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	<title>Comments on: बेनामी सूनामी से भी ज्यादा भयंकर !!??</title>
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	<description>Kakesh's KudKud</description>
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		<title>By: sanjupahari</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/benaam_baat/comment-page-1/#comment-999</link>
		<dc:creator>sanjupahari</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 31 Oct 2007 16:03:14 +0000</pubDate>
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		<description>काकेश भाई कमाल का लिखते हो भैय्या, कुछ नाम मुझे भी सुझाओ क्या है की नामकरण में दाल-भात खाने को जो मिलने वाला ठैरा ..चलो वो जो भी हो पर आपके लेख होते बहुत मस्त हैं ..लिखते रहे हमें पढ़ाते रहें ... with lots of नराई 
tumar dagaru
sanjupahari

JAI PAHAD&gt;&gt;JAI BADRIVISHAL</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>काकेश भाई कमाल का लिखते हो भैय्या, कुछ नाम मुझे भी सुझाओ क्या है की नामकरण में दाल-भात खाने को जो मिलने वाला ठैरा ..चलो वो जो भी हो पर आपके लेख होते बहुत मस्त हैं ..लिखते रहे हमें पढ़ाते रहें &#8230; with lots of नराई<br />
tumar dagaru<br />
sanjupahari</p>
<p>JAI PAHAD&gt;&gt;JAI BADRIVISHAL</p>
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		<title>By: ghughutibasuti</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/benaam_baat/comment-page-1/#comment-155</link>
		<dc:creator>ghughutibasuti</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 14 Apr 2007 18:32:45 +0000</pubDate>
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		<description>बहुत खूब काकेश जी ! मजा आ गया। बहुत अच्छा व मनोरंजक लिखा। नाम तो मैं भी सुझा सकती हूँ। नाम ही नाम के नाम से अपनी दुकान भी खोल सकती हूँ। उदाहरण के लिये मेरा नाम देखिये।
घुघूती बासूती</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बहुत खूब काकेश जी ! मजा आ गया। बहुत अच्छा व मनोरंजक लिखा। नाम तो मैं भी सुझा सकती हूँ। नाम ही नाम के नाम से अपनी दुकान भी खोल सकती हूँ। उदाहरण के लिये मेरा नाम देखिये।<br />
घुघूती बासूती</p>
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		<title>By: Tarun</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/benaam_baat/comment-page-1/#comment-154</link>
		<dc:creator>Tarun</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 13 Apr 2007 00:19:24 +0000</pubDate>
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		<description>हम स्वामीजी की बात से सहमत हूँ, बेनाम होने का बडा सही गुणा भाग किये हैं आप</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>हम स्वामीजी की बात से सहमत हूँ, बेनाम होने का बडा सही गुणा भाग किये हैं आप</p>
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		<title>By: सागर चन्द नाहर</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/benaam_baat/comment-page-1/#comment-153</link>
		<dc:creator>सागर चन्द नाहर</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 12 Apr 2007 13:11:02 +0000</pubDate>
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		<description>मैं भी स्वामीजी की बात से सहमत हूँ। और रही बात अनाम रह कर लिखने की तो नाम धारियों ने अपनी सभ्यता का परिचय दे ही दिया है  कि वे कितने सभ्य है।
आप लिखते रहिये हमें कोई फरक नहीं पड़ता कि आप राकेश हैं या कोई और हम आपके लेख उनकी गुणवत्ता की वजह से पढ़ते हैं ना कि आपके नाम की वजह से।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मैं भी स्वामीजी की बात से सहमत हूँ। और रही बात अनाम रह कर लिखने की तो नाम धारियों ने अपनी सभ्यता का परिचय दे ही दिया है  कि वे कितने सभ्य है।<br />
आप लिखते रहिये हमें कोई फरक नहीं पड़ता कि आप राकेश हैं या कोई और हम आपके लेख उनकी गुणवत्ता की वजह से पढ़ते हैं ना कि आपके नाम की वजह से।</p>
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	</item>
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		<title>By: masijeevi</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/benaam_baat/comment-page-1/#comment-152</link>
		<dc:creator>masijeevi</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 12 Apr 2007 11:24:55 +0000</pubDate>
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		<description>आप हिट हैं और आपके नारद हिंट उतने नहीं दिखेंगे क्‍योंकि अब अधिक लोग आपको सब्‍सक्राईब करके पढ रहे हैं। टिप्‍पणी का कुछ हिस्‍सा वही है जो अल्‍लसुबह अनामदास के यहॉं की थी क्‍योंकि इस मुद्दे पर पिछले 10 घंटे में मेरी राय बदल नहीं गई है :)। कुछ बातें अंत में नई जोड़ी हैं

यह ठीक है कि अक्‍सर बेनाम अपने दिमाग की गंदगी ही इधर उधर टिकाते ज्‍यादा नजर आते हैं और हमसे अधिक इस बात को शायद ही किसी ने सहा होगा। पर ये भी सच है कि वे इस पाखंड से दूर होते हैं कि भई देखो हमारे दिमाग में कोई गंदगी है ही नहीं। इसलिए हमने लगातार सबसे कुत्सित और कायर के बेनाम रहने के अधिकार का पूरा सम्‍मान किया भले ही उसकी कुत्सिकता और कायरता को रद्दी की टोकरी के हवाले किया। हमारे इस मुखौटेपन के विरोध में भी कई बाकायदा चेहरेवालों ने बेनाम मुखौटे पहने और अपनी दस्‍त और कब्‍ज का मुजाहिरा किया।

और एक बार और हम बेनाम को गालियॉं बककर उसका एक चेहरा ही गढ़ने के व्‍याकरण में हैं जबकि शायद स्‍वाभाविक है कि बेनाम एक नहीं अनेक हैं चूकि हर बेनाम सिर्फ बेनाम होता है इसलिए हम मान लेते हैं कि हर बेनाम सिर्फ हरामी होता है नहीं साहब कुछ हरामी, कुछ कमीने, कुछ कायर, कुछ यशलिप्‍सा से मुक्‍त योगी,....अलग अलग होते होंगे।
इसलिए वहीं किया जाना चाहिए कि किसी को कचरा फेंकने के अधिकार से इसलिए वंचित न करेंकि वह पासपोर्ट नहीं लाया है लेकिन आप उस कचरे को रखते हैं कि नहीं ये आपका ही विवेक रहेगा।
:
:
और एक बात। ये बेनाम पर बात सदैव पुल्लिंग में ही क्‍यों होती है। वह कमीना है-कमीनी नहीं ?? हे चिट्ठाजगत की सीमोन तुम कहा हो।

&#039;वैसे एक राज की बात बताऊं आप अपना नाम कोई स्त्रीलिंग में रख सकें तो बहुत अच्छा . इससे एक तो आपको पप्पी चिप्पी लगाने वाले ज्यादा मिलेंगे और फिर कोई आपको इस तरह से गरियाएगा भी नहीं . जी हां सही बात है....
वैसे साथी स्‍त्री चिट्ठाकारों के विषय में आपकी राय इससे खूब जाहिर होती है और ये भी कि देखो नाम बेनाम होने का सभ्‍यता से कोई पॉजीटिव कोरिलेशन नहीं है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आप हिट हैं और आपके नारद हिंट उतने नहीं दिखेंगे क्‍योंकि अब अधिक लोग आपको सब्‍सक्राईब करके पढ रहे हैं। टिप्‍पणी का कुछ हिस्‍सा वही है जो अल्‍लसुबह अनामदास के यहॉं की थी क्‍योंकि इस मुद्दे पर पिछले 10 घंटे में मेरी राय बदल नहीं गई है <img src='http://kakesh.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> । कुछ बातें अंत में नई जोड़ी हैं</p>
<p>यह ठीक है कि अक्‍सर बेनाम अपने दिमाग की गंदगी ही इधर उधर टिकाते ज्‍यादा नजर आते हैं और हमसे अधिक इस बात को शायद ही किसी ने सहा होगा। पर ये भी सच है कि वे इस पाखंड से दूर होते हैं कि भई देखो हमारे दिमाग में कोई गंदगी है ही नहीं। इसलिए हमने लगातार सबसे कुत्सित और कायर के बेनाम रहने के अधिकार का पूरा सम्‍मान किया भले ही उसकी कुत्सिकता और कायरता को रद्दी की टोकरी के हवाले किया। हमारे इस मुखौटेपन के विरोध में भी कई बाकायदा चेहरेवालों ने बेनाम मुखौटे पहने और अपनी दस्‍त और कब्‍ज का मुजाहिरा किया।</p>
<p>और एक बार और हम बेनाम को गालियॉं बककर उसका एक चेहरा ही गढ़ने के व्‍याकरण में हैं जबकि शायद स्‍वाभाविक है कि बेनाम एक नहीं अनेक हैं चूकि हर बेनाम सिर्फ बेनाम होता है इसलिए हम मान लेते हैं कि हर बेनाम सिर्फ हरामी होता है नहीं साहब कुछ हरामी, कुछ कमीने, कुछ कायर, कुछ यशलिप्‍सा से मुक्‍त योगी,&#8230;.अलग अलग होते होंगे।<br />
इसलिए वहीं किया जाना चाहिए कि किसी को कचरा फेंकने के अधिकार से इसलिए वंचित न करेंकि वह पासपोर्ट नहीं लाया है लेकिन आप उस कचरे को रखते हैं कि नहीं ये आपका ही विवेक रहेगा।<br />
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और एक बात। ये बेनाम पर बात सदैव पुल्लिंग में ही क्‍यों होती है। वह कमीना है-कमीनी नहीं ?? हे चिट्ठाजगत की सीमोन तुम कहा हो।</p>
<p>&#8216;वैसे एक राज की बात बताऊं आप अपना नाम कोई स्त्रीलिंग में रख सकें तो बहुत अच्छा . इससे एक तो आपको पप्पी चिप्पी लगाने वाले ज्यादा मिलेंगे और फिर कोई आपको इस तरह से गरियाएगा भी नहीं . जी हां सही बात है&#8230;.<br />
वैसे साथी स्‍त्री चिट्ठाकारों के विषय में आपकी राय इससे खूब जाहिर होती है और ये भी कि देखो नाम बेनाम होने का सभ्‍यता से कोई पॉजीटिव कोरिलेशन नहीं है।</p>
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		<title>By: Rachana</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/benaam_baat/comment-page-1/#comment-151</link>
		<dc:creator>Rachana</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 12 Apr 2007 09:19:21 +0000</pubDate>
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		<description>वाह मजेदार!!!!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>वाह मजेदार!!!!</p>
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	<item>
		<title>By: प्रियंकर</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/benaam_baat/comment-page-1/#comment-150</link>
		<dc:creator>प्रियंकर</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 12 Apr 2007 08:44:25 +0000</pubDate>
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		<description>वाह! पिटी-पिटाई लीक छोड़कर बहुत अच्छा लिखा है आपने . यह नई उद्भावना है . सच में इसे इस नए कोण से भी देखा जा सकता है .</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>वाह! पिटी-पिटाई लीक छोड़कर बहुत अच्छा लिखा है आपने . यह नई उद्भावना है . सच में इसे इस नए कोण से भी देखा जा सकता है .</p>
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	<item>
		<title>By: जगदीश भाटिया</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/benaam_baat/comment-page-1/#comment-149</link>
		<dc:creator>जगदीश भाटिया</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 12 Apr 2007 07:29:36 +0000</pubDate>
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		<description>परेशानी बेनाम से नहीं उसकी आजादी से है। बेनाम कुछ भी लिखने को आजाद हो जाता है। नाम(छद्म ही सही) बाले की एक पहवान धीरे धीरे बन जाती है तो हम उसके अंदाज और शैली को समझने लगते हैं। हम जिसे जान जाते हैं उसकी आलोचना को सकरात्मक तरीके से ले पाते हैं, अनजान की आलोचना, बुराई या गाली कोई बर्दाश्त कैसे करेगा?</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>परेशानी बेनाम से नहीं उसकी आजादी से है। बेनाम कुछ भी लिखने को आजाद हो जाता है। नाम(छद्म ही सही) बाले की एक पहवान धीरे धीरे बन जाती है तो हम उसके अंदाज और शैली को समझने लगते हैं। हम जिसे जान जाते हैं उसकी आलोचना को सकरात्मक तरीके से ले पाते हैं, अनजान की आलोचना, बुराई या गाली कोई बर्दाश्त कैसे करेगा?</p>
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	<item>
		<title>By: कमल शर्मा</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/benaam_baat/comment-page-1/#comment-148</link>
		<dc:creator>कमल शर्मा</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 12 Apr 2007 06:21:03 +0000</pubDate>
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		<description>मैं आपकी कुछ बातों से सहमत हूं लेकिन सच्‍चे मित्र और हितैषी मेरी नजर में वे ही जो सामने मुंह पर सच कह दे1 बगैर लाग लपेट के बगैर भूमिका बांधे लगे बुरा तो लगे1 लेकिन मुंह पर कहो1 नाराज हो तो हो बला से1 मैंने सेठ होशंगाबादी के ब्‍लॉग पर देखा था कि एक बेनाम ने जमकर मां बहिन की गालियां दे मारी जो मैं यहां नहीं बता सकता पर आप हम सब समझते हैं मां बहिन की क्‍या क्‍या गालियां हिंदुस्‍तान में बकी जाती है1 यह काम वह नाम के साथ करता तो मजा आता1 बेनामी साहसी होते हैं तो सीधे मुंह पर आकर क्‍यों नहीं कह देते1 मैं सुनना चाहता हूं मेरे खिलाफ सही बात बोलिए जिसे बोलना है1 मैं नहीं परेशान होता अपनी निंदा से1</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मैं आपकी कुछ बातों से सहमत हूं लेकिन सच्‍चे मित्र और हितैषी मेरी नजर में वे ही जो सामने मुंह पर सच कह दे1 बगैर लाग लपेट के बगैर भूमिका बांधे लगे बुरा तो लगे1 लेकिन मुंह पर कहो1 नाराज हो तो हो बला से1 मैंने सेठ होशंगाबादी के ब्‍लॉग पर देखा था कि एक बेनाम ने जमकर मां बहिन की गालियां दे मारी जो मैं यहां नहीं बता सकता पर आप हम सब समझते हैं मां बहिन की क्‍या क्‍या गालियां हिंदुस्‍तान में बकी जाती है1 यह काम वह नाम के साथ करता तो मजा आता1 बेनामी साहसी होते हैं तो सीधे मुंह पर आकर क्‍यों नहीं कह देते1 मैं सुनना चाहता हूं मेरे खिलाफ सही बात बोलिए जिसे बोलना है1 मैं नहीं परेशान होता अपनी निंदा से1</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: संजय बेंगाणी</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/benaam_baat/comment-page-1/#comment-147</link>
		<dc:creator>संजय बेंगाणी</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 12 Apr 2007 06:11:23 +0000</pubDate>
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		<description>आज तक मैने कोई टिप्पणी नहीं हटाई, चाहे वह कितनी ही अरूचीकर क्यों न हो, या ऐसी टिप्पणी किसी गुमनाम ने ही क्यों न की हो.
मगर एक बेनामी टिप्पणी को मैने हटाया क्यों कि उसमे मुझे मुस्लिम की औलाद बताते हुए बहुत सी गालियाँ लिखी थी. अगर यह टिप्पणी नाम के साथ आती तो मैं नहीं हटाता. लोग भी देखे की कोई कितना नीचतापूर्वक लिख सकता है. मगर जनाब में इतनी हिम्मत नहीं थी. उसे क्या कहें? कायर या बहादूर?</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आज तक मैने कोई टिप्पणी नहीं हटाई, चाहे वह कितनी ही अरूचीकर क्यों न हो, या ऐसी टिप्पणी किसी गुमनाम ने ही क्यों न की हो.<br />
मगर एक बेनामी टिप्पणी को मैने हटाया क्यों कि उसमे मुझे मुस्लिम की औलाद बताते हुए बहुत सी गालियाँ लिखी थी. अगर यह टिप्पणी नाम के साथ आती तो मैं नहीं हटाता. लोग भी देखे की कोई कितना नीचतापूर्वक लिख सकता है. मगर जनाब में इतनी हिम्मत नहीं थी. उसे क्या कहें? कायर या बहादूर?</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: सृजन शिल्पी</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/benaam_baat/comment-page-1/#comment-146</link>
		<dc:creator>सृजन शिल्पी</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 12 Apr 2007 05:46:41 +0000</pubDate>
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		<description>मैं ई-स्वामी से पूरी तरह सहमत हूं। यही वजह है कि मैंने तमाम नये चिट्ठों में सबसे अधिक टिप्पणी आपके चिट्ठे पर की है। आपका स्वागत भी एक अलग और खास अंदाज में किया। :)

जहां तक बेनाम टिप्पणियों की बात है, ऐसी टिप्पणियों से तब तक किसी को परेशानी नहीं होनी चाहिए जब तक कि उसमें सत्य कहा गया हो, भले ही उसकी भाषा कुछ हद तक अप्रिय हो। सच को कहने का अंदाज और लहज़ा इतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना कि स्वयं सच। लेकिन एक इंसान को किसी दूसरे इंसान से जिस न्यूनतम तमीज की अपेक्षा होती है, कम से कम उतनी तमीज तो हम आपस में संवाद करते समय अपनी भाषा में दिखा ही सकते हैं।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मैं ई-स्वामी से पूरी तरह सहमत हूं। यही वजह है कि मैंने तमाम नये चिट्ठों में सबसे अधिक टिप्पणी आपके चिट्ठे पर की है। आपका स्वागत भी एक अलग और खास अंदाज में किया। <img src='http://kakesh.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<p>जहां तक बेनाम टिप्पणियों की बात है, ऐसी टिप्पणियों से तब तक किसी को परेशानी नहीं होनी चाहिए जब तक कि उसमें सत्य कहा गया हो, भले ही उसकी भाषा कुछ हद तक अप्रिय हो। सच को कहने का अंदाज और लहज़ा इतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना कि स्वयं सच। लेकिन एक इंसान को किसी दूसरे इंसान से जिस न्यूनतम तमीज की अपेक्षा होती है, कम से कम उतनी तमीज तो हम आपस में संवाद करते समय अपनी भाषा में दिखा ही सकते हैं।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: योगेश समदर्शी</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/benaam_baat/comment-page-1/#comment-145</link>
		<dc:creator>योगेश समदर्शी</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 12 Apr 2007 05:29:53 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://kakesh.com/2007/04/11/benaam_baat/#comment-145</guid>
		<description>बहुत खूब अंदाज में आपने विषय को समाप् करने के लिये अंतिम भाषण जैसा दे डाला है. मैं समझता हूं कि आपकी इस पोस्ट में इतना दम है कि अब इसे पढने के बाद बेनामी विषय पर कोई पोस्ट नहीं लिखी जानी चाहिये. सब खल्लास कर दिया आपने. एक एक तर्क मानो तरकश से आ रहा कोई ब्रह्मास्त्र हो.
&quot;किसी ने कहा कि ‘बेनाम लिखने वाला कायर है’ . मैं कहता हूं ‘बेनाम लिखने वाला सभ्य है’ . वो आपकी इज्जत कर रहा है . वो आपके खिलाफ बुरे विचार ,आपकी बात की खिलाफत सीधे मुंह पर नहीं कर रहा . वो आपसे वार्तालाप का एक नया माध्यम तलाश रहा है . इसमें तकनीक भी उसका साथ दे रही है फिर आपको क्या समस्या है ?…. आपके लिये क्या महत्वपूर्ण है वार्तालाप या व्यक्ति .यदि आप कहें ‘वार्तालाप’ .. तो नाम पर क्यों जाते है वो अनाम हो या अनामदास क्या अंतर पड़ता है और यदि आप कहें नहीं ‘नाम’ ज्यादा महत्वपूर्ण है तो बन्द कर दो ना ‘एनोनिमस पोस्टिंग’ .क्यों बेचारों को गरियाकर अपनी सभ्यता का परिचय दे रहे हो &quot;
बात एकदम सही है. हमें बुरे से बुरा सुनना आना चाहिये. पर यह बात भी है कि हममें बुरे से बुरा खुल कर कहने कि हिममत भी हो तो हम ज्यादा दिलदार साबित हो सकते हैं.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बहुत खूब अंदाज में आपने विषय को समाप् करने के लिये अंतिम भाषण जैसा दे डाला है. मैं समझता हूं कि आपकी इस पोस्ट में इतना दम है कि अब इसे पढने के बाद बेनामी विषय पर कोई पोस्ट नहीं लिखी जानी चाहिये. सब खल्लास कर दिया आपने. एक एक तर्क मानो तरकश से आ रहा कोई ब्रह्मास्त्र हो.<br />
&#8220;किसी ने कहा कि ‘बेनाम लिखने वाला कायर है’ . मैं कहता हूं ‘बेनाम लिखने वाला सभ्य है’ . वो आपकी इज्जत कर रहा है . वो आपके खिलाफ बुरे विचार ,आपकी बात की खिलाफत सीधे मुंह पर नहीं कर रहा . वो आपसे वार्तालाप का एक नया माध्यम तलाश रहा है . इसमें तकनीक भी उसका साथ दे रही है फिर आपको क्या समस्या है ?…. आपके लिये क्या महत्वपूर्ण है वार्तालाप या व्यक्ति .यदि आप कहें ‘वार्तालाप’ .. तो नाम पर क्यों जाते है वो अनाम हो या अनामदास क्या अंतर पड़ता है और यदि आप कहें नहीं ‘नाम’ ज्यादा महत्वपूर्ण है तो बन्द कर दो ना ‘एनोनिमस पोस्टिंग’ .क्यों बेचारों को गरियाकर अपनी सभ्यता का परिचय दे रहे हो &#8221;<br />
बात एकदम सही है. हमें बुरे से बुरा सुनना आना चाहिये. पर यह बात भी है कि हममें बुरे से बुरा खुल कर कहने कि हिममत भी हो तो हम ज्यादा दिलदार साबित हो सकते हैं.</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: अतुल शर्मा</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/benaam_baat/comment-page-1/#comment-144</link>
		<dc:creator>अतुल शर्मा</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 12 Apr 2007 05:27:26 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://kakesh.com/2007/04/11/benaam_baat/#comment-144</guid>
		<description>जब तक बेनामों की भाषा संयत है तो कोई समस्या ही नहीं है और जिन लोगों को असंयत भाषा का भय है वे लोग अपने चिट्ठे पर कमेंट मॉडरेशन की सेंसरशिप लागू कर सकते हैं। लोग बेनामों को लतियाए जा रहें हैं केवल इसलिए कि वे बेनाम हैं। इन ब्लॉगर्स की भाषा भी असंयत है &#039;कौन है इन बेनामों का बाप&#039;, भला ये स्वयं क्या बताना चाह रहे हैं। यदि टिप्पणी की भाषा ठीक है तो भी बेनाम को क्यों कोसे जा रहे हैं।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>जब तक बेनामों की भाषा संयत है तो कोई समस्या ही नहीं है और जिन लोगों को असंयत भाषा का भय है वे लोग अपने चिट्ठे पर कमेंट मॉडरेशन की सेंसरशिप लागू कर सकते हैं। लोग बेनामों को लतियाए जा रहें हैं केवल इसलिए कि वे बेनाम हैं। इन ब्लॉगर्स की भाषा भी असंयत है &#8216;कौन है इन बेनामों का बाप&#8217;, भला ये स्वयं क्या बताना चाह रहे हैं। यदि टिप्पणी की भाषा ठीक है तो भी बेनाम को क्यों कोसे जा रहे हैं।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: beji</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/benaam_baat/comment-page-1/#comment-143</link>
		<dc:creator>beji</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 12 Apr 2007 05:14:02 +0000</pubDate>
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		<description>&quot;क्यों हम कही हुई ‘बात पर ना जाकर जात पर’ ( नाम पर ) जाते हैं . क्यों मेरी कही हुई ठीक वही बात अलग अलग नामों से अलग अलग अर्थ दे जाती है .&quot;
बिल्कुल सही!!
सामने एक नाम हो तो शायद कोसने के लिए पहचान मिल जाती है।
वैसे आप, &quot;आप ‘भैनजी’ रख सकते हैं … इससे एक तो आपको य़ू.पी. के चुनावों में कुछ माइलेज मिल जायेगा और फिर आप मासूम से सवाल भी उठा सकती है …“ नेता क्यूं बने अभिनेता “ टाइप&quot; ऐसे रहस्य ना खोले.... :))</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>&#8220;क्यों हम कही हुई ‘बात पर ना जाकर जात पर’ ( नाम पर ) जाते हैं . क्यों मेरी कही हुई ठीक वही बात अलग अलग नामों से अलग अलग अर्थ दे जाती है .&#8221;<br />
बिल्कुल सही!!<br />
सामने एक नाम हो तो शायद कोसने के लिए पहचान मिल जाती है।<br />
वैसे आप, &#8220;आप ‘भैनजी’ रख सकते हैं … इससे एक तो आपको य़ू.पी. के चुनावों में कुछ माइलेज मिल जायेगा और फिर आप मासूम से सवाल भी उठा सकती है …“ नेता क्यूं बने अभिनेता “ टाइप&#8221; ऐसे रहस्य ना खोले&#8230;. <img src='http://kakesh.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> )</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: peloopande</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/benaam_baat/comment-page-1/#comment-142</link>
		<dc:creator>peloopande</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 12 Apr 2007 05:07:13 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://kakesh.com/2007/04/11/benaam_baat/#comment-142</guid>
		<description>आपका अन्दाज़ बढ़िया है भाई..मगर यहाँ मुद्दा वही है जो रवि जी और आशीष कह रहे हैं..ग़ुमनामी की आड़ से गाली गलौज.. अति-स्वतंत्र समाज में भी मर्यादायें तो होंगी..मामला उसी सीमा का है.. कल को  कोई अपनी एक पहचान लेकर गाली गलौज करने लगे तो भी आप प्रकाशित तो नहीं कर देंगे..</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आपका अन्दाज़ बढ़िया है भाई..मगर यहाँ मुद्दा वही है जो रवि जी और आशीष कह रहे हैं..ग़ुमनामी की आड़ से गाली गलौज.. अति-स्वतंत्र समाज में भी मर्यादायें तो होंगी..मामला उसी सीमा का है.. कल को  कोई अपनी एक पहचान लेकर गाली गलौज करने लगे तो भी आप प्रकाशित तो नहीं कर देंगे..</p>
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	<item>
		<title>By: eswami</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/benaam_baat/comment-page-1/#comment-141</link>
		<dc:creator>eswami</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 12 Apr 2007 05:00:19 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://kakesh.com/2007/04/11/benaam_baat/#comment-141</guid>
		<description>काकेश,

मैंने हिन्दी और अंग्रेजी में लिखने वाले एक से एक धुरंधर ब्लागर्स पढे. बहुत लाजवाब शैली और शब्द-विन्यास वाले, किसी को लेखक हो चुकने की चाह, किसी को लोकप्रिय होने की, किसी को प्रसिद्ध होने की तो किसी को हिट काऊंटर की चिंता तो कोई बेवजह आत्ममोहित.

मुझे किसी और के लेखन ने इतनी जल्दी प्रभावित नहीं किया जितना आपके लेखन ने किया है! आपने स्ट्राईक-आऊट का प्रयोग बहुत सुंदरता से किया है - क्या सोच रहे हैं और क्या लिखना पडेगा दोनो दर्शाने के लिये.

लेखन में निरपेक्ष विश्लेषण और वैचारिक स्पष्टता के अलावा अपनी बात तार्किक तरीके से रखने का दम है आप में.

पाठक को समझता है की आप ब्लागर होने के लिये लिख रहे हैं, पाठकों का सम्मान करते हुए संवाद स्थापित करने और संप्रेषण की समझ विकसित करने के लिये. हर लेख से एक ऊंची छंलाग लगा रहे हैं. इसे कहते हैं ब्लागिंग!

एक और बात, कहीं कहीं आपकी शैली अनुभवी ब्लागर रमण कौल भाई की शैली से भी मिलती है और ये एक बहुत बडा कांप्लिमेंट है! बधाई. :)</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>काकेश,</p>
<p>मैंने हिन्दी और अंग्रेजी में लिखने वाले एक से एक धुरंधर ब्लागर्स पढे. बहुत लाजवाब शैली और शब्द-विन्यास वाले, किसी को लेखक हो चुकने की चाह, किसी को लोकप्रिय होने की, किसी को प्रसिद्ध होने की तो किसी को हिट काऊंटर की चिंता तो कोई बेवजह आत्ममोहित.</p>
<p>मुझे किसी और के लेखन ने इतनी जल्दी प्रभावित नहीं किया जितना आपके लेखन ने किया है! आपने स्ट्राईक-आऊट का प्रयोग बहुत सुंदरता से किया है &#8211; क्या सोच रहे हैं और क्या लिखना पडेगा दोनो दर्शाने के लिये.</p>
<p>लेखन में निरपेक्ष विश्लेषण और वैचारिक स्पष्टता के अलावा अपनी बात तार्किक तरीके से रखने का दम है आप में.</p>
<p>पाठक को समझता है की आप ब्लागर होने के लिये लिख रहे हैं, पाठकों का सम्मान करते हुए संवाद स्थापित करने और संप्रेषण की समझ विकसित करने के लिये. हर लेख से एक ऊंची छंलाग लगा रहे हैं. इसे कहते हैं ब्लागिंग!</p>
<p>एक और बात, कहीं कहीं आपकी शैली अनुभवी ब्लागर रमण कौल भाई की शैली से भी मिलती है और ये एक बहुत बडा कांप्लिमेंट है! बधाई. <img src='http://kakesh.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
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	<item>
		<title>By: आशीष</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/benaam_baat/comment-page-1/#comment-140</link>
		<dc:creator>आशीष</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 12 Apr 2007 04:55:35 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://kakesh.com/2007/04/11/benaam_baat/#comment-140</guid>
		<description>आपकी पिछली पोष्ट पिटी नही है, वो ऐसा है टिप्पणीयो की संख्या या नारद का हिट काउंटर किसी पोष्ट की सफलता का पैमाना नही है।
मेरी किसी भी चिठ्ठे पर हिट नारद का हिट काउंटर मे जोड़ा नही जाता क्योंकि मै फीडरीडर का प्रयोग करता हूं।
बेनामी टिप्पणीयो से कोई परेशानी तब तक नही है जब तक वह सभ्य भाषा मे हो !</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आपकी पिछली पोष्ट पिटी नही है, वो ऐसा है टिप्पणीयो की संख्या या नारद का हिट काउंटर किसी पोष्ट की सफलता का पैमाना नही है।<br />
मेरी किसी भी चिठ्ठे पर हिट नारद का हिट काउंटर मे जोड़ा नही जाता क्योंकि मै फीडरीडर का प्रयोग करता हूं।<br />
बेनामी टिप्पणीयो से कोई परेशानी तब तक नही है जब तक वह सभ्य भाषा मे हो !</p>
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	<item>
		<title>By: Mohinder Kumar</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/benaam_baat/comment-page-1/#comment-139</link>
		<dc:creator>Mohinder Kumar</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 12 Apr 2007 04:50:31 +0000</pubDate>
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		<description>काकेश जी

आप व्यर्थ ही परेशान हो गये..
यदि टिप्पणी नाम के साथ हो चाहे कटाक्ष ही हो तो पता चलता है कि कौन हितैषी है जो हमें सुधारना चाहता है. बेनामी टिप्पणी में तोडी कायरता का एहसास जरूर होता है... सच्चाई को साफ़ साफ़ कहने मे‍ क्या बुराई है.
वैसे टिप्पणी, आपके विचारो‍ का प्रतिबिम्ब नही‍ वो तो व्यक्ति विशेष के विचार है‍.. और कोई जरूरी नही की आप उससे सहमत ही हो‍

सस्नेह
मोहिन्दर</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>काकेश जी</p>
<p>आप व्यर्थ ही परेशान हो गये..<br />
यदि टिप्पणी नाम के साथ हो चाहे कटाक्ष ही हो तो पता चलता है कि कौन हितैषी है जो हमें सुधारना चाहता है. बेनामी टिप्पणी में तोडी कायरता का एहसास जरूर होता है&#8230; सच्चाई को साफ़ साफ़ कहने मे‍ क्या बुराई है.<br />
वैसे टिप्पणी, आपके विचारो‍ का प्रतिबिम्ब नही‍ वो तो व्यक्ति विशेष के विचार है‍.. और कोई जरूरी नही की आप उससे सहमत ही हो‍</p>
<p>सस्नेह<br />
मोहिन्दर</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: raviratlami</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/benaam_baat/comment-page-1/#comment-138</link>
		<dc:creator>raviratlami</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 12 Apr 2007 04:42:11 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://kakesh.com/2007/04/11/benaam_baat/#comment-138</guid>
		<description>&lt;b&gt;&lt;i&gt;&quot;...मुझे लगता है हमारी पीड़ा का कारण बेनाम व्यक्ति नहीं वरन उसकी कही हुई कड़वी ( सच्ची ) बातों को हजम नहीं कर पाना है ....&quot;  &lt;/b&gt;&lt;/i&gt;

नहीं, संभवतः ये बात नहीं है. दरअसल कड़वी से कड़वी बात भी सभ्यता से रखी जा सकती है. बात गंदी भाषा के असभ्यता पूर्वक इस्तेमाल को लेकर ज्यादा है. और, इसे तो कोई भी बर्दाश्त नहीं करेगा- शायद वे अनाम भी जो ऐसी भाषा लिखते हैं!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p><b><i>&#8220;&#8230;मुझे लगता है हमारी पीड़ा का कारण बेनाम व्यक्ति नहीं वरन उसकी कही हुई कड़वी ( सच्ची ) बातों को हजम नहीं कर पाना है &#8230;.&#8221;  </i></b></p>
<p>नहीं, संभवतः ये बात नहीं है. दरअसल कड़वी से कड़वी बात भी सभ्यता से रखी जा सकती है. बात गंदी भाषा के असभ्यता पूर्वक इस्तेमाल को लेकर ज्यादा है. और, इसे तो कोई भी बर्दाश्त नहीं करेगा- शायद वे अनाम भी जो ऐसी भाषा लिखते हैं!</p>
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