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	<title>Comments on: अहमदाबाद और दिल्ली का जातिवाद ? ..</title>
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	<description>Kakesh's KudKud</description>
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		<title>By: Mired Mirage</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/castism-in-ahamadabad-and-delhi/comment-page-1/#comment-551</link>
		<dc:creator>Mired Mirage</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 25 Jun 2007 15:15:00 +0000</pubDate>
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		<description>आपका सोचना कुछ सीमा तक सही है । बहुत सी बातें ऐसी होती हैं जो हमें स्वाभाविक व व्यवहारिक लगती हैं किन्तु जो पोलिटिकली करेक्ट नहीं होतीं । मान लीजिये मैं शाकाहारी हूँ और मेरा पूरा परिवार शाकाहारी है तो यदि मैं शाकाहारी लोगों के बीच रहूँगी तो मेरा जीवन सरल हो जाएगा । मैं रात दिन पड़ोसियों के घर से आती माँस पकने की गन्ध से बच जाऊँगी । मैं स्वयं माँस पकाती हूँ पर मुझे भी वह गन्ध असह्य लगती है । &lt;br/&gt;इसी तरह यदि किसी सोसायटी में केवल वृद्ध रहते हों तो वे पार्टियों व संगीत की ऊँची आवाज से भी बच जाएँगे और युवाओं को टोकने से भी ।&lt;br/&gt;पर यही सब बात जब धार्मिक या जातीय स्तर पर कही जाती है तो स्वाभाविक रूप से बुरी लगती है । यदि मैं किसी माँसाहारी ब्राह्मण को घर किराये पर देने से मना करती हूँ तो उसे बुरा नहीं लगेगा, पर यदि किसी अन्य धर्म वाले , या जाति वाले को माँसाहार के आधार पर मना करूँगी तो उन्हें निश्चय ही लगेगा कि मैं धार्मिक या जातीय भेदभाव कर रही हूँ । यह साधारण सा मनोविग्यान है ।&lt;br/&gt;हाँ, यह भी सही है कि जितनी अधिक विविधता किसी मौहल्ले में होगी उतना ही वह हमें सहनशील व औरों के अधिकारों व भावनाओं के प्रति जागरुक बनायेगी । &lt;br/&gt;घुघूती बासूती</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आपका सोचना कुछ सीमा तक सही है । बहुत सी बातें ऐसी होती हैं जो हमें स्वाभाविक व व्यवहारिक लगती हैं किन्तु जो पोलिटिकली करेक्ट नहीं होतीं । मान लीजिये मैं शाकाहारी हूँ और मेरा पूरा परिवार शाकाहारी है तो यदि मैं शाकाहारी लोगों के बीच रहूँगी तो मेरा जीवन सरल हो जाएगा । मैं रात दिन पड़ोसियों के घर से आती माँस पकने की गन्ध से बच जाऊँगी । मैं स्वयं माँस पकाती हूँ पर मुझे भी वह गन्ध असह्य लगती है । <br />इसी तरह यदि किसी सोसायटी में केवल वृद्ध रहते हों तो वे पार्टियों व संगीत की ऊँची आवाज से भी बच जाएँगे और युवाओं को टोकने से भी ।<br />पर यही सब बात जब धार्मिक या जातीय स्तर पर कही जाती है तो स्वाभाविक रूप से बुरी लगती है । यदि मैं किसी माँसाहारी ब्राह्मण को घर किराये पर देने से मना करती हूँ तो उसे बुरा नहीं लगेगा, पर यदि किसी अन्य धर्म वाले , या जाति वाले को माँसाहार के आधार पर मना करूँगी तो उन्हें निश्चय ही लगेगा कि मैं धार्मिक या जातीय भेदभाव कर रही हूँ । यह साधारण सा मनोविग्यान है ।<br />हाँ, यह भी सही है कि जितनी अधिक विविधता किसी मौहल्ले में होगी उतना ही वह हमें सहनशील व औरों के अधिकारों व भावनाओं के प्रति जागरुक बनायेगी । <br />घुघूती बासूती</p>
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		<title>By: संजय बेंगाणी</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/castism-in-ahamadabad-and-delhi/comment-page-1/#comment-550</link>
		<dc:creator>संजय बेंगाणी</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 25 Jun 2007 07:40:00 +0000</pubDate>
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		<description>आपका लिखा गलत है, क्योंकि दिल्ली गुजरात में नहीं है. बाकि ऐसा तो सब जगह मिल जाता है.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आपका लिखा गलत है, क्योंकि दिल्ली गुजरात में नहीं है. बाकि ऐसा तो सब जगह मिल जाता है.</p>
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		<title>By: ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/castism-in-ahamadabad-and-delhi/comment-page-1/#comment-549</link>
		<dc:creator>ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 25 Jun 2007 06:05:00 +0000</pubDate>
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		<description>मुहल्ला हो चाहे न हो. लोगों की सोच में ही वह बस गया है. पोस्टमें/टिप्पणीमें/बहसमें मुहल्लीकरण कर ही लेते हैं.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मुहल्ला हो चाहे न हो. लोगों की सोच में ही वह बस गया है. पोस्टमें/टिप्पणीमें/बहसमें मुहल्लीकरण कर ही लेते हैं.</p>
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		<title>By: अभय तिवारी</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/castism-in-ahamadabad-and-delhi/comment-page-1/#comment-548</link>
		<dc:creator>अभय तिवारी</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 25 Jun 2007 05:44:00 +0000</pubDate>
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		<description>मियाँ काकेश, आप की पोस्ट से ज़्यादा आप की पोस्ट पर टिप्पणीकारों से सहमत हुआ जाता हूँ.. आशा है आप बुरा न मानेंगे..प्रमोद जी और मसिजीवी ने पते की बात कही है..</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मियाँ काकेश, आप की पोस्ट से ज़्यादा आप की पोस्ट पर टिप्पणीकारों से सहमत हुआ जाता हूँ.. आशा है आप बुरा न मानेंगे..प्रमोद जी और मसिजीवी ने पते की बात कही है..</p>
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		<title>By: अरुण</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/castism-in-ahamadabad-and-delhi/comment-page-1/#comment-547</link>
		<dc:creator>अरुण</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 25 Jun 2007 05:22:00 +0000</pubDate>
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		<description>जा की रही भावना जैसी,उसको दिखी उसकी सूरत वैसी,&lt;br/&gt;काहे महामोह्ल्लेशवर,कस्बेशवर को समझाने मे वक्त,समय और दिमाग जाया करते हो&lt;br/&gt;इतनी मेहनत अपने विभाग के साथ करो,चौपाये तक ट्रेंड हो जायेगे&lt;br/&gt;&quot; तुम खुब समझालो,वो नही समझेगे या रब&lt;br/&gt;  या खुदा उन्हे दे बुद्धी,काकेश को बदाम का ट्रक:</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>जा की रही भावना जैसी,उसको दिखी उसकी सूरत वैसी,<br />काहे महामोह्ल्लेशवर,कस्बेशवर को समझाने मे वक्त,समय और दिमाग जाया करते हो<br />इतनी मेहनत अपने विभाग के साथ करो,चौपाये तक ट्रेंड हो जायेगे<br />&#8221; तुम खुब समझालो,वो नही समझेगे या रब<br />  या खुदा उन्हे दे बुद्धी,काकेश को बदाम का ट्रक:</p>
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	<item>
		<title>By: masijeevi</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/castism-in-ahamadabad-and-delhi/comment-page-1/#comment-546</link>
		<dc:creator>masijeevi</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 25 Jun 2007 04:47:00 +0000</pubDate>
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		<description>काकेश थोड़ा सरलीकरण किए जा रहे हैं, जरा थमिए:&lt;br/&gt;आप दिल्‍ली के बारे में जो कह रहे हैं वह पूरी तरह निराधार नहीं है पर आप बसावट के अधिकांश उदाहरण पेशेगत व क्षेत्र के देकर इसे स्‍वाभाविक कहे दे रहे हैं- जाति की भी भूमिका है उसे नजरअंदाज न करें और धर्म की भी- पर विशेष बात यह कि ये दिल्‍ली की प्रकृति उस रूप में नहीं है जैसी रवीश बता रहे हैं (अगर सच है तो)और फिर &#039;अपने जैसे&#039; लोगों के इकट्ठे होने में जो सेल्‍फ व अदर की गहरी निर्मिति है वही तो &#039;दंगे&#039; की शुरूआत है।&lt;br/&gt;&lt;br/&gt;एक नजर ताज एपार्टमेंट (गीता कालोनी) पर भी डाल आएं और स्‍पष्ट हो जाएगा।&lt;br/&gt;&lt;br/&gt;ये जो अल्‍पसंख्‍यकों में भय-मनोवृत्ति होती है, महानगर उसका निषेध करता है या कहें आदर्श रूप में उसे करना चाहिए पर यदि वह उसका पोषण करने लगे तो ये महानगर का ग्रामीकरण है जो &#039;गुजरातों&#039; को जन्‍म दे सकता है- देता है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>काकेश थोड़ा सरलीकरण किए जा रहे हैं, जरा थमिए:<br />आप दिल्‍ली के बारे में जो कह रहे हैं वह पूरी तरह निराधार नहीं है पर आप बसावट के अधिकांश उदाहरण पेशेगत व क्षेत्र के देकर इसे स्‍वाभाविक कहे दे रहे हैं- जाति की भी भूमिका है उसे नजरअंदाज न करें और धर्म की भी- पर विशेष बात यह कि ये दिल्‍ली की प्रकृति उस रूप में नहीं है जैसी रवीश बता रहे हैं (अगर सच है तो)और फिर &#8216;अपने जैसे&#8217; लोगों के इकट्ठे होने में जो सेल्‍फ व अदर की गहरी निर्मिति है वही तो &#8216;दंगे&#8217; की शुरूआत है।</p>
<p>एक नजर ताज एपार्टमेंट (गीता कालोनी) पर भी डाल आएं और स्‍पष्ट हो जाएगा।</p>
<p>ये जो अल्‍पसंख्‍यकों में भय-मनोवृत्ति होती है, महानगर उसका निषेध करता है या कहें आदर्श रूप में उसे करना चाहिए पर यदि वह उसका पोषण करने लगे तो ये महानगर का ग्रामीकरण है जो &#8216;गुजरातों&#8217; को जन्‍म दे सकता है- देता है।</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: Pramod Singh</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/castism-in-ahamadabad-and-delhi/comment-page-1/#comment-545</link>
		<dc:creator>Pramod Singh</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 25 Jun 2007 03:27:00 +0000</pubDate>
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		<description>यह दिल्‍ली ही नहीं, मुंबई- कमोबेश किसी भी बड़े भारतीय शहर की अंदरूनी डायरी है. इस अनुभव से नतीजा क्‍या निकलता है? एक तो वह जिसे आप समूहबद्धता की सहूलियत का सीधा, आसान-सा नाम देकर छुट्टी पा सकते हैं. और देखना चाहें तो (मुझे हर जगह वही प्रभावी दीखता है)- कि ऊपरी तौर पर आधुनिकता के दिखावटी हो-हल्‍ले के बावजूद किस तरह यह हमारी &lt;b&gt;एंटी-शहरी, घेटोआइज़्ड&lt;/b&gt; और अपनी पहचानी सामूहिकता से बाहर किसी भी अजनबीयत से भारी &lt;b&gt;भय की मानसिकता&lt;/b&gt; है! आपको-हमको उतना न दिखे, मगर किसी भी अनजानी व नयी जगह में &lt;b&gt;अल्‍पसंख्‍यक&lt;/b&gt; जिसकी सबसे ज्‍यादा तक़लीफ़ें व अलगावपन झेलते व जीते हैं.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>यह दिल्‍ली ही नहीं, मुंबई- कमोबेश किसी भी बड़े भारतीय शहर की अंदरूनी डायरी है. इस अनुभव से नतीजा क्‍या निकलता है? एक तो वह जिसे आप समूहबद्धता की सहूलियत का सीधा, आसान-सा नाम देकर छुट्टी पा सकते हैं. और देखना चाहें तो (मुझे हर जगह वही प्रभावी दीखता है)- कि ऊपरी तौर पर आधुनिकता के दिखावटी हो-हल्‍ले के बावजूद किस तरह यह हमारी <b>एंटी-शहरी, घेटोआइज़्ड</b> और अपनी पहचानी सामूहिकता से बाहर किसी भी अजनबीयत से भारी <b>भय की मानसिकता</b> है! आपको-हमको उतना न दिखे, मगर किसी भी अनजानी व नयी जगह में <b>अल्‍पसंख्‍यक</b> जिसकी सबसे ज्‍यादा तक़लीफ़ें व अलगावपन झेलते व जीते हैं.</p>
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