्लिश और हिन्दीकी , मैने इस विषय को कई बार उठाया है की सबको इंग्लिश कि जानकारी होनी चाहिये पर हर बार मुझे कमेंट्स मे गालियां तक मिली है । आज मैं इस ब्लोग पर ये कहना चाहती हूँ की अगर किसी को भी इंग्लिश मैं कोई भी सहायता चाहिये , जैसे कहीं अप्लिकेशन देनी हो , या किसी के भी बच्चे को इंग्लिश में फॉर्म इत्यादि भरना हो तो मुझ से निःसंकोच ईमेल पर सम्पर्क कर सकते है। कोई भी बात जो आप दूसरो से पूछने में हिचकते हो कि कोई क्या कहेगा उसे मुझे ईमेल कर दें, यथा संभव मैं आप को उसकी हिन्दी बता दूंगी । अगर रोमन मैं आप समझ लेंगे तो मेरा वक्त कम लगेगा पर अगर आवश्यक है तो मैं हिन्दी में भी लिख दूंगी । इंग्लिश मुश्किल नहीं है , आपकी हिचक इस को मुश्किल बनाती है । अगर आप को नहीं भी आती है तो भी अपने बच्चो को अवश्य इंग्लिश माध्यम से ही पढाएं । हिन्दी हमारा दिल है और इंग्लिश हमारा दिमाग और तरक्की के लिये दिमाग की जरुरत ज्यादा होती है । मातृ भाषा या राष्ट्र भाषा बदने की जरुरत नहीं है , जरुरत हैं अपनी सोच बदलने की , देश का विकास बिना इग्लिश के हो सकता है पर व्यक्ति के विकास में इंग्लिश का योगदान लेना कुछ बुरा नहीं है । और वह जितने लोग इंग्लिश कि बुराई करते हैं , यहाँ हिन्दी ब्लोगिंग समुदाय में भी उन सब के इंग्लिश में भी ब्लोग है !!! उनसब के घर मै इंग्लिश के अखबार भी आते हैं और उनमे बहुत से केवल टाइम पास के लिये भाषा पर वाद विवाद करते हैं ।

रचना जी आपका धन्यवाद. अगली पोस्ट में इस विषय पर फिर अपने विचार रखुंगा.

आप को लग रहा होगा कि मैं क्या बकवास कर रहा हूँ…. हिन्दी चिट्ठा लिखता हूँ लेकिन अंग्रेजी की वकालत कर रहा हूँ. लेकिन नहीं जी … मैं ऎसा सोच समझ कर कह रहा हूँ. कारण है कि हमारे महान देश भारत में कोई भी काम अंग्रेजी के बिना नहीं होता. किसी भी प्राइवेट कंपनी के कार्यालय में जायें आपको सारे लोग अंग्रेजी में ही काम करते मिल जायेंगें.

कल एक सज्जन से इसी विषय पर बातचीत हो रही थी. उनका कहना था कि सॉफ्टवेयर और काल सैंटर के क्षेत्र में हम इतने आगे इसलिये है क्योकि हम अच्छी अंग्रेजी जानते हैं. उनका यह भी कहना था कि अंग्रेजी के बिना कोई भी तकनीकी पढ़ाई पूरी नहीं हो सकती. इसलिये अंग्रेजी को तो बचपन से ही अनिवार्य कर देना चाहिये. वर्तमान स्थितियों में उन सज्जन की बात से असहमत नहीं हुआ जा सकता.

क्या अंग्रेजी के बिना विकास संभव नहीं है. यदि ऎसा है तो कई विकसित देश जैसे चीन,जापान, रशिया,जर्मनी जो बिना अंग्रेजी के ही विकसित हो गये वो कैसे हुए?

मुझे अपनी कहानी याद आ गयी. मेरी पढ़ाई हिन्दी माध्यम से हुई है. तो बचपन मेंमेरी अंग्रेजी भी वैसे ही थी जैसे एक आम हिन्दी माध्यम से पढे हुए विधार्थी की होती है यानि वो अंग्रेजी व्याकरण के तो बहुत से नियम जानता है लेकिन फिर भी ना सही सही अंग्रेजी लिख पाता ना बोल पाता है.मुझे लगता है कि हम लोग बच्चों को अंग्रेजी शिक्षा के नाम पर जो व्याकरण पढ़ाते हैं वो फायदे की जगह नुकसान ही करती है. कुछ भी लिखने व बोलने से पहले व्यक्ति उस वाक्य को व्याकरण की कसौटी पर तोलता है कि यह सही है या नहीं.खैर यह तो विषयातंर हो रहा है…. मैं जब आई.आई.टी. की तैयारी कर रहा था तो लोगों ने कुछ विशेष किताबों को पढने की सलाह दी. जैसे भौतिकी के लिये रैशनिक हैलीडे ( जो कि एक रशियन किताब का अंग्रेजी अनुवाद था) या गणित के लिये एम.एल.खन्ना. उस छोटे शहर में यह किताबें भला कहाँ मिलती…. तो किसी तरह यह किताबें दिल्ली से मंगवायी गयी. किताबें तो आगयीं लेकिन किताबें थीं तो अंग्रेजी में. भौतिकी का “जड़त्व आघूर्ण” किताब में ‘Moment of Inertia’ हो गया और समबाहू त्रिभुज ‘Equilateral Triangle’ बन गया.तो मुझे दो-तीन महीने तो यही सब समझने में लग गये कि किस तकनीकी शब्द को अंग्रेजी में क्या कहते हैं ….पढ़ाई क्या खाक करते. इस वजह से या किसी और वजह से आई.आई.टी. में सलैक्सन तो नहीं हुआ. लेकिन इस बात की कोफ्त हमेशा रही कि अगर आगे चलकर हमें यही सब अंग्रेजी में ही पढ़ना था तो हमें बचपन से ही अंग्रेजी में यह सब क्यों नहीं पढ़ाया गया. इसलिये हम जैसे चोट खाये और समझदार माँ बाप अपने बच्चों को हिन्दी माध्यम से नहीं पढ़ाना चाहते.

http://kakesh.comवैसे मुझे यह तर्क बेमानी लगता है कि अंग्रेजी के बिना विकास संभव नहीं है.क्या अंग्रेजी के बिना विकास सचमुच संभव नहीं है. यदि ऎसा है तो कई विकसित देश जैसे चीन,जापान, रशिया,जर्मनी जो बिना अंग्रेजी के ही विकसित हो गये वो कैसे हुए? जरूरत है तो इस दिशा में सही सोच की. आज हम गलत सलत ही सही लेकिन अग्रेजी लिखने बोलने को ही अपनी शान समझते हैं. यदि ऎसा ही है तो क्यों ना अंग्रेजी को ही राष्ट्रभाषा बना दिया जाये. कम से कम मेरे जैसे हिन्दी माध्यम से पढ़े बच्चों का तो भला हो ही जायेगा और वो मेरी तरह हीन भावना का शिकार तो नहीं होंगे कि वो आई.आई.टी. वालो से कमतर हैं इसलिये क्योकि वो अंग्रेजी नहीं जानते थे.

[ ऊपर का चित्र आई.आई.एम. की मेलिंग लिस्ट में आया था जिसे मेरे एक मित्र ने मेरे को मेल पर भेजा था. इसमें ठंडी बियर यानि "CHILLED BEER" को "CHILD BEAR" यानि भालू का बच्चा लिखा गया है.साइड में अखबारी जुगाड़ सागर चंद नाहर जी के सौजन्य से है.]

पड़ौस के पहलवान दुकान की टांग तोड़कर किबला जेल में थे. सब को चिंता थी कि किबला को कहीं जेल ना हो जाये लेकिन किबला हमेशा की तरह बेखबर थे.वो अपनी सजा को कम करवाने के लिये किसी की सिफारिस को भी तैयार ना थे. किबला की इसी मर्दानगी को खोया पानी में बखूबी वर्णित किया गया है. आप भी आनन्द लें.

===========================================

अंतिम समय और जूं का ब्लड टैस्ट

अदालत में फ़ौजदारी मुक़दमा चल रहा था। अनुमान यही था कि सजा हो जायेगी, ख़ासी लम्बी होगी। घर में हर पेशी के दिन रोना-पीटना मचता। दोस्त-रिश्तेदार अपनी जगह हैरान- परेशान कि जरा-सी बात पर यह नौबत आ गयी। पुलिस उन्हें हथकड़ी पहनाये सारे शहर का चक्कर दिला कर अदालत में पेश करती और पहलवान से इस सेवा का मेहनताना वुसूल करती। भोली-भाली बीबी को विश्वास नहीं आता था। एक-एक से पूछतीं ‘भैया! क्या सचमुच की हथकड़ी पहनायी थी?’ अदालत के अन्दर और बाहर क़िबला के तमाम दुश्मनों यानी सारे शहर की भीड़ होती। सारे ख़ानदान की नाक कट गयी मगर क़िबला ने कभी मुंह पर तौलिया और हथकड़ी पर रूमाल नहीं डाला। गश्त के दौरान मूंछों पर ताव देते तो हथकड़ी झन-झन, झन-झन करती। रमजान का महीना आया तो किसी ने सलाह दी कि नमाज़ रोज़ा शुरू कर दीजिये। अपने कान ही पूर के मौलाना हसरत मोहानी तो रोज़े में चक्की भी पीसते थे। क़िबला ने बड़ी हिक़ारत से जवाब दिया ‘लाहौल विला क़ुव्वत! मैं शायर थोड़े ही हूं। यह नाम होगा कि दुनिया के दुख न सह सका।’

बीबी ने कई बार पुछवाया ‘अब क्या होयेगा?’ हर बार एक ही जवाब मिला ‘देख लेंगे।’ क्रोधावस्था में जो बात मुंह से निकल जाये या जो काम हो जाये,उस पर उन्हें कभी लज्जित होते नहीं देखा। कहते थे कि आदमी के अस्ल चरित्र की झलक तो क्रोध के कौंदे में ही दिखायी देती है। इसलिए अपनी किसी करतूत यानी अस्ल चरित्र पर लज्जित या परेशान होने को मर्दों की शान के विरुद्ध समझते थे।

एक दिन उनका भतीजा शाम को जेल में खाना और जुऐं मारने की दवा दे गया, दवा के विज्ञापन में लिखा था कि इसके मलने से जुऐं अंधी हो जाती हैं, फ़िर उन्हें आसानी से पकड़ कर मारा जा सकता है। जूं और लीख मारने की तरकीब भी लिखी थी, यानी जूं को बायें हाथ के अंगूठे पर रखो और दायें अंगूठे के नाखून से चट से कुचल दो। अगर जूं के पेट से काला या गहरा लाल खून निकले तो तुरन्त हमारी दवा अक्सीरे-जालीनूस’-खून साफ़ करने वाली-पी कर अपना खून साफ़ कीजिये। पर्चे में यह निर्देश भी था कि दवा का कोर्स उस समय तक जारी रखिये जब तक कि जूं के पेट से साफ़-सुर्ख़ खून न निकलने लगे। क़िबला ने जंगले के उस तरफ़ से इशारे से भतीजे को कहा कि अपना कान मेरे मुंह के पास लाओ। फ़िर उससे कहा कि बरखुरदार! ज़िंदगी का भरोसा नहीं, संसार इस जेल-समेत नश्वर है। ग़ौर से सुनो, यह मेरा आदेश भी है और वसीयत भी। लोहे की अलमारी में दो हज़ार रुपये आड़े समय के लिये रद्दी अखबारों के नीचे छुपा आया था। रुपया निकाल कर अल्लन (शहर का नामी गुंडा) को दे देना। अपनी चची को मेरी ओर से तसल्ली देना। अल्लन को मेरी दुआ कहना और यह कहना कि छओं को ऐसी ठुकाई करे कि घर वाले सूरत न पहचान सकें। यह कहकर अखबार का एक मसला हुआ पुर्जा भतीजे को थमा दिया, जिसके किनारे पर उन छ: गवाहों के नाम लिखे थे, जिन को पिटवाने की योजना उन्होंने जेल में उस समय बनायी थी जब ऐसी ही हरकत पर उन्हें आजकल में सजा होने वाली थी।

एक बार इतवार को उनका भतीजा जेल में मिलने आया और उनसे कहा कि जेलर तक आसानी से सिफारिश पहुंचायी जा सकती है। अगर आपका जी किसी ख़ास खाने जैसे ज़र्दा या दही बड़े, शौक की मसनवी (एक पुराने शायर का महाकाव्य), सिगरेट या महोबे के पान को चाहे तो चोरी छुपे हफ्ते में कम-से-कम एक बार आसानी से पहुंचाया जा सकता है। चची ने याद करके कहने को कहा है। ईद करीब आ रही है, रो-रो कर उन्होंने आंखें सुजा ली हैं। क़िबला ने जेल के खद्दर के नेकर पर दौड़ता हुआ खटमल पकड़ते हुए कहा, मुझे किसी चीज़ की कोई ज़ुरूरत नहीं। अगली बार आओ तो सिराज फ़ोटोग्राफ़र से हवेली का फ़ोटो खिंचवा के ले आना। कई महीने हो गये देखे हुए। जिधर तुम्हारी चची के कमरे की चिक है उस ओर से खींचे तो अच्छी आयेगी।

संतरी ने ज़मीन पर ज़ोर से बूट की थाप लगाते और थ्री-नाट-थ्री की राइफ़ल का कुन्दा बजाते हुए डपट कर कहा कि मुलाक़ात का समय समाप्त हो चुका। ईद का खयाल करके भतीजे की आंखें डबडबा आयीं और उसने नज़रें नीची कर लीं। उसके होंठ कांप रहे थे। क़िबला ने उसका कान पकड़ा और खींच कर अपने मुंह तक लाने के बाद कहा, हां! हो सके तो जल्दी से एक तेश चाक़ू, कम से कम छ: इंच के फल वाला, डबल रोटी या ईद की सिवैंयों में छुपा कर भिजवा दो। दूसरे, बम्बई में “Pentangular” शुरु होने वाला है। किसी तरकीब से मुझे रोजाना स्कोर मालूम हो जाये तो वल्लाह! हर रोज़ ईद का दिन हो, हर रात शबे-बरात। ख़ास तौर से वज़ीर अली का स्कोर दिन के दिन मालूम हो जाये तो क्या कहना। सजा हो गयी, डेढ़ साल कैदे-बामुशक़्कत (सश्रम कारावास) फैसला सुना, सर उठा कर ऊपर देखा। मानो आसमान से पूछ रहे हों ‘तू देख रहा है! यह क्या हो रहा है?’ How’s that? पुलिस ने हथकड़ी डाली। क़िबला ने किसी प्रकार की प्रतिक्रिया शाहिर नहीं की। जेल जाते समय बीबी को कहला भेजा कि आज मेरे पुरखों की आत्मा कितनी प्रसन्न होगी, कितनी भाग्यशाली हो तुम कि तुम्हारा दूल्हा (जी हां! यही शब्द इस्तेमाल किया था) एक हरामज़ादे की ठुकाई करके मर्दों का ज़ेवर पहने जेल जा रहा है। लकड़ी की टांग लगवा कर घर नहीं आ रहा। दो रक़अत (नमाज़ में खड़े होने, झुकने और माथा टेकने को एक रक़अत कहते हैं) नमाज़ शुकराने (धन्यवाद निवेदन) की पढ़ना। भतीजे को निर्देश दिया कि हवेली की मरम्मत कराते रहना, अपनी चची का खयाल रखना। उनसे कहना, ये दिन भी गुज़र जायेंगे, दिल भारी न करें और जुमे को कासनी दुपट्टा ओढ़ना न छोड़ें।

बीबी ने पुछवाया, ‘अब क्या होयेगा?’

जवाब मिला, ‘देखा जायेगा।’

जारी………………

===========================================

पिछले अंक : 1. खोया पानी-1:क़िबला का परिचय 2. ख़ोया पानी 2: चारपाई का चकल्लस 3. खोया पानी-3:कनमैलिये की पिटाई 4. कांसे की लुटिया,बाली उमरिया और चुग्गी दाढ़ी़ 5. हवेली की पीड़ा कराची में 6. हवेली की हवाबाजी 7. वो तिरा कोठे पे नंगे पांव आना याद है 8. इम्पोर्टेड बुज़ुर्ग और यूनानी नाक 9. कटखने बिलाव के गले में घंटी 10. हूँ तो सज़ा का पात्र, पर इल्ज़ाम ग़लत है

===========================================

khoya_pani_front_coverकिताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

Technorati Tags: पुस्तक चर्चा, समीक्षा, काकेश, विमोचन, हिन्दी, किताब, युसूफी, व्यंग्य, humour, satire, humor, kakesh, hindi blogging, book, review, mustaq, yusufi, hindi satire, book review

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: पुस्तक चर्चा, समीक्षा, काकेश, विमोचन, हिन्दी, किताब, युसूफी, व्यंग्य

अगड़म बगड़म वाले आलोक जी ने टिप्पणी की ये सच्चे अर्थों में अद्भभुत उपन्यास है। इसकी कई परतें हैंजी, जितनी बार पढ़ेंगे, उतनी बार नयी खुलेंगी। व्यंग्यकार सच्ची में क्या होता है. कितना पढ़ा लिखा होता है, कित्ता बड़ा आबजर्वर होता है., ये मसले इस उपन्यास को पढ़कर खुलते हैं।दरअसल यह किताब हास्य-व्यंग्य की टेक्स्टबुकों में एक मानी चाहिए।” यहाँ पर मैं यह खुलासा करता चलूँ कि इस उपन्यास के विमोचन समारोह का निमंत्रण मुझे आलोक जी की वजह से ही मिला था वरना अपन को पहचानता ही कौन है. तो लीजिये पेश है अगली कड़ी.

===========================================

रावण क्यों मारा गया

क़िबला की दुकानदारी और उनकी लायी हुई परेशानियों का कोई एक उदाहरण हो तो बतायें। कोई ग्राहक ज़रा-सा भी उनकी किसी बात या भाव पर शक करे तो फ़िर उसकी इज़्ज़त ही नहीं, हाथ पैर की भी ख़ैर नहीं। एक बार जल्दी में थे। लकड़ी की क़ीमत छूटते ही दस रुपये बता दी। देहाती ग्राहक ने पौने दस रुपये लगाये और ये गाली देते हुए मारने को दौड़े कि जट गंवार की इतनी हिम्मत कैसे हुई। दुकान में एक टूटी हुई चारपाई पड़ी रहती थी। जिसके बानों को चुरा-चुरा कर आरा खींचने वाले मज़दूर चिलम में भरकर सुल्फे के दम लगाते थे। क़िबला जब बाक़ायदा सशस्त्र हो कर हमला करना चाहते तो इस चारपाई का सेरुवा यानी सिरहाने की पट्टी निकालकर अपने दुश्मन (ग्राहक) पर झपटते। अक्सर सेरुवे को पुचकारते हुए कहते, “अजीब सख़्तजान है, आज तक इसमें फ़्रैक्चर नहीं हुआ। लठ रखना बुज़दिलों और गंवारों का काम है और लाठी चलाना कसाई, कुजड़ों, गुंडों और पुलिस का।“ प्रयोग में लाने के बाद सेरुवे की फर्स्ट एड करके यानी अंगोछे से अच्छी तरह झाड़-पोंछ कर वापस झिलंगे में लगा देते। इस तरीके में ख़ास बात शायद यह थी कि चारपाई तक जाने और सेरुवा निकालने के बीच अगर गुस्से को ठंडा होना है तो हो जाये, और जिस पर गुस्सा किया जा रहा है वो अपनी टांगों का प्रयोग करने में कंजूसी से काम न ले। (एक पुरानी चीनी कहावत है कि लड़ाई के जो तीन सौ सतरह पैंतरे ज्ञानियों ने गिनवाये हैं, उनमें जो पैंतरा सबसे उपयोगी बताया गया है वो यह है कि भाग लो) इसकी पुष्टि हिन्दू देवमाला से भी होती है। रावण के दस सर और बीस हाथ थे, फ़िर भी मारा गया। इसकी वज्ह हमारी समझ में तो यही आती है-भागने के लिये टांगें सिर्फ दो थीं। हमला करने से पहले क़िबला कुछ देर खौंखियाते ताकि विरोधी अपनी जान बचाना चाहता है तो बचा ले।बताते थे, आज तक ऐसा नहीं हुआ कि किसी की ठुकाई करने से पहले मैंने उसे गाली देकर खबरदार न किया हो।

हूँ तो सज़ा का पात्र, पर इल्ज़ाम ग़लत है

क़िबला का आतंक सबके दिलों पर बैठा था, बस दायीं तरफ़ वाला दुकानदार बचा हुआ था। वो कन्नौज का रहने वाला, अत्यिध्क दंभी, हथछुट, दुर्व्यवहारी और बुरी ज़बान का आदमी था। उम्र में क़िबला से बीस साल कम होगा। यानी जवान और धृष्ट। कुछ साल पहले तक अखाड़े में बाक़ायदा ज़ोर करता था। पहलवान सेठ कहलाता था। एक दिन ऐसा हुआ कि एक ग्राहक क़िबला की सीमा में 3/4 प्रवेश कर चुका था कि पहलवान सेठ उसे पकड़ कर घसीटता हुआ अपनी दुकान में ले गया और क़िबला “महाराज! महाराज!” पुकारते ही रह गये। कुछ देर बाद वो उसकी दुकान में घुस कर ग्राहक को छुड़ाकर लाने की कोशिश कर रहे थे कि पहलवान सेठ ने उनको वो गाली दी जो वो खुद सबको दिया करते थे।

फ़िर क्या था। क़िबला ने अपने ख़ास शस्त्र-भंडार से यानी चारपाई से पट्टी निकाली और नंगे-पैर दौड़ते हुए उसकी दुकान में दुबारा घुसे। ग्राहक ने बीच-बचाव कराने का प्रयास किया और पहली झपट में अपना दांत तुड़वाकर बीच-बचाव की कारवाई से रिटायर हो गया। बुरी ज़बान वाला पहलवान सेठ दुकान छोड़ कर बगटुट भागा। क़िबला उसके पीछे सरपट। थोड़ी दूर जा कर उसका पांव रेल की पटरी में उलझा और वो मुंह के बल गिरा। क़िबला ने जा लिया। पूरी ताकत से ऐसा वार किया कि पट्टी के दो टुकड़े हो गये। मालूम नहीं इससे चोट आयी या रेल की पटरी पर गिरने से, वो देर तक बेहोश पड़ा रहा। उसके गिर्द खून की तलैया-सी बन गयी।

पहलवान सेठ की टांग के मल्टीपल फ़्रैक्चर में गैंग्रीन हो गया और टांग काट दी गयी। फौजदारी का मुक़दमा बन गया। उसने पुलिस को खूब पैसा खिलाया और पुलिस ने पुरानी दुश्मनी के आधार पर क़िबला का, कत्ल की कोशिश के इल्ज़ाम में, चालान पेश कर दिया। लम्बी चौड़ी चार्ज शीट सुनकर, क़िबला कहने लगे कि टांग का नहीं क़ानून का मल्टीपल फ़्रैक्चर हुआ है। पुलिस गिरफ्ऱतार करके ले जाने लगी तो बीबी ने पूछा ‘अब क्या होयेगा?’ कंधे उचकाते हुए बोले ‘देखेंगे।’ अदालत में बीच-बचाव करने वाले ग्राहक का दांत और कत्ल का हथियार यानी चारपाई की खून पिलायी हुई पट्टी Exhibits के तौर पर पेश किये गये। मुकद्दमा सेशन के सुपुर्द हो गया। क़िबला कुछ अर्से रिमांड पर न्यायिक हिरासत में रहे थे। अब जेल में बाक़ायदा खूनियों, डाकुओं, जेबकतरों और आदी-मुजरिमों के साथ रहना पड़ा। तीन-चार मुचैटों के बाद वो भी क़िबला को अपना चचा कहने और मानने लगे।

उनकी ओर से यानी बचाव-पक्ष के वकील की हैसियत से कानपुर के एक योग्य बैरिस्टर मुस्तफा रजा क़िज़िलबाश ने पैरवी की, मगर वकील और मुविक्कल की किसी एक बात पर भी सहमति न हो सकी। क़िबला को ज़िद थी कि मैं हलफ़ उठा कर यह बयान दूंगा कि शिकायत करने वाले ने अपनी वल्दियत ग़लत लिखवाई है, इसकी सूरत अपने बाप से नहीं, बाप के एक बदचलन दोस्त से मिलती है।

वकील साहब इस बात पर ज़ोर देना चाहते थे कि चोट रेल की पटरी पर गिरने से आई है, मुल्ज़िम के मारने से नहीं, उधर क़िबला अदालत में फ़िल्मी बैरिस्टरों की तरह टहल-टहल कर कटहरे को झंझोड़-झंझोड़ कर ये एलान करना चाहते थे कि मैं सिपाही का बच्चा हूं। दुकानदारी मेरे लिये कभी मान-सम्मान पाने का ज़रिया नहीं रही, बल्कि काफी समय से आमदनी का ज़रिया भी नहीं रही। टांग पर वार करना हमारी सिपाहियाना शान और मर्दानगी की तौहीन है। मैं तो दरअसल इसका सर टुकड़े-टुकड़े करना चाहता था। इसलिये अगर मुझे सज़ा देना ही ज़ुरूरी है तो टांग तोड़ने की नहीं, ग़लत निशाने की दीजिये। “सज़ा का पात्र हूं, मगर इल्ज़ाम ग़लत है।“

जारी………………

===========================================

पिछले अंक : 1. खोया पानी-1:क़िबला का परिचय 2. ख़ोया पानी 2: चारपाई का चकल्लस 3. खोया पानी-3:कनमैलिये की पिटाई 4. कांसे की लुटिया,बाली उमरिया और चुग्गी दाढ़ी़ 5. हवेली की पीड़ा कराची में 6. हवेली की हवाबाजी 7. वो तिरा कोठे पे नंगे पांव आना याद है 8. इम्पोर्टेड बुज़ुर्ग और यूनानी नाक 9. कटखने बिलाव के गले में घंटी

===========================================

khoya_pani_front_coverकिताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

 

Technorati Tags: पुस्तक चर्चा, समीक्षा, काकेश, विमोचन, हिन्दी, किताब, युसूफी, व्यंग्य, humour, satire, humor, kakesh, hindi blogging, book, review, mustaq, yusufi, hindi satire, book review

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: पुस्तक चर्चा, समीक्षा, काकेश, विमोचन, हिन्दी, किताब, युसूफी, व्यंग्य

कानपुर हॉस्टल में मेरे एक कवि मित्र हुआ करते थे.मित्र तो अभी भी हैं लेकिन उनसे मेरी मुलाकात पिछ्ले 12-13 सालों से नहीं हुई है.एक दिन अचानक उनका फोन आया और फोन करते ही बोले “काकेश भाई”. हम सोचे कि कोई ब्लॉगर मित्र ही होगा. वरना खाकसार को कौन याद करता है इस नाम से.पता चला कि हमारे पुराने मित्र हैं और यहीं इसी शहर में रह रहे हैं.कहीं से उनको हमारा नम्बर मिला और उन्होने हमें फोन कर लिया.

अब इन मित्र की क्या तारीफ करूँ. हॉस्टल के जमाने से मैं इनकी कविताओं का मुरीद रहा हूँ.कई दिनों से मैं इन्हें ढूंढ भी रहा था. इसी लिये एक बार फुरसतिया जी को ई-पत्र भी लिखा था.लेकिन इनका पता नहीं लग पाया.अब पता चला कि ये यहीं दिल्ली में हैं तो तुरत अपने ब्लॉग का पता दिया. ताकि एक पाठक तो और बढ़े वरना अपन को तो गिने चुने लोग ही पढ़ते हैं. इन्होने पढ़ा और तुरंत अपनी छाप छोड़ी कविता के माध्यम से. इनके बारे में एक बात और बता दूँ कि इनके पास तब ( अब पता नहीं) कविताओं का भरपूर स्टॉक रहता था. हर अवसर पर एक कविता तैयार रहती थी. मैं यदि कभी मंच संचालन कर रहा होता तो इनकी एक आध कविता जरूर सुनाता.किसी एक फेयरवेल में इनकी कविता जो लाइने मैने सुनायी थी वो मुझे अभी भी याद हैं.

आदमी की ज़िन्दगी है, ज़ुगनुओं की रोशनी
कौन जाने कब यह नूर गुल हो जायेगा
हम नहीं होंगे ना होंगे आप लेकिन
याद में अपनी यह वक्त फिर फिर आयेगा.

खैर ये हमारे ब्लॉग पर आये और रोमन में अपनी कविताई छाप छोड़ गये. जो इस प्रकार थी.

नराई के बहाने सिर्फ नराई वाले लेख पर यह बोले.

पत्र तुम्हारा नेह संस्करण लगता है…
पंक्ति पंक्ति पीयुष प्रेम का बहता है
शब्द शब्द संबोधित करता प्रानों को
अक्षर अक्षर हाल तुम्हारा कहता है.

और हमारे एक व्य़ंग्य पर इनका कहना था.

भाई वाह! आप तो सचमुच कमाल करते हो
लफ़्जों को छूरी जैसे इस्तेमाल करते हो
हास्य के हाथों व्यवस्था के रुग्ण चेहरे पर
अश्क अर्थों के, व्यंग्य के रुमाल रखते हो.

अब हम इनके पीछे पड़ गये कि भाई अपना ब्लॉग बनाओ. ताकि फिर से इनकी कविताओं का स्वाद चख सकें.इनकी ना नुकुर चलती रही. इनको कंप्यूटर में हिन्दी लिखने की समस्या थी. उसके लिये इन्हे पूरा प्रोसीजर भी भेजा. फोन पे भी तकादा चलता रहा. फिर थक हार के इन्होने एक और कविता हमें भेजी इस आशय की कि ये ब्लॉग नहीं लिख पायेंगे.

नशे मे प्यार के रहने की है आदत तुमको,
बहक तो हमको ही जाना है ,तुम ना साथ चलो.

मैं तो अनजान था दुनियाँ की नज़र में अब तक,
जानता तुमको ज़माना है, तुम ना साथ चलो.

दिल में आबाद था जो दर्द-ए-गुलिश्तां कब से,
नज़र आ जाएगा सबको कि, तुम ना साथ चलो.

इतनी सुन्दर कविता पढ़ने के बाद तो लगा कि ये सारी कविताओं से हम वंचित क्यों रहें. और तुक्का देखिये एक तो कनपुरिया ऊपर से पांडे.लेकिन हम भी कहाँ मानने वाले थे. पीछे पड़े रहे. हारकर उन्हें ब्लॉग बनाना ही पड़ा. तो आप भी उन्हें पढिये और उनसे गुजारिश करिये कि वो नियमित लिखते रहें ताकि हम सभी उनकी कविताओं का आनन्द ले सकें.

उनका ब्लॉग है “मेरा निर्झर”. अभी तो मात्र दो कविताऎं चिपकायी हैं लेकिन शीघ्र ही और भी लिखेंगे ऎसा कहना है उनका.

© 2012 काकेश की कतरनें Suffusion theme by Sayontan Sinha