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	<title>Comments on: &#8220;नराई&#8221; के बहाने,चिट्ठाजगत पर बहस</title>
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	<description>Kakesh's KudKud</description>
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		<title>By: ghughutibasuti</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/nayi_bat1/comment-page-1/#comment-127</link>
		<dc:creator>ghughutibasuti</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 14 Apr 2007 18:55:21 +0000</pubDate>
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		<description>अच्छा लिखा है काकेश जी ! मैं तो इतना ही जानती हूँ कि कुछ अच्छा लगेगा तो मैं पढ़ती रहूँगी। जहाँ भाषा या शैली या रचना बुरी होगी पढ़ना छोड़ दूँगी। जो बुरी भाषा अपनाये उसे पढ़ो ही मत। बात खतम। और यदि इस माध्यम से कुछ अर्थ लाभ कर सकता है तो बुरा क्या है ?
घुघूती बासूती</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अच्छा लिखा है काकेश जी ! मैं तो इतना ही जानती हूँ कि कुछ अच्छा लगेगा तो मैं पढ़ती रहूँगी। जहाँ भाषा या शैली या रचना बुरी होगी पढ़ना छोड़ दूँगी। जो बुरी भाषा अपनाये उसे पढ़ो ही मत। बात खतम। और यदि इस माध्यम से कुछ अर्थ लाभ कर सकता है तो बुरा क्या है ?<br />
घुघूती बासूती</p>
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		<title>By: masijeevi</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/nayi_bat1/comment-page-1/#comment-126</link>
		<dc:creator>masijeevi</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 11 Apr 2007 05:55:27 +0000</pubDate>
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		<description>प्रसन्‍न‍ता है कि आप इस दिशा में सोच रहे हैं। रेटिंग का संकेत यदि हाल की लोकमंच की रेटिंग की ओर है तो करने दें उन्‍हें...धीरे धीरे या तो वे मानकीकरण सीख जाएंगे या फिर खुद अप्रासंगिक हो जाएंगे। उसमें कुछ विशेष चिंता की जरूरत मुझे नहीं दिखाई देती। इतिहास ऑफिशियल होने से इतिहास नहीं बन जाता- यूँ भी किसी भी चीज का एक इतिहास नहीं होता।
अच्‍छी बात यह है कि मोहल्‍ला मुसलमान ही नहीं चिट्ठाकारी का भविष्‍य भी बहस का विषय बन रहा है। साधुवाद आपको।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>प्रसन्‍न‍ता है कि आप इस दिशा में सोच रहे हैं। रेटिंग का संकेत यदि हाल की लोकमंच की रेटिंग की ओर है तो करने दें उन्‍हें&#8230;धीरे धीरे या तो वे मानकीकरण सीख जाएंगे या फिर खुद अप्रासंगिक हो जाएंगे। उसमें कुछ विशेष चिंता की जरूरत मुझे नहीं दिखाई देती। इतिहास ऑफिशियल होने से इतिहास नहीं बन जाता- यूँ भी किसी भी चीज का एक इतिहास नहीं होता।<br />
अच्‍छी बात यह है कि मोहल्‍ला मुसलमान ही नहीं चिट्ठाकारी का भविष्‍य भी बहस का विषय बन रहा है। साधुवाद आपको।</p>
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		<title>By: Tarun</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/nayi_bat1/comment-page-1/#comment-125</link>
		<dc:creator>Tarun</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 10 Apr 2007 03:23:48 +0000</pubDate>
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		<description>लगता है रेटिंग हटवानी पडेगी खैर वो तो अलग बात है लेकिन आपने स्वामीजी की बात को सही पकड के आगे बढाया है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>लगता है रेटिंग हटवानी पडेगी खैर वो तो अलग बात है लेकिन आपने स्वामीजी की बात को सही पकड के आगे बढाया है।</p>
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		<title>By: notepad</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/nayi_bat1/comment-page-1/#comment-124</link>
		<dc:creator>notepad</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 10 Apr 2007 02:46:54 +0000</pubDate>
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		<description>बहुत सही सोच रहे हो ।यह स्थिति वाकई चिंता जनक है। मसिजीवि के कयास भी सही हैं। आपकी चिंता भी। चिट्ठों की रेटिंग् व्यावसायिकता को बढावा देगी और व्यावसायिकता के आते ही बाज़ार यहाँ सक्रिय हो जाएगा। मीडिया तो सक्रिय है ही। ब्लॉग जगत के पुरोधा सोचें।
संभव हो तो अगली ब्लॉगर मीट मे इस पर विचार हो ।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बहुत सही सोच रहे हो ।यह स्थिति वाकई चिंता जनक है। मसिजीवि के कयास भी सही हैं। आपकी चिंता भी। चिट्ठों की रेटिंग् व्यावसायिकता को बढावा देगी और व्यावसायिकता के आते ही बाज़ार यहाँ सक्रिय हो जाएगा। मीडिया तो सक्रिय है ही। ब्लॉग जगत के पुरोधा सोचें।<br />
संभव हो तो अगली ब्लॉगर मीट मे इस पर विचार हो ।</p>
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		<title>By: kakesh</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/nayi_bat1/comment-page-1/#comment-123</link>
		<dc:creator>kakesh</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 09 Apr 2007 18:48:34 +0000</pubDate>
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		<description>धन्यवाद सभी मित्रों को .

@संजय भाई आपकी स्माइली कुछ समझ नहीं आयी .आप तारीफ कर रहे हैं या नाखुश हैं समझ में नही आया.

कुछ लोगों ने कहा कि विचार होना चाहिये . जी सही कहा आपने इसीलिये ये मुद्दा उठाया है.

@अनुभव : मुझे ये तो नहीं मालूम कि आपके अनुभव क्या हैं इसलिये मैं आपकी बातों पर अपनी राय नहीं दे सकता .वैसे ई-स्वामी जी के उत्तर से मैं काफी हद तक सहमत भी हूं व्यवसायिक होना बुरा नहीं है लेकिन अव्यवसायिकता का मुखोटा लगाये पीठ पीछे खेल खेलना मेरी राय में गलत है . ये में किसी सन्दर्भ में नहीं कह रहा बल्कि अपनी विचारधारा बता रहा हूं. जहाँ तक बात महिमामंडन की बात है ..मैं सहमत हूं आपसे पर ई-स्वामी का लेख इन्ही मिथकों को तोड़ता है . जहां तक गुटबाजी की बात है ऎसा लगता तो नहीं ..हाँ ये हो सकता है कि जो पुराने लोग हैं वे आपस में खुल चुके हैं ..कुछ दिनों में हम भी इसी परिवार का हिस्सा हो जाएंगे. इसलिये दिल पे मत ले यार.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>धन्यवाद सभी मित्रों को .</p>
<p>@संजय भाई आपकी स्माइली कुछ समझ नहीं आयी .आप तारीफ कर रहे हैं या नाखुश हैं समझ में नही आया.</p>
<p>कुछ लोगों ने कहा कि विचार होना चाहिये . जी सही कहा आपने इसीलिये ये मुद्दा उठाया है.</p>
<p>@अनुभव : मुझे ये तो नहीं मालूम कि आपके अनुभव क्या हैं इसलिये मैं आपकी बातों पर अपनी राय नहीं दे सकता .वैसे ई-स्वामी जी के उत्तर से मैं काफी हद तक सहमत भी हूं व्यवसायिक होना बुरा नहीं है लेकिन अव्यवसायिकता का मुखोटा लगाये पीठ पीछे खेल खेलना मेरी राय में गलत है . ये में किसी सन्दर्भ में नहीं कह रहा बल्कि अपनी विचारधारा बता रहा हूं. जहाँ तक बात महिमामंडन की बात है ..मैं सहमत हूं आपसे पर ई-स्वामी का लेख इन्ही मिथकों को तोड़ता है . जहां तक गुटबाजी की बात है ऎसा लगता तो नहीं ..हाँ ये हो सकता है कि जो पुराने लोग हैं वे आपस में खुल चुके हैं ..कुछ दिनों में हम भी इसी परिवार का हिस्सा हो जाएंगे. इसलिये दिल पे मत ले यार.</p>
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		<title>By: eswami</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/nayi_bat1/comment-page-1/#comment-122</link>
		<dc:creator>eswami</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 09 Apr 2007 13:54:14 +0000</pubDate>
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		<description>बहुत बढिया लेख है! मेरे उस चिट्ठे लिखने का ध्येय प्राप्त हो गया.

@anubhav, आप इंटरनेट से नादारद हिंदी और इंटरनेट पर व्यवसायिक/अव्यवसायिक रूप से उपलब्ध हिंदी दोनो में से क्या ज्यादा बेहतर स्थिती समझते हैं?

नादारद से नारद बेहतर है! नारद से विशाद बेहतर होगा - हमें हर किस्म के लोगों की जरूरत होगी. लेकिन एक बात से सहमत नहीं हूं की किसी किस्म की गुटबाजी है, समूह में छोटे ग्रुप में काम करने वालों को गुट नहीं मंडली बोला जाता है - परियोजनाओं के स्वाभाव पर निर्भर है! महिमामंडन का बुखार उतारना आता है हमें -मेरा लेख पढ लीजियेगा भाग-२ इसी बारे में है - हां करने वालों का काम बोलता है! छिछलेदारी के बजाए कुछ बेहतर कर सकते हैं तो जरूर कीजिये!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बहुत बढिया लेख है! मेरे उस चिट्ठे लिखने का ध्येय प्राप्त हो गया.</p>
<p>@anubhav, आप इंटरनेट से नादारद हिंदी और इंटरनेट पर व्यवसायिक/अव्यवसायिक रूप से उपलब्ध हिंदी दोनो में से क्या ज्यादा बेहतर स्थिती समझते हैं?</p>
<p>नादारद से नारद बेहतर है! नारद से विशाद बेहतर होगा &#8211; हमें हर किस्म के लोगों की जरूरत होगी. लेकिन एक बात से सहमत नहीं हूं की किसी किस्म की गुटबाजी है, समूह में छोटे ग्रुप में काम करने वालों को गुट नहीं मंडली बोला जाता है &#8211; परियोजनाओं के स्वाभाव पर निर्भर है! महिमामंडन का बुखार उतारना आता है हमें -मेरा लेख पढ लीजियेगा भाग-२ इसी बारे में है &#8211; हां करने वालों का काम बोलता है! छिछलेदारी के बजाए कुछ बेहतर कर सकते हैं तो जरूर कीजिये!</p>
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		<title>By: प्रियंकर</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/nayi_bat1/comment-page-1/#comment-121</link>
		<dc:creator>प्रियंकर</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 09 Apr 2007 13:22:19 +0000</pubDate>
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		<description>बेहद वाज़िब मुद्दा उठाया है आपने . इस पर विचार होना चाहिए .</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बेहद वाज़िब मुद्दा उठाया है आपने . इस पर विचार होना चाहिए .</p>
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	<item>
		<title>By: समीर लाल</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/nayi_bat1/comment-page-1/#comment-120</link>
		<dc:creator>समीर लाल</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 09 Apr 2007 12:58:01 +0000</pubDate>
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		<description>सही है, लिखते रहो.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>सही है, लिखते रहो.</p>
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	<item>
		<title>By: aalochak</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/nayi_bat1/comment-page-1/#comment-119</link>
		<dc:creator>aalochak</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 09 Apr 2007 11:00:59 +0000</pubDate>
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		<description>खांचो से बचने के लिए मुखोटा एक समाधान हो सकता है ।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>खांचो से बचने के लिए मुखोटा एक समाधान हो सकता है ।</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: अभय तिवारी</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/nayi_bat1/comment-page-1/#comment-118</link>
		<dc:creator>अभय तिवारी</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 09 Apr 2007 08:46:30 +0000</pubDate>
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		<description>भई अपना खाँचा तो तोड़ दिया आपने..सही है..</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>भई अपना खाँचा तो तोड़ दिया आपने..सही है..</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: सृजन शिल्पी</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/nayi_bat1/comment-page-1/#comment-117</link>
		<dc:creator>सृजन शिल्पी</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 09 Apr 2007 08:29:46 +0000</pubDate>
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		<description>बिल्कुल सही। इसी बेबाक अंदाज में लिखते रहें।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बिल्कुल सही। इसी बेबाक अंदाज में लिखते रहें।</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: anubhav</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/nayi_bat1/comment-page-1/#comment-114</link>
		<dc:creator>anubhav</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 09 Apr 2007 07:33:20 +0000</pubDate>
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		<description>बात तो सही कही आपने पर कितने लोग इस बात को आज के दिन समझते है .हिन्दी ब्लोगिंग में अभी से गैंगबाजी चालू हो गयी है. सबके अपने अपने ग्रुप हैं सब अपनी अपनी दुकान चलाना चाहते हैं हिन्दी सेवा के नाम पर . ये सब अपनी अपनी कंपनिया खोल लेंगे और फिर उन्हें किसी बढ़ी कंपनी को बेच पैसा डकार जायेंगे . कुछ एक ने खोल भी दी है. ईतिहास लेखन शुरु हो गया है भाई . इन्ही के कुछ भाई भतीजे शोध करने भी पहुंच रहे हैं वो इस इतिहास को प्रमाणित कर देंगे और वो बन जायेगा ऑफिसियल . फिर सब जगह इनका ही नाम होगा. नाम की लड़ाई है भाई ये ,बाद में इसमें दाम भी जुड़ जायेगा.   सब लोग मलाई खा लेंगे और पानी वाला दूध छोड़ देंगे आम जनता के लिये. आप जिस मौलिकता या रास्ता दिखाने की बात करते हैं वो यहां संभव नही . महिमामंडन के इस दुर्ग में सैंध लगाना सहज संभव नहीं . फिर भी कोशिस जारी रहे . शायद रेटिंग की दुकान चलाने वाले भी समझें इन्हें . अच्छा मौलिक लेख है .ऊपर देखो ना एक चोर दुकान्दार ने चिप्पी लगाकर आपका मजाक उड़ाया है. वैसे &quot;चोर चोर मौसेरे भाई&quot; . सावधान रहें इन से. लिखते रहें.. ज्यादा हो गया तो माफ करना भाई.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बात तो सही कही आपने पर कितने लोग इस बात को आज के दिन समझते है .हिन्दी ब्लोगिंग में अभी से गैंगबाजी चालू हो गयी है. सबके अपने अपने ग्रुप हैं सब अपनी अपनी दुकान चलाना चाहते हैं हिन्दी सेवा के नाम पर . ये सब अपनी अपनी कंपनिया खोल लेंगे और फिर उन्हें किसी बढ़ी कंपनी को बेच पैसा डकार जायेंगे . कुछ एक ने खोल भी दी है. ईतिहास लेखन शुरु हो गया है भाई . इन्ही के कुछ भाई भतीजे शोध करने भी पहुंच रहे हैं वो इस इतिहास को प्रमाणित कर देंगे और वो बन जायेगा ऑफिसियल . फिर सब जगह इनका ही नाम होगा. नाम की लड़ाई है भाई ये ,बाद में इसमें दाम भी जुड़ जायेगा.   सब लोग मलाई खा लेंगे और पानी वाला दूध छोड़ देंगे आम जनता के लिये. आप जिस मौलिकता या रास्ता दिखाने की बात करते हैं वो यहां संभव नही . महिमामंडन के इस दुर्ग में सैंध लगाना सहज संभव नहीं . फिर भी कोशिस जारी रहे . शायद रेटिंग की दुकान चलाने वाले भी समझें इन्हें . अच्छा मौलिक लेख है .ऊपर देखो ना एक चोर दुकान्दार ने चिप्पी लगाकर आपका मजाक उड़ाया है. वैसे &#8220;चोर चोर मौसेरे भाई&#8221; . सावधान रहें इन से. लिखते रहें.. ज्यादा हो गया तो माफ करना भाई.</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: SHUAIB</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/nayi_bat1/comment-page-1/#comment-116</link>
		<dc:creator>SHUAIB</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 09 Apr 2007 07:01:23 +0000</pubDate>
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		<description>सही फ़र्माते हैं आप :)</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>सही फ़र्माते हैं आप <img src='http://kakesh.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: संजय बेंगाणी</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/nayi_bat1/comment-page-1/#comment-115</link>
		<dc:creator>संजय बेंगाणी</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 09 Apr 2007 06:05:08 +0000</pubDate>
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		<description>बहुत ही मौलिक लेख :)</description>
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