[ पिछ्ले अंको में में आपने किबला का मजेदार परिचय और उनकी लकड़ी की दुकान के बारे में पढ़ा. जिसमें आप उनके चरित्र के बहाने उस समय की स्थितियों से भी परिचित हुए. ज्ञान जी ने टिप्पणी करते हुए कहा “यह तो वास्तव में व्यंग का मुरब्बा है। आंवले को सिझा कर कोंच कोंच कर शीरा मिलाया जाता है; वैसे ही इसके हर वाक्य में/शब्द में सटायर मिलाया गया है।” सच इतना सहज हास्य है कि बस लगता है पढ़ते जायें. आप भी पढिये और आनन्द लें] ===========================================
कांसे की लुटिया , बाली उमरिया और चुग्गी दाढ़ी़:
क़िबला अपना माल बड़ी तवज्जो, मेहनत और मुहब्बत से दिखाते थे। मुहब्बत की बढ़ोत्तरी हमने इसलिये की कि वो ग्राहक को तो शेर की नज़र से देखते थे मगर अपनी लकड़ी पर मुहब्बत से हाथ फेरते रहते थे। कोई सागौन का तख़्ता ऐसा नहीं था, जिसके रेशों का जाल और रगों का तुग़रा, (अरबी लिपि में पेचीदा मगर सुन्दर लिखाई) अगर वो चाहें तो याददाश्त से काग़ज़ पर न बना सकते हों। लकड़मंडी में वो अकेले दुकानदार थे जो ग्राहक को अपनी और हर शहतीर-बल्ली की वंशावली याद करा देते थे। उनकी अपनी वंशावली बल्ली से भी ज़ियादा लम्बी थी। उस पर अपने परदादा को टांग रखा था। एक बल्ली की लम्बाई की तरफ़ इशारा करते हुए कहते, सवा उन्तालीस फुट लम्बी है। गोंडा की है। अफ़सोस, असग़र गोंडवी की शायरी ने गोंडा की बल्लियों की प्रसिद्धि का बेड़ा ग़र्क कर दिया। लाख कहो, अब किसी को यक़ीन नहीं आता कि गोंडा की प्रसिद्धि की अस्ल वज्ह खूबसूरत बिल्लयां थीं। असग़र गोंडवी से पहले ऐसी सीधी बेगांठ बल्ली मिलती थी कि चालीस फुट उंचे सिरे पर से छल्ला छोड़ दो तो बेरोक सीध नीचे झन्न से आ कर ठहरता था। एक बार हाजी मुहम्मद इसहाक चमड़े-वाले, शीशम खरीदने आये। क़िबला यूं तो हर लकड़ी की प्रशंसा में ज़मीन आसमान एक कर देते थे, लेकिन शीशम पर सचमुच फ़िदा थे। अक्सर फ़र्माते, तख़्ते-ताऊस में शाहजहां ने शीशम ही लगवायी थी। शीशम के गुणग्राहक और कद्रदान तो कब्र में जा सोये, मगर क्या बात है शीशम की। जितना इस्तेमाल करो, उतनी ही खूबियां निखरती हैं।शीशम की जिस चारपाई पर मैं पैदा हुआ, उसी पर दादा मियां ने जन्म लिया था और इस इत्तफाक को वो चारपाई और दादाजान दोनों के लिये मान और सम्मान का कारण समझते थे। हाजी मुहम्मद इसहाक बोले, ‘ये लकड़ी तो साफ़ मालूम नहीं होती।’ क़िबला न जाने कितने बरसों बाद मुस्कुराये। हाजी साहब की दाढ़ी को टकटकी बांध कर देखते हुए बोले, ‘यह बात हमने शीशम की लकड़ी, कांसे की लुटिया, बाली- उमरिया, और चुग्गी-दाढ़ी में ही देखी कि जितना हाथ फेरो उतनी ही चमकती है। बढ़िया क्वालिटी की शीशम की पहचान ये है कि आरा,रन्दा, बरमा सब खुंडे और हाथ पत्थर हो जायें। यह चीड़ थोड़े ही हैं कि एक ज़रा कील ठोको तो ‘अलिफ़’ (उर्दू वर्णमाला का पहला अक्षर) से लेकर ‘ये’ (अंतिम अक्षर) तक चिर जाये। पर एक बात है कि ताज़ा कटी हुई चीड़ से जंगल की महक का एक झरना पफूट पड़ता है। लगता है इसमें नहाया जा रहा हूं। जिस दिन कारख़ाने में चीड़ की कटाई होने वाली हो, उस दिन मैं इत्र लगा के नहीं आता’।
क़िबला का मूड बदला तो हाजी इसहाक की हिम्मत बंधी। कहने लगे, इसमें शक नहीं कि ये शीशम तो सबसे अच्छी मालूम होती है मगर सीज़ण्ड (Seasoned) नहीं लगती। क़िबला के तो आग ही लग गयी। कहने लगे, ‘सीज़ण्ड! कितना भूखा रहने के बाद सीखा है यह शब्द? सीज़ण्ड सामने वाली मस्ज़िद का, मय्यत को नहलाने वाला तख़्ता है। बड़ा पानी पिया है उसने! लाऊं? उसी पे लिटा दूंगा।’
यूं तो उनकी ज़िंदगी डेल कार्नेगी के हर सिद्धांत की शुरु से आखिर तक अत्यधिक कामयाब अवहेलना थी, लेकिन बिज़नेस में उन्होंने अपने हथकंडे अलग आविष्कार कर रखे थे। ग्राहक से जब तक यह न कहलवा लें कि लकड़ी पसंद है, उसकी क़ीमत नहीं बताते थे। वो पूछता भी तो साफ़ टाल जाते ‘आप भी कमाल करते हैं, आपको लकड़ी पसंद है, ले जाइये, घर की बात है।’ ग्राहक जब पूरी तरह लकड़ी पसंद कर लेता तो क़िबला क़ीमत बताये बग़ैर हाथ फैला कर बयाना तलब करते। सस्ता ज़माना था वो दुअन्नी या चवन्नी का बयाना पेश करता जो इस सौदे के लिये काफी होता। इशारे से दुत्कारते हुए कहते, चांदी दिखाओ। (यानी कम-से-कम एक कलदार रुपया निकालो।) वो बेचारा शर्मा-हुशूरी एक रुपया निकालता जो उस ज़माने में पंद्रह सेर गेहूं या सेर-भर अस्ली घी के बराबर होता तो, क़िबला रुपया लेकर अपनी हथेली पर इस तरह रखते कि उसे तसल्ली के लिये नज़र तो आता रहे, मगर झपट्टा न मार सके। हथेली को अपने ज़ियादा क़रीब भी न लाते, कहीं ऐसा न हो कि सौदा पटने से पहले ही ग्राहक बिदक जाये। कुछ देर बाद खुद-ब-खुद कहते ‘मुबारक हो! सौदा पक्का हो गया।’ फ़िर क़ीमत बताते, जिसे सुन कर वो हक्का-बक्का रह जाता। वो क़ीमत पर हुज्जत करता, तो कहते ‘अजीब घनचक्कर हो। बयाना दे के फ़िरते हो। अभी रुपया दे के सौदा पक्का किया है। अभी तो इसमें से तुम्हारे हाथ की गर्मी भी नहीं गई और अभी फ़िर गये। अच्छा कह दो कि यह रुपया तुम्हारा नहीं है। कहो! कहो! क़ीमत नाप तौल कर ऐसी बताते कि काइयां से काइयां ग्राहक भी दुविधा में पड़ जाये और यह फैसला न कर सके कि पेशगी डूबने में ज़ियादा नुकसान है या इस भाव लकड़ी खरीदने में।
हुज्जत के दौरान कितनी ही गर्मी बल्कि हाथापाई हो जाये वो अपनी हथेली को चित ही रखते। मुट्ठी कभी बंद नहीं करते थे ताकि ज़लील होते हुए ग्राहक को यह संतुष्टि रहे कि कम-से-कम बयाना तो सुरक्षित है। उनके बारे में एक क़िस्सा मशहूर था कि एक सरफ़िरे ग्राहक से झगड़ा हुआ तो धोबी-पाट का दांव लगा कर ज़मीन पर दे मारा और छाती पर चढ़ कर बैठ गये लेकिन इस पोज़ में भी अपनी हथेली जिस पर रुपया रखा था, चित ही रखी ताकि उसे ये बदगुमानी न हो कि रुपया हथियाना चाहते हैं।
लेकिन इसमें शक नहीं कि जैसी बेदाग़ और बढ़िया लकड़ी वो बेचते थे, वैसी उनके कहे-अनुसार, ‘बागे़- बहिश्त में शाखे-तूबा (जन्नत का एक खूश्बूदार पेड़) से भी प्राप्त न होगी। दाग़ी लकड़ी बंदे ने आज तक नहीं बेची। सौ साल बाद भी दीमक लग जाये तो पूरे दाम वापस कर दूंगा।’ बात दरअस्ल ये थी कि वो अपने उसूल के पक्के थे। मतलब यह कि तमाम उम्र ‘उंची-दुकान, सही-माल, ग़लत-दाम,’ पर सख़्ती से क़ायम रहे। सुना है कि दुनिया के सबसे बड़े फ़ैज़नेबल स्टोर हेरड्ज़ का दावा है कि हमारे यहां सूई से लेकर हाथी तक हर चीज़ मिलती है। कहने वाले कहते हैं कि क़ीमत भी दोनों की एक ही होती है। हेरड्ज़ अगर लकड़ी बेचता तो ख़ुदा की कसम ऐसी ही और इन ही दामों बेचता।
जारी………………
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पिछले अंक : 1. खोया पानी-1:क़िबला का परिचय 2. ख़ोया पानी 2: चारपाई का चकल्लस 3. खोया पानी-3:कनमैलिये की पिटाई
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किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857
पेज -350 (हार्डबाऊंड)
कीमत-200 रुपये मात्र
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यह किताब यहां नहीं मिली और इस महीने का पुस्तक बजट भी खतम!
अब क्या करें?
काकेश भाई पढना चाहूंगा. एक बार बार हुई थी फ़ोन पर.
अतुल
बहुत उम्दा. किताब पढ़ने की इच्छा बढ़ती ही जा रही है.
वाह! दुकानदारी का नया सबक आज किबला से सिखा. आगे के लिए ध्यान रहेगा. कृपया जारी रखें. और पहली पोस्ट मे जो गुजारिश की थी उसका ध्यान रखें.