हिन्दी के कई चिट्ठाकार अब तकनीकी रूप से कुशल हो गये हैं. अपने चिट्ठों में तरह तरह के विजेट और चित्र लगाने लगे हैं. यह एक सुखद परिवर्तन है. इधर कुछ चिट्ठाकारों ने अपने चिट्ठों में मधुर संगीत प्रदान करने वाला कोई विजेट भी लगाया है. जो चिट्ठा खुलते ही मधुर संगीत से आपका स्वागत करता है. स्वागत करना अच्छी बात है लेकिन मुझ जैसे कई लोगों को इससे परेशानी का सामना करना पड़ सकता है.

मैं कई चिट्ठे ऑफिस में पढ़ता हूँ. और जब कभी इस तरह के चिट्ठे पर जाता हूँ तो जो संगीत बजता है वो मेरे अलावा भी कई लोगों को सुनायी पड़ जाता है.तो तुर्ंत वह चिट्ठा बन्द कर देना पड़ता है. हर बार अपने स्पीकर को म्यूट करना संभव नहीं हो पाता. इससे कई बार अटपटा भी लगता है. इसलिये मेरा ऎसे संगीतप्रेमी चिट्ठाकारों से निवेदन है कि वो अपने स्वागतगीत को स्वत:चालित ना रखें. हमारे पास विकल्प हो कि यदि हम चाहें तो आपके स्वागत गीत का आनंद ले सकें.

आशा है आप लोग ध्यान देंगे.

चलिये अब आपने इतना पढ़ ही लिया है तो एक मुक्तिबोध की कविता भी पढ़ लें.ताकि आपको ये ना लगे की बेकार ही यहाँ आये.

नाश देवता

घोर धनुर्धर, बाण तुम्हारा सब प्राणों को पार करेगा,
तेरी    प्रत्यंचा  का  कंपन  सूनेपन  का  भार   हरेगा
हिमवत, जड़, निःस्पंद हृदय के अंधकार में जीवन-भय है
तेरे तीक्ष्ण बाणों की नोकों पर जीवन-संचार करेगा ।

तेरे क्रुद्ध वचन बाणों की गति से अंतर में उतरेंगे,
तेरे क्षुब्ध हृदय के शोले उर की पीड़ा में ठहरेंगे
कोपुत तेरा अधर-संस्फुरण उर में होगा जीवन-वेदन
रुष्ट दृगों की चमक बनेगी आत्म-ज्योति की किरण सचेतन ।

सभी उरों के अंधकार में एक तड़ित वेदना उठेगी,
तभी सृजन की बीज-वृद्धि हित जड़ावरण की महि फटेगी
शत-शत बाणों से घायल हो बढ़ा चलेगा जीवन-अंकुर
दंशन की चेतन किरणों के द्वारा काली अमा हटेगी ।

हे रहस्यमय, ध्वंस-महाप्रभु, जो जीवन के तेज सनातन,
तेरे अग्निकणों से जीवन, तीक्ष्ण बाण से नूतन सृजन
हम घुटने पर, नाश-देवता ! बैठ तुझे करते हैं वंदन
मेरे सर पर एक पैर रख नाप तीन जग तू असीम बन ।

— गजानन माधव मुक्तिबोध

11 Responses to “सभी संगीतप्रेमी चिट्ठाकारों से निवेदन”

  1. अपने निवेदन में मेरा भी शामिल कर लें। मैं भी भौत दुखी हूं, इस तरह की संगीतबाजी से। मान न मान, झेल ये सुर-तान टाइप का मामला हो लेता है।

  2. मुआफ़ी, मैने रखा था यह विजेट पर रतलामी जी के कहने के बाद उसे हटा देना ही उचित लगा तो सीधे हटा ही दिया!!

    शुक्रिया मुक्तिबोध जी की कविता के लिए!!

  3. आलोक पुराणिक और आपसे पूरी सहमति। आपने कैसे कहा कि आलोक कहीं और दीखते ही नहीं!

  4. हम तो दुखी होने के नुस्खे सीखने की आशा लेकर आये थे , आपने तो नुस्खे न सिखाकर दुखी ही कर दिया । हमें एक अदद रूमाल की सख्त जरूरत महसूस हो रही है, आशा है नया साफ सुथरा रूमाल शीघ्र भेजेंगे ।
    घुघूती बासूती

  5. बहुत ‘संगीतमय’ निवेदन लगा आपका….मुक्तिबोध जी की कविता के लिए धन्यवाद. बहुत बढ़िया कविता है.

  6. कई सर्वरों पर कई वेबसाइटों/वेबपेज या उनके अंश विशेष को ब्लॉक करने के प्रोग्राम इन्स्टॉल होते हैं। आपके ब्राऊजर तथा फायरवाल में भी कई ऐसे विकल्प होंगे। कौन-से ब्राऊजर का उपयोग करते हैं आप? कुछ टूल्स का उपयोग करके .MP3 .WAV आदि को ब्लॉक किया जा सकता है।

  7. क्या ऐसा नही हो सकता कि आप ब्लौग पर जायें तो आपको विकल्प उपलब्ध हो -
    आप कैसे पढना चाहते हैं ? स-संगीत या असंगीत ?
    धुन अच्छी हो तो कभी कभी सुनना भी अच्छा लगता है.
    अपनी अपनी पसन्द है.

    मेरा एक और प्रश्न है जो सभीसे पूछ रहा हूं. मेरे पास कवि सम्मेलन की रिकौर्डिंग है ( गत 12 अक्टूबर 2007 की और अन्य भी ). इसे किस प्रकार ब्लोग पर डाला जा सकता है? क्या इसके लिये किसी विशेष टूल की आवश्यकता होगी ?
    सम्भव हो तो सूचित करें.
    chaturvediarvind@gmail.com

  8. मैं भी आपकी तरह इन सङ्गीत प्रेमी चिट्ठों को पसन्द नहीं करता। खैर मेरे स्पीकर आम तौर पर बन्द रहते हैं इसलिए ज्यादा कोफ्त नहीं होती।

  9. आपने हमारी तकलीफ को शब्द दिये, बहुत आभार. मुक्तिबोध की कविता पढ़कर आनन्द आ गया. पेश करने के लिये साधुवाद.

  10. काकेश जी हम तो समझे पहले कि हमारी तारीफ़ हो रही है कि इत्ते कम समय में ब्लोग संगीतमय बना लिया। पर अब समझ में आया कि हमारे दोस्तो को ये पसंद नही आया। वैसे हमारे ब्लोग पर संगीत न पंसद आये तो बंद करने का प्रावधान है, फ़िर भी हम बहुत जल्द इसे हटवाते है, आखिर किसको इम्प्रेस करना है

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