Archive for January, 2008
कल से तो सतझड़ (बारिश होना) पड़ रहे हैं भुला. सारे लकड़ी, गुपटाले भीग गये हैं. चूल्हा जलाने में धुंआ तो होगा ही. आमा (दादी) चूल्हे में फूंक मारते मारते अपने नाती को समझा रही है. लेकिन नाती जो अभी मात्र पांच साल का ही है उसे इस सतझड़ और गुपटालों (उपले) से क्या मतलब. [...]
January 23rd, 2008 | Posted in नराई | 21 Comments
कहते हैं हम को समय की मांग के हिसाब से काम करना चाहिये.कल अमरीका जाने की बात की तो गुरु अजदक नाराज हो गये. वो खुद पहले इटली और अब चीन की यात्रा कर रहे हैं लेकिन हमको अमरीका नहीं जाने देंगे. इसलिये हमहूँ डिसाइड कर लिये कि हम झुमरी तलैया शिफ्ट हो जाते हैं. [...]
January 22nd, 2008 | Posted in हास्य व्यंग्य | 18 Comments
नमस्कार!
मैं Ashley Layla , अन्तर-जाल व्यापार का विशेषज्ञ हूँ| मैं खोज यन्त्र संधान कर्ता भी हूँ | मैं इस क्षेत्र में गत 1 वर्षो से हूँ तथा इसके प्रत्येक गुण एवं दोष से भालीभाती परिचित हूँ| आपके किसी भी जिज्ञाषा को शांत करने में पूर्णतया समर्थ, मैं आपकी सेवा में उपस्थित हूँ !
इन सब के [...]
January 21st, 2008 | Posted in चिट्ठाकारी, मेरी बात | 14 Comments
मैं कभी अमरीका नहीं गया …हाँलाकि मेरे कई मित्र अभी अमरीका में हैं. वैसे मेरे पास भी कई ऑफर आये अमरीका जाने के (आई.टी. में यह कोई बड़ी बात नहीं है) लेकिन ना जाने क्यों अभी तक खुद को तैयार नहीं कर पाया इस के लिये.
अभी कुछ दिनों पहले एक मित्र से मुलाकात हुई जो [...]
January 21st, 2008 | Posted in मेरी बात | 13 Comments
हिन्दी चिट्ठाजगत चोरी की घटनाऎं बीच बीच में सामने आती रहती हैं. कॉपीराइट का प्रश्न भी यदा-कदा उठता ही रहता है. अभी कुछ दिनों पहले टिप्पणीकार की किसी पोस्ट पर भी टिप्पणीयों पर कॉपीराइट की चर्चा हुई थी. इसलिये हमने सोचा कि इस यक्ष प्रश्न को फिर से उठाया जाय.
मेरी एक पोस्ट पर किसी बहन [...]
January 20th, 2008 | Posted in बहस | 7 Comments
मेरी टिप्पणी वाली पोस्ट पर विस्तृत टिप्पणीयाँ थमने का नाम ही नहीं ले रही. कल जब सोच रहा था कि शायद अब यह सिलसिला थम गया होगा तो आज सुबह देखा एक और बड़ी टिप्पणी आयी. यह टिप्पणी क्या ..यह तो किसी पोस्ट से भी बड़ी है. यह भी छ्द्म नाम से की गयी है [...]
January 19th, 2008 | Posted in बहस | 6 Comments
एक अच्छे व्यंगकार की खासियत है कि हास्य के रंगो के साथ साथ यथार्थ के ऎसे रंग मिलाये जायें कि पाठक को पता भी ना चले और गहरी से गहरी बात उसके दिमाग में सीधे उतर जाये.अंतिम पैरे में किबला के गांव का वर्णन तो देखिये. लगता है पूरा का पूरा चित्र आंखों के सामने [...]
January 19th, 2008 | Posted in खोया पानी | 2 Comments
[ व्यंग्य की दुनिया का अद्भुत नमूना है “खोया पानी”. यदि किसी को व्य़ंगकार की ओबजर्वेशन की ताकत का पता करना हो तो इस उपन्यास को पढ़े.यह पाकिस्तान के मशहूर व्यंग्यकार मुश्ताक अहमद यूसुफी की किताब आबे-गुम का हिन्दी अनुवाद है. इस पुस्तक के अनुवाद कर्ता है ‘लफ़्ज’ पत्रिका के संपादक श्री ‘तुफैल चतुर्वेदी’ जी. [...]
January 18th, 2008 | Posted in खोया पानी | 2 Comments