Archive for January, 2008

उमर की मधुशाला के निहितार्थ

अब तक तो आप समझ ही चुके होंगे कि उमर खैय्याम की रुबाइयों में कितनी व्यापकता है. जब मैं उमर खैय्याम की रुबाइयों और उनके उन अनुवादों के बारे में सोचता हूँ जो भारत में हुए तो उनमें एक साम्य जैसा लगता है. पहले उमर खैय्याम की मूल रचना की बात करें. उमर खैयाम ने [...]

केमो बस की सर्-रर प्वां प्वां..

बस पहाड़ी रास्तों पर हाँफते धीमे रफ्तार डीज़ल का धुँआ उगलते चढ़ रही है.केमो* की उस बस में बैठते ही उसे लगा था कि वह जैसे अपने घर पहुंच गया.ट्रेन की सारी रात की थकन बस में अपना सूटकेस रखते ही जैसे उड़न छू हो गयी. उन टेढ़े मेढ़े,ऊंचे नीचे रास्तों में हिचकोले खाती बस [...]

मैं यह नौकरी नहीं छोड़ुंगा…

वो मेरे मित्र थे.पत्रकार तो वो थे ही लेकिन साथ साथ एक कवि भी थे, यानि कि पूरा का पूरा डैडली कंबीनेशन. लिखने बैठते तो किस विषय पर क्या लिख दें इसका उनको ही पता नहीं रहता था. प्रमाद की अवस्था में पहुंच जाते तो क्या क्या बकने लगते.दूसरों के लिखे को अपना बताने लगते. [...]

ये मेरा ब्लॉग और मेरा ब्लॉग

नवभारत टाइम्स में वरिष्ठ कवि/पत्रकार श्री मंगलेश डबराल जी ने हिन्दी ब्लॉग पर एक लेख लिखा. वो धन्यवाद के पात्र तो हैं ही कि उनकी नजरें इस नये बने अराजनैतिक, व्यक्तिगत, रूमानी, भावुक और अगंभीर माध्यम पर इनायत हुई लेकिन इन सबके ऊपर उन्होने हिन्दी ब्लॉगजगत पर जो आरोप लगाये हैं वो शायद इस हँसी-ठिठोली [...]

क़िबला का रेडियो ऊंचा सुनता था

पिछ्ली पोस्ट में नीरज जी ने कहा. “किताब हर लिहाज़ से विलक्षण है. शब्द यहाँ जादू से जगाते लगते हैं…हैरानी होती है पढ़ के की इंसान के जेहन में ऐसे जुमले आ कहाँ से जाते हैं…ये किताब हर समझदार इंसान को पढ़नी चाहिए…”
संजीत जी बोले ” वाकई शानदार शब्द चित्र। अभी तक आपने इस [...]

टिप्पणी-चर्चा,स्त्री-विमर्श व इस ब्लॉग का भविष्य

वैसे तो टिप्पणीकार टिप्पणीचर्चा करते ही हैं लेकिन अपने ब्लॉग के लिये यह काम हमने ही शुरु कर दिया है.कई बार किसी भी ब्लॉग पर बहुत अच्छी टिप्पणीयाँ आती हैं… कभी कभी कई अच्छी टिप्पणीयाँ दब जाती हैं उनको भी लोगों तक पहुचाना मुझे जरूरी लगता है. इसलिये सोचा कि अब अपने ब्लॉग पर आयी [...]

खोया पानी: ओलती की टपाटप

यूसूफी साहब शब्द चित्र खीचने में माहिर हैं. एक छोटा सा उदाहरण देखिये जहाँ सत्तर साल के किबला अपने गांव की पुराने दिनों की याद में खो जाते हैं.
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सत्तर साल के बच्चे की सोच में तस्वीरें गडमड होने लगतीं। खुशबुऐं, नरमाहटें और आवाजें भी तस्वीरें बन-बन कर उभरतीं। उसे अपने गांव में मेंह बरसने [...]

कभी सुराही टूट,सुरा ही रह जायेगी,कर विश्वास !!

मैने उमर के रुबाइयों के बहुतेरे अनुवाद पढ़े..हिन्दी में भी अंग्रेजी में भी. हिन्दी में मुझे ‘मधुशाला’ (जो कि अनुवाद नहीं है पर इसकी चर्चा बाद में) और ‘मधुज्वाल‘ ने बहुत प्रभावित किया.हाँलाकि रघुवंश गुप्त जी का अनुवाद भी काफी अच्छा है….पर ‘मधुज्वाल’ मुझे उसके नये प्रतिमानों और छंद के नये नये प्रयोगो की वजह [...]