Jan 312008
 

अब तक तो आप समझ ही चुके होंगे कि उमर खैय्याम की रुबाइयों में कितनी व्यापकता है. जब मैं उमर खैय्याम की रुबाइयों और उनके उन अनुवादों के बारे में सोचता हूँ जो भारत में हुए तो उनमें एक साम्य जैसा लगता है. पहले उमर खैय्याम की मूल रचना की बात करें. उमर खैयाम ने इतिहास के उस युग में जन्म लिया जब युरोप के लोग इतने सभ्य नहीं थे…या यूं कहें कि निरे जंगली थे तो अतिशयोक्ति ना होगी. उस समय स्कॉटलैंड में मैलकम कैमोर का दबदबा था और इंग्लैंड में सैक्सन राजाओं का आधिपत्य था. ये सब राजा प्रजा को गुलाम की तरह रखते थे…लेकिन इसके विपरीत फारस (पारस) में ज्योति थी, जीवन था, ज्ञान था और साहित्य था. सूफी संस्कृति, वैज्ञानिक सोच की अपनी महत्ता थी. ऎसे सामाजिक परिदृश्य में उमर ने सांसारिकता को ईश्वरीय सत्ता से जोड़कर रखने के अपनी रुबाइयों का सहारा लिया.

जॉन फिटजराल्ड सहित कई अनुवादकों का मानना है कि उमर खुद सुरा-प्रेमी थी और उनके इन पदों में केवल सुरा,सुन्दरी का ही जिक्र है लेकिन उमर की रुबाईयों को ईश्वरीय सत्ता से जोड़कर देखने वालों की भी कमी नहीं है. मैने भी अब तक जितना उमर को पढ़ा उसके आधार पर मैं यह मानने को तैयार नहीं हूँ कि ये रुबाइयाँ मात्र सुरा-वन्दना हीं है. यह रुबाइयाँ उससे अधिक बहुत कुछ कह जाती हैं.मैं अपने और विचार लेख के अगले अंक में आने वाले सप्ताह में रखूंगा.

उमर की रुबाइयों के अनुवाद हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं में 1930 से 1945 के बीच हुए. इस समय देश में अंग्रेजों का शासन था लेकिन स्वतंत्रता का सूरज भी धीरे धीरे आंखे खोल रहा था. यह नवजागरण का काल था. लोगों में पर्याप्त मात्रा में असंतोष था. यह ऎसा समय था जब लोग खुद-ब-खुद उमर की दार्शनिकता की ओर खिंचे चले आये.लोगों की आंखों में सपने थे, दिलों में जोश था और चाल में मस्ती. यह समय था जब लोगों ने उमर को पढना और गुनना प्रारम्भ किया.

हरिवंश राय बच्चन ने एक जगह इसी परिस्थिति का वर्णन कुछ ऎसे किया है.

” सात-आठ बरस बाद जब मैंने उमर खैयाम की रुबाइयों को पहली बार पढ़ा, तो मुझे अच्छी तरह याद है कि मैंने उनमें किसी रोदन, किसी वेदना या किसी निराशा की प्रत्याशा करते हुए पढ़ा था। मेरी यही प्रत्याशा कहाँ तक पूरी हुई होगी इसे ‘रुबाइयात उमर खैयाम’ का हरेक पाठक अपने आप समझ सकता है। मुमकिन है, यहाँ मेरी बात काटकर कुछ लोग मुझसे अपनी असहमति जताएँ। साधारण जनता के बीच, और इसमें प्रायः ऐसे लोग अधिक हैं जिन्होंने उमर खैयाम की कविता स्वयं नहीं पढ़ी, बस यदा-कदा दूसरों से उसकी चर्चा सुनी है, या कभी उसके भावों को व्यक्त करने वाले चित्रों को उड़ती नज़र से देखा है, कवि की एक और ही तसवीर घर किए हुए है। उनके ख़याल में उमर खैयाम आनन्दी जीव है, प्याली और प्यारी का दीवाना है, मस्ती का गाना गाता है, सुखवादी है या जिसे अंग्रेज़ी में ‘हिडोनिस्ट’ या ‘एपीक्योर’ कहेंगे। इतिहासी व्यक्ति उमर खैयाम ऐसा ही था या इससे विपरीत, इस पर मुँह खोलने का मुझे हक़ नहीं है। फ़ारसी की रुबाइयों में उमर ख़ैयाम का जो व्यक्तित्व झलका है, उस पर अपनी राय देने का मैं अधिकारी नहीं हूँ क्योंकि फ़ारसी का मेरा ज्ञान बहुत कम है, लेकिन, एडवर्ड फ़िट्ज़जेरल्ड ने उन्नीसवीं सदी के मध्य में अपने अंग्रेज़ी तरजुमे के अन्दर उमर खैयाम का जो खाका खींचा है उसके बारे में बिना किसी संकोच या सन्देह के मैं कह सकता हूँ कि वह किसी सुखवादी आनन्दी जीवन अथवा किसी हिडोनिस्ट या ‘एपीक्योर’ का नहीं है।

इन रुबाइयों का लिखने वाला वह व्यक्ति है जिसने मनुष्य की आकांक्षाओं को संसार की सीमाओं के अन्दर घुटते देखा है, जिसने मनुष्य की प्रत्याशाओं को संसार की प्राप्तियों पर सिर धुनते देखा है, जिसने मनुष्य के सुकुमार स्वप्नों को संसार के कठोर सत्यों से टक्कर खाकर चूर-चूर होते देखा है। इन रूबाइयों के अन्दर एक उद्विग्न और आर्त आत्मा की पुकार है, एक विषण्ण और विपन्न मन का रोदन है, एक दलित और भग्न हृदय का क्रन्दन है। संक्षेप में कहना चाहें तो यह कहेंगे कि रुबाइयात मनुष्य की जीवन के प्रति आसक्ति और जीवन की मनुष्य के प्रति उपेक्षा का गीत है-रुबाइयों का क्रम जैसा रक्खा गया है उससे वे अलग-अलग न रहकर एक लम्बे गीत के ही रूप में हो गई हैं। यह गीत जीवन-मायाविनी के प्रति मानव का एकांतिक प्रणय निवेदन है। पर कौन सुनता है ? वह अपना क्रोध-विरोध प्रकट करता है-पर उसे हार ही माननी पड़ती है। मानव की दुर्बलता, उसकी असमर्थता, उसकी परवशता, उसकी अज्ञानता और उसकी लघुता के साथ उसका दम्भ, उसका क्रोध-विरोध और उसकी क्रान्ति उसे कितना दयनीय बना देती है ! रुबाइयात सुख का नहीं दुख का गीत है, सन्तोष का नहीं असन्तोष का गान है।”

बच्चन जी की ’मधुशाला‘ में ही देखें तो पायेंगे कि इसके पूर्वाद्ध में यदि कवि ने मरणोपरांत क्रियाओं में भी मधु की महत्ता स्थापित की है तो इसके उत्तरार्द्ध में दर्द,अस्थिरता,क्षण भंगुरता और मोह भंग का यह रूप भी है -

कहाँ गया वह स्वर्गिक साकी, कहाँ गई सुरभित हाला

कहाँ गया स्वप्निल मदिरालय, कहाँ गया स्वर्णिम प्याला

पीने वालों ने मदिरा का मूल्य हाय कब पहचाना

फूट चुका जब मधु का प्याला, टूट चुकी जब मधुशाला

तो उमर की रुबाइयों को मात्र सुरा,सुन्दरी से जोड़कर देखना शायद सही नहीं है. इसके और भी कई पहलू हैं…जिनकी चर्चा अगले अंक में करेंगे.

क्रमश :….

[अब यह श्रंखला अब प्रत्येक गुरुवार को प्रकाशित की जायेगी]

इस श्रंखला के पिछ्ले लेख.

1. खैयाम की मधुशाला.. 2. उमर खैयाम की रुबाइयों के अनुवाद.. 3. मधुशाला में विराम..टिप्पणी चर्चा के लिये 4. उमर की रुबाइयों के अनुवाद भारतीय भाषाओं में  5. मैथिलीशरण गुप्त का अनुवाद 6. खैयाम की रुबाइयाँ रघुवंश गुप्त की क़लम से 7. मधुज्वाल:मैं मधुवारिधि का मुग्ध मीन 8.कभी सुराही टूट,सुरा ही रह जायेगी,कर विश्वास !!

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: उमर खैय्याम, मधुशाला, रुबाई, बच्चन, हरिवंश, फिट्जराल्ड, मदिरा, रधुवंश गुप्त, सुमित्रानंदन पंत

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Jan 302008
 

बस पहाड़ी रास्तों पर हाँफते धीमे रफ्तार डीज़ल का धुँआ उगलते चढ़ रही है.केमो* की उस बस में बैठते ही उसे लगा था कि वह जैसे अपने घर पहुंच गया.ट्रेन की सारी रात की थकन बस में अपना सूटकेस रखते ही जैसे उड़न छू हो गयी. उन टेढ़े मेढ़े,ऊंचे नीचे रास्तों में हिचकोले खाती बस एक के बाद एक मोड़ों पर हॉर्न देते हुए ठिठक ठिठक कर चल रही थी. एक तेरह चौदह साल की लड़की उलटी कर करके परेशान है. वो लोग सैलानी हैं शायद. लड़की की माँ सब जतन कर हार गयी लेकिन उलटी रह रह कर हो ही जाती है.वो याद करता कि जब वह अपनी ईजा (माँ) के साथ कभी ऎसे ही केमो की गाड़ी में जाता था तो उसकी माँ उलटी जैसी कुछ शिकायत होने पर माल्टा (संतरे जैसा एक फल) चूस लेती और उलटी रुक जाती.

बस की खिड़की से बाहर जैसे सब कुछ चलचित्र की भांति चल रहा है.बरफ से ढके पहाड़, उनके नीचे छोटी छोटी चोटियाँ, चीड़ देवदारु के जंगल और उनके नीचे छोटे छोटे गांव,स्कूल से घर लौटते बच्चे किसी छोटे पत्थर या पांगर के दाने को पैर से फुटबाल की तरह लुढ़काते, दातुले को अपनी कमर में खोस कर सिर पर हरी घास का गट्ठा लाते पहाड़ी औरतें, कहीं किसी जंगल में गाय चराते लड़के,उसी जंगल के बीच भूमिया देवता का मंदिर, किसी गाढ़ (छोटी नदी) के किनारे चलता हुआ घट (पनचक्की), किसी चाय की दुकान पर फसक (गप) मारते कोई ठुलबाबू (ताऊ जी).

एक मोड़ आया तो चीड़ का जंगल शुरु हो गया. चीड़ के जंगल उसे हमेशा से ही बड़े मोहित करते रहे हैं.बचपन में अपनी ईजा के साथ पिरूल लेने जाता तो चीड़ के टूटे फूल ले आता जिसे ऊन में बांध कर सारे पटांगड़ में चलाता रहता और कहता कि यह मेरी बकरी है. चीड़ के पेड़ की देह पर चीरा लगाकर बनाये लीसा निकालने वाले खप्पर भी उसे आकर्षित करते कि यह है क्या जिससे यह चिपचिपा पदार्थ निकल रहा है.ये तो उसे बाद में पता चला कि ये लीसा है जो तारपीन तेल बनाने के काम आता है.

ड्राइवर का हाथ सधा हुआ है. वह मोड़ों पर बड़ी आसानी से बस को मोड़ देता है. सैलानी लड़की खिड़की से बाहर नीचे गहरी घाटी देखती तो एक अनजाने भय से सिहर जाती है.लेकिन ड्राइवर के चेहरे पर कोई भाव नहीं. बस का कंडक्टर बीड़ी फूंक रहा है और साथ ही किसी डेली पसैंजर से बात भी कर रहा है. “पदम ज्यू आज बोरे में क्या भर लाये हो?”… “कुछ नहीं चेला… बस लाई के पत्ते और नीम्बू है यार.”…..बीड़ी खतम कर वह शहर के कंडक्टरों की तरह दरवाजे से नहीं लटकता बल्कि अपनी सीट में बैठ कर अपने रैक्सीन के थैले में रखे पैसों का हिसाब करने लगा है.पैन उसने अपने कान के ऊपर रख रखी है. कभी किसी सवारी को उतरना होता तो वो दरवाजे के पास लटकती रस्सी को खींच देता और ड्राइवर के पास घंटी बज जाती और वह गाड़ी रोक देता. कंडक्टर का हिसाब शायद पूरा हो चुका है. पदम दत्त जी भी उतर चुके हैं.बीच बीच में कंडक्टर अपनी माशूका की याद भी आ जाती जिसके लिये पिछ्ले हफ्ते ही वो गोल्ल ज्यू के मंदिर में घंटी चढ़ाने की मन्नत मांग कर आया था.

लगभग आधा रस्ता कट चुका है. उसे अब चाय की तलब लग रही है.वह सोच रहा कि कब ड्राइवर ज्यू गाड़ी रोकें और वह पहाड़ी रायते और पकोड़ी का स्वाद ले और साथ में गरमा गरम चाय भी. वह सोच ही रहा था कि एक झटके से गाड़ी (बस) रुक गयी. ‘चाय-पानी पी लो हो फटाफट’ …कंडक्टर बस से उतरते उतरते बोला. वो भी उतरा. सामने वही चिर परिचित दुकाने और उनमें आलू के गुटके, काले चने, प्याज की गरमा गरम उतरती पकोडियां , पहाड़ी रायता. उसके मुँह में हमेशा की तरह पानी आ गया.वह रायता-पकोड़ी का ऑर्डर देकर बैठ गया. पार्श्व में  पहाड़ी गाना बज रहा था…”टक टका टक कमला बाटुली लगाये…”.रायता-पकौड़ी के अनोखे स्वाद के बीच उसे भी अपनी कमला याद आने लगी. ….अब तो बस आधा ही सफर और बांकी था…..

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के.मो.ओ.यू. (KMOU) : कुमाऊँ मोटर्स ओनर्स यूनियन की प्राइवेट बसें जिन्हे उत्तराखंड के पहाड़ों में केमो की बस के नाम से जाना जाता है.

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साथ में बोनस के रूप में सुनिये नरेन्द्र सिंह नेगी का गाया गढ़वाली गीत. “चली बे मोटर चली…सर-रर..प्वां..प्वां……”

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ऊपर वाला गाना तकनीकी समस्या के कारण थोड़ा फास्ट सुनायी दे रहा है. जल्दी ही इसे ठीक करता हूँ.

तब तक आप यह गाना सुनिये….”टक टका कमला बाटुली लगाये…” …मस्त गाना है… जरूर सुनियेगा….

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Jan 292008
 

वो मेरे मित्र थे.पत्रकार तो वो थे ही लेकिन साथ साथ एक कवि भी थे, यानि कि पूरा का पूरा डैडली कंबीनेशन. लिखने बैठते तो किस विषय पर क्या लिख दें इसका उनको ही पता नहीं रहता था. प्रमाद की अवस्था में पहुंच जाते तो क्या क्या बकने लगते.दूसरों के लिखे को अपना बताने लगते. एक न्यूज चैनल में थे.उनका काम था समाचारों की समीक्षा करना. मूड हुआ तो घंटे में चार के हिसाब से समीक्षा लिख डालते नहीं अपनी पैन से कभी सर और कभी कान खुजाते.

उनकी सबसे बड़ी समस्या थी कि वो समझते कि लोग उन्हे पत्ता नहीं देते. शंकर जी के पक्के भक्त थे तो शिकायत भी उन्ही से करते. भगवान देख ना उसे देख कैसे वह बॉस के साथ हँस हँस कर बात कर रहा है. बॉस मेरे साथ ऎसे बात क्यों नहीं करता.जबाब भी वह जानते थे. मैं बॉस के साथ दारू नहीं पीता ना.वो सीधे सादे थे. दारू पीना, देर रात तक प्रेस क्लब में चिकन की टांग तोड़ते हुए अंतर्राष्टीय समस्याओं पर विचार करना ये सब उनकी आदतों में शामिल नहीं था. वे तेल लगाने की सार्वभौमिक कला में माहिर भी ना थे. इसलिये अठारह बीस साल भाड़ झोकने के बाद भी अभी वह वो मुकाम हासिल नहीं कर पाये थे जो यह ‘नये लौंडे” तीन चार सालों में ही कर लेते थे.

एक दिन मेरे पास आये और कहने लगे. “मैं यह नौकरी छोड़ दुंगा, नहीं करनी मुझे यह पत्रकारिता”. उनके दो छोटे छोटे बच्चे थे. जो अभी पढ़ रहे थे. उनका ख्याल करते हुए मैने उन्हें समझाने की कोशिश की और जानना चाहा कि आखिर क्यों वह नौकरी छोड़ना चाहते हैं. “अरे साले एक ही स्टोरी को सुबह से शाम तक चलाते रहते हैं…और मुझे कहते हैं कि इसे कभी इस ऎगिल से चेंज करो …कभी उस ऎगिल से.. वीडियो फुटेज कम होते हैं..तो एक ही विडियो को बार बार प्ले करते हैं और कहते हैं कि आप स्टोरी चालू रखो.. खाक स्टोरी चालू रखो…मैं कोई कहानीकार थोड़े हूँ ..पत्रकार हूँ… बिना कुछ हुए कैसे लिखूँ…मैं बदलाव लाऊंगा“. मैं इससे पहले कि उन्हे कुछ समझाता वो अपनी आवाज को और ऊंची कर बोलने लगे. ” वो साला खुद से एक लाइन नहीं लिख सकता ..खुद का एक भी कॉंसैप्ट नहीं है…मेरे कॉंसैप्ट ले जाता है और उन पर लिखता है… ” जाहिर है वो प्रमाद की अवस्था में जा रहे थे. मैने इस बात पर उन्हे छेड़ना उचित नहीं समझा कि वो नौकरी क्यों छोड़्ना चाहते हैं…निश्चित ही उनके दिल को गहरी चोट लगी थी..मैं जानता हूँ इस तरह के भावनात्मक आदर्शवाद से उनके सहकर्मी भी दो चार होते थे. लेकिन चार घूंट अन्दर जाते ही सारी आदर्शवादिता हवा हो जाती.

मैने प्रश्न बदलते हुए कहा कि “नौकरी छोड़ दोगे तो फिर करोगे क्या? अपना परिवार कैसे चलाओगे?” उनके चेहरे ने कई रंग एकसाथ बदले. लगा जैसे वो आसमान से जमीन पर आ रहे हों. लेकिन ठसक अभी बांकी थी… मैं कविता लिखुंगा. अपना कविता संग्रह छ्पवाऊंगा. वो हिन्दी के कवि थे इसलिये मेरे चेहरे पर मुस्कान तैर गयी…लेकिन साथ साथ मुझे उनके बच्चों का भूखा भविष्य भी नजर आने लगा. मैने उनसे पूछा …आप किस पर कविता लिखेंगे ..वही चांद, वही सूरज, वही तारे, वही प्रकृति, वही प्यार, वही कसमें, वही वादे,वही रूठना, वही मनाना,वही रस,वही छंन्द…बस इन्ही को तो अलग अलग ऎंगल से देखेंगे ना. .. वो फिर भड़क उठे..कहने लगे ..ये सब कविताऎं तो ना जाने कब से लिखी जा रही हैं.तुम्हे तो कविता की समझ ही नहीं ..यह सब कविता तो पुराने जमाने की छायावादी कविता है…मैं तो यथार्थवादी कवि हूँ…. मैं लिखुंगा भूख पर, बेरोजगारी पर,भष्टाचार पर, बाजारवाद पर, पूंजीवाद पर, छ्द्म साम्यवाद पर… वो आगे भी बोलते लेकिन मैने उन्हे रोककर कहा…लेकिन इन सब पर भी तो पिछ्ले ना जाने कितने साल से कविताऎं लिखी जा रही हैं…क्या हुआ..एक ही वीडियो है जिसे बार बार प्ले किया जा रहा है… आप क्या करेंगे एक ही स्टोरी को थोड़ा अलग ऎगल से दिखायेंगे ना..उससॆ क्या होने वाला है..क्या उससे तसवीर कुछ बदल जायेगी…यही करना है तो जहाँ हैं वही क्यों नहीं करते ..कम से कम घर तो चलेगा….

उनके चेहरे की दृढ़ता निरिहता में बदलती गयी.. उनके हाथों की बँधी मुट्ठियाँ ढीली हो गयी….आदर्श के सारे सपने टूटकर चकनाचूर हो गये थे..वो उठे और कहने लगे..नहीं मैं यह नौकरी नहीं छोड़ूंगा.

Jan 282008
 

नवभारत टाइम्स में वरिष्ठ कवि/पत्रकार श्री मंगलेश डबराल जी ने हिन्दी ब्लॉग पर एक लेख लिखा. वो धन्यवाद के पात्र तो हैं ही कि उनकी नजरें इस नये बने अराजनैतिक, व्यक्तिगत, रूमानी, भावुक और अगंभीर माध्यम पर इनायत हुई लेकिन इन सबके ऊपर उन्होने हिन्दी ब्लॉगजगत पर जो आरोप लगाये हैं वो शायद इस हँसी-ठिठोली और खुशफहमी में कहीं दब ना जायें कि हिन्दी ब्लॉग के ऊपर नवभारत टाइम्स जैसे मुख्यधारा के अखवार ने संडे स्पेशल फोकस कर लिया इसलिये हम हाजिर हैं उस पर अपने विचार रखने के लिये.

उन्होने हिन्दी ब्लॉग बिरादरी के बारे में कहा कि इसमें “एक आपसी लगाव इसलिए भी दिखता है कि उनके आयोजक स्वाभाविक रूप से मिलते जुलते हैं”. इस बात से मैं इत्तेफाक नहीं रखता कि कि आपसी लगाव सिर्फ इसलिये है कि ब्लॉगर्स आपस में मिलते जुलते हैं. मेरे विचार से अभी तक सिर्फ दस – पन्द्रह प्रतिशत ब्लॉगर्स ही आपस में मिले होंगे. यह आपसी लगाव इसलिये कि हम एक दूसरे के लेखन में खुद को महसूस कर पाते हैं. हमारे दर्द,खुशी,प्यार,रिश्ते,सामाजिक सरोकार किन्ही दूसरों के लेखन में दिखायी पड़ते हैं.उन्हे हम अपने दिल के करीब मानते है.हम सहज भाव से ही बिना मिले ही वो रिश्ते जोड़ लेते हैं जो लोग बरसों साथ रहने से भी नहीं जोड़ पाते. इसीलिये इस ब्लॉग मे हमें कोई बड़ा भाई मिल जाता है,कोई अच्छा मित्र मिल जाता है तो कोई दीदी ,भाभी या बहन भी और कहीं हम सह-ब्लॉगर के सह अस्तित्व के साथ ही एक दूसरे से जुड़ जाते हैं.

मंगलेश जी को अमेरिकी इंडियन मूल के कवि एमानुएल ओर्तीज की एक अद्भुत कविता हिन्दी ब्लॉग जगत में नहीं मिली लेकिन यह मिल भी जाती तो भी ब्लॉग जगत कोई तीर ना मार चुका होता.ब्लॉग एक अभिव्यक्ति का माध्यम है.हिन्दी की भाषाई शुद्धताओं, नुक्ताचीनियों और सामाजिक क्रातियों के उलट इसमें एक सहज अभिव्यक्ति है जो सीधे दिल को छूती है.यह ब्लॉगर्स भाषा व जबान के मामले में शायद इतने माहिर ना हो जितने हिन्दी भाषा जगत के महोपाध्याय लेकिन इनके दर्द और ग़म भी वैसे ही हैं जितने अमेरिकी इंडियन मूल के कवि एमानुएल ओर्तीज के.ये और बात है कि ओर्तीज का नाम कुछ चंद पढ़े लिखे, भाषाई महापंडित, बुद्धिजीवी वर्ग के ब्लॉगर्स के अलावा शायद ही किसी ने सुना हो. हमारी भाषा इतनी अच्छी होती तो हम यह बिना पैसे का ब्लॉग खोल के लिखने क्यों बैठते किसी पत्रिका या समाचार पत्र में छ्प छ्पाकर कुछ पत्र-पुष्प ही बना रहे होते.

हिन्दी साहित्य का नुकसान उन्ही लोगों ने किया है जिन्होने अभिव्यक्ति को भाषाई व्याकरण के इतने कड़े नियमों में बांध कर रख दिया कि वो आम आदमी से दूर होती चली गयी.प्रेमचन्द अभी भी अपने से इसलिये लगते हैं क्योकि वो समझ में आते हैं. हम रोना रोते हैं हिन्दी का पाठक कहाँ है?, हिन्दी में किताबें बिकती क्यों नहीं?, लोगों की रुचि साहित्य में कम क्यों हो रही है?.यह दोष पाठकों का नहीं वरन उन चंद साहित्यकारों का है जिन्होने भाषा के ऎसे किले बनाये जिनके भीतर पहुंचकर वो खुद को सुरक्षित महसूस कर सकें और नये आने वाले व्यक्तियों को उन किलों को फतह करने के लिये ऎसी कड़ी परीक्षाओं से गुजरना पड़े कि वो पहुंचने से पहले ही टें बोल जाये.इसी लिये हिन्दी साहित्य गुटबाजियों, पुरुस्कार राजनीतियों और चारण-भाटों का अड्डा बन गयी है. हम चितित है हिन्दी के लिये लेकिन नियमों में ढील नहीं देंगे.

[यहाँ पर इतना और बता दूँ कि मैने स्वयं देखा है किस तरह बंगाल में लोग किताबों को खरीदते हैं.वहाँ कई छोटी पत्रिकाऎं छ्पती है जो नये नये कवियों को अवसर देती हैं. बंगला में, हिन्दी की तरह बोलने व लिखने की भाषा में अंतर नहीं है.बंगला या मराठी के लोग किताबों के ना बिकने का रोना नहीं रोते.]  

हिन्दी ब्लॉग इन्ही सब नियमालियों से निज़ात दिलाकर एक सहज,सरल,मोहक,ग्राह्य अभिव्यक्ति को सामने लाता है. वह अभिव्यक्ति जिसको किसी संपादक की कैंची से बचकर नहीं गुजरना पड़ता. जिसके लिये आपको किसी की चरण वन्दना नहीं करनी पड़ती किसी गुट का सदस्य नहीं होना होता.यह रामचन्द्र शुक्लों,द्विवेदियों की किसी युग परिभाषाओं से दूर है.यहाँ मन की बात है, खुद के अनुभव और आम बोलचाल की भाषा है. शेरदा ‘अनपढ़” , बाबा नागार्जुन या भिखारी ठाकुर इन्ही जैसों के बीच ही तो हैं.

एक ब्लॉगर क्यों लिखता हैं?आज हर ब्लॉगर एक साहित्यकार, मँजा हुआ लेखक या पत्रकार नहीं है.बहुतों के पास लिखने की कोई मजबूरी भी नहीं है.वो अच्छी तरह से कमा खा रहे हैं. लेकिन अन्दर ही अन्दर एक बेचेनी है.. खुद को अभिव्यक्त करने की…. अपने उमड़ते,घुमड़ते विचारों को भाषा का -फटा-पुराना ही सही- जामा पहनाकर ब्लॉग रूपी उपवन में सजाने की. इस सार्थक (?) प्रयास को सिरे से नकार देना शायद सही नहीं. यदि एक ब्लॉगर तरह तरह की तकनीकी, भाषाई व साहित्यिक अज्ञान की तमाम अड़चनों के बाद भी अपने व अपने आसपास के अनुभवों के बारे में लिख रहा है तो हमें इसका स्वागत करना चाहिये.

मुझे लगता है अंतर्जाल पर हिन्दी को अपना वर्चस्व स्थापित करने से पूर्व कई पड़ावों से गुजरना है. कई तरह की तकनीकी दिक्कतें हैं जो धीरे धीरे दूर हो रही हैं. जैसे जैसे कंप्यूटरों का उपयोग आम प्रचलन में आने लगेगा अपनी बात को दूसरों तक पहुचाने की ललक कई लोगों को ब्लॉगजगत से जोड़ेगी.वह अभिव्यक्ति के विस्फोट का दिन होगा. हिन्दी के वर्चस्व का दिन होगा. हमें उस दिन की प्रतीक्षा करनी होगी. हम मुख्य मीडिया से ज्यादा जिम्मेदार भी बनेंगे लेकिन अभी तो हमारा शैशव काल है अभी तो हमें ‘ब्लॉग-ब्लॉग’ खेलने तक ही सीमित रहने दें मंगलेश जी.

एक कविता मंगलेश जी के लिये.

‘काफल’ जब पकेंगे
तो लूण-तेल में मिला के खा लेंगे
और जोका ना लग जाये इसलिये
‘पानी’ भी ना पियेंगे
तब तक ‘हम जो देखते हैं’
हमें देखने दें
और ‘पहाड़ पर टंगी लालटेन
दिखाती रहे ‘घर का रास्ता’

Jan 272008
 

पिछ्ली पोस्ट में नीरज जी ने कहा. “किताब हर लिहाज़ से विलक्षण है. शब्द यहाँ जादू से जगाते लगते हैं…हैरानी होती है पढ़ के की इंसान के जेहन में ऐसे जुमले आ कहाँ से जाते हैं…ये किताब हर समझदार इंसान को पढ़नी चाहिए…”

संजीत जी बोले ” वाकई शानदार शब्द चित्र। अभी तक आपने इस किताब के जितने भी अंश उपलब्ध करवाए उन्हे पढ़कर तो यही कहा जा सकता है कि वाकई अद्भुत!!

अब आगे पढिये..

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दरिया के बहाव के विरुद्ध तैरने में तो खैर कोई नुक्स़ान नहीं, हमारा मतलब है दरिया का नुक्स़ान नहीं, लेकिन क़िबला तो सैकड़ों फ़ुट की ऊंचाई से गिरते हुए नियाग्रा फ़ॅाल पर तैर कर चढ़ना चाहते थे या यूं कहिये कि तमाम उम्र नीचे उतरने वाले एस्केलेटर से ऊपर चढ़ने की कोशिश करते रहे और एस्केलेटर बनाने वाले को गालियां देते रहे। एक दिन कहने लगे ”मियां यह तुम्हारा शहर भी अजीब शहर है। न खरीदारी की तमीज़, न छोटों के आदाब, न किसी के बड़प्पन का लिहाज़।मैं जिस ज़माने में बिशारत मियां के साथ बिहार कालोनी में रहता था, उस ज़मानेमें रेडियो में कार की बैटरी लगानी पड़ती थी। बिहार कालोनी में बिजली नहीं थी। उसका रखना और चलाना एक दर्दे-सर था। बिशारत मियां रोज़ाना बैटरी अपने कारखाने ले जाते और चार्ज होने के लिये आरा मशीन में लगा देते। सात आठ घंटे में इतनी चार्ज हो जाती थी कि बस एकाध घंटे बी. बी. सी. सुन लेता था। इसके बाद रेडियो से आरा मशीन की आवाजें आने लगतीं और मैं उठ कर चला आता। घर के पिछवाड़े एक पच्चीस फ़ुट ऊंची, निहायत क़ीमती, बेगांठ बल्ली गाड़ कर एरियल लगा रखा था। इसके बावजूद वो रेडियो ऊंचा सुनता था। आये दिन पतंग उड़ाने वाले लौंडे मेरे एरियल से पेच लड़ाते। मतलब यह कि उसमें पतंग उलझा कर ज़ोर आज़माई करते। डोर टूट जाती, एरियल खऱाब हो जाता। अरे साहब! एरियल क्या था, पतंगों का हवाई क़ब्रिस्तान था। उस पर यह कटी पतंगें चौबीस घंटे इस तरह फड़फड़ाती रहतीं जैसे सड़क के किनारे किसी नये मरे हुए पीर के मज़ार पर झंडियां। पच्चीस फ़ुट की ऊंचाई पर चढ़ कर एरियल दोबारा लगाना, न पूछिये कैसा कष्टदायक था। बस यूं समझिये! सूली पे लटक के बी. बी. सी. सुनता था। बहरहाल, जब बर्नस रोड वाले फ्रल़ैट में जाने लगा तो सोचा वहां तो बिजली है, चलो रेडियो बेचते चलें। बिशारत मियां भी तंग आ गये थे कहते थे, इससे तो पतंगों की पफड़पफड़ाहट ब्रॉडकास्ट होती रहती है। एक दूर के पड़ोसी से २५० रुपये में सौदा पक्का हो गया। सवेरे-सवेरे वो नक़द रक़म ले आया और मैंने रेडियो उसके हवाले कर दिया। रात को ग्यारह बजे फाटक बंद करने बाहर निकला तो क्या देखता हूं कि वो आदमी और उसके बैल जैसी गर्दन वाले दो बेटे कुदाल, फावड़ा लिये मज़े से एरियल की बल्ली उखाड़ रहे हैं। मैंने डपट कर पूछा, ये क्या हो रहा है? सीना ज़ोरी देखिये! कहते हैं बड़े मियां, बल्ली उखाड़ रहे हैं, हमारी है।

”ढाई सौ रुपये में रेडियो बेचा है, बल्ली से क्या मतलब?

मतलब नहीं तो हमारे साथ चलो और ज़रा बल्ली के बिना बजा के दिखा दो। यह तो इसकी Accessory है।“

”न हुआ कानपुर, साले की ज़ुबान गुद्दी से खींच लेता और इन हरामी पिल्लों की बैल जैसी गर्दन एक ही बार में भुट्टा-सी उड़ा देता। मैंने तो ज़िंदगी में ऐसा बेईमान आदमी नहीं देखा। इस दौरान वो कमीन बल्ली उखाड़ के ज़मीन पे लिटा चुका था। एक बार जी में आया कि अंदर जा कर १२ बोर ले आऊं और इसे भी बल्ली के बराबर लम्बा लिटा दूं, फ़िर ख्याल आया कि बंदूक़ का लाइसेंस तो समाप्त हो चुका है और कमीने के मुंह क्या लगना, इसकी बेकुसूर बीबी रांड हो जायेगी। वो ज़ियादा क़ानून छांटने लगा तो मैंने कहा, जा जा, तू क्या समझता है? बल्ली की हक़ीक़त क्या है, ये देख, ये छोड़ के आये हैं।“

क़िबला हवेली की तस्वीर दिखाते ही रह गये और वो तीनों बल्ली उठा कर ले गये।

जारी………………   [अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जायेगी]    

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पिछले अंक : 1. खोया पानी-1:क़िबला का परिचय 2. ख़ोया पानी 2: चारपाई का चकल्लस 3. खोया पानी-3:कनमैलिये की पिटाई 4. कांसे की लुटिया,बाली उमरिया और चुग्गी दाढ़ी़ 5. हवेली की पीड़ा कराची में 6. हवेली की हवाबाजी 7. वो तिरा कोठे पे नंगे पांव आना याद है 8. इम्पोर्टेड बुज़ुर्ग और यूनानी नाक 9. कटखने बिलाव के गले में घंटी 10. हूँ तो सज़ा का पात्र, पर इल्ज़ाम ग़लत है 11. अंतिम समय और जूं का ब्लड टैस्ट 12. टार्जन की वापसी 13. माशूक के होंठ 14. मीर तकी मीर कराची में 15. दौड़ता हुआ पेड़ 16. खोया पानी: ओलती की टपाटप

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किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

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Jan 262008
 

वैसे तो टिप्पणीकार टिप्पणीचर्चा करते ही हैं लेकिन अपने ब्लॉग के लिये यह काम हमने ही शुरु कर दिया है.कई बार किसी भी ब्लॉग पर बहुत अच्छी टिप्पणीयाँ आती हैं… कभी कभी कई अच्छी टिप्पणीयाँ दब जाती हैं उनको भी लोगों तक पहुचाना मुझे जरूरी लगता है. इसलिये सोचा कि अब अपने ब्लॉग पर आयी कुछ सार्वजनिक महत्व की टिप्पणीयों की चर्चा यहीं शुरु कर दूँ..वैसे पहले भी करता रहा हूँ

आलोक जी ने मेरी एक पोस्ट पर कहा

” लेखकीय पहचान एक्सचेंज आफर से मिलती है। जो आपको अच्छा लेखक ना माने, उसे लेखक तक मानने से इनकार दीजिये।”

आजकल ब्लॉग में स्त्री-विमर्श खूब चल रहा है. मेरी एक पोस्ट में तो सारे रिकॉर्ड ही टूट गये. यह अभी भी जारी है.

मैने एक टिप्पणी पोस्ट बनायी थी जिस पर विस्तृत टिप्पणीयाँ आयीं. उसी से संबंधित एक पोस्ट में स्वप्नदर्शी जी ने कहा

“बहस का कोइ अंत नही है, और ये समस्या बहस से सुलझने वाली भी नही है. [ये समस्या] सिर्फ और सिर्फ व्यवहार और अनुभूतियों से ही सुलझेंगी. खासकर किसी भी समाज की असभ्यता का सबसे ज्यादा शिकार इसके सबसे कमज़ोर वर्ग ही होते है, जैसे औरते, बच्चे, बूढे. जिस तरह का विमर्श यहां देखने को मिला, मुझे बहुत शर्म है अपने भारत पर, इसके बाशिन्दो पर. और अगर वाकई सभ्य समाज बनाना है तो सभ्यता इसी में है कि सबको समान अवसर दिया जाय, एक इंसान के बतौर. स्त्री विमर्श को छोड भी दिया जाय, तो बूढो कि स्थिति, अपाहिज लोगों के लिये सार्वजनिक जीवन में इससे भी कम जगह है. किस शहर की बसें, यायायात के साधन,ऑफिस, और तमाम दूसरी सार्वजनिक जगह हैं, जहां, स्वभिमान के साथ ये लोग जा सकते है? शिरकत कर सकते है?

य़े टकराव का ज़माना है, समस्या का सीधा समाधान और नैतिक और राजनैतिक दृष्टि के अभाव में, सवर्ण-दलित, अगडे-पिछड़े, औरत-मर्द, जवान-बूढे, क्षेत्रियता, धर्म, सभी की वाट लगने वाली है.

ये मन की ग़ांठें है, इतनी आसानी से नही खुलेंगी……….

एक मरतबा, एक जमीन्दार रशूख वाले साहब, होस्टल में पढने गये, और टोयलेट का फ्लश चलाना उन्हे अपनी शान के खिलाफ लगा. इस काम को उन्होने, भंगी का काम माना. पर होस्टल मे कौन था जो उनका भंगी बनता? अंत मे उनकी पेशी हुयी, और फिर उन्होने अपनी गन्द साफ करनी सीखी.

इसीलिये, जिनके दिमाग मे गन्द भरी है, फ्लश उन्ही को चलाना पड़ेगा. नही तो उसकी गन्द से सबसे पहले उनके आसपास वाले, परिवार वाले बीमार होंगे, उनके अपनो को सबसे ज्यादा तकलीफ होगी. बाकी छ अरब लोगों के साथ किसी भी औरत का सिर्फ, माँ, बहन, प्रेमिका या पत्नी का समबन्ध नही हो सकता और इस परिधी मे दुनिया के अधिकांश लोगो को क्या उसके अपमान का लायसेंस मिला हुआ है?

लेकिन कुछ लोग इससे सहमत नहीं भी हैं. डॉक्टर अमर कुमार ने कहा

बहुत खूब,
ऎसा कतई नहीं है कि मैं प्रभुसत्तावादी हूं, या कि पुरातन विचारों का हूं किंतु हम
क्यों नहीं स्वीकार कर पाते कि पुरुष और नारी का संबन्ध अधुनातन काल से ही
वृक्ष और लता का सा रहा है । बराबरी का अधिकार ? यह किंन्ही निहितार्थ के
चलते कुछ पुरुषों द्वारा ही गढ़ा गया है , और अबला अब बला की बला बन बैठी है।
चित्त और पट्ट दोंनों ही हथियाने की जुगत है, यह स्वांग

इसी विषय पर प्रत्यक्षा जी की गुस्से वाली यह पोस्ट पढ़ना ना भूलें.

चलिये अब विषयांतर….

मेरे संकल्पों को लेकर आलोक जी ने एक अच्छी बात कही कि “अनुशासित सिर्फ कंप्यूटर होते हैं या कुत्ते। हम रचनाधर्मी लोग हैं। अनंत के साधक हैं, यूं तुच्छ संकल्पों की सीमाओं में अपने पुरुषार्थ को ना बांधिये।”. उनसे पूरी सहमति और इतना अनुशासन है भी नहीं अपन में…….लेकिन फिर भी इस ब्लॉग के पाठको के लिये राह आसान हो इसका प्रबन्ध कर रहा हूँ.

शास्त्री जी समय समय पर विषय आधारित चिट्ठों की वकालत करते रहते हैं. अब अपने से कोई दस ब्लॉग तो मैंटेन हो नहीं पायेंगे इसलिये फिलहाल के लिये दिनों के हिसाब से इस ब्लॉग को विभिन्न भागों में बांटने का प्रयास कर रहा हूँ.

सोमवार : समसामयिक/व्यंग्य/पॉडकास्ट

मंगलवार: समसामयिक/व्य़ंग्य/मौज

बुधवार : पहाड़ी नराई

गुरुवार : मधुशाला या उस जैसी ही कोई श्रंखला

शुक्रवार : खोया पानी

शनिवार : टिप्पणी चर्चा/ पाठकों के जबाब/ब्लॉग संबंधी

रविवार : खोया पानी

ये सभी पोस्ट सुबह आठ बजे से पहले प्रकाशित कर दी जायेंगी. इसके अतिरिक्त यदि कभी कोई अन्य विषय हुआ तो उसे अलग से दिन के किसी भी समय प्रकाशित कर दिया जायेगा. आशा करता हूँ कि इससे पाठको को सुविधा होगी और वो अपने हिसाब से इस ब्लॉग को पढ़ सकेंगे.

आपके कोई सुझाव हों तो जरूर बताइयेगा…..

Jan 252008
 

यूसूफी साहब शब्द चित्र खीचने में माहिर हैं. एक छोटा सा उदाहरण देखिये जहाँ सत्तर साल के किबला अपने गांव की पुराने दिनों की याद में खो जाते हैं.

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सत्तर साल के बच्चे की सोच में तस्वीरें गडमड होने लगतीं। खुशबुऐं, नरमाहटें और आवाजें भी तस्वीरें बन-बन कर उभरतीं। उसे अपने गांव में मेंह बरसने की एक-एक आवाज अलग सुनाई देती। टीन की छत पर तड़-तड़ बजते हुए ताजे, सूखे पत्तों पर करारी बूंदों का शोर, पक्के फ़र्श पर जहां उंगल भर पानी खड़ा हो जाता, वहां मोटी बूंद गिरती तो मोतियों का एक ताज-सा हवा में उछल पड़ता, तपती खपरैलों पर उड़ती बदली के झाले की सनसनाहट, गर्मी के दानों से उपेड़ बालक-बदन पर बरखा की पहली फुहार, जैसे किसी ने मेंथोल में नहला दिया हो, जवान बेटे की कब्र पर पहली बारिश और मां का नंगे सर आंगन में आ-आ कर आसमान की तरपफ़ देखना, फबक उठने के लिये तैयार मिट्टी पर टूट के बरसने वाले बादल की हरावल गरम लपट, ढोलक पर सावन के गीत की ताल पर बजती चूड़ियां और बेताल ठहाके, सूखे तालाब के पेंदे की चिकनी मिट्टी में पड़ी हुई दराड़ों के जाल में तरसा-तरसा कर बरसने वाली बारिश के सरसराते रेले। खम्बे से लटकी हुई लालटेन के सामने जहां तक रोशनी थी, मोतियों की रिमझिम झालर, हुमक-हुमक कर पराये आंगन में गिरते परनाले। आमों के पत्तों पर मंजीरे बजाती नर्सल बौछार और झूलों पर पींगे लेती लड़कियां और फिर रात के सन्नाटे में, पानी थमने के बाद, सोते जागते ओलती की टपाटप। ओलती की टपाटप तक पहुंचते-पहुंचते

क़िबला की आंखें जल-थल हो जातीं। बारिश तो हम उन्हें लाहौर और नथैया गली की ऐसी दिखा सकते थे कि बीती उम्र की सारी टपाटप भूल जाते। पर ओलती कहां से लाते? इसी तरह आम तो हम मुलतान का एक से एक पेश कर सकते थे। दसहरी, लंगड़ा, समर बहिश्त, अनवर रटौल, लेकिन हमारे पंजाब में तो ऐसे पेड़ हैं ही नहीं जिनमें आमों की जगह लड़कियां लटकी हुई हों।

इसलिये ऐसे अवसर पर हम खामोश, हमातन-गोश (पूरा शरीर कान बन जाता) बल्कि खरगोश बने ओलती की टपाटप सुनते रहते।

जारी………………       

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पिछले अंक : 1. खोया पानी-1:क़िबला का परिचय 2. ख़ोया पानी 2: चारपाई का चकल्लस 3. खोया पानी-3:कनमैलिये की पिटाई 4. कांसे की लुटिया,बाली उमरिया और चुग्गी दाढ़ी़ 5. हवेली की पीड़ा कराची में 6. हवेली की हवाबाजी 7. वो तिरा कोठे पे नंगे पांव आना याद है 8. इम्पोर्टेड बुज़ुर्ग और यूनानी नाक 9. कटखने बिलाव के गले में घंटी 10. हूँ तो सज़ा का पात्र, पर इल्ज़ाम ग़लत है 11. अंतिम समय और जूं का ब्लड टैस्ट 12. टार्जन की वापसी 13. माशूक के होंठ 14. मीर तकी मीर कराची में 15. दौड़ता हुआ पेड़

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किताब- खोया पानी
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उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
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Jan 242008
 

मैने उमर के रुबाइयों के बहुतेरे अनुवाद पढ़े..हिन्दी में भी अंग्रेजी में भी. हिन्दी में मुझे ‘मधुशाला’ (जो कि अनुवाद नहीं है पर इसकी चर्चा बाद में) और ‘मधुज्वाल‘ ने बहुत प्रभावित किया.हाँलाकि रघुवंश गुप्त जी का अनुवाद भी काफी अच्छा है….पर ‘मधुज्वाल’ मुझे उसके नये प्रतिमानों और छंद के नये नये प्रयोगो की वजह से ज्यादा सुन्दर प्रतीत होता है. बांकी अनुवाद एक ही शैली में बँध गये से लगते हैं. हाँलाकि बच्चन की ‘मधुशाला’ जितनी लोकप्रिय हुई उतना लोकप्रिय इसके समवर्ती रुबाइयों का कोई भी अनुवाद हिन्दी में नहीं हुआ.. लेकिन मुझे लगता है इसका मूल कारण यह रहा कि मधुशाला एक गेय रचना है.जो लोगों की जबान पर तुरंत चढ़ जाती है इस कारण इसको याद रखना ज्यादा आसान होता है.

आइये आज आपको मधुज्वाल से मेरे पसंद के कुछ छंदो से परिचित करवाता हूँ.

यह जग मेघों की चल माया
भावी, स्वप्नों की छ्ल छाया !
तू बहती सरिता के जल पर
देख रहा अपनी प्रतिछवि नर !

उठ रे , कल के दुख से व्याकुल,
जीवन सतरँग वाष्पों का पुल !
कल का दुख केवल पागलपन,
पल पल बहता स्वप्निल जीवन !
ले, उर में हाला ज्वाला भर ,
सुरा पान कर , सुधा पान कर !

स्वर्गिक अप्सरि सी प्रिय सहचरि
हो हँसमुख संग ,
मधुर गान हो ,सुरा पान हो
लज्जारुण रंग !
कल कल छ्ल छ्ल बहता हो जल
तट हो कुसुमित
कोमल शाद्वल चूमे पद तल
साकी हो स्मित !
इससे अतिशय स्वर्ग न सुखमय
यही सुर सदन ,
छोड़ मोह भय , मदिरा में लय
हो विमूढ़ मन!

वह ह्रदय नहीं
जिसमें प्रियतम की चाह नहीं!
वह प्रणय नहीं
जिसमें विरहानल दाह नहीं !
वह दिवस नहीं
यदि अविरत सुरा प्रवाह नहीं !
वह वयस नहीं
जो बाला के गल बाँह नहीं !

वह मनुष्य जिसके रहने को
हो छोटा आंगन , गृह द्वार ,
खाने को रोटी का टुकड़ा ,
पीने को मदिरा की धार !
जो न किसी का सेवक शासक ,
हँसमुख हों जिसके सहचर ,
कहता उमर सुखी है वह नर ,
स्वर्ग उसे है यह संसार !

मदिर नयन की , फूल बदन की
प्रेमी को ही चिर पहचान ,
मधुर गान का , सुरा पान का
मौजी ही करता सम्मान !
स्वर्गोत्सुक जो , सुरा विमुख जो
क्षमा करें उनको भगवान ,
प्रेयसि का मुख , मदिरा का सुख
प्रणयी के , मद्यप के प्राण !

उमर न कभी हरित होगा फिर
पलित बयस का गलित लिबास,
मेरे मन अनुकूल फिरेगा
भाग्य चक्र ,यह व्यर्थ प्रयास !
पान पात्र भर ले मदिरा से
शोक न कर , मदिरा कर पान ,
कभी सुराही टूट , सुरा ही
रह जायेगी , कर विश्वास! 

धर्म चक्रों को यदि मुझसे
कभी मित्रता हो स्वीकार
वो मेरे दुखों के बदले
इतना मात्र करें उपकार-
मेरे मरने बाद देह की
रज से ईंटे कर तैयार
चुनवा दें वे मदिरालय के
खँडहर की टूटी दीवार !

surahi-toot

 

क्रमश :….

[अब यह श्रंखला अब प्रत्येक गुरुवार को प्रकाशित की जायेगी]

इस श्रंखला के पिछ्ले लेख.

1. खैयाम की मधुशाला.. 2. उमर खैयाम की रुबाइयों के अनुवाद.. 3. मधुशाला में विराम..टिप्पणी चर्चा के लिये 4. उमर की रुबाइयों के अनुवाद भारतीय भाषाओं में  5. मैथिलीशरण गुप्त का अनुवाद 6. खैयाम की रुबाइयाँ रघुवंश गुप्त की क़लम से 7. मधुज्वाल:मैं मधुवारिधि का मुग्ध मीन

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: उमर खैय्याम, मधुशाला, रुबाई, बच्चन, हरिवंश, फिट्जराल्ड, मदिरा, रधुवंश गुप्त, सुमित्रानंदन पंत

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Jan 232008
 

कल से तो सतझड़ (बारिश होना) पड़ रहे हैं भुला. सारे लकड़ी, गुपटाले भीग गये हैं. चूल्हा जलाने में धुंआ तो होगा ही. आमा (दादी) चूल्हे में फूंक मारते मारते अपने नाती को समझा रही है. लेकिन नाती जो अभी मात्र पांच साल का ही है उसे इस सतझड़ और गुपटालों (उपले)  से क्या मतलब. वो तो हाथ में कटोरी ले के आ गया गोठ (नीचे का कमरा) में जहाँ रसोई भी है. भुला की आंखों से धुंए के कारण पानी निकल रहा है लेकिन वो फिर भी रसोई में खड़ा है.

आमा दाल-भात दे ना.भुला बोला…. भुला की नाक से सिंगाणा निकल रहा है. जिसे वो बार बार अपने कमीज की बांह से पोछ लेता था.

अल्ल द्यूँ चेला..बनने तो दे. वैं (वहीं) बैठ जा

आमा धोती लगा के खाना बनाती थी …इसलिये रिस्या में किसी को नहीं आने देती थी. अपने चारों ओर कोयले से एक लकीर खींच देती थी और किसी को भी उस लकीर के अन्दर पांव छूने की भी छूट नहीं थी. आज आमा ने पालक का कापा और दाल बनायी थी. दाल बन चुकी थी बस जम्बू का धुंगार लगाना बांकी था.चावल बन रहा था. आमा ने पतीली का ढ्क्कन निकाल कर चावल को पणुवे से चलाया. चावल के दो दानों को हाथ से मसल कर देखा. …और किसी तरह से फूंक मार मार कर चूल्हा जलाया… लकड़ियों को ऊपर कर आंच तेज की.भुला हाथ की कटोरी को एक छोटी लकड़ी से बजाता हुआ वहीं बैठ गया.

आमा को सोच पड़ गये.बाहर धीमे धीमे द्यो (बारिश) पड़ रहा है. ऎसी बारिस में गोरू-बल्दों के लिये सूखी घास का इनजाम पहले से करना होगा.अच्छा किया ब्वारी (बहू) को रतैब्याण ही जंगल में भेज दिया. कुछ हरी घास काट के ले आयेगी तो गोठ में रखी सूखी घास थोड़ी ज्यादा चल जायेगी…. नहीं तो फिर वो नये वाले लूटे से घास निकालनी पड़ेगी. तीन दिन से मोव (गोबर) भी नहीं निकाला.थोड़ा द्यो कम हो तो आज मोव निकाला जाय.हाथ के सारे पैसे भी खतम हो गये. खिमुवा का मनीआर्डर आने में तो अभी और दस दिन में बांकी है. आज बुबु (दादा) किसी जजमानी में जायें तो कुछ पैसा मिले. अभी हरिया को पैसे भी देने है. पिछ्ले हफ्ते मडुवा पिसाया था ना. …खिमुवा की चिट्ठी आये भी पन्द्रह दिन से ऊपर हो गये.सब कुशल ही होगी. ये फौज की नौकरी भी ना एकदम बेकार है… एक साल से खिमुवा घर नहीं आया. इस बार आयेगा तो उसको बोलुंगी..क्या फायदा ऎसी नौकरी का..अब यहीं रह जा..यहीं कोई छोटी मोटी दुकान खोल ले नहीं तो कही चपरासी की नौकरी ही कर ले.. शायद मान जाये… लेकिन कहीं वो अपने दगड़ुवों के चक्कर में पड़ गया तो..रोज शाम को सब शराब पीके आते हैं फिर अपनी सैणी (पत्नी) को मारते हैं.. ना हो ना..उससे तो मेरा खिमुवा ही अच्छा..साल में एक बार घर आता है तो सब उसकी कितनी इज्जत करते हैं..सबको वो मिलट्री के रम की बोतल दे देता है तो साल भर सब उसके गुणगान करते है.. कल ही चिमुली के बौज्यू ब्वारी से कह रहे थे.. धुल्हैणी (बहू) ..कब आ रहा है हो खिमुवा….वो भी अपनी रम की बोतल के जुगाड़ में होंगे…

तभी चावल उबल कर उसका पानी चूल्हे में गिरने लगा. छ्यां की आवाज से आमा की तंद्रा भंग हुई.

लगता है चावल पक गया. आमा पतीली को हटा जंबू के धुंगार की तैयारी करने लगी.

सामने भुला लिपी हुई जमीन में कोयले से कोई नयी आकृति बना रहा था.

Jan 222008
 

कहते हैं हम को समय की मांग के हिसाब से काम करना चाहिये.कल अमरीका जाने की बात की तो गुरु अजदक नाराज हो गये. वो खुद पहले इटली और अब चीन की यात्रा कर रहे हैं लेकिन हमको अमरीका नहीं जाने देंगे. इसलिये हमहूँ डिसाइड कर लिये कि हम झुमरी तलैया शिफ्ट हो जाते हैं. इसके जो फायदे हम को नजर आये वो यह हैं.

1. एक तो यह कि लोग कहते हैं कि ब्लॉगिंग में बिहारवाद आ रहा है.इसीलिये सब लोग बिहार छोड़ कर बड़े शहरों में शिफ्ट हो रहे हैं और अपने अनुभव बता रहे हैं. हम बड़ा शहर छोड़ के बिहार शिफ्ट होंगे और वहाँ से अपने अनुभव लिखेंगे और 10-12 पोस्ट इसी पर ठेल देंगे. फिर लोग ब्लॉगिंग में बिहारवाद की नहीं वरन बिहार में ब्लॉगवाद की चर्चा करेंगे. 

2. हमार झुमरी तलैया रेडियो में अपने फरमाइश भेजने के लिये माहिर रहा है. किसी भी फर्माइशी कार्यक्रम यदि झुमरी तलैया की फरमाइश ना हो तो वो कार्यक्रम पूरा नहीं होता. फिर हमहूँ अपनी फरमाइश भेज के अपने पसंद के गाने सुन सकेंगे.

3. आजकल ब्लॉग-सृजन के लिये सम्मान  के लिये दिये जा रहे हैं उसमें भी बड़े शहरों वालों को शामिल नहीं किया गया है. ठीक किया जी …वैसे भी हमें बड़े शहर में कोई सुविधा नहीं है ..और हमने तो सुना है जी कि आजकल लोग रतलाम जैसी छोटी जगह में 2 एम बी पी एस का कनेक्शन इस्तेमाल करते हैं और इलाहाबाद जैसी जगह में जी.पी.आर.एस से ब्लॉग पढ़ लेते हैं …हमें तो यह सब सुविधा बड़े शहर में मिल ही नहीं पाती…बस एक कंपनी से मिले लैपटॉप को कंपनी से मिले डेटाकार्ड के जरिये सिर्फ लैप में ही इस्तेमाल करते हैं जी…..दो तो छोड़ एक टेबल भी नही है लैपटॉप रखने के लिये. इसलिये झुमरी तलैया चले जायेंगे तो यह सब सुविधा भी मिल जायेगी और फिर हमरा नाम भी ऎसे सम्मानों में शामिल हो जायेगा.:-)

4. अक्सर फिल्मों में झुमरी तलैया का जिक्र होता रहता है. जब भी ऎसा जिक्र होगा हमको भी लगेगा कि हमारे शहर का नाम हो गया जी.

इसलिये हम फॉर-द-टाइम-बीइंग झुमरी तलैया शिफ्ट हो रहे हैं जी…..

सम्मान वाले लोग सुन रहे हैं ना…