किबला के जेल जाने से मानवीय संवेदनाऎं किबला के पक्ष में हैं. ज्ञान जी ने भी कहा कि अब किबला का दुख देखा नहीं जाता. लेकिन किबला इसे दुख माने तब ना.किबला तो जेल में मस्त हैं. दो साल की सजा हुई है. सब सोच रहे हैं कि अब शायद किबला बदल जायेंगे. हो सकता है अब उनके व्यवहार में परिवर्तन हो जये.शायद अब वह लोगों से तमीज से बात करने लगेगें. पाठकों भी यही आस है. देखिये किबला लौटे तो क्या करते हैं. क्या होता है उनकी दुकान का. कैसे पेश आता है बगल वाला दुकानदार. तो आप भी आनन्द लीजिये टार्जन की वापसी का.

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टार्जन की वापसी

दो साल तक दुकान में ताला पड़ा रहा। लोगों का विचार था कि जेल से छूटने के बाद छुपते-छुपाते कहीं और चले जायेंगे। क़िबला जेल से छूटे, जरा जो बदले हों। उनकी रीढ़ की हड्डी में जोड़ नहीं थे। जापानी भाषा में कहावत है कि बन्दर पेड़ से ज़मीन पर गिर पड़े, फ़िर भी बन्दर ही रहता है, सो वह भी टार्जन की तरह।। Auuaauuu चिंघाड़ते जेल से निकले। सीधे अपने ख़ानदानी कब्रिस्तान गये। पिता की कब्र की पायंती की मिट्टी सर पर डाली। फातिहा (दुआ) पढ़ी और कुछ सोच कर मुस्कुरा दिये। दूसरे दिन दुकान खोली, केबिन के बाहर एक बल्ली गाड़ कर उस पर एक लकड़ी की टांग बढ़ई से बनवा कर लटका दी। सुब्ह शाम उसको रस्सी से खींच कर इस तरह चढ़ाते और उतारते थे, जिस तरह उस ज़माने में छावनियों में यूनियन जैक चढ़ाया उतारा जाता था। जिन्होंने दो साल से पैसा दबा रखा था उन्हें धमकी-भरे ख़त लिखे और अपने हस्ताक्षर के बाद ब्रेकेट में सजायाफ्ता (सजा पाया हुआ) लिखा। जेल जाने से पहले पत्रों में खुद को बड़े गर्व से “नंगे-असलाफ़” (पूर्वजों के अपमान का कारण) लिखा करते थे। किसी की मजाल न थी कि इससे असहमत हो। असहमत होना तो दूर की बात है, मारे डर के सहमत भी नहीं हो सकता था। अब अपने नाम के साथ “सजा-याफ्ता” इस प्रकार लिखने लगे जैसे लोग डिग्रियाँ या सम्मानसूचक शब्द लिखते हैं। कानून और जेल की झिझक निकल चुकी थी।

क़िबला जैसे गये थे, वैसे ही जेल काट कर वापस आ गये। तनतने और आवाज़ के कड़ाके में जरा अंतर न आया। इस बीच अगर ज़माना बदल गया तो उसमें उनका कोई दोष न था। उनका कहा हुआ विश्वसनीय तो पहले ही था अब अंतिम सत्य भी हो गया। काले मखमल की रामपुरी टोपी और अधिक तिरछी हो गयी, यानी इतनी झुका कर टेढ़ी ओढ़ने लगे कि दायीं आंख ठीक से नहीं खोल सकते थे। बीबी कभी घबरा के कहतीं ‘अब क्या होयेगा?’ तो वह ‘देखते हैं’ की जगह ‘देख लेंगे’ और ‘देखती जाओ’ कहने लगे। रिहाई के दिन नज़दीक आये थे तो दाढ़ी के बाल भी गुच्छेदार मूंछों में मिला लिये थे। जो अब इतनी घनी हो गयी थीं कि एक हाथ से पकड़ कर उन्हें उठाते, तब कहीं दूसरे हाथ से मुंह में खाने का कौर रख पाते थे। जेल उनका कुछ बिगाड़ न सकी। कहते थे यहीं तीसरी बैरक में एक मुंशी फ़ाजिल (B.A. पास) जालिया है, फ़साहत खान। ग़बन और धोखाधड़ी में तीन साल की कैद काट रहा है, बामुशक्कत। पहले ‘शोला’ अब `हज़ीं´ उपनाम रखा है। चक्की पीसते समय अपनी ही ताज़ा ग़ज़ल गाता रहता है। मोटा पीसता है और पिटता है अब यह कोई शायरी तो है नहीं। तिस पर खुद को ग़ालिब से कम नहीं समझता। हालांकि एक जैसी बात सिर्फ इतनी है कि दोनों ने जेल की हवा खायी।

खुद को रुहेला बताता है। होगा, लगता नहीं। कैदियों से भी मुंह छुपाये फिरता है। अपने बेटे से कह रखा है कि मेरे बारे में कोई पूछे तो कह देना कि अब्बा कुछ दिनों के लिये बाहर गये हैं। जेल को कभी जेल नहीं कहता, ज़िंदा कहता है। (जेल के लिये फारसी शब्द ) अरे साहब! ग़नीमत है कि जेलर को अज़ीज़े-मिश्र (मिश्र का बादशाह ) नहीं कहता। उसे तो चक्की को आसिया (चक्की के लिये अरबी शब्द) कहने में भी हिचक न होती मगर मैं जानूं पाट की अरबी मालूम नहीं। अरे साहब! मैं यहां किसी की जेब काट के थोड़े ही आया हूं। शेर को पिंजरे में क़ैद कर दो तब भी शेर ही रहता है। गीदड़ को कछार में आज़ाद छोड़ दो, और ज़ियादा गीदड़ हो जायेगा। अब हम ऐसे भी गये गुजरे नहीं कि जेल का घुटन्ना (घुटनों तक की निकर) पहनते ही स्वभाव बदल जाये। बल्कि हमें तो क़िबला की बातों से ऐसा लगता था कि फटा हुआ कपड़ा पहनने और जेल जाने को सुन्नते-यूसुफी समझते हैं उनके स्वभाव में जो टेढ़ थी वह कुछ और बढ़ गयी। कव्वे पर कितनी तकलीफें गुज़र जायें, कितना ही बूढ़ा हो जाये, उसके पर काले ही रहते हैं। खुर्रे, खुर्रे , खुरदरे, खरे या खोटे, वह जैसे कुछ भी थे, उनका बाहर और अंतर्मन एक था।

तन उजरा मन गादला, बगुला जैसा भेक

ऐसे से कागा भले, बाहर भीतर एक

कहते थे खुदा की करम है मैं मुनाफ़िक (पाखंडी) नहीं। मैंने गुनाह को हमेशा गुनाह समझकर किया।

दुकान दो साल से बंद पड़ी थी। छूट कर घर आये तो बीबी ने पूछा:

“अब क्या होयेगा?”

“बीबी, जरा तुम देखती जाओ”।

जारी………………

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पिछले अंक : 1. खोया पानी-1:क़िबला का परिचय 2. ख़ोया पानी 2: चारपाई का चकल्लस 3. खोया पानी-3:कनमैलिये की पिटाई 4. कांसे की लुटिया,बाली उमरिया और चुग्गी दाढ़ी़ 5. हवेली की पीड़ा कराची में 6. हवेली की हवाबाजी 7. वो तिरा कोठे पे नंगे पांव आना याद है 8. इम्पोर्टेड बुज़ुर्ग और यूनानी नाक 9. कटखने बिलाव के गले में घंटी 10. हूँ तो सज़ा का पात्र, पर इल्ज़ाम ग़लत है 11. अंतिम समय और जूं का ब्लड टैस्ट

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khoya_pani_front_coverकिताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

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  4 Responses to “टार्जन की वापसी”

  1. किबला ज़ेल काट आये। अप्रियतम स्थिति को भी स्थितप्रज्ञ की तरह निपट लिये। वे जैसे भी मजाकिया चरित्र हों – उनका यह गुण तो ग्राह्य है। हमारे जीवन में रोज अप्रिय स्थितियाँ आती हैं और उंसे निपटने में या तो क्रोध या अवसाद का सहारा लेते हैं हम।
    काश किबला की कबलियत आ पाये हम में।

  2. वाह! किबला से हर कड़ी मे कुछ सिखने मिलजाता है. अगर कही टार्जन भी किबला को मिल जाए तो उसका भी खुदा ही हाफिज़ होगा.

  3. जारी रखें. पढ़ कर मजा आ रहा है.

  4. तो किबला बाहर आ गए, चलिए देखते हैं अब क्या-क्या गुल खिलाते हैं!!

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