नमस्कार!
मैं Ashley Layla , अन्तर-जाल व्यापार का विशेषज्ञ हूँ| मैं खोज यन्त्र संधान कर्ता भी हूँ | मैं इस क्षेत्र में गत 1 वर्षो से हूँ तथा इसके प्रत्येक गुण एवं दोष से भालीभाती परिचित हूँ| आपके किसी भी जिज्ञाषा को शांत करने में पूर्णतया समर्थ, मैं आपकी सेवा में उपस्थित हूँ !
इन सब के अलावे मेरी कुछ रुचियाँ भी हैं जिनमें कविता लेखन तथा चुटकुले सामिल हैं..मेरे साथ आप इनका भी आनंद ले सकते हैं |
मेरा पता यह है
जीमेल :- workwithseo@gmail.com
याहू :- ram_sachin@yahoo.co.in
हाटमेल : – workwithseo@hotmail.com

 

ये परिचय है एक चोर का जिन्होने अभी अभी एक चिट्ठा शुरु किया और इस चिट्ठे पर सारी की सारी रचनाऎं चोरी की हैं. यहाँ तक की इन्होने चित्र का मूल लिंक भी मूल चिट्ठे पर रखा है. इसी का फायदा उठाकर मैने अपनी चिट्ठे पर चित्र बदल दिया तो इनकी पोस्ट भी बदल गयी. आप भी देखिये.

मूल चिट्ठा मूल लेखक-तिथि चोर का नाम -तिथि चोरी का माल
वो कहते नहीं क्यूं मोहब्बत है उनको |

vinod kumar

Wednesday, September 19, 2007

January 23, 2008 — workwithseo वो कहते नहीं क्यूं मोहब्बत है उनको…
Mobile Hindi Love SMS’s January 20, 2008 — workwithseo Love SMS’s
टिंकू की दाढ़ी और लम्बाई September 5, 2007 by chaturchacha January 20, 2008 — workwithseo टिंकू की दाढ़ी और लम्बाई
आज कुछ कमी सी है तेरे बगैर December 10, 2007 — दीपक January 20, 2008 — workwithseo आज कुछ कमी सी है तेरे बगैर
मजेदार कार्टूनः टाटा नेनो के १० साइड इफेक्टस January 16, 2008 — Tarun January 20, 2008 — workwithseo मजेदार कार्टूनः टाटा नेनो के १० साइड इफेक्टस
ये कैसी बेबसी Tuesday, May 29, 2007

by Neeraj Rajput

January 20, 2008 — workwithseo ये कैसी बेबसी
“मैडम जी..कहाँ थी आप?” December 6, 2007

राजीव तनेजा

January 3, 2008 — workwithseo “मैडम जी..कहाँ थी आप?”
भूल गया Friday, December 14, 2007

सुधांशू द्वारा

January 3, 2008 — workwithseo भूल गया

रचनाकार: हिन्दी भाषा का प्रथम व्याकरण

November 17, 2007 December 30, 2007 — workwithseo हिन्दी भाषा का प्रथम व्याकरण
पारसी थियेटर, मुग़ले आज़म और माचिस की तीलियां

 

11Dec07

जगदीश भाटिया

December 31, 2007 — workwithseo पारसी थियेटर, मुग़ले आज़म और माचिस की तीलियां
क्रिसमस का इतिहास

 

December 24, 2007 December 30, 2007 — workwithseo क्रिसमस का इतिहास

मैं कभी अमरीका नहीं गया …हाँलाकि मेरे कई मित्र अभी अमरीका में हैं. वैसे मेरे पास भी कई ऑफर आये अमरीका जाने के (आई.टी. में यह कोई बड़ी बात नहीं है) लेकिन ना जाने क्यों अभी तक खुद को तैयार नहीं कर पाया इस के लिये.

अभी कुछ दिनों पहले एक मित्र से मुलाकात हुई जो अमरीका में रह चुके थे. उन्होने अमरीका के बारे में एक मजेदार बतायी. जिस प्रकार भारत में लेन ड्राइविंग होती है उसी प्रकार अमेरिका में भी होती है. लेकिन सामान्यत; भारत में यह निर्धारित नहीं है कि किस लेन में कौन चलेगा. लेकिन अमेरिका में एक लेन (शायद सबसे बांये वाली) ऎसी होती है जिसे पूल-कार लेन कहा जाता है. इसमें चलने वाले अपनी गाड़ी की स्पीड सामान्य से ज्यादा रख सकते हैं और आमतौर पर इसमें ट्रैफिक जाम भी नहीं लगता…. लेकिन इसमें वही गाड़ी चल सकती है जिसमें एक से ज्यादा लोग बैठे हों. इसके पीछे तर्क यह होता है कि आप ट्रैफिक को कम करने के लिये कार पूल का उपयोग करें तो जितने लोग आपकी पूल कार में बैठे हैं उतनी गाडियाँ सड़क पर कम चल रही हैं. …तो इस लेन में चलने के लिये जरूरी है कि आपके कार में एक से ज्यादा लोग बैठे हों.

इससे निबटने का तरीका भी अमरीका वालों ने बहुत खूब निकाला. वहाँ दुकानों में इस तरह कि डमी मॉडल (खिलोने) मिलते हैं जो देखने में बिल्कुल जीते जागते इंसान की तरह ही लगते हैं. लोग इनको खरीद के अपनी गाड़ी में बिठा लेते हैं और पूल-कार लेन में आराम से अधिक स्पीड में चलते हैं.  

carpool

यह दाढ़ी और चश्मा लगाये सज्जन सचमुच में नहीं हैं वरन एक खरीदे हुए मॉडल हैं.

(चित्र गूगल इमेज सर्च द्वारा)

इसी से जुड़ा हुआ एक किस्सा और सुनाया उन्होने. एक व्यक्ति हमेशा ट्रैफिक की वजह से ऑफिस में देरी से पहुचता था. पहले उसने सोचा कि वह भी इस तरह की डमी खरीद ले लेकिन फिर उसके दिमाग में एक आइडिया आया. वह अपने घर के पास वाली सड़क में एक बोर्ड लेकर खड़ा हो जाता जिसमें लिखा होता ” Today Traffic is bad. Either spend two hours or pay me $15 and get there in 15 minutes” [आज सड़क पूरी तरह जाम है. या तो इस जाम में दो घंटे फंसे रहो या फिर मुझे 15 डालर दो और 15 मिनट में ऑफिस पहुंचो ] 

कौन कहता है कि केवल भारतीय ही जुगाड़ू होते हैं?

हिन्दी चिट्ठाजगत चोरी की घटनाऎं बीच बीच में सामने आती रहती हैं. कॉपीराइट का प्रश्न भी यदा-कदा उठता ही रहता है. अभी कुछ दिनों पहले टिप्पणीकार की किसी पोस्ट पर भी टिप्पणीयों पर कॉपीराइट की चर्चा हुई थी. इसलिये हमने सोचा कि इस यक्ष प्रश्न को फिर से उठाया जाय.

मेरी एक पोस्ट पर किसी बहन जी ने एक लंबी टिप्पणी की थी.जिसे मैने एक पोस्ट के रूप में आपके सामने रखा. हाँलाकि मुझे शक था कि यह कहीं ना कहीं से कॉपी की गयी है और इसका जिक्र भी मैने अपनी पोस्ट में किया था. इसी पोस्ट के बारे में रचना जी ने बताया कि यह यहाँ से कॉपी की गयी है. अब मानिये कि उस समीक्षा की मूल लेखिका या लेखक कल को मेरे को कॉपीराइट के अंतर्गत चार्ज करे कि मैने उसके कंटेंट की चोरी की है तो मैं क्या जबाब दूँ??

इस तरह से तो कोई भी छ्द्म नाम से कुछ भी कॉपीराइट कंटेंट किसी टिप्पणी में डाल सकता है. इस प्रकार की घटना में कॉपीराइट की चोरी का इल्जाम किस पर लगना चाहिये..क्या चिट्ठाकार पर जिसके चिट्ठे पर वह टिप्पणी है या उस अनाम पर जिसका कोई पता ही नहीं है..सिवाय आई.पी. ऎड्रेस के.

क्या मेरे को वह पोस्ट और वह टिप्पणी हटा देनी चाहिये? कृपया सुझायें.

मेरी टिप्पणी वाली पोस्ट पर विस्तृत टिप्पणीयाँ थमने का नाम ही नहीं ले रही. कल जब सोच रहा था कि शायद अब यह सिलसिला थम गया होगा तो आज सुबह देखा एक और बड़ी टिप्पणी आयी. यह टिप्पणी क्या ..यह तो किसी पोस्ट से भी बड़ी है. यह भी छ्द्म नाम से की गयी है ….किन्ही बहन जी द्वारा.यहाँ पर यह बता दूँ कि यह बहन जी एक टिप्पणी पहले भी कर चुकी हैं… जिसमें इन्होने रंजना जी के लिये अपशब्द कहे थे. इसलिये वो टिप्पणी मैने सार्वजनिक नहीं की. वैसे आज की टिप्पणी कहीं से कॉपी की हुई लगती है… लेकिन है अच्छी इसलिये आप भी पढिये.

[ बाद में जोड़ा गया: रचना जी ने बताया कि यह टिप्पणी यहाँ से चुरायी गयी है. इस लेख पर अधिकार मूल लेखक/लेखिका के हैं. पूरी समीक्षा आप यहाँ क्लिक कर पढ़ें ]

मिथिलेश वामनकर अपनी समीक्षा में क्या कहते हैं. यह आपको पढ़ना चाहिए.

यह रेखांकित करने लायक बात है कि अब स्त्री अपने जीवन के असंख्य क्लेशों का इतिहास अपनी ही जुबानी बताने को तत्पर है। एक जद के साथ उसे यह घोषित करना पड रहा है कि इतनी बडी दुनिया में उसकी अनुभूतियों को कोई स्थान नहीं मिल पा रहा है। महादेवी वर्मा ने लिखा है –

विस्तृत नभ का कोई कोना
मेरा न कभी अपना होना
मैं नीर भरी दुःख की बदली –

दूसरी ओर प्रसिद्ध नारीवादी लेखिका वर्जीनिया वुल्फ को जब इंग्लैण्ड के विश्वविद्यालय में उद्बोधन के लिये आमंत्रित किया गया तो उन्होंने कहा ‘मैं पहले अपने कमरे के विषय में बोलना चाहती हूँ।’ श्रोताओं की शंका का समाधान करते हुए फिर उन्होंने बताया कि इसका महिला लेखन से गहरा सम्बन्ध है क्योंकि कोई जगह होनी चाहिए जहाँ वे बैठ कर अपनी मानसिक दुनिया के सुख-दुःख और संघर्षों पर अपने आपसे विमर्श कर सके।’ दो बडी लेखिकाओं की यह पीडा दर्शाती है कि स्त्री होने के कारण ही उनकी कुछ अनसुलझी गुत्थियाँ थीं जो सभ्य समाज पर सबसे बडा प्रश्नचिह्न लगाती हैं। किसी सभ्य समाज के विकास की प्रक्रिया में स्त्री को अलग-थलग ही नहीं बल्कि ‘हेय’ माने जाने के कुछ और भी उदाहरण मिलते हैं जैसे क्यूसीडायडीज की सम्मति थी कि ‘जिस प्रकार किसी सभ्य स्त्री का शरीर उसके मकान के अन्दर बन्द रहता है वैसे ही उसका नाम भी बंद रहना चाहिए।’ सुकरात यह मानते थे कि नारी सभी बुराइयों का मूल है, उसका प्यार पुरुषों की घृणा से अधिक भयावह है। अरस्तु के अनुसार ‘नारी की तुलना में पुरुष स्वभावतः श्रेष्ठ होता है क्योंकि नारी इच्छा शक्ति में निर्बल, नैतिकता में शिथिल और विचार-विमर्श में अपरिपक्व होती है।’

‘मनु’ के अनुसार तो स्त्री के लिये पति सेवा ही गुरुकुल में वास और गृहकार्य अग्नि होम है -

पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने ।
रक्षन्ति स्थविरै पुत्रा न स्त्री स्वतन्भ्यमर्हति ।

इस तरह सारे विधि, शास्त्र और व्यवस्था में स्त्री अपनी देह की ही ‘अनधिकारिणी’ होती है जैसे वह देह उसकी नहीं किसी एक व्यवस्था की है, जिसका संचालन पुरुष प्रधान समाज के हाथों में है। स्त्रियाँ स्वयं भी यह अनुभव करती हैं और स्त्री विमर्श में भी यह चिन्ताएँ सामने आई हैं कि स्त्रियाँ दुनिया को अपनी नहीं पुरुष की आँखों से समझना और भोगना चाहती हैं। वे स्त्रियाँ जो पुरुष की ‘अनुकम्पा’ पर जीवन बसर करना अपनी ‘नियति’ मानकर स्वीकार कर चुकी हैं, उनकी ‘गिरवी’ रखी हुई आत्माओं पर किसी प्रकार का बोझ नहीं है। संकट उन प्रश्नाकुल स्त्रियों का है जो अपनी तयशुदा भूमिका और निर्धारित प्रायोजित और आदेशात्मक शब्दावली से आहत और अघायी हुई हैं। उनकी दिक्कत यह है कि वे अपने आपसे प्रश्न पूछने लगी हैं ‘ जैसे कि स्त्री के जन्म से मृत्यु तक के मसले ‘हाँ’ और ‘ना’ के बीच क्यों तैरते हैं ‘ क्यों लडका ‘चिरंजीवी’ और लडकी ‘सौभाग्यकांक्षिणी’ कहलाती हैं। सौभाग्यवती होकर जीना यदि स्त्री की पहली खुशी है तो वह सौभाग्य भी उसे सही अर्थों में प्राप्त क्यों नहीं है ‘ ऐसी ‘सौभाग्यशाली’ को दहेज के कारण जला देना ‘गलत’ नहीं है ‘ क्या यह ‘सही’ है कि स्त्री को बुद्धिमान न माना जाए ‘ ‘देह’ से शुरू होकर ‘देह’ पर ही उसकी इति मान ली जाए ‘ यह सारा झगडा अन्तहीन भी इन्हीं कारणों से बना हुआ है कि कुछ तो स्त्री जीवन का इतिहास और वर्तमान विडम्बनाओं और अन्तर्विरोधों से भरा है, दूसरा पुरुष प्रधान समाज का सोच भी संकीर्णताओं से घिरा हुआ है। पता ही नहीं चला कि कब स्त्री को व्रत, अनुष्ठान,श्रंगार-सिन्दूर, पायल, बिछिया, बिन्दी, चूडी और मेहन्दी रंगे हाथों में बाँधकर उसकी देह पर कब्जा कर लिया गया। फिर मोहाविष्ट होकर स्त्री ने इसी खेल को अपना ‘सौभाग्य’ मान लिया। भोग्या बनकर वह स्वयं से प्रश्न पूछने से भी डरने लगी। कभी यह पूछने का साहस ही नहीं जुटा पायी कि ‘क्या मेरी संवेदनाओं, मेरी इच्छाओं, मेरी बुद्धि का किसी को पता चला ‘ क्या मैं भी अपने मन में बसी हजारों हजार इच्छाओं में किसी एक ‘इच्छा’ को व्यक्त करूँ ‘ क्या ‘मैं’ अपनी ‘सरीखी’ संरचना को जन्म दूँ ‘

सारे विमर्श के केन्द्र में मुख्य चिन्ता यही है कि ‘आखर स्त्री का वजूद, उसका अस्तित्व क्या है ‘ क्या कोई रास्ता है जिस पर वह आजादी से चल सके ‘

स्त्रियों के संघर्ष, उनके उत्पीडन, उनकी छटपटाहट से साहित्य जगत् में भी हलचल होती रही है। इसकी पहली अनुगूँज (कहानी में) बंग महिला (राजेन्द्र बालाघोष) की ‘कुम्भ में छोटी बहू’ और ‘दुलाईवाली’ कहानी में सुनाई देती है। इस प्रकार के लेखन की सबसे बडी विशेषता तो यही थी कि लेखिकाओं ने समाज के शक्ति केन्द्रों पर निशाना साधा था। यह सच उतना ही पारदर्शी है जितने में स्त्री अपनी भाषा और अपने भोगे हुए यथार्थ को अपनी रचनाओं में व्यक्त करे, गोया रचना को ही ‘आइना’ बना ले। लेखिकाओं ने अपनी रचनाओं में जिस स्वानुभूत सच्चाइयों को उजागर किया वे कुछ ज्वलन्त प्रश्नों को जन्म देती हैं। इस संदर्भ में महिला लेखन की परख करना जरूरी है क्योंकि इनके लेखन में स्त्री जीवन की चिन्ताएँ सामाजिक, आर्थिक, कानूनी और पितृ सत्तात्मक व्यवस्था के मुद्दों के रूप में विश्लेषित हुई हैं। यह सच ही है कि महिला लेखन में लगातार कुछ नया और उद्वेलित करता हुआ सच उद्घाटित हो रहा है। सबसे बडी चिन्ता तो यही है कि सम्पूर्ण सामाजिक और पारिवारिक ढाँचे में स्त्री को जगह तलाश करना। एक बडी साजिश यह हुई है कि स्त्री के मन को उसकी देह से पृथक कर दिया गया है। एकबारगी देखने से ऐसा लगता है कि उसकी आत्मा को मारकर, सोच की शक्ति को कुचलकर केवल देह को ही केन्द्र में रखा गया है। स्त्री-देह के प्रति पुरुष वर्ग का यह षड्यन्त्र वोल्गा की ‘राजनैतिक कहानियाँ’ नाम के संग्रह में खुलकर सामने आया है। स्वयं लेखिका की स्वीकारोक्ति है कि ‘शरीर के शोषण से स्त्री को मानसिक रूप से दमित रखना, उसके व्यक्तित्व के विकास को रोककर उसके शरीर को नियंत्रित रखना एक गहरी राजनीति है जो पुरुष प्रधान समाजों के मूल्यों के साथ गुँथी हुई है। अपना निजी काम समझकर जिसमें स्त्रियाँ अपनी पूरी ऊर्जा उण्डेल देती हैं वे काम दरअसल उनके लिये नहीं होते।

समाज की धारणा है कि शरीर तथा मन दो अलग-अलग ईकाइयाँ हैं और वह अवसर के अनुसार कभी मन तो कभी शरीर को अहमियत देने लगता है। लेखिका का मानना है कि हम अपने शरीर से अलग नहीं हैं, अब इस बात को स्पष्ट रूप से कहना अनिवार्य है। वोल्गा ने पूरी संवेदनशीलता के साथ आँख, कान, नाक, बाल आदि यानी स्त्री को पूरी देह की क्षमताओं को पुरुष और स्त्री तथा स्त्री और परिवार के सम्बन्धों की कसौटी पर परखा है। वोल्गा ने अपनी सभी कहानियों में उन अनुभवों की हिस्सेदारी की है जो कटु और यथार्थ है। इस रूप में कि स्त्री शोषण का मुख्य आधार शारीरिक दृष्टि से ही अधिक है। संग्रह की पहली कहानी ‘सीता की चोटी’ पढकर ऐसा लगता है कि स्त्री को सभी काम सामाजिक दिखावे, रीति-रिवाजों के निर्वहन पति, बच्चों आदि के लिये करने पडते हैं। बालों की देखभाल, उनका लम्बा और सुन्दर होना, उनमें फूल लगाना, चोटी बनाना कब उचित और कब अनुचित हो जाता है, इसका निर्णय सीता के हाथ में कभी रहा ही नहीं। पति गुजरा नहीं कि सिर मुण्डवाने का दबाव पडता है। अगर बाल सँवारने का काम सीता स्वयं के आनन्द के लिये करती है तो पति की मृत्यु के बाद क्यों नहीं कर सकती ‘ जीवन के उत्तरकाल में जबकि बाल सफेद हो गए, झडने लगे तब उसे समझ में आने लगा कि अपने बालों पर ही उसका हक नहीं है तो फिर औरत की पूरी देह पर कितनी क्रूरता से औरों का हक जम जाता होगा ‘

‘आँखें’ कहानी में स्त्री स्वाधीनता के प्रश्न को उठाया गया है। लडकियाँ बचपन से ही समाज द्वारा बनाए गए साँचे में ढाल दी जाती हैं। लडकियों पर बहुत से निषेध थोप दिये जाते हैं। लडकी और लडके के भेद को इस कहानी में बडी सूक्ष्मता से दर्शाया गया है। किसी भी लडकी की आँखें कितनी भी सुन्दर और बडी क्यों न हो वह दुनिया नहीं देख सकती, उस पर पुरुष प्रधान परिवार के लाख पहरे हैं। जबकि राम अपनी छोटी-छोटी आँखों से दुनिया देख सकता है, खा सकता है, घूम सकता है, खेल सकता है। ‘लडकी’, ‘लडकी’ ही बनी रहे इसमें स्त्रियों की दासता जनित सोच भी जम्मेदार है। उसे माँ ने डाँटा ‘क्या इधर- उधर देखती रहती है। सर नीचा करके चलो। लडकी की निगाहें हमेशा नीची ही रहनी चाहिए।’ कथ्य में जो उद्वेलन है वह प्रश्नों के रूप में बार-बार कौंधता है जैसे ‘देखने के बाद कुछ तो करना चाहिये नहीं तो देखने का क्या फायदा’ देखने के पहले, देखने के बाद भी एक जैसा रहेंगे तो देखना ही क्यों ‘

महिलाएँ अपने दैहिक सौन्दर्य के प्रति कितनी सचेत हैं इससे भी अधिक चिन्ता उन लोगों को है जो स्त्री को केवल दैहिक आधारों पर परखते हैं। रमा की नाक ‘बेसरी’ कहानी में चर्चा का विषय है और प्रकारान्तर से लेखिका ने यह चिन्ता व्यक्त की है कि रमा के साथ जो हो रहा है वह गलत है। रमा की नाक का छेद और दाग सबको दिखाई देता है किन्तु कोई यह समझने को तैयार नहीं है कि वह कितनी शिक्षित है, उसके मन में इस बात की कितनी नाराजगी है कि ‘अब वैसा जमाना हो गया कि विवाह के लिये वर पक्ष वालों की इच्छानुसार वधुओं को अवयव बदलने पडेंगे। अब तक हर लडके वालों ने रमा की नाक के छेद पर टिप्पणी की तो पिता ने उसकी नाक की सर्जरी करवायी। फिर एक रिश्ता आया है। दहेज तय हो गया। वर पक्ष वाले खुश हैं। बस सत्यनारायण की एक ही इच्छा है कि लडकी की नाक में बेसरी हो। बेसरी पहनने के लिये फिर नाक में छेद करवाना। किन्तु रमा ने तय किया – ‘अब बिलकुल नाक में छेद नहीं करवाऊँगी। यह शादी रुक जाएगी तो रुकने दो।’ विडम्बना यह है कि पहले लडके वालों की आपत्ति हुई तो नाक का छेद बंद करवाया। अब फैशन है और लडका चाहता है लडकी नाक में बेसरी तो फिर से ……. ।

जानकी के दिमाग की सबसे बडी उलझन यही है कि क्यों उसे मुँह बन्द करने के लिये कहा जाता है जबकि उसके भाई जोर-जोर से चिल्लाते हैं। ‘मुँह बन्द करो’ कहानी स्त्री के दिमाग पर चोट करती है क्योंकि ‘शब्द मुँह से निकलते हैं पर उनका जन्म तो दिमाग से होता है।’

स्त्रियों में अपने शरीर और शरीर धर्मों के प्रति हीन भावना पैदा करने की जम्मेदारी पितृसत्तात्मक समाज की है। शिक्षक, नजदीक के रिश्तेदार, पति, पिता, भाई इन सभी के दुर्भावनापूर्ण व्यवहार से क्षुब्ध स्त्री को अपना जन्मना ही ‘पाप’ लगने लगता है। इस संकलन की ‘दीवारें’, ‘रक्षक’ ‘क्या करना चाहिए’ आदि कहानियों में महिलाओं की अवास्तविक जंदगी का दारुण दुःख व्यक्त हुआ है। पुरुष प्रधान समाज की इस राजनीति को समझना होगा कि परिवार में उनको विभाजित करके रखा जाता है। सास, ननद, बहू, जेठनी, देवरानी के झगडे करवाये जाते हैं। घर में वे मित्र नहीं शत्रु की तरह रहती हैं। लेखिका का इशारा इस ओर भी है कि स्त्रियों को इन कहानियों को पढकर अपने ‘भ्रम’ दूर कर लेने चाहिये। प्रेम, वात्सल्य, कर्त्तव्य और जम्मेदारी के नाम पर उसे ‘घर’ देकर पुरुष अपने राजनैतिक खेल खेलता है। यह राजनीति ‘घर’ और ‘सुरक्षा’ के नाम पर खेली जाती है जहाँ निरन्तर स्त्री के आत्मगौरव को ठेस पहुँचाती रहती है। ‘पत्थर के स्तन’ कहानी का टीचर और मामा, ‘एक राजनीतिक कहानी’ का पति, ‘आर्ति’ कहानी के माँ और पिता, ‘विवाह’ कहानी की सामाजिक परम्परा की अनिवार्यता आदि में स्त्री के विचार, भाषा, अनुभूति सब कुछ कुचलकर उसे स्त्री-गरिमा की कई सीढयों से नीचे धकेल दिया गया है। एक तथ्य इसमें अन्तर्निहित है और वह यह कि देह के भीतर बसे मन और बुद्धि में जो स्वतंत्रता और आत्मबोध का ज्ञान है वह पितृसत्ता को चुनौती देता है। देह के प्रति अनाधिकृत आकर्षण और फिर उस पर मनचाहा नियंत्रण, यही लोगों का मुख्य ध्येय है।

स्त्री और स्त्री समुदाय की दासता के कितने रूप समाज में बिखरे पडे हैं, उन पर भी ध्यान देने की जरूरत है। हम जब भी अपनी सुप्त चेतना को झकझोरते हैं तो इस सत्य को जान पाते हैं कि स्त्रियों से सम्बन्धित कई धार्मिक और सामाजिक विषय ऐसे हैं जिन्हें हम ‘प्रथा’ कहकर महत्त्व ही नहीं देते हैं। स्त्री समुदाय पर पूरा कब्जा बना रहे इसलिये उन्हें कई प्रकार की अतिवादी भावाकुलताओं से जोडे रखा जाता है। भारतीय समाज का अस्तित्व शायद ऐसी ही प्रथाओं के बलबूते पर बना रहता है। जया जादवानी की कहानी ‘जो भी यह कथा पढेगा’ भारतीय सांस्कृतिक जीवन के परम्परागत ढाँचे में हस्तक्षेप करती प्रतीत होती है। यह कहानी उन तमाम स्त्रियों के जीवन के उस पाखण्ड का पर्दाफाश करती है जो धर्म के नाम पर सदियों से चलता आ रहा है। व्रत, अनुष्ठान, पूजापाठ के कर्म विधानों से स्त्रियाँ वैसे ही जकडी हुई हैं फिर अब उनके व्यस्त कार्यक्रमों में सीरियल भी आ जुडे हैं। अब उन्हें दुनिया देखने की फुर्सत ही कहाँ है ‘ गहने, कपडे, सौन्दर्य प्रसाधनों से दबी ढँकी इन स्त्रियों को अपनी मुख्य समस्या का बोध ही नहीं है। औरतों और लडकियों ने ‘तीज’ का व्रत किया, अपने घर की उकताहट, झल्लाहट और रूटीन से हटने के लिये सामूहिक रूप से मंदिर गयीं। पूजा, कथा श्रवण सब कुछ की व्यवस्था है किन्तु वहाँ उन्होंने सुनने के सिवा मनचाहा सब कुछ किया। सुष्मिता सेन की बातें, फिर मन का कुछ न कर पाने की हताशा, चाँद निकलने का इन्तजार और इन सबके बीच यह अनुभूति कि व्रत की इन कहानियों में लहुलुहान औरतों की आत्माएँ हैं। सभी स्त्रियाँ धार्मिक पर्वों पर निरपेक्ष रहती हैं। उनकी आस्थाएँ ‘छूट’ लेना चाहती हैं, पानी न पीना हो तो दूध पीने का मन बनाना, खीर की जगह चाप्सी और चाउमीन खाना और घर में पति यानी शासक नहीं बल्कि पुरुष, ‘मानवीयता’ की तलाश करना, एक तरह से रूढयों के प्रति विद्रोह है। वे स्त्रियाँ जो व्रत करती हैं और वे जो बिना आस्था के व्रत करने को मजबूर हैं, उन्हें अब यह महसूस होने लगा है कि व्रतों की कहानियों में स्त्री की कमजोरियाँ दर्शायी जाती हैं। ‘सुहागन’ बने रहने में ही वे सुरक्षित अनुभव करती हैं। व्रतों की अतिवादी भंगिमा को तोडती यह कहानी जो भी पढेगा, जैसा कि शीर्षक भी है, वह इस सत्य से साक्षात्कार करेगा कि बहुत ही खूबसूरती से स्त्रियों के लिये ऐसी मर्यादाओं का घेरा बना दिया गया है जिसमें रहते-रहते स्त्री की क्षमताएँ चुकती जा रही हैं। हजारों वर्षों से स्त्रियों के आदर्श सीता और सावित्री ही रहे हैं। इन ‘मिथकों’ के सहारे ही शेष जीवन बिताने की चाह रखना कितना खतरनाक है। एक महत्त्वपूर्ण बिन्दु यह भी है कि जिनके लिये स्त्री व्रत करती है, भूखी-प्यासी, थकी-क्लांत रहती है, क्या वह उससे प्रेम करता है और क्या यही पति उसे जन्म-जन्मान्तर चाहिये’

इस सन्दर्भ में शती के पूर्वार्द्ध में लिखी हुई यशपाल की कहानी ‘करवा का चौथ’ का उल्लेख करना प्रासंगिक ही होगा जिसमें स्त्री जीवन के अन्तर्विरोध अधिक व्यंग्यात्मक होकर व्यंजित हुए हैं। पति की प्रताडनाओं से तंग और क्षुब्ध पत्नी करवा चौथ के व्रत पर भूखे रहने की तुलना में रोटी खा लेती है और पति के पीटने पर चिल्लाते हुए कहती है – मार ले जितना मारना हो, मैंने कौन-सा तेरे लिये व्रत किया है।’ यह संवाद स्त्री के चेतना सम्पन्न होने का बहुत ही सार्थक उदाहरण है जिसमें सम्बन्धों की कसौटी व्रत करने या न करने में नहीं बल्कि ‘प्रेम’ में अन्तर्निहित है। अत्याचारी पति के प्रति यह विद्रोह नारीवाद का पहला उदाहरण माना जा सकता है।

कहानी में और स्त्री-विषयक चर्चित मुद्दों में एक और समस्या स्त्री के मन को कचोटती रहती है और वह है उसके ‘होने के अहसास की।’ उसकी ‘आइडेंटिटी अस्मिता या पहचान का सवाल’। वह अब सामाजिक काल्पनिकताओं से बाहर आने के लिये छटपटा रही है। अलका सरावगी की कहानी ‘मिसेज डिसूजा के नाम’ में लेखिका की आकांक्षा यही है कि वह घर-परिवार, पति-बच्चे के अलावा अपना भी जीवन जी सके। उसकी यही ‘चाहत’ उसकी सबसे बडी पीडा और असफलता का कारण बन जाती है। बच्ची के स्कूल से उपालम्भ, पति का आदेशात्मक स्वर सभी इस ओर इशारा करते हैं कि दुनिया में जितने अनुशासन हैं, उनकी कैद में अधिकतर बच्चे और महिलाएँ दण्डित हैं। खोजने पर पता चलता है कि अभी तक हमें जीने का सही ढंग आया ही नहीं है। जहाँ जिज्ञासाएँ, प्रश्न, प्रफुल्लता और संवेदनाएँ नहीं होंगी वहाँ मुर्दादिली पसरी दिखाई देगी। वर्तमान समय में कहानियों के कलेवर ने जो परिदृश्य हमारे समक्ष प्रस्तुत किया है उसमें नौकरी पेशा महिलाओं के जीवन की चिन्ताएँ शीर्ष पर हैं। पितृसत्तात्मक समाज, बाजारवाद, पूँजीवादी संस्कृति और बढती हुई असीमित लालसाओं ने स्त्री के सम्मुख बहुत से संकट खडे कर दिए हैं।

अचला नागर की कहानी ‘सिफारिश’ की गुड्डी दैहिक शोषण से बचने के लिए चार नौकरियाँ छोड चुकी है किन्तु पाँचवीं नौकरी के लिये सिफारिश चाहिये और उसके लिये गुड्डी को समर्पण करना पडता है। माँ की शिक्षा, अपना आत्म सम्मान, सब कुछ गिरवी रख देती है, ‘गाडी सूनी सडक पर चलती है। सामने लगे शीशे पर एक बार यूँ ही मेरी दृष्टि चली जाती है ……. एक जोडी सुर्ख आँखें मेरी आँखों से मिलती हैं और फिर से एक हौल-सा मन में गडबडाने लगता है ….. तभी उनकी बाईं बाँह मेरे कन्धे पर टिक जाती हैं, उँगलियाँ इधर-उधर रेंगने लगती हैं, और कुछ देर बाद माँ के पहनाए गए जिरह-बख्तर में आजाद होने के बाद मैं सामने झूलते हुए सफलता के उस रेशमी परिधान को देखती हूँ।’
‘जाँच अभी जारी है’ कहानी में ममता कालिया ने स्त्री- उत्पीडन की व्यथा को बहुत ही मार्मिकता के साथ व्यक्त किया है। अपर्णा मेहनती, कुशाग्र और ईमानदार स्त्री है। सम्भवतः यही गुण उसके अवगुण बन जाते हैं। वह बैंक के अपने सहकर्मियों के साथ शामें नहीं गुजारती है। नैतिकता और सच्चाई का दामन पकडे वह जिस रास्ते पर चलना चाहती है उसमें बहुत से व्यवधान आते हैं। उस पर झू�� ा मुकदमा भी चलता है। वह हर जगह अपनी नेक-नियति की सफाई देती है किन्तु निराशा ही हाथ लगती है। इस सारे संघर्ष में से बदली हुई स्त्री की जो चौंकाने वाली छवि सामने आयी उसने स्त्री के आदर्शवादी नकाब को उतारकर फैंक दिया। कमल कुमार की कहानी ‘सीढयाँ’ में नीरू सफलता के लिये पुरुष मित्रों को सीढी की तरह काम में लेती है। उसे लगता है अजय में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं रही है। अजय से मित्रता रखना मतलब कि घर के बोझ से दबी घरेलू औरत। विजय की मित्रता, उसका कलात्मक व्यक्तित्व भी नीरू को रास नहीं आता, क्योंकि वह आदर्शवादी है। नीरू की दिलचस्पी अब अनिल में है। किन्तु देह और दुनिया के सारे खेल देखकर उसे इस सच्चाई का भान होता है कि रिश्तों को साधन नहीं साध्य मानना चाहिये। वह पुनः लौटती है पुराने सम्बन्धों के पास। विजय को फोन करती है।

नौकरीपेशा स्त्री की छटपटाहट, अपने ही निर्णयों के प्रति असमंजस की स्थिति, संवेदनाओं के उतार-चढाव की अत्यन्त ही मर्मस्पर्शी कहानी है। चित्रा मुद्गल की ‘दरमियान’। एक नौकरी में उलझी स्त्री के पास सबसे अधिक समस्या है समय की। उसकी चिंता कभी ‘स्व’ के प्रति, कभी बच्ची के प्रति, कभी पति के प्रति सन्नद्ध होती है। ऐसी ऊहापोह और उलझन भरी मनःस्थितियों का पुनः पुनः दोहराया जाना यह सिद्ध करता है कि महानगरीय जीवन के बीच नौकरी और परिवार के बीच सामंजस्य स्थापित करना कितना मुश्किल है। समकालीन समय में जीवन मूल्यों में जो परिवर्तन आया उसने स्त्री जीवन को भी प्रभावित किया है। मधु कांकरिया उन लेखिकाओं में है जिन्होंने स्त्री के मन को बहुत ही गहराई से टटोला है। मधु कांकरिया की कहानियों की स्त्रियाँ कहीं बेबाक, कहीं कोमल और कहीं अपनी अस्मिता की तलाश करती हुई दिखाई देती है। यह कम महत्त्वपूर्ण तथ्य नहीं है कि मधु ने जब भी अपनी स्त्री पात्रों के प्रति न्याय किया वे अपने आप से, एक विशेष प्रकार के काल्पनिक रिश्तों से मुक्त होती हुई प्रतीत होती हैं। मधु का ‘बीतते हुए’ में इन्द्रजीत और मणि दीपा के प्रेम-प्रसंग को, प्रेम के उठते-गिरते ग्राफ को और फिर इस रिश्ते से उठती भाप को बादल बनते हुए दिखाया है। पन्द्रह वर्षों के सुदीर्घ अन्तराल के बाद, जीवन में बहुत कुछ खोकर, मणिदीपा इन्द्रजीत अपने पुराने प्रेमी को आमंत्रित करती है। इन्तजार लम्बा होता जाता है, और पुरानी स्मृतियाँ पुनर्जीवन पाती हैं। इस उद्वेलन को सहते-सहते मणिदीपा ‘प्रेम’ की परिभाषा कुछ यूँ करती है – ‘मुझे तो आत्मबोध हो चुका इन्द्र का प्रेम न उद्दाम वेग है, न आत्मविस्मृति या तल्लीनता के चरम क्षण। थककर चूर निःस्पन्द पडी काया के सिरहाने तकिया बढाते हाथ प्रेम है। श्रम और परेशानी से माथे पर उभरी स्वेद बूँदों पर शीतल उँगलियों की छुअन है प्रेम। ठिठुरती ठंड में गर्म खाने के लिये ठिठुरती प्रतीक्षारत निगाहें हैं प्रेम।

हिन्दी कहानियों में महत्त्वपूर्ण बदलाव उषा प्रियम्वदा की उन कहानियों से आया जिनमें एक तरफ अर्थ के प्रभाव है तो दूसरी ओर स्त्री के अकेलेपन का विस्तार वर्णित है। ‘जन्दगी और गुलाब के फूल’ उषा जी की ‘नई कहानी’ के दौर की किन्तु इस समय की पुरानी कही जाने वाली कहानी है किन्तु अर्थ के केन्द्र में यदि स्त्री है तो पुरुष का अहं कैसे आहत होता है’ यह मुहावरा आज भी अपना असर बनाए हुए हैं। पिछले दिनों उषा प्रियम्वदा का ‘मेरी कहानियाँ’ नाम से संग्रह पढने को मिला। उनकी ‘कितना बडा झूठ ’ और ‘मोहबंध’ कहानियों में आधुनिक भारतीय समाज में वैवाहिक जीवन की असंगतता और दिखावे की स्थितियों को प्रस्तुत किया गया है। प्रेमविहीन जीवन स्त्रियों को कितना थका देता है इसका यथार्थ वर्णन किया गया है। विवाह सम्बन्ध कम समझौता अधिक है। ‘कितना बडा झूठ ’ कहानी की किरण नौकरीपेशा आधुनिक स्त्री है। उसके मन में पति और बच्चों से मिलने की इच्छा नहीं है। वह चाहती है मैक्स का स्पर्श। दैहिक सुख। विवाहेतर सम्बन्धों का यह सहज स्वीकार स्त्री को नये सोच की तरफ धकेलता है। किरण को मैक्स का शादी कर लेना इसलिये स्वीकार्य नहीं है। किन्तु विवश और लाचार वह झूठ से सही पति और बच्चों को अपनाने के लिये स्वयं को तैयार कर लेती है।

[ बाद में जोड़ा गया: रचना जी ने बताया कि यह टिप्पणी यहाँ से चुरायी गयी है. इस लेख पर अधिकार मूल लेखक/लेखिका के हैं. पूरी समीक्षा आप यहाँ क्लिक कर पढ़ें ]

क्या यह बहनजी सामने आंयेगी.

रंजना जी ने कहा.

बहन जी,आपकी साहित्यिक चेतना वन्दनीय है,अद्भुत है.आपसा कहानियो का मिमान्सक जगत मे मिलना दुर्लभ है.
साधुवाद.

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मुँह ना खुलवाइये-वरना जितना आरोप एक स्त्री लगा सकती है उससे कहीं ज्यादा एक पुरुष

आज सुबह लिखी पोस्ट : दौड़ता हुआ पेड़

एक अच्छे व्यंगकार की खासियत है कि हास्य के रंगो के साथ साथ यथार्थ के ऎसे रंग मिलाये जायें कि पाठक को पता भी ना चले और गहरी से गहरी बात उसके दिमाग में सीधे उतर जाये.अंतिम पैरे में किबला के गांव का वर्णन तो देखिये. लगता है पूरा का पूरा चित्र आंखों के सामने उतर आया है.

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कराची शहर उन्हें किसी तरह और किसी तरफ़ से अच्छा नहीं लगा। झुंझला कर बार-बार कहते “अमां! यह शहर है या जहन्नुम ?“ मिर्जा किसी ज्ञानी के शब्दों में तब्दीली करके कहते हैं, क़िबला इस दुनिया से कूच करने के बाद अगर खुदा करे, वहीं पहुंच गये जिससे कराची की मिसाल दिया करते हैं तो चारों तरफ़ नज़र दौड़ाने के बाद यह कहेंगे कि हमने तो सोचा था कराची छोटा-सा जहन्नुम है। जहन्नुम तो बड़ा-सा कराची निकला।

एक बार उनके एक क़रीबी दोस्त ने उनसे कहा कि तुम्हें समाज में खराबियां ही खराबियां नज़र आती है तो बैठे-बैठे इन पर कुढ़ने की जगह सुधार की सोचो। बोले, “सुनो! मैंने एक जमाने में पी. डब्ल्यू. डी. के काम भी किये हैं, मगर नर्क की एयर-कंडीशनिंग का ठेका नहीं ले सकता।

बात सिर्फ इतनी थी कि अपनी छाप, तिलक और छब छिनवाने से पहले वो जिस आईने में खुद को देख-देख कर सारी उम्र इतराया किये, उसमें जब नई दुनिया और नये वतन को देखा तो वह ज़माने की गर्दिशों से Distorting Mirror बन चुका था। जिसमें हर शक्ल अपना ही मुंह चिढ़ाती नज़र आती थी। उनके कारोबारी हालात तेजी से बिगड़ रहे थे। बिजनेस, न होने के बराबर था। उनकी दुकान पर एक तख़्ती लटके देख कर हमें दु:ख हुआ।

न पूछ हाल मिरा, चोबे-ख़ुश्के-सहरा हूं

लगा के आग जिसे कारवां रवाना हुआ

(मेरा हाल न पूछ मैं रेगिस्तान की सूखी लकड़ी हूं, जिसे आग लगा कर कारवां चला गया हमने उनका दिल बढ़ाने के लिये कहा, आपको चोबे-खुश्क (सूखी लकड़ी कौन कह सकता है? आपकी जवां हिम्मती और मुस्तैदी पर तो हमें ईर्ष्या ही होती है। अकस्मात मुस्कुराये, जबसे डेन्चर्ज़ टूटे, मुंह पर रूमाल रख कर हंसने लगे थे। कहने लगे, आप जवान आदमी हैं। अपना तो यह हाल हुआ कि

मुन्फइल हो गये क़वा ग़ालिब

अब अनासिर में एतदाल कहां

(सारे अंग प्रत्यंग कमज़ोर हो गये। अब तत्वों में सामंजस्य कहाँ) मैं वो पेड़ हूं जो ट्रेन में जाते हुए मुसाफिर को दौड़ता हुआ नज़र आता है।)

मेरे ही मन का मुझ पर धावा

यूं वो जहां तक मुमकिन हो अपने गुस्से को कम नहीं होने देते थे, कहते थे मैं ऐसी जगह एक मिनट भी नहीं रहना चाहता, जहां आदमी, किसी पर गुस्सा ही न हो सके और जब उन्हें ऐसी ही जगह रहना पड़ा तो वो ज़िन्दगी में पहली बार अपने आपसे रूठे। अब वो आप ही आप कुढ़ते, अंदर ही अंदर खौलते, जलते, सुलगते रहते:

मेरे ही मन का मुझ पर धावा

मैं ही आग  हूं,  मैं  ही    ईधन

उन्हीं का कहना है कि याद रखो, गुस्सा जितना कम होगा, उसकी जगह उदासी लेती जायेगी, और यह बड़ी बुज़दिली की बात है। बुज़दिली के ऐसे ही उदास लम्हों में अब उन्हें अपना गांव जहां बचपन गुजरा था, बेतहाशा याद आने लगता। बिखरी-बिखरी ज़िंदगी ने अतीत में शरण तलाश कर ली। जैसे अलबम खुल गया।

धुन्धली, पीले से रंग की तस्वीरें विचार-दर्पण में बिखरती चली जातीं। हर तस्वीर के साथ ज़माने का पृष्ठ उलटता चला गया। हर स्नेप शॉट की अपनी एक कहानी थी। धूप में अबरक के जरों से चिलकती कच्ची सड़क पर घोड़ों के पसीने की नर महकार, भेड़ के बच्चे को गले में मफ़लर की तरह डाले शाम को खुश-खुश लौटते किसान। पर्दों के पीछे हरसिंगार के फूलों से रंगे हुए दुपट्टे, अरहर के हरे-भरे खेत में पगडंडी की मांग, सूखे में सावन के थोथे बादलों को रह-रह कर ताकती निराश आंखें, जाड़े की उजाड़ रातों में ठिठुरते गीदड़ों की आवाजें, चिराग़ जले बाड़े में लौटती गायों के गले में बजती हुई घंटियां। काली भंवर रात में चौपाल की जलती बुझती गश्ती चिलम पर लम्बे होते हुए कश, मोतिया के गजरों की लपट के साथ कुंवारे बदन की महक, डूबते सूरज की पीली रोशनी में ताशा क़ब्र पर जलती हुई अगरबत्ती का बल खाता धुंआ, दहकती बालू में तड़कते चनों की सोंधी लपट से फड़कते हुए नथुने, म्यूनिसपिल्टी की मिट्टी के तेल की लालटेन का भभका। यह थी उनके गांव की सत सुगंध। यह उनकी अपनी नाभि की महक थी, जो यादों के जंगल में बावली फिरती थी।

जारी………………        ===========================================

पिछले अंक : 1. खोया पानी-1:क़िबला का परिचय 2. ख़ोया पानी 2: चारपाई का चकल्लस 3. खोया पानी-3:कनमैलिये की पिटाई 4. कांसे की लुटिया,बाली उमरिया और चुग्गी दाढ़ी़ 5. हवेली की पीड़ा कराची में 6. हवेली की हवाबाजी 7. वो तिरा कोठे पे नंगे पांव आना याद है 8. इम्पोर्टेड बुज़ुर्ग और यूनानी नाक 9. कटखने बिलाव के गले में घंटी 10. हूँ तो सज़ा का पात्र, पर इल्ज़ाम ग़लत है 11. अंतिम समय और जूं का ब्लड टैस्ट 12. टार्जन की वापसी 13. माशूक के होंठ 14. मीर तकी मीर कराची में

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khoya_pani_front_coverकिताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

 

 

Technorati Tags: पुस्तक चर्चा, समीक्षा, काकेश, विमोचन, हिन्दी, किताब, युसूफी, व्यंग्य, humour, satire, humor, kakesh, hindi blogging, book, review, mustaq, yusufi, hindi satire, book review

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: पुस्तक चर्चा, समीक्षा, काकेश, विमोचन, हिन्दी, किताब, युसूफी, व्यंग्य

[ व्यंग्य की दुनिया का अद्भुत नमूना है “खोया पानी”. यदि किसी को व्य़ंगकार की ओबजर्वेशन की ताकत का पता करना हो तो इस उपन्यास को पढ़े.यह पाकिस्तान के मशहूर व्यंग्यकार मुश्ताक अहमद यूसुफी की किताब आबे-गुम का हिन्दी अनुवाद है. इस पुस्तक के अनुवाद कर्ता है ‘लफ़्ज’ पत्रिका के संपादक श्री ‘तुफैल चतुर्वेदी’ जी.  इस उपन्यास की टैग लाइन है “एक अद्भुत व्यंग्य उपन्यास” जो इस उपन्यास पर सटीक बैठती है.इसी उपन्यास को छोटे छोटे भागों में यहां पेश किया जा रहा है. यदि आपने पहले की कडियाँ ना पढ़ी हों तो आपने बहुत कुछ मिस कर दिया. अब आगे पढिये.]

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पहली नज़र में उन्होंने कराची को और कराची ने उनको रद्द कर दिया। उठते बैठते कराची में कीड़े डालते। शिकायत का अंदाज़ कुछ ऐसा होता था। हज़रत! यह मच्छर हैं या मगरमच्छ? कराची का मच्छर डीडीटी से भी नहीं मरता, सिर्फ कव्वालों की तालियों से मरता है या ग़लती से किसी शायर को काट ले तो बावला होकर बेऔलाद मरता है। नमरूद (वह व्यक्ति जिसने पैग़म्बर इब्राहीम को जलाने की कोशिश की थी ) की मौत नाक में मच्छर घुसने से हुई थी। कराची के मच्छरों की वंशावली कई नमरूदों से होती हुई उसी मच्छर की वंशावली से जा मिलती है और जरा ज़बान तो देखिये। मैंने पहली बार एक साहब को पट्टे वाला पुकारते सुना तो मैं समझा अपने कुत्ते को बुला रहे हैं। मालूम हुआ कि यहां चपरासी को पट्टे वाला कहते हैं। हर समय कुछ न कुछ फ़ड्डा और लफ़ड़ा होता रहता है, टोको तो कहते हैं उर्दू में इस स्थिति के लिये कोई शब्द नहीं है। भाई मेरे! उर्दू में यह स्थिति भी तो नहीं है। बम्बई वाले शब्द और स्थितियां दोनों अपने साथ लाये हैं। मीर तकी मीर ऊंट गाड़ी में मुंह बांधे बैठे रहे, अपने हमसफ़र से इसलिये बात न की कि “ज़बाने-गै़र से अपनी ज़बां बिगड़ती है “ मीर साहब कराची में होते तो बखुदा मुंह पर सारी उम्र ढाटा बांधे फिरते। यहां तक कि डाकुओं का सा भेस बनाये फिरने पर किसी डकैती में धर लिये जाते। अमां ! टोंक वालों को अमरुद को सफ़री (पित्त बनाने वाला ) कहते तो हमने भी सुना था। यहां अमरूद को जाम कहते हैं और उस पर नमक मिर्च की जगह साहब लगा दें तो अभिप्राय नवाब साहब लासबेला होते हैं। अपनी तरफ़ विक्टोरिया का मतलब मल्का टूरिया होता था। यहां किसी तरकीब से दस-बारह जने एक घोड़े पर सवारी गांठ लें तो उसे विक्टोरिया कहते हैं। मैं दो दिन लाहौर रुका था। वहां देखा कि जिस बाज़ार में कोयलों से मुंह काला किया जाता है वह हीरा मंडी कहलाती है। अब यहां नया फैशन चल पड़ा है। गाने वालों को गुलूकार और लिखने वाले को क़लमकार कहने लगे हैं। मियां ! हमारे समय में तो सिर्फ नेककार (अच्छे लोग) और बदकार (बुरे लोग ) हुआ करते थे। कलम और गले से ये काम नहीं लिया जाता था। मैंने लालू खेत,बिहार-कालोनी, चाकीवाड़ा और गोलीमार का चप्पा-चप्पा देखा है। चौदह-पन्द्रह लाख आदमी ज़ुरूर रहते होंगे, लेकिन कहीं किताब और इत्र की दुकान न देखी। काग़ज़ तक के फूल नज़र न आये। कानपुर में हम जैसे शरीफों के घराने में कहीं न कहीं मोतिया की बेल जुरूर चढ़ी होती थी। जनाब! यहां मोतिया सिर्फ आंखों में उतरता है। हद हो गई, कराची में लखपति, करोड़पति सेठ लकड़ी इस तरह नपवाता है जैसे किमख़्वाब का टुकड़ा ख़रीद रहा हो। लकड़ी दिन में दो फुट बिकती है और बुरादा खरीदने वाले पचास! मैंने बरसों उपलों पर पकाया हुआ खाना भी खाया है लेकिन बुरादे की अंगीठी पर जो खाना पकेगा वो सिर्फ नर्क में जाने वाले मुर्दों के चालीसवें के लिये मुनासिब है।

भर पाये ऐसे बिजनेस से! माना कि रुपया बहुत कुछ होता है, मगर सभी कुछ तो नहीं। पैसे को जुरूरत पूरी करने वाला कहा गया है। बिल्कुल ठीक। मगर जब ये खुद सबसे बड़ी आवश्यकता बन जाये तो वो सिर्फ मौत से दूर होगी। मैंने तो जिदंगी में ऐसी कानी-खुतरी लकड़ी नहीं बेची। बढ़ई का ये साहस कि छाती पे चढ़ के कमीशन मांगे। न दो तो माल को सड़े अंडे की तरह कयामत तक सेते रहो। हाय! न हुआ कानपुर। बिसौले से साले की नाक उतार कर हथेली पर रख देता कि जा! अपनी जुरवा (पत्नी) को महर में दे देना। वल्लाह! यहां का तो बाबा आदम ही निराला है। सुनता हूं, यहां के रेड लाइट एरिया नैपियर रोड और जापानी रोड पर तवायफें अपने-अपने दर्शनी झरोखों में लाल बत्तियां जलते ही कंटीली छातियों के पैड लगा कर बैठ जाती हैं। फिल्मों में भी इसी का प्रदर्शन होता है। यह तो वही बात हुई कि ओछे के घर तीतर, बाहर बांधूं कि भीतर। इस्लामी गणतंत्र की सरकार-बेसरोकार कुछ नहीं कहती, लेकिन किसी तवायफ़ को शादी ब्याह में मुजरे के लिये बुलाना हो तो पहले इसकी सूचना थाने को देनी पड़ती है। रंडी को परमिट राशनकार्ड पे मिलते हमने यहीं देखा। ऐश का सामान मांगने के वक़्त न मिला तो किस काम का। दर्शनी मंडियों में दर्शनी हुंडियों का क्या काम।

मिर्जा अब्दुल बेग इस स्थिति की कुछ और ही व्याख्या करते हैं। कहते हैं कि तवायफ़ को थाने से N.O.C. इसलिये लेना पड़ता है कि पुलिस पूरी तरह इत्मीनान कर ले कि वो अपने धन्धे पर ही जा रही है। धार्मिक प्रवचन सुनने या राजनीति में हिस्सा लेने नहीं जा रही।

एक दिन क़िबला कहने लगे “अभी कुछ दिन हुए कराची की एक नामी गिरामी तवायफ़ का गाना सुनने का मौका मिला। अमां। उसका उच्चारण तो चाल चलन से भी ज़ियादा खराब निकला। हाय! एक ज़माना था कि शरीफ़ लोग अपने बच्चों को शालीनता सीखने के लिये चौक की तवायफों के कोठों पर भेजते थे। “ इस बारे में भी मिर्जा कहते हैं कि तवायफों के कोठों पर तो इसलिये भेजते थे कि बुजुर्गों के साथ रहने और घर के माहौल से बचे रहें।

जारी………………

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पिछले अंक : 1. खोया पानी-1:क़िबला का परिचय 2. ख़ोया पानी 2: चारपाई का चकल्लस 3. खोया पानी-3:कनमैलिये की पिटाई 4. कांसे की लुटिया,बाली उमरिया और चुग्गी दाढ़ी़ 5. हवेली की पीड़ा कराची में 6. हवेली की हवाबाजी 7. वो तिरा कोठे पे नंगे पांव आना याद है 8. इम्पोर्टेड बुज़ुर्ग और यूनानी नाक 9. कटखने बिलाव के गले में घंटी 10. हूँ तो सज़ा का पात्र, पर इल्ज़ाम ग़लत है 11. अंतिम समय और जूं का ब्लड टैस्ट 12. टार्जन की वापसी 13. माशूक के होंठ

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किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

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मेरी पोस्ट स्त्रियां क्या खुद से सवाल पूछती हैं?, जिसमे‌ पूरी पोस्ट मात्र टिप्पणीयों से ही बनी थी,उस पर् टिप्पणीयों के नये रिकॉर्ड बन रहे हैं.उसमे‌ कोइ आदम जी तो जैसे स्त्रियो‌ के पीछे ही पड गये हैं.आप भी देखें.

मेरी माँ बहन बेटी सभी स्त्रियाँ है लेकिन मैं जब बेटी का रिश्ता करने जाऊगा तो बेटी चाहती है लडका कम से कम 4 इंच लम्बा हो तथा उससे ज्यदा कमाता हो। क्यो बराबारी चाहती है ये समाज वादी औरतें ? सामाज में सभी को बराबरी नहीं वरन सम्मान मिलना जरूरी है बराबरी की मागॅ इस भेद को केवल अधिक बडा कर रही है। इन बैवकुफ समाज वादी औरतो को भी नहीं पता ये समाज का कितना अहित कर रही है।

एक औरत अपने स्त्री होने का फायदा उठा कर पुरूष से ज्यदा माल बेचती है तब उसे याद नही आती बराबर
कई बस में सफर कर रहे हो या ट्रैन के टिकट की लाईन हो क्यों इन्हें बराबर नही रखा जाता वास्तव में प्रकृति ने हम सभी को अलग अलग रोल दिये हैं और हमें ये करने होंगे। क्यों बराबर धरती नहीं है कही पहाड तो कही तलाब, क्यों बराबर ऋतु नही हैं। आखिर पुरूष तो बराबरी कर 9 मास तक बच्चे को पेट में नहीं रख सकता।

अगर स्त्रियाँ सम्मान चाहती है तो मेरी राय में रात को 2 बजे शराब पीकर समुद्र पर धुमना सम्मान नहीं दिला सकता इस दौड में कई आज कल धुम्रपान मदिरा पान कर रही है कल क्या वो बराबर होकर पुरूष की तरह बलात्कार करना पसंद करेंगी

Adam on January 17th, 2008 at 10:44 am

 

स्त्रियों की सबसे बड़ी समस्या है कि उनमें जलन का भाव है. वो किसी की भी तरक्की नहीं देख सकती.अपने पति की भी नहीं दूसरी स्त्री की तो बिलकुल भी नहीं.पुरुष व स्त्री के कुछ काम बंटे हुए हैं.ये एक सामाजिक व्यवस्था है.जो स्त्रियाँ घर के काम करना नहीं जानती या चाहती या जिनको घर के काम नहीं करने पड़ते वो ही स्त्रियाँ इस प्रकार के स्त्री विमर्श के मुद्दे उठाती है. समस्या स्त्रियों की ही नहीं पुरुषों की भी है. जिस प्रकार स्त्री घर चलाती है पुरुष भी कमाता है यह एक सामाजिक व्यवस्था. यदि स्त्री कमाये और पुरुष घर चलाये तो भी इसमें कुछ हानि नहीं. लेकिन यदि पुरुष घर चलाने लगेगा तो स्त्रियों को उससे भी इन-सिक्योरिटी होने लगेगी. इन-सिक्योरिटी स्त्री के गुण में है और पुरुषों से बराबरी करना भी उसी इंसिक्योरिटी का लक्षण है.जबकि देखा जाये तो कुछ मामलों में स्त्री आगे है तो कुछ में पुरुष. यह प्रतियोगिता का विष्य नहीं वरन सहभागिता का विष्य है. लेकिन कुछ स्त्रियाँ सहभागिता नहीं चाहती.लिखा तो बहुत कुछ जा सकता है पर हम पुरुषों का यह स्वभाव नहीं कि स्त्रियों की तरह हर चीज में खोट निकालें.

रचना जी ने जबाब देने की कोशिश की

rachna singh on January 17th, 2008 at 11:10 am

 

ऐडम जी आप विषय का परिवर्तन क्यो करना चाहेते है , यहाँ बात केवल मुम्बई मे हुए हादसे की हो रही है . स्त्रियोचित गुण अवगुण कि नहीं . जरुरी नहीं है की आप अपनी स्त्रियों के प्रती अपनी भडास को इस ब्लोग के मंच पर निकले । स्त्रियों के लिये क्या उचित है क्या अनुचित इसका फैसला उन्हे ही करने दे ।” पुरुष व स्त्री के कुछ काम बंटे हुए हैं।ये एक सामाजिक व्यवस्था है.जो स्त्रियाँ घर के काम करना नहीं जानती या चाहती या जिनको घर के काम नहीं करने पड़ते वो ही स्त्रियाँ इस प्रकार के स्त्री विमर्श के मुद्दे उठाती है.” वैस आप का ये सेंटेंस बहुत पसंद आया क्योंकी मे तो उम्मीद कर रही थी आप ही ऐसा लिखेगे । आप तो आज भी adam – eve के ज़माने मे रह रहे हैं जबकी एव ने काफी तरकी कर ली है , मानसिक रूप से । आप का नाम कोई है नहीं , आदम और हव्वा के ज़माने के आप है , यहाँ ब्लोग पर क्यो अपना समय बर्बाद कर रहे हैं । और विषय प्रवर्तन करके आपने कुछ पुरुषो कि ” विचरते {घुमते } रहने की आदत को सही साबित किया है ।

Adam on January 17th, 2008 at 12:25 pm

रचना जी ऎसा इसलिये क्योंकि यहाँ पर जो भी स्त्रीयों के महत्व के मुद्दे उठाये उन्होने अपने गुणों या अवगुणों से ही उठाये हैं.आप लोग फालतू में पुरुषों का विरोध करती हैं क्योंकि वही मिला है ना सीधा-साधा -और बेचारे पुरुष स्त्री-विरोधी ना कह दिये जायें इसलिये चुप भैठे हैं. दिल में उनके भी वही बातें हैं लेकिन सब डरते हैं. आपको स्त्री अधिकारों की इतनी ही चिंता है तो सामाजिक व्यवस्था का विरोध कीजिये ना.सामाजिक व्यवस्था पुरुष नहीं बनाता वरन स्त्री और पुरुष दोनों मिलकर बनाते हैं.आज क्यों लोग भ्रूण हत्या करने पर विवश हैं-क्योंकि दहेज एक बुराई है .तो क्या केवल पुरुष दहेज लेता है.सबसे ज्यादा दहेज की लालची तो महिलाऎं होती है. नये नये जेवर,साडियाँ, कोस्मेटिक दहेज में किसे चाहिये महिलाओं को ही ना.लेकिन पुरुष की कमजोरी यही कि वो इसका विरोध नहीं करता. सास के अत्याचार को ससुर मौन सहमति दे देता है.क्यों? यह गलत है. लेकिन इससे सास का दोष कम नहीं हो जाता. असली दोषी तो वही सास है ना.

लेकिन सामाजिक व्यवस्था का विरोध करेंगी तो कई स्त्रीयां भी विरोध में आ जायेंगी इसलिये सही है पुरुषों का विरोध करो. बेचारे पुरुष भी आड़े ना आयेंगे. जहाँ तक 31 दिसंबर की घटना का स्वाल है उसमें भीड़ की गलती है. लेकिन यही भीड़ पुरुषों का भी अहित कर सकती है स्त्री का भी. तो भीड़ का विरोध कीजिये ,भीड़ की मानसिकता का विरोध कीजिये. यदि वहाँ पर लड़्कियों की ही भीड़ होती तो वो भी एक पुरुष का बलात्कार कर देती.कई ऎसी घ्टनाओं का साक्षी रहा हूँ जहाँ मदमस्त लड़्कियों ने एक बेचारे पुरुष को कामवासना के वशीभूत हो मार दिया. उन लड़कियों के बारे में क्या कहेंगी जो एक शादी-शुदा मर्द से प्यार कर दूसरी स्त्री का दिल तोड़ती हैं.

कहता हूँ ना मुँह ना खुलवाइये-वरना जितना आरोप एक स्त्री लगा सकती है उससे कहीं ज्यादा एक पुरुष.

madhujwal_cover उमर खैयाम की रुबाइयों का अनुवाद सुमित्रानंदन पंत ने 1929 में उर्दु के प्रसिद्ध शायर असगर साहब गोडवी की सहायता और इंडियन प्रेस के आग्रह पर किया था. यह अनुवाद “मधुज्वाल” नाम से 1948 में प्रकाशित हुआ था. अन्य हिन्दी अनुवादकों की तरह उनका यह अनुवाद फिट्जराल्ड की की पुस्तक पर आधारित नहीं था बल्कि उन्होने मूल फारसी से हिन्दी अनुवाद किया था. मूल फारसी को समझने में उनकी सहायता असगर साहब ने की थी. इसीलिये इस पुस्तक में पाठक को कल्पनाशीलता के कुछ नये रंग मिलते हैं. इसी कल्पनाशीलता की वजह से यह अनुवाद स्वयं के ज्यादा करीब लगता है. नये प्रतिमानों में कोयल है, बुलबुल है,गुलाब और आम्र मंजरी की गंध भी है.”मधुज्वाल” में नये छंद विधान हैं जो कहीं कहीं रुबाई वाले छंद में परिणित हो जाते हैं और कहीं एक्दम दूसरा ही रूप ले लेते हैं.इस पुस्तक में पदों की संख्या भी अपने पूर्ववर्तियों के मुकाबले कहीं ज्यादा है. “मधुज्वाल” के द्वितीय संस्करण में कुल 151 पद हैं.

आइये कुछ पदों पर नजर डालें.

खोलकर मदिरालय का द्वार
प्रात: ही कोई  उठा पुकार
मुग्ध श्रवणों में मधु रव घोल,
जाग उन्मद मदिरा के छात्र!
 
  ढुलक कर यौवन मधु अनमोल
शेष रह जाय नहीं मृदु मात्र,
ढाल जीवन मदिरा जी खोल
लबालब भर ले उर का पात्र! [2]
सुरालय हो मेरा संसार,
सुरा-सुरभित उर के उदगार!
सुरा ही प्रिय सहचरि सुकुमार,
सुरा,लज्जारुण मुख साकार!
 
  उमर को नहीं स्वर्ग की चाह,
सुरा में भरा स्वर्ग का सार!
सुरालय राह स्वर्ग की राह,
सुरालय द्वार स्वर्ग का द्वार्!  [11]
अधर मधु किसने किया सृजन ?
तरल गरल !
रची क्यों नारी चिर निरुपम ?
रूप अनल !
अगर इनसे रहना वंचित
यही विधान ,
दिये विधि ने तप संयम हित
न क्यों दृढ़ प्राण ? [16]

छूट जायें जब तन से प्राण
सुरा में मुझे कराना स्नान !
सुरा,साकी,प्याले का नाम
सुनाना मुझे उमर अविराम!

खोजना चाहे कोई भूल
मुझे मेरे मरने के बाद ,
पांथशाल की सूंघे धूल,
दिलायेगी वो मेरी याद! [18]

madhujwaal_2
इस जीवन का भेद
जिसे मिल गया गभीर अपार,
रहा ना उसको क्लेद
मरण भी बना स्वर्ग का द्वार !
 
  करले आत्म विकास ,
खोज पथ, जब तक दीपक हाथ,
मरने बाद , निराश ,
छोड़ देगा प्रकाश भी साथ! [23]
रम्य मधुवन हो स्वर्ग समान,
सुरा हो सुरबाला का ज्ञान !
तरुण बुलबुल की विह्वल तान
प्रणय ज्वाला से भर दे प्राण !
 
  न विधि का भय , न जगत का ज्ञान,
स्वर्ग की स्पृहा , नरक का ध्यान ,-
मदिर चितवन पर दूँ जय बार
चूम अधरों की मदिरा-धार ! [28]
उमर दो दिन का यह संसार
लबालब भर ले उर भ्रंगार
क्षणिक जीवन यौवन का मेल,
सुरा प्याली का फेनिल खेल !
 
  देख , वन के फूलों की डाल
ललक खिलती , झरती तत्काल !
व्यर्थ मत चिंता कर , नादान ,
पान कर मदिराधर कर पान ! [30]
लज्जारुण मुख , बैठी सम्मुख ,
प्रेयसि कंपित कर से उत्सुक
भर ज्वाला रस , हाला हँस हँस
उमर पिलाए , ह्र्दय हो अक्श !
 
  ह्रदय हीन कह लें मलीन,
मैं मधु वारिधि का मुग्ध मीन !
अपवर्ग व्यर्थ , केवल निसर्ग
संगीत, सुरा , सुन्दरी , – स्वर्ग ! [33]
पंचम पिकरव , विकल मनोभव ,
        यौवन उत्सव !
मधुवन गुंजित , नीर तंरंगित
        तीर कल ध्वनित !
हँसमुख सुन्दर प्रिय सुख सहचर ,
        प्रिया मनोहर ,
पी मदिराधर सखे , निरंतर ,
       जीवन क्षण भर ! [35]
 
अपना   आना   किसने    जाना ?
जग में आ फिर क्या पछताना ?
जो   आते   वो   निश्चय    जाते,
तुझको   मुझको  भी    है  जाना !
 
 
  बाँध  कमर , ओ साकी सुन्दर ,
उठ कंपित कर में प्याली धर ,
प्रीति सुधा भर,भीति द्विधा हर,
चिर विस्मृति में डूबे अंतर ! [49]

मधुज्वाल के पद हिन्दी के बांकी अनुवादों से थोड़े अलग हैं. इसलिये इनको पढ़ने में एक नयी ताजगी का अहसास होता है. अगले अंक में इसी किताब के कुछ और पदों की चर्चा करेंगे और कुछ चर्चा होगी बच्चन और सुमित्रानंदन पंत के बीच हुए पत्र व्यवहार के बारे में भी.

यह श्रंखला आपको कैसी लग रही है टिप्पणीयों के माध्यम से बतायें…

क्रमश:…………………………

इस श्रंखला के पिछ्ले लेख.

1. खैयाम की मधुशाला.. 2. उमर खैयाम की रुबाइयों के अनुवाद.. 3. मधुशाला में विराम..टिप्पणी चर्चा के लिये 4. उमर की रुबाइयों के अनुवाद भारतीय भाषाओं में  5. मैथिलीशरण गुप्त का अनुवाद 6. खैयाम की रुबाइयाँ रघुवंश गुप्त की क़लम से

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: उमर खैय्याम, मधुशाला, रुबाई, बच्चन, हरिवंश, फिट्जराल्ड, मदिरा, रधुवंश गुप्त, सुमित्रानंदन पंत

Technorati Tags: उमर खैय्याम, मधुशाला, रुबाई, बच्चन, हरिवंश, फिट्जराल्ड, मदिरा, रधुवंश गुप्त, सुमित्रानंदन पंत, umar khaiyym, Omar khaiyyam, madhushala, Fitzarald, bachchan, sumitrnandan pant

सुनो-पंगेबाज 2007-2008 के सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर पुरुस्कार दे रहे हैं. एक ओर जब भारत रत्न के लिये लाइन लगी है वहीँ दूसरी ओर पंगेबाज जी महोदय की  टिप्पणीयों में लोग दावा कर रहे हैं कि उन्हे पुरुस्कार दिया जाय लेकिन शायद वो अपने पुराने पंगेबाज यानि खाकसार को भूल गये.

देखिये जी आजकल सब खेल पहले होने का है कल हमने अपनी भी अपनी एक पहली पोस्ट डाली थी पूरे प्रूफ के साथ.लेकिन आप लोग उसे देखना भूल गये ….तो पहले तो उसे देखिये फिर हम देते हैं पंगेबाज पुरस्कार के लिये अपना नामांकन.वैसे भी जब मेन पंगेबाज दौड़ से बाहर हैं तो हमारे चांसेज तो पक्के हो ही जाते हैं. [ वैसे भी कल हम एक स्पेशल चांदनी बार में सुनो-पंगेबाज से मिल चुके हैं और उन्हे गिफ्ट भी प्रदान कर चुके हैं.अब देखते हैं कौन रोकता है हमें]

क्या आपने किसी नये ब्लोगर को अपनी दूसरी पोस्ट में ही बड़े बडों से पंगा लेते सुना है. नहीं सुना तो आप खाकसार को नहीं जानते.हमने अपनी दूसरी ही पोस्ट में पंगा ले लिया जी. पढिये आचार संहिता का अनाचार जिसको पढ़कर हमारे एक अग्रज और मित्र हमें धूमकेतु नाम से पुकारने लगे और हम निराश होकर कविता करने लगे.

फिर हमने पंगा लिया अपने पत्रकार भाइयों से जब हमने अपना शोध-पत्र पत्रकार यूँ बने ब्लौगर !!  पेश किया. ये लोग जब ज्यादा नहीं चिढ़े तो हमने पंगे को और आगे बढाया. उनसे सीधा पूछ ही लिया कि क्या होगा आपका पत्रकार महोदय ?? 

फिर हमने जूता- सैंडल पुराण – भाग 1 में उस समय के चिट्ठाजगत के दो महारथियों से  पूरा पंगा लिया.. यह अलग बात है जूते खाने से हम भी परेशान रहे और जूता – सैंडल पुराण -भाग 1.5 में हमें बहुत डांट पड़ी. जिसको हमने रिकॉर्ड कर पॉडकास्ट द्वारा लोगों को भी सुनाया…खैर रोते-धोते जूता-सैंडल पुराण का अंतिम भाग किसी प्रकार पूरा किया गया.

फिर बेनामी की एक सूनामी आयी तो हम बोले बेनामी सूनामी से भी ज्यादा भयंकर !!?? है और फिर ज्ञान देने लगे कि आओ ‘अनाम’ के अस्तित्व को स्वीकारें.

इधर हम अपने सामाजिक दायरे को लेकर भी चिंतित थे. क्योंकि हमारे मोहल्ले का माहौल बड़ा विकट हो रहा था तो हम लिखे आईये ‘मोहल्ला’ बदल डालें…जिसे पाठकों ने ना जाने किस किस से जोड़ने की कोशिश की ..हम तो डिस्क्लेमर लगा ही चुके थे जी इसलिये हम सदी की सबसे बरबाद कविता लिख कर फिर पंगा लेने लगे.

उधर हमें सुनो-पंगेबाज की असलियत पता चली और हम गदर्भ गान गाने लगे गधा मिलन को जाना. लेकिन तभी हमारे पड़ोसी बिरयानी और दाल-भात जैसे विषयों पर लड़ने लगे. उनको समझाया गया और एक और गीत धड़-धड़-धड़-धड़, बम बम बम बम….. गाया गया.

फेहरिस्त तो अभी काफी लंबी है पर हमें लगता है इस छोटे से पुरस्कार के लिये इतना काफी है.

आप क्या बोलते हैं जी ??

हिन्दी ब्लॉगिंग के इतिहास में पहले का बहुत महत्व रहा है. इसीलिये कोई ना कोई अपने आप को पहला साबित करने में जुटा है. किसी ने चलती ट्रेन से पहली पोस्ट लिखी तो कोई अस्पताल के वार्ड से पहली पोस्ट लिख रहा है.वैसे हमने भी एक पोस्ट चलती ट्रेन में रात को बारह बजे बाद लिखी थी लेकिन इसे चलती ट्रेन से पोस्ट नहीं कर पाया था और फिर उस समय पहले का महत्व मालूम भी ना था. लेकिन सोचा आज एक मौका है इसलिये इसे हाथ से क्यों जाने दें.

boarding-passतो ये रही फ्लाइट से लिखी हुई पोस्ट (पहली है या नहीं यह फैसला आप करें). यह फ्लाइट है इन्डियन एअरलाइंस की IC -201. कलकत्ता से दिल्ली जाने वाली यह फ्लाइट कलकत्ता से दिल्ली के बीच 1325 किमी की दूरी को तकरीबन 2 घंटा 15 मिनट में पूरी करती है.

ऊपर वाला हिस्सा तब लिखा था जब विमान उड़ा नही था. विमान परिचारिका कह रही थी कि आप लैपटॉप का प्रयोग विमान के उड़ने के बाद ही कर सकते हैं. मैने उससे कहा कि कोई जरुरी काम है तो वो फिर कुछ नहीं बोली. मेरे बगल में दो लोग बैठे हैं वो चाइनीज जैसे लग रहे हैं और शायद चाइनीज में बात कर रहे हैं उनमें से एक मेरे स्क्रीन को ध्यान से देख रहा है. कहीं वह हिन्दी पढ़ना जानता ना हो. :-) लगता तो नहीं क्योकि वो सिर्फ देख रहा है उसके चेहरे के भावों को परिवर्तन नहीं हुआ.अब शायद जलपान सेवा आरंभ होगी.

going-towards-planeसामान्यतया मैं यात्रा के दौरान किसी से बात नहीं करता लेकिन जलपान के दौराम मैने एक चाइनीज से बात करने की कोशिश की (इस पोस्ट के लिये). वे लोग हिन्दी नहीं जानते …ना ही अच्छी अंग्रेजी बोल पा रहे हैं. उनसे बात करने से पता लगा कि वो दिल्ली में ऑटो एक्स्पो देखने जा रहे हैं. वो सीधे कलकत्ता आये थे क्योंकि उनके कुछ मित्र कलकत्ता में रहते हैं. मैने एक चायनीज से पूछा कि उनको भारत कैसा लगा. उसका कहना था “ब्यूतीफूल बत क्राउडेड” . मैने उनसे पूछा कि चीन की जनसंख्या भारत से ज्यादा है तो क्या वहाँ ज्यादा भीड़भाड़ नहीं है. उसका कहना था कि नहीं वहाँ सड़कें ज्यादा चौड़ी हैं और सरकार लोगों का अच्छा ध्यान रखती है. जलपान में उसने शाकाहारी खाना लोया.उसने यह भी बताया कि उसे भारतीय खाना पसंद हैं.

अभी विमान के कप्तान ने घोषणा की है कि हम 36000 फीट की ऊंचाई पर उड़ रहे हैं.बाहर का तापमान शून्य से 50 डिग्री कम है. विमान की गति 700 किमी/घंटा है. कुछ दूरी पर विपरीत दिशा से हवायें 200 किमी/घंटा से आ रही हैं इसलिये विमान निर्धारित समय से 15 मिनट की देरी से दिल्ली पहुंचेगा. कलकत्ता का तापमान 27 डिग्री सैंटीग्रेड था. दिल्ली का तापमान 17 डिग्री सैंटीग्रेड होने की संभावना है.

विमान अब दिल्ली पहुंचने वाला है. मेरे सामने की सीट पर एक महिला बैठी है जो शायद बंगाली हैं क्योकि वो “आनन्दलोक” ( एक बंगला पत्रिका”) पढ़ रही थीं. उन्होने अपने बैग से एक छोटा सा शीशा निकाला है और वो अपने चेहरे को देख रही हैं. फिर उंन्होने एक लिपिस्टिक निकाली है और वो होंठों पर लिपिस्टिक लगा रही हैं. एक काली पैंसिल भी निकाली. उससे भी कुछ कर रही है. अब यह पलकों पर लगा रही हैं या आंखों पर समझ नहीं आ रहा. उनके बैग पर कुछ लिखा हुआ है …मैं पढ़ने की कोशिश कर रहा हूँ…. “शाश्वती भट्टाचार्य” ….शायद नाम है उनका.

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ऊपर वाली पोस्ट कल (14 जनवरी) फ्लाइट में लिखी थी. लेकिन उसे चित्र लगाने के बाद पोस्ट अभी (15 जनवरी) कर रहा हूँ.

प्रत्यक्षा जी ने कहा : चित्र कहाँ है? भारत के विमानों में चित्र लेने की अनुमति नहीं होती. फिर भी चुंकि पोस्ट लिखनी थी तो ….

insiade-ic-201 luggage-cabin waiting-lounge
सीट के आगे लगा चार्ट ऊपर लगे सामान कक्ष प्रतीक्षा स्थल (लाऊंज)

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