समीर जी का उत्साह बढ़ाने में कोई सानी नहीं. कल की पोस्ट पर उन्होने एक अच्छी सी टिप्पणी की जिससे फिर से ऊर्जा मिली कि बांकी भाग को भी टाइप कर आप तक पहुंचाऊं.

थक गये हैं, थोड़ा विश्राम प्राप्त करें मित्र.

कार्य इतना उत्तम हैं कि यह कह पाना संभव नहीं कि थक गये हैं तो जाने दिजिये.

बहुत आभार इस पेशकश का. हमारे पास ताप के ताये हुए दिन होती तो जरुर मदद कर देते आपकी, यह तो आप जानते ही हैं. :)

धन्यवाद समीर जी.

लीजिये प्रस्तुत है अंतिम भाग. पहले दो भाग आपने ना पढ़े हों तो वो यहाँ और यहाँ हैं. निवेदन यही कि पहले उन दोनों भागों को पढ़ लें.

मँड़हे से निकला मैं, वह भी साथ था
पूछ पड़ा, किसके लड़के हो
मैंने शिक्षा जैसी थी अलक्ष को प्रणाम किया
कहा, जगरदेवसिंह मेरे पिता थे
बैरागी बाबू, पूछा उसने
मैंने कहा, उनका यह भी नाम है
उसने कहा, अब ऐसे आदमी दिखाई नहीं पड़ते
धरम जानकर रहे धरम किया

मैं बाहर निकला तो सोचता हुआ निकला
आज जो हुआ वह केवल आज ही हुआ है
और मैंने आज के उड़ंछू शब्दों को
पकड़ पाने के लिए अपने मन को
उद्यत कर दिया
ऐसा कम होता है बहुत कम
जब शब्द किसी समय जी से बतियाने लगें
बुआ से मैंने सबकुछ कहा फिर पुछा
उसका नाम क्या है
बुआ ने कहा नगई
महरिन के माथे से उबहनी लटकाए
मैंने घर जाते देखा था
उधर वही घर था
मुड़ते भी देख लिया उनको
उसी ओर
कई दिनों बाद
गया नगई की मँड़ई पर

नगई खाँची फाँदे बैठा था
हाथों में वही काम
आँखें उन हाथों का
हथवट चिताती हुई
खाँची में लगी एक आँख मुझे भी देखा
और कहा बैठो उस पीढे पर
साफ है मैंनें कुछ पहले ही धोया है
बैठने पर मुझसे कहा
अच्छा बाँच लेते है रमायन
तुम्हारे बाबू कहते थे जैसे
अब कोई क्या कहेगा
उनकी भीतर की आँख खुली थी
सुर भी क्या कण्ठ से निकलता था
जैसे आषाढ़ के मेघ की गरज
मैने कहाँ महरा
मैं तो अभी सीख रहा हूँ
नगई ने कहाँ कितने होंगे
जो जानते हैं वही कुछ सीखना है
बाबू की तपस्या का फल
तुम्हें मिला है मिलेगा
मैं इस सनेहिल असीस से
चुपाया रहा
नगई ने हाथ चलाते चलाते फिर कहा
दुनियां है दुनियां का ज्ञान है आदमी है
आदमी को क्या क्या नहीं जानना है
देखते-सुनते और करते ज्ञान होता है
अपनी जब होती है समझ नयी होती है
मेरे लिए समझ पाना कठिन था
पर रुक रुककर निकले बोल ये
कहीं ठहर गये थे मेरे मन में
अर्थ बहुत बाद में कुछ कुछ पाया
धारणा बेकार में बोझ ढोना ही नहीं है
आदमी बात से व्यवहार से
पहचाना जाता है
समझ ही
आदमी को आदमी से जोड़ती है

वर्ष बीत जाने के बाद, शायद
एक दिन नगई की ओर जा निकला
इतने जन वहाँ मैंने नहीं देखे थे
अपना कुछ काम था फिर भी में रुक गया
नगई की दृष्टि मुझ पर पड़ी
काम रोककर मेरे पास आ गया
और कहा, भात है बिरादरी को न्योता है
दिन परसों निश्चित है
आप कहाँ जाते हो
मैंने कहा काम से
उसने कहा मुझे भी बुझाव है
परसों आना
इज्ज्त मैं क्या दुंगा
फिर भी दसों नँह जोड़े
खड़ा ही मिलूँगा
सेवक हूँ और सेवा करना मेरा काम है

मैं आगे बढ़ गया
उस दिन बडी भीड़ थी
बड़े-बड़े चूल्हे जगाये गये
जिन पर हण्डे कड़ाह चढ़े थे
कहीं भात कहीं दाल और कहीं
तरकारी पकती थी
लकड़ियों की कोई कमी नहीं थी
जंगल के बीच थे चिरानीपट्टी की बस्ती
दोने पत्तल पहले से बनाकर
ठिकाने से रखे थे
ढखुलाही कोई छोटी नहीं थी
ढाक के पेड़ ही पेड़ थे
बड़े और अच्छे पत्ते जिन पर छाये थे
जंगल में क्या कमी
जंगल जिसका हो
उससे कह कर ले लेना था
रोक टोक कोई खास नहीं थी
कई बार आ जाकर
रंग वहाँ का देखा
जो भी मिला काम से लगा मिला
ऐसे लोग भी मिले
जो करते थे कम और बोलते बहुत रहते हैं
आवाज ऊँची से ऊँची हो आती है।
ध्यान इधर उधर जाता है आसपासवालों का
कुछ लोग फिरकी से फिरते हुए
इनके पास उनके पास जाते थे
काम को देखकर बताते थे
ऐसे करो वैसे करो
मैंने सुना, एक कहाँ रहा था, कैसे भला
लेकिन सचेत पाँव कान से कुछ दूर थे
मुँह किसी और हाथ से कुछ कह रहा था

कोई दस बार पाँत बैठी थी
हर बार पत्तलें पचास ऊपर लगती थी
नगई ने तीन बीस का हिसाब रखा था
भोजन करने वाले तुष्ट थे
गाँजा, तमाखू, सुरती, बीड़ी, और पान का
प्रबन्ध था
जब जो जिसे चाहिए
जाकर ले लेता था
कुछ बूढ़े और आदर मान पाने वाले ही
अपनी जगह जमे थे
उनकी सेवा नौजवान करते थे
बार-बार यहाँ या वह पूछकर
सराहना हो रही थी
नगई के यहाँ वहाँ
बड़े लोग भी प्रबन्ध ऐसा
नहीं कर पाते
नगई पर कृपा है भगवान की
इस तरह मान दिया
भार हल्का कर दिया

पंचायत बैठी थी जाजिम पर
पीपल के नीचे
दिन दो घड़ी शेष था
कोतवाल, सिपाही और गोड़इत
जाति के ही लोग थे
बरौछीदार-चँवरदार मक्खियाँ उड़ाते थे
बैठे हुए लोगों को बचाते
हवा पट पड़ी थी इसी कारण
पंखे का प्रबन्ध था पसीना चल रहा था
और बड़े-बड़े पंखे तीन चार हाथों से
हवा को लहराते थे
मैं उभरी पीपल की सोर पर जरा हटकर
बैठा था, मेरी आँखों के लिए
पहली पंचायत थी
चौकीदार ने पुकारा
नगई और लखमनी
दोनों हाथ जोड़े सिर झुकाए हाज़िर हुए
फिर उनका दोस बतलाकर पूछा गया
अपने दोस मानते हो
मानते हैं—दोनों ने साथ कहा
पूछा गया, डाँड़-बाँध तुमको मंजूर है
सिर माथे हमको मंजूर है—दोनों बोले
पंचों ने कहा, दस रुपये की डाँड़ है, भात देना होगा
यह भी मंजूर है
फिर महरिन जल लायी, सबको दिया पीने को
नगई ने हुक्का पिया और बारी-बारी सबको दिया
पंचों ने हुक्म दिया अब तुम दोनों साथ रहो
पंचायत तो मानो पंचपरमेसर है
नगई हाथ जोड़े अब खड़ा हुआ
बोला, जाति गंगा ने मुझे पावन कर दिया
धन्य हुआ
और फिर भोज हुआ
नाच और नाटक हुए.

[‘ताप के ताये हुए दिन’ से]

त्रिलोचन श्रंखला के कुछ और लेख…

1. त्रयी के त्रिलोचन की कवितायें.

2. चम्पा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती:त्रिलोचन

3. बिस्तरा है न चारपाई है:त्रिलोचन

4. नगई महरा: त्रिलोचन

5. नगई महरा- 2 : त्रिलोचन

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: कविता, काकेश, त्रिलोचन, गांव, नगई महरा, नगई, ताप के ताये हुए दिन

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कल नगई महरा का पहला भाग प्रस्तुत किया था. आज पेश है उसी का दूसरा भाग.कृपया पूरी कविता पढ़ें आप निश्चित ही कविता के मर्म में उतर पायेंगे.य़ह एक कविता है जिसके अन्दर समाज की एक कहानी भी साथ साथ चल रही है और दिख रहा है समूचा गाँव.आइये आनन्द लें.

तब मेरी उमर जैसी छोटी थी
समझ भी छोटी थी
शब्द याद रह गये
अर्थ वर्षों बाद खुला जब
समाज के पर्दे खुलने लगे

चार भाई थे—नगई, बैरागी, बित्तू
और कोई और
बैरागी को मैने देखा था जब तब
चिरानीपट्टी कभी-कभी आता था
बैरागी का बियाह महजी से हुआ था
महजी इस महरिन की कोख से जनमी थी
बैरागी-महजी के नाते से
कभी कदा नगई की चर्चा चल जाती थी

चर्चा कमजोर थी
कहारों में
किसी को छोड़कर दूसरे को कर लेना
चलता था
और अब भी चलता है
नर या नारी का बिसेख कोई नहीं था
जोड़े में जब कोई नहीं रहा
दूसरे को लाने में बाधा कुछ नहीं थी
जरा ऊँच-नीच का विचार तो यहाँ भी था
जातियों के आपसी भेद थे
कोई जाति कुछ ऊँची
कोई जाति कुछ नीची
स्त्री-पुरुष भिन्न-भिन्न शाखा के हुए
तो मुश्किल पड़ जाती थी
लेकिन पंचायत थी
डाँड़-बाँध करती थी
जिसे मानना ही था
और फिर भोज भात चलता था
भोज भात खाया भागे नहीं
आपसी बतियाव, खेला, गाना, नाच-रंग
नाटक, तमाशा, सभी होता था
इसी समय सबके गुन खुलते थे

नगई ने अपने सगे भाई की सास को
घर में बैठाया था
उसी घर में माँ-बेटी
जेठानी-देवरानी थीं
सम्बन्धों की छीछालेदार
घर में ना हो गाँव-भर में होती थी
बाप दादों का कुटका
बछैया छोड़कर नगई ने छोड़ दिया
मँडई डाल ली चिरानीपट्टी में आकर

मैने एक दिन उधर
पेड़ों के सहारे एक मड़ई खड़ी देखी
पास ही बँसवट थी
जिसमें बहुत साँप सुने जाते थे
और कुछ कदम पर डँड़ियबा का मसान था
गाँव में गाँव से अलग छनिहर
कौन यहाँ रहता है
देखने के लिए गया
आँखें जो देखती थीं मेनेजर को बताती थीं
मुँह मेरा बन्द था

नगई ने जेंवरी बरते पूछा, पढ़ते हो
हाँ कहने को खुला
फिर नगई ने पूछा
रमायन बाँच लेते हो
हाँ अटक अटककर
सुन कर हँसा नगई खुलकर बोला
बाँचना अटक अटक कर
और इसे बूझना बूझने की बात है
मेरे कान नगई के कहन-रस में पगे
अब उसने फिर कहा
लाऊँ मैं, बाँचोगे,
ले आओ मैंने कहा
मन में गुना अब तक तो
अपने आप बाँचता था
आज किसी और के लिए मुझे बाँचना है
यहाँ नयी बात थी
और नयी बात में अनकुस होता ही है
मन हाल रहा था
बात को फैलाव से बचाने के लिए मै
नगई का नाम बार-बार दे रहा हूँ
लेकिन मुझे उस दिन
उसका नाम मालूम नहीं था
बातों से बात चली
अलगाव दूर था लगाव पास पास था
और लगाव को कोई नाम देने से
काम बहुत नहीं बनता
नाम एक निश्चित निश्चय उगाता है
अर्थ सम्बन्धों के सहारे चला करते हैं
यानि अर्थ का उदगम छिपा रह जाता है
नगई ने बेठन को खोलकर पोथी को
माथे से लगा लिया
फिर उसे खाट कि सिरहाने रखा
लोटे में पानी लेकर मुझसे कहा
चरण मुझे धोने दो
और उसने मेरे दोनें पैरों को
घुटनों तक धो दिया अच्छी तरह
फिर लोटे को माँजा धोकर पानी लिया
और कहा, चलो हाथ मुँह भी धुला दूं

मैं उठा पानी वह ढालता रहा
मैने हाथ-मुँह फरचाए
पास के मँड़हे में कुशासन एक अलग था
उसकी गर्द झाड़कर मुझे बैठने को कहा
मेरे बैठ जाने पर पोथी मुझे सौंप दी
फिर मुझे बड़े भक्ति-भाव से प्रणाम किया
कुछ हटकर हाथ जोड़कर सामने ही
भूमि पर बैठ गया

मैने पोथी खोल ली
पूछा, कहाँ पढूं
उसने कहा सुन्दरकाण्ड
मैंने साँस चैन की ली
सुन्दरकाण्ड कई बार पढ़ा था
पढने को,अर्थ कौन ढुँढता
ध्वनी अपनी मुझे अच्छी लगती थी
जहाँ-जहाँ अर्थ झलक जाता था
वहाँ आनन्द मुझे मिलता था
जनक सुता के आगे ठाढ़ भएउ कर जोरि
पढकर मैं रुका प्रति दोहे पर जैसे
वैसे ही उसने इस दोहे पर
भक्ति भाव से कहा
सियाबर रामचन्द्र की जय
फिर मुझ से कहा अब विश्राम
कुशा खण्ड पतला सा मेरी ओर करके कहा
चिह्न रख दो पोथी में
मैंने चिह्न लगाकर पोथी को बन्द किया
उसने अब पूछा था कल भी आओगे इस ओर
मैने कहा, आऊँगा
जब मैं खड़ा हुआ चलने को
उसने भक्ति भाव से मुझे फिर प्रणाम किया

[‘ताप के ताये हुए दिन’ से]

क्रमश:……………….

कविता अभी समाप्त नहीं हुई. लेकिन मेरी उंगलिया अब टाइप कर पाने मे असमर्थ पा रही हैं खुद को. चलिये तो शीघ्र ही आता हूँ एक और भाग के साथ जो इस कविता का अंतिम भाग होगा.

त्रिलोचन श्रंखला के कुछ और लेख…

1. त्रयी के त्रिलोचन की कवितायें.

2. चम्पा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती:त्रिलोचन

3. बिस्तरा है न चारपाई है:त्रिलोचन

4. नगई महरा: त्रिलोचन

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: कविता, काकेश, त्रिलोचन, गांव, नगई महरा, नगई, ताप के ताये हुए दिन

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‘नगई महरा’ त्रिलोचन की एक सशक्त रचना है.पहलू में त्रिलोचन की कविताओं में भी इस कविता का जिक्र हुआ था. यह एक लंबी कविता है जिसे दो भागों में पेश कर रहा हूँ. इस कविता में ग्रामीण जीवन अपने पूरे यौवन के साथ उतर गया है. गांव के आम शब्द इस कविता में इतने सहज भाव से आ जाते हैं कि समझने के लिये अतिरिक्त प्रयास नहीं करना पड़ता.गांव के जीवन का एक शब्द चित्र सी खींचती है यह कविता. जाति-पाति,पंचायत, और समाज सभी कुछ तो है इसमें.आप भी आनंद लीजिये.

नगई महरा

गाँव वाले इधर उधर कहते थे
नगई भगताया है
सामना हो जाने पर कहते थे
नगई भगत

नगई कहार था
अपना गाँव छोड़कर
चिरानीपट्टी आ बसा
पूरब की ओर
जहाँ बाग या जंगल था
बाग में
पेड़ आम,जामुन या चिलबिल के
जंगल में मकोय, हैंस, रिसबिल की बँवरें
झाड़ियां झरबेरी की
और कई जाति की
ढ़ेरे, कटार,ढ़ाक, आछी,
बबूल और रेवाँ के
पेड़ भी जहाँ तहाँ खड़े थे

सूखे पत्ते वहाँ बहुत सारे थे
नगई ने भाड़ बैठा दिया
दिन में साँस मिलने पर
भाड़ को जगाता था
दूर दूर से भुँजानेवाले आ जाते थे
संझा के पहले ही
भाड़ बन्द होता था
नगई का परिवार
छोटा था
घरनी और एक बच्ची
बच्ची गोहनलगुई थी
घरनी सेंदुर से मिली नहीं थी
धरौवा कर लिया था

घरनी फुर्तीली थी
चुस्त काम काज में
बोल बात में हँसमुख
कभी उसका चेहरा मुरझाया हो
याद नहीं आता मुझे
बात पर बात ऐसे जड़ती थी
जहाँ समझ लड़ती थी
और ये दुर्लभ है
नगई ने गाँव के
तीन-चार घरों का
पानी थाम लिया था
कभी वह भरता था
कभी घरनी भरती थी
कुछ खेत मिले थे इसके लिए
और घर घर से
कलेवा मिल जाता था
नगई नहीं खाता था
माँ-बेटी खाकर कुछ करती थी

पूरा परिवार मैंने देखा
पैरों पैरों है
हाथों ने काम कोई लिया, किया
हो जाने का ही काम
हाथों में आता था
रस्सियाँ भी नगई बरा करता था
सुतली को कातकर बांध भी बनाता था
कहता था, दैव ने मुँह चीर दिया है
उसमें कुछ देने को हाथ तो चलाना है
मैने इस घर में
टुन्न पुन्न नहीं देखी
घरनी को महरिन मैं कहता था
मैं ही नहीं कोई मुँह-मुँह देखे
क्योंकि नगई महरा थे
सबके लिए
केवल बड़े-बूढ़े बखरीवाले
नगई बुलाते थे
कभी नगई कभी महरा
जो भी जबान पर चढ़ गया
कहने की झोंक में

नगई को बैठने और उठने का
बोलने-बतियाने का सहूर है
यह अनमोल बाबा कहते थे
अनमोल बाबा की आँख
इन्ही बातों पर पड़ती थी
अच्छी तरह जानता हूँ
मुझ पर जब चिढ़ते थे
कहते थे तू कैसे
बेटा बैरागी का हो गया
भलमनई की कोई चाल नहीं
नगई की चर्चा
निन्दकों को प्रिय नहीं थी
गाँव में निन्दक कम नहीं थे
कहाँ नहीं होते वे
जहाँ वृद्दि पाते हैं
खुचड़ खोज-खोजकर दिखाते हैं

बहुतों के पाँव अपनी डगर पर
निन्दा की कहीं छिपी कहीं उभरी
अढ़ुकन से ठोकर खा जाते हैं
उबेने पाँव चलना कठिन होता है
हर डग का ऊँच खाल
देखे और तोले बिना
काम नहीं चलता
अपना शरीर बेसम्हार होता है
एक दिन अपने द्वारे
इमली के पेड़ तले मैं था
घेउरा बुआ था महरिन पानी भरने आ गयी
बुआ ने बुलाया महरिन
महरिन आ गई पास
बुआ ने, अब मैं समझता हूँ,
कुछ प्यार से कुछ तिरस्कार से
कहा होगा— महरिनिया
तू दमाद के घर
क्यों बैठ गयी
महरिन का जवाब पहले का तैयार लगा
बूआ, अपनी ओर ही निगाह करो
दूसरों की बूझने से पहले अपना ही बूझना
कहीं अच्छा होता है
और वह इज्जत बचाती हुई
घर में चली गयी
छूछा जोर लेकर बाहर निकली
बिल्कुल चुप
बुआ भी चुप ही रहीं
उसके इनारे की ओर चले जाने पर
आप ही आप कहा
कौन नीच जाति के मुँह लगे.

[‘ताप के ताये हुए दिन’ से]

क्रमश:……………………………………..

त्रिलोचन श्रंखला के कुछ और लेख…

1. त्रयी के त्रिलोचन की कवितायें.

2. चम्पा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती:त्रिलोचन

3. बिस्तरा है न चारपाई है:त्रिलोचन

 

दुखी होना आपकी सामाजिक चेतना का लक्षण है. अवसरवादी के लिये दुख लाभ प्राप्ति का मार्ग है.आप अपनी सुविधानुसार दुखी हो सकते हैं.यदि आपके पास एक अदद नौकरी है तो इस बात पर दुखी होइये कि आपका बॉस आपको बहुत परेशान करता है.सुबह से शाम तक आपको एक कोल्हू के बैल की तरह काम करना पड़ता है. बदले में आपको वेतन के रूप में जो पैसे मिलते हैं वो आपकी योग्यता व काम के हिसाब से बहुत कम हैं. यदि आप भारत के अधिकांश युवाओं की तरह पढ़े लिखे अयोग्य हैं तो दुखी होने का पहला हक आपका है. आप बेरोजगारी की समस्या का रोना रोते हुए सरकार को जी भर कोस सकते हैं.आप जगह जगह जा कर कह सकते हैं कि इस देश में योग्य व्यक्ति की कोई पूछ नहीं है. ज्यादा दिनों तक नौकरी ना मिले तो कहिये कि अरे नौकरी की क्या है मिलने को तो कितनी ही मिल जायेंगी लेकिन हम अपनी शर्तों पर काम करना चाहते हैं.आजकल हर जगह भ्रष्टाचार है.लोगों का नैतिक पतन हो चुका है.क्या होगा देश का. ऎसा प्रकट करें कि जैसे सारे देश का भार आपके ऊपर ही है.कुछ दिनो में कुछ ले-दे के एक अदद नौकरी का जुगाड़ हो गया तो कहिये कि क्या करें… सोचा है कि सिस्टम को कोसने से बेहतर है कि सिस्टम में रहकर उसके खिलाफ लड़ें.आजकल कोई देश के बारे में सोचता ही नहीं. यकीन मानिये लोगों की सहानुभूति आपके साथ होगी. 

यदि आप कवि हैं तो भगवान ने आपको एक कलम दी है जिसे कुछ बड़े बूढ़ों ने तलवार से भी ज्यादा मारक बताया है. ये बड़े बूढ़े वही रहे होंगे जो किसी राजा के जमाने में युद्ध के लिये मिसफिट घोषित कर दिये गये होंगे. कवि दुखी होकर उस तलवार से जिस पर चाहे उस पर वार कर सकता है.कवि के दुखी होने का अपना ही एक इश्टाइल होता है जिससे दुखी होने का नाटक कर दूसरों लोगों को पर्याप्त दुखी कर सकता है.इस तरह वह माहोल को दुखमय बना देश व समाज की प्रगति में योगदान देता है.कवि की दुखी होने और करने की विभिन्न क्षमताओं के आधार पर ही उसे तरह तरह पुरुस्कार प्रदान किये जाते हैं.साहित्य के क्षेत्र के जितने भी बड़े बड़े पुरुस्कार हैं वह अधिकतर कवियों को ही दिये जाते है. व्यंग्यकारों को अपनी दुखी न कर पाने की असमर्थता के कारण कोई पुरुस्कार नहीं मिलता.यदि किसी एक आध व्य़ंग्यकार को पुरुस्कार मिला भी हो तो मान लीजिये कि उसने अपनी रचनाओं से लोगों को पर्याप्त दुख दिया होगा.

दुखी होने के मामले में नेता लोग आत्मनिर्भर होते हैं. उन्हें दुखी होने के लिये कोई खास मसक्कत नहीं करनी पड़ती. वो किसी भी मुद्दे पर घड़ियाली आंसू बहा सकते हैं.कैमरे के सामने आते ही वो पूरी तरह चेहरे को लटकायमान बनाते हुए किसी भी मुद्दे पर दुख प्रकट कर सकते हैं. यह सार्वभौमिक सत्य है कि किसी भी नेता द्वारा प्रकट दुख का कारण विपक्षी पार्टी ही होती है.

जिस तरह से दुख के संवेदना जुड़ी हुई है उसी तरह सुख के साथ जलन का रिश्ता है. यदि कोई दुखी है तो आप उससे हमदर्दी जतायेंगे जबकी यदि कोई सुखी है तो आपको उससे हमेशा जलन होगी.इसलिये ज्ञानी लोग अपना सुख कभी प्रकट नहीं करते. वे आपको जलने का कोई अवसर नहीं देते. पेट भरा हो तो आप पेट में गैस की शिकायत कीजिये. पेट खाली हो तो देश में भोजन की समस्या पर विस्तार से भाषण दे डालिये जब तक की आपके लिये भोजन की व्यवस्था ना हो जाये.यदि आप सिंगापुर से शौपिंग करके लौटे हैं तो कहिये ‘क्या करें ऑस्ट्रेलिया नहीं जा पाये इस बार’ और यदि लोगों की सहानुभूतियों के बल पर ऑस्ट्रेलिया चले ही गये तो कहिये ‘यू.एस. जाने की इच्छा थी लेकिन क्या करें’…. और यदि यू. एस. भी पहुंच जायें तो अपने गांव को याद कर रोने लगिये. यानि आपको कोई मौका नहीं जाने देना है दुखी होने का.

किसी पुराने कवि ने कहा है.

सुखिया सब संसार है , खाये और सोये
दुखिया दास कबीर है , जागे और रोये

इन पंक्तियों का सार यही है कि जिन्होने दुखी होने का पर्याप्त अभ्यास कर लिया वह अब सुखी हो गये और अब वह चैन से खा-पी कर सो रहे हैं. लेकिन कबीर दास जी जो अभी इस क्षेत्र में नये हैं वो जाग जाग कर दुखी होने का अभ्यास कर रहे हैं ताकि वह भी सुख को प्राप्त कर खा-पी कर आराम से सो सकें.

इसलिये मेरा निवेदन है कि दुनिया के सभी लोग दुखी हों. आमीन.

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: हास्य, हास्य व्यंग्य, काकेश
 

हिन्दी के कई चिट्ठाकार अब तकनीकी रूप से कुशल हो गये हैं. अपने चिट्ठों में तरह तरह के विजेट और चित्र लगाने लगे हैं. यह एक सुखद परिवर्तन है. इधर कुछ चिट्ठाकारों ने अपने चिट्ठों में मधुर संगीत प्रदान करने वाला कोई विजेट भी लगाया है. जो चिट्ठा खुलते ही मधुर संगीत से आपका स्वागत करता है. स्वागत करना अच्छी बात है लेकिन मुझ जैसे कई लोगों को इससे परेशानी का सामना करना पड़ सकता है.

मैं कई चिट्ठे ऑफिस में पढ़ता हूँ. और जब कभी इस तरह के चिट्ठे पर जाता हूँ तो जो संगीत बजता है वो मेरे अलावा भी कई लोगों को सुनायी पड़ जाता है.तो तुर्ंत वह चिट्ठा बन्द कर देना पड़ता है. हर बार अपने स्पीकर को म्यूट करना संभव नहीं हो पाता. इससे कई बार अटपटा भी लगता है. इसलिये मेरा ऎसे संगीतप्रेमी चिट्ठाकारों से निवेदन है कि वो अपने स्वागतगीत को स्वत:चालित ना रखें. हमारे पास विकल्प हो कि यदि हम चाहें तो आपके स्वागत गीत का आनंद ले सकें.

आशा है आप लोग ध्यान देंगे.

चलिये अब आपने इतना पढ़ ही लिया है तो एक मुक्तिबोध की कविता भी पढ़ लें.ताकि आपको ये ना लगे की बेकार ही यहाँ आये.

नाश देवता

घोर धनुर्धर, बाण तुम्हारा सब प्राणों को पार करेगा,
तेरी    प्रत्यंचा  का  कंपन  सूनेपन  का  भार   हरेगा
हिमवत, जड़, निःस्पंद हृदय के अंधकार में जीवन-भय है
तेरे तीक्ष्ण बाणों की नोकों पर जीवन-संचार करेगा ।

तेरे क्रुद्ध वचन बाणों की गति से अंतर में उतरेंगे,
तेरे क्षुब्ध हृदय के शोले उर की पीड़ा में ठहरेंगे
कोपुत तेरा अधर-संस्फुरण उर में होगा जीवन-वेदन
रुष्ट दृगों की चमक बनेगी आत्म-ज्योति की किरण सचेतन ।

सभी उरों के अंधकार में एक तड़ित वेदना उठेगी,
तभी सृजन की बीज-वृद्धि हित जड़ावरण की महि फटेगी
शत-शत बाणों से घायल हो बढ़ा चलेगा जीवन-अंकुर
दंशन की चेतन किरणों के द्वारा काली अमा हटेगी ।

हे रहस्यमय, ध्वंस-महाप्रभु, जो जीवन के तेज सनातन,
तेरे अग्निकणों से जीवन, तीक्ष्ण बाण से नूतन सृजन
हम घुटने पर, नाश-देवता ! बैठ तुझे करते हैं वंदन
मेरे सर पर एक पैर रख नाप तीन जग तू असीम बन ।

— गजानन माधव मुक्तिबोध

 

कल एक महान विचारक की पुरानी डायरी हाथ लग गयी. यह सोच के डायरी खोली कि शायद उसमें किसी घोटाले की चर्चा होगी लेकिन उसमें तो महान चिंतन के अद्भुत सूत्र थे.प्रस्तुत हैं उसी डायरी के कुछ अंश..

दुखी होना मेरी मजबूरी ही नहीं मेरा पेशा भी है. मैं अक्सर अपनी सुविधानुसार दुखी हो जाता हूँ. दुखी होना मेरे लिये एक अदद सुख का टुकड़ा अपने नाम कर लेने का माध्यम है. आजकल जो ज्यादा दुखी है वो उतने ही अधिक सुख के टुकड़े नये नये फ्लैट्स के माध्यम से अपने नाम बुक करा रहा है. दुखी होना सुख-सुविधा नामक चिड़िया को संवेदना के ढेले से मार अपने बैक बैलेंस जैसे किसी पिजरे में कैद कर लेने में सहायक भी है. आप जितना ज्यादा सुखी हों आपको दुखी होने के उतने ही ज्यादा अवसर भी मिलेंगे और कारण भी. हर नया दुख आपके लिये सुख के नये द्वार खोलेगा.

ये अच्छा समय है जब आप किसी भी स्थिति , परिस्थिति , विषय , घटना पर दुखी हो सकते हैं. आप अच्छी तरह से अंग्रेजी बोल सकते हों तो आप हिन्दी की दशा-दिशा पर आंसू बहा सकते हैं.अंग्रेजी में भाषण देके हिन्दी के प्रति अपने प्रेम का इज़हार कर सकते हैं. अपनी खराब हिन्दी को अपनी व्यवसायिक मजबूरी की आड़ में छिपा सकते हैं. अंग्रेजी के शब्दों को अपनी बोलचाल में शामिल कर आप अपनी विद्वता का ढोल पिटवा कर अपने हिन्दी दुख का प्रदर्शन कर सकते हैं.जितना दुख आप प्रदर्शित करेंगे उतना ही हिन्दी सेवा का मेवा आप प्राप्त कर सकते हैं. पिछले कई सालों से लोग ऎसा कर रहे हैं और आने वाले कई सालों तक लोग ऎसा करते रहेंगे.

दुखी होना और सहानुभूति बटोरना एक ही क्रिया के दो अलग अलग रूप हैं. या यूँ कहें कि एक क्रिया है तो दूसरी प्रतिक्रिया. लेकिन दोनों का अस्तित्व बहुत महत्वपूर्ण है. आप का दुखी होने का अभिनय उतना ही सफल है जितनी सहानुभुति आप अर्जित कर पा रहे हैं. आप के दुखी होने का फल लोगों के सहानुभूति के प्रदर्शन में हैं. जितनी सहानुभूति आप अर्जित कर पायेंगे उतना ही खुद को सुख के करीब पायेंगे.

दुनिया का हर व्यक्ति दुखी होने की योग्यता रखता है. आप दलित हैं तो सवर्णो को गाली दे सकते हैं उनके व्यवहार पर दुखी हो सकते हैं. उनके पूर्वजों द्वारा आपके पूर्वजों पर किये गये अत्याचारों का बदला आप आरक्षण की तलवार से आने वाली कई पीढ़ियों तक ले सकते हैं.हर अवसर पर सवर्णों को लतियाना और अपने हर दुख का कारण सवर्णों द्वारा की गयी किसी गलती पर थोपना आपके व्यक्तित्व के दो प्रमुख लक्षण होने चाहिये. आप सवर्ण है तो आरक्षण के खिलाफ बोलकर दुखी हो सकते हैं.आप सहित आपके जितने भी अयोग्य रिश्तेदार सरकारी नौकरी प्राप्त करने में असफल रहे उन सबका का ठीकरा आप आरक्षण के सर पर फोड़ सकते हैं.आप आरक्षण के खिलाफ मोर्चा भी खोल सकते हैं,आत्मदाह की धमकी भी दे सकते हैं.

आप महिला हैं तो पुरुषों द्वारा किये जा रहे हर अच्छे और बुरे काम को कोसकर दुखी हो सकती हैं. आपकी हर परेशानी के मूल में कोई ना कोई पुरुष है. आप उस पुरुष को ढूंढ निकालिये और उसकी कारिस्तानियों पर दुखी होकर सहानुभूति की बेल पर चढ़ सुख सुविधा के नये नये फलों का स्वाद चखिये. आपके लड़की होने से आपको अतिरिक्त लाभ है.दुखी होने की कला हर औरत को विरासत में मिलती है. दुखी होना हर औरत का जन्मसिद्ध अधिकार है इसलिये आपके आंसू आपके आंखो के एकदम किनारे पर निवास करते हैं जिन्हे आप बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के अपनी इच्छानुसार जब चाहें तब निकाल सकती हैं. आधे से ज्यादा पुरुष आपके दुखी होने का अभिनय करने से पहले ही अपनी संवेदनाओं के रुमाल ले के सहानुभूति प्रदर्शन के लिये तैयार बैठे रहते हैं.कुछ अन्य ,जो अपने पुरुषत्व के अहम के कारण अपने मन को मार कर अपनी संवेदनाओं के प्रदर्शन में संकोच करते हैं, वो भी आपकी आंसुओं की अनवरत धारा को देखकर अपने रुमालों को अपनी जेबों में नहीं रख पायेंगे.आपके लिये बाजी जीतना आसान है लेकिन ध्यान रहे आप लक्ष्य केवल रुमाल हासिल करना नहीं है इसलिये भावनाओं के अतिरेक में ना बहें.अपनी नजर पुरुष की जेब के उस पर्स पर बनाये रखें जिसमें सुख-सुविधा रूपी गहने रखे गये हैं. यदि आप पुरुष है तब भी आप महिलाओं की स्थिति पर दुखी हो सकते हैं. घर में पत्नी को पीट कर हुई खुशी को महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों पर भाषण देकर मिटा सकते हैं.   

कल भी जारी रहेगा……….

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: हास्य, हास्य व्यंग्य, काकेश
 

धीरे धीरे ठंड बढ़ने लगी है. देश के खाये पिये लोग खुश हैं.वे ठंड का इंतजार करते हैं. ठंड उन्हे अच्छे कपड़े पहनने का अवसर देती है. ठंड में आपकी पाचन क्षमता बढ़ जाती है तो कुछ लोग इसी को और अधिक खाने का अवसर बना लेते हैं.वैसे खाने वाले लोग किसी भी मौसम में खाने का तरीका ढूंढ ही लेते हैं. जैसे पीने वाले लोग किसी भी अवसर पर पीने का बहाना ढूंढते हैं. खाने-पीने वाले लोग हर मौसम को एक दृष्टि से देखते हैं पर ठंड उन्हे अपनी दृष्टि को और व्यापक बनाने की प्रेरणा देती है. कुछ अपने बढ़े हुए वजन से इसी ठंड में निजात पाना चाहते हैं. ठंड बहुत अच्छी है जो हमें इस तरह के अवसर देती है.

धीरे धीरे ठंड बढ़ने लगी है.वो लोग जो अभी तक किसी भी फुटपाथ,किसी भी डिवाइडर या किसी भी पुल के नीचे चैन से सो जाते थे उन्हे अब नया घर तलाशना होगा. वो अधनंगे लोग जो किसी तरह से गुदड़ियों में अपनी इज्जत बचाये घूम रहे हैं उन्हे अब इज्जत के साथ साथ खुद को भी बचाना होगा. ठंड उनके शरीर पर अब फिर से वार करेगी वैसे ही जैसे पिछ्ले कई सालों से कर रही है.वैसे ही जैसे कुछ दिनों पहले तक सावन कर रहा था , बारिश कर रही थी , बाढ कर रही थी. उन्हे फिर से रात भर जागना होगा,सुबह कोई काम तलाशने से पहले.

धीरे धीरे ठंड बढ़ने लगी है. बजार में कितनी नई नई तरह के गरम कपड़े आये हैं. नये तरह के कोट , जैकेट , उनी स्वेटर , मफ़लर , टोपी और भी ना जाने क्या क्या. लोग ठंड के लिये अभी से खरीदकारी करने निकल चुके हैं. अपने क्रेडिट कार्ड का उपयोग कर आज वो कोई इम्पोर्टेड जैकेट लेने की सोच रहे हैं.टोपी से सर को ढंककर,मफ़लर से कानों को ढंककर वो जब ऑफिस को निकलेंगे तो कितना मजा आयेगा.पिछ्ले साल उनको इस तरह देख कर मुन्नू कितने तो प्यार से बोला था ‘पापा आप तो बिल्कुल उल्लू लग रहे हैं’ और वो कितने खुश हुए थे, असली मजा तो ठंड का ही है. देश प्रगति पर है. गीजर के गरम पानी से नहाने का सुख तो आप ठंड में ही उठा सकते हैं.

धीरे धीरे ठंड बढ़ने लगी है.कुछ लोगों की चिंताऎं भी इसके साथ साथ बढ़ने लगी है. अपने चार महीने के बच्चे को इस ठंड से बचाने के लिये वो अधनंगी औरत चिंतित है. वो दो साल पहले की घटना को दुहराना नहीं चाहती जिसमें उसका एक बच्चा इसी तरह की ठंड की भेंट चढ़ गया था. वो कपड़े इकट्टा कर रही है.कुछ पुरानी फटी धोतियां शायद उसकी मालकिन दे देगी. वो इस बार मालकिन को बोलेगी कि कोई पुराना ऊनी कपड़ा भी दे दे.वो ठंड के बारे में सोच कर दुखी हो रही है. सुबह सुबह ठंडे पानी से रात के जूठे बर्तन बर्फ जैसे ठंडे पानी से जब वह मांजती है तो पूरा शरीर सिहर जाता है. हाथ अकड़ जाते हैं. लेकिन उसे मालकिन के उठने से पहले बर्तन मांजने होंगे नहीं तो कहीं मालकिन नाराज होकर हमेशा की तरह चिल्लाने लगेंगी तो फिर उसे ऊनी कपड़े नहीं देंगी.

धीरे धीरे ठंड बढ़ने लगी है.गाजर का हलवा,गजक,मूंगफली आहा ये सब ठंड के ही तो तोहफे हैं.गुनगुनी रजाई के अन्दर बैठकर प्लाज्मा टी.वी पर पिक्चर देखना कितना सुखद है. जिनके शरीर पर स्वेटर है,जेब में पैसे है, खाने का पर्याप्त स्कोप है उसे ठंड से खूबसूरत कोई मौसम नहीं लगता. वह इस मौसम में कविता भी करता है. बिरयानी और व्हिस्की की पर्याप्त व्यवस्था होने पर इस ठंड के ऊपर किसी भी कॉंफ्रेंस में भाषण भी दे सकता है.

धीरे धीरे ठंड बढ़ने लगी है.हमेशा की तरह रात सिर्फ सुबह उगने वाले सूरज की आशा में काटी जायेगी.वही सूरज, जिसे गरमी में जी भर कोसा करते थे ,अभी एकमात्र सहारा है.घुटनों को छाती से चिपकाकर बैठने से ठंड को कम करने का प्रयास किया जायेगा.एक अदद अलाव जलाने के लिये सूखी लकड़ियों की तलाश की जायेगी. कड़कड़ाती ठंड का किटकिटाते दांतो और बंधी हुई मुट्ठी के जरिये ही सामना करना होगा. वो प्रार्थना कर रहे हैं कि काश इस बार फिर चुनाव हो जाते. दो साल पहले जब चुनाव हुए थे किसी नेता ने कंबल बांटे थे.वो कंबल कितने अच्छे थे वो नेता कितना अच्छा था. सुना है वो जीत गया इसीलिये तब से दिखायी नहीं दिया. खैर चुनाव हो जायें तो वो फिर आयेगा और कंबल बांटेगा.

धीरे धीरे ठंड बढ़ने लगी है.एक ही मौसम कितने रूप दिखाता है ना. दोष किसका है क्या मौसम का ?

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: हास्य व्यंग्य, काकेश
 

बिस्तरा    है   न   चारपाई    है,
जिन्दगी   खूब  हमने  पायी   है।

कल अंधेरे में जिसने सर काटा,
नाम  मत  लो  हमारा   भाई है।

ठोकरें  दर-ब-दर  की थी हम थे,
कम नहीं हमने मुँह की खाई है।

कब  तलक  तीर  वे  नहीं   छूते,
अब  इसी  बात  पर   लड़ाई   है।

आदमी    जी  रहा  है  मरने को
सबसे    ऊपर    यही  सचाई है।

कच्चे ही हो अभी त्रिलोचन तुम
धुन कहाँ वह सँभल के आई है।

– त्रिलोचन ( “गुलाब और बुलबुल” से )

कुछ सॉनेट ‘दिगंत’ से

सिपाही और तमाशबीन

घायल हो कर गिरा सिपाही और कराहा।
         एक तमाशबीन दौड़ा आया। फिर बोला,
        ‘‘योद्धा होकर तुम कराहते हो, यह चोला
एक सिपाही का है जिस को सभी सराहा

करते हैं, जिस की अभिलाषा करते हैं, जो
         दुर्लभ है, तुम आज निराशावादी-जैसा
        निन्द्य आचरण करते हो।’’ कहना सुन ऐसा
उधर सिपाही ने देखा जिस ओर खड़ा हो

उपदेशक बोला था। उन ओठों को चाटा
सूख गए थे जो, स्वर निकला, ‘‘प्यास !’’ खड़ा ही
    सुनने वाला रहा। सिपाही पड़ा पड़ा ही
करवट हुआ, रक्त अपना पी कुछ दुख काटा—
        ‘‘जाओ चले, मूर्ख दुनिया में बहुत पड़े हैं।
         उन्हें सिखाओ हम तो अपनी जगह अड़े हैं।’’

सॉनेट का पथ

इधर त्रिलोचन सॉनेट के ही पथ पर दौड़ा;
        सॉनेट, सॉनेट, सॉनेट, सॉनेट; क्या कर डाला
        यह उस ने भी अजब तमाशा। मन की माला
गले डाल ली। इस सॉनेट का रस्ता चौड़ा

अधिक नहीं है, कसे कसाए भाव अनूठे
        ऐसे आएँ जैसे क़िला आगरा में जो
        नग है, दिखलाता है पूरे ताजमहल को;
गेय रहे, एकान्विति हो। उस ने तो झूठे
ठाटबाट बाँधे हैं। चीज़ किराए की है।
    स्पेंसर, सिडनी, शेक्सपियर, मिल्टन की वाणी
    वर्ड्सवर्थ, कीट्स की अनवरत प्रिय कल्याणी
स्वर-धारा है, उस ने नई चीज़ क्या दी है।

    सॉनेट से मजाक़ भी उसने खूब किया है,
    जहाँ तहाँ कुछ रंग व्यंग्य का छिड़क दिया है।
 

प्यार

जब भौंरे ने आकर पहले पहले गाया
        कली मौन थी। नहीं जानती थी वह भाषा
        इस दुनिया की, कैसी होती है अभिलाषा
इस से भी अनजान पड़ी थी। तो भी आया

जीवन का यह अतिथि, ज्ञान का सहज सलोना
        शिशु, जिस को दुनिया में प्यार कहा जाता है,
        स्वाभिमान-मानवता का पाया जाता है
जिस से नाता। उस में कुछ ऐसा है टोना

जिस से यह सारी दुनिया फिर राई रत्ती
        और दिखाई देने लगती है। क्या जाने
        कौन राग छाती से लगता है अकुलाने,
इंद्रधनुष सी लहराती है पत्ती पत्ती।

        बिना बुलाए जो आता है प्यार वही है।
        प्राणों की धारा उस में चुपचाप बही है।

 

त्रिलोचन श्रंखला के कुछ और लेख…

1. त्रयी के त्रिलोचन की कवितायें.

2. चम्पा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती:त्रिलोचन

 

कवि त्रिलोचन बीमार हैं. उनके बारे में ब्लॉग जगत में लिखा भी जा रहा हैं. कुछ दिनों पहले मैने एक पोस्ट लिखी थी जिसमें त्रिलोचन की कुछ कविताऎं प्रस्तुत की थी. कल अतुल ने उसी पोस्ट पर टिप्पणी कर त्रिलोचन के बारे में फणीश्वर नाथ रेणु के संस्मरण के बारे में बताया.उसे पढ़ा और फिर त्रिलोचन की कविताऎं जैसे नजर के सामने घूम गयीं.

जब से पहलू में त्रिलोचन की कविताओं के बारे में पढ़ा था तब से ही ‘नगई महरा ‘ और ‘चंपा काले-काले अक्षर नहीं चीन्हती’ कविताऎं दिमाग में थी.फिर चन्द्रभूषण जी ने  इन कविताओं का अनुरोध भी कर दिया था.

अब अगर मौका मिले तो ‘चंपा काले-काले अक्षर नहीं चीन्हती’ और ‘नगई महरा’ की मुंहदिखाई भी करा दो…

बोधी भाई का अनुरोध था

हो सके तो “बिस्तरा है न चारपाई है” भी छापें ।

तो कल शाम को जब मन त्रिलोचन-मय था तो ये तीनों कविताऎं ढूंढने का खयाल आया…और घर में ही तीनों कविताऎं मिल गयी.. तो लीजिये आज प्रस्तुत है ‘चंपा काले-काले अक्षर नहीं चीन्हती’ बांकी दो कविताऎं भी जल्दी ही लाता हूँ.

चम्पा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती
मैं जब पढ़ने लगता हूँ वह आ जाती है
खड़ी खड़ी चुपचाप सुना करती है
उसे बड़ा अचरज होता है:
इन काले चिन्हों से कैसे ये सब स्वर
निकला करते हैं.

चम्पा सुन्दर की लड़की है
सुन्दर ग्वाला है : गाय भैसे रखता है
चम्पा चौपायों को लेकर
चरवाही करने जाती है

चम्पा अच्छी है
         चंचल है
न ट ख ट भी है
कभी कभी ऊधम करेती है
कभी कभी वह कलम चुरा देती है
जैसे तैसे उसे ढूंढ कर जब लाता हूँ
पाता हूँ – अब कागज गायब
परेशान फिर हो जाता हूँ

चम्पा कहती है:
तुम कागद ही गोदा करते हो दिन भर
क्या यह काम बहुत अच्छा है
यह सुनकर मैं हँस देता हूँ
फिर चम्पा चुप हो जाती है

उस दिन चम्पा आई , मैने कहा कि
चम्पा, तुम भी पढ़ लो
हारे गाढ़े काम सरेगा
गांधी बाबा की इच्छा है -
सब जन पढ़ना लिखना सीखें
चम्पा ने यह कहा कि
मैं तो नहीं पढ़ुंगी
तुम तो कहते थे गांधी बाबा अच्छे हैं
वे पढ़ने लिखने की कैसे बात कहेंगे
मैं तो नहीं पढ़ुंगी

मैने कहा चम्पा, पढ़ लेना अच्छा है
ब्याह तुम्हारा होगा , तुम गौने जाओगी,
कुछ दिन बालम सँग साथ रह चला जायेगा जब कलकत्ता
बड़ी दूर है वह कलकत्ता
कैसे उसे सँदेसा दोगी
कैसे उसके पत्र पढ़ोगी
चम्पा पढ़ लेना अच्छा है!

चम्पा बोली : तुम कितने झूठे हो , देखा ,
हाय राम , तुम पढ़-लिख कर इतने झूठे हो
मैं तो ब्याह कभी न करुंगी
और कहीं जो ब्याह हो गया
तो मैं अपने बालम को संग साथ रखूंगी
कलकत्ता में कभी न जाने दुंगी
कलकत्ता पर बजर गिरे।

– त्रिलोचन ( उनकी पुस्तक धरती से जो 1945 में प्रकाशित हुई थी)

 

[ री-कैप : "खोया पानी" यह है उस व्यंग्य उपन्यास का नाम जो पाकिस्तान के मशहूर व्यंग्यकार मुश्ताक अहमद यूसुफी की किताब आबे-गुम का हिन्दी अनुवाद है. इस पुस्तक के अनुवाद कर्ता है 'लफ़्ज' पत्रिका के संपादक श्री 'तुफैल चतुर्वेदी' जी. पुस्तक क्या है हास्य का पटाख़ा है और इतना महीन व्य़ंग्य की आपके समझ आ जाये तो मुँह से सिर्फ वाह वाह ही निकलती है. इस उपन्यास की टैग लाइन है "एक अद्भुत व्यंग्य उपन्यास" जो इस उपन्यास पर सटीक बैठती है.]

khoya_pani_front_cover पिछ्ले भाग में आपको बताया था कि यह उपन्यास ऎसे अनगिनत जुमलों से भरा है जो आपको सोचने पर बाध्य कर देते हैं. आइये कुछ और पढ़ें.

एक मजेदार पात्र हैं किबला.देखिये कैसे हैं.

किबला मुंहफट, बदतमीज़ मशहूर ही नहीं थे, थे भी। वो दिल से, बल्कि बेदिली से भी, किसी की इज़्जत नहीं करते थे। दूसरे को ज़लील करने का कोई-न-कोई कारण ज़ुरूर निकाल लेते। मिसाल के तौर पर अगर किसी की उम्र उनसे एक महीना भी कम हो तो उसे लौंडा कहते और अगर एक साल ज़ियादा तो बुढ़ऊ।

वो हमेशा मेरे कुछ ना कुछ लगते थे।जिस जमाने में मेरे ससुर नहीं बने थे तो फूफा हुआ करते थे और फूफा बनने से पहले मैं उन्हें चचा हुजूर कहा करता था। इससे पहले भी वो मेरे कुछ और जुरूर लगते होंगे, मगर उस वक़्त मैंने बोलना शुरु नहीं किया था। हमारे यहाँ मुरादाबाद और कानपुर में रिश्ते-नाते उबली हुई सिवइयों की तरह उलझे और पेच-दर-पेच गुंथे हुए होते हैं।

किबला के बारे में बताते हुए वह आगे कहते हैं.

मिज़ाज,ज़बान और हाथ, किसी पर काबू न था, हमेशा गुस्से से कांपते रहते। इसलिए ईंट,पत्थर, लाठी, गोली, गाली किसी का भी निशाना ठीक नहीं लगता था 

एक बार किबला के मकान की जांच करने के लिये जब अधिकारी आता है तो देखिये किबला उससे कैसे निपटते हैं.

अफसर ने कहा. ‘बड़े मियां सुना नहीं? एलॉटमेट आर्डर दिखाओ।’ किबला ने बड़ी शांति से अपने बायें पैर का सलीम-शाही जूता उतारा और उतने ही आराम से कि उसे, खयाल तक न हुआ कि क्या करने वाले हैं, उसके मुंह पर मारते हुए बोले ‘यह है यारों का एलॉटमेंट आर्डर! कार्बन कॉपी भी देखेंगे?’ उसने अब तक, यानी ज़लील होने तक, रिश्वत-ही-रिश्वत खायी थी, जूते नहीं खाये थे। फ़िर कभी इधर का रुख नहीं किया।

उनकी कहानी ‘हवेली’ का कथानक कोई 60-70 साल पहले का है. उस समय की परिस्थिति का वर्णन कहते हुए युसूफ़ी साहब कहते हैं.

जहां तक हमें याद पड़ता है, उन दिनों कुर्सी सिर्फ दो अवसरों पर निकाली जाती थी। एक तो जब हकीम, वैद्य,होम्योपैथ, पीर, फ़क़ीर और सयानों से मायूस हो कर डाक्टर को घर बुलाया जाता था। उस पर बैठ कर वो जगह-जगह स्टेथेस्कोप लगा कर देखता कि मरीज़ और मौत के बीच जो खाई थी, उसे इन महानुभावों ने अपनी दवाओं और ताबीज़, गंडों से किस हद तक पाटा है। उस समय का दस्तूर था कि जिस घर में मुसम्मी या महीन लकड़ी की पिटारी में रुई में रखे हुए पांच अंगूर आयें या सोला-हैट पहने डाक्टर और उसके आगे-आगे हटो-बचो करता हुआ तीमारदार उसका चमड़े का बैग उठाये आये तो पड़ोस वाले जल्दी-जल्दी खाना खा कर खुद को शोक व्यक्त करने और कन्धा देने के लिये तैयार कर लेते थे।


यह भी देखने में आया है कि कई बार ख़ानदान के दूर-पास के बुज़ुर्ग छठी-सातवीं क्लास तक फ़ेल होने वाले लड़कों की, संबंधें की निकटता व क्षमता के हिसाब से अपने निजी हाथ से पिटाई भी करते थे, लेकिन जब लड़का हाथ-पैर निकालने लगे और इतना सयाना हो जाये कि दो आवाज़ों में रोने लगे यानी तेरह, चौदह साल का हो जाये तो फिर उसे थप्पड़ नहीं मारते थे, इसलिये कि अपने ही हाथ में चोट आने और पहुंचा उतरने का अन्देशा रहता था, केवल चीख-पुकार, डांट से काम निकालते थे। हर बुज़ुर्ग उसकी सर्टिफाइड नालायकी की अपने झूठे शैक्षिक रिकार्ड से तुलना करता और नई पौध में अपनी दृष्टि की सीमा तक कमी और गिरावट के आसार देख कर इस सुखद निर्णय पर पहुंचता कि अभी दुनिया को उस जैसे बुज़ुर्ग की ज़ुरूरत है। भला वो ऐसी नालायक नस्ल को दुनिया का चार्ज देकर इतनी जल्दी कैसे विदा ले सकता है।

कुछ और मोती चुनिये इस किताब के.

विज्ञापन में मौलवी सैय्यद महुम्मद मुज्जफर ने जो कि स्कूल के संस्थापक, व्यवस्थापक, संरक्षक, कोषाध्यक्ष और ग़बनकर्ता का नाम था, सूचित किया था कि उम्मीदवार को लिखित आवेदन करने की आवश्यकता नहीं, अपनी डिग्री और नेकचलनी के दस्तावेशी सुबूत के साथ सुब्ह आठ बजे स्वयं पेश हो। बिशारत की समझ में न आया कि नेकचलनी का क्या सुबूत हो सकता है, बदचलनी का अलबत्ता हो सकता है। उदाहरण के लिये चालान, मुचलका, गिरफ्तारी-वारंट, सत्ता के आदेश की नक़्ल या थाने में दस-नम्बरी बदमाशों की लिस्ट। पांच मिनट में आदमी बदचलनी तो कर सकता है नेकचलनी का सुबूत नहीं दे सकता।

अपनी ग़ज़लों और शेरों का चयन.उन्होंने दिल पर पत्थर बल्कि पहाड़ रख कर किया था। शेर कितना ही घटिया और कमज़ोर क्यों न हो उसे स्वयं काटना और रद्द करना उतना ही मुश्किल है जितना अपनी औलाद को बदसूरत कहना या जंबूर से खुद अपना हिलता हुआ दांत उखाड़ना। ग़ालिब तक से ये पराक्रम न हो सका।

कभी अपने बुज़ुर्ग या बॉस या अपने से अधिक बदमाश आदमी को सही रास्ता बताने की कोशिश न करना।उन्हें ग़लत राह पर देखो तो तीन ज्ञानी बंदरों की तरह अंधे बहरे और गूंगे बन जाओ!

युसूफी साहब जब किसी स्थिति का वर्णन करते हैं तो उसमें सहज ही हास्य आ जाता है. उनके वर्णन इतने मजेदार हैं कि पूरा का पूरा दृश्य आपके आंखों के सामने से गुजर जाता है.देखिये उनका कलात्मक वर्णन. बिशारत जब इंटरव्यू के लिये प्रतीक्षा कर रहे थे तो देखिये क्या होता है…

नीम की छांव में एक उम्मीदवार जो खुद को इलाहाबाद का एल.टी. बताता था, उकडूं बैठा तिनके से रेत पर 20 का यंत्र बना रहा था। जिसके ख़ानों की संख्यायें किसी तरप़फ से भी गिनी जाये, जोड़ 20 आता था। स्त्री-वशीकरण तथा अफसर को प्रभावित करने के लिये यह यंत्र सर्वोत्तम समझा जाता था। कान के सवालिया निशान `?´ के अन्दर जो एक और सवालिया निशान होता है, उन दोनों के बीच उसने खस के इत्र का फाया रखा था। ज़ुल्फे-बंगाल हेयर ऑयल से की हुई सिंचाई के रेले, जो सर की तात्कालिक आवश्यकता से कहीं ज़ियादा थे, माथे पर बह रहे थे। दूसरा उम्मीदवार जो कालपी से आया था, खुद को अलीगढ़ का बीएड –बी.टी. बताता था। धूप का चश्मा तो समझ में आता था, मगर उसने गले में सिल्क का लाल स्कार्फ़ भी बांध रखा था जिसका इस चिलचिलाती धूप में यही उद्देश्य मालूम पड़ता था कि चेहरे से टपका हुआ पसीना सुरक्षित कर ले। अगर उसका वजन 100 पौंड कम होता तो वो जो सूट पहन कर आया था, बिल्कुल फ़िट आता। क़मीज के नीचे के दो बटन तथा पैंट के ऊपर के दो बटन खुले हुए थे सिर्फ़ सोलर हैट सही साइज़ का था।

उसी तरह जब उन्हे उपहार में चार तरबूज दिये जाते हैं तो ….

उतरती गर्मियों में चार तरबूज़ फटी बोरी में डलवा कर साथ कर दिये। हर क़दम पर निकल-निकल पड़ते थे। एक को पकड़ते तो दूसरा लुढ़क कर किसी और राह पर बदचलन हो जाता। जब बारी-बारी सब तड़क गये तो आधे रास्ते में ही बोरी एक प्याऊ के पास पटक कर चले आये। उनके बहते रस को एक प्यासा सांड, जो पंडित जुगल किशोर ने अपने पिताजी की याद में छोड़ा था, तब तक चाव और तल्लीनता से चाटता रहा जब तक एक अल्हड़ बछिया ने उसका ध्यान उत्तम से सर्वोत्तम की ओर भटका न दिया।

शायरों को लपेटने की इस किताब में विशेष व्यवस्था की गयी है.देखिये.

शेरो-शायरी या नॉविलों में देहाती ज़िन्दगी को रोमेंटिसाइज़ करके उसकी निश्छलता, सादगी, सब्र और प्राकृतिक सौन्दर्य पर सर धुनना और धुनवाना और बात है लेकिन सचमुच किसी किसान के आधे पक्के या मिट्टी गारे के घर में ठहरना किसी शहरी इन्टेलेक्चुअल के बस का रोग नहीं। किसान से मिलने से पहले उसके ढोर-डंगर, घी के फ़िंगर प्रिन्ट वाले धातु के गिलास, जिन हाथों से उपले पाथे उन्हीं हाथों से पकाई हुई रोटी, हल, दरांती, मिट्टी से खुरदुराये हुए हाथ, बातों में प्यार और प्याज़ की महक, मक्खन पिलायी हुई मूंछें सबसे एक ही वक़्त में गले मिलना पड़ता है।

फरमाया कि शायरों से यतीमखाने और स्कूल के चंदे के लिये अपील जरुर कीजियेगा। उन्हे शेर सुनाने में जरा भी शर्म नही आती, तो आपको इस पुण्यकार्य में काहे की शर्म।

कुछ और प्यास बुझा लें.

जो व्यक्ति हाथी की लगाम की तलाश करता रह जाये, वो कभी उस पर चढ़ नहीं सकता। जाम उसका है, जो बढ़कर खुद साकी को जाम-सुराही समेत उठा ले।

विदेश घूमने और देश से दूर रहने का एक लाभ ये देखा कि देश और देशवासियों से प्यार न केवल बढ़ जाता है, बल्कि अहैतुक हो जाता है-

गाली, गिनती और गंदा लतीफा तो अपनी मादरीजबान में ही मजा देता है।

पाकिस्तान की अफवाहों में सबसे बड़ी खऱाबी ये है कि सच निकलती हैं।

पाकिस्तान में जो लड़के पढ़ाई में फिसड्डी होते हैं, वो फौज में चले जाते हैं और जो फौज के लिए मेडिकली अनफिट होते हैं, वो कालिजों में प्रोफेसर बन जाते हैं।

हमारा ख्याल है कि इक्के का आविष्कार किसी घोड़े ने किया होगा, इसीलिये इसके डिजाइन में इस बात का ध्यान रखा गया है कि घोड़े से अधिक सवारी को परेशानी उठानी पड़े।

वस्तुत रास्ते नहीं बदलते इंसान बदल जाता है। सड़क कहीं नहीं जाती वो तो वहीं की वहीं रहती है मुसाफिर खुद कहां से कहां पहुंच जाता है। राह कभी गुम नहीं होती राह चलने वाले गुम हो जाते हैं।

कुछ और जुम्लों और यूसूफी साहब के बारे में जानने के लिये पिछ्ली पोस्ट देखें. यदि आप पुस्तक मगांना चाहें तो नीचे दिये पते से मंगा लें. पुस्तक की खूबियों को देखते हुए पुस्तक का मूल्य काफी कम है. मंगाते समय इस पोस्ट का ज़िक्र भी कर दें तो क्या पता ‘तुफ़ैल’ साहब कुछ विशेष डिस्काउंट की व्यवस्था कर दें यदि ना भी करें तब भी किताब खरीद कर पढ़ने योग्य तो है ही. 

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किताब डाक से मंगाने का पता:

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

 

 

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