कविता : ना जाने क्यों …

Na Jane

प्यार की निष्ठाओं पर उठते सवालों के बीच रहता हूँ इस घर में

शब्द ,जब मौन की धरातल पर सर पटक चुप हो जायें
आस्था, जब विडम्बना की देहली पर दस्तक देने लगे
गीली आँखों के कोने में कोई दर्द , बेलगाम पसरा हो
तनहाइयां ,जब चीख के बोलना भूल जायें
आसमान ,अपनी स्वतंत्रता के अहसास को कोसने लगे
बर्बादियों से रिश्ता कायम करना आसान हो जाये
अंगुलियाँ , तेरे चेहरे से जुल्फ हटाने में भी कांपने लगे

समझा पाओ तो समझाना
कि क्यों
रिश्ते की बुनियाद पर खड़ा महल
आज खंडहर बनने को बैचेन है
प्यार अब ताकता है सिर्फ दीवाल
और पसर कर सो जाते हैं हम
फिर उसी बिस्तर पर
एक दूसरे की ओर पीठ किये

काकेश – 16.04.2007

Article written by काकेश

मैं एक परिन्दा….उड़ना चाहता हूँ….नापना चाहता हूँ आकाश…

6 responses to “कविता : ना जाने क्यों …”

  1. beji

    कुछ देर और पकड़ो आस्था की डोर को…
    बस अब थोड़ी ही देर है होने में भोर को….

  2. beji

    कविता अच्छी लगी….कहना रह गया था।

  3. समीर लाल

    बढ़िया कविता, बधाई!!

  4. ghughutibasuti

    बहुत सुन्दर!
    घुघूती बासूती

  5. Manish

    बहुत अच्छे काकेश भाई । भावों को अच्छी तरह बाँधा है इस कविता में ।

  6. reetesh gupta

    काकेश जी,

    मन के भावों को ज्यों का त्यों रख दिया है आपने

    बेजी जी की बात पर ध्यान दें

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