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	<title>Comments on: समूहबद्धता और जातिवाद&#8230;</title>
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	<description>Kakesh's KudKud</description>
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		<title>By: अरुण</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/groupism-and-castism/comment-page-1/#comment-561</link>
		<dc:creator>अरुण</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 26 Jun 2007 12:54:00 +0000</pubDate>
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		<description>काकेश जी हर जगह आदमी समूहो को बनाने और &lt;br/&gt;अपने समूह वाले को ढ्ढने मे लगा है.हर जगह आपको दिख जायेगा,पहले देश ,फ़िर प्रांत,फ़िर शहर फ़िर धर्म और जाती,उपजाती,गोत्र ढ्ढने मे लगा रहने वाला ये जंतु इनसान है.कहा नही है ये देखिये,आप दंग रह जायेगे.बाकी काफ़ी कुछ आलोक जी ने कह ही दिया है .&lt;br/&gt;रही आपकी टिप्पणि की बात लोग ऐसे मामलो पर बोलने से डरते है इसीलिये मै कल मस्ती लेकर आपको बादाम खाने की राय देकर निकल लिया था</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>काकेश जी हर जगह आदमी समूहो को बनाने और <br />अपने समूह वाले को ढ्ढने मे लगा है.हर जगह आपको दिख जायेगा,पहले देश ,फ़िर प्रांत,फ़िर शहर फ़िर धर्म और जाती,उपजाती,गोत्र ढ्ढने मे लगा रहने वाला ये जंतु इनसान है.कहा नही है ये देखिये,आप दंग रह जायेगे.बाकी काफ़ी कुछ आलोक जी ने कह ही दिया है .<br />रही आपकी टिप्पणि की बात लोग ऐसे मामलो पर बोलने से डरते है इसीलिये मै कल मस्ती लेकर आपको बादाम खाने की राय देकर निकल लिया था</p>
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		<title>By: ALOK PURANIK</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/groupism-and-castism/comment-page-1/#comment-560</link>
		<dc:creator>ALOK PURANIK</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 26 Jun 2007 10:38:00 +0000</pubDate>
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		<description>बिलकुल ठीक मेरी बात को किसी के विरोध के रुप में देखा जाये,&lt;br/&gt;मैं तो इस पूरी बात में अपनी बात  रखने की कोशिश की है</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बिलकुल ठीक मेरी बात को किसी के विरोध के रुप में देखा जाये,<br />मैं तो इस पूरी बात में अपनी बात  रखने की कोशिश की है</p>
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		<title>By: ALOK PURANIK</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/groupism-and-castism/comment-page-1/#comment-559</link>
		<dc:creator>ALOK PURANIK</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 26 Jun 2007 10:26:00 +0000</pubDate>
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		<description>अतुलजी&lt;br/&gt;पहले तो आपके आरोप का खंडन करता हूं कि पहुंचा हुआ चिंतक हूं। &lt;br/&gt;दूसरी बात यह सरजी कि इंदौर में अगर बंगाली एक साथ एक कालोनी में रह रहे हैं, तो इसके पीछे एक डर है पहचान विलीन होने का। एक किस्म की सांस्कृतिक वाट हर किस्म के अल्पसंख्यक चाहे वह भाषाई हो, की लगी होती है। यह वाट उन्हे इंदौर में जोड रही है। पर बंगाल में भी वे अपनी पहचान को लेकर उतना नहीं डरते होंगे। दिल्ली में कई महाऱाष्ट्रीयन सभाएं अपनी भाषा को लेकर, अपनी पहचान को लेकर चिंतित रहती हैं, क्योंकि उन्हे यहां की पंजाबी बहुलता से खतरा लगता है। पर ये महाराष्ट्रीयन परस्पर गोष्ठी में कुछ इस तरह की बातें करते हैं-हम ऊंचें क्योंकि हम पुणे वाले हैं, और वो नीचे क्योंकि वो कानपुर वाले हैं। किसी न किसी किस्म का डर उन्हे जोड़ रहा है। पर एक्सलूसिवपने की चाह अपनी जगह कायम है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अतुलजी<br />पहले तो आपके आरोप का खंडन करता हूं कि पहुंचा हुआ चिंतक हूं। <br />दूसरी बात यह सरजी कि इंदौर में अगर बंगाली एक साथ एक कालोनी में रह रहे हैं, तो इसके पीछे एक डर है पहचान विलीन होने का। एक किस्म की सांस्कृतिक वाट हर किस्म के अल्पसंख्यक चाहे वह भाषाई हो, की लगी होती है। यह वाट उन्हे इंदौर में जोड रही है। पर बंगाल में भी वे अपनी पहचान को लेकर उतना नहीं डरते होंगे। दिल्ली में कई महाऱाष्ट्रीयन सभाएं अपनी भाषा को लेकर, अपनी पहचान को लेकर चिंतित रहती हैं, क्योंकि उन्हे यहां की पंजाबी बहुलता से खतरा लगता है। पर ये महाराष्ट्रीयन परस्पर गोष्ठी में कुछ इस तरह की बातें करते हैं-हम ऊंचें क्योंकि हम पुणे वाले हैं, और वो नीचे क्योंकि वो कानपुर वाले हैं। किसी न किसी किस्म का डर उन्हे जोड़ रहा है। पर एक्सलूसिवपने की चाह अपनी जगह कायम है।</p>
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		<title>By: काकेश</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/groupism-and-castism/comment-page-1/#comment-558</link>
		<dc:creator>काकेश</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 26 Jun 2007 10:25:00 +0000</pubDate>
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		<description>ये बात समझ में नही आयी कि इस पोस्ट पर हिट तो बहुत हुई पर टिप्पणी बहुत कम आयी..&lt;br/&gt;&lt;br/&gt;अतुल जी आप सही समझे मैं वह ही कहना चाहता था/हूँ जो आपने मतलब निकाला...लेकिन जो आलोक जी ने कहा वो भी किन्ही और अर्थों में एकदम सही है.. जैसा संजय भाई ने कहा कि आलोक जी की टिप्पणी को इस लेख के उपसंहार के रूप में देखना चाहिये ..ना कि विरोध या समर्थन के रूप में..</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>ये बात समझ में नही आयी कि इस पोस्ट पर हिट तो बहुत हुई पर टिप्पणी बहुत कम आयी..</p>
<p>अतुल जी आप सही समझे मैं वह ही कहना चाहता था/हूँ जो आपने मतलब निकाला&#8230;लेकिन जो आलोक जी ने कहा वो भी किन्ही और अर्थों में एकदम सही है.. जैसा संजय भाई ने कहा कि आलोक जी की टिप्पणी को इस लेख के उपसंहार के रूप में देखना चाहिये ..ना कि विरोध या समर्थन के रूप में..</p>
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		<title>By: अतुल शर्मा</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/groupism-and-castism/comment-page-1/#comment-557</link>
		<dc:creator>अतुल शर्मा</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 26 Jun 2007 10:16:00 +0000</pubDate>
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		<description>आलोकजी आप पहुँचे हुए चिंतक-लेखक हैं इसलिए आप निश्चित सही लिख रहे होंगे। काकेशजी जो कहना चाहते हैं उसे मैं अपनी अक्ल से ये समझा हूँ कि समूहवाद मनुष्य का एक गुण है और इसे केवल गुजरात से ही जोड़ कर नहीं देखा जा सकता। मेरे इन्दौर शहर में भी बंगाली कॉलोनी है, किसी इलाके में केवल बिहारी लोग ही रहते हैं, दक्षिण भारतीयों ने एक विशेष क्षेत्र चुन रखा है वे बहुसंख्य वहीं रहते हैं। महाराष्ट्रियन लोगों की भी कॉलोनियाँ हैं। ये सभी लोग किसी धार्मिक संगठन के बहकावे में एक जगह नहीं रहते। ये केरली, बंगाली, महाराष्ट्रियन, गुजराती एक दूसरे के भय से एक साथ नहीं रहते। एक भाषा संस्कृति के लोग साथ रहना चाहते हैं।    &lt;br/&gt;साथ रहना और विवाह करना दो अलग बातें हैं। बीसा दस्सा आपस में विवाह न करें पर साथ तो रहते ही हैं।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आलोकजी आप पहुँचे हुए चिंतक-लेखक हैं इसलिए आप निश्चित सही लिख रहे होंगे। काकेशजी जो कहना चाहते हैं उसे मैं अपनी अक्ल से ये समझा हूँ कि समूहवाद मनुष्य का एक गुण है और इसे केवल गुजरात से ही जोड़ कर नहीं देखा जा सकता। मेरे इन्दौर शहर में भी बंगाली कॉलोनी है, किसी इलाके में केवल बिहारी लोग ही रहते हैं, दक्षिण भारतीयों ने एक विशेष क्षेत्र चुन रखा है वे बहुसंख्य वहीं रहते हैं। महाराष्ट्रियन लोगों की भी कॉलोनियाँ हैं। ये सभी लोग किसी धार्मिक संगठन के बहकावे में एक जगह नहीं रहते। ये केरली, बंगाली, महाराष्ट्रियन, गुजराती एक दूसरे के भय से एक साथ नहीं रहते। एक भाषा संस्कृति के लोग साथ रहना चाहते हैं।    <br />साथ रहना और विवाह करना दो अलग बातें हैं। बीसा दस्सा आपस में विवाह न करें पर साथ तो रहते ही हैं।</p>
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		<title>By: संजय बेंगाणी</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/groupism-and-castism/comment-page-1/#comment-556</link>
		<dc:creator>संजय बेंगाणी</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 26 Jun 2007 10:04:00 +0000</pubDate>
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		<description>अच्छे लेख का आलोकजी ने अच्छा उपसंहार दिया की जब तक कि पूरी दुनिया ही पहुंचे हुए फकीरों की श्रेणी में न आ जाये, यह सब गुल-गपाड़ा चलेगा। &lt;br/&gt;&lt;br/&gt;खरी बात.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अच्छे लेख का आलोकजी ने अच्छा उपसंहार दिया की जब तक कि पूरी दुनिया ही पहुंचे हुए फकीरों की श्रेणी में न आ जाये, यह सब गुल-गपाड़ा चलेगा। </p>
<p>खरी बात.</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: ALOK PURANIK</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/groupism-and-castism/comment-page-1/#comment-555</link>
		<dc:creator>ALOK PURANIK</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 26 Jun 2007 09:29:00 +0000</pubDate>
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		<description>मित्र, मामला बहुत सीधा नहीं है। मनुष्य जितना जटिल दिखता है, उससे कहीं ज्यादा जटिल वह है। जोड़ने और तोड़ने के काम एक साथ चलते हैं। आदमी जुड़ता है, जब उसकी वाट लगती है। उसे डर लगता है। उसका वजूद खतरे में होता है। डरों हुए को जोड़ना बहुत आसान होता है। इसलिए सारे सांप्रदायिक संगठन पहले डराते हैं। अकेलापन, एकदम बेनाम होकर विलीन होने का डर, बड़ा डर होता है। बहुत बढ़िया इंसान बहुत घटिया टाइप के संगठनों के सदस्य होते हैं। एक  फर्जी किस्म का सहारा सा हो जाता है, कि हमारे साथ ये या वो है। पर मामला सिर्फ इतना नहीं है। पर जुड़कर भी बंदा अपना एक्सक्लूसिव वजूद चाहता है। जब वाट लगी होने की सिचुएशन खत्म हो जाये। डर कम हो जायें, तो फिर मारकाट। जाति आधारित संगठन एक दूसरे के खिलाफ विषवमन करके ताकत पाते हैं। पर अंदरुनी मारकाट कहीं कम नहीं होती। बीसा रेटिंग के बनिया दस्सा रेटिंग के बनिये से विवाह संबंध कायम करने में संकोच ही नहीं, घृणा का इजहार करते हैं। गंगा पार का ब्राह्णण इस पार के ब्राह्णण को चिरकुट मानता है। और सिर्फ ऐसा नहीं कि ये कैटगराइजेशन सवर्णों में ही है। प्रेस करके आजीविका अर्जित करने वाले धोबी बंधु गधे रखने वाले धोबियों के प्रति बहुत सकारात्मक भाव नहीं रखते।&lt;br/&gt;मनुष्य एक साथ साथ भी रहना चाहता है। &lt;br/&gt;पर एक्सक्लूसिवपने का भाव भी चाहता है कि हमसा कोई ना हो, हम पर टाप पर हों। झगड़े इसलिए कभी नहीं रुकेंगे, और समूह बद्धता की डिमांड भी बराबर रहेगी।&lt;br/&gt;यही वजह है कि झगड़े हिंदू मुसलमान में ही नहीं होते। हिंदुओं में भी आपसे में भरपूर हो रहे है। पर डरजनित एकता कुछ समय के लिए की जा सकती है।  &lt;br/&gt;जब तक कि पूरी दुनिया ही पहुंचे हुए फकीरों की श्रेणी में न आ जाये, यह सब गुल-गपाड़ा चलेगा। &lt;br/&gt;आलोक पुराणिक</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मित्र, मामला बहुत सीधा नहीं है। मनुष्य जितना जटिल दिखता है, उससे कहीं ज्यादा जटिल वह है। जोड़ने और तोड़ने के काम एक साथ चलते हैं। आदमी जुड़ता है, जब उसकी वाट लगती है। उसे डर लगता है। उसका वजूद खतरे में होता है। डरों हुए को जोड़ना बहुत आसान होता है। इसलिए सारे सांप्रदायिक संगठन पहले डराते हैं। अकेलापन, एकदम बेनाम होकर विलीन होने का डर, बड़ा डर होता है। बहुत बढ़िया इंसान बहुत घटिया टाइप के संगठनों के सदस्य होते हैं। एक  फर्जी किस्म का सहारा सा हो जाता है, कि हमारे साथ ये या वो है। पर मामला सिर्फ इतना नहीं है। पर जुड़कर भी बंदा अपना एक्सक्लूसिव वजूद चाहता है। जब वाट लगी होने की सिचुएशन खत्म हो जाये। डर कम हो जायें, तो फिर मारकाट। जाति आधारित संगठन एक दूसरे के खिलाफ विषवमन करके ताकत पाते हैं। पर अंदरुनी मारकाट कहीं कम नहीं होती। बीसा रेटिंग के बनिया दस्सा रेटिंग के बनिये से विवाह संबंध कायम करने में संकोच ही नहीं, घृणा का इजहार करते हैं। गंगा पार का ब्राह्णण इस पार के ब्राह्णण को चिरकुट मानता है। और सिर्फ ऐसा नहीं कि ये कैटगराइजेशन सवर्णों में ही है। प्रेस करके आजीविका अर्जित करने वाले धोबी बंधु गधे रखने वाले धोबियों के प्रति बहुत सकारात्मक भाव नहीं रखते।<br />मनुष्य एक साथ साथ भी रहना चाहता है। <br />पर एक्सक्लूसिवपने का भाव भी चाहता है कि हमसा कोई ना हो, हम पर टाप पर हों। झगड़े इसलिए कभी नहीं रुकेंगे, और समूह बद्धता की डिमांड भी बराबर रहेगी।<br />यही वजह है कि झगड़े हिंदू मुसलमान में ही नहीं होते। हिंदुओं में भी आपसे में भरपूर हो रहे है। पर डरजनित एकता कुछ समय के लिए की जा सकती है।  <br />जब तक कि पूरी दुनिया ही पहुंचे हुए फकीरों की श्रेणी में न आ जाये, यह सब गुल-गपाड़ा चलेगा। <br />आलोक पुराणिक</p>
]]></content:encoded>
	</item>
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		<title>By: अतुल शर्मा</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/groupism-and-castism/comment-page-1/#comment-554</link>
		<dc:creator>अतुल शर्मा</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 26 Jun 2007 06:19:00 +0000</pubDate>
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		<description>मैं आपके पिछले लेख से सहमत हूँ, परंतु वहाँ पर विरोध के स्वर ‍देख कर बिना टिप्पणी दिए लौट गया था।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मैं आपके पिछले लेख से सहमत हूँ, परंतु वहाँ पर विरोध के स्वर ‍देख कर बिना टिप्पणी दिए लौट गया था।</p>
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	<item>
		<title>By: अतुल शर्मा</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/groupism-and-castism/comment-page-1/#comment-553</link>
		<dc:creator>अतुल शर्मा</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 26 Jun 2007 06:17:00 +0000</pubDate>
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		<description>उत्कृष्ट! बहुत ही खुली और व्यापक सोच है आपकी। आप समूह बनने की क्रिया को मोहल्ले से वैश्विक स्तर तक ले गए। बहुत ही अच्छे तरीके से समझाया है। एक गड़बड़ हो गई आपने इसे जनरलाइज़ कर दिया, व्यापक बना दिया। अब यह समूहगतता गुजरात और अहमदाबाद की ही नहीं रही। आप लोगों की बातें समझ नहीं रहे हैं। आप बड़े ही चिकने घड़े हैं, औंधे घड़े हैं। जब आपको बताया जा रहा है कि गुजरात और अहमदाबाद में होता है तो आप काहे अपना मोहल्ला, शहर, होस्टल, बंगाल, लंदन याद कर रहे हैं। आप के बीन बजाने से कुछ होगा क्या?</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>उत्कृष्ट! बहुत ही खुली और व्यापक सोच है आपकी। आप समूह बनने की क्रिया को मोहल्ले से वैश्विक स्तर तक ले गए। बहुत ही अच्छे तरीके से समझाया है। एक गड़बड़ हो गई आपने इसे जनरलाइज़ कर दिया, व्यापक बना दिया। अब यह समूहगतता गुजरात और अहमदाबाद की ही नहीं रही। आप लोगों की बातें समझ नहीं रहे हैं। आप बड़े ही चिकने घड़े हैं, औंधे घड़े हैं। जब आपको बताया जा रहा है कि गुजरात और अहमदाबाद में होता है तो आप काहे अपना मोहल्ला, शहर, होस्टल, बंगाल, लंदन याद कर रहे हैं। आप के बीन बजाने से कुछ होगा क्या?</p>
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