क्या केवल “सैक्स” ही बिकता है..एक “सैक्सी” विश्लेषण..

ज़िस्म

अपनी पिछ्ली पोस्ट में मैं कुछ उधेड़बुन में था कि ब्लौग क्या बिना उद्देश्य के भी लिखा जा सकता है … आप लोगों की टिप्पणीयों से साहस बंधा कि मुझे इस प्रश्न पर सर खपाने की बजाय लिखते रहना चाहिये …. इसलिये अब अपने सारे पूर्वाग्रह और दुराग्रह छोड़ के फिर से उपस्थित हुआ हूँ .

अभी कुछ दिनों से टीवी पर ऎसे विज्ञापनो की संख्या बढ़ गयी है जिसे आप अपने पूरे परिवार के बीच नहीं देख सकते…या देखकर शर्म महसूस कर सकते हैं… पहले ऎसे विज्ञापन केवल कॉंडोम या अन्य गर्भनिरोधकों के ही होते थे. मुझे याद है ..बचपन में जब केवल दूरदर्शन ही एकमात्र चैनल हुआ करता था तब रात के हिन्दी समाचारों के बाद गर्भनिरोधकों जैसे “निरोध” या “माला-डी” का विज्ञापन आता था और जब भी हिन्दी समाचार समाप्त होने को होते और मुख्य समाचारों की बारी आती तो हमारे घर में टी वी की आवाज कम कर दी जाती. हाँलाकि उस समय इन विज्ञापनों में अश्लील कुछ भी नहीं होता था फिर भी इन्हें परिवार के बीच देखना गवारा नहीं समझा जाता था. और आजकल तो विज्ञापन ही ऎसे आ गये हैं जो द्र्श्य और श्रव्य दोनों ही रूपों में अश्लीलता की श्रेणी में आते हैं… और ये विज्ञापन खुले आम हमारे घरों में प्रवेश भी कर गये हैं… अभय जी अपनी पोस्ट में यौन कुंठा की बात कही उनका इशारा आजकल बन रही फिल्मों के बारे में था.. फिल्म देखने के लिये तो तब भी आपके पास एक विकल्प (ऑप्सन )होता है कि आप फिल्म देखें या नहीं लेकिन विज्ञापन तो कोई विकल्प भी नहीं देते… ये तो बस आपके टी.वी. पर आ जाते हैं जब तक आप इसकी शीलता या अश्लीलता समझे तब तक ये समाप्त हो चुके होते हैं और आप सोफे में बैठ नजरें कहीं और ग़ड़ाये चुप रहते हैं ये साबित करने के लिये कि आपका ध्यान तो कहीं और था.

Amul Macho2

अब “अमूल माचो” नामक अंडरवियर के विज्ञापन को ही लें.. ये किस तरह की फंतासी का निर्माण आपके अन्दर करता है .. जब नयी नवेली दुल्हन तालाब के किनारे अपनी पति के अंतर्वस्त्र को धो रही होती है तब वो और वहां पर जलती भुनती अन्य औरतें क्या सोच रही होती हैं… और वो नयी नवेली दुलहन सारी लोकलाज त्याग कर घुटनों तक अपनी साड़ी उठा कर, अजीब अजीब से मुँह बनाकर अंतर्वस्त्र धोने लगती है .. आप भी देखना चाहते हैं तो देखिये क्या है यह ?.. एक फंतासी के जरिये उत्पाद बेचने की कोशिश .. और ये ही बिक भी रहा है.. समाचारों के मुताबिक इस ब्रांड की बिक्री में इस विज्ञापन के बाद 30 प्रतिशत की वृद्धि हुई है.. अंडरवियर के ऎसे बहुत से विज्ञापन आजकल दिखाये जा रहें हैं.. कुछ लोगों के मुताबिक ये सृजनात्मकता (क्रियेटिविटी) है .. लेकिन यदि क्रियेटिविटी क्या केवल अश्लील ही होती है…

इसी तरह के एक अन्य विज्ञापन में एक अर्धनग्न बाला बड़े ही सिड्यूसिंग तरीके से कहती है … “निकालिये ना ……. कपड़े “. ये क्यों?? इस तरह द्विअर्थी वाक्य तो पहले दादा कोंडके की फिल्मों में होते थे .. आपको “ अन्धेरी रात में दिया तेरे हाथ में” या “खोल दे मेरी…… जबान “ तो याद ही होंगे ना..तब लोग इन फिल्मों को कोसते थे और ये फिल्में “ए” सार्टिफिकेट के साथ हॉल में आती थीं .. लेकिन आजकल के विज्ञापन बिना किसी सेंसर के हमारे ड्राइंग रूम में आ रहे हैं… इसी तरह का एक द्विअर्थी विज्ञापन था रीडिफमेल का ..जिसमें लड़कियां एक छोटे राजू के बड़े साइज के बारे में बात कर रही होती हैं.. यहाँ तक की राजू का बॉस भी शौचालय में अपनी दृष्टि राजू के शरीर पर ही गड़ाये रखता है … और अंत में एक बेशरम मित्र पूछ ही लेता है क्या ये सचमुच बहुत बड़ा है .. तो राजू कहता है कि ये बड़ा ही नहीं वरन अनलिमिटेड है .. तब पता चलता है कि वो लोग राजू के मेल बॉक्स के साईज के बारे में बात कर रहे होते हैं…

अब कॉडोम के “बिन्दास बोल” या फिर दिल्ली सरकार के “कॉडोम हमेशा साथ रखिये” से तो बच्चे बहुत कुछ सीख ही रहे थे… अब आने वाले समय में और भी ना जाने क्या क्या सीखेंगे …

18 thoughts on “क्या केवल “सैक्स” ही बिकता है..एक “सैक्सी” विश्लेषण..”

  1. आज की मानसिकाता ही बनी हुई है सेक्स को बेचने और खरीदनें की। बड़ी बुढ़ापे मे अमिताभ भी जिया खान के टॉंगों को घूरते नही थकते। :)

    सही कहा बडें सीखे या न सीखें बच्‍चे जरूर बहुत कुछ ज्‍यादा सीख रहे है :D

  2. aap ne bilkul sahi likha, ye yonkuntha ki parakashta hai. rediff ke massenger per jakar dekho to esa lagta hai ki sex marijo ke bich aagye ho.
    is vishaya ko uthane ke liye aapko sadhuwad

  3. जब बज़ारीकरण कर ही दिया है फ़िर क्या भाई साहब. अब संस्कार-संस्कृति सब बिकेंगे और कोई टिप्पणी करे या आपत्ति जताये तो कहा जायेगा कि अजन्ता-एलोरा को देख लो यही इतिहास है… जब ओखल मे सर डाल दिया फ़िर मूसल से क्या डरना.

  4. भाइ धन्यवाद हम ये सब घर पर जरा ढंग से नही देख पाते,
    उम्मीद है भविष्य मे भी आप ऐसे ही दिखाते रहेगे :)
    बाकी क्या है की जो बिकता है वही दिखाते है बिचारे,
    फ़िर भी आप किसी दूसरे की आजादी पर हमला नही कर रहे है क्या,अगले के नये नये घर वाले का नया निक्कर है पैसे खर्च किये है,दिखाये भी नही,आप भी दिखाये अपने नये निक्कर की फ़ोटो :)

  5. Roman mein hindi ke liye kshma. Ad se jyada aapke dimag mein fitoor hai. Ye ad aap ek particular context(sandarbh) se analyse kar rahe hain. Dimag se Sab sandarbh hata dijiye ad mein kuch bura nahin lagega.

  6. आप सोफे में बैठ नजरें कहीं और ग़ड़ाये चुप रहते हैं ये साबित करने के लिये कि आपका ध्यान तो कहीं और था.

    सत्य कहा, अब आजकल के बच्चों का तो पता नहीं पर अपना यही हाल था।

    पता नहीं ये अश्लीलता की आंधी नई पीढ़ी को कहाँ ले जाएगी। इस बारे में ऊपर गौरव प्रताप जी की टिप्पणी बहुत सारगर्भित है।

    इस तरह द्विअर्थी वाक्य तो पहले दादा कोंडके की फिल्मों में होते थे।

    ये दादा कोंडके का नाम बहुत बार सुना है पर कभी कोई फिल्म देखी नहीं।

  7. vakai jis tarah ke ad dikhayejaa rahe hai unhe parivar ke saath dekhte hue aankhe sharm se jhuk jaati hai. fir bachcho ne us baare me saval pooch liye tab to bolti band ho jaati hai. pata nahi vigypan nirmatao ko aisa kyo lagta hai ki bina asheel put diye product nahi bikega.

  8. एड्स बड़ी विकराल समस्या है, परंतु उससे बचाव ‘बिंदास बोल’ नहीं है। वैसे भी ये सरकारी विज्ञापन इसके लक्ष्य दर्शकों तक नही पहुँच पाते। सर्वाधिक संक्रमित होने वाले लोग जैसे ट्रक ड्राइवर, यौनकर्मी प्राइम टाइम में शायद ही टीवी देखते हों, और यदि देखते भी हों तो अशिक्षा और पेशगत बाध्यता के कारण कंडोम का उपयोग नहीं कर पाते होंगे। ग्रामीण जनता तक भी ये विज्ञापन नहीं पहुँचते होंगे क्योंकि वहाँ पर सबके पास टीवी नहीं होता, यदि टीवी है तो समय नहीं होता, यदि ये सब है तो भारत के अधिकांश गाँवों में बिजली नहीं होती है।

  9. काकेश भाई बच्‍चे कुछ नहीं सीखेंगे । ध्‍यान से देखिये आजकल की जनरेशन में कमाल की समझदारी है । आजकल के बच्‍चों को सब कुछ पता है । और मुझे तो लगता है कि उन पर इसका कोई बुरा असर नहीं पड़ने वाला । इसका मतलब ये नहीं कि मैं अश्‍लीलता का समर्थन कर रहा हूं । इसे तो फौरन से पेशतर बंद करना होगा । पर उससे भी जरूरी है कि हम आज के समझदार बच्‍चों को सही समझ मेरा मतलब सही शिक्षा दें । जो इस माहौल में जरूरी है ।

  10. बजार की मांग और अश्लीलता को विभाजित करती जो एक महीन रेखा है, उसको पहचानने की जरुरत है, बस. समय और जगह के हिसाब से इनके अर्थ बदलते रहते हैं. जो बात हमारे समय में अश्लील मानी जाती है, वह आज नहीं मानी जाती. अभी तो अनेकों ऐसे बदलाव हमेशा की तरह आते रहेंगे. :)

  11. हर वस्तु का वैश्वीकरण हो रहा है….जब कोई आंधी चलती है तो सब कुछ प्रभावित होता है फर्क सिर्फ इतना होता है कि कोई कम प्रभावित होता है कोई ज्यादा…अब आप ही की बात लीजिये आप नाटक कर रहे थे कि आप नहीं देख रहे लेकिन आप देख रहे थे….तो यही होता है….कोईघर पर देखता है और अगर नहीं देख सका तो कहीं बाहर जाकर देखता है….आप यह न समझे कि मैं इसकी पक्षधर हूं मैं सिर्फ सच्चाई बता रही हूं….कि चाहे खुलकर देखें य चुपके से बात तो वही है…..स्त्री के इश्तहार के बिना तो कुछ भी नहीं बिकता…

    संसार का हर व्यापार उससे ही चल रहा है,
    क्योंकि उसे व्यापार का इश्तहार कर दिया है।

    होटल,क्लब,बार उसकी थिरकन में झूमते हैं,
    फिर भी तन-मन से उसे कंगाल कर दिया है।

    नग्न तन से यहां नाचती हैं जो तारिकाएं,
    स्त्री की अस्मिता पर इक बड़ा सवाल कर दिया है।

    अब बस यही हमारी संस्कृति का पतन का दौर चल रहा है….और हम विवश होकर देख ही सकते हैं….मूल्यहीनता की आंधी को रोक नहीं सकते…

  12. अमूल मैचो के इस विज्ञापन से ज्यादा अश्लीलता आजकल धारावाहिकों में दिख जाती है और यह धारावाहिक बड़े मजे से सपरिवार देखें जाते हैं।

  13. “KYA SEX HEE BIKATA HAI” jee ha mahoday, aaj kal sex ke shahre hee ek product becha ja skata hai. Agar add mai kuch khas nahi ho to kisi ko usko dekhame koi dilchaspi nahi rahegi, jab koi add hee nahi dekhega to product kaise bikeka. Yeh ek jariya hai ek utpad ko bhechne ka. Privartan sansar kaa niyam hai. jaisa kee uprokaqt comment mai kaha purane jamane mai nirodh ke add, mai esa kucha nahi hota tha, parntu use dekhane mai sharm mahsus hoti thi. To aaj ke is kaliyug mai thoda parivartan ho gaya to kucha khas bat nahi hai hai. Jaha tak bachho ka sawal hai aaj Tv. Cable, Dish , Cd audio-video aur in sabka bap INTERNATE-CHATTING ke jariye sab sikha aur dekha lete hai.App apne bachho par kitna watch rakh sakte hai. Jab tak voh ghar par ho. Mahoday Bahar kya karenge? SMS, Extra Classes, Tutions aur bhee bahut kuch bahane mojud hai inke pass.

    देवनागिरी में रूपांतर : काकेश

    ” क़्या सैक्स ही बिकता है” : जी हाँ महोदय, आज कल सेक्स के सहारे ही एक प्रॉडक्ट बेचा जा सकता है. अगर ऎड में कुछ ख़ास नही हो तो किसी को उसको देख़ने में कोई दिलचस्पी नही रहेगी, जब कोई ऎड ही नही देखेगा तो प्रॉडक्ट कैसे बिकेगा. एड एक ज़रिया है एक उत्पाद को बेचने का. परिवर्तन संसार का नियम है. जैसा की उपरोक्त कॉमेंट में कहा पुराने ज़माने में निरोध के ऎड, में ऎसा कूछ नही होता था, परन्तु उसे देखने में शर्म महसूस होती थी… तो आज के इस कलियुग में थोड़ा परिवर्तन हो गया तो कुछ ख़ास बात नही है. जहां तक बच्चो का सवाल है आज टीवी, केबल, डिश , सीडी ऑडियो-वीडियो और इन सबका बाप – इंटरनैट-चैटिंग के ज़रिए सब सीख और देख लेते है.आप अपने बच्चो पर कितना वॉच रख सकते है. जब तक वो घर पर हो. महोदय बाहर क्या करेंगे? एस एम एस एक्सट्रा क्लासेज, टूयूसंस और भी बहुत कुछ बहाने मोजूद हैं इनके पास.

  14. लाखों उत्पाद बाजार हैं में, हजार से ज्यादा तो शायद विज्ञापन ही होंगे सिर्फ टी.वी. पर. इस भीड में सेक्स का सहारा लिये बिना उपभोक्ता को आकर्षित करना बडा मुश्किल है भाई. और इस तरह के विज्ञापनों को तो शायद ही कोई होगा जो ‘नोटिस’ नहीं करता.

  15. Aajkal kewal sex hi bikta hai, Ashlilta ki sabhi seemayen langhi ja chuki hai. puri tarah se pashchatya sanskriti ko yah samaj apna chuka hai vigyapano mai to had par ki ja chuki hai, Ek sadharan se peya ko AAMSUTRA kahate hai us ka pura vigyapan hi dwiarthi hai.Isi tarah dharavahikon mai bhi ashlilta parosi ja rahi hai. Sabhi shows mai MALAIKA ARORA ne to sare vastra hi utar diye hai unke is tarah aane par rok lagani chahiye.

  16. काका हाथरसी की पंक्ति याद आ रही है

    अगर कपड़े उतारना ही फैशन है तो हम अभागे हैं,
    जानवर हमसे बहुत आगे हैं….।

    विग्यापन बनाने वाले संभवतः किसी सेक्स कुंठा से शिकार हो सकते हैं, यह निष्कर्ष इसलिये निकला कि टाईल्स के विग्यापन में नारी देह का क्या काम? पुरुषों के अंर्तवस्त्रों में भी नारी देह, यहां तक कि पुरुषों के डियोडरेंट बेचने के लिये भी नारी देह का सहारा, तम्बाकू, सिगरेट, सोडा वाटर के एड में भी नारी देह……………पता नहीं क्यों?

  17. काकेश जी,
    कम्पनियाँ ऐसे विज्ञापन क्यों न बनायें , अब देखिये आपने इन विज्ञापनों का कितना गहन विश्लेषण किया है.
    अवश्य ही आपने इन्हे बड़े ध्यान से एक नही कई बार देखा होगा.
    क्या आप च्यवनप्राश और बर्तन धोने के विज्ञापनों को इतने गौर से देखते हैं?

  18. नैतिकता का पाठ तो घर से सिखाना होगा, कहा जाता है कि बच्‍चे की प्राथमिक पाठशाला घर होती है, घर से ही बच्‍चों को नैतिकता का पाठ सिखाना होगा

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