वो आजकल परेशान थे.वो आजकल बेरोजगार थे.वो रह रह कर देश के बारे में सोचने लगते. देश के बारे में सोचने से उन्हे अच्छा लगता. उनका खुद का दु:ख कुछ कम हो जाता. पनवाड़ी की दुकान पर सिगरेट के कश लगाते लगाते वो सामने से गुजरते यातायात को देख रहे थे.स्कूल बसों में जाते हुए बच्चे,डी.टी.सी. बसों में ऑफिसकर्मी,ऑटो के इंतजार में खड़ी कुछ महिला ऑफिसकर्मी,बस को पकड़ने के लिये पीछे पीछे भागते कुछ लोग. उनकी आंखों के सामने ही सब कुछ हो रहा था लेकिन उनका दिल कहीं और था. वो नेताओं की तरह सब कुछ देख के भी उसे देख नहीं पा रहे थे.

सिगरेट का आखरी कश लगाकर उसके फिल्टर को अपनी पैरों तले उन्होने ऎसे कुचला जैसे वो ही उनकी सारी समस्याओं की जड़ हो.जर्दे के पान को मुँह में डालते हुए बोले ‘ये देश रसातल में जा रहा है.कानून व्यवस्था पूरी तरह ठप हो गयी है.देश आतंक की छाया में पल रहा है.आतंकवादी हमारे घर तक घुस आये हैं.कुछ करना होगा.शीघ्र ही कुछ करना होगा.” उनके चेहरा तना हुआ था.मुट्ठियां भिच गयी थी.लगा जैसे पान के साथ साथ पूरे देश को भी चबा जायेंगे.पान वाले को उनका वाक्य कुछ समझ आया कुछ नहीं.लेकिन इतना जरूर समझ में आया कि इस महीना भी वो उधार में ही पान खायेंगे. जब भी वो देश और समाज की चिता करते हुए इस तरह के डायलॉग बोलते पनवाड़ी समझ जाता कि आजकल धंधा कुछ मंदा चल रहा है.

बात को आगे बढाने के लिये पान वाला बोला.तो बाबू साहब सरकार कुछ क्यों नहीं करती?

क्या करेगी सरकार?? ये सरकार निकम्मी है.

वो तो सारी ही होती हैं.इसमें नयी बात क्या है. पान वाला सहजता से बोला.

नहीं ये सरकार विशेष रूप से निकम्मी है. कहीं कुछ नहीं होता.पिछ्ले दिनों लग रहा था कि मध्यावधि चुनाव हो जायेंगे पर उसका भी अभी कोई स्कोप नहीं दिखता.ये लैफ्ट वाले अन्दर ही अन्दर सरकार से मिले हैं.केवल धमकी देते हैं कुछ करते नहीं.भाजपा वाले भी सरकार के साथ ही मिल गये हैं.सब मिल बांट के खा रहे हैं.किसी को देश की चिता नहीं है.

आप किस पार्टी के साथ हैं.पान वाले ने जिज्ञासा व्यक्त की.

अरे हम किसी पार्टी के साथ नहीं है.हम तो मुद्दों पर बोलते हैं.देश के बारे में सोचते हैं.कोई मुद्दा ही नहीं है आजकल. सब लोग शांत बैठे हैं.सब जगह स्टेटस को है.

लेकिन शांति होना तो अच्छी बात है ना.देश में शांति है.देश विकास कर रहा है.

अरे ऎसी शांति से क्या फायदा. क्या होगा इस शांति से. ना कोई जुलूस,ना भाषण बाजी.ना कोई रैली, ना कोई लाठी चार्ज. ना अफवाहें, ना कर्फ्यू.ना आगजनी, ना लूटपाट. ना हडताल, ना मारपीट. ना तालाबंदी, ना घेराव.ना सीलिंग, ना चीटिंग.ना चंदा, ना धंधा अरे इन सब के बिना देश तरक्की नहीं कर सकता.

वो सही बोल रहे थे. देश शांत था.इसलिये वे बेरोजगार थे. उनकी क्षमताओं का उपयोग नहीं हो पा रहा था.देश प्रगति करता तो वो भाषण देते.किसी जुलूस का नेतृत्व करते.कुछ सरकारी बसों मे आग लगाते. कुछ दुकानें लूट कर घर का सामान ले आते. उनके घर का टी वी और फ्रिज पुराना हो गया था. इस बार जाड़ों से पहले वो गीजर भी घर ले आने की तमन्ना रखते थे.उनकी इन्ही क्षमताओं की वजह से ही उनको रॉयल चैलेंज व्हिस्की और दू जून का चिकन नसीब हो जाता.     

वो पनवाड़ी को देश की तरक्की से अवगत करा ही रहे थे,कि उनके एक साथी ने आके उनके कान में कुछ कहा. उनके चेहरे पर मुस्कान तैर गयी.

मैं कहता था ना कि भाजपा वाले जरूर कुछ करेंगे.

क्यों क्या हुआ.

अरे हमारी आस्था का प्रश्न है.राम हमारे आराध्य हैं.हमारी आस्था का केन्द्र हैं.आस्था का कोई प्रमाण नहीं होता. हम राम सेतू बचा कर रहेंगें.

उनकी आवाज उंची होती चली गयी. उनके चारों ओर भीड़ बढ़ने लगी.

पानवाला भी खुश था.उसे तसल्ली हुई कि वो जल्दी ही अपना बकाया चुकता कर देंगे. उन्हे रोजगार मिल चुका था.

,हिन्दी

  5 Responses to “शांति की बेरोजगारी”

  1. बाकी कुछ हो न हो-कम से कम पनवाड़ी खुश हो लिया कि उसकी उधार चुकता हो जायेगी. वाह, सब राम जी की माया है और बीजेपी का महात्म. :)

    बहुत खूब, आजकल चरम पर हैं आप, जनाब!! खींचे रहें माहोल.

  2. इन सज्जन के देश प्रेम को देखते हुये देश और राज्यों में चुनाव हर साल होने चहियें! ऐसा वैधानिक परिवर्तन जरूरी है! :)

  3. सही बात है। ऐसे चरित्रों की दुकान राजनीति से चलती है। ग्राहक खींचने के लिए कभी आस्था का इस्तेमाल करते हैं तो कभी किसी और बात का…

  4. मसले दुकानों के हैं।
    राम के नाम की दुकान से कुछ कमाते खाते हैं।
    राम के नाम के विरोध की दुकानों से भी कुछ खाते-पीते हैं।
    इस मुल्क में इत्ते बेरोजगार हैं जी, सबको कमाने-खाने का हक है कि नहीं।
    राम नाम के घाट पे भई लुच्चन की भीर
    तुलसी माथा पीटें और रोवन लागै कबीर

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