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	<title>Comments on: त्रयी के त्रिलोचन की कवितायें.</title>
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	<description>Kakesh's KudKud</description>
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		<title>By: Atul</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/poems-of-trilochan/comment-page-1/#comment-856</link>
		<dc:creator>Atul</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 14 Oct 2007 12:17:36 +0000</pubDate>
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		<description>कृपया मैत्री पर त्रिलोचन के बारे में पढ़ें.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>कृपया मैत्री पर त्रिलोचन के बारे में पढ़ें.</p>
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		<title>By: समीर लाल</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/poems-of-trilochan/comment-page-1/#comment-465</link>
		<dc:creator>समीर लाल</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 19 Jul 2007 18:21:56 +0000</pubDate>
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		<description>सॉनेट क्या होते हैं पहली बार जाना. रचनायें पढ़कर बहुत अच्छा लगा और साथ ही त्रिलोचन जी स्वास्थय के बारे जान दुख हुआ. ईष्ट देव जी विचारों को साधुवाद. मेरे लायक कोई सेवा हो, तो सूचित किया जाये.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>सॉनेट क्या होते हैं पहली बार जाना. रचनायें पढ़कर बहुत अच्छा लगा और साथ ही त्रिलोचन जी स्वास्थय के बारे जान दुख हुआ. ईष्ट देव जी विचारों को साधुवाद. मेरे लायक कोई सेवा हो, तो सूचित किया जाये.</p>
]]></content:encoded>
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		<title>By: अनूप शुक्ल</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/poems-of-trilochan/comment-page-1/#comment-464</link>
		<dc:creator>अनूप शुक्ल</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 19 Jul 2007 17:52:51 +0000</pubDate>
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		<description>काकेशजी,मेरी जानकारी के अनुसार त्रिलोचनजी ने एक लाख से ऊपर सानेट लिखे हैं। उनकी ज्यादा से ज्यादा रचनायें नेट पर लाने के लिये कोशिश करनी चाहिये।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>काकेशजी,मेरी जानकारी के अनुसार त्रिलोचनजी ने एक लाख से ऊपर सानेट लिखे हैं। उनकी ज्यादा से ज्यादा रचनायें नेट पर लाने के लिये कोशिश करनी चाहिये।</p>
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	<item>
		<title>By: Isht Deo Sankrityaayan</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/poems-of-trilochan/comment-page-1/#comment-463</link>
		<dc:creator>Isht Deo Sankrityaayan</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 19 Jul 2007 13:09:10 +0000</pubDate>
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		<description>त्रिलोचन ने गजलें और चतुश्पदियाँ भी ख़ूब लिखी हैं. हो सके तो कुछ उनमें से भी लाएं .रही बात  उपेक्षा की तो हर ईमानदार आदमी के साथ वह करना हिंदी वालों की फितरत भी है और मजबूरी भी.  उस सिलसिले में हम-आप सबसे पहला काम तो यही कर सकते हैं कि ब्लॉगों पर उनके बारे में ज्यादा से ज्यादा लिख कर और उस पर टिप्पणियां कर के हिंदी आलोचना को उसकी औकात बता दें. कबीर, दादू, रैदास या तुलसी को हम किसी आलोचक के मार्फ़त नहीं, जन के मार्फ़त जानते हैं. रही बात पुरस्कार-सम्मान की, तो  इनकी अब न तो त्रिलोचन को कोई जरूरत है और न कोई इनका महत्त्व ही. क्या ही बेहतर हो हम लोग हरिद्वार में चलकर या कहीँ त्रिलोचन के साहित्य पर एक छोटा सा सादा सा आयोजन करें और तथाकथित हिंदी वालों को (जो वे हैं नहीं) उनकी औकात बता दें.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>त्रिलोचन ने गजलें और चतुश्पदियाँ भी ख़ूब लिखी हैं. हो सके तो कुछ उनमें से भी लाएं .रही बात  उपेक्षा की तो हर ईमानदार आदमी के साथ वह करना हिंदी वालों की फितरत भी है और मजबूरी भी.  उस सिलसिले में हम-आप सबसे पहला काम तो यही कर सकते हैं कि ब्लॉगों पर उनके बारे में ज्यादा से ज्यादा लिख कर और उस पर टिप्पणियां कर के हिंदी आलोचना को उसकी औकात बता दें. कबीर, दादू, रैदास या तुलसी को हम किसी आलोचक के मार्फ़त नहीं, जन के मार्फ़त जानते हैं. रही बात पुरस्कार-सम्मान की, तो  इनकी अब न तो त्रिलोचन को कोई जरूरत है और न कोई इनका महत्त्व ही. क्या ही बेहतर हो हम लोग हरिद्वार में चलकर या कहीँ त्रिलोचन के साहित्य पर एक छोटा सा सादा सा आयोजन करें और तथाकथित हिंदी वालों को (जो वे हैं नहीं) उनकी औकात बता दें.</p>
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		<title>By: बोधिसत्व</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/poems-of-trilochan/comment-page-1/#comment-454</link>
		<dc:creator>बोधिसत्व</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 19 Jul 2007 12:06:50 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://kakesh.com/2007/07/19/poems-of-trilochan/#comment-454</guid>
		<description>आलोक जी
त्रिलोचन जी को लेकर मेरी और अभय की बात हुई है । उनके लिए कुछ भी करना हमारे लिए संतोष की बात होगी । पर सवाल यह है कि किया क्या जाए।
जहाँ तक मेरी जानकारी है उन्हे आर्थिक कष्ट नहीं है। पर इस बात को दरयाफ्त कैसे करें । आप लोग और चंदू भाई दिल्ली में हैं । वहाँ से त्रिलोचन जी की ताजा यथार्थ स्थिति का पता लगा कर हमें सूचित करें। जो भी करना होगा हम वह करने के लिए तैयार हैं ।
त्रिलोचन जी के साथ हिंदी के लोग उपेक्षा का बरताव कर रहे हैं । जो कहीं अधिक मारक है। उनकी अवस्था 90 के पार है । तय है कि आज उन्हे सहारे की आवश्यकता होगी। उनकी बूढ़ी आँखे हिंदी के तमाम सपूतों को खोजती होंगी पर । मैं कह नहीं सकता कि कौन हिंदी वाला इस बीच गया हो उनसे मिलने । हिंदी जगत ने उनकी तरफ से आँखें फेर ली हैं । यह उनके लिए कहीं अधिक बड़ा आघात है । उनकी इसी उपेक्षा से आहत होकर मैंने अपनी कविता लिखी थी । खैर ।
आने वाले अगस्त में वे 90 के हो रहे हैं पर मुझे नहीं लगता कि उन पर हिंदी पत्र-पत्रिकाओं में कुछ खास छपना-छपाना है। यह हिंदी का पुराना चरित्र है । इसका क्या करें । हम कोशिश कर के त्रिलोचन जी की अधिकाधिक रचनाएं ब्लॉग पर डालें । उन पर गंभीर चर्चा करें तो भी कुछ बात बन सकती है।
आप पता कर सकें तो अच्छा होगा। जो करना होगा हम पीछे नहीं हटेंगे।
आप का
बोधिसत्व</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आलोक जी<br />
त्रिलोचन जी को लेकर मेरी और अभय की बात हुई है । उनके लिए कुछ भी करना हमारे लिए संतोष की बात होगी । पर सवाल यह है कि किया क्या जाए।<br />
जहाँ तक मेरी जानकारी है उन्हे आर्थिक कष्ट नहीं है। पर इस बात को दरयाफ्त कैसे करें । आप लोग और चंदू भाई दिल्ली में हैं । वहाँ से त्रिलोचन जी की ताजा यथार्थ स्थिति का पता लगा कर हमें सूचित करें। जो भी करना होगा हम वह करने के लिए तैयार हैं ।<br />
त्रिलोचन जी के साथ हिंदी के लोग उपेक्षा का बरताव कर रहे हैं । जो कहीं अधिक मारक है। उनकी अवस्था 90 के पार है । तय है कि आज उन्हे सहारे की आवश्यकता होगी। उनकी बूढ़ी आँखे हिंदी के तमाम सपूतों को खोजती होंगी पर । मैं कह नहीं सकता कि कौन हिंदी वाला इस बीच गया हो उनसे मिलने । हिंदी जगत ने उनकी तरफ से आँखें फेर ली हैं । यह उनके लिए कहीं अधिक बड़ा आघात है । उनकी इसी उपेक्षा से आहत होकर मैंने अपनी कविता लिखी थी । खैर ।<br />
आने वाले अगस्त में वे 90 के हो रहे हैं पर मुझे नहीं लगता कि उन पर हिंदी पत्र-पत्रिकाओं में कुछ खास छपना-छपाना है। यह हिंदी का पुराना चरित्र है । इसका क्या करें । हम कोशिश कर के त्रिलोचन जी की अधिकाधिक रचनाएं ब्लॉग पर डालें । उन पर गंभीर चर्चा करें तो भी कुछ बात बन सकती है।<br />
आप पता कर सकें तो अच्छा होगा। जो करना होगा हम पीछे नहीं हटेंगे।<br />
आप का<br />
बोधिसत्व</p>
]]></content:encoded>
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	<item>
		<title>By: प्रियंकर</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/poems-of-trilochan/comment-page-1/#comment-455</link>
		<dc:creator>प्रियंकर</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 19 Jul 2007 11:42:30 +0000</pubDate>
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		<description>भाई काकेश!
आपने बहुत ज़रूरी काम किया है . आभारी हूं .</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>भाई काकेश!<br />
आपने बहुत ज़रूरी काम किया है . आभारी हूं .</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: paramjitbali</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/poems-of-trilochan/comment-page-1/#comment-459</link>
		<dc:creator>paramjitbali</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 19 Jul 2007 09:43:19 +0000</pubDate>
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		<description>इन अनमोल रचनाओं को पढ़ कर आज अपने पूछे गए प्रश्न से मै भी बहुत शर्मिंदा हूँ। मै सचमुच नही जानता था कि मै एक इतने बड़े महान और गहरी सोच वाले रचनाकार से अनजान रहा। अब उनका परिचय और रचनाओं को पढ़कर मन को सात्वंना मिल रही है। आप सब का बहुत धन्यवाद । जिन्होनें मेरी जिज्ञासा को शांत किआ।आशा है इसी तरह आप हमारा ज्ञानवर्धन करते रहेगें ।आप सब का एक बार फिर धन्यवाद।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>इन अनमोल रचनाओं को पढ़ कर आज अपने पूछे गए प्रश्न से मै भी बहुत शर्मिंदा हूँ। मै सचमुच नही जानता था कि मै एक इतने बड़े महान और गहरी सोच वाले रचनाकार से अनजान रहा। अब उनका परिचय और रचनाओं को पढ़कर मन को सात्वंना मिल रही है। आप सब का बहुत धन्यवाद । जिन्होनें मेरी जिज्ञासा को शांत किआ।आशा है इसी तरह आप हमारा ज्ञानवर्धन करते रहेगें ।आप सब का एक बार फिर धन्यवाद।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: alok puranik</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/poems-of-trilochan/comment-page-1/#comment-458</link>
		<dc:creator>alok puranik</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 19 Jul 2007 09:27:16 +0000</pubDate>
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		<description>दुखद है, शाकिंग है, बोधिसत्वजी-अभय तिवारीजी-क्या ब्लागर्स किसी भी तरह से कुछ भी कर सकते हैं क्या इस सिलसिले में।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>दुखद है, शाकिंग है, बोधिसत्वजी-अभय तिवारीजी-क्या ब्लागर्स किसी भी तरह से कुछ भी कर सकते हैं क्या इस सिलसिले में।</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: बोधिसत्व</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/poems-of-trilochan/comment-page-1/#comment-457</link>
		<dc:creator>बोधिसत्व</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 19 Jul 2007 08:17:34 +0000</pubDate>
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		<description>भाई इसमें औरों और अपनों की बात कहाँ से आ गई । त्रिलोचन सब के अपने हैं।
हो सके तो विस्तरा है न चारपाई है भी छापें ।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>भाई इसमें औरों और अपनों की बात कहाँ से आ गई । त्रिलोचन सब के अपने हैं।<br />
हो सके तो विस्तरा है न चारपाई है भी छापें ।</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: arun</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/poems-of-trilochan/comment-page-1/#comment-456</link>
		<dc:creator>arun</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 19 Jul 2007 06:33:53 +0000</pubDate>
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		<description>बहुत अच्छी कविता,बहुत दुखद कहानी,
शायद यही है हिंदी की कहानी...?</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बहुत अच्छी कविता,बहुत दुखद कहानी,<br />
शायद यही है हिंदी की कहानी&#8230;?</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: CHANDRABHUSHAN</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/poems-of-trilochan/comment-page-1/#comment-462</link>
		<dc:creator>CHANDRABHUSHAN</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 19 Jul 2007 06:24:41 +0000</pubDate>
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		<description>भइया काकेश, इतना सारा माल तो आपके पास पड़ा था, खुद ही परस दिया होता, औरों से क्यों कहा? अब अगर मौका मिले तो &#039;चंपा काले-काले अक्षर नहीं चीन्हती&#039; और &#039;नगई महरा&#039; की मुंहदिखाई भी करा दो...</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>भइया काकेश, इतना सारा माल तो आपके पास पड़ा था, खुद ही परस दिया होता, औरों से क्यों कहा? अब अगर मौका मिले तो &#8216;चंपा काले-काले अक्षर नहीं चीन्हती&#8217; और &#8216;नगई महरा&#8217; की मुंहदिखाई भी करा दो&#8230;</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: ज्ञानदत पाण्डेय</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/poems-of-trilochan/comment-page-1/#comment-461</link>
		<dc:creator>ज्ञानदत पाण्डेय</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 19 Jul 2007 05:59:01 +0000</pubDate>
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		<description>धन्यवाद मित्र. कल प्रियंकर की पोस्ट पढ़ कर मन बड़ा उदास सा हो रहा है.
कविता ज्यादा नहीं पढ़ी है पर त्रिलोचन इस दशा में हैं - यह जान कर बहुत कुछ सोचने लगा हूं.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>धन्यवाद मित्र. कल प्रियंकर की पोस्ट पढ़ कर मन बड़ा उदास सा हो रहा है.<br />
कविता ज्यादा नहीं पढ़ी है पर त्रिलोचन इस दशा में हैं &#8211; यह जान कर बहुत कुछ सोचने लगा हूं.</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: अभय तिवारी</title>
		<link>http://kakesh.com/2007/poems-of-trilochan/comment-page-1/#comment-460</link>
		<dc:creator>अभय तिवारी</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 19 Jul 2007 05:57:44 +0000</pubDate>
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		<description>पिछले दिनों व्यस्त रहने के चलते इस सब क्रम से अनभिज्ञ रहा.. चन्दू भाई के आग्रह को आप ने पूरा किया.. और मुझे शर्मिन्दगी से बचा लिया.. इस के लिए धन्यवाद..</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>पिछले दिनों व्यस्त रहने के चलते इस सब क्रम से अनभिज्ञ रहा.. चन्दू भाई के आग्रह को आप ने पूरा किया.. और मुझे शर्मिन्दगी से बचा लिया.. इस के लिए धन्यवाद..</p>
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