उपस्थित हूँ फिर से कुछ दिनों की छुट्टियां बिताने के बाद. छुट्टियों में मैने अधिकतर चिट्ठे पढे पर हर जगह टिप्पणी नही दे पाया …कारण इंटरनैट की धीमी गति. पिछ्ले दिनों ट्रेन से अपने होमटाउन (अब होमटाउन की हिन्दी क्या होगी यह कोई सुधी जन बताये) जाना हुआ.शाम 4 बजे की ट्रेन थी लेकिन दीवाली से पहले वाला दिन था तो ट्रैफिक जाम का अन्देशा था. वैसे भी इससे पहले वाले दिन यानि धनतेरस के दिन दिल्ली में भयंकर ट्रैफिक जाम लगा था.इसी लिये ऑफिस से थोड़ी जल्दी रवाना हो गया और 2 बजे के आसपास पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंच गया.

उस दिन प्लेटफार्म पर काफी भीड़ थी अधिकतर लोग दीपावली के कारण अपने घरों की ओर प्रस्थान कर रहे थे. मैने अभी तक लंच नहीं किया था तो मैं यह समझने का प्रयास कर रहा था कि इतनी भीड़ में कहाँ कैसे अपनी भूख शांत करूँ. तभी एक कोने में कई विदेशी पर्यटक नजर आये.पर्यटकों में महिलाओं की संख्या पुरुषों से ज्यादा थी. वे लोग प्लेटफॉर्म पर लगी रेलवे समय सारणी को बड़े ध्यान से देख रहे थे. कुछ पर्यटक उड़ते कबूतरों को अपने कैमरे में कैद करने की कोशिश कर रहे थे. मैं उनके करीब से गुजरा तो कान उनके वार्तालाप पर थे. कुछ ध्यान से सुनने पर लगा कि वो अंग्रेजी में बात नहीं कर रहे बल्कि किसी और भाषा में बात कर रहे हैं. वह भाषा भी कुछ जानी पहचानी सी लगी. और ध्यान से सुनने पर पता चला कि वो स्पैनिश में बात कर रहे हैं. किसी जमाने में मैने यह भाषा सीखी थी. मुझे लगा कि मुझे उनसे बात करनी चाहिये..आखिर बात प्रारम्भ करने का सूत्र तो पकड़ ही सकता हूँ. लेकिन हिम्मत सी नहीं हुई. कुछ देर वहीं खड़े होकर उनकी बातें सुनने लगा. हालांकि यह दर्शाने की पूरी कोशिश की कि मेरा ध्यान कहीँ और है. संयोग से एक पर्यटक ने पूछ ही लिया कि हावड़ा राजधानी एक्सप्रेस का समय क्या है. उसने यह प्रश्न अंग्रेजी में पूछा था जिसका जबाब भी मैने अंग्रेजी में दिया. लेकिन फिर मैने उसे अंग्रेजी में ही बताया कि मैं स्पेनिश समझ सकता हूँ…वह मुस्कुराया..मैने बोलने की कोशिश की.

हाबलो अन पोको एस्पिनिऑल (Hablo un poco español) : मैं थोड़ा थोड़ा स्पैनिश समझ सकता हूँ.

मेरी बात सुनके कुछ पर्यटक वहाँ और आ गये.करीब दस मिनट तक हम अंग्रेजी,स्पैनिश में बात करते रहे.उनसे पता लगा कि वो राजधानी एक्सप्रेस से हावड़ा जा रहे हैं और वहाँ से उनका दार्जिलिंग जाने का प्लान है. खाने के प्रति वो थोड़ा चितित दिखे. उन्हे भारतीय मसाले व मिर्च रास नहीं आ रहे थे. मैने उनके सामने राजधानी एक्सप्रेस की खूब तारीफ की. मैने उन्हे बताया कि राजधानी में कॉटिनेंटल खाना भी मिलता है क्योकि भारतीय रेलवे अपने यात्रियों का बहुत ख्याल रखती है. हाँलाकि मुझे मालूम था कि झूठी  तारीफ कर रहा हूँ लेकिन फिर भी विदेशियों के सामने आप बुराई भी तो नहीं कर सकते ना. उन लोगो ने मेरा कार्ड भी लिया और मेरे कुछ फोटो भी खीचे. मैने भी उनकी मेल आई. डी. ले ली.मुझे उस समय ध्यान नहीं रहा कि मैं भी अपने मोबाइल से उन लोगों की फोटो ले सकता हूँ अन्यथा मैं भी कुछ फोटो लेकर यहाँ चिपकाता.

मैंrailway-food फिर लंच की तलाश में निकला तो देखा कि रेलवे का सैल्फ सर्विस वाला रैस्टोरेंट पास ही है. अन्दर जाकर देखा तो एक बोर्ड में सभी खाद्य सामग्रियों के दाम लिखे थे. मैने उसी में देख कर मसाला डोसा खाने की इच्छा व्यक्त की तो पता चला कि थाली के अलावा वहाँ कुछ भी उपलब्ध नहीं था. थाली के लिये भी चावल अभी पक रहा था और उसके लिये 15-20 मिनट की प्रतीक्षा करनी पड़ती. मैने वहाँ काउंटर वाले सज्जन से कहा कि मेरे को केवल रोटी ही दे दे तो वह गहन सोच में पड़ गया लेकिन फिर वहाँ खड़े दूसरे सज्जन ने कहा कि आप बैठिये. मैं बाइस रुपये देकर एक कुर्सी पर बैठ गया.करीब पांच मिनट बाद मेरा नम्बर आया. थाली में दो तीन चीजें ( वह सब्जी थी कि दाल समझ में ही नहीं आया क्योकि सब में आलू अनिवार्य रूप से थे) और दही था. सब्जियां ठंडी थी.रोटियों में ऊपर की दो रोटी गरम और बाकीं दो एकदम ठंडी थी. सब्जियां और दही एक दूसरे से मिलकर अनन्य प्रेम भाव की सृष्टि कर रहे थे.खैर किसी तरह से दो रोटी खा के मैं उठ गया.

मैं सोच रहा था यदि वो स्पैनिश पर्यटक रेलवे का यह खाना खाते तो उनके मन में भारतीय रेल की क्या छवि बनती.

ज्ञान जी बोले “भैया, यह बताना कि यूसुफी जी ने यह लिखने में कितना समय लिया था। हमें तो इस छाप का सोचने में इतना समय लगे कि उम्र निकल जाये!” . सच जब से मैने यह उपन्यास पढ़ना शुरु किया कुछ इसी तरह के विचार मेरे दिल में भी आये थे.संजीत जी ने कहा “इतनी किश्तें पढ़ने के बाद कहा जा सकता है कि वाकई अद्भुत व्यंग्य उपन्यास है।”. तो मैं संजीत जी से कहना चाहुंगा कि अभी तो ये शुरुआत है..आगे आगे देखिये होता है क्या. तो आइये आगे पढ़ें.

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कटखने बिलाव के गले में घंटी

आहिस्ता-आहिस्ता बीबी को सब्र आ गया। एक बेटी थी। क़िबला को वह अत्यन्त प्रिय होती गयी। इस हद तक सब्र आ गया कि अक्सर कहते, ख़ुदा बड़ा दयावान है। उसने बड़ी मेहरबानी की जो बेटा न दिया। अगर मुझ पर पड़ता तो सारी उम्र परेशान होता और अगर न पड़ता तो मैं नालायक को निकाल बाहर करता। ’सयानी बेटी कितनी भी चहेती हो, मां-बाप की छाती पर पहाड़ होती है।

लड़की, रिश्तों के इश्तेहार के अनुसार देखने में ठीकठाक, सुशील, हंसमुख, घरेलू काम काज में माहिर, लेकिन किसका बुरा वक़्त आया था कि क़िबला की बेटी के लिये रिश्ता भेजे। हमें नमरूद की आग में निर्भय होकर कूदने से कहीं ज़ियादा खतरनाक काम नमरूद की वंशावली में कूद पड़ना लगता है। जैसा कि हम पहले बता चुके हैं, क़िबला हमारे मित्र बिशारत के फूफा, चचा और अल्लाह जाने! क्या-क्या लगते थे। दुकान और मकान दोनों-प्रकार से पड़ोसी भी थे। बिशारत के पिता भी रिश्ते के पक्ष में थे, लेकिन सन्देशा भेजने से साफ़ इन्कार कर दिया कि बहू के बिना फ़िर भी गुज़ारा हो सकता है लेकिन नाक और टांग के बिना तो व्यक्तित्व अधूरा-सा लगेगा। बिशारत ने रेल की पटरी से खुद को बंधवाकर बड़ी लाइन के इंजन से आत्महत्या करने की धमकी दी। रस्सियों से बंधवाने की शर्त खुद इसलिये लगा दी कि कहीं ठीक समय पर डर कर भाग न जायें लेकिन उनके पिता ने साफ़ कह दिया कि उस कटखने बिलाव के गले में तुम्हीं घंटी बांधो।

क़िबला मुंहफट, बदतमीज़ मशहूर ही नहीं थे, थे भी। वो दिल से, बल्कि बेदिली से भी, किसी की इज़्जत नहीं करते थे। दूसरे को ज़लील करने का कोई-न-कोई कारण ज़ुरूर निकाल लेते। मिसाल के तौर पर अगर किसी की उम्र उनसे एक महीना भी कम हो तो उसे लौंडा कहते और अगर एक साल ज़ियादा तो बुढ़ऊ।

ज्वालामुखी पहाड़ में छलांग

बिशारत ने इन दिनों बी.ए. का इम्तिहान दिया था और पास होने की संभावना फ़िप्टी-फ़िप्टी थी। फ़िप्टी-फ़िप्टी इतने गर्व और विश्वास से कहते थे जैसे अपनी कांटा-तौल की हुई आधी-नालायक़ी से इम्तिहान लेने वाले को कड़ी परीक्षा में डाल दिया है। फुर्सत-ही-फुर्सत थी। कैरम और कोट पीस खेलते। आत्माओं को बुलाते और उनसे ऐसे प्रश्न करते कि ज़िदों को शर्म आती। कभी दिन-भर बैठे नज़ीर अकबराबादी के कविता संग्रह में बिंदुओं वाले ब्लैंक भरते रहते जो मुंशी नवल किशोर प्रेस ने सभ्यता की मांग और भारतीय क़ानून की वज्ह से ख़ाली छोड़ दिये थे। बातचीत में हर वाक्य के बाद शेर का ठेका लगाते। कहानी लिखने का अभ्यास भी जारी था।

आखिरकार एक सुहानी सुब्ह बिशारत ने खुद अपने हाथ एक पर्चा लिखा और रजिस्ट्री से भिजवा दिया। हालांकि जिसे भेजा उसके मकान की दीवार उनके मकान की दीवार से मिली हुई थी। सन्देशा 23 पृष्ठों और लगभग पचास शेरों पर आधारित था। इनमें से आधे शेर उनके अपने और आधे अंदलीब शादानी के थे, जिनसे क़िबला के भाइयों जैसे संबंध थे। उस ज़माने में संदेशे केसर से लिखे जाते थे। लेकिन इस संदेश के लिये तो केसर का एक खेत भी अपर्याप्त होता। इसलिये सिर्फ सम्मानसूचक संबोधन केसर से और बाक़ी बातें लाल-सियाही से ज़ैड के मोटे निब से लिखीं। जिन हिस्सों पर ख़ास-तौर से ध्यान दिलाना था, उन्हें नीली सियाही से बारीक अक्षरों में लिखा। बात हालांकि धृष्टतापूर्ण थी, लेकिन भाव फ़िर भी ताबेदारी का और अंदाज़ बेहद चापलूसी का था। क़िबला के अच्छे स्वभाव, हंसमुखपन, मुहब्बत की जी खोल कर प्रशंसा की, जिसकी परछाई तक क़िबला के चरित्र में न थी। साथ-साथ दुश्मनों की नाम ले-ले कर डट कर बुराई की। उनकी संख्या इतनी थी कि 23 पृष्ठों की मिट्टी के पियाले में रखकर खरल करना उन्हीं का काम था। बिशारत ने जी कड़ा करके ये तो लिख दिया कि मैं शादी करना चाहता हूं। लेकिन ये कहने की हिम्मत न पड़ी कि किससे। बात बिखरी-बिखरी सही लेकिन क़िबला अपनी अच्छी आदतों और दुश्मनों की हरमज़दगियों के बयान से बहुत खुश हुए। इससे पहले किसी ने उनको खूबसूरत और सजीला भी नहीं कहा था। दो बार पढ़कर अपने मुंशी को पकड़ा दिया कि तुम्हीं पढ़कर बताओ कि साहबज़ादे किससे शादी करना चाहते हैं, अच्छाइयां तो मेरी बयान की हैं। ग्लेशियर था कि पिघला जा रहा था। मुस्कुराते हुए मुंशी जी से बोले, किसी-किसी बेउस्ताद शायर के शेर में कभी-कभी अलिफ़ गिरता है। इसके शेरों में तो अलिफ़ से लेकर ये तक सारे अक्षर एक-दूसरे पर गिर पड़ रहे हैं, जैसे ईदगाह में नमाज़ी एक-दूसरे की कमर पर सिजदा कर रहे हों। बिशारत के साहस की कहानी जिसने सुनी, हैरान रह गया। खयाल था कि ज्वालामुखी फट पड़ेगा। क़िबला ने तरस खाकर सारे ख़ानदान को क़त्ल नहीं किया तो कम से कम हरेक की टांगें ज़ुरूर तोड़ देंगे, लेकिन यह सब कुछ नहीं हुआ। क़िबला ने बिशारत को अपनी गुलामी में लेना स्वीकार कर लिया।

जारी………………

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पिछले अंक : 1. खोया पानी-1:क़िबला का परिचय 2. ख़ोया पानी 2: चारपाई का चकल्लस 3. खोया पानी-3:कनमैलिये की पिटाई 4. कांसे की लुटिया,बाली उमरिया और चुग्गी दाढ़ी़ 5. हवेली की पीड़ा कराची में 6. हवेली की हवाबाजी 7. वो तिरा कोठे पे नंगे पांव आना याद है 8. इम्पोर्टेड बुज़ुर्ग और यूनानी नाक

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khoya_pani_front_coverकिताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

 

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[ “खोया पानी” उस व्यंग्य उपन्यास का नाम है जो पाकिस्तान के मशहूर व्यंग्यकार मुश्ताक अहमद यूसुफी की किताब आबे-गुम का हिन्दी अनुवाद है. इस पुस्तक के अनुवाद कर्ता है ‘लफ़्ज’ पत्रिका के संपादक श्री ‘तुफैल चतुर्वेदी’ जी.  इस उपन्यास की टैग लाइन है “एक अद्भुत व्यंग्य उपन्यास” जो इस उपन्यास पर सटीक बैठती है.इसी उपन्यास को छोटे छोटे भागों में यहां पेश किया जा रहा है. यदि आपने पहले की कडियाँ ना पढ़ी हों तो आपने बहुत कुछ मिस कर दिया. आप चाहें तो पढ़ सकते हैं. अब और आगे पढिये]

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इम्पोर्टेड बुज़ुर्ग और यूनानी नाक

वो ज़माने और शराफ़त के ढ़ंग और थे। जब तक बुजुर्ग अस्ली इम्पोर्टिड यानी मध्य एशिया और खैबर के उस पार से आये हुए न हों, कोई हिन्दुस्तानी मुसलमान खुद को इज्जतदार और शरीफ़ नहीं कहता था। ग़ालिब को तो शेखी बघारने के लिए अपना (फ़र्ज़ी) उस्ताद मुल्ला अब्दुस्समद तक ईरान से इम्पोर्ट करना पड़ा। क़िबला के बुज़ुर्गों ने जब बेरोजगारी और ग़रीबी से तंग आकर वतन छोड़ा तो आंखें नम और दिल पिघले हुए थे। बार-बार अफ़सोस में अपना हाथ घोड़े की रान पर मारते और एक-दूसरे की दाढ़ी पर हाथ फेर के तौबा-तौबा कहते। यह नये आने वाले, जिससे भी मिले अपने आचरण से उसका दिल जीत लिया।

पहले ज़ां फ़िर जाने-ज़ां फ़िर जाने-जाना हो गये

फ़िर यही प्यारे लोग आहिस्ता-आहिस्ता पहले खां, फ़िर ख़ाने-खां, फ़िर ख़ाने-ख़ाना हो गये।

हवेली के आर्किटेक्चर की भांति क़िबला के रोग भी राजसी होते थे। बचपन में दायें गाल पर शायद आमों की फ़स्ल में फुन्सी निकली थी, जिसका दाग़ अभी तक बाक़ी था। कहते थे, जिस साल मेरे यह औरंगशेबी पफोड़ा निकला, उसी साल बल्कि उसी हफ्ते महारानी विक्टोरिया रांड हुई। साठ के पेटे में आये तो शाहजहानी ‘हब्से-बोल’ (पेशाब का बंद हो जाना) में गिरफ्तार हो गये। फ़र्माते थे कि ग़ालिब मुग़ल-बच्चा था। सितम-पेशा डोमनी को अपने इश्क के जहर से मार डाला मगर खुद इसी, यानी मेरी-वाली बीमारी में मरा। एक खत में लिखता है कि घूंट-घूंट पीता हूं और कतरा- कतरा बाहर निकालता हूं। दमे का दौरा जरा थमता तो बड़े गर्व से कहते कि फ़ैज़ी को यही रोग था। उसने एक जगह कहा है कि दो आलम मेरे सीने में समा गये, मगर आधा सांस किसी तौर नहीं समा रहा। अपने स्वर्गवासी पिता के बारे में बताते थे कि राज-रोग यानी अकबरी संग्रहणी में इंतक़ाल फ़र्माया। मतलब इससे, आंतों की टी.बी. था। मरज़ तो मरज़, नाक तक अपनी नहीं थी-यूनानी बताते थे।

मुर्दा अज ग़ै़ब बरूं आयदो-कारे-बकुनद’

(मुर्दा परोक्ष से आया और काम कर गया)

क़िबला को दो ग़म थे। पहले ग़म का बयान बाद में आयेगा। दूसरा ग़म दरअस्ल इतना उनका अपना नहीं जितना बीबी का था, वो बेटे की इच्छा में घुल रही थीं। उस ग़रीब ने बड़ी मन्नतें मानीं, शर्बत में नक़्श (क़ुरआन की आयतें लिखे पर्चे) घोल-घोल कर पिलाये। उनके तकिये के नीचे तावीज़ रखे। छुप-छुप कर मज़ारों पर चादरें चढ़ाई। हमारे यहां जब जीवित लोगों से मायूस हो जाते हैं तो बस यही आस बाक़ी रह जाती है। पचास मील के दायरे में कोई मज़ार ऐसा न बचा जिसके सिरहाने खड़े होकर वो इस तरह फूट-फूट कर न रोयी हों कि कब्र-वाले के रिश्तेदार भी दफ्न करते समय क्या रोये होंगे। उस ज़माने में कब्र के अन्दर वाले चमत्कारी हों या न हों, कम-से-कम कब्र के भीतर अवश्य होते थे। आजकल जैसा हाल नहीं था कि मज़ार अगर मैयत से ख़ाली है तो ग़नीमत जानिये, वरना अल्लाह जाने अंदर क्या दफ्न है, जिसका इस धूम-धाम से उर्स मनाया जा रहा है। खैर यह तो एक वाक्य था जो रवानी में फैल कर पूरा पैरा बन गया। निवेदन यह करना था कि क़िबला खुद को किसी सिद्ध पुरुष से कम नहीं समझते थे। उन्हें जब यह पता चला कि बीबी लड़के की मन्नत मांगने चोरी-छुपे नामहरमों (जिनके साथ निकाह जायज़ हो) के मज़ारों पर जाने लगी है, तो बहुत नाराज हुए। वो जब बहुत नाराज होते तो खाना छोड़ देते थे। हलवाई की दुकान से रबड़ी, मोती-चूर के लड्डू और कचौरी लाकर खा लेते। दूसरे दिन बीबी कासनी रंग का दुपट्टा ओढ़ लेतीं और उनकी पसंद के खाने यानी दोप्याशा, डेढ़गुनी शक्कर वाला ज़र्दा, बहुत तेज मिर्च के उड़द के दही-बड़े खिला कर उन्हें मना लेतीं। क़िबला इन्हीं खानों पर अपने ईरानी और अरबी नस्ल के पुरखों की नियाज़ दिलवाते (श्राद्ध करते), लेकिन उनके दही-बड़ों में मिर्च बस नाम को डलवाते।

मज़ारों पर जाने पर पाबंदी लगी। बीबी बहुत रोयीं-धोयीं तो क़िबला कुछ पिघले। मज़ारों पर जाने की इजाजत दे दी, लेकिन इस शर्त पर कि मज़ार में रहने वाला जाति का कम्बोह न हो। कम्बोह मर्द और ग़ज़ल के शायर से पर्दा ज़ुरूरी है चाहे वो मुर्दा ही क्यों न हो। ‘मैं इनकी रग-रग पहचानता हूं।’ उनके दुश्मनों का कहना है कि क़िबला खुद भी जवानी में शायर और ननिहाल की ओर से कम्बोह थे। अक्सर कहते कि कम्बोह के मरने पर तो जश्न मनाना चाहिये।

जारी………………

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पिछले अंक : 1. खोया पानी-1:क़िबला का परिचय 2. ख़ोया पानी 2: चारपाई का चकल्लस 3. खोया पानी-3:कनमैलिये की पिटाई 4. कांसे की लुटिया,बाली उमरिया और चुग्गी दाढ़ी़ 5. हवेली की पीड़ा कराची में 6. हवेली की हवाबाजी 7. वो तिरा कोठे पे नंगे पांव आना याद है 

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किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

 

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[ कोठे की कहानियां तो अभी आनी बांकी हैं.एक से बढ़कर एक कहानियां हैं जो आप आगे के हिस्सों में पढेंगे.अभी तो हम हवेली में ही अटके हुए हैं. किबला को अपनी हवेली से कितना प्यार था कि वो अपनी हवेली को महल से कम नहीं समझते थे. किबला की बहादुरी का परिचय भी आप देख चुके हैं कि कैसे उन्होने अपनी सलीम शाही जूती की छाप से कराची में एक घर हथियाया था. किबला की हवेली के और भी कई हिस्से हैं जो उन्हें मुँह-जबानी याद हैं. युसूफी साहब ने “खोया पानी” में किबला के द्वारा इस हवेली की यादों से बखूबी जोड़ा है. आइये आनन्द लें.  ] 

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वो तिरा कोठे पे नंगे पांव आना याद है

हवेली के मुख्य दरवाज़े से कुछ क़दम के फासले पर जहां फ़ोटो में घूरे पर एक काला मुर्गा गर्दन फुलाये अज़ान दे रहा था, वहां एक टूटे चबूतरे के चिह्न नज़र आ रहे थे। उसके पत्थरों के जोड़ों और झिरियों में से पौधे रोशनी की तलाश में घबरा कर बाहर निकल रहे थे। एक दिन उस चबूतरे की ओर संकेत कर कहने लगे कि यहां साफ़ पानी से भरा हुआ पत्थर का आठ कोण वाला हौज़ हुआ करता था, जिसमें विलायती गोल्डफ़िश तैरती रहती थीं। आरिफ़ मियां उसमें पायनियर अखबार की किश्तियां तैराया करते थे। यह कहते-कहते क़िबला जोश में अपनी छड़ी लेकर उठ खड़े हुए। उससे फटी हुई दरी पर हौज़ का नक़्शा खींचने लगे। एक जगह काल्पनिक लकीर कुछ टेढ़ी खिंची तो उसे पैर से रगड़ कर मिटाया। छड़ी की नोक से शैतान मछली की तरफ़ इशारा किया जो सबसे लड़ती फ़िरती थी। फ़िर एक कोने में उस मछली की ओर भी इशारा किया जिसका जी निढाल था। उन्होंने खुल कर तो नहीं कहा कि आखिर हम उनके छोटे थे, लेकिन हम समझ गये कि इस मछली का जी खट्टी चीजें और सोंधी मिट्टी खाने को चाह रहा होगा।

क़िबला कभी तरंग में आते तो अपने इकलौते बेतकल्लुफ़ दोस्त रईस अहमद क़िदवाई से कहते कि जवानी में मई-जून की ठीक दुपहरिया में एक हसीन कुंवारी लड़की का कोठों-कोठों नंगे पांव उनकी हवेली की तपती छत पर आना अब तक (मय डायलाग के) याद है। यह बात मिर्ज़ा की समझ में आज तक न आयी। इसलिये कि उनकी हवेली तीन मन्जिला थी। जबकि दायें-बायें पड़ोस के दोनों मकान एक-एक मंज़िल के थे। हसीन कुंवारी अगर नंगे पैर हो और लाज का गहना उतारने के लिये उतावली भी हो, तब भी यह करतब संभव नहीं (जब तक कि हसीना उनके इश्क में दो टुकड़ों में न बंट जाये। )

पिलखन

फ़ोटो में हवेली के सामने एक ऊंची-घनी पिलखन उदास खड़ी थी। इसका बीज उनके परदादा काली टांगों वाले भूरे घोड़े पर सवार, कारचोबी काम के चोग़े में छुपा कर अकाल के ज़माने में दमिश्क से लाये थे। क़िबला के कहे अनुसार उनके परदादा के अब्बा जान कहा करते थे कि निर्धनता के आलम में यह नंगे-खलाइक, नंगे-असलाफ़, नंगे-वतन (लोगों, बुजुर्गों और देश के लिये अपमान का कारण) नंगे सर, नंगे पैर, घोड़े की नंगी पीठ पर, नंगी तलवार हाथ में लिये, खैबर के नंगे पहाड़ों को फलांगता हिन्दुस्तान आया। जो चित्र वो खींचते थे, उससे तो यही लगता था कि उस समय क़िबला के बुज़ुर्ग के पास बदन ढंकने के लिये घोड़े की दुम के सिवा और कुछ न था। जायदाद, महलसरा, नौकर-चाकर, सामान, रुपया पैसा सब कुछ वहीं छोड़ आये, परन्तु सामान का सबसे क़ीमती हिस्सा यानी वंशावली और पिलखन का बीज साथ ले आये। घोड़ा जो उन्हीं की तरह ख़ानदानी और वतन से बेज़ार था, बीज और वंशावली के बोझ से रानों-तले निकला पड़ रहा था।

ज़िन्दगी की धूप जब कड़ी हुई और पैरों-तले से ज़मीन-जायदाद निकल गयी तो आइन्दा नस्लों ने उसी वृक्ष और वंशावली की छांव-तले विश्राम किया। क़िबला को अपने पुरखों की बुद्धि और समझ पर बड़ा मान था। उनका प्रत्येक पुरखा अदभुत था और उनकी वंशावली की हर शाख पर एक जीनियस बैठा ऊंघ रहा था। क़िबला ने एक फ़ोटो उस पिलखन के नीचे ठीक उस जगह खड़े हो कर खिंचवाया था, जहां उनकी नाल गड़ी थी। कहते थे कि अगर किसी को मेरी हवेली की मिल्कियत में शक हो तो नाल निकाल कर देख ले। जब आदमी को यह न मालूम हो कि उसकी नाल कहां गड़ी है और पुरखों की हडि्डयां कहां दफ्न हैं, तो वो मनीप्लांट की तरह हो जाता है, जो मिट्टी के बग़ैर सिर्फ बोतलों में फलता-फूलता है। अपनी नाल, पुरखों और पिलखन का ज़िक्र इतने गर्व के साथ और इतना अधिक करते-करते हाल यह हुआ कि पिलखन की जड़ें वंशावली में उतर आयीं, जैसे घुटनों में पानी उतर आता है।

जारी………………

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पिछले अंक : 1. खोया पानी-1:क़िबला का परिचय 2. ख़ोया पानी 2: चारपाई का चकल्लस 3. खोया पानी-3:कनमैलिये की पिटाई 4. कांसे की लुटिया,बाली उमरिया और चुग्गी दाढ़ी़ 5. हवेली की पीड़ा कराची में 6. हवेली की हवाबाजी

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लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
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पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

 

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[ किबला की बहादुरी का परिचय आप देख चुके हैं कि कैसे उन्होने अपनी सलीम शाही जूती की छाप से कराची में एक घर हथियाया था. किबला की कानपुर में एक हवेली भी हुआ करती थी. हवेली क्या थी सोचें की किबला के लिये एक महल था.किबला की ना जाने कितनी यादें उससे जुड़ीं थीं. हवेली की फोटो हमेशा अपने साथ लिये घूमते थे.युसूफी साहब ने "खोया पानी" में किबला के द्वारा इस हवेली की यादों से बखूबी जोड़ा है. आइये आनन्द लें.  ]

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जिस हवेली में था हमारा घर

क़िबला ने बड़े जतन से मार्किट में एक छोटी-सी लकड़ी की दुकान का डोल डाला। बीबी के दहेज़ के ज़ेवर और वेबले स्कॉट की बन्दूक औने-पौने में बेच डाली। कुछ माल उधर खरीदा, अभी दुकान ठीक से जमी भी न थी कि एक इन्कमटैक्स इंस्पेक्टर आ निकला। खाता, रजिस्ट्रेशन, रोकड़-बही और रसीद बुक तलब कीं। दूसरे दिन, क़िबला हमसे कहने लगे ‘मियां! सुना आपने? महीनों जूतियां चटख़ाता, दफ्तरों में अपनी औक़ात खराब करवाता फ़िरा, किसी ने पलट कर न पूछा कि भैया कौन हो! अब दिल्लगी देखिये, कल एक इन्कम टैक्स का तीसमारख़ां दनदनाता आया। लक़्का कबूतर की तरह सीना फुलाये। मैंने साले को यह दिखा दी-यह छोड़ कर आये हैं। चौंक के पूछने लगा-यह क्या है! मैंने कहा हमारे यहां इसे महलसरा कहते हैं।’

सच झूठ का हाल मिर्जा जानें, उन्हीं से सुना है कि इस महलसरा का एक बड़ा फ़ोटो, फ्रेम करवा के अपने फ्लैट की काग़ज़ी-सी दीवार में कील ठोंक रहे थे कि दीवार के उस पार वाले पड़ोसी ने आ कर निवेदन किया कि कील एक फुट ऊपर ठोकिये ताकि दूसरे सिरे पर मैं अपनी शेरवानी लटका सकूं। दरवाज़ा ज़ोर से खोलने और बंद करने की धमक से इस ज़ंग खाई कील पर सारी महलसरा पेण्डुलम की तरह झूलती रहती थी। घर में डाकिया या नई धोबिन भी आती तो उसे भी दिखाते ‘यह छोड़ कर आये हैं।‘

उस हवेली का फ़ोटो हमने भी कई बार देखा था। उसे देखकर ऐसा लगता था जैसे कैमरे को मोटा नज़र आने लगा है लेकिन कैमरे की आंख की कमज़ोरी को क़िबला अपनी बातों के ज़ोर से दूर कर देते थे। यूं भी अतीत हर चीज़ के आस-पास एक रूमानी घेरा खींच देता है। आदमी का जब सब-कुछ छिन जाये तो वो या तो मस्त मलंग हो जाता है या किसी फ़ैंटैसी-लैंड में शरण लेता हैं, वंशावली और हवेली भी ऐसे ही शरण-स्थल थे। संभव है धृष्ट-निगाहों को यह तस्वीर में ढंढार दिखायी दे लेकिन क़िबला जब इसके नाज़ुक पहलुओं की व्याख्या करते थे तो इसके आगे ताजमहल बिल्कुल सीध-सपाटा, गंवारू घरौंदा मालूम होता था। मिसाल के तौर पर, दूसरी मंज़िल पर एक दरवाज़ा नज़र आता था, जिसकी चौखट और किवाड़ झड़ चुके थे। क़िबला उसे फ्रांसीसी दरीचा बताते थे, अगर यहां वाकई कोई यूरोपियन खिड़की थी तो यक़ीनी तौर पर ये वही खिड़की होगी जिसमें जड़े हुए कांच को तोड़ कर सारी-की-सारी ईस्ट इंडिया कम्पनी आंखों में अपने जूतों की धूल झोंकती गुज़र गयी। ड्योढ़ी में दाखिल होने का जो बेकिवाड़ फाटक था वो दरअस्ल शाहजहानी मेहराब थी। उसके ऊपर एक टूटा हुआ छज्जा था, जिस पर तस्वीर में एक चील आराम कर रही थी। ये राजपूती झरोखे के बाक़ी-बचे चिह्न बताये जाते थे, जिनके पीछे उनके दादा के समय में ईरानी क़ालीनों पर आज़रबैज़ानी अंदाज़ की कव्वालियां होती थीं। पिछले पहर जब नींद से भारी आंखें मुंदने लगतीं तो थोड़ी-थोड़ी देर बाद चांदी के गुलाबपाशों से महफ़िल में आये लोगों पर गुलाबजल छिड़का जाता। फ़र्श और दीवारें क़ालीनों से ढकी रहतीं। कहते थे कि जित्ते फूल ग़लीचे पे थे, वित्ते ही बाहर बग़ीचे में थे, जहां इतालवी मखमल के कारचोबी क़ालीन पर गंगा-जमुनी काम के पीकदान रखे रहते थे, जिनमें चांदी के वरक में लिपटी हुई गिलौरियों की पीक जब थूकी जाती तो बिल्लौरी गले में उतरती-चढ़ती साफ़ नज़र आती, जैसे थर्मामीटर में पारा।

वो भीड़ कि अक़्ल़ धरने की जगह नहीं

हवेली के चन्द अंदरूनी क्लोज़-अप भी थे। कुछ कैमरे की आंख के और कुछ कल्पना की आंख के। एक तिदरी थी जिसकी दो मेहराबों की दरारों में ईंटों पर कानपुरी चिडियों के घोंसले नज़र आ रहे थे। इन पर Moorish arches का अभियोग था, दिया रखने का एक ताक ऐसे आर्टिस्टिक ढंग से ढहा था कि पुर्तगाली आर्च के चिह्न दिखायी पड़ते थे। फ़ोटो में उसके पहलू में एक लकड़ी की घड़ौंची नज़र आ रही थी, जिसका शाहजहानी डिज़ाइन उनके परदादा ने बादशाह के पानी रखने की जगह से, अपने हाथ से चुराया था। शाहजहानी हो या न हो, उसके मुग़ल होने में कोई शक नहीं था, इसलिए कि उसकी एक टांग तैमूरी थी। हवेली की गर्दिशें फ़ोटो में नज़र आती थीं, लेकिन एक पड़ोसी का बयान कि उनमें गर्दिश के मारे ख़ानदानी बूढ़े रूले फ़िरते थे। उत्तरी हिस्से में एक खम्भा, जो मुद्दत हुई छत का बोझ अपने ऊपर से ओछे के अहसान की तरह उतार चुका था, Roman Pillars का अदुभुत नमूना बताया जाता था। आश्चर्य इस पर था कि छत से पहले क्यों न गिरा। इसका एक कारण यह हो सकता है कि चारों तरफ़ गर्दन तक मलबे में दबे होने की वज्ह से उसके गिरने के लिए कोई ख़ाली जगह न थी। एक टूटी दीवार के सहारे लकड़ी की कमज़ोर सीढ़ी इस प्रकार खड़ी थी कि यह कहना मुश्किल था कि कौन किसके सहारे खड़ा है। उनके बयान के अनुसार जब दूसरी मंजिल नहीं गिरी थी तो यहां विक्टोरियन स्टाइल का Grand Staircase हुआ करता था। उस छत पर, जहां अब चिमगादड़ें भी नहीं लटक सकती थीं, क़िबला लोहे की कड़ियों की ओर इशारा करते, जिनमें दादा के समय में बेल्जियम के फ़ानूस लटके रहते थे, जिनकी चम्पई रोशनी में वो घुंघराली खंजरियां बजतीं जो दो कूबड़ वाले बाख़्तरी ऊंटों के साथ आयी थीं। अगर फ़ोटो उनकी रनिंग कमेन्ट्री के साथ न देखे होते तो किसी तरह यह खयाल में नहीं आ सकता था कि पांच सौ स्क्वायर गज़ की एक लड़खड़ाती हवेली में इतनी वास्तु कला और ढेर-सारी संस्कृतियों का ऐसा घमासान का दंगल होगा कि अक़्ल धरने की जगह न रहेगी। पहली बार फ़ोटो देखें तो लगता था कि कैमरा हिल गया है। फ़िर ज़रा ग़ौर से देखें तो आश्चर्य होता था कि यह ढंढार हवेली अब तक कैसे खड़ी है। मिर्ज़ा का विचार था कि इसमें गिरने की भी ताकत नहीं रही।

जारी………………

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पिछले अंक : 1. खोया पानी-1:क़िबला का परिचय 2. ख़ोया पानी 2: चारपाई का चकल्लस 3. खोया पानी-3:कनमैलिये की पिटाई 4. कांसे की लुटिया,बाली उमरिया और चुग्गी दाढ़ी़ 5. हवेली की पीड़ा कराची में

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khoya_pani_front_coverकिताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

 

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प्रभु कई दिनों से गायब थे. उनके गायब होने से तरह तरह की अटकलों का बाजार गर्म था. कोई कहता प्रभु संजीवनी बूटी खाने लाने गये हैं. कोई कहता कि मंहगाई का जमाना है. प्रभु को भी दुनिया चलानी है शायद अतिरिक्त कमाई का जुगाड़ बैठा रहे होंगे.कोई कहता लॉग ड्राइव पर निकल गये होंगे.जितने मुँह उतनी बातें.

धीरे धीरे सब कुछ सामान्य हो गया. लोग प्रभु को भूलने लगे.जैसा कि आमतौर पर होता है कि किसी के जाने से दुनिया नहीं रुकती प्रभु के जाने से भी कुछ नहीं रुका. उनके बिना दुनिया चलने लगी. अचानक एक हलचल सी हुई. प्रभु की पार्टी के लोग जो उंघते उंघते सो चुके थे एकाएक जग गये. खबर आयी कि प्रभु आ रहे हैं.

कुछ बचे खुचे समर्थकों ने नारेबाजी शुरु कर दी. “जब तक सूरज चांद रहेगा….”, “हमारा नेता कैसा हो …” , “प्रभु जी तुम संघर्ष करो..” जैसे नारों से आकाश गूजने लगा. जनता टकटकी लगाये देखती रही और सोचती रही कि जिसे हमने चुन कर भेजा था वो हमें मझधार में छोड़ कर कहाँ गायब हो गया था. लेकिन जनता तो जनता थी सोचने के अलावा और कर भी क्या सकती थी.

वो अवतरित हुए. लगा कि जैसे सब कुछ बदल गया. उनके फूले फूले गाल एकदम पिचक से गये जैसे किसी ने पान की गिलोरी को मुँह से निकाल दिया हो.तौंद एकदम गायब. छ्ररहरा बदन.चेहरे का रंग भी बदला बदला नजर आ रहा था. चाल भी हाथी जैसी ना होकर घोड़े जैसी हो गयी थी.यानि कि तेज तर्रार ….लगा जैसे स्लिम एंड ट्रिम होने का पूरा कोर्स करके आ रहे हों.

आते ही इधर उधर देखने लगे. फिर सकपका कर अपने एक सहायक से बोले कि मेरी कुर्सी नहीं दिखायी दे रही.   

कुर्सी !! कौन सी कुर्सी ?

अरे मेरी कुर्सी !! मैं यहाँ का मुख्यमंत्री हूँ ना.

हूँ नहीं थे..

थे मतलब…!! मेरे को तो जनता ने चुन कर भेजा था.

हाँ लेकिन आप कुर्सी छोड़कर चले गये थे ना.

हाँ लेकिन मैं तो..

हाँ.. तो जब तक आप ये रूप बदल रहे थे.जनता ने नया मुख्यमंत्री चुन लिया.

ऎसा कैसे हो सकता है.

हो सकता है नहीं हो गया है. आजकल कुर्सी बहुत महत्वपूर्ण हो गयी है उसे एक मिनट भी छोड़ना नहीं चाहिये.

लेकिन … मुख्यमंत्री जो कि अब भूतपूर्व हो गया था उसके चेहरे पर परेशानी के भाव बदले हुए मेकअप के बाद भी साफ देखे जा सकते थे.इससे पहले कि वह कुछ सोचता कि क्या करें ,फोन की घंटी बजी. उधर से हाई कमान का फोन था. उसे थोड़ी आस बंधी कि चलो कोई तो उसकी सुनेगा. लेकिन इससे पहले वो अपना पक्ष हाईकमान के सामने रखता. उधर से आवाज आयी.

तो आ गये आप.

जी….

आपको कुर्सी छोड़कर जाने की क्या आवश्यकता थी?

मैने सोचा कि मैं थोड़ा स्लिम…..भूतपूर्व हकलाते हुए बोलना चाह रहा था.

आपको नहीं मालूम ..कंपटीसन का जमाना है. देश में अस्थिरता का माहौल है. ऎसे में एक एक मिनट बहुत कीमती है.

लेकिन स्लिम..

देखिये आपको स्लिम ही होना था तो आप कुर्सी में बैठकर ही कुछ आसन वगैरह करते रहते.वैसे भी कुर्सी में बैठकर भी कौन सा काम ही करते थे.सुनते हैं आजकल आसनों से आसानी से स्लिम हुआ जा सकता है…

लेकिन मैं तेज….

अरे जब कुर्सी ही नहीं रही तो ये तेजी किस काम की…

लेकिन कुर्सी तो मेरी थी ना…

लोकतंत्र में कुर्सी किसी की नहीं होती. अपनी बारी भूल गये जब पिछली बार आपने कुर्सी खाली देखी थी तो सब विधायकों को पटा कर खुद उस कुर्सी पर बैठ गये थे और तब से एकछ्त्र राज भी कर रहे थे. देखो जब तुम अपनी कुर्सी नहीं बचा पाये तो ये देश कैसे बचाओगे.

वो तो ठीक है लेकिन अब करूं तो क्या करूं.

अब बस इंतजार करो. देखो अगला कब कुर्सी छोड़कर जाता है. जैसे ही वो जाये लपक के बैठ लेना यह कहकर हाई कमान ने फोन काट दिया. प्रभु को भी बात समझ आ गयी थी.

[ यह मात्र एक व्यंग्य है इसका हाल फिलहाल की किसी घटना से कोई संबंध नहीं है ]

[किसी भी अच्छे व्यंग्य में करुणा का पुट लिये यथार्थ की झलक भी होती है.खोया पानी में भी यह प्रचुर मात्रा में है लेकिन यह करुणा ऎसी है जो हास्य से ही उपजती है. युसूफी साहब भी बीच बीच में कड़वा यथार्थ लेकर आये हैं जो हास्य की चाशनी में लिपटा हुआ है. आइये आज देखें हास्य मिश्रित करुणा की झलक.इसमें आपको जीवन की सच्चाईयां भी मिलेंगी और सहज हास्य भी. आपकी टिप्पणीयां ही इसको आगे चलाये रखने का संबल देंगी इसलिये कृपया टिपिया दें. ]  

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ये छोड़ कर आये हैं

कानपुर से उजड़ के कराची आये तो दुनिया ही और थी। अजनबी माहौल, बेरोज़गारी, सबसे बढ़कर बेघरी। अपनी पुरखों की हवेली के दस-बारह फ़ोटो खिंचवा लाये थे। ‘ज़रा यह साइड पोज़ देखिये, और यह शाट तो कमाल का है।’ हर आये-गये को फ़ोटो दिखा कर कहते ‘यह छोड़ कर आये हैं।’ जिन दफ्रतरों में मकान के एलॉटमेंट के प्रार्थना-पत्र दिये थे, उनके बड़े अफ़सरों को भी कटघरे के इस पार से तस्वीरी प्रमाण दिखाते ‘यह छोड़ कर आये हैं।’ वास्कट और शेरवानी की जेब में और कुछ हो या न हो, हवेली का फ़ोटो ज़ुरूर होता था। अस्ल में यह उनका विज़िटिंग-कार्ड था। कराची के फ्लैटों को कभी माचिस की डिब्बियां, कभी दड़बे, कभी काबुक कहते। लेकिन जब तीन महीने जूतियां चटख़ाने के बावजूद एक काबुक में भी सर छुपाने को जगह नहीं मिली तो आंखें खुलीं। दोस्तों ने समझाया ‘फ्लैट एक घंटे में मिल सकता है, कस्टोडियन की हथेली पर पैसा रखो और जिस फ्लैट की चाहो, चाबी ले लो।’ मगर क़िबला तो अपनी हथेली पर पैसा रखवाने के आदी थे, वो कहां मानते । महीनों फ्लैट एलॉट करवाने के सिलसिले में भूखे-प्यासे, परेशान-हाल सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटते रहे। ज़िदगी भर किसी के मेहमान न रहे थे। अब बेटी-दामाद के यहां मेहमान रहने की तकलीफ़ भी सही।

‘अब क्या होएगा?’

इंसान जब किसी घुला-देने-वाली पीड़ा या परीक्षा से गुज़रता है तो एक-एक पल, एक-एक बरस बन जाता है और यूं लगता है जैसे। ‘हर बरस के हों दिन पचास हज़ार’

बेटी के घर टुकड़े तोड़ने या उस पर भार बनने की वो कल्पना भी नहीं कर सकते थे। कानपुर में कभी उसके यहां खड़े-खड़े एक गिलास पानी भी पीते तो हाथ पर पांच-दस रुपये रख देते। लेकिन अब ? सुब्ह सर झुकाये नाश्ता करके निकलते तो, दिन-भर ख़ाक छान-कर मग़रिब (सूरज डूबने के बाद की नमाज़) से ज़रा पहले लौटते। खाने के समय कह देते कि ईरानी होटल में खा आया हूं। जूते उन्होंने हमेशा रहीम बख़्श से बनवाये, इसलिए कि उसके बनाये हुए जूते चरचराते बहुत थे। इन जूतों के तले अब इतने घिस गये थे कि चरचराने के लायक़ न रहे। पैरों में ठेकें पड़ गयी, अचकनें ढीली हो गयीं। बीमार बीबी रात को दर्द से कराह भी नहीं सकती थी कि समधियाने वालों की नींद खराब होने का डर था। मलमल के कुर्ते की लखनवी कढ़ाई मैल में छुप गयी। चुन्नटें निकलने के बाद आस्तीनें उंगलियों से एक-एक बालिश्त नीचे लटकी रहतीं। खिज़ाबी मूंछों का बल तो नहीं गया, लेकिन सिर्फ़ बल-खायी हुई नोकें सियाह रह गयीं। चार-चार दिन नहाने को पानी न मिलता। मोतिया का इत्र लगाये तीन महीने हो गये। बीबी घबरा कर बड़े भोलेपन से देहाती अंदाज़ में कहतीं ‘अब क्या होयेगा? होगा के बजाए होयेगा उनके मुंह से बहुत प्यारा लगता था। इस एक वाक्य में वो अपनी सारी परेशानी,मासूमियत, बेबसी, सामने वाले के ज्योतिष-ज्ञान और उसकी बेमांगी मदद पर भरोसा-सभी कुछ समो देती थी। क़िबला इसके जवाब में बड़ा विश्वास से ‘देखते हैं’ कह कर उनकी तसल्ली कर देते थे।

बाहुबल और तेज़ काट की अवस्था

हर दु:ख, हर परेशानी के बाद ज़िन्दगी आदमी पर अपना एक रहस्य खोल देती है। बोधि वृक्ष की छांव तले बुद्ध भी एक दु:ख भरी तपस्या से गुज़रे थे। जब पेट पीठ से लग गया, आंखें अन्धे-कुंओं की तह में अंधेरी हो गयीं और हडि्डयों की माला में बस सास की डोरी अटकी रह गयी तो गौतम बुद्ध पर भी एक भेद खुला था। जैसा, जितना और जिस कारण आदमी दु:ख भोगता है, वैसा ही भेद उस पर खुलता है, निर्वाण ढूंढने वाले को निर्वाण मिल जाता है और जो दुनिया के लिये कष्ट उठाता है दुनिया उसको रास्ता देती चलती जाती है।

गली-गली ख़ाक फांकने और दफ्तर-दफ्तर धक्के खाने के बाद क़िबला के दुखी दिल पर कुछ खुला तो ये कि क़ायदे-क़ानून बुद्धिमानों और ज़ालिमों ने कमज़ोर दिल वालों को क़ाबू में रखने के लिये बनाये हैं। जो व्यक्ति हाथी की लगाम की तलाश करता रह जाये, वो कभी उस पर चढ़ नहीं सकता। जाम उसका है, जो बढ़कर खुद साक़ी को जाम-सुराही समेत उठा ले। दूसरे शब्दों में, जो बढ़कर ताला तोड़ डाले, मकान उसी का हो गया। कानपुर से चले तो अपनी जमा-जत्था, वंशावली, स्प्रिंग से खुलने वाला चाकू, अख़्तरी बाई फ़ैजाबादी के तीन रिकार्ड, मुरादाबादी हुक़्के और सुराही के हरे कैरियर स्टेंड के अतिरिक्त अपनी दुकान का ताला भी ढो कर ले आये थे। अलीगढ़ से ख़ास तौर पर बनवाकर मंगवाया था, तीन सेर से कम न होगा। ऊपर जो कुछ उन पर खुला, उसके बाद बर्नस रोड पर एक शानदार फ्लैट अपने लिये पसन्द किया। मार्बल की टाइल्स, समुद्र की ओर खुलने वाली खिड़कियां जिनमें रंगीन शीशे लगे थे, दरवाज़े के ज़ंग लगे ताले पर अपने अलीगढ़ी ताले की एक ही चोट से फ्लैट में खुद को सरकार का अहसानमंद हुए बग़ैर आबाद कर लिया। तख़्ती दुबारा पेंट करवा के लगा दी। तख़्ती पर नाम के आगे ‘मुज़तर कानपुरी’ भी लिखवा दिया। पुराने परिचितों ने पूछा आप शायर कब से हो गये? फ़रमाया, मैंने आज तक किसी शायर पर दीवानी मुक़दमा चलते नहीं देखा, न डिग्री, क़ुर्की होते देखी! फ्लैट पर कब्ज़ा करने के कोई चार महीने बाद अपने चूड़ीदार का घुटना रफू कर रहे थे कि किसी ने बड़ी बदतमीज़ी से दरवाज़ा खटखटाया। मतलब ये कि नाम की तख़्ती को फटफटाया। जैसे ही उन्होंने हड़बड़ा कर दरवाज़ा खोला, आनेवाले ने अपना परिचय इस प्रकार करवाया जैसे अपने ओहदे की चपड़ास उठा के उनके मुंह पर दे मारी। ‘अफ़सर कस्टोडियन इवैकुएट प्रापर्टी।’ फ़िर डपट कर कहा, ‘बड़े मियां! फ्लैट का एलाटमेंट आर्डर दिखाओ।’ क़िबला ने वास्कट की जेब से हवेली का फ़ोटो निकाल कर दिखाया ‘ये छोड़ कर आये हैं’ उसने फ़ोटो का नोटिस न लेते हुए सख़्ती से कहा, बड़े मियां! सुना नहीं? एलॉटमेट आर्डर दिखाओ।’ क़िबला ने बड़ी शाति से अपने बायें पैर का सलीम-शाही जूता उतारा और उतने ही आराम से कि उसे, खयाल तक न हुआ कि क्या करने वाले हैं, उसके मुंह पर मारते हुए बोले ‘यह है यारों का एलॉटमेंट आर्डर! कार्बन कॉपी भी देखेंगे?’ उसने अब तक, यानीज़लील होने तक, रिश्वत-ही-रिश्वत खायी थी, जूते नहीं खाये थे। फ़िर कभी इधर का रुख नहीं किया।

जारी………………

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पिछले अंक : 1. खोया पानी-1:क़िबला का परिचय 2. ख़ोया पानी 2: चारपाई का चकल्लस 3. खोया पानी-3:कनमैलिये की पिटाई 4. कांसे की लुटिया,बाली उमरिया और चुग्गी दाढ़ी़

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khoya_pani_front_coverकिताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

 

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: पुस्तक चर्चा, समीक्षा, काकेश, विमोचन, हिन्दी, किताब, युसूफी, व्यंग्य

[ पिछ्ले अंको में में आपने किबला का मजेदार परिचय और उनकी लकड़ी की दुकान के बारे में पढ़ा. जिसमें आप उनके चरित्र के बहाने उस समय की स्थितियों से भी परिचित हुए. ज्ञान जी ने टिप्पणी करते हुए कहा “यह तो वास्तव में व्यंग का मुरब्बा है। आंवले को सिझा कर कोंच कोंच कर शीरा मिलाया जाता है; वैसे ही इसके हर वाक्य में/शब्द में सटायर मिलाया गया है।” सच इतना सहज हास्य है कि बस लगता है पढ़ते जायें. आप भी पढिये और आनन्द लें] ===========================================

कांसे की लुटिया , बाली उमरिया और चुग्गी दाढ़ी़:

क़िबला अपना माल बड़ी तवज्जो, मेहनत और मुहब्बत से दिखाते थे। मुहब्बत की बढ़ोत्तरी हमने इसलिये की कि वो ग्राहक को तो शेर की नज़र से देखते थे मगर अपनी लकड़ी पर मुहब्बत से हाथ फेरते रहते थे। कोई सागौन का तख़्ता ऐसा नहीं था, जिसके रेशों का जाल और रगों का तुग़रा, (अरबी लिपि में पेचीदा मगर सुन्दर लिखाई) अगर वो चाहें तो याददाश्त से काग़ज़ पर न बना सकते हों। लकड़मंडी में वो अकेले दुकानदार थे जो ग्राहक को अपनी और हर शहतीर-बल्ली की वंशावली याद करा देते थे। उनकी अपनी वंशावली बल्ली से भी ज़ियादा लम्बी थी। उस पर अपने परदादा को टांग रखा था। एक बल्ली की लम्बाई की तरफ़ इशारा करते हुए कहते, सवा उन्तालीस फुट लम्बी है। गोंडा की है। अफ़सोस, असग़र गोंडवी की शायरी ने गोंडा की बल्लियों की प्रसिद्धि का बेड़ा ग़र्क कर दिया। लाख कहो, अब किसी को यक़ीन नहीं आता कि गोंडा की प्रसिद्धि की अस्ल वज्ह खूबसूरत बिल्लयां थीं। असग़र गोंडवी से पहले ऐसी सीधी बेगांठ बल्ली मिलती थी कि चालीस फुट उंचे सिरे पर से छल्ला छोड़ दो तो बेरोक सीध नीचे झन्न से आ कर ठहरता था। एक बार हाजी मुहम्मद इसहाक चमड़े-वाले, शीशम खरीदने आये। क़िबला यूं तो हर लकड़ी की प्रशंसा में ज़मीन आसमान एक कर देते थे, लेकिन शीशम पर सचमुच फ़िदा थे। अक्सर फ़र्माते, तख़्ते-ताऊस में शाहजहां ने शीशम ही लगवायी थी। शीशम के गुणग्राहक और कद्रदान तो कब्र में जा सोये, मगर क्या बात है शीशम की। जितना इस्तेमाल करो, उतनी ही खूबियां निखरती हैं।शीशम की जिस चारपाई पर मैं पैदा हुआ, उसी पर दादा मियां ने जन्म लिया था और इस इत्तफाक को वो चारपाई और दादाजान दोनों के लिये मान और सम्मान का कारण समझते थे। हाजी मुहम्मद इसहाक बोले, ‘ये लकड़ी तो साफ़ मालूम नहीं होती।’ क़िबला न जाने कितने बरसों बाद मुस्कुराये। हाजी साहब की दाढ़ी को टकटकी बांध कर देखते हुए बोले, ‘यह बात हमने शीशम की लकड़ी, कांसे की लुटिया, बाली- उमरिया, और चुग्गी-दाढ़ी में ही देखी कि जितना हाथ फेरो उतनी ही चमकती है। बढ़िया क्वालिटी की शीशम की पहचान ये है कि आरा,रन्दा, बरमा सब खुंडे और हाथ पत्थर हो जायें। यह चीड़ थोड़े ही हैं कि एक ज़रा कील ठोको तो ‘अलिफ़’ (उर्दू वर्णमाला का पहला अक्षर) से लेकर ‘ये’ (अंतिम अक्षर) तक चिर जाये। पर एक बात है कि ताज़ा कटी हुई चीड़ से जंगल की महक का एक झरना पफूट पड़ता है। लगता है इसमें नहाया जा रहा हूं। जिस दिन कारख़ाने में चीड़ की कटाई होने वाली हो, उस दिन मैं इत्र लगा के नहीं आता’

क़िबला का मूड बदला तो हाजी इसहाक की हिम्मत बंधी। कहने लगे, इसमें शक नहीं कि ये शीशम तो सबसे अच्छी मालूम होती है मगर सीज़ण्ड (Seasoned) नहीं लगती। क़िबला के तो आग ही लग गयी। कहने लगे, ‘सीज़ण्ड! कितना भूखा रहने के बाद सीखा है यह शब्द? सीज़ण्ड सामने वाली मस्ज़िद का, य्यत को नहलाने वाला तख़्ता है। बड़ा पानी पिया है उसने! लाऊं? उसी पे लिटा दूंगा।’

यूं तो उनकी ज़िंदगी डेल कार्नेगी के हर सिद्धांत की शुरु से आखिर तक अत्यधिक कामयाब अवहेलना थी, लेकिन बिज़नेस में उन्होंने अपने हथकंडे अलग आविष्कार कर रखे थे। ग्राहक से जब तक यह न कहलवा लें कि लकड़ी पसंद है, उसकी क़ीमत नहीं बताते थे। वो पूछता भी तो साफ़ टाल जाते ‘आप भी कमाल करते हैं, आपको लकड़ी पसंद है, ले जाइये, घर की बात है।’ ग्राहक जब पूरी तरह लकड़ी पसंद कर लेता तो क़िबला क़ीमत बताये बग़ैर हाथ फैला कर बयाना तलब करते। सस्ता ज़माना था वो दुअन्नी या चवन्नी का बयाना पेश करता जो इस सौदे के लिये काफी होता। इशारे से दुत्कारते हुए कहते, चांदी दिखाओ। (यानी कम-से-कम एक कलदार रुपया निकालो।) वो बेचारा शर्मा-हुशूरी एक रुपया निकालता जो उस ज़माने में पंद्रह सेर गेहूं या सेर-भर अस्ली घी के बराबर होता तो, क़िबला रुपया लेकर अपनी हथेली पर इस तरह रखते कि उसे तसल्ली के लिये नज़र तो आता रहे, मगर झपट्टा न मार सके। हथेली को अपने ज़ियादा क़रीब भी न लाते, कहीं ऐसा न हो कि सौदा पटने से पहले ही ग्राहक बिदक जाये। कुछ देर बाद खुद-ब-खुद कहते ‘मुबारक हो! सौदा पक्का हो गया।’ फ़िर क़ीमत बताते, जिसे सुन कर वो हक्का-बक्का रह जाता। वो क़ीमत पर हुज्जत करता, तो कहते ‘अजीब घनचक्कर हो। बयाना दे के फ़िरते हो। अभी रुपया दे के सौदा पक्का किया है। अभी तो इसमें से तुम्हारे हाथ की गर्मी भी नहीं गई और अभी फ़िर गये। अच्छा कह दो कि यह रुपया तुम्हारा नहीं है। कहो! कहो! क़ीमत नाप तौल कर ऐसी बताते कि काइयां से काइयां ग्राहक भी दुविधा में पड़ जाये और यह फैसला न कर सके कि पेशगी डूबने में ज़ियादा नुकसान है या इस भाव लकड़ी खरीदने में।

हुज्जत के दौरान कितनी ही गर्मी बल्कि हाथापाई हो जाये वो अपनी हथेली को चित ही रखते। मुट्ठी कभी बंद नहीं करते थे ताकि ज़लील होते हुए ग्राहक को यह संतुष्टि रहे कि कम-से-कम बयाना तो सुरक्षित है। उनके बारे में एक क़िस्सा मशहूर था कि एक सरफ़िरे ग्राहक से झगड़ा हुआ तो धोबी-पाट का दांव लगा कर ज़मीन पर दे मारा और छाती पर चढ़ कर बैठ गये लेकिन इस पोज़ में भी अपनी हथेली जिस पर रुपया रखा था, चित ही रखी ताकि उसे ये बदगुमानी न हो कि रुपया हथियाना चाहते हैं।

लेकिन इसमें शक नहीं कि जैसी बेदाग़ और बढ़िया लकड़ी वो बेचते थे, वैसी उनके कहे-अनुसार, ‘बागे़- बहिश्त में शाखे-तूबा (जन्नत का एक खूश्बूदार पेड़) से भी प्राप्त न होगी। दाग़ी लकड़ी बंदे ने आज तक नहीं बेची। सौ साल बाद भी दीमक लग जाये तो पूरे दाम वापस कर दूंगा।’ बात दरअस्ल ये थी कि वो अपने उसूल के पक्के थे। मतलब यह कि तमाम उम्र ‘उंची-दुकान, सही-माल, ग़लत-दाम,’ पर सख़्ती से क़ायम रहे। सुना है कि दुनिया के सबसे बड़े फ़ैज़नेबल स्टोर हेरड्ज़ का दावा है कि हमारे यहां सूई से लेकर हाथी तक हर चीज़ मिलती है। कहने वाले कहते हैं कि क़ीमत भी दोनों की एक ही होती है। हेरड्ज़ अगर लकड़ी बेचता तो ख़ुदा की कसम ऐसी ही और इन ही दामों बेचता।

जारी………………

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पिछले अंक : 1. खोया पानी-1:क़िबला का परिचय 2. ख़ोया पानी 2: चारपाई का चकल्लस 3. खोया पानी-3:कनमैलिये की पिटाई

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khoya_pani_front_coverकिताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

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चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: पुस्तक चर्चा, समीक्षा, काकेश, विमोचन, हिन्दी, किताब, युसूफी, व्यंग्य

[ पहलेदूसरे अंक में आपने किबला का मजेदार परिचय पढा. जिसमें आप उनके चरित्र के बहाने उस समय की स्थितियों से भी परिचित हुए. “खोया पानी” नामक इस व्यंग्य उपन्यास में ऎसे अनेकों जुमले हैं जिनमे हास्य कूट कूट कर भरा है और व्यंग्य इतना महीन है कि समझ में आये तो मजा ही आ जाय. पाकिस्तान के मशहूर व्यंग्यकार मुश्ताक अहमद यूसुफी की किताब आबे-गुम के इस हिन्दी अनुवाद छोटे छोटे भागों में यहां पेश किया जा रहा है. अब और आगे पढिये ]

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स्टेशन,लकड़मंडी और बाज़ारे–हुस्न में बिजोग

मकसद इस भूमिका का ये है कि जहां चारपाई का चलन हो वहां फ़र्नीचर का बिज़नेस पनप नहीं सकता। अब इसे इमारती लकड़ी कहिये या कुछ और, धंधा इसका भी हमेशा मंदा ही रहता था कि दुकानों की तादाद ग्राहकों से ज़ियादा थी। इसलिये कोई भी ऐसा नज़र आ जाये तो हुलिये और चाल-ढाल से जरा भी ग्राहक मालूम हो तो लकड़मंडी के दुकानदार उस पर टूट पड़ते। ज़ियादातर ग्राहक आस-पास के देहाती होते जो ज़िन्दगी में पहली और आख़िरी बार लकड़ी ख़रीदने कानपुर आते थे। इन बेचारों का लकड़ी से दो ही बार वास्ता पड़ता था। एक, अपना घर बनाते समय दूसरे अपना क्रिया कर्म करवाते समय।

पाकिस्तान बनने से पहले जिन पाठकों ने दिल्ली या लाहौर के रेलवे स्टेशन का नक्शा देखा है, वो इस छीना-झपटी का बखूबी अंदाज़ा कर सकते हैं। 1945 में हमने देखा कि दिल्ली से लाहौर आने वाली ट्रेन के रुकते ही जैसे ही मुसाफ़िर ने अपने जिस्म का कोई हिस्सा दरवाज़े या खिड़की से बाहर निकाला, क़ुली ने उसी को मज़बूती से पकड़ कर पूरे मुसाफ़िर को हथेली पर रखा और हवा में उठा लिया और उठाकर प्लेटफार्म पर किसी सुराही या हुक्के की चिलम पर बिठा दिया लेकिन जो मुसाफ़िर दूसरे मुसाफ़िरों के धक़्क़े से खुद-ब-खुद डिब्बे से बाहर निकल पड़े उनका हाल वैसा ही हुआ जैसा उर्दू की किसी नई-नवेली किताब का आलोचकों के हाथ होता है। जो चीज़ जितनी भी, जिसके हाथ लगी सर पर रख-कर हवा हो गया। दूसरे चरण में मुसाफ़िर पर होटलों के दलाल और एजेंट टूट पड़ते। सफेद कोट-पतलून, सफेद कमीज़, सफ़ॆद रूमाल, सफेद कैनवस के जूते, सफ़ेद मोज़े, सफेद दांत मगर इसके बावजूद मुहम्मद हुसैन आज़ाद (19वीं शताब्दी के महान लेखक) के शब्दों में हम ये नहीं कह सकते कि चमेली का ढेर पड़ा हंस रहा है। उनकी हर चीज़ सफेद और उजली होती, सिवाय चेहरे के। हंसते तो मालूम होता तवा हंस रहा है। ये मुसाफ़िर पर इस तरह गिरते जैसे इंग्लैंड में रग्बी की गेंद और एक-दूसरे पर खिलाड़ी गिरते हैं। उनके इन तमाम प्रयत्नों का मकसद खुद कुछ पाना नहीं, बल्कि दूसरों को पाने से दूर रखना होता था। मुसलमान दलाल तुर्की टोपी से पहचाने जाते। वो दिल्ली और यू.पी. से आने वाले मुसलमान मुसाफ़िरों को टोंटीदार लोटे, पर्दादार औरतों, बहुत-से बच्चों और क़ीमे-परांठे के भबके से पहचान लेते और अस्सलामो-अलैकुम या “Brother in Islam” कहकर लिपट जाते। मुसलमान मुसाफ़िरों के साथ सिर्फ़ मुसलमान दलाल ही धींगा-मुश्ती कर सकते थे। (जिस दलाल का हाथ मुसाफ़िर के कपड़ों के सब से मज़बूत हिस्से पर पड़ता वो वहीं से उसे घसीटता हुआ बाहर ले आता। जिनका हाथ लिबास के कमज़ोर या फटे-गले पुराने हिस्से पर पड़ता, वो बाद में उसको रूमाल की तरह इस्तेमाल करते।) अर्धनग्न मुसाफ़िर क़दम-क़दम पर अपने क़ाफी कपड़े भी उतरवाने पर मजबूर होता। स्टेशन के बाहर क़दम रखता तो असंख्य पहलवान, जिन्होंने अखाड़े को नाकाफ़ी पाकर तांगा चलाने का पेशा अपना लिया था, खुद को उस पर छोड़ देते। अगर मुसाफ़िर के तन पर कोई चीथड़ा संयोग से बच रहा होता तो उसे भी नोच कर तांगे की पिछली सीट पर रामचन्द्र जी की खड़ाऊं की तरह सजा देते अगर किसी के चूड़ीदार के नाड़े का सिरा तांगे वाले के हाथ लग जाता तो वो ग़रीब गांठ पे हाथ रखे उसी में बंध चला आता। कोई मुसाफ़िर का दामन आगे से खींचता, कोई पीछे से फाड़ता।

अंतिम राउण्ड में एक तगड़ा-सा तांगे वाला सवारी का दायां हाथ और दूसरा मुस्टन्डा उसका बायां हाथ पकड़ कर Tug of war खेलने लगते। लेकिन इससे पहले कि दोनों दावेदार अपने-अपने हिस्से की रान और हाथ उखाड़ कर ले जायें, एक तीसरा फ़ुर्तीला तांगे वाला टांगों के चिरे हुए चिमटे के नीचे बैठ कर मुसाफ़िर को एकाएक अपने कंधें पर उठा लेता और तांगे में जोतकर हवा हो जाता।

लगभग यही नक्शा कोपरगंज की लकड़मंडी का हुआ करता था जिसके बीच में क़िबला की दुकान थी। गोदाम आम-तौर पर दुकान से ही जुड़े हुए पीछे होते थे। ग्राहक पकड़ने के लिए क़िबला और दो-तीन चिड़ीमार दुकानदारों ने ये किया कि दुकानों के बाहर सड़क पर लकड़ी के छोटे-छोटे केबिन बना लिये। क़िबला का केबिन मसनद, तकिये, हुक्के, उगालदान और स्प्रिंग से खुलने वाले चाक़ू से सजा हुआ था। केबिन जैसे एक तरह का मचान था, जहां से वो ग्राहक को मार गिराते थे। फ़िर उसे चूम-पुचकार कर अंदर ले जाया जाता, जहां कोशिश यह होती थी ख़ाली-हाथ और भरी-जेब वापस न जाने पाये। जैसे ही कोई व्यक्ति जो अंदाज़े-से ग्राहक लगता, सामने से गुज़रता तो दूर और नज़दीक के दुकानदार उसे हाथ के इशारे से या आवाज़ देकर बुलाते: ‘महाराज! महाराज!’ इन महाराजों को दूसरे दुकानदारों के पंजे से छुड़ाने और खुद घसीटकर अपनी कछार में ले जाने के दौरान अक्सर उनकी पगिड़यां खुल कर पैरों में उलझ जातीं। इस सिलसिले में आपस में इतने झगड़े और हाथापाई हो चुकी थी कि मंडी के तमाम व्यापारियों ने पंचायती प़फैसला किया कि ग्राहक को सिर्फ वही दुकानदार आवाज़ देकर बुलायेगा, जिसकी दुकान के सामने से वो गुज़र रहा हो, लेकिन जैसे ही वह किसी दूसरे दुकानदार के आक्रमण-क्षेत्रा में दाखिल होगा तो उसे कोई और दुकानदार हरगिज़ आवाज़ न देगा। इसके बावजूद छीना-झपटी और कुश्तम-पछाड़ बढ़ती ही गयी तो हर दुकान के आगे चूने से हदबंदी की लाइन खींच दी गयी। इससे यह फ़र्क़ पड़ा कि कुश्ती बंद हो गयी और कबड्डी होने लगी। कुछ दुकानदारों ने मार-पीट, ग्राहकों का हांका और उन्हें डंडा-डोली करके अन्दर लाने के लिए बिगड़े पहलवान और शहर के छटे हुए शुहदे और मुस्टंडे पार्ट-टाइम नौकरी पर रख लिये थे। आर्थिक मंदी अपनी चरम-सीमा तक पहुंची हुई थी। यह लोग दिन में लकड़-मंडी के ग्राहकों को डरा-धमका कर खराब और कण्डम माल खरीदवाते और रात को यही फ़र्ज बाज़ारे-हुस्न में अंजाम देते। बहुत-सी तवाय़फों ने हर रात अपनी आबरू को ज़ियादा से ज़ियादा असुरक्षित रखने के उद्देश्य से इनको बतौर ‘पिम्प’ नौकर रख छोड़ा था। क़िबला ने इस क़िस्म का कोई गुण्डा या कुचरित्र पहलवान नौकर नहीं रखा, कि उन्हें अपने हाथों की ताकत पर पूरा भरोसा था लेकिन औरों की तरह माल की चिराई-कटाई में मार-कुटाई का खर्चा भी शामिल कर लेते थे।

ख़ून निकालने के तरीक़े : ज़ोंक, सींगी, लाठी

हर वक्त क्रोधावस्था में रहते थे। सोने से पहले ऐसा मूड बना कर लेटते कि आंख खुलते ही, गुस्सा करने में आसानी हो। माथे के तीन बल सोते में भी नहीं मिटते थे। गुस्से की सबसे ख़ालिस क़िस्म वह होती है जो किसी बहाने की मुहताज न हो या किसी बहुत ही मामूली सी बात पर आ जाये। गुस्से के आखिर होते-होते यह भी याद नहीं रहता था कि आया किस बात पर था। बीबी उनको रोज़ा नहीं रखने देती थीं। यह शायद 1935 की बात है। एक दिन-रात की नमाज़ के बाद गिड़गिड़ा-गिड़गिड़ा कर अपनी पुरानी परेशानियां दूर होने की दुआयें मांग रहे थे कि एक ताज़ा परेशानी का खयाल आते ही एकदम क्रोध आ गया। दुआ में ही कहने लगे कि तूने मेरी पुरानी परेशानियां ही कौन-सी दूर कर दीं, जो अब यह नई परेशानी दूर करेगा। उस रात मुसल्ला (नमाज़ पढ़ने की चादर) तह करने के बाद फ़िर कभी नमाज़ नहीं पढ़ी।

उनके गुस्से पर याद आया कि उस ज़माने में कनमैलिये मुहल्लों, बाज़ारों में फेरी लगाते थे। कान का मैल निकालना ही क्या, दुनिया जहान के काम घर बैठे हो जाते थे। सब्शी, गोश्त और सौदा-सुलुफ़ की खरीदारी, हजामत, तालीम, प्रसव,पीढ़ी, खट-खटोले की-यहां तक कि खुद अपनी मरम्मत भी घर बैठे हो जाती। बीबियों के नाखुन निहन्नी से काटने और पीठ मलने के लिये नाइनें घर आती थीं। कपड़े भी मुग़लानियां घर आकर सीती थीं ताकि किसी को नाप तक की हवा न लगे। हालांकि उस समय के ज़नाना कपड़ों के जो नमूने हमारी नज़र से गुज़रे हैं वो ऐसे होते थे कि किसी बड़े लेटर-बक्स का नाप लेकर सिये जा सकते थे। मतलब ये कि सब काम घर ही में हो जाते थे। हद यह कि मौत तक घर में घटित होती थी। इसके लिये बाहर जा कर किसी ट्रक से अपनी आत्मा निकलवाने की ज़ुरूरत नहीं पड़ती थी। खून की खराबी से किसी के बार-बार फोड़े-फुंसी निकलें, या दिमाग़ में बुरे खयालात की भीड़ दिन-दहाड़े भी रहने लगे तो घर पर ही फ़स्द (रगों से खून निकलवाना) खोल दी जाती थी। अधिक और खराब खून निकलवाने के उद्देश्य से अपना सर फुड़वाने या फोड़ने के लिये किसी राजनैतिक जलसे में जाने या सरकार के खिलाफ़ प्रदर्शन करके लाठी खाने की ज़ुरूरत नहीं पड़ती थी। उस ज़माने में लाठी को खून निकालने के हथियार के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जाता था। जोंक और सींगी लगाने वाली कंजरियां रोज़ फेरी लगाती थीं, अगर उस समय के किसी हकीम का हाथ आजकल के नौजवानों की नब्ज़ पर पड़ जाये तो कोई नौजवान ऐसा न बचे जिसके जहां-तहां सींगी लगी नज़र न आये। रहे हम जैसे आजकल के बुज़ुर्ग कि

“की जिससे बात उसको हिदायत ज़ुरूर की”

तो! कोई बुज़ुर्ग ऐसा न बचेगा, जिसकी ज़बान पर हकीम लोग जोंक न लगवा दें।

हम क़िस्सा यह बयान करने चले थे कि गर्मियों के दिन थे। क़िबला क़ोरमा और खरबूज़ा खाने के बाद केबिन में झपकी ले रहे थे कि अचानक कनमैलिये ने केबिन के दरवाज़े पर बड़ी ज़ोर से आवाज लगायी ‘कान का मैल’। ख़ुदा जाने मीठी-नींद सो रहे थे या कोई बहुत-ही हसीन ख्वाब देख रहे थे जिसमें ग्राहक उनसे तिगुने दामों में धड़ाधड़ लकड़ी खरीद रहे थे, हड़बड़ा कर उठ बैठे। एकबार तो दहल गये। चिक के पास पड़ी हुई लकड़ी उठा कर उसके पीछे हो लिये। कमीने की यह हिम्मत कि उनके कान से सिर्फ गज़ भर दूर, बल्कि पास, ऐसी बेतमीज़ी से चीखे। यह कहना तो ठीक न होगा कि आगे-आगे वो और पीछे-पीछे ये, इसलिये कि क़िबला गुस्से में ऐसे भरे हुए थे कि कभी-कभी उससे आगे भी निकल जाते थे। सड़क पर कुछ दूर भागने के बाद कनमैलिया गलियों में निकल गया और आंखों से ओझल हो गया, मगर क़िबला सिर्फ अपनी छठी-इंद्रिय की बतायी हुई दिशा में दौड़ते रहे, और यह वो दिशा थी जिस तरफ़ कोई व्यक्ति, जिसकी पांचों इंद्रियां सलामत हों, हमला करने के चक्कर में लाठी घुमाता हरगिज़ न जाता कि ये थाने की तरफ़ जाती थी। इस वहशियाना दोड़ में क़िबला की लकड़ी और कनमैलिये का पग्गड़, जिसके हर पेच में उसने मैल निकालने के औज़ार उड़स रखे थे, ज़मीन पर गिर गया। उसमें से एक डिबिया भी निकली, जिसमें उसने कान का मैल जमा कर रखा था। नज़र बचा कर उसी में से तोला भर मैल निकाल कर दिखा देता कि देखो तुम्हारे कान में जो भिन-भिन, तिन-तिन, की आवाज़ें आ रही थीं वो इन्हीं की थीं। लेकिन यह सच है कि वो कान की भूलभुलैयों में इतनी दूर तक सहज-सहज सलाई डालता चला जाता कि महसूस होता-अभी कान के रास्ते आंतें भी निकाल कर हथेली पर रख देगा। क़िबला ने इस पग्गड़ को बल्ली पर चढ़ा कर बल्ली अपने केबिन के सामने इस तरह गाड़ दी, जिस तरह पहले समय में कोई बेसब्र उत्तराधिकारी शहज़ादा या वो न हो तो फ़िर कोई दुश्मन, बादशाह सलामत का सर काट कर भाले पर हर ख़ासो-आम की सूचना के लिये उठा देता था। इसका डर ऐसा बैठा कि दुकान के सामने से बढ़ई,खटबुने, सींगी लगाने वालियों और सहरी (रमज़ान के महीने में दिन निकलने से पहले खाया जाने-वाला खाना) के लिये जगाने वालों ने भी निकलना छोड़ दिया। पड़ोस की मस्ज़िद का बुरी आवाज़ वाला मुअज़्ज़िन (अज़ान देने वाला) भी पीछे वाली गली से आने जाने लगा।

जारी….
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khoya_pani_front_coverकिताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

 

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बीच बीच में मुझे ना जाने क्या होने लगता है कि मैं हिन्दी ब्लॉगिंग के बारे में सोचने लगता हूँ.फिर वही उहापोह वाली स्थिति होती है कि लिखें या ना लिखें. अब इस उमर में लेखक या साहित्यकार तो बनने से रहे तो फिर क्या फायदा…अपने काम में मन लगायें और उसी में कुछ करने की कोशिश करें. जब इस तरह की उहापोह वाली स्थिति आती है तो मैं पढ़ने लगता हूँ.कल भी तीन चार घंटे खूब पढ़ा.दिन के बाद के लगभग सभी चिट्ठे पढ़े और अधिकांश में टिप्पणीयां भी की. फिर कुछ पुराने चिट्ठे पढे.ज्ञान जी के पुराने लेख पढ़े और समझने की कोशिश की गैस्ट आर्टिस्ट की तरह पदार्पण करने वाले ज्ञान जी कैसे दैनिक ब्लॉगर बन गये. फिर फुरसतिया जी के कुछ पुराने अच्छे लेख पढे. मजा भी आया. अंतत: सोचा कि चलो जब तक मन हो लिखते रहें.

Abstract आप सोच रहे होंगे कि आज खोया पानी नहीं छ्पा.बस थोड़े देर में उसका तीसरा भाग लेकर हाजिर होता हूँ.

गूगल का नया ट्रांसलिट्रेसन टूल हिन्दी लिखने के लिये काफी अच्छा है. इसकी सहायता से आप रोमन में लिख कर आराम से हिन्दी लिख सकते हो. इसीलिये इसे मैने अपने कॉमेंट बॉक्स के नीचे लगाया था. आजकल कई लोगों ने इसे अपने चिट्ठे पर लगा रखा है.इस औजार को चिट्ठे में लगाने से दिक्कत यह है कि जब भी कोई आपके लेख पर आता है तो उसका कर्सर इस टूल के पहली लाइन पर आ जाता है और आपको लेख को पढने के लिये ऊपर जाना होता है. मुझे इससे कई चिट्ठों में समस्या हुई तो सोचा कि मेरे पाठकों को भी यह समस्या होती होगी इसलिये इस टूल को अपने चिट्ठे से हटा दिया.आपके पास कुछ समाधान हो तो बताइयेगा.

आजकल मुन्नी पोस्ट लिखने का फैशन बन गया है. फुरसतिया जी जो अपनी फुरसतिया लम्बी पोस्ट लिखने के लिये बदनाम हैं वो भी आजकल एक पोस्ट को तीन पोस्टों में ठेलने लगे है. निरमलानंद जब से कानपुर से लौटे है तब से उनकी पोस्ट छोटी होने लगी हैं इसीलिये वो आजकल दिन में चार मुन्नी पोस्ट ठेल देते हैं.आलोक जी एक ही बोतल का पानी दो दिन पिला रहे हैं. ज्ञान जी तो पहले ही प्रोब्लॉगर की टिप पढ़कर छोटा छोटा ही लिखते हैं.

चलिये मैं भी यह मुन्नी पोस्ट समाप्त करता हूँ. थोड़ी देर में लेकर आ रहा हूँ…खोया-पानी का तीसरा भाग.

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