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	<title>Comments on: आचार संहिता का अनाचार</title>
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	<description>Kakesh's KudKud</description>
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		<title>By: क्या ये सारे चिट्ठे चिट्ठाजगत.इन से हटाये जायें</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/aachar_sanheeta/comment-page-1/#comment-982</link>
		<dc:creator>क्या ये सारे चिट्ठे चिट्ठाजगत.इन से हटाये जायें</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 30 Oct 2007 06:00:13 +0000</pubDate>
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		<description>[...] जगत में भी है.इससे पहले भी इस विषय पर मेरे द्वारा और अन्य लोगों द्वारा लिखा गया [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] जगत में भी है.इससे पहले भी इस विषय पर मेरे द्वारा और अन्य लोगों द्वारा लिखा गया [...]</p>
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		<title>By: जूता- सैंडल पुराण - भाग 1 &#171; हम भी हैं लाइन में</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/aachar_sanheeta/comment-page-1/#comment-30</link>
		<dc:creator>जूता- सैंडल पुराण - भाग 1 &#171; हम भी हैं लाइन में</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 05 Apr 2007 06:33:04 +0000</pubDate>
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		<description>[...] हमने चिट्ठाकारिता शुरू की तो कुछ &#8216;शुरुआती झटके&#8217; लगे &#8230;. हुआ यूं कि हम इतने बड़े जुरासिक [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] हमने चिट्ठाकारिता शुरू की तो कुछ &#8216;शुरुआती झटके&#8217; लगे &#8230;. हुआ यूं कि हम इतने बड़े जुरासिक [...]</p>
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		<title>By: पत्रकार यूँ बने ब्लौगर !! &#171; हम भी हैं लाइन में</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/aachar_sanheeta/comment-page-1/#comment-29</link>
		<dc:creator>पत्रकार यूँ बने ब्लौगर !! &#171; हम भी हैं लाइन में</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 23 Mar 2007 04:20:29 +0000</pubDate>
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		<description>[...] 22nd, 2007   ब्लोग की दुनिया बड़ी निराली है . जब आप विवदित हो तो आपको हिट्स भी मिलती हैं और [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] 22nd, 2007   ब्लोग की दुनिया बड़ी निराली है . जब आप विवदित हो तो आपको हिट्स भी मिलती हैं और [...]</p>
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		<title>By: aalochak</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/aachar_sanheeta/comment-page-1/#comment-28</link>
		<dc:creator>aalochak</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 20 Mar 2007 10:39:42 +0000</pubDate>
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		<description>अरे काकेश जी ये आचार सहिता से मुक्ती की बात बिल्कुल सोला आने सही है लेकिन ईस्का जम कर विरोध भी करते है खासकर वो लोग जिनको किसी भी नऎ ब्लोगर से ,जो पहली बार मे हि कुछ अच्छा लिख देता है, कुछ insecurity सी हो जाती है ।
बिल्कुल मुक्त हो कर अपने विचार व्यक्त करते रहे।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अरे काकेश जी ये आचार सहिता से मुक्ती की बात बिल्कुल सोला आने सही है लेकिन ईस्का जम कर विरोध भी करते है खासकर वो लोग जिनको किसी भी नऎ ब्लोगर से ,जो पहली बार मे हि कुछ अच्छा लिख देता है, कुछ insecurity सी हो जाती है ।<br />
बिल्कुल मुक्त हो कर अपने विचार व्यक्त करते रहे।</p>
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	<item>
		<title>By: notepad</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/aachar_sanheeta/comment-page-1/#comment-27</link>
		<dc:creator>notepad</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 20 Mar 2007 03:13:08 +0000</pubDate>
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		<description>गैन्गबाज़ी  ????</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>गैन्गबाज़ी  ????</p>
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		<title>By: Shrish</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/aachar_sanheeta/comment-page-1/#comment-26</link>
		<dc:creator>Shrish</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 19 Mar 2007 21:54:39 +0000</pubDate>
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		<description>ऊपर योगेश समदर्शी, सागर चंद नाहर और जीतू भैया वाली ही टिप्पणियाँ हमारी भी समझी जाएं। बाकी अपने विचार अपने चिट्ठे पर ब्लॉगियायेंगे।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>ऊपर योगेश समदर्शी, सागर चंद नाहर और जीतू भैया वाली ही टिप्पणियाँ हमारी भी समझी जाएं। बाकी अपने विचार अपने चिट्ठे पर ब्लॉगियायेंगे।</p>
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	<item>
		<title>By: masijeevi</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/aachar_sanheeta/comment-page-1/#comment-25</link>
		<dc:creator>masijeevi</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 19 Mar 2007 18:31:04 +0000</pubDate>
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		<description>देखिए आचार संहिता रविजी ने बना दी है। सृजन जी यहॉं वहॉं मत पूछो कहॉं कहॉं संतोषी मॉं की तर्ज पर उसका पालन भी कर रहे हैं। लेकिन हम तो उसी विश्‍वविद्यालयी भाषा में जारी रहने वाले हैं।
ये तकनीक वकनीक से जासूसी छोड़ लोग क्‍यों नहीं किसी रचनात्‍मक काम में ऊर्जा लगाते।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>देखिए आचार संहिता रविजी ने बना दी है। सृजन जी यहॉं वहॉं मत पूछो कहॉं कहॉं संतोषी मॉं की तर्ज पर उसका पालन भी कर रहे हैं। लेकिन हम तो उसी विश्‍वविद्यालयी भाषा में जारी रहने वाले हैं।<br />
ये तकनीक वकनीक से जासूसी छोड़ लोग क्‍यों नहीं किसी रचनात्‍मक काम में ऊर्जा लगाते।</p>
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		<title>By: जीतू</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/aachar_sanheeta/comment-page-1/#comment-24</link>
		<dc:creator>जीतू</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 19 Mar 2007 11:19:36 +0000</pubDate>
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		<description>इसे बोलते है तू कौन खांमखा, क्यों पिले, बस हॉबी है।

भैया, पहले बात को समझिए तो। हमने कभी भी चिट्ठों की आचार संहिता की बात नही की। जो सभी लोग स्वतन्त्रता की बात करने आ गए।

हम नारद पर शामिल होने वाले चिट्ठों की आचार संहिता की बात कर रहे है। आपकी जानकारी के लिए बता दें, हिन्दी मे हजारो विषयों पर लिखा जाता है, पोर्नो से लेकर, तन्त्र मन्त्र विद्या तक, हमने वे चिट्ठे नारद पर शामिल नही किए। लेकिन हमने उनको लिखने से रोका क्या? नही, तो फिर काहे का बवाल?

दूसरे तरीके से समझिए, हो सकता है हम में से कुछ लोग गाली गलौच करने के शौकीन हो, हो भी सकता है (इनका पुलिस मे अच्छा कैरियर होगा), लेकिन क्या वे ही बन्धु अपने घर पर गाली गलौच करेंगे? अपने परिवार के बीच गाली गलौच करेंगे? शायद नही। मेरे विचार से यही आचार संहिता की बात मै कहना चाहता हूँ। उसके बाद भी आप बिना समझे पिल्लम पिल्ली करना चाहो तो आपकी मर्जी।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>इसे बोलते है तू कौन खांमखा, क्यों पिले, बस हॉबी है।</p>
<p>भैया, पहले बात को समझिए तो। हमने कभी भी चिट्ठों की आचार संहिता की बात नही की। जो सभी लोग स्वतन्त्रता की बात करने आ गए।</p>
<p>हम नारद पर शामिल होने वाले चिट्ठों की आचार संहिता की बात कर रहे है। आपकी जानकारी के लिए बता दें, हिन्दी मे हजारो विषयों पर लिखा जाता है, पोर्नो से लेकर, तन्त्र मन्त्र विद्या तक, हमने वे चिट्ठे नारद पर शामिल नही किए। लेकिन हमने उनको लिखने से रोका क्या? नही, तो फिर काहे का बवाल?</p>
<p>दूसरे तरीके से समझिए, हो सकता है हम में से कुछ लोग गाली गलौच करने के शौकीन हो, हो भी सकता है (इनका पुलिस मे अच्छा कैरियर होगा), लेकिन क्या वे ही बन्धु अपने घर पर गाली गलौच करेंगे? अपने परिवार के बीच गाली गलौच करेंगे? शायद नही। मेरे विचार से यही आचार संहिता की बात मै कहना चाहता हूँ। उसके बाद भी आप बिना समझे पिल्लम पिल्ली करना चाहो तो आपकी मर्जी।</p>
]]></content:encoded>
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	<item>
		<title>By: सृजन शिल्पी</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/aachar_sanheeta/comment-page-1/#comment-23</link>
		<dc:creator>सृजन शिल्पी</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 19 Mar 2007 10:14:49 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://kakesh.com/2007/03/18/aachar_sanheeta/#comment-23</guid>
		<description>मेरी उपर्युक्त टिप्पणी अन्यत्र पोस्ट की जानी थी, लेकिन असावधानीवश यहाँ पेस्ट हो गई।

काकेश जी, शुरुआती पोस्ट ही आपने झटका देने के लिए की है। थोड़ा समझ लीजिए, रम जाइए, जम जाइए, फिर झटका भी दीजिएगा। ऐसा नहीं है कि किसी नए चिट्ठाकार को इसका हक नहीं है। लेकिन आप दूसरों की पोस्ट के आधार पर हिन्दी चिट्ठाकारी के बारे में अपनी धारणा न बनाएँ।

वैसे, विवादों से शुरुआत करना अपनी तरफ ध्यान आकर्षित कराने का पुराना फंडा रहा है। बहरहाल, आपका स्वागत है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मेरी उपर्युक्त टिप्पणी अन्यत्र पोस्ट की जानी थी, लेकिन असावधानीवश यहाँ पेस्ट हो गई।</p>
<p>काकेश जी, शुरुआती पोस्ट ही आपने झटका देने के लिए की है। थोड़ा समझ लीजिए, रम जाइए, जम जाइए, फिर झटका भी दीजिएगा। ऐसा नहीं है कि किसी नए चिट्ठाकार को इसका हक नहीं है। लेकिन आप दूसरों की पोस्ट के आधार पर हिन्दी चिट्ठाकारी के बारे में अपनी धारणा न बनाएँ।</p>
<p>वैसे, विवादों से शुरुआत करना अपनी तरफ ध्यान आकर्षित कराने का पुराना फंडा रहा है। बहरहाल, आपका स्वागत है।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: सागर चन्द नाहर</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/aachar_sanheeta/comment-page-1/#comment-22</link>
		<dc:creator>सागर चन्द नाहर</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 19 Mar 2007 08:48:37 +0000</pubDate>
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		<description>काकेश जी
जिस आचार संहिता  की बात आप कर रहे हैं वह &quot;नारद&quot; पर पंजीकृत चिट्ठों  के लिये है, ना कि इन्टरनेट पर लिखे जा रहे सारे लेखन के लिये।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>काकेश जी<br />
जिस आचार संहिता  की बात आप कर रहे हैं वह &#8220;नारद&#8221; पर पंजीकृत चिट्ठों  के लिये है, ना कि इन्टरनेट पर लिखे जा रहे सारे लेखन के लिये।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: सृजन शिल्पी</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/aachar_sanheeta/comment-page-1/#comment-21</link>
		<dc:creator>सृजन शिल्पी</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 19 Mar 2007 08:36:52 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://kakesh.com/2007/03/18/aachar_sanheeta/#comment-21</guid>
		<description>भाई, ये समझ में आता है कि हिन्दी के क्षेत्र में शोध करने वालों और कराने वालों के लिए घिस-पीट के अप्रासंगिक हो चुके विषयों की नीरसता से बचने के लिए ऑनलाइन हिन्दी की तरफ रुख करना जरूरी हो गया है। लेकिन ब्लॉगिंग के प्रयोजन और प्रकृति को समझे बगैर और खुद उसमें गहरे उतरे बगैर आप लोग इतने पंडिताऊ ढंग से बातें करने लग जाते हो, यह समझ में नहीं आता।

ब्लॉगिंग यदि पत्रकारिता नहीं है तो कॉलेजों और विश्वविद्यालयों का हिन्दी विभाग भी नहीं है। मुखौटे लगाने का शौक है, लगाओ। लेकिन गैंगबाजी मत करो। तकनीक तुम्हारी असलियत की पोल खोल रहा है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>भाई, ये समझ में आता है कि हिन्दी के क्षेत्र में शोध करने वालों और कराने वालों के लिए घिस-पीट के अप्रासंगिक हो चुके विषयों की नीरसता से बचने के लिए ऑनलाइन हिन्दी की तरफ रुख करना जरूरी हो गया है। लेकिन ब्लॉगिंग के प्रयोजन और प्रकृति को समझे बगैर और खुद उसमें गहरे उतरे बगैर आप लोग इतने पंडिताऊ ढंग से बातें करने लग जाते हो, यह समझ में नहीं आता।</p>
<p>ब्लॉगिंग यदि पत्रकारिता नहीं है तो कॉलेजों और विश्वविद्यालयों का हिन्दी विभाग भी नहीं है। मुखौटे लगाने का शौक है, लगाओ। लेकिन गैंगबाजी मत करो। तकनीक तुम्हारी असलियत की पोल खोल रहा है।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: योगेश समदर्शी</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/aachar_sanheeta/comment-page-1/#comment-20</link>
		<dc:creator>योगेश समदर्शी</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 19 Mar 2007 08:19:35 +0000</pubDate>
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		<description>बात अच्छी लगी. पर मुझे लगता है ब्लोगिंग पत्रकारिता नहीं है, न ही साहित्य हैं, ब्लोगिंग लेखन की एक अलग परमपरा है. इसमे पत्रकारिता के शोध भी है, समाज का दर्पण भी है और व्यक्ति के खुद के विचार इन दोनों से ज्यादा है. यह माध्यम हाल में रोजी रोटी या कमाई के बजाय स्वांत सुखाय ज्यादा है इसलिये यहा लेखक के सामने किसी किसम की कोई रुकावट नहीं कोई बंदिश भी नही है और मजबूरी भी नही है अतं हर कोई मन की कर सकता है. मैं समझता हू जब सबको मन की करने की पूरी छूट होती है तब यह ज्यादा जरूरी हो जाता है कि एक आचार संहिता हो. अपनी मन की करने के चचक्कर में हम दूसरों के मन को चोट न पहुंचाने लगे. मेरा ऐसा मानना है.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बात अच्छी लगी. पर मुझे लगता है ब्लोगिंग पत्रकारिता नहीं है, न ही साहित्य हैं, ब्लोगिंग लेखन की एक अलग परमपरा है. इसमे पत्रकारिता के शोध भी है, समाज का दर्पण भी है और व्यक्ति के खुद के विचार इन दोनों से ज्यादा है. यह माध्यम हाल में रोजी रोटी या कमाई के बजाय स्वांत सुखाय ज्यादा है इसलिये यहा लेखक के सामने किसी किसम की कोई रुकावट नहीं कोई बंदिश भी नही है और मजबूरी भी नही है अतं हर कोई मन की कर सकता है. मैं समझता हू जब सबको मन की करने की पूरी छूट होती है तब यह ज्यादा जरूरी हो जाता है कि एक आचार संहिता हो. अपनी मन की करने के चचक्कर में हम दूसरों के मन को चोट न पहुंचाने लगे. मेरा ऐसा मानना है.</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: notepad</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/aachar_sanheeta/comment-page-1/#comment-19</link>
		<dc:creator>notepad</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 19 Mar 2007 08:19:05 +0000</pubDate>
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		<description>आपका स्वागत है!
वैसे मै भी १ महीना पुरानी हू।
 एक राय है। माने ,यह कोइ ज़रूरी नही।
template बदल सके तो अच्छा रहेगा।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आपका स्वागत है!<br />
वैसे मै भी १ महीना पुरानी हू।<br />
 एक राय है। माने ,यह कोइ ज़रूरी नही।<br />
template बदल सके तो अच्छा रहेगा।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: raviratlami</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/aachar_sanheeta/comment-page-1/#comment-18</link>
		<dc:creator>raviratlami</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 19 Mar 2007 07:10:22 +0000</pubDate>
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		<description>&quot;...इंटरनैट एक खुला माध्यम (open platform) है ..इसे खुला ही रहने दें इसकी सुन्दरता  व भलाई भी इसी में है…..&quot;

मेरा भी यही मानना है. बाकी, आपका कहना है-
&quot;...एक शिकायत.. “चिट्ठा चर्चा” में दीप्ती पंत के नये चिट्ठे का जिक्र हुआ मेरे चिट्ठे का नहीं… क्या चर्चा के लिये “स्त्रीलिंग” होना आवश्यक है..यदि ऎसा है तो मैं भी फिर जे. ऎल. सोनार की तर्ज पर नया मुखोटा लगाऊं..:-)...&quot;

तो आज का चिट्ठा-चर्चा अवश्य पढ़ें</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>&#8220;&#8230;इंटरनैट एक खुला माध्यम (open platform) है ..इसे खुला ही रहने दें इसकी सुन्दरता  व भलाई भी इसी में है…..&#8221;</p>
<p>मेरा भी यही मानना है. बाकी, आपका कहना है-<br />
&#8220;&#8230;एक शिकायत.. “चिट्ठा चर्चा” में दीप्ती पंत के नये चिट्ठे का जिक्र हुआ मेरे चिट्ठे का नहीं… क्या चर्चा के लिये “स्त्रीलिंग” होना आवश्यक है..यदि ऎसा है तो मैं भी फिर जे. ऎल. सोनार की तर्ज पर नया मुखोटा लगाऊं..:-)&#8230;&#8221;</p>
<p>तो आज का चिट्ठा-चर्चा अवश्य पढ़ें</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: संजय बेंगाणी</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/aachar_sanheeta/comment-page-1/#comment-17</link>
		<dc:creator>संजय बेंगाणी</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 19 Mar 2007 06:57:04 +0000</pubDate>
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		<description>&#039;मैं&quot; शब्द ही सही है, हास्य की पुट देने के लिए हम शब्द का प्रयोग किया जाता है.

चिट्ठाचर्चा में लिंग भेद नहीं होता.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>&#8216;मैं&#8221; शब्द ही सही है, हास्य की पुट देने के लिए हम शब्द का प्रयोग किया जाता है.</p>
<p>चिट्ठाचर्चा में लिंग भेद नहीं होता.</p>
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