[पिछले अंक में आपने किबला का मजेदार परिचय पढा. “खोया पानी” उस व्यंग्य उपन्यास का नाम है जो पाकिस्तान के मशहूर व्यंग्यकार मुश्ताक अहमद यूसुफी की किताब आबे-गुम का हिन्दी अनुवाद है. इस पुस्तक के अनुवाद कर्ता है ‘लफ़्ज’ पत्रिका के संपादक श्री ‘तुफैल चतुर्वेदी’ जी. इस उपन्यास की टैग लाइन है “एक अद्भुत व्यंग्य उपन्यास” जो इस उपन्यास पर सटीक बैठती है.इसी उपन्यास को छोटे छोटे भागों में यहां पेश किया जा रहा है अब और आगे पढिये]

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रंग गेहुआं, जिसे आप उस गेहूं जैसा बताते हैं, जिसे खाते ही हज़रत आदम एकदम जन्नत से निकाल दिये गये। जब देखो झल्लाते, तिनतिनाते रहते। मिज़ाज,ज़बान और हाथ, किसी पर क़ाबू न था, हमेशा गुस्से से काँपते रहते। इसलिए ईंट, पत्थर, लाठी, गोली, गाली किसी का भी निशाना ठीक नहीं लगता था। गछी-गछी मूंछें, जिन्हें गाली देने से पहले और बाद में ताव देते। आख़री ज़माने में भौंहों को भी बल देने लगे, गठा हुआ कसरती बदन मलमल के कुर्ते से झलकता था। चुनी-हुई आस्तीन और उससे भी महीन चुनी-हुई दुपलिया टोपी। गर्मियों में ख़स का इत्र लगाते। कीकरी की सिलाई का चूड़ीदार पाजामा-चूड़ियां इतनी अधिक कि पाजामा नज़र नहीं आता था। धोबी उसे अलगनी पर नहीं सुखाता था, अलग बांस पर दस्ताने की तरह चढ़ा देता था। आप रात को दो बजे भी दरवाज़ा खटखटा कर बुलायें तो चूड़ीदार में ही बाहर निकलेंगे।

वल्लाह! मैं तो यह कल्पना करने का भी साहस नहीं कर सकता कि दाई ने भी उन्हें चूड़ीदार के बग़ैर देखा होगा। भरी-भरी पिंडलियों पर ख़ूब जंचता था, हाथ के बुने रेशमी नाड़े में चाबियों का गुच्छा छनछनाता रहता था। जो ताले बरसों पहले बेकार हो गये थे, उनकी चाबियां भी इसी गुच्छे में सुरक्षित थीं। हद यह कि उस ताले की भी चाबी थी, जो पांच साल पहले चोरी हो गया था। मुहल्ले में इस चोरी की बरसों चर्चा रही, इसलिये कि चोर सिर्फ़ ताला, पहरा देने वाला कुत्ता और वंशावली चुरा कर ले गया। कहते थे कि इतनी ज़लील चोरी सिर्फ़ कोई रिश्तेदार ही कर सकता है। आख़िरी ज़माने में यह इज़ारबंदी गुच्छा बहुत वज़नी हो गया था और मौक़ा-बेमौक़ा फिल्मी गीत के बाज़ूबंद की तरह खुल-खुल जाता। कभी भावातिरेक में झुककर किसी से हाथ मिलाते तो दूसरे हाथ से इज़ारबंद थामते। मई-जून में टेम्प्रेचर बहुत हो जाता और मुंह पर लू के थप्पड़ से पड़ने लगते तो पाजामे से एयर कंडीशनिंग कर लेते। मतलब यह कि चूड़ियों को घुटनों-घुटनों पानी से भिगो कर, सर पर अंगोछा डाले तरबूज़ खाते। ख़स की टट्टी और ठंडा पानी कहां से लाते। इसके मुहताज भी न थे। कितनी ही गर्मी पड़े, दुकान बंद नहीं करते थे, कहते थे, मियां! यह तो बिज़नेस है, पेट का धंधा है, जब चमड़े की झोपड़ी में आग लगी रही हो तो क्या गर्मी, क्या सर्दी लेकिन ऐसे में कोई शामत का मारा ग्राहक आ निकले तो बुरा-भला कहकर भगा देते थे। इसके बावजूद वो खिंचा-खिंचा दुबारा उन्हीं के पास आता था, इसलिए कि जैसी उम्दा लकड़ी वो बेचते थे, वैसी सारे कानपुर में कहीं नहीं मिलती थी। फर्माते थे, दाग़ी लकड़ी बन्दे ने आज तक नहीं बेची, लकड़ी और दाग़ी! दाग़ तो दो-ही चीज़ों पर सजता है, दिल और जवानी।

शब्द के लच्छन और बाज़ारी पान

तम्बाकू, किवाम, ख़रबूज़े और कढ़े हुए कुर्ते लखनऊ से, हुक़्का मुरादाबाद और ताले अलीगढ़ से मंगवाते थे। हलवा सोहन और डिप्टी नशीर अहमद वाले मुहावरे दिल्ली से। दांत गिरने के बाद सिर्फ मुहावरों पर गुज़ारा था। गालियां अल्बत्ता स्थानीय बल्कि खुद की गढ़ी हुई देते, जिनमें रवानी पाई जाती थी। सलीम शाही जूतियां और चुनरी आपके जयपुर से मंगवाते थे। साहब! आपका राजस्थान भी खूब था, क्या-क्या उपहार गिनवाये थे उस दिन आपने खांड, सांड, भांड और रांड। यह भी खूब रही कि मारवाड़ियों को जिस चीज़ पर भी प्यार आता है उसके नाम में ठ, ड और ड़ लगा देते हैं मगर यह बात आपने अजीब बतायी कि राजस्थान में रांड का मतलब खूबसूरत औरत होता है। मारवाड़ी भाषा में सचमुच की विधवा के लिये भी कोई शब्द है कि नहीं लेकिन यह भी ठीक है कि सौ-सवा-सौ साल पहले तक रंडी का मतलब सिर्फ़ औरत होता था, जबसे मर्दों की नीयतें खराब हुइ, इस शब्द के लच्छन भी बिगड़ गये।

साहब! राजस्थान के तीन तुहफों के तो हम भी क़ायल और घायल हैं। मीराबाई, मेंहदी हसन और रेशमा। हाँ! तो मैं कह यह रहा था कि बाहर निकलते तो हाथ में पान की डिबिया और बटुवा रहता। बाज़ार का पान हरगिज़ नहीं खाते थे। कहते थे बाज़ारी पान सिर्फ रंडवे, ताक-झांक करने वाले और बम्बई वाले खाते हैं।

साहब! यह रखरखाव और परहेज़ मैंने उन्हीं से सीखा। डिबिया चांदी की, नक़्शीन (बेल-बूटे बने हुए) भारी, ठोस। इसमें जगह-जगह डेंट नज़र आते थे जो इंसानी सरों से टकराने की वज्ह से पड़े थे। गुस्से में अक्सर पानों भरी डिबिया फैंक के मारते। बड़ी देर तक तो यह पता ही नहीं चलता था कि घायल होने वालों के सर और चेहरे से खून निकल रहा है या बिखरे पानों की लाली ने ग़लत जगह रंग जमाया है। बटुवे ख़ास-तौर से आपके जन्म-स्थान, टोंक से मंगवाते थे। कहते थे कि वहां के पटुवे ऐसे डोरे डालते हैं कि इक ज़रा घुंडी को झूठों हाथ लगा दो तो बटुआ आप-ही-आप जी-हुज़ूर लोगों की बांछों की तरह खिलता चला जाता है।गुटका भोपाल से आता था, लेकिन खुद नहीं खाते थे।कहते थे, मीठा पान, ठुमरी,गुटका और नावेल, ये सब नाबालिग़ों के व्यसन हैं। शायरी से कोई ख़ास दिलचस्पी न थी। रदीफ़-क़ाफ़िये से आज़ाद शायरी से ख़ास-तौर पर चिढ़ते थे। यूं उर्दू-फ़ारसी के जितने भी शेर, लकड़ी, आग, धुएं, हेकड़ी, लड़-मरने, नाकामी और झगड़े के बारे में हैं, सब याद कर रखे थे। स्थिति कभी क़ाबू से बाहर हो जाती तो शायरी से उसका बचाव करते। आख़िरी ज़माने में एकांतप्रिय इंसानों-से हो गये थे और सिर्फ़ दुश्मनों के जनाज़े को कंधा देने के लिए बाहर निकलते थे। खुद को कासनी और बीबी को मोतिया रंग पसंद था। अचकन हमेशा मोतिया-रंग के टसर की पहनी।

वाह क्या बात कोरे बर्तन की

बिशारत की ज़बानी परिचय ख़त्म हुआ। अब कुछ मेरी, कुछ उनकी ज़बानी सुनिये और रही-सही आम लोगों की ज़बान से, जिसे कोई नहीं पकड़ सकता। कानपुर में पहले बांसमंडी और फिर कोपरगंज में क़िबला की लकड़ी की दुकान थी। इसी को आप उनका रोटी-रोज़ी कमाने और लोगों को सताने का साधन कह सकते हैं। थोड़ी बहुत जलाने की लकड़ी भी रखते थे मगर उसे लकड़ी नहीं कहते। उनकी दुकान को अगर कभी कोई टाल कह देता तो दो सेरी लेकर दौड़ते। जवानी में पंसेरी लेकर दौड़ते थे। तमाम उम्र पत्थर के बाट इस्तेमाल किये। फ़र्माते थे कि लोहे के फ़िरंगी बाट बेबरकत होते हैं। इन देसी बाटों को बाज़ुओं में भर-के, सीने से लगा-के उठाना पड़ता है। कभी किसी को यह साहस नहीं हुआ कि उनके पत्थर के बाटों को तुलवा कर देख ले। किसकी बुरी घड़ी आई थी कि उनकी दी हुई रक़म या लौटाई हुई रेज़गारी को गिन कर देखे। उस समय में, यानी इस सदी की तीसरी दहाई में इमारती लकड़ी की खपत बहुत कम थी। साल और चीड़ का रिवाज आम था। बहुत हुआ तो चौखट और दरवाज़े शीशम के बनवा लिये। सागौन तो सिर्फ़ अमीरों और रईसों की डाइनिंग टेबल और गोरों के ताबूत में इस्तेमाल होती थी। फ़र्नीचर होता ही कहां था। भले घरों में फ़र्नीचर के नाम पर सिर्फ चारपाई होती थी। जहां तक हमें याद पड़ता है, उन दिनों कुर्सी सिर्फ़ दो अवसरों पर निकाली जाती थी। एक तो जब हकीम, वैद्य, होम्योपैथ, पीर, फ़कीर और सयानों से मायूस हो कर डाक्टर को घर बुलाया जाता था। उस पर बैठ कर वो जगह-जगह स्टेथेस्कोप लगा कर देखता कि मरीज़ और मौत के बीच जो खाई थी, उसे इन महानुभावों ने अपनी दवाओं और तावीज़, गंडों से किस हद तक पाटा है। उस समय का दस्तूर था कि जिस घर में मुसम्मी या महीन लकड़ी की पिटारी में रफई में रखे हुए पांच अंगूर आयें या सोला-हैट पहने डाक्टर और उसके आगे-आगे हटो-बचो करता हुआ तीमारदार उसका चमड़े का बैग उठाये आये तो पड़ोस वाले जल्दी-जल्दी खाना खा कर खुद को शोक व्यक्त करने और कन्धा देने के लिये तैयार कर लेते थे। सच तो यह है कि डाक्टर को सिर्फ़ उस अवस्था में बुला कर इस कुर्सी पर बिठाया जाता था, जब वह स्थिति पैदा हो जाये जिसमें दो हज़ार साल पहले लोग ईसा मसीह को आज़माते थे। कुर्सी के इस्तेमाल का दूसरा और आख़िरी अवसर हमारे यहां खतने (लिंग की खाल काटना) के अवसर पर आता था, जब लड़कों को दूल्हा की तरह सजा बना और मिट्टी का खिलौना हाथ में दे कर इस कुर्सी पर बिठा दिया जाता था। इस जल्लादी कुर्सी को देखकर अच्छे-अच्छों की घिग्घी बंध जाती थी। ग़रीबों में इस काम के लिये भाट या लम्बे-वाले कोरे मटके को उल्टा करके लाल कपड़ा डाल देते थे।

चारपाई

सच तो यह है कि जहां चारपाई हो वहां किसी फ़र्नीचर की न ज़रूरत है , न गुंजाइश, न तुक। इंग्लैंड का मौसम अगर इतना ज़लील न होता और अंग्रेज़ों ने वक़्त पर चारपाई का आविष्कार कर लिया होता तो न सिर्फ ये कि वो मौजूदा फ़र्नीचर की खखेड़ से बच जाते, बल्कि फ़िर आरामदेह चारपाई छोड़ कर उपनिवेश बनाने की ख़ातिर घर से बाहर निकलने को भी उनका दिल न चाहता। ‘ओवरवर्क्ड’ सूरज भी उनके साम्राज्य पर एक सदी तक हर वक़्त चमकते रहने की ड्यूटी से बच जाता। कम से कम आजकल के हालात में अटवाटी-खटवाटी लेकर पड़े रहने के लिये उनके घर में कोई ढंग की चीज़ तो होती। हमने एक दिन प्रोफेसर क़ाज़ी अब्दुल से कहा कि आपके कथनानुसार सारी चीज़ें अंग्रेज़ों ने आविष्कृत की हैं, सुविधा-भोगी और बेहद प्रैक्टिकल लोग हैं-हैरत है कि चारपाई इस्तेमाल नहीं करते! बोले, अदवान कसने से जान चुराते हैं। हमारे ख्याल में एक बुनियादी फ़र्क ज़हन में ज़ुरूर रखना चाहिए, वो ये कि यूरोपियन फ़र्नीचर सिर्फ़ बैठने के लिये होता है, जबकि हम किसी ऐसी चीज़ पर बैठते ही नहीं, जिस पर लेट न सकें। मिसाल में दरी, गदैले, क़ालीन, ज़ाज़िम, चांदनी, चारपाई, माशूक़ की गली और दिलदार के पहलू को पेश किया जा सकता है। एक चीज़ हमारे यहां अलबत्ता ऐसी थी जिसे सिर्फ बैठने के लिए इस्तेमाल किया जाता था। उसे हुक्मरानों का तख़्त कहते थे, लेकिन जब उन्हें उसी पर लटका कर, फ़िर नहला दिया जाता तो यह तख़्ता कहलाता था और इस काम को तख़्ता उलटना कहते थे।

जारी….
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khoya_pani_front_coverकिताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

 

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["खोया पानी" यह है उस व्यंग्य उपन्यास का नाम जो पाकिस्तान के मशहूर व्यंग्यकार मुश्ताक अहमद यूसुफी की किताब आबे-गुम का हिन्दी अनुवाद है. इस पुस्तक के अनुवाद कर्ता है 'लफ़्ज' पत्रिका के संपादक श्री 'तुफैल चतुर्वेदी' जी. पुस्तक क्या है हास्य का पटाख़ा है और इतना महीन व्य़ंग्य की आपके समझ आ जाये तो मुँह से सिर्फ वाह वाह ही निकलती है. इस उपन्यास की टैग लाइन है "एक अद्भुत व्यंग्य उपन्यास" जो इस उपन्यास पर सटीक बैठती है.इसी उपन्यास को छोटे छोटे भागों में यहां पेश किया जा रहा है.]

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वो आदमी है मगर, देखने की ताब नहीं

मैने 1945 में जब क़िबला (माननीय) को पहले-पहल देखा तो उनका हुलिया ऐसा हो गया था जैसा अब मेरा है। लेकिन बात हमारे अलबेले दोस्त बिशारत अली फ़ारूक़ी के ससुर की है, इसलिये परिचय भी उन्हीं की ज़बान से ठीक रहेगा। हमने तो बहुत बार सुना, आप भी सुनिये:

‘वो हमेशा से मेरे कुछ न कुछ लगते थे। जिस ज़माने में मेरे ससुर नहीं बने थे तो फूफा हुआ करते थे और फूफा बनने से पहले मैं उन्हें चचा हुज़ूर कहा करता था। इससे पहले भी वो मेरे कुछ और ज़ुरूर लगते होंगे, मगर उस वक़्त मैंने बोलना शुरु नहीं किया था। हमारे यहाँ मुरादाबाद और कानपुर में रिश्ते-नाते उबली हुई सिवइयों की तरह उलझे और पेच-दर-पेच गुंथे हुए होते हैं।

ऐसा रौद्ररूप, इतने गुस्से वाला आदमी ज़िन्दगी में नहीं देखा। उनकी मृत्यु हुई तो मेरी उम्र, आधी इधर आधी उधर, चालीस के लगभग तो होगी, लेकिन साहब! जैसा आतंकित मैं उनकी आंखें देख कर छुटपन में होता था, वैसा ही न सिर्फ उनके आखरी दम तक रहा, बल्कि अपने आखरी दम तक भी रहूंगा। बड़ी-बड़ी आंखें अपने साकेट से निकली पड़ती थी-लाल, सुर्ख़, ऐसी-वैसी? बिल्कुल कबूतर का खून। लगता था, बड़ी-बड़ी पुतलियों के गिर्द लाल डोरों से अभी खून के फव्वारे छुटने लगेंगे और मेरा मुंह खूनम-खून हो जायेगा। हर वक़्त गुस्से में भरे रहते थे।जाने क्यों गाली उनका तकिया-कलाम थी और जो रंग बोलचाल का था, वही लिखाई का भी।

रख हाथ निकलता है धुआं मग़्जे -क़लम से’

ज़ाहिर है, कुछ ऐसे लोगों से भी पाला पड़ता था जिन्हें किसी कारण से गाली नहीं दे सकते थे। ऐसे अवसरों पर ज़बान से तो कुछ न कहते, लेकिन चेहरे पर ऐसा भाव लाते कि सर से पांव तक गाली नज़र आते। किसकी शामत आई थी कि उनकी किसी भी राय से असहमति व्यक्त करता। असहमति तो दर-किनार, अगर कोई व्यक्ति सिर्फ़ डर के मारे उनसे सहमत होता तो, अपनी राय बदल कर उल्टा उसके सर हो जाते।

अरे साहब! बातचीत तो बाद की बात है, कभी-कभी सिर्फ़ सलाम से भड़क उठते थे! आप कुछ भी कहे कैसी ही सच्ची और सामने की बात कहें, वो उसका खंडन ज़रूर करेंगे। किसी से सहमत होने में अपनी हेठी समझते थे। उनका हर वाक्य ‘नहीं’ से शुरू होता था। एक दिन कानपुर में कड़ाके की सर्दी पड़ रही थी। मेरे मुंह से निकल गया कि आज बड़ी सर्दी है। बोले ‘नहीं कल इससे ज़ियादा पड़ेगी।’

वो चचा से फूफा बने और फूफा से ससुर, लेकिन मेरी, आखरी वक़्त तक, निगाह उठा कर बात करने की हिम्मत न हुई। निकाह के वक़्त वो क़ाज़ी के पहलू में थे, क़ाज़ी ने मुझसे पूछा ‘क़ुबूल है?’ उनके सामने मुंह से ‘हां’ कहने का साहस न हुआ-अपनी ठोड़ी से दो ठोंगें-सी मार दीं, जिन्हें क़ाज़ी और क़िबला ने रिश्ते के लिये नाकाफी समझा। क़िबला कड़क कर बोले, ‘लौंडे! बोलता क्यों नहीं?’ डांट से मैं नर्वस हो गया। अभी क़ाज़ी का सवाल पूरा भी नहीं हुआ था कि मैंने ‘जी हां! क़ुबूल है’ कह दिया। आवाज़ एकदम इतने शोर से निकली कि मैं खुद चौंक पड़ा। क़ाज़ी उछल कर सेहरे में घुस गया, सब लोग खिलखिला कर हंसने लगे। अब क़िबला इस पर भिन्ना रहे हैं कि इतने शोर की ‘हां’ से बेटी वालों की हेठी होती है। बस तमाम-उम्र उनका यही हाल रहा, तमाम-उम्र मैं रिश्तेदारी के दर्द और निकटता में घिरा रहा।

हालांकि इकलौती बेटी, बल्कि इकलौती औलाद थी और बीबी को शादी के बड़े अरमान थे, लेकिन क़िबला ने ‘माइयों’ के दिन ठीक उस वक़्त, जब मेरा रंग निखारने के लिए उबटन मला जा रहा था, कहला भेजा कि दूल्हा मेरी मौजूदगी में अपना मुंह सेहरे से बाहर नहीं निकालेगा। दो सौ क़दम पहले सवारी से उतर जायेगा और पैदल चलकर अक़्दगाह (निकाह के स्थान) तक आयेगा। अक़्दगाह उन्होंने इस तरह कहा जैसे अपने फ़ैज़ साहब (शाइर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़) क़त्लगाह का ज़िक्र करते हैं और सच तो यह है कि उनका आतंक दिल में कुछ ऐसा बैठ गया था कि मुझे छपरखट भी फांसी-घाट लग रहा था। उन्होंने यह शर्त भी लगायी कि बराती पुलाव-ज़र्दा ठूंसने के बाद यह हरगिज़ नहीं कहेंगे कि गोश्त कम डाला और शक्कर ड्योढ़ी नहीं पड़ी। ख़ूब समझ लो, मेरी हवेली के सामने बैंड-बाजा हरगिज़ नहीं बजेगा और तुम्हें रंडी नचवानी है तो अपने कोठे पर नचवाओ।

किसी ज़माने में राजपूतों और अरबों में लड़की की पैदाइश अपशकुन और ख़ुदा के क्रोध की निशानी समझी जाती थी। उनका आत्माभिमान यह कैसे गवारा कर सकता था कि उनके घर बरात चढ़े। दामाद के ख़ौफ़ से वो लड़की को ज़िंदा गाड़ आते थे। क़िबला इस वहशियाना रस्म के ख़िलाफ़ थे। वो दामाद को ज़िंदा गाड़ देने के पक्ष में थे।

चेहरे, चाल और तेवर से शहर के कोतवाल लगते थे। कौन कह सकता था कि बांस मंडी में उनकी इमारती लकड़ी की एक मामूली-सी दुकान है। निकलता हुआ क़द। चलते तो क़द, सीना और आंखें, तीनों एक साथ निकाल कर चलते थे। अरे साहब क्या पूछते हैं, अव्वल तो उनके चेहरे की तरफ देखने की हिम्मत नहीं होती थी और कभी जी कड़ा करके देख भी लिया तो बस लाल-भभूका आंखें-ही-आंखें नज़र आती थीं.

निगहे-गर्म से इक आग टपकती है असद’

जारी….
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khoya_pani_front_coverकिताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

 

 

[पहाड़ की ठंड का अपना एक अलग ही आनन्द है. इस आनन्द को वही महसूस कर सकता है जिसने इसको जिया है,एक टूरिस्ट की भांति एक-दो दिन के लिये नहीं बल्कि कई दिनों तक. उस पर से पहाड़ी भाषा,जो मूल रूप से कुमांउनी या गढ़वाली बोली के रूप में जानी जाती है,उसकी अपनी अलग ही मिठास है..पहाड़ी भाषा में बोलने वाला यदि हिन्दी भी बोलेगा तो उसका अपना एक अलग ही अन्दाज होगा. उसमें पहाड़ी के शब्द तो आयेंगे ही साथ ही एक नये तरीके के वाक्य-विन्यास की भी रचना होगी. लीजिये आज उसी का एक नमूना प्रस्तुत है.यह एक अधेड अप्रवासी व्यक्ति से की गयी काल्पनिक बातचीत है जो अपने घर को छोड़ कर अपने भाई भतीजों के साथ मैदानी इलाके में रह रहा है.कुछ शब्दों के अर्थ हो सकता है आपकी समझ में ना आयें.हाँलाकि मैने कहीं कहीं शब्दों के हिन्दी पर्याय भी लिख दिये हैं फिर भी कोई समस्या हो तो टिप्पणियो से बतायें. ]  

मैने कका से पूछा.कका कुछ पहाड़ की ठंड के बारे में भी बताओ ना.

अब क्या बताऊं भुला.. ठंड वो भी पहाड़ की …सुनके ही जैसे ठंड लग जा रही है हो….गरम कपड़े तो लगभग साल भर निकले ही रहने वाले हुए …थोड़े से द्यो की तोप ( बारिश की बूंदें) क्या पड़ी तो कंबल रजाई सब निकल जाने वाली हुई.पांच पांच किलो की रजाई होने वाली हुई वहाँ तो ….यहाँ कि चाव (कपड़े का टुकड़ा) जैसी रजाई से काम थोड़े चलने वाला हुआ. पंत ज्यू अपना बास्कट निकालने को जैसे तैयार ही ठहरे बल. द्यो पड़ा और उनका बास्कट,बंद गले का कोट निकल जाने वाला हुआ.कानों को मफलर से ढंक कर,हाथों में ऊन के दस्ताने पहने पांडे ज्यू गूड़ की टपुक के साथ घर में चहा पीने वाले ठहरे और ऑफिस में घाम (धूप) सेकते सेकते फसक (गप) मारने वाले ठहरे.काम ना करने के जितने paharबहाने ले लो उनसे.

‘अब इतने जाड़े में कैसे काम होने वाला ठहरा.हाथ की उंगलियां जैसे पताल चली गयी हैं. मुँह से सांस की जगह भाप निकल रही है.ला हो बिसन सिंह एक चहा और पिला यार.‘ पूरा दिन जैसे चाय पीने और घाम सेकने में ही निकल जाने वाला हुआ.

तेरी काखी (चाची) का हाल भी बुरा हुआ.सुबह उठ कर पहला काम हुआ बाहर पटांगण (आंगन) में चूल्हा जलाना. वो छिलुके से पहले चूल्हा जलायेगी और फिर पानी गरम करने वाले डेक (भगोना) को पानी से भर कर रख देगी. अब उस समय ना तो गैस हुई ना ही पानी गरम करने के लिये गीजर.ये सब तो आजकल के साधन हुए भुला हमारे जमाने में ये सब कहाँ हुआ.फिर नौले से फौंले (तांबे की गगरी) में सर में रखकर पानी लाने वाली हुई तब ताजे पानी से चाय बनने वाली हुई.ज्यादा ठंड हुई तो मेथी भूंट के उसकी चाय बना ली.तू तो तब छोटा ही था रे.तू तो तब सात सात दिन तक बिना नहाये हुए रहने वाला हुआ. बस मुँह धो के स्कूल चला जाने वाले हुआ.

बनियान (स्वेटर) उस समय हाथ से बुनी जाने वाली हुई.यह आजकल के मशीन वाले स्वेटर जो क्या हुए उस समय. पुराने स्वेटरों को उधाड़ कर रंग बिरंगी स्वेटर घर-पन के लिये और बजार के लिये खजूरे के डब्बे जैसी बुनाई वाला स्वेटर. जाड़ों में तो तुम लोगों की छुट्टी हो जाने वाले ठहरी . तू तो भींणे में घाम की झलक दिखी नहीं वहीं पर खड़ा हो जाने वाला ठहरा.

आदमी लोगों के ऑफिस जाने के बाद औरतों का काम जल्दी जल्दी पूरा होने वाला हुआ.औरतें पटांगण में बैठ के भान (बरतन) माजने वाली ठहरी फिर गोरु,बल्द हका के, मोव-वोव निकाल के गुपटाले पाथने वाली ठहरी. सब काम होने के बाद दिन का कुछ समय मिलने वाला हुआ ‘क्वीड़’ (बातें) करने के लिये. उसमे भी एक दूसरे की बुनाई देखने और इधर उधर की कितनी तो बातें हुई. ‘अभी तो महालछ्मी के ऎपण भी देने हैं हो मुन्ना की ईजा. मैं बिस्वार पीस दुंगी फिर साथ ही मिल के दे देंगे.एक दिन तुमारा द्याप्ताथान (मंदिर) हो जायेगा एक दिन हमारा कर देंगे.’ या फिर ‘ चलो रे नीबू सानते हैं …जा रे हरिया एक निमू तोड़ ल्या तो और दुई जाड़ मुलैक लै लिये.’ इकादसी का बर्त (व्रत) हुआ तो मूमफली (मूंगफली) मंगा ली और सब मिलके खाने वाले हुए. 

लाई की सब्जी, आलू मेथी की सब्जी, गडेरी की भांग डाली हुई सब्जी,घौत की दाल तो जाड़ों में ही भल (अच्छी)  लगने वाली हुई.ब्याव (शाम) होते ही सब लोग अंगीठी जला लेने वाले हुए.घर के बुड़-बाड़नियों के लिये सगड़ में गुपटाले लगा के कोयले के चूरे के लड्डू सिलका देना हुआ.वो आराम से हाथ तापने वाले हुए.

क्या करें भुला अब तो घर में सब कुछ है…हीटर है ,गीजर है सब तरह की सुविधायें हैं फिर भी मन करता है कि जैसे भाग के चले जायें अपने उसी पटाल वाले आंगन में और धूप सेंकने लगें.कोई दही मूली वाला नीबू सान के लाये और उसे चट चट करते हुए खायें.जंबू का धुंगार लगाये हुए भट के डुबके हों, दाणिम की चटनी हो….भांगे का नमक हो…क्या क्या सोचूँ ..क्या क्या इच्छा करूँ …पूरी थोड़े होनी है रे अब इस उमर में..

कका की आँखो के कोने गीले थे. मैं उनसे पूछ्ना चाहता था कि पहाडों में जब बरफ पड़ती है तो कैसा लगता है.लेकिन अभी नहीं फिर कभी पूछुंगा….

इससे पहले की नराई…

1. नराई के बहाने सिर्फ नराई

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: नराई, पहाड़, उत्तराखंड, काकेश
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