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	<title>Comments on: आईये &#8216;मोहल्ला&#8217; बदल डालें&#8230;</title>
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	<description>Kakesh's KudKud</description>
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		<title>By: अथ श्वानगाथा: Dogma of Dogs &#171; मालव संदेश</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/mohalaa_badlo/comment-page-1/#comment-198</link>
		<dc:creator>अथ श्वानगाथा: Dogma of Dogs &#171; मालव संदेश</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 25 Apr 2007 06:56:22 +0000</pubDate>
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		<description>[...] है और यह सब &#8216;कौवों के राजा&#8217; अर्थात काकेश का किया धरा है। मोहल्ले का नाम ले लेकर [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] है और यह सब &#8216;कौवों के राजा&#8217; अर्थात काकेश का किया धरा है। मोहल्ले का नाम ले लेकर [...]</p>
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		<title>By: घुघुती जी के आदेश पर ... &#171; हम भी हैं लाइन में</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/mohalaa_badlo/comment-page-1/#comment-197</link>
		<dc:creator>घुघुती जी के आदेश पर ... &#171; हम भी हैं लाइन में</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 22 Apr 2007 13:20:15 +0000</pubDate>
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		<description>[...] कुछ घटनायें हो गयी .एक तो मुहल्ले में ‘कुत्तों का आतंक’ फैल गया और उस आतंक को दूर करने की [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] कुछ घटनायें हो गयी .एक तो मुहल्ले में ‘कुत्तों का आतंक’ फैल गया और उस आतंक को दूर करने की [...]</p>
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		<title>By: अतुल शर्मा</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/mohalaa_badlo/comment-page-1/#comment-196</link>
		<dc:creator>अतुल शर्मा</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 21 Apr 2007 10:09:22 +0000</pubDate>
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		<description>दो दिन नेट से दूर रहा और आज आपकी रचना पढ़ी। वाकई आपने बहुत उम्दा व्यंग लिखा है।
एक बात और इंजेक्शन मेरे लिए भी रख लेना, उधर मेरा नाम भी लिखा हुआ था एक बार।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>दो दिन नेट से दूर रहा और आज आपकी रचना पढ़ी। वाकई आपने बहुत उम्दा व्यंग लिखा है।<br />
एक बात और इंजेक्शन मेरे लिए भी रख लेना, उधर मेरा नाम भी लिखा हुआ था एक बार।</p>
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		<title>By: kakesh</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/mohalaa_badlo/comment-page-1/#comment-195</link>
		<dc:creator>kakesh</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 20 Apr 2007 18:11:21 +0000</pubDate>
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		<description>@अरुण जी : इंजेक्सन तो पहले ही लगा लिये थे जी.
@ अभय जी (ग़ुरुदेव) : तारीफ के लिये शुक्रिया.
@ सृजन जी : आपने तारीफ की तो लगा तर गये . अब तो पूरी आकाशगंगा पार कर ही लेंगे .
@ शशि जी : आप भी कहां टांग खीचने लगे भाई साहब . दोनों धुरंधरों का आशीर्वाद है तभी तो ये सब लिख पा रहे हैं...और समीर जी तो अब हमरे मित्र भी हो गये हैं.
@ नीरज जी , तरुण जी , पंकज जी , जगदीश जी , प्रमेन्द्र जी , मसिजीवी जी : आप सबका भी ढेरों धन्यवाद.
@ अविनाश भाई : आपका विशेष धन्यवाद .
@श्रीश जी : लगता है आपने मेरी पहले वाली पोस्ट नहीं पढ़ी . अब पढ़ भी डालिये जनाब.
@ चौपटस्वामी जी : मैने अपनी आपत्ति आपके चिट्ठे पर दर्ज करा दी है.

@ मित्र समीर : भइये आप लोग तो जहां खड़े होते हो लाइन वहीं से शुरु होती है...हम तो सिर्फ लाइन ही ढूंढते रहते हैं. वैसे धन्यवादा आपका भी.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>@अरुण जी : इंजेक्सन तो पहले ही लगा लिये थे जी.<br />
@ अभय जी (ग़ुरुदेव) : तारीफ के लिये शुक्रिया.<br />
@ सृजन जी : आपने तारीफ की तो लगा तर गये . अब तो पूरी आकाशगंगा पार कर ही लेंगे .<br />
@ शशि जी : आप भी कहां टांग खीचने लगे भाई साहब . दोनों धुरंधरों का आशीर्वाद है तभी तो ये सब लिख पा रहे हैं&#8230;और समीर जी तो अब हमरे मित्र भी हो गये हैं.<br />
@ नीरज जी , तरुण जी , पंकज जी , जगदीश जी , प्रमेन्द्र जी , मसिजीवी जी : आप सबका भी ढेरों धन्यवाद.<br />
@ अविनाश भाई : आपका विशेष धन्यवाद .<br />
@श्रीश जी : लगता है आपने मेरी पहले वाली पोस्ट नहीं पढ़ी . अब पढ़ भी डालिये जनाब.<br />
@ चौपटस्वामी जी : मैने अपनी आपत्ति आपके चिट्ठे पर दर्ज करा दी है.</p>
<p>@ मित्र समीर : भइये आप लोग तो जहां खड़े होते हो लाइन वहीं से शुरु होती है&#8230;हम तो सिर्फ लाइन ही ढूंढते रहते हैं. वैसे धन्यवादा आपका भी.</p>
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		<title>By: जगदीश भाटिया</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/mohalaa_badlo/comment-page-1/#comment-194</link>
		<dc:creator>जगदीश भाटिया</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 20 Apr 2007 14:49:37 +0000</pubDate>
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		<description>बहुत अच्छे। गंभीर बात को भी हंसी हंसी में कह दिया।
वाह वाह।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बहुत अच्छे। गंभीर बात को भी हंसी हंसी में कह दिया।<br />
वाह वाह।</p>
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		<title>By: श्रीश शर्मा 'ई-पंडित'</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/mohalaa_badlo/comment-page-1/#comment-193</link>
		<dc:creator>श्रीश शर्मा 'ई-पंडित'</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 20 Apr 2007 14:12:35 +0000</pubDate>
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		<description>अरे वाह काकेश जी नहीं मालूम था कि आप इतना अच्छा व्यंग्य भी लिखते हैं। प्रतीकात्मक व्यंग्य लिखने वाले कुछ चिट्ठाकारों में आप भी शुमार हो गए।

बाकी भईया हमने तो कुत्तों के डर से उस मोहल्ले में जाना ही छोड़ दिया। इससे बेहतर कोई तरीका नहीं।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अरे वाह काकेश जी नहीं मालूम था कि आप इतना अच्छा व्यंग्य भी लिखते हैं। प्रतीकात्मक व्यंग्य लिखने वाले कुछ चिट्ठाकारों में आप भी शुमार हो गए।</p>
<p>बाकी भईया हमने तो कुत्तों के डर से उस मोहल्ले में जाना ही छोड़ दिया। इससे बेहतर कोई तरीका नहीं।</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: chaupatswami</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/mohalaa_badlo/comment-page-1/#comment-192</link>
		<dc:creator>chaupatswami</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 20 Apr 2007 14:03:01 +0000</pubDate>
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		<description>मेरी प्रतिक्रिया यहां देखें :

http://samakaal.wordpress.com</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मेरी प्रतिक्रिया यहां देखें :</p>
<p><a href="http://samakaal.wordpress.com" rel="nofollow">http://samakaal.wordpress.com</a></p>
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	<item>
		<title>By: समीर लाल</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/mohalaa_badlo/comment-page-1/#comment-191</link>
		<dc:creator>समीर लाल</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 20 Apr 2007 13:32:58 +0000</pubDate>
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		<description>मित्र काकेश

बढ़िया लिखे हो. बधाई!

@ शशि भाई

कलेजे को ठंढ़क-अरे,ऐसी लगी कि निमोनिया की नौबत आयी जा रही है. काकेश और फुरसतिया जी की बात करते हो और साथ में हम-बहुत विनोदी हो भाई!! हा हा, इनके सामने तो हम बस यही कहते हैं-हम भी लाइन में-सबसे पीछे-चल रहे हैं खरामा खरामा!!   :)</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मित्र काकेश</p>
<p>बढ़िया लिखे हो. बधाई!</p>
<p>@ शशि भाई</p>
<p>कलेजे को ठंढ़क-अरे,ऐसी लगी कि निमोनिया की नौबत आयी जा रही है. काकेश और फुरसतिया जी की बात करते हो और साथ में हम-बहुत विनोदी हो भाई!! हा हा, इनके सामने तो हम बस यही कहते हैं-हम भी लाइन में-सबसे पीछे-चल रहे हैं खरामा खरामा!!   <img src='http://kakesh.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: masijeevi</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/mohalaa_badlo/comment-page-1/#comment-190</link>
		<dc:creator>masijeevi</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 20 Apr 2007 09:36:06 +0000</pubDate>
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		<description>हो हो हो
(अब इसे भी भो भो भो मत पढ लेना)</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>हो हो हो<br />
(अब इसे भी भो भो भो मत पढ लेना)</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: PRAMENDRA PRATAP SINGH</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/mohalaa_badlo/comment-page-1/#comment-189</link>
		<dc:creator>PRAMENDRA PRATAP SINGH</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 20 Apr 2007 08:42:28 +0000</pubDate>
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		<description>अच्‍छा व्‍यंग था मजा आ गया खास कर जब हथौडों वालों को बाप की संज्ञा दिया गया था।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अच्‍छा व्‍यंग था मजा आ गया खास कर जब हथौडों वालों को बाप की संज्ञा दिया गया था।</p>
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		<title>By: पंकज बेंगाणी</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/mohalaa_badlo/comment-page-1/#comment-188</link>
		<dc:creator>पंकज बेंगाणी</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 20 Apr 2007 07:33:42 +0000</pubDate>
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		<description>:),  bahut sahii</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p> <img src='http://kakesh.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> ,  bahut sahii</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: अविनाश</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/mohalaa_badlo/comment-page-1/#comment-187</link>
		<dc:creator>अविनाश</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 20 Apr 2007 05:02:54 +0000</pubDate>
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		<description>अच्‍छा है, मेरी बधाई... ऐसे ही लिखते रहें।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अच्‍छा है, मेरी बधाई&#8230; ऐसे ही लिखते रहें।</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: Tarun</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/mohalaa_badlo/comment-page-1/#comment-186</link>
		<dc:creator>Tarun</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 20 Apr 2007 03:40:08 +0000</pubDate>
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		<description>काकेश, आप कुछ इंजेक्शन भी भेज दीजिये डाक से यहाँ वहाँ, इतने सारे हिट मिले पोस्ट को लेकिन किसी को कुछ कहना नही, इतनी कम टिप्पणियां। व्यंग्य तो अच्छा लिखा है, अगर नही लिखा है तो भी किसी ने नही कहा कि क्या कांव कांव कर गये।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>काकेश, आप कुछ इंजेक्शन भी भेज दीजिये डाक से यहाँ वहाँ, इतने सारे हिट मिले पोस्ट को लेकिन किसी को कुछ कहना नही, इतनी कम टिप्पणियां। व्यंग्य तो अच्छा लिखा है, अगर नही लिखा है तो भी किसी ने नही कहा कि क्या कांव कांव कर गये।</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: शशि सिंह</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/mohalaa_badlo/comment-page-1/#comment-185</link>
		<dc:creator>शशि सिंह</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 19 Apr 2007 19:10:30 +0000</pubDate>
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		<description>अब जाकर हमारे फुरसतिया और उड़नतस्तरी के कलेजे को ठंढ़क पड़ी होगी कि चलो कोई तो है लाइन में जो लेखन में उनके कांधे का बोझ हल्का कर रहा है। क्यों सुकुलजी और समीर भाई इस लाइन वाले बालक के सिर पर आप लोगों का हाथ है कि नहीं? वैसे भी पिछली बार ही काकेश भाई ने आप दोनों के जुत्ते को जुतियों और सेंडिलों से भेंट कराकर अपनी योग्यता सिद्ध कर दी थी।

खूबसूरत व्यंग्य... आपके अंदाज के दीवाने हो गये है हम।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अब जाकर हमारे फुरसतिया और उड़नतस्तरी के कलेजे को ठंढ़क पड़ी होगी कि चलो कोई तो है लाइन में जो लेखन में उनके कांधे का बोझ हल्का कर रहा है। क्यों सुकुलजी और समीर भाई इस लाइन वाले बालक के सिर पर आप लोगों का हाथ है कि नहीं? वैसे भी पिछली बार ही काकेश भाई ने आप दोनों के जुत्ते को जुतियों और सेंडिलों से भेंट कराकर अपनी योग्यता सिद्ध कर दी थी।</p>
<p>खूबसूरत व्यंग्य&#8230; आपके अंदाज के दीवाने हो गये है हम।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: नीरज दीवान</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/mohalaa_badlo/comment-page-1/#comment-184</link>
		<dc:creator>नीरज दीवान</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 19 Apr 2007 17:12:11 +0000</pubDate>
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		<description>बढ़िया कटाक्ष. एक आंख के बुद्धिजीवियों से तर्क वितर्क करना मूर्खता की निशानी है. जो सुनने को राज़ी नहीं उसको संदर्भ समझ नहीं आते. वह अपनी सुविधा और एजंडे के मुताबिक़ कहता पढ़ता है.

कुछ उसके बारे में -- सुनो --

जिगर मुरादाबादी कह गए हैं-
उनका जो फ़र्ज़ है अरबाबे सियासत जाने
मेरा पैग़ाम मोहब्बत है, जहां तक पहुंचे.

शुरू से ही मैंने उस तरह के ‘हंस’विवेकी चिट्ठों से परहेज़ रखा है. कुछ कथा मासिक और पत्रिकाओं मे ऐसे लेखों की भरमार होती है. अभद्र शब्द, आग-लगाऊ कुतर्क, धर्म विशेष पर आक्षेप!! इनका अस्तित्व ही इस तरह के लेखों पर टिका हुआ है. एक पक्ष जब तक क्रिया न करें तब तक यह प्रतिक्रिया कैसे करेंगे. कई दफ़ा क्रिया इधर तो प्रतिक्रिया उधर से ही आती है. यानी बहोत सूक्ष्म में इनका वजूद कट्टरवादियों के दूसरे धड़े के अस्तित्व पर अवलंबित है. मौलिकता के नाम पर क्या है ये तो पढ़ने के बाद ही पता चल गया था. तभी मैंने ‘हंसविवेकी’ कथाओं का ज़िक्र किया है.

धर्मनिरपेक्षता का यह मतलब बिलकुल नहीं कि ख़ास क़ौम ही निशाने पर रखा जाए. इस हद तक हमले किए जाएं कि बात ग़ैरक़ानूनी कृत्य तक पहुंच जाए. अब ऐसा ही हो रहा है तो मुझे समझ आ रहा है कि सेकुलरिज़्म को नुक़सान पहुंचाने वालों में सांप्रदायिक तत्वों के साथ-साथ ऐसे सेकुलरवादियों का भी कम योगदान नहीं है.

आदरणीय, आपके विचारो से मेरे विचार शून्य से सौ फ़ीसद न भी मिले किंतु इस आधार पर मैं आपका अपमान करने का अधिकारी नहीं हो सकता. ऐसा ही सौम्य व्यवहार मेरे साथ होना चाहिए. अपनी लाइन बड़ी करने के लिए दूसरों की लाइन छोटी करना घटियापने की निशानी है.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बढ़िया कटाक्ष. एक आंख के बुद्धिजीवियों से तर्क वितर्क करना मूर्खता की निशानी है. जो सुनने को राज़ी नहीं उसको संदर्भ समझ नहीं आते. वह अपनी सुविधा और एजंडे के मुताबिक़ कहता पढ़ता है.</p>
<p>कुछ उसके बारे में &#8212; सुनो &#8211;</p>
<p>जिगर मुरादाबादी कह गए हैं-<br />
उनका जो फ़र्ज़ है अरबाबे सियासत जाने<br />
मेरा पैग़ाम मोहब्बत है, जहां तक पहुंचे.</p>
<p>शुरू से ही मैंने उस तरह के ‘हंस’विवेकी चिट्ठों से परहेज़ रखा है. कुछ कथा मासिक और पत्रिकाओं मे ऐसे लेखों की भरमार होती है. अभद्र शब्द, आग-लगाऊ कुतर्क, धर्म विशेष पर आक्षेप!! इनका अस्तित्व ही इस तरह के लेखों पर टिका हुआ है. एक पक्ष जब तक क्रिया न करें तब तक यह प्रतिक्रिया कैसे करेंगे. कई दफ़ा क्रिया इधर तो प्रतिक्रिया उधर से ही आती है. यानी बहोत सूक्ष्म में इनका वजूद कट्टरवादियों के दूसरे धड़े के अस्तित्व पर अवलंबित है. मौलिकता के नाम पर क्या है ये तो पढ़ने के बाद ही पता चल गया था. तभी मैंने ‘हंसविवेकी’ कथाओं का ज़िक्र किया है.</p>
<p>धर्मनिरपेक्षता का यह मतलब बिलकुल नहीं कि ख़ास क़ौम ही निशाने पर रखा जाए. इस हद तक हमले किए जाएं कि बात ग़ैरक़ानूनी कृत्य तक पहुंच जाए. अब ऐसा ही हो रहा है तो मुझे समझ आ रहा है कि सेकुलरिज़्म को नुक़सान पहुंचाने वालों में सांप्रदायिक तत्वों के साथ-साथ ऐसे सेकुलरवादियों का भी कम योगदान नहीं है.</p>
<p>आदरणीय, आपके विचारो से मेरे विचार शून्य से सौ फ़ीसद न भी मिले किंतु इस आधार पर मैं आपका अपमान करने का अधिकारी नहीं हो सकता. ऐसा ही सौम्य व्यवहार मेरे साथ होना चाहिए. अपनी लाइन बड़ी करने के लिए दूसरों की लाइन छोटी करना घटियापने की निशानी है.</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: सृजन शिल्पी</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/mohalaa_badlo/comment-page-1/#comment-181</link>
		<dc:creator>सृजन शिल्पी</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 19 Apr 2007 15:17:32 +0000</pubDate>
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		<description>वाह, काकेश जी। यह है असली व्यंग्य, यह है लेखन, यह है कहने का अंदाज! मैंने खुद कभी व्यंग्य नहीं लिखा, लेकिन पढ़ा पर्याप्त है। इस स्तर का व्यंग्य बहुत कम मिला है पढ़ने को, कम से कम हिन्दी चिट्ठाकारी में।

@ अभय जी,

&lt;blockquote&gt;बेचारे अविनाश के साथ मेरी पूरी सहानुभूति है.. उसकी नीयत बुरी नहीं है&lt;/blockquote&gt;
जहां तक नीयत की बात है, कोई किसी के दिल में झांकने तो जाएगा नहीं। आप जो लिखते-बोलते हैं, उसी से आपके बारे में राय बनती है। अविनाश ने जो लिखा है, वह भारतीय क़ानून के हिसाब से एक संज्ञेय अपराध है, जिसके लिए उसे तीन वर्ष तक के कारावास की सजा हो सकती है और चाहे जो भी उसके आका हों, उसे बचा नहीं पाएंगे। हो सकता है कि वह मेरी इस बात को धमकी के रूप में ले, लेकिन मैं सिर्फ आगाह कर रहा हूं। क्योंकि क़ानून की जानकारी नहीं होने को किसी अपराध के परिणामों से बचाव का बहाना नहीं बनाया जा सकता। आप उसके शुभचिंतक हैं, यदि समझा सकते हैं उसे तो समझा लीजिए समय रहते।
हालांकि वास्तविक जिंदगी में इतने महत्वपूर्ण और जरूरी काम सबके पास पहले से हैं कि हर कोई इस तरह के फालतू ऑनलाइन विवादों से बचना चाहेगा। चिट्ठाकारी हम लोग महज शौक से करते हैं और यह जीवन की प्राथमिकता में नहीं है। कोई अपने चिट्ठे की हिट्स बढ़ाने और टिप्पणियां पाने का संतोष हासिल करने के लिए इस तरह से व्यर्थ के विवाद खड़ा करेगा, तो यह किसी के लिए अच्छा नहीं रहेगा। ऐसे लोगों से सभी लोग दूरी बनाए रखना ही पसंद करते हैं। काकेश ने जो बात खूबसूरती से व्यंग्य में कह दी है, उस बात को मैं सीधे-सपाट शब्दों में कह रहा हूं। क्योंकि घुमाकर बात को कहना अपन की आदत में नहीं है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>वाह, काकेश जी। यह है असली व्यंग्य, यह है लेखन, यह है कहने का अंदाज! मैंने खुद कभी व्यंग्य नहीं लिखा, लेकिन पढ़ा पर्याप्त है। इस स्तर का व्यंग्य बहुत कम मिला है पढ़ने को, कम से कम हिन्दी चिट्ठाकारी में।</p>
<p>@ अभय जी,</p>
<blockquote><p>बेचारे अविनाश के साथ मेरी पूरी सहानुभूति है.. उसकी नीयत बुरी नहीं है</p></blockquote>
<p>जहां तक नीयत की बात है, कोई किसी के दिल में झांकने तो जाएगा नहीं। आप जो लिखते-बोलते हैं, उसी से आपके बारे में राय बनती है। अविनाश ने जो लिखा है, वह भारतीय क़ानून के हिसाब से एक संज्ञेय अपराध है, जिसके लिए उसे तीन वर्ष तक के कारावास की सजा हो सकती है और चाहे जो भी उसके आका हों, उसे बचा नहीं पाएंगे। हो सकता है कि वह मेरी इस बात को धमकी के रूप में ले, लेकिन मैं सिर्फ आगाह कर रहा हूं। क्योंकि क़ानून की जानकारी नहीं होने को किसी अपराध के परिणामों से बचाव का बहाना नहीं बनाया जा सकता। आप उसके शुभचिंतक हैं, यदि समझा सकते हैं उसे तो समझा लीजिए समय रहते।<br />
हालांकि वास्तविक जिंदगी में इतने महत्वपूर्ण और जरूरी काम सबके पास पहले से हैं कि हर कोई इस तरह के फालतू ऑनलाइन विवादों से बचना चाहेगा। चिट्ठाकारी हम लोग महज शौक से करते हैं और यह जीवन की प्राथमिकता में नहीं है। कोई अपने चिट्ठे की हिट्स बढ़ाने और टिप्पणियां पाने का संतोष हासिल करने के लिए इस तरह से व्यर्थ के विवाद खड़ा करेगा, तो यह किसी के लिए अच्छा नहीं रहेगा। ऐसे लोगों से सभी लोग दूरी बनाए रखना ही पसंद करते हैं। काकेश ने जो बात खूबसूरती से व्यंग्य में कह दी है, उस बात को मैं सीधे-सपाट शब्दों में कह रहा हूं। क्योंकि घुमाकर बात को कहना अपन की आदत में नहीं है।</p>
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		<title>By: अभय तिवारी</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/mohalaa_badlo/comment-page-1/#comment-183</link>
		<dc:creator>अभय तिवारी</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 19 Apr 2007 14:40:53 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://kakesh.com/2007/04/19/mohalaa_badlo/#comment-183</guid>
		<description>कमाल है भाई आपका सेन्स ऑफ़ ह्यूमर..हँसी हँसी में गहरी बातें कर डाली..बेचारे अविनाश के साथ मेरी पूरी सहानुभूति है.. उसकी नीयत बुरी नहीं है.. बस वो कुछ ज़्यादा ही सेल्फ़ राइटियस होने की भूल कर रहा है.. जो उसके विचार से सहमत नहीं हो रहा उसे साम्प्रदयिक घोषित कर दे रहा है..उसे आपके लेख से थोड़ी सीख लेनी चाहिये.. समझना चाहिये कि वो कोई चेतना जगाने का काम तो नहीं कर पा रहा उलटा खुद अलग थलग पड़ जा रहा है.. मुझे बख्श देने के लिये बहुत बहुत शुक्रिया..</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>कमाल है भाई आपका सेन्स ऑफ़ ह्यूमर..हँसी हँसी में गहरी बातें कर डाली..बेचारे अविनाश के साथ मेरी पूरी सहानुभूति है.. उसकी नीयत बुरी नहीं है.. बस वो कुछ ज़्यादा ही सेल्फ़ राइटियस होने की भूल कर रहा है.. जो उसके विचार से सहमत नहीं हो रहा उसे साम्प्रदयिक घोषित कर दे रहा है..उसे आपके लेख से थोड़ी सीख लेनी चाहिये.. समझना चाहिये कि वो कोई चेतना जगाने का काम तो नहीं कर पा रहा उलटा खुद अलग थलग पड़ जा रहा है.. मुझे बख्श देने के लिये बहुत बहुत शुक्रिया..</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: अरुण</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/mohalaa_badlo/comment-page-1/#comment-182</link>
		<dc:creator>अरुण</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 19 Apr 2007 13:43:07 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://kakesh.com/2007/04/19/mohalaa_badlo/#comment-182</guid>
		<description>काकेश जी आपत्तिया ही आपत्तिया है एक तो आप अपने आप को तीन चार ईन्जेक्शन पहले ही (प्रीवेन्टिव) लगा ले आपको पागल कुत्तो के काटने का खतरा ज्यादा है
२ भाई बे मतलब इतना हसाओगे गलत बात है कल इसी बात पे पंगा हो जायेगा कि हम ५७%+१५% ज्यादा हसे है दुसरे का हिस्सा मार लिया</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>काकेश जी आपत्तिया ही आपत्तिया है एक तो आप अपने आप को तीन चार ईन्जेक्शन पहले ही (प्रीवेन्टिव) लगा ले आपको पागल कुत्तो के काटने का खतरा ज्यादा है<br />
२ भाई बे मतलब इतना हसाओगे गलत बात है कल इसी बात पे पंगा हो जायेगा कि हम ५७%+१५% ज्यादा हसे है दुसरे का हिस्सा मार लिया</p>
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