हुल्लड़ जी की रचना:शिव कुमार जी द्वारा.

मेरी पिछ्ली पोस्ट पर शिव कुमार जी ने एक बेहतरीन हास्य रचना टिपियायी.कहीं वो छुप ना जाये इसलिये उसे पोस्ट में भी डाल रहा हूँ.लेकिन पहले एक बोनस रचना.ये भी शायद हुल्लड़ जी की ही है.

सुबह सबेरे ही देखा था,
लेकिन सपना भंग हो गया
प्रेम पत्र पर टिकट लगाया,
फिर भी वह बैरंग हो गया.
जिसको लिखना चाह रहे थे,
वो ही ग़ज़ल नही लिख पाए.
कभी शेर मे कमी रह गयी,
कभी काफ़िया तंग हो गया.

अब हुल्लड़ मुरादाबादी की ये कविता पढ़िये….

क्या बताये आपसे हम हाथ मलते रह गए
गीत सूखे पर लिखे थे, बाढ़ में सब बह गए

भूख, महगाई, गरीबी इश्क मुझसे कर रहीं थीं
एक होती तो निभाता, तीनो मुझपर मर रही थीं
मच्छर, खटमल और चूहे घर मेरे मेहमान थे
मैं भी भूखा और भूखे ये मेरे भगवान् थे
रात को कुछ चोर आए, सोचकर चकरा गए
हर तरफ़ चूहे ही चूहे, देखकर घबरा गए
कुछ नहीं जब मिल सका तो भाव में बहने लगे
और चूहों की तरह ही दुम दबा भगने लगे
हमने तब लाईट जलाई, डायरी ले पिल पड़े
चार कविता, पाँच मुक्तक, गीत दस हमने पढे
चोर क्या करते बेचारे उनको भी सुनने पड़े

रो रहे थे चोर सारे, भाव में बहने लगे
एक सौ का नोट देकर इस तरह कहने लगे
कवि है तू करुण-रस का, हम जो पहले जान जाते
सच बतायें दुम दबाकर दूर से ही भाग जाते
अतिथि को कविता सुनाना, ये भयंकर पाप है
हम तो केवल चोर हैं, तू डाकुओं का बाप है

6 comments to हुल्लड़ जी की रचना:शिव कुमार जी द्वारा.

  • यह अच्छा कार्य किया. :)

  • शिव कुमार मिश्र से बच कर रहना. अपनी पोस्ट लिखने में बेहद आलसी हैं पर दूसरे की पोस्ट पर टिप्पणी में पूरी पोस्ट छाप कुछ ठेलने में सिद्धहस्त!

    मेरी कई पोस्टें हाइजैक कर ली हैं उन्होने इस तरह. :-)

    कोई तरीका हो कि यह टिप्पणी औरों को दिखे पर उन्हें नहीं – अगर हो तो वह तरकीब लगाइयेगा!

  • काकेश जी,

    ज्ञान भैया की ये टिप्पणी आपके लिए ‘वार्निंग’ टाईप है…मुझे बेकल उत्साही जी की एक गजल याद आ गयी…

    जो मेरा है, वो तेरा भी अफसाना हुआ तो
    समझे थे जिसे अपना, वो बेगाना हुआ तो

    लेकिन इसी गजल का अगला शेर है…ये मेरी ‘वार्निंग’ टाईप लगेगी…

    तुम क़त्ल से बचने का जतन ख़ूब करो हो
    कातिल का अगर लहजा शरीफना हुआ तो

    चलिए, जब यहाँ तक पहुँच गए हैं तो कुछ और सही….

    काबे की जियालत का सफर करने चले हो
    रस्ते में अगर कोई सनमखाना हुआ तो

    उसको भी बिठा देते हो, फरजानों की सह में
    गुस्ताख अगर बज़्म में दीवाना हुआ तो

    कमजर्फ को न इतनी मोहब्बत से पिलाओ
    लबरेज अगर वक्त का पैमाना हुआ तो

  • शिवबाबू की टिप्पणी पढ़कर लगा कि ज्ञानदत्तजी की चेतावनी सही थी।

  • लिजिए एक पोस्ट में दो पोस्ट पिला दीं ये तो गलत बात है न जी पहले वार्न करना था…:)

  • Vipin Pandey

    AAJ KAL CHUHE HI MAJE KARTE KAL

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