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	<title>Comments on: क्या चिट्ठाकार बढ़ने से फायदा हुआ है?</title>
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		<title>By: रवीन्द्र रंजन</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/hindi-chitthakari/comment-page-1/#comment-728</link>
		<dc:creator>रवीन्द्र रंजन</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 02 Oct 2007 09:30:50 +0000</pubDate>
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		<description>फायदा तो हुआ है, इसमें कोई दो राय नहीं होनी चाहियें। इस फायदे को लोग अलग-अलग तरह से ले सकते हैं। जैसे यह लिखने के लिये एक बेहतर प्लेटफार्म है। आपका लिखा फौरन लाखों लोगों तक पहुंच जाता है। जहां तक गुट का संबंध है तो जब कोई ब्लाग आपको अच्छा लगता है तो आप नियमित उस पर जाना शुरू कर देते हैं। टिप्पणी भी करते हैं। इसे गुटबाजी की तरह नहीं लेना चाहिये, बल्कि कोशिश तो यह होनी चाहिये कि ये गुट निरंतर बड़े होते रहें ताकि उनका लिखा ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंच सके। कई लोगों के पास इतना समय नहीं होता कि वो नियमित अखबार या पत्रिका के लिये लिख सकें। वहां स्वीकृति-अस्विकृति का भी पंगा होता है। लिहाजा कई बार नये लेखक हतोत्साहित भी हो जाते हैं। यहां ऐसा नहीं है। लोग लगातार लिखने के लिये प्रेरित होते हैं। यही इसकी सबसे बड़ी खूबसूरती है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>फायदा तो हुआ है, इसमें कोई दो राय नहीं होनी चाहियें। इस फायदे को लोग अलग-अलग तरह से ले सकते हैं। जैसे यह लिखने के लिये एक बेहतर प्लेटफार्म है। आपका लिखा फौरन लाखों लोगों तक पहुंच जाता है। जहां तक गुट का संबंध है तो जब कोई ब्लाग आपको अच्छा लगता है तो आप नियमित उस पर जाना शुरू कर देते हैं। टिप्पणी भी करते हैं। इसे गुटबाजी की तरह नहीं लेना चाहिये, बल्कि कोशिश तो यह होनी चाहिये कि ये गुट निरंतर बड़े होते रहें ताकि उनका लिखा ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंच सके। कई लोगों के पास इतना समय नहीं होता कि वो नियमित अखबार या पत्रिका के लिये लिख सकें। वहां स्वीकृति-अस्विकृति का भी पंगा होता है। लिहाजा कई बार नये लेखक हतोत्साहित भी हो जाते हैं। यहां ऐसा नहीं है। लोग लगातार लिखने के लिये प्रेरित होते हैं। यही इसकी सबसे बड़ी खूबसूरती है।</p>
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