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	<title>Comments on: घुघुती जी के आदेश पर &#8230;</title>
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	<description>Kakesh's KudKud</description>
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		<title>By: श्रीश शर्मा 'ई-पंडित'</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/a_letter_to_crow/comment-page-1/#comment-205</link>
		<dc:creator>श्रीश शर्मा 'ई-पंडित'</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 23 Apr 2007 11:30:07 +0000</pubDate>
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		<description>काँव काँव (वाह, वाह !!) हे काकनरेश, आपने तो कमाल कर दिया। ऑन डिमांड लेखन की फुरसतिया-समीरलाल शैली में आप भी कूद पड़े। उम्मीद है अब इन दोनों महाशयों की तरह आपके इस स्टाइल के लेखन का भी निरंतर आनंद मिलता रहेगा।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>काँव काँव (वाह, वाह !!) हे काकनरेश, आपने तो कमाल कर दिया। ऑन डिमांड लेखन की फुरसतिया-समीरलाल शैली में आप भी कूद पड़े। उम्मीद है अब इन दोनों महाशयों की तरह आपके इस स्टाइल के लेखन का भी निरंतर आनंद मिलता रहेगा।</p>
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		<title>By: अतुल शर्मा</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/a_letter_to_crow/comment-page-1/#comment-204</link>
		<dc:creator>अतुल शर्मा</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 23 Apr 2007 10:20:17 +0000</pubDate>
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		<description>हमें भी बचपन में पढ़ाया गया था कि कौवा सफाई का दरोगा होता है। सत्य ही है। कौवा कहीं भी हो सफाई का उत्तरदायित्व ले ही लेता है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>हमें भी बचपन में पढ़ाया गया था कि कौवा सफाई का दरोगा होता है। सत्य ही है। कौवा कहीं भी हो सफाई का उत्तरदायित्व ले ही लेता है।</p>
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		<title>By: ghughutibasuti</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/a_letter_to_crow/comment-page-1/#comment-203</link>
		<dc:creator>ghughutibasuti</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 23 Apr 2007 08:58:23 +0000</pubDate>
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		<description>वाह काकेश जी, मान गए आपको ! विश्वास हो गया मैंने सही व्यक्ति से विनती की थी । आप तो  आधुनिक युग के होते हुए भी सच के राजा निकले । एक आम व्यक्ति की विनती का इतना मान रखा । धन्य हैं आप काकेश जी ।
आपका लेख हर तरह से सम्पूर्ण है । मनोरंजक है, ज्ञानवर्धक है , व्यापक है । मुझे विश्वास है यदि कौवों की कोई बहुत बड़ी मजबूरी न हुई तो वे मेरे आँगन में अवश्य आएँगे ।
आपका बहुत बहुत धन्यवाद ।
घुघूती बासूती</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>वाह काकेश जी, मान गए आपको ! विश्वास हो गया मैंने सही व्यक्ति से विनती की थी । आप तो  आधुनिक युग के होते हुए भी सच के राजा निकले । एक आम व्यक्ति की विनती का इतना मान रखा । धन्य हैं आप काकेश जी ।<br />
आपका लेख हर तरह से सम्पूर्ण है । मनोरंजक है, ज्ञानवर्धक है , व्यापक है । मुझे विश्वास है यदि कौवों की कोई बहुत बड़ी मजबूरी न हुई तो वे मेरे आँगन में अवश्य आएँगे ।<br />
आपका बहुत बहुत धन्यवाद ।<br />
घुघूती बासूती</p>
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		<title>By: समीर लाल</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/a_letter_to_crow/comment-page-1/#comment-202</link>
		<dc:creator>समीर लाल</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 23 Apr 2007 02:57:08 +0000</pubDate>
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		<description>जहां लूट लिया प्रभू आपने. बहुत खूब कह गये. शाबास, हमरे मित्र काकेश..:) कॉव कॉव!!  यह आपसे सहमती के स्वर हैं..हा हा</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>जहां लूट लिया प्रभू आपने. बहुत खूब कह गये. शाबास, हमरे मित्र काकेश..:) कॉव कॉव!!  यह आपसे सहमती के स्वर हैं..हा हा</p>
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		<title>By: sujata</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/a_letter_to_crow/comment-page-1/#comment-201</link>
		<dc:creator>sujata</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 23 Apr 2007 02:49:53 +0000</pubDate>
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		<description>भाई कागाधिराज

 कौआ वर्णन से हमे अभी अभी पहाड के कौए याद आ गए।
उनकी वाणी अत्यंत कर्कश होती है जैसे गला बैठ गया हो ,शहर वाले थोडे सॉफ्ट हो जाते हैं । पर हमें पहाड के कौए खासतौर से बहुत पसन्द हैं।
वाणी से भी खास यह कि उनका रंग भयंकर रूप से काला होत है। काले पन मे उनका कोई सानी नही ।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>भाई कागाधिराज</p>
<p> कौआ वर्णन से हमे अभी अभी पहाड के कौए याद आ गए।<br />
उनकी वाणी अत्यंत कर्कश होती है जैसे गला बैठ गया हो ,शहर वाले थोडे सॉफ्ट हो जाते हैं । पर हमें पहाड के कौए खासतौर से बहुत पसन्द हैं।<br />
वाणी से भी खास यह कि उनका रंग भयंकर रूप से काला होत है। काले पन मे उनका कोई सानी नही ।</p>
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		<title>By: सृजन शिल्पी</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/a_letter_to_crow/comment-page-1/#comment-200</link>
		<dc:creator>सृजन शिल्पी</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 23 Apr 2007 02:36:00 +0000</pubDate>
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		<description>कौवे का पक्ष इस तरह से काकेश ही रख सकते हैं, जिसे कौवों से संबंधित काव्य, इतिहास और पुराण से लेकर लोकगाथा और आजकल की फिल्म दुनिया तक में आए सभी वृतांत मालूम हैं। अदभुत लिखा है, आपने।

आपने घुघुती जी के आदेश का जिस खूबसूरती से पालन किया है, आपको हृदय से उनका आशीर्वाद मिलेगा।

मेरे सबसे प्रिय चिट्ठाकारों में से तो आप शामिल हो ही चुके हैं।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>कौवे का पक्ष इस तरह से काकेश ही रख सकते हैं, जिसे कौवों से संबंधित काव्य, इतिहास और पुराण से लेकर लोकगाथा और आजकल की फिल्म दुनिया तक में आए सभी वृतांत मालूम हैं। अदभुत लिखा है, आपने।</p>
<p>आपने घुघुती जी के आदेश का जिस खूबसूरती से पालन किया है, आपको हृदय से उनका आशीर्वाद मिलेगा।</p>
<p>मेरे सबसे प्रिय चिट्ठाकारों में से तो आप शामिल हो ही चुके हैं।</p>
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		<title>By: रवि</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/a_letter_to_crow/comment-page-1/#comment-199</link>
		<dc:creator>रवि</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 23 Apr 2007 02:19:55 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://kakesh.com/2007/04/22/a_letter_to_crow/#comment-199</guid>
		<description>काकेश जी, काकीय कहानी में नई बातें जानने को मिलीं. कादम्बिनी में कोई सालेक भर पहले दिल्ली के किसी काक-व्यक्ति के बारे में छपा था (मैंने रचनाकार में पुनर्प्रकाशन के लिए अनुमति मांगी थी जो नहीं मिली) - जिनके आसपास हजारों काक मंडराते रहते हैं - काक उसके दोस्त हैं... वो कहानी भी अलग सी थी.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>काकेश जी, काकीय कहानी में नई बातें जानने को मिलीं. कादम्बिनी में कोई सालेक भर पहले दिल्ली के किसी काक-व्यक्ति के बारे में छपा था (मैंने रचनाकार में पुनर्प्रकाशन के लिए अनुमति मांगी थी जो नहीं मिली) &#8211; जिनके आसपास हजारों काक मंडराते रहते हैं &#8211; काक उसके दोस्त हैं&#8230; वो कहानी भी अलग सी थी.</p>
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