एक और भयानक चिट्ठाचोर..कहीं आपका…??

नमस्कार!
मैं Ashley Layla , अन्तर-जाल व्यापार का विशेषज्ञ हूँ| मैं खोज यन्त्र संधान कर्ता भी हूँ | मैं इस क्षेत्र में गत 1 वर्षो से हूँ तथा इसके प्रत्येक गुण एवं दोष से भालीभाती परिचित हूँ| आपके किसी भी जिज्ञाषा को शांत करने में पूर्णतया समर्थ, मैं आपकी सेवा में उपस्थित हूँ !
इन सब के [आगे पढ़ें.....]

क्या अमरीका में सचमुच ऎसा होता है?

मैं कभी अमरीका नहीं गया …हाँलाकि मेरे कई मित्र अभी अमरीका में हैं. वैसे मेरे पास भी कई ऑफर आये अमरीका जाने के (आई.टी. में यह कोई बड़ी बात नहीं है) लेकिन ना जाने क्यों अभी तक खुद को तैयार नहीं कर पाया इस के लिये.

अभी कुछ दिनों पहले एक मित्र से मुलाकात [आगे पढ़ें.....]

टिप्पणीयाँ और कॉपीराइट

हिन्दी चिट्ठाजगत चोरी की घटनाऎं बीच बीच में सामने आती रहती हैं. कॉपीराइट का प्रश्न भी यदा-कदा उठता ही रहता है. अभी कुछ दिनों पहले टिप्पणीकार की किसी पोस्ट पर भी टिप्पणीयों पर कॉपीराइट की चर्चा हुई थी. इसलिये हमने सोचा कि इस यक्ष प्रश्न को फिर से उठाया जाय.

मेरी एक पोस्ट पर किसी बहन [आगे पढ़ें.....]

ये बहन जी कौन हैं?

मेरी टिप्पणी वाली पोस्ट पर विस्तृत टिप्पणीयाँ थमने का नाम ही नहीं ले रही. कल जब सोच रहा था कि शायद अब यह सिलसिला थम गया होगा तो आज सुबह देखा एक और बड़ी टिप्पणी आयी. यह टिप्पणी क्या ..यह तो किसी पोस्ट से भी बड़ी है. यह भी छ्द्म नाम से की गयी है [आगे पढ़ें.....]

दौड़ता हुआ पेड़

एक अच्छे व्यंगकार की खासियत है कि हास्य के रंगो के साथ साथ यथार्थ के ऎसे रंग मिलाये जायें कि पाठक को पता भी ना चले और गहरी से गहरी बात उसके दिमाग में सीधे उतर जाये.अंतिम पैरे में किबला के गांव का वर्णन तो देखिये. लगता है पूरा का पूरा चित्र आंखों के [आगे पढ़ें.....]

मीर तकी मीर कराची में

[ व्यंग्य की दुनिया का अद्भुत नमूना है “खोया पानी”. यदि किसी को व्य़ंगकार की ओबजर्वेशन की ताकत का पता करना हो तो इस उपन्यास को पढ़े.यह पाकिस्तान के मशहूर व्यंग्यकार मुश्ताक अहमद यूसुफी की किताब आबे-गुम का हिन्दी अनुवाद है. इस पुस्तक के अनुवाद कर्ता है ‘लफ़्ज’ पत्रिका के संपादक श्री ‘तुफैल चतुर्वेदी’ [आगे पढ़ें.....]

मुँह ना खुलवाइये-वरना जितना आरोप एक स्त्री लगा सकती है उससे कहीं ज्यादा एक पुरुष

मेरी पोस्ट स्त्रियां क्या खुद से सवाल पूछती हैं?, जिसमे‌ पूरी पोस्ट मात्र टिप्पणीयों से ही बनी थी,उस पर् टिप्पणीयों के नये रिकॉर्ड बन रहे हैं.उसमे‌ कोइ आदम जी तो जैसे स्त्रियो‌ के पीछे ही पड गये हैं.आप भी देखें.

मेरी माँ बहन बेटी सभी स्त्रियाँ है लेकिन मैं जब बेटी का रिश्ता [आगे पढ़ें.....]

मधुज्वाल:मैं मधुवारिधि का मुग्ध मीन

उमर खैयाम की रुबाइयों का अनुवाद सुमित्रानंदन पंत ने 1929 में उर्दु के प्रसिद्ध शायर असगर साहब गोडवी की सहायता और इंडियन प्रेस के आग्रह पर किया था. यह अनुवाद “मधुज्वाल” नाम से 1948 में प्रकाशित हुआ था. अन्य हिन्दी अनुवादकों की तरह उनका यह अनुवाद फिट्जराल्ड की की पुस्तक पर आधारित नहीं [आगे पढ़ें.....]

सुनो-पंगेबाज हम ही हैं लाइन में

सुनो-पंगेबाज 2007-2008 के सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर पुरुस्कार दे रहे हैं. एक ओर जब भारत रत्न के लिये लाइन लगी है वहीँ दूसरी ओर पंगेबाज जी महोदय की  टिप्पणीयों में लोग दावा कर रहे हैं कि उन्हे पुरुस्कार दिया जाय लेकिन शायद वो अपने पुराने पंगेबाज यानि खाकसार को भूल गये.

देखिये जी आजकल सब खेल [आगे पढ़ें.....]

"ब्यूतीफूल बत क्राउडेड"

हिन्दी ब्लॉगिंग के इतिहास में पहले का बहुत महत्व रहा है. इसीलिये कोई ना कोई अपने आप को पहला साबित करने में जुटा है. किसी ने चलती ट्रेन से पहली पोस्ट लिखी तो कोई अस्पताल के वार्ड से पहली पोस्ट लिख रहा है.वैसे हमने भी एक पोस्ट चलती ट्रेन में रात को बारह बजे [आगे पढ़ें.....]

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