इन्टरव्यू की ग़रज से धीरजगंज जाने के लिये बिशारत सुब्ह तीन बजे ही निकल खड़े हुए। सात बजे मौलवी मुजफ़्फ़र के घर पहुंचे तो वो जलेबियों का नाश्ता कर रहे थे। बिशारत ने अपना नाम पता बताया तो कहने लगे, “आइये आइये! आप तो कान ही पुर (कानपुर ही) के रहने वाले हैं। कानपुर को गोया लखनऊ का आंगन कहिये। लखनऊ के लोग तो बड़े घमंडी और नाक वाले होते हैं। लिहाजा मैं नाश्ते के लिये झूठों भी नहीं टोकूंगा।”

“ऐ जौक़ तकल्लुफ़ में हैं तकलीफ़ बराबर (जी हां उन्होंने सरासर को बराबर कर दिया था) जाहिर है नाश्ता तो आप कर आये होंगे। सलेक्शन कमेटी की मीटिंग अंजुमन के दफ़्तर में एक घंटे बाद होगी। वहीं मुलाक़ात होगी, और हां! जिस बेहूदे आदमी से आपने सिफ़ारिश करवाई है, वो निहायत कंजूस और नामाक़ूल है।”

इस सारी बातचीत में अधिक से अधिक दो मिनट लगे होंगे। मौलवी मुजफ़्फ़र ने बैठने को भी नहीं कहा, खड़े-खड़े ही भुगता दिया। घर से मुंह अंधेरे ही चले थे, मौलवी मुजफ़्फ़र को गर्म जलेबियां खाते देखकर उनकी भूख भड़क उठी। मुहम्मद हुसैन आजाद के शब्दों में ‘भूख ने उनकी अपनी ही जबान में जायक़ा पैदा कर दिया।’ घूम फिर के हलवाई की दुकान पता की। डेढ़ पाव जलेबियां घान से उतरती हुई तुलवाईं। दोने से पहली जलेबी उठाई ही थी कि हलवाई का कुत्ता उनके पूरे अरज के ग़रारे नुमा लखनवी पाजामे के पांयचे में मुंह डाल के बड़े आवेग से लपड़-लपड़ पिंडली चाटने लगा। कुछ देर वो चुपचाप, निस्तब्ध और शांत खड़े चटवाते रहे। इसलिये कि उन्होंने किसी से सुना था कि कुत्ता अगर पीछा करे या आपके हाथ-पैर चाटने लगे तो भागना या शोर नहीं मचाना चाहिये वर्ना वो आजिज आकर सचमुच काट खायेगा। जैसे ही उन्होंने उसे एक जलेबी डाली, उसने पिंडली छोड़ दी। इसी बीच उन्होंने ख़ुद भी एक जलेबी खायी। कुत्ता अपनी जलेबी ख़त्म होते ही पांयचे में मुंह डाल के फिर शुरू हो गया। जबान भी ठीक से साफ़ नहीं की।

अब नाश्ते का ये पैटर्न बना कि पहले एक जलेबी कुत्ते को डालते तब एक ख़ुद भी खा पाते। जलेबी देने में जरा देर हो जाती तो वो लपक कर बड़े चाव और दोस्ती से पिंडली चिचोड़ने लगता, शायद इसलिये कि उसके अन्दर एक हड्डी थी। लेकिन अब दिल से कुत्ते का डर इस हद तक निकल चुका था कि उसकी ठंडी नाक से गुदगुदी हो रही थी। उन्होंने खड़े-खड़े दो बहुत महत्वपूर्ण निर्णय लिये, पहला ये कि कभी कानपुर के जाहिलों की तरह सड़क पर खड़े होकर जलेबी नहीं खायेंगे; दूसरा लखनऊ के शरीफ़ों की तरह चौड़े पांयचे का पाजामा हरगिज नहीं पहनेंगे, कम-से-कम जिंदा हालत में।

कुत्ते को नाश्ता करवा चुके तो ख़ाली दोना उसके सामने रख दिया। वो शीरा चाटने में तल्लीन हो गया तो हलवाई के पास दुबारा गये। एक पाव दूध कुल्हड़ में अपने लिये और डेढ़ पाव कुत्ते के लिये ख़रीदा ताकि उसे पीता छोड़ कर सटक जायें। अपने हिस्से का दूध गटागट पी कर क़स्बे की सैर को रवाना होने लगे तो कुत्ता दूध छोड़ कर उनके पीछे-पीछे हो लिया। उन्हें जाता देख कर पहले कुत्ते के कान खड़े हुए थे, अब उनके खड़े हुए कि बदजात अब क्या चाहता है।

तीन-चार जगह जहां उन्होंने जरा दम लेने के लिये रफ़्तार कम करने की कोशिश की या अपनी मर्जी से मुड़ना या लौटना चाहा तो कुत्ता किसी तरह राजी न हुआ। हर मोड़ पर गली के कुत्ते उन्हें और उसे घेर लेते और खदेड़ते हुए दूसरी गली तक ले जाते, जिसकी सीमा पर दूसरे ताजादम कुत्ते चार्ज ले लेते। कुत्ता बड़े अनमनेपन से अकेला लड़ रहा था। जब तक युद्ध निर्णायक ढंग से समाप्त न हो जाता या कम-से-कम अस्थायी युद्ध विराम न हो जाता अथवा दूसरी गली के शेरों से नये सिरे से लड़ाई शुरू न हो जाती, वो U.N.O. की तरह बीच में ख़ामोश खड़े देखते रहते। वो लौंडों को कुत्तों को पत्थर मारने से बड़ी सख़्ती से मना कर रहे थे। इसलिये कि सारे पत्थर उन्हीं के लग रहे थे, वो कुत्ता दूसरे कुत्तों को उनकी तरफ़ बढ़ने नहीं देता था और सच तो ये है उनकी हमदर्दी अब अपने ही कुत्ते के साथ हो गई थी। दो फ़र्लांग पहले जब वो चले थे तो वह महज एक कुत्ता था, मगर अब रिश्ता बदल चुका था। वो उसके लिये कोई अच्छा-सा नाम सोचने लगे।

उन्हें आज पहली बार मालूम हुआ कि गांव में मेहमान के आने का ऐलान कुत्ते, चोर और बच्चे करते हैं उसके बाद वो सारे गांव और हर घर का मेहमान बन जाता है।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

इस भाग की अन्य कड़ियां.

1. फ़ेल होने के फायदे 2. पास हुआ तो क्या हुआ 3. नेकचलनी का साइनबोर्ड 4. मौलवी मज्जन से तानाशाह तक

पहला भाग

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

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चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: पुस्तक चर्चा, समीक्षा, काकेश, विमोचन, हिन्दी, किताब, युसूफी, व्यंग्य

 

पिछ्ले दिनों एक सेमिनार में गया था और एअरर्पोर्ट पर एक किताब दिखायी थी “डब्बेवाले”. डब्बेवालों के बारे में काफी कुछ सुना था. सुना था कि आई-आई-एम वाले लोग उन पर अध्ययन कर चुके हैं. एक बार बंगलौर में मुझे भी एक सेमिनार में इस संस्था के लोगों द्वारा ही तैयार किया प्रजेंटेसन देखने को मिला था. जिसमें इस बात का भी जिक्र था कि किस प्रकार यह लोग सिक्स सिगमा ( Six Sigma) के मानकों को पूरा करते हैं. इसी जिज्ञासावस वह किताब खरीद ली. मात्र 110 रुपये में. डायमंड पाकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक श्रीनिवास पंडित ने लिखी है. हाँलाकि जिस जिज्ञासा के साथ यह किताब खरीदी थी वह पूरी तो नहीं हुई लेकिन कुछ बातें जरूर सीखने को मिली.

अपनी भूमिका में श्रीनिवास कहते हैं.

मैं आपको एक व्यावसायिक सफलता की कहानी की तलाश के बारे में बताने को उत्सुक हूँ. क्योंकि मैंने इस दीर्घकालीन सफलता के बीच गहरे मूल्यों की जानकारी  को जाना है. यहां मैं वही कीमती जानकारी आपके सम्मुख प्रस्तुत कर रहा हूँ जिसे पढ़कर आप इस व्यवसाय की सफलता का आनंद ले सकेंगे.जो संगठन दिमाग चकरा देने वाले बदलाव के पहलुओंdabbe-wale का सामना कर रहा हो, उसके कार्यकर्त्ताओं के रचनात्मक प्रयास सफलता की कहानी के सच्चे पात्र बनते हैं.

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इससे मुझे लाओत्से की प्रसिद्ध उक्ति याद आती है—‘‘निरंतरता की पहचान से ही निष्पक्ष नजरिया पैदा होता है.’’ इसका अर्थ है कि हमें बदलाव की इस उलझी हुई पहेली में निरंतर ‘स्थिरता’ को पहचानना चाहिए. ‘स्थिरता’ व ‘अस्थिरता’ में भेद करने के लिए हमें उन व्यवसायों व उनसे जुड़े लोगों का, जिन्होंने प्रतिवर्ष-स्थायी सफलता अर्जित की है, का अध्ययन करना आवश्यक है.

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यह 115 साल पुराने व्यवसाय की कहानी है, जिसे 5000 कम पढ़े-लिखे लोग मिलकर चलाते हैं. यहाँ मेरे सहित चार पात्रों के संवादों द्वारा कहानी प्रस्तुत की गई है. रघुनाथ मेगड़े (रघु) (48), व गंगाराम तालेकर (गंगा) (55), मुंबई के टिफिन बॉक्स कोरियर यानि डिब्बेवाले हैं. रघु कला स्नातक है जबकि गंगा आठवीं पास है. वे गांव के सीधे-साधे कृषि समुदाय में पले-बढ़े उन्होंने स्थानीय मराठी भाषा में अपनी पढ़ाई की.

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हालांकि वे ‘मराठी युक्त अंग्रेजी’ में अपने भाव आसानी से प्रकट कर देते हैं. वे बड़े जोश से अपनी कहानियाँ सुनाते हैं. फिर भी वे गप्पी नहीं हैं. जैसा कि रघु ने मुझे बताया—‘‘अंग्रेजी भाषी लोगों से मिलने के कारण हमारी बातचीत की कला में निखार आया.’’ रघु का स्वभाव थोड़ा शुष्क है जबकि गंगा का स्वभाव मस्त है.

मैं डब्बेवालों की धीमी सांस्कृतिक पर्यावरण को अच्छी तरह जानता हूँ अतः यह निरीक्षण वास्तव में काफी अद्भुत रहा कि वे किस तरह घनी आबादी वाले मुंबई की सड़कों के व्यस्त घंटों में डिब्बे ले जाते हैं.

महानगरी मुंबई के रंग-बिरंगी पोशाकों में सजे स्त्री-पुरुष व बच्चों के बीच इनकी धुंधली सफेद कमीज़, पजामा व स्काउट की तरह पहनी गई टोपी, बिल्कुल विपरीत दिखाई देती है. आप डिब्बेवालों को लगातार गाड़ियों, बसों, कारों, वैनों, ट्रकों, ऑटों, साइकिलों, ठेलों, पदयात्रियों व बर्फ लाने वाले ठेलों की मैराथन में सबसे आगे दौड़ता पाएँगे. जहाँ सारा दिन लापरवाही से सड़क क्रॉसिंग, ओवरटेकिंग, गति सीमा, भोंपू का स्वर इत्यादि कार्य ही होते रहते हैं.

यह भी एक पहेली है कि वे पिछले 115 वर्षों से किस तरह रोज-दर-रोज, सप्ताह-दर-सप्ताह, माह-दर-माह, साल-दर-साल, सारे मौसमों में अपने डिब्बों को सही समय पर पहुँचाने के लिए, अपने ठेलों को सड़क पर भगाते आ रहे हैं.
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अनीता (अ), रघु (र) गंगा (ग) व स्वयं (श्री) की बातचीत आपको एक ऐसे साधारण व्यावसायिक नमूने के बारे में बताएगी, जो एशिया की 11 करोड़ आवादी  वाली विशालतम महानगरी में शून्य वास्तविकता के आधार पर काम करता है. संवाद भी बुद्धिमत्ता व तर्क से भरपूर हैं.

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पहला अध्याय

यह जीवंत संवाद परंपरा व आधुनिकता, मनुष्य व मशीन, पर्यावरण व तकनीक तथा उपयोग व उपभोक्तावाद के शाश्वत संघर्षों पर रोशनी डालते हैं. पाने व संतुष्ट होने की लड़ाई लगातार जारी है. डिब्बेवालों ने अपने मूल्यों में ही छिपा जीवन अमृत पा लिया है. उपलब्धि, महत्ता, धरोहर व प्रसन्नता का संगम ही उन्हें कामकाजी जीवन का संतुलन देता है.

अनीता ने काव्यात्मक शैली में इस वातावरण का वर्णन किया. उसके पास विद्वतापूर्ण नजरिया है, जो उसे उत्सुकतापूर्वक अच्छी बातें बाँटने की प्रेरणा देता है. इसी बातचीत के दौरान उसने रघु व गंगा से हुई भेंट के बारे में बताया.

अ.    क्या आप इन डब्बेवालों व उनके अविश्वसनीय डिलीवरी रिकॉर्ड के बारे में जानते हैं ?

श्री. हाँ, मैं जानता हूँ.

अ.    यह अर्धशिक्षित 5000 डब्बेवाले, 60 कि.मी. के दायरे में, 2,00,000 लोगों को, केवल 3 घंटे के भीतर घर का पका भोजन पहुँचाते हैं. हर रोज 4,00,000 बार लेन-देन होता है. कार्यस्थल व आवासीय क्षेत्र किसी बिखरे हुए चित्र की तरह फैले हुए हैं. सचमुच एक अद्भुत कहानी है.

श्री. इसमें कोई शक नहीं है.

अ.    16 मिलियन लेन-देन में मूल दर 1% है. यह एक अविश्वसनीय समय प्रबंध है. मुंबई तेजी से अपने पाँव फैलाती जा रही है. इस समय इसकी जनसंख्या 10.3 मिलियन के करीब है. फास्ट-फूड, रेस्त्रां व पटरी पर खाने-पीने का सामान बेचने वाले खोमचे भी चारों ओर फैले हुए हैं. फिर भी नूतन मुंबई टिफिन बाक्स सप्लायर्स एसोसिएशन धीरे-धीरे तरक्की कर रहा है.

श्री. तुम्हारे हिसाब से इसकी खास वजह क्या है ?

अ.    घर का बना भोजन पाने की इच्छा. अगर उचित कीमत पर घर से ऑफिस तक टिफिन पहुँच जाए. अब भी ज्यादातर लोग घर के बने भोजन को ही प्राथमिकता देते हैं. दूरी, वजन या स्थान जैसी बातों को ध्यान में न रखते हुए, एक डब्बावाला ग्राहक से प्रतिमाह 200 रुपए (या 4.6 डालर) लेता है. इसके बदले में वह अपने 25-30 ग्राहकों से 5000-6000 रु. (तकरीबन 116-140 डालर) कमा लेता है. दूसरे देशों में लोगों के पास ऐसी सुविधा नहीं है. लेकिन आप किसी से भी पूछें, खासतौर पर कहीं के भी निम्न आय-वर्गीय लोग, घर का बना भोजन ही लेना पसंद करेंगे. यह इच्छा इतनी बुनियादी है कि इसमें बदलाव आ ही नहीं सकता. बाहरी भोजन की उपलब्धता व आकर्षण के बावजूद घर का पका भोजन सदैव सराहा जाता रहेगा.

पिछ्ली समीक्षा :
चयनम् : क्या साहित्य विफल है ?

 

परुली की शादी के बारे में कोई धारणा नहीं थी. वह तो यह भी नहीं जानती थी कि शादी का मतलब क्या होता है. उसके लिये तो शादी का मतलब सिर्फ इतना था कि शादी के बाद लड़की को घर छोड़ के जाना होता है,पढ़ाई बन्द हो जाती है,साड़ी पहननी पड़ती है और दूसरे घर में जाके घूंघट के अन्दर ही रहना पड़ता है.एक डेढ़ साल बाद एक बच्चा भी हो जाता है. यह कैसे होता है इसके बारे में भी उसे कोई विशेष जानकारी नहीं थी. स्कूल में बड़ी लड़कियां शादी और बच्चे की बातें रस ले लेकर करती. मुँह नीचे कर हँसती पर परुली को कुछ भी पल्ले नहीं पड़ता.  

उसके बाबू आज मलगाड़ गांव गये थे पांडे जी से बात पक्की करने. परुली के दिल में जाने कैसे कैसे ख्याल आ रहे थे. वह मन ही मन प्रार्थना कर रही थी कि किसी तरह बात टल जाये और वह अभी शादी करने से बच जाये.लेकिन ऐसा कैसे होगा यह उसे मालूम नहीं था. स्कूल में भी आज वह खोयी खोयी से रही.शाम को बाबू आये तो बहुत खुश थे.चाख (पहला कमरा) में बैठ कर घर वालों को पूरी बात रहे थे.हर बात में पांडे ज्यू की तारीफ..

“पांडे ज्यू भल मैस (अच्छे आदमी) ठहरे. भौत बढिया घर हुआ हो वह. घर में गोरु,बल्द सब ही हुए. जमीन भी भौत ठहरी. कित्ते नाली तो बता रहे थे. पांडे ज्यू आदमी भी अच्छे हुए.गोपाल भी अच्छा ही हुआ. कोई ऐब नहीं ठहरा उसे. दिल्ली जैसी जगह में ठहरा फिर भी कितना सौम्य. शिबौ-शिब भौत काम करना पड़ने वाला हुआ बल उसे. पांडे ज्यू कह रहे थे कि परुली को थोड़ी ‘सार-पतार’ ( तमीज, मैनर्स) आ जाये तो इसे भी कुछ दिनों के लिये दिल्ली भेज देंगे.मैने कहा आप जैसा भी करेंगे आप की ही हुई अब परुली……

आगे नहीं सुन पायी परुली. मलखंड (ऊपर वाला कमरा) में जाके रजाईयों के बीच मुँह छिपा कर रोने लगी. उसका डाक्टर बनने का सपना आंसूओं के साथ बहने लगा. आज पहली बार उसे अपनी लड़की होने का अहसास हुआ. एक लड़की किस हद तक मजबूर हो सकती है इस बात से मन ही मन उसे खुद से घृणा होने लगी. सब कितने खुश थे. वो उनकी खुशी नहीं छीनना चाहती थी लेकिन जो हो रहा था उसके लिये वह खुद को तैयार भी नहीं कर पा रही थी. मन में आता कि वह कह दे कि नहीं करनी उसे शादी. लेकिन क्या कह पायेगी वह यह सब और फिर लोग क्या कहेंगे..”जोस्ज्यू की लड़की ने शादी के लिये मना कर दिया” …कितनी तो बातें बनेंगी.. उसकी खुद की सहेलियाँ उससे बातें नहीं करेंगी…आंसूओं का सैलाब लगता था कि उसे बहा ले जायेगा… 

उधर घर में खुशी का माहौल था. परुली की ईजा भी बहुत खुश थी. बगल की काखी (चाची), कैंजा (मौसी), जेठज्या (ताई) और अन्य औरतें भी घर में बधाईयां देने आयीं

“भल भौ हो (अच्छा हुआ).. बड़ा अच्छा संबंध मिला बल.. ” .

हाँ हो सब गोल्ज्यू की किरपा हुई हो..” ..

“तो कब कर रहे हो ब्या ….मंगसीर (नवंबर-दिसंबर) में करोगे कि जेठ (मई-जून) में   

“इस साल तो परुली का बोर्ड हुआ .. इम्तयान (परीक्षा) हो जाये तो जेठ में ही करेंगे. पिठ्या (टीका,सगाई) कोई भल दिन देख के लगा देंगे”

यह बात परुली ने भी सुनी.रो रो कर उसकी आंखे लाल हो गयी थी पर उसे सुखद आश्चर्य हुआ कि शादी के लिये भी उसके बोर्ड की परीक्षाओं को को ध्यान में रखा जा रहा है. वह सोचने लगी कि यदि वह ईजा से डाक्टर बनने वाली बात करे तो शायद ईजा की समझ में बात आ जाये और अभी शादी ना करने के लिये मान जाये…लेकिन उसके बाबू और घर के अन्य लोग ईजा की बात मानेंगे यह अपने आप में एक बड़ा प्रश्न था. फिर भी उसे लगा कि उसे कम-से-कम अपनी ईजा से तो बात करनी ही चाहिये… उसे आशा की एक धुधली किरण दिखायी देने लगी…लेकिन फिर उसे चमुली की बात याद आयी…. “डॉक्टर बनना इतना आसान नही है परुली. ढेर सारे डबल (पैसे) लगते है बल. इत्ते सारे डबल तेरे बौज्यू कहाँ से लायेंगे.तेरे को तो हाईस्कूल ही करा रहे हैं वही बहुत है.”.यदि ईजा सब लोगों को मना भी ले तो उसे पढ़ायेंगे कैसे.

यह सब सोचते सोचते परुली के सर में दर्द होने लगा और वह ईजा का इंतजार करते करते सो गयी… 

जारी…..

पिछले भाग : 1. परुली…. 2. परुली: चिन्ह साम्य होगा क्या ??

 

सरकार को कोसना हर भारतीय का जन्मसिद्ध अधिकार है.देश की प्रत्येक समस्या का ठीकरा सरकार के ऊपर फोड़ देना हमारी राष्ट्रीय आदतों में शामिल है. इसी तरह सरकार की हर योजना में कुछ ना कुछ खोट निकाल कर भोली भाली भूखी जनता के सामने पकवानों की थाली की तरह प्रस्तुत करना पत्रकारों और बुद्धिजीवीयों का एक अच्छा टाइमपास है.मुझे इसमें कुछ गलत नहीं जान पड़ता. हर एक को अपनी रोजी-रोटी कमाने का हक है.कोई यदि किसी को मूर्ख बनाके यह काम करे तो इसमें क्या गलत ? मूर्ख बनाने का काम केवल सरकार ही करे यह ज़रूरी तो नहीं.लेकिन आज मैं सरकार की सराहना करना चाहता हूँ.

लोग कहते हैं कि सरकार दूरदर्शी नहीं होती.मुझे लगता है जिन लोगों को सरकार के लॉंग टर्म विज़न का पता नहीं होता वही लोग ऎसी अज्ञानता में बात करते हैं. अभी दिल्ली में 2010 में कॉमनवैल्थ गेम होने वाले हैं और सरकार तैयारियों में व्यस्त है. जनसंख्या निय़ंत्रण के लिये ब्लू लाइन बसें चलायी जा रही हैं.डैंगू, मलेरिया के मच्छरों को ओवरटाइम ड्यूटियां दी जा रही हैं.इधर बर्ड-फ्लू युक्त मुर्गियों से भी बातचीत चल रही है.नये नये फ्लाई ओवर बनाये जा रहे हैं.ऎसे ही एक फ्लाईओवर का उपयोग मैं भी हर रोज करता हूँ जो दिल्ली और गुड़गांव को जोड़ता है. इस फ्लाई ओवर से गुजरते हुए मैं सरकार के लॉंग टर्म विजन की सराहना किये बिना नहीं रहता.

सरकार ने जब इस फ्लाईओवर का निर्माण किया तो उसने केवल वाहन वालों का ध्यान ही नहीं रखा बल्कि समाज के कई और वर्गों का भी पूरा पूरा ध्यान रखा गया.उसने रोजगार देने के नये अवसर पैदा किये. टोल टैक्स बूथ बनाये जिसमें यात्रियों को जाम में फँसाये रखा ताकि वो फ्लाईओवर और टॉल टैक्स बूथ का भरपूर निरीक्षण कर सरकार के काम से परिचित हो सकें. इस बहाने कई लोगों को भीख मांगने और चने, मूंगफली बेचने का मौका मिला. कुछ टी वी चैनलों और एफ एम चैनलों को अपनी स्टोरी बनाने का अवसर दिया गया. वाहनों की भीड़ का नियंत्रण करने के लिये विशेष ड्रेस पहने और हाथ में वॉकी-टॉकी पकड़े लोगों की व्यवस्था की गयी. टॉल बूथ में कंप्यूटर के सामने बैठे लोगों के अलावा कुछ लोगों को टॉल टैक्स की पर्चियाँ बेचने के लिये भी रखा गया. ताकि कंप्यूटर का उपयोग भी हो सके और रोजगार के अवसर भी बने रहें.

टॉल टैक्स भी सोच समझ कर निर्धारित किया गया. इसका दाम जान बूझकर सोलह रुपये रखा गया. ताकि टॉल टैक्स लेने वाला बीस का नोट लेके कुछ भी न लौटाने को बाध्य हो. इस तरह वह मासिक वेतन के अलावा कुछ ऊपरी कमाई भी कर सके. सरकार यह नहीं चाहती कि ऊपरी कमाई का लाभ सरकार के चंद बाबू लोगों तक ही सीमित रह जाये. वह इस लाभ को समाज के हर वर्ग तक पहुंचाना चाहती है.

सरकार ने न केवल इन लोगों के बारे में सोचा वरन फ्लाईओवर पर पैदल चलने वालों का पूरा पूरा ख्याल रखा. उसने फ्लाईओवर को क्रॉस करने के लिये भी कुछ प्रबन्ध नहीं किया.ताकि लोग रोड क्रॉस करने समय एक ओर से आती हुई तेज गाडियों को देखें और फिर थोड़ी सी जगह मिलते ही दौड़ पड़ें. फिर यदि बच गये तो बीच में पहुंच कर यही प्रक्रिया दूसरी और से आती हुई गाडियों को देख कर करें. इस तरह सभी लोगों को दौड़ने की प्रैक्टिस हो जायेगी,स्वास्थ्य बेहतर होगा और पूरा का पूरा रोमांच भी बना रहेगा. अक्सर स्कूली बच्चे भी यहाँ रोड क्रॉस करते हैं क्या पता इसी तरह प्रैक्टिस करते करते हुए वह भविष्य में ऐथलीट बन सकें. तो सरकार फ्लाईओवर के बहाने भविष्य के ऐथेलीट पैदा कर रही है. कभी कभी रोड क्रॉस करते करते यदि कोई किसी गाड़ी से टकरा कर ऊपर पहुंच जाये तो एक तो जनसंख्या नियंत्रण का लक्ष्य पूरा होगा और दूसरे टकराकर ऊपर पहुंचे व्यक्ति के घर वालों को मुआवजा भी दिया जायेगा. जितना व्यक्ति दो तीन साल में कमाता उतना मुआवजा सरकार कुछ दिनों में ही दिलवा देगी. तो है ना फायदे का सौदा.

आइये आप भी मेरे साथ सरकार के लॉंग टर्म विज़न की सराहना करें.

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मेरी कल की टिप्पणी पोस्ट पर कालिया और गब्बर सिंह के पिता जी श्री हरी सिंह की टिप्पणीयाँ मजेदार हैं. आप भी पढ़ें.

 

आलोक जी की नियमित अगड़म बगड़म को कई लोग पढ़ते हैं पर अक्सर उन पर उतनी टिप्पणीयां नहीं आती लेकिन इस बार तो गज्जब हो गया. उन्होने गब्बर सिंह का जो ख़त लीक किया था उस पर दमदार टिप्पणीयाँ आयी हैं.

ज्ञान दत्त जी काले कारनामों की भूरी भूरी प्रशंसा कर रहे हैं.  

Gyan Dutt Pandey, on February 23rd, 2008 at 6:41 am Said:

कभी कभी आपकी भूरिभूरि प्रशंसा का मन करता है। आज वही करने का मन कर रहा है। डकैती पर सर्विस टेक्स! क्या नायब और सरकार के लिये राजकोश में वृद्धि का विचार है। आप को तो वित्त सलाहकार, भारत सरकार तत्काल प्रभाव से बना देना चाहिये। फिर आप ऐसा सर्विस टेक्स आतन्कवाद, कालाबाजारी, टीटीई बाबू की दिहाडी की कमाई – इन सब पर लगवा दीजियेगा। राजकोश में इजाफा होगा और कई आम कृत्य टेक्स की नेट में आ जायेंगे।
मैं एक बार फिर प्रशंसा करता हूं जी!!! :-)

अनूप जी तो टैक्स का नामकरण भी कर दिये.

अनूप शुक्ल, on February 23rd, 2008 at 7:06 am Said:

शानदार सलाह और अनुरोध। डकैती पर जब भी सर्विस टैक्स लगेगा उसे आलोक पुराणिक टैक्स के नाम से जाना जायेगा। :)

शिव कुमार जी अपनी बिरादरी के लोगों के बारे में कुछ कह रहे हैं.

Shiv Kumar Mishra, on February 23rd, 2008 at 10:31 am Said:

गब्बर सिंह जी ने शेयरों में अपने निवेश के लिए सांभा को जिम्मेवार ठहरा दिया. लेकिन उन्होंने उन एनालिस्ट लोगों को जिम्मेवार नहीं ठहराया जिन्होंने बिजनेस न्यूज़ चैनल पर बैठे-बैठे उन्हें बताया था कि किन-किन शेयर में इन्वेस्ट करना है. कहीं ऐसा तो नहीं कि सिंह जी उन्हें लूट चुके हैं जो बाकी लोगों को टीवी पर बैठे-बैठे लूटते रहते हैं.

गब्बर सिंह जी शायद अपने ऊपर छापा न पड़ने से दुखी हैं. इसीलिए डकैती पर सर्विस टैक्स लगाने की बात कर रहे हैं. एक बार उनकी सर्विस पर टैक्स लगा तो उसकी चोरी भी करनी पड़ेगी. टैब कहीं जाकर छापा पड़ेगा उनके ऊपर. और एक बार छापा पड़ गया तब जाकर लोग डरेंगे उनसे. नहीं तो आजकल जनता ऐसे लोगों को डाकू बदमाश मानने से इनकार कर देती है जिनके ऊपर छापा नहीं पड़ता.

आशा है वित्तमंत्री जी सिंह जी के सुझावों पर जरूर ध्यान देंगे. आख़िर समाज के माईनोरिटी सेक्शन के बारे में सोचने की कसम खाई है उन्होंने.

संजय तिवारी जी थोड़े सैण्टिया गये हैं.

  • संजय तिवारी, on February 23rd, 2008 at 10:37 am Said:

    यह सही है कि आंटा-दाल चावल भी अब निवेश के इश्यू हो रहे हैं. थू है ऐसे विकास और प्लानिंग पर.

    अरुण जी फिर से पंगा लेने की फ़िराक में हैं.

  • अरूण, on February 23rd, 2008 at 10:54 am Said:

    आलोक जी आपने पिछ्ले कई साल से ये जो कंसल्टेंसी का काम किया हुआ है (अगडम बगडम प्राईवेट लिमिटेड का) इस्का सर्विस टैक्स जाम कराईये.. या हम से सैटल मेंट कीजीये सेंट्रल एक्साईज डिपार्टमेंट ,नई दिल्ली

    ई..का …लो जी लो ..ग़ब्बर सिंह भी हाजिर हो गये.

  • गब्बर सिंह, on February 23rd, 2008 at 1:33 pm Said:

    का हो आलोक बबुआ ई सब का अंट-शंट बकवास कर रहे हो.
    हमई पर अगर सर्भिस टैक्सवा लगा दोगे तो बहुत पछ्तावोगे.
    पता है कि नही होली कब है? हाँ कब है होली?
    अबरी बरस होरी मे हम तोका नाही छोडेंगे.
    संभल जइयो.

    और पीछे पीछे सांभा भी…

  • सांभा, on February 23rd, 2008 at 6:07 pm Said:

    सरदार, यहां क्या कर रहे हैं?

    और फिर वालिद साहब भी…

  • हरी सिंह, गब्बर सिंह के वालिद, on February 23rd, 2008 at 6:30 pm Said:

    गब्बर, बेटा इतने गिर गए कि एक लेखक को धमका रहे हो. मुझे कैसे गर्व होगा तुमपर? एक लेखक जिसने तुम्हें रास्ता दिखाया, जिसने तुम्हारी तकलीफों के बारे में लिखा उसे ही धमकी देना कितना जायज है?

    और क्या ये चिल्लाते रहते हो कब है होली, होली कब है. ये होली के बारे में इतने आतुर क्यों रहते हो? कभी दिवाली के बारे में जानने की कोशिश की है. तीन साल हो गए, घर पर एक पैसा नहीं भेजा तुमने. कुछ अपने माँ-बाप के बारे में भी कुछ करो. जितना पैसा कमाते हो (वैसे भी अब कुछ ज्यादा नहीं कमाते), सब उस नाचने-गाने वालों के ऊपर उड़ा देते हो. मेरी हालत का अंदाजा है तुम्हें? लूट-मार से मैंने जो कुछ भी कमाया था, उसमें से आधा तो तुम्हारी ट्रेनिंग और हथियार खरीदने पर लगा दिया. बाकी जो कुछ बचा था उसे गाँव के पोस्ट ऑफिस में एम् आई एस कर रखा था. इन्टरेस्ट रेट की हालत देख रहे हो. दिनों-दिन घटता ही जा रहा है. आजकल तो खाने-पीने की तकलीफ हो रही है.

    बेटा, मेरी बात पर गौर करो और अलोक पुराणिक जी से माफ़ी मांगो. आख़िर कितने लेखक हैं जो एक डाकू को रास्ता दिखाते हैं? और हाँ, तुरंत पन्द्रह हज़ार का मनी आर्डर भेजो, गाँव के बनिया के यहाँ बहुत कर्जा हो गया है. अब तो नमक देने से भी इनकार करने लगा है.

    तुम्हारा पिता
    हरी सिंह

    शिवकुमार जी तो देख के ही ब्लॉग महिमा गाने लगे हैं.  

    Shiv Kumar Mishra, on February 23rd, 2008 at 6:55 pm Said:

    अलोक जी,

    सर ब्लॉग की ताकत का अंदाजा चला आज. आपकी पोस्ट क्या पब्लिश हुई, गब्बर, सांभा, कालिया तक आ पहुंचे टिपण्णी करने. और तो छोड़िये हरी सिंह जी तक आ पहुंचे.

    वाह. ये हुआ न असली ब्लॉग-महिमा.

    आप वहाँ टिप्पणी ना दे पायें हों तो यहाँ दे दें.

    बाल किशन जी की धमकी के बाद उनकी टिप्पणी भी यहाँ दी जा रही है. ;-)

  • balkishan, on February 23rd, 2008 at 1:34 pm Said:

    अरे भाई साब यंहा तो बहुत खतरा है.
    हम बाद मे मतलब होली के बाद कमेन्ट करेंगे.

  • और संजीत जी अभी आने ही वाले होंगे…धमकी देने तो उनको भी शामिल कर लेते हैं जी ;-)

  • Sanjeet Tripathi, on February 23rd, 2008 at 3:39 pm Said:

    धांसू आईडिया

  •  

    इस अंक में देखिये कि बिशारत, जो मास्टरी की नौकरी के लिये तहसीलदार मौलवी मज्जन के पास जा रहे हैं, उनको मौलवी के बारे में क्या क्या बातें पता चलती हैं.

    ***

    मौलवी मज्जन से तानाशाह तकः तहसीलदार तक सिफ़ारिश पंहुचाने में कोई कठिनाई नहीं हुई। अलबत्ता मौलवी मुजफ़्फ़र (जो तिरस्कार, संक्षेप और प्यार में मौली मज्जन कहलाते थे) के बारे में जिससे पूछा, उसने नया ऐब निकाला। एक साहब ने कहा, क़ौम का दर्द रखता है हाकिमों से मेलजोल रखता है पर कमीना है, बच के रहना। दूसरे साहब बोले मौलवी मज्जन एक यतीमख़ाना शम्स-उल-इस्लाम भी चलाता है। यतीमों से अपने पैर दबवाता है। स्कूल की झाड़ू दिलवाता है और मास्टरों को यतीमों की टोली के साथ चंदा इकट्ठा करने कानपुर और लखनऊ भेजता है, वो भी बिना टिकिट। मगर इसमें कोई शक नहीं कि धुन का पक्का है। धीरजगंज के मुसलमानों की बड़ी सेवा की है। धीरजगंज के जितने भी मुसलमान आज पढ़े-लिखे और नौकरी करते नजर आते हैं वो सब इसी स्कूल के जीने से ऊपर चढ़े हैं। कभी-कभी लगता था कि लोगों को मौलवी मुजफ़्फ़र से ईश्वरीय बैर हो गया है। बिशारत को उनसे एक तरह की हमदर्दी हो गई। यूं भी मास्टर फ़ाख़िर हुसैन ने एक बार बड़े काम की नसीहत की थी कि कभी अपने बुजुर्ग या बॉस या अपने से अधिक बदमाश आदमी को सही रास्ता बताने की कोशिश न करना। उन्हें ग़लत राह पर देखो तो तीन ज्ञानी बंदरों की तरह अंधे, बहरे और गूंगे बन जाओ! ठाठ से राज करोगे!

    एक दिलजले बुजुर्ग, जो ‘जमाना’ पत्रिका में काम करते थे, फ़र्माया, वो छाकटा ही नहीं, चरकटा भी है। पच्चीस रुपये की रसीद लिखवा कर पन्द्रह रुपल्ली हाथ पे टिका देगा। पहले तुम्हें जांचेगा, फिर आंकेगा, इसके बाद तमाम उम्र हांकेगा। उसने दस्तख़त करने उस वक़्त सीखे जब चंदे की जाली रसीदें काटने की जुरूरत पड़ी। अरे साहब! सर सय्यद तो अब जा के बना है मैंने अपनी आंखों से उसे अपने निकाहनामे पे अंगूठा लगाते देखा है। ठूंठ जाहिल है मगर बला का गढ़ा हुआ, घिसा हुआ भी। ऐसा-वैसा चपड़क़नात नहीं है, लुक़्क़ा भी है, लुच्चा भी और टुच्चा भी। बुजुर्गवार ने एक ही सांस में पाजीपन के ऐसे बारीक शेड्स गिनवा दिये कि जब तक आदमी हर गाली के बाद शब्दकोष न देखे या हमारी तरह लम्बे समय तक भाषाविदों की सुहबत के सदमे न उठाये हुए हो वो जबान और नालायक़ी की उन बारीकियों को नहीं समझ सकता।

    सय्यद एजाज हुसैन ‘वफ़ा’ कहने लगे ‘‘मौली मज्जन पांचों वक़्त टक्करें मारता है। घुटने, माथे और जमीर पर ये बड़े-बड़े गट्टे पड़ गये हैं। थानेदार और तहसीलदार को अपनी मीठी बातचीत, इस्लाम-दोस्ती, मेहमान-नवाजी और रिश्वत से क़ाबू में कर रखा है। दमे का मरीज है। पांच मिनट में दस बार आस्तीन से नाक पोंछता है।’’ दरअस्ल उन्हें आस्तीन से नाक पोंछने पर इतना एतराज न था जितना इस पर कि आस्तीन को अस्तीन कहता है, यख़नी को अख़नी और हौसला का होंसला। उन्होंने अपने कानों से उसे मिजाज शरीफ़ और शुबरात कहते सुना था। जुहला (गंवारों) किसानों और बकरियों की तरह हर वक़्त मैं! मैं! करता रहता है। लखनऊ के शुरफ़ा (शरीफ़ का बहुवचन-भद्र लोग) अहंकार से बचने की ग़रज से ख़ुद को हमेशा हम कहते हैं। इस पर एक कमजोर और सींक-सलाई बुजुर्ग ने फ़र्माया कि जात का क़साई, कुंजड़ा या दिल्ली वाला मालूम होता है, किस वास्ते कि तीन बार गले मिलता है। अवध में शुरफ़ा केवल एक बार गले मिलते हैं।

    ये अवध के साथ सरासर जियादती थी इसलिये कि सिर्फ़ एक बार गले मिलने में शराफ़त का शायद उतना दख़्ल न था जितना नाजुक-मिजाजी का और ये याद रहे कि यह उस जमाने के पारम्परिक चोंचले हैं जब नाजुक-मिजाज बेगमें ख़ुश्के और ओस का आत्महत्या के औजार की तरह प्रयोग करती थीं और यह धमकी देती थीं कि ख़ुश्कख़ार ओस में सो जाऊंगी। वो तो खैर बेगमें थीं, तानाशाह उनसे भी बाजी ले गया। उसके बारे में मशहूर है कि जब वो बंदी बना कर दरबार में बेड़ियां पहना कर लाया गया तो सवाल ये पैदा हुआ कि इसे मरवाया कैसे जाये। दरबारियों ने एक से एक उपाय पेश किये। एक ने तो मशवरा दिया कि ऐसे अय्याश को तो मस्त हाथी के पैर से बांध कर शहर का चक्कर लगवाना चाहिये। दूसरा कोर्निश बजा कर बोला, दुरुस्त, मगर मस्त हाथी को शहर का चक्कर कौन माई का लाल लगवायेगा। हाथी शहर का चक्कर लगाने के लिये थोड़े ही मस्त होता है, अलबत्ता आप तानाशाह की अय्याशियों की सजा हाथी को देना चाहते हैं तो और बात है। इस पर तीसरा दरबारी बोला कि तानाशाह जैसे अय्याश को इससे जियादा तकलीफ़ देने वाली सजा नहीं हो सकती कि इसे हीजड़ा बना कर इसी के हरम में खुला छोड़ दिया जाये। एक और दरबारी ने तजवीज पेश की कि आंखों में नील की सलाई फिरवा कर अंधा कर दो, फिर क़िला ग्वालियर में दो साल तक रोजाना ख़ाली पेट पोस्त का पियाला पिलाओ कि अपने जिस्म को धीरे-धीरे मरता हुआ ख़ुद भी देखे। इस पर किसी इतिहासकार ने विरोध किया कि सुल्तान का तानाशाह से ख़ून का कोई रिश्ता नहीं है, ये बरताव तो सिर्फ़ सगे भाइयों के साथ होता आया है। एक दिलजले ने कहा कि क़िले की दीवार से नीचे फेंक दो, मगर यह तरीक़ा इसलिए रद्द कर दिया गया कि इसका दम तो मारे डर के रस्ते में ही निकल जायेगा, अगर मक़सद तकलीफ़ पहुंचाना है तो वो पूरा नहीं होगा। अंत में वजीर ने, जिसका योग्य होना साबित हो गया, ये मुश्किल हल कर दी। उसने कहा कि मानसिक पीड़ा देकर और तड़पा-तड़पाकर मारना ही लक्ष्य है तो इसके पास से एक ग्वालिन गुजार दो।

    जिन पाठकों ने बिगड़े रईस और ग्वालिन नहीं देखी उनकी जानकारी के लिये निवेदन है कि मक्खन और कच्चे दूध की बू, रेवड़ बास में बसे हुए लंहगे और पसीने के नमक से सफ़ेद पड़ी हुई काली क़मीज के एक भबके से अमीरों और रईसों का दिमाग़ फट जाता था। फिर उन्हें हिरन की नाभि से निकली हुई कस्तूरी के लख़लख़े सुंघा कर होश में लाया जाता था।

    जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

    [उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

    इस भाग की अन्य कड़ियां.

    1. फ़ेल होने के फायदे 2. पास हुआ तो क्या हुआ 3. नेकचलनी का साइनबोर्ड

    पहला भाग

    किताब डाक से मंगाने का पता: 

    किताब- खोया पानी
    लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
    उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
    प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
    सेक्टर 11, नोएडा-201301
    मोबाइल-09810387857

    पेज -350 (हार्डबाऊंड)

    कीमत-200 रुपये मात्र

    Technorati Tags: पुस्तक चर्चा, समीक्षा, काकेश, विमोचन, हिन्दी, किताब, युसूफी, व्यंग्य, humour, satire, humor, kakesh, hindi blogging, book, review, mustaq, yusufi, hindi satire, book review

    चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: पुस्तक चर्चा, समीक्षा, काकेश, विमोचन, हिन्दी, किताब, युसूफी, व्यंग्य

     

    नेकचलनी का साइनबोर्ड : विज्ञापन में मौलवी सय्यद महुम्मद मजुफ्फर ने, कि यही स्कूल के संस्थापक, व्यवस्थापक, संरक्षक, कोषाध्यक्ष और ग़बनकर्ता का नाम था, सूचित किया था कि उम्मीदवार को लिखित आवेदन करने की आवश्यकता नहीं, अपनी डिग्री और नेकचलनी के दस्तावेजी सुबूत के साथ सुब्ह आठ बजे स्वयं पेश हो। बिशारत की समझ में न आया कि नेकचलनी का क्या सुबूत हो सकता है, बदचलनी का अलबत्ता हो सकता है। उदाहरण के लिये चालान,मुचलका, गिरफ़्तारी-वारंट, सजा के आदेश की नक़्ल या थाने में दस-नम्बरी बदमाशों की लिस्ट। पांच मिनट में आदमी बदचलनी तो कर सकता है नेकचलनी का सुबूत नहीं दे सकता। मगर बिशारत की चिंता अकारण थी। इसलिये कि जो हुलिया उन्होंने बना रक्खा था यानी मुंडा हुआ सर, आंखों में सुरमे की लकीर, एड़ी से ऊंचा पाजामा, सर पर मख़मल की काली रामपुरी टोपी, घर, मस्जिद और मुहल्ले में पैर में खड़ाऊं….. इस हुलिये के साथ वो चाहते भी तो नेकचलनी के सिवा और कुछ संभव न था। नेकचलनी उनकी मजबूरी थी, स्वयं अपनायी हुई अच्छाई नहीं और उनका हुलिया इसका सुबूत नहीं साइनबोर्ड था।

    यह वही हुलिया था जो इस इलाक़े के निचले मिडिल क्लास ख़ानदानी शरीफ़ घरानों के नौजवानों का हुआ करता था। ख़ानदानी शरीफ़ से अभिप्राय उन लोगों से है जिन्हें शरीफ़ बनने, रहने और कहलाने के लिये व्यक्तिगत कोशिश बिल्कुल नहीं करनी पड़ती थी। शराफ़त, जायदाद और ऊपर वर्णित हुलिया पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस तरह विरसे में मिलते थे जिस तरह आम आदमी को जीन्स और वंशानुगत रोग मिलते हैं। आस्था, प्रचार, ज्ञान और हुलिये के लिहाज से पड़पोता अगर हू-ब-हू अपना पड़दादा मालूम हो तो ये ख़ानदानी कुलीनता, शराफ़त और शुद्धता की दलील समझी जाती थी।

    इन्टरव्यू के लिये बिशारत ने उसी हुलिये पर रगड़ घिस करके नोक-पलक संवारी। अचकन धुलवाई, बदरंग हो गई थी इसलिये धोबी से कहा क़लफ़ अधिक लगाना। सर पर अभी शुक्रवार को जीरो नम्बर की मशीन फिरवाई थी, अब उस्तरा और उसके बाद आम की गुठली फिरवा कर आंवले के तेल की मालिश करवाई। देर तक मिर्चें लगती रहीं। टोपी पहन कर आइना देख रहे थे कि अन्दर मुंडे हुए सर से पसीना इस तरह रिसने लगा जिस तरह माथे पर विक्स या बाम लगाने से झरता है। टोपी उतारने के बाद पंखा चला तो ऐसा लगा जैसे किसी ने हवा में पिपरमेन्ट मिला दिया हो। फिर बिशारत ने जूतों पर फ़ौजियों की तरह थूक से पालिश करके अपनी पर्सनेलिटी को फ़िनिशिंग टच दिया।

    सलेक्शन कमेटी का चेयरमैन तहसीलदार था। सुनने में आया था कि एपाइन्टमेन्ट के मुआमले में उसी की चलती है। फक्कड़, फ़िक़रेबाज, साहित्यिक, मिलनसार, निडर और रिश्वतख़ोर है। घोड़े पर कचहरी आता है, ‘नादिम’ (शर्मिन्दा) उपनाम रखता है, आदमी बला का जहीन और तबीयतदार है। उसे अपना तरफ़दार बनाने के लिये [बिशारत ने] बादामी काग़ज का एक दस्ता, छह-सात निब वाले क़लम ख़रीदे और रातों-रात अपनी शायरी का चमन यानी सत्ताईस ग़जलों का गुलदस्ता स्वयं तैय्यार किया। [बिशारत] ‘मखमूर’ उपनाम रखते थे जो उनके उस्ताद जौहर इलाहाबादी का दिया हुआ था। इसी लिहाज से अपनी अधूरी आद्योपान्त किताब का नाम ‘ख़ुमख़ाना-ए-मख़मूर कानपुरी सुम लखनवी’ रखा (लखनऊ से केवल इतना सम्बन्ध था कि पांच साल पहले अपना पित्ता निकलवाने के सिलसिले में दो सप्ताह के लिये अस्पताल में लगभग अर्धमूर्छित हालत में रहे थे) फिर उसमें एक विराट संकलन भी मिला दिया।

    इस विराट संकलन की कहानी यह है कि अपनी ग़जलों और शेरों का चयन उन्होंने दिल पर पत्थर बल्कि पहाड़ रख कर किया था। शेर कितना ही घटिया और कमजोर क्यों न हो उसे स्वयं काटना और रद्द करना उतना ही मुश्किल है जितना अपनी औलाद को बदसूरत कहना या जंबूर से ख़ुद अपना हिलता हुआ दांत उखाड़ना। ग़ालिब तक से ये पराक्रम न हो सका। कांट-छांट मौलाना फ़ज्ले-हक़ खैराबादी के सुपुर्द करके ख़ुद ऐसे बन के बैठ गये जैसे कुछ लोग इंजेक्शन लगवाते वक़्त दूसरी तरफ़ मुंह करके बैठ जाते हैं।

    बिशारत ने शेर छांटने को तो छांट दिये मगर दिल नहीं माना, इसलिये अंत में एक परिशिष्ट अपनी रद्द की हुई शायरी का सम्मिलित कर दिया। यह शायरी उस काल से संबंधित थी जब वो बेउस्ताद थे और ‘फ़रीफ़्ता’ उपनाम रखते थे। इस उपनाम की एक विशेषता यह थी कि जिस पंक्ति में भी डालते वो छंद से बाहर हो जाती। चुनांचे अधिकतर ग़जलें बग़ैर मक़्ते के थीं। चंद मक़्तों में शेर का वज्न पूरा करने के लिये ‘फ़रीफ़्ता’ की जगह उसका समानार्थक ‘शैदा’ और ‘दिलदादा’ प्रयोग किया, उससे शेर में कोई और दोष पैदा हो गया। बात दरअस्ल यह थी कि आकाश से जो विचार उनके दिमाग़ में आते थे उनके दैवीय जोश और तूफ़ानी तीव्रता को छंद की गागर में बंद करना इंसान के बस का काम न था।

    जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

    [उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

    इस भाग की अन्य कड़ियां.

    1. फ़ेल होने के फायदे 2. पास हुआ तो क्या हुआ

    पहला भाग

    किताब डाक से मंगाने का पता: 

    किताब- खोया पानी
    लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
    उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
    प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
    सेक्टर 11, नोएडा-201301
    मोबाइल-09810387857

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    कीमत-200 रुपये मात्र

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    साहित्य अकादमी एक संस्था है जो भारतीय भाषाओं के छ्पी विभिन्न रचनाओं को सामने लाने का माध्यम बनी है.यह अंग्रेजी में 1957 से इंडियन लिटरेचर तथा हिन्दी में 1980 के समकालीन भारतीय साहित्य जैसी पत्रिकाओं का नियमित प्रकाशन भी करती आ रही है.ये पत्रिकाएँ विभिन्न भारतीय भाषाओं में रचित श्रेष्ठ समकालीन साहित्य को प्रस्तुत करती रही हैं.chayanam

    वर्ष 2006 में साहित्य अकादेमी की स्वर्ण जयंती के अवसर पर अरुण प्रकाश द्वारा संपादित एक पुस्तक का प्रकाशन किया था जिसका नाम है “चयनम्” .यह अकादमी की द्विमासिक हिन्दी पत्रिका समकालीन भारतीय साहित्य के पिछले 25 वर्षों में प्रकाशित रचनाओं से एक चयन है, इसमें कविता कहानी, संस्मरण, रेखाचित्र, आत्मकथा, साक्षात्कार तथा आलोचनात्मक लेखों के साथ-साथ एक उपन्यासिका का भी समावेश किया गया है.

    इसमें उर्दू के ख्याति प्राप्त आलोचक आले अहमद सुरूर, अज्ञेय, निर्मल वर्मा, प्रसिद्ध नाट्यकर्मी शुंभ मित्र, भैरप्प, विजय तेन्दुलकर, फणीश्वरनाथ रेणु, त्रिलोचन शास्त्री, नागार्जुन, राजेन्द्र यादव, कमलेश्वर, गोपीचंद्र नारंग, अली सरदार जाफ़री, प्रतिभा राय, सुनील गंगोपाध्याय, सुभाष मुखोपाध्याय, अमृता प्रीतम, केशव रेड्डी, योसफ़ मेकवान, शरणकुमार लिम्बाले, ओ.एन.वी. कुरुप से लेकर युवा अंग्रेजी कथाकार मित्रा फुकन की रचनाऎं हैं.

    आज प्रस्तुत है इसी पुस्तक से आले अहमद सुरुर की एक रचना “क्या साहित्य विफल है ?” के प्रमुख अंश. 

    लगभग सत्तर वर्ष पहले जब टी.एस. एलियट ने कहा कि उपन्यास मर चुका है, और बाद में जब एडमंड विल्सन ने घोषणा की कि एक ‘मरती हुई विधा’ है, तो उनका आशय यही था कि दूसरे रूप और पद्धतियाँ उनका स्थान ले लेंगी. उन्होंने यह नहीं कहा कि साहित्य एक मरती हुई कला है. लेकिन इन दिनों कोई ख़ास रूप या विधा नहीं, बल्कि संरचित भाषिक प्रवचन का संपूर्ण माध्यम ही आक्रमणों के घेरे में है. दूरदर्शन और अन्य आधुनिक तकनीकी चमत्कारों के सम्मुख मुद्रित शब्द अपना आकर्षण खो रहा है. यह एक वास्तविक ख़तरा है कि किताबें बेकार हो चलें और मुद्रण केवल अल्पतम उपयोगितापरक कामों तक सीमित हो जाए.

    ******* तथ्य फिर भी यह है कि किताबें पहले से ज़्यादा छप और बिक रही हैं और शायद पढ़ी जाती होंगी. यह सही है, जैसा कि एक समीक्षक ने टाइम्स लिटरेरी सप्लीमेण्ट में कुछ अरसा पहले इशारा किया था कि उनमें अधिकांश ‘कूड़ा’ होंगी. भारत में हालत और भी बदतर होगी, लेकिन शायद कुछ विश्वास के साथ यह दावा किया जा सकता है कि अधिकांश भारतीय भाषाओं में अभी भी कुछ उम्दा किताबें आ रही हैं और कविता तथा गद्य में कुछ महत्त्वपूर्ण प्रयोग किए जा रहे हैं. भारतीय भाषाओं में आपस में और विदेशी साहित्य से पहले से अधिक अनुवाद देखे जा सकते हैं.

    साहित्य के विभिन्न रूपों और विधाओं के बीच की सीमा-रेखाएँ धुँधली पड़ने लगी है. भाषा ख़ुद बदल रही है, नैतिक सवालों पर बहस जारी है, यद्यपि नैतिक समाधानों का प्रचलन नहीं रहा, विचारधारा की पकड़ ढ़ीली होती जा रही है तथा संशयवाद, संदेह और निराशा, अँधी आस्था, सुनिश्चित मताग्रहों और अस्पष्ट सामान्यीकरण की जगह लेते जा रहे हैं. भारतीय साहित्यिक परिदृश्य में टैगोर, इक़बाल और प्रेमचंद्र जैसे महान नाम इस समय नहीं हैं. महानों का दौर समाप्त हो गया है. आकाश पर कवि छाए नहीं हैं. यह गद्य का, उपन्यास, कहानी, आत्मकथा और आलोचना का दौर है. कुछ रचनाकारों ने आलोचकों की वर्तमान हैसियत पर विरोध प्रकट किया है. आलोचक कई बार नए लेखकों की प्रतिभा को पहचानने में असफल रहे हैं; वे अधिकांशतः पुरानी अभिरुचियों में ही शरण लेते रहे हैं; विचारधारा की अपनी तालाश के मारे वे साहित्य के मूल्यांकन में नाकामयाब रहे हैं; फिर भी एक परिप्रेक्ष्य के लिए, एक मूल्यबोध और संस्कृति की खोज के लिए और इस दौर की बढ़ती हुई बर्बरता में एक सामाजिक चेतना, एक नैतिक ताने-बाने के लिए और भाषा नामक रहस्य के सम्मान के लिए आलोचक का महत्त्व है.

    *******पाठक आमतौर पर रूढ़िवादी होते हैं, वे सामान्यतया साहित्य में अपनी स्थापित मर्यादाओं की स्वीकृति या एक स्वप्न-जगत में पलायन चाहते हैं. साहित्य एक झटके में उन्हें अपने आस-पास के उस जीवन के प्रति सचेत करता है, जिससे उन्होंने आँखें मूँद रखी थीं. शुतुरमुर्ग़ अफ्रीका के रेगिस्तानों में नहीं मिलते; वे हर जगह बहुतायत में उपलब्ध है. प्रौद्योगिकी के इस दौर का नतीजा जीवन के हर गोशे में नक़द फ़सल के लिए बढ़ता हुआ पागलपन है; और हमारे राजनीतिज्ञ, सत्ता के दलाल, व्यापारी, नौकरशाह- सभी लोगों को इस भगदड़ में नहीं पहुँचने, जैसा दूर करते हैं वैसा करने, चूहादौड़ में शामिल होने और कुछ-न-कुछ हासिल कर लेने को जिए जा रहे हैं. हम थककर साँस लेना और अपने चारों ओर निहारना, हवा के पेड़ में से गुज़रते वक्त पत्तियों की मनहर लय-गतियों को और फूलों के जादुई रंगों को, फूली सरसों के चमकदार पीलेपन को, खिले मैदानों की घनी हरीतिमा को मर्मर ध्वनि के सौन्दर्य, हिमाच्छादित शिखरों की भव्यता, समुद्र तट पर पछाड़ खाकर बिखरती हुई लहरों के घोस को देखना-सुनना भूल गए हैं.

    कुछ लोग सोचते हैं कि पश्चिम का आधुनिकतावाद और भारत तथा अधिकांश तीसरी दुनिया के नव औपनिवेशिक चिन्तन के साथ अपनी जड़ों से अलगाव, व्यक्तिवादी अजनबियत में हमारा अनिवार्य बेलगाम धँसाव, अचेतन के बिम्ब, बौद्धिकता से विद्रोह, यह घोषणा की ‘दिमाग़ अपनी रस्सी के अंतिम सिरे पर है’, यथार्थवाद का विध्वंस, काम का ऐन्द्रिक सुख मात्र रह जाना और मानवीय भावनाओं का व्यावसायीकरण तथा निम्नस्तरीयकरण इस अँधी घाटी में आ फँसने की वजह है. लेकिन वे भूल जाते हैं कि आधुनिकीकरण इतिहास की एक सच्चाई है, कि नई समस्याओं को जन्म देने और विज्ञान को अधिक जटिल बनाने के बावजूद आधुनिकीकरण, एक तरह से, मानव जाति की नियति है.

    वे यह भी भूल जाते हैं कि आधुनिकीकरण सौ फीसदी पश्चिमी करण नहीं है, बल्कि एक बिन्दु के बाद यह अपना रास्ता ख़ुद बनाता है. हमें इस तथ्य पर विचार करना चाहिए कि भारतीय पुनर्जागरण उदीयमान बुर्जुआ वर्ग़ द्वारा अपनी ज़रूरतों के लिए अपहृत कर लिया गया और अधूरा ही रह गया. हमें मशीम द्वारा मनुष्य के विस्थापन, महानगरों के जंगलों का निर्माण और प्रगति के नाम पर सत्ता की राजनीति को भी समझना चाहिए. आधुनिकता के बहुत से आयाम हैं, लेकिन पश्चिम में पूँजीवाद की भूमिका से सीख लेते हुए भारत में भी इसे समग्र मनुष्य के बारे में महसूस करने और सोचने को हतोत्साहित किया और ऊब तथा मनुष्य में छिपे पशुत्व के रसातल में उदास चिन्तन के रेगिस्तान को बढ़ावा दिया है. मानवता और मानवीयता की जगह बर्बरता और पशुत्व ने ले ली है. ‘नवता’, स्टीफ़ोन स्पेण्डर द्वारा प्रयुक्त पद, की तालाश में कुछ लोगों ने अच्छे लेखन को ‘प्रतिक्रांतिकारी’ मान लिया. उनकी राय में साहित्य यथास्थिति पर हमारे अक्रोश की धीर को कुंठित करता और हमें केवल मानसिक जगत में रहने के लिए प्रेरित करता है.

    मेरा सुझाव है कि विवेकहीन आधुनिकता के बावजूद आधुनिकता की दिशा में धैर्यपूर्वक सुयोजित प्रयास होने चाहिए. यथार्थवाद का अर्थ व्यर्थ के ब्यौरे नहीं होने चाहिए और न स्वस्थ काम को अश्लील लेखन में ढलना चाहिए. हमें याद रखना चाहिए कि क्लासिकी साहित्य ने काम-व्यवहार को भी अपनी परिधि में लिया, पर उसमें लोलुप संतोष नहीं हैं. एक आलोचक किसी नाली में भी झाँक सकता है, पर वह नाली-निरीक्षक नहीं होता. लेखक का कार्य दुनिया को बदलना नहीं, समझना है.

    साहित्य क्रांति नहीं करता; वह मनुष्यों के दिमाग़ बदलता और उन्हें क्रांति की ज़रूरत के प्रति जागरूक बनाता है. हमें स्मरण रखना चाहिए कि पक्षधर साहित्य, साहित्य का एक प्रकार मात्र है, कि विचारधारा सर्जनात्मक दृष्टि को बाधित कर सकती है, गो यह उसे एक दिशा भी देती है. साहित्य में ‘चाहिए’ को भी ध्यान में रखा जा सकता है, पर उसका मुख्य सरोकार ‘है’ से होता है. जब पाठक को लगता है कि उसे एक शो-रूम में ले आया गया है तो वह फँसा हुआ महसूस करता है; जब वह एक खिड़की से दुनिया को देखता है तो उसमें प्रत्येक चीज़ को देखने की उत्सुकता और जिज्ञासा जागती है. साहित्य राजनीतिक हो सकता है और धार्मिक, रहस्यवादी, दार्शनिक भी, लेकिन उसे किसी दर्शन या विचारधारा को हथौड़ा नहीं बनाना चाहिए. दोस्तोएव्स्की ने एक बार कहा था कि केवल ‘सौंदर्य’ ही दुनिया को बचा सकता है. मेरे ख़याल में सौन्दर्य से उसका तात्पर्य उपयोगिता के उस संकीर्ण अर्थ से था, जिसका उपदेश कॉडवेल ने दिया. सौन्दर्य से उसका तात्पर्य शायद था पूर्णता की खोज में सक्रिय मनुष्य : परिचित और अपरिचित में, जीवन की खुशी और दुःख में, संगति और असंगति के सौंदर्य, वक्र गतियों और उज्जवल भावों का, उत्प्रेरक विचारों का, निराशा के अतल में आशा का, प्रभावित यौवन और थके-हारे युग का सौंदर्य; मनुष्य में दिव्यत्व के कंपन का और आज एक पेड़ लगाने का सौंदर्य; मार्टिन लूथर के शब्दों में, यह जानते हुए भी कि यह दुनिया कल समाप्त हो सकती है.

    *************

    अच्छे साहित्य के चहेताओं को यह किताब खरीद लेनी चाहिये.

     

    परुली सो तो गयी. दिन भर की थकी थी नींद भी आ गयी. लेकिन ना जाने कितने देर तक सपनों से लड़ती रही. कभी लगता कि वह एक भ्योल (ऊंची पहाड़ी) से नीचे गिरती जा रही है.चारों और कंटीली झाडियां हैं जिनको वह पकड़ने की कोशिश कर रही है पर वह हाथ नहीं आ रहीं.कभी लगता कि वह नौले से पानी ला रही है और उसकी तांबे की गगरी उसके सर से छिटक कर गिर गयी है और वह उसे पकड़ने दौड़ रही है या उसकी ईजा गाय को बांधने गोठ गयी तो गाय ने उसे ही सींग से मार दिया वह गिरी तो गाय उसे अपने पैरों के तले रौदते हुए चली गयी. रात भर इस तरह के सपनों से लड़ती रही. एक दो बार आंख भी खुली तो घुप्प अंधेरा था कुछ दिखायी नहीं दिया. सिर्फ बीतती हुई रात थी.सुबह अभी भी कहीं दूर थी.

    रात की बात आयी गयी हो गयी. सुबह से परुली फिर अपने काम में जुट गयी.रोज की तरह छिलुके से चूल्हा जलाया. ईजा के साथ घर का काम किया.स्कूल की ड्रेस के कपड़े बिस्तर के नीचे से निकाल कर पहने और बाकी लड़कियों के साथ स्कूल के लिये चल दी.रास्ते में उसने लड़कियों को कल रात की ईजा-बाबू की बातचीत के बारे में बताया. तो चमुली बोली

    “यह तो बहुत बढिया हुआ. तेरा चिंन्ह साम्य हो जायेगा तो तू तो ब्योली (दुल्हन) बन के चले जायेगी. तेरा तो नाक नक्स इतना अच्छा है तभी तो तेरा चिन्ह मांगा है.हम लोगों का तो कोई भी नहीं मांगता. हम भी ब्योली बने तो इस पढ़ाई से तो छुटकारा मिले”.

    बाकी लड़कियां उसके साथ हँसी ठिठोली करने लगीं. लेकिन परुली को यह बिल्कुल भी अच्छा नहीं लग रहा था.

    “लेकिन मैं अभी पढ़ना चाहती हूँ.” परुली की आवाज में एक दृढ़ता थी.

    अरे पढ़ लिख के क्या बैरिस्टर बनेगी. ब्या तो तब भी होगा ना और फिर तो वही भनपान, गोरु-बाछों का मोव निकलना, गुपटाले पाथना, पानी सारना और घरपन के सारे काम, इन सब में तेरी पढ़ाई क्या काम आयेगी रे परुली..और अच्छे रिश्तो के लिये मना नहीं करना चाहिये. वो पारघर की बिन्दी बुआ को नहीं देखा. पढ़ाई के चक्कर में उनके बौज्यू (पिताजी) ने पहले उनका ब्या नहीं किया. अब कब के एम.ए. तो कर लिया लेकिन अब घर में बैठी हैं. कहीं बात ही नहीं बन रही. अब इस उमर में कहाँ होता है ब्या उनका.

    उसने भी बिन्दी बुआ के बारे में अपनी ईजा से सुना था कि वह पहले सारे रिश्तों के लिये मना कर देती थी. लेकिन अब तो किसी उमरदार या दूसरे ब्या वाले से भी शादी करने को भी तैयार है लेकिन कोई मिलता ही नहीं. फिर भी परुली को लगा कि वह यदि डॉक्टर बन गयी तो शायद फिर तो रिश्तों की कमी नहीं होगी. यह सोच कर वह बोली.

    “लेकिन मैं डॉक्टर बन गयी तो !”

    सुनके सभी लड़कियां जैसे एक साथ हँसी. “डॉक्टर बनना इतना आसान नही है परुली. ढेर सारे डबल (पैसे) लगते है बल. इत्ते सारे डबल तेरे बौज्यू कहाँ से लायेंगे.तेरे को तो हाईस्कूल ही करा रहे हैं वही बहुत है.”

    यह तो परुली भी जानती थी कि बाबू की जजमानी से घर का खर्च भी मुश्किल से निकल पाता था. आये दिन पैसों को लेकर घर में खिच खिच होती थी.

    परुली सोच में पड़ गयी. आज उसका स्कूल की पढ़ाई में भी मन नहीं लगा. उसके डॉक्टर बनने के सपने जैसे हवा में उड़ गये थे.वो तो सोच रही थी कि वह सवा रुपये का उचैण (मन्नत) गोल ज्यू के नाम का रखेगी कि उसका चिन्ह साम्य ना हो और वो ब्या करने से बच जाये.लेकिन अब तो उसको लगने लगा कि यदि उसका ब्या नहीं हुआ तो उसके बोज्यू पर वह एक भार की तरह पड़ी रहेगी. वह अपने बौज्यू पर भार भी नहीं बनना चाहती थी. उसकी ईजा भी कहती थी कि “परुली तेरा ब्या हो जाये तो एक बहुत बड़ा भार सर से निकल जायेगा.” तो क्या वह घर वालों पर एक भार थी? ऎसी ही बातें उसने अपने पड़ोस की माया दीदी से भी बहुत पहले सुनी थी.तब उसे इन सब बातों का मतलब समझ नहीं आया था.कुछ महीने पहले माया दीदी ने जब एक गाड़ में छ्लांग लगा कर अपनी जान दे दी तो उसे बहुत बुरा लगा था और गुस्सा भी आया था. लेकिन अब उसे लग रहा था शायद माया दीदी भी ऎसी ही किसी परिस्थिति से गुजरी होगी.तो क्या उसे भी ……

    “प्रिया! आज तुम्हारा ध्यान किधर है !!” मैडम की आवाज आयी.

    “मै…म …”

    “पढ़ाई में ध्यान लगाओ..”

    परुली ने फिर पढ़ाई में ध्यान लगा लिया.दिन बीतते गये. बोर्ड की परीक्षाऎं करीब आ रही थीं. परुली सब कुछ भूल कर बोर्ड की तैयारियों में जुट गयी.एक दिन उसके बाबू आये. आज वह बड़े खुश थे. थोड़ा सा गुड़ और बताशे लाये थे.आमतौर यह वह तब लाते जब कोई खुशी का मौका होता. ईजा तो तब घर पर थी नहीं उन्होने परुली से कहा “परु बेटा जरा चहा तो बना दे”. उनके बातों से अतिरिक्त प्यार झलक रहा था.वह बड़बाज्यू से बात करने लगे, जो पटांगण में बैठ कर अपना हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे.

    “बाबू आज पांडे ज्यू मिले थे. कह रहे थे कि गोपाल और परुली का चिन्ह साम्य हो गया.इस मंगशीर में जल्दी से कोई लगन निकाल कर ब्या कर लेंगें”

    यह बात चाय बनाती परुली ने भी सुनी. वह पानी में चाय की पत्ती डाल चुकी थी और अब वह पत्ती साफ पानी में अपना मटमैला रंग छोड़ रही थी.

    जारी….

    पिछला भाग : परुली….

     

    मेरी किसी पत्रकार से दोस्ती नहीं है.हाँ जान-पहचान सी है. लेकिन हर मौकों पर केवल जान पहचान से काम नहीं चलता.दोस्ती चाहिये.पत्रकारों से दोस्ती ना होने के बहुत सारे नुकसान हैं और कुछ कुछ फायदे भी हैं. सबसे बड़ा नुकसान तो यह है कि आपका नाम किसी पत्र-पत्रिका में तब तक नहीं छ्पता जब तक कि आपने सही में कोई बहुत अच्छा या बुरा काम ना किया हो. दोस्ती होने से आपके नाम के चर्चे बहुत जल्दी हो जाते हैं. फायदा तो यह है ही कि आपको फालतू की बहस में नहीं खीचा जाता.

    ऎसे ही एक जान पहचान के पत्रकार हमारे पास आये.मैने उन्हें दुआ सलाम की.वो एक्दम बौखलाये हुए थे. वो अक्सर इस तरह बौखलाये हुए मेरे पास आते थे.जब जब उनकी कोई रचना किसी संपादक से रिज़ेक्ट होकर आती है वो उसे गरियाते हुए मेरे पास आते हैं.ये बात और है वो उसी रिज़ेक्ट माल को रीसायकल करते रहते थे.कभी इस पत्रिका में कभी उस पत्रिका में. इसलिये गरियाने का अवसर भी उनको मिलता रहता था.कभी इस संपादक को कभी उस संपादक को.

    आज वह मेरे साथ दलित विमर्श करना चाहते थे.मैं आमतौर पर उनसे बहस नहीं करता.क्योंकि एक तो उनकी बहस का मतलब होता था कि जो वह बोल रहे हैं उसी की हाँ में हाँ मिलाओ, नहीं तो वह अपने किसी संपादक की तरह आपको गाली देने में भी पीछे नहीं हटते थे…और दूसरे मैं अपने आप को किसी भी बहस के उपयुक्त मानता भी नहीं हूँ क्योंकि बहस के लिये जिस बुद्धि,तर्क,कुतर्क, नीचपने,चाटुकारिता और चंपुओं की फौज की जरूरत होती है वो मेरे पास नहीं है. लेकिन आज वो दलित-विमर्श पर उतारू थे और मैं अपने आपको दलित विरोधी साबित नहीं करना चाहता था. मैं था भी नहीं लेकिन मेरे लिये दलित बहस का मुद्दा ना होकर सामाजिक व्यवस्था का एक अंग था जिसके उत्थान के लिये किसी बहस की जरूरत नहीं वरन सही में कुछ करने की जरुरत थी.

    मैं उन्हें टालना चाहता था इसलिये जब उन्होने पत्रकारिता में एक दलित पत्रकार की तलाश या ऎसा ही कुछ कहा था तो मैने उनसे पूछा …दलित मतलब क्या ? उन्होने सोचा ना था कि मैं ऎसा मूर्खतापूर्ण प्रश्न भी कर सकता हूँ. वो थोड़ा सकपका गये लेकिन फिर भी खुद को संयत करके बोले.

    “दलित …मतलब जो सरकार की सूची में दलित है. “

    “यानि सरकार तय करती है कि कौन दलित है या नहीं..”

    “नहीं ..हाँ ..मतलब कुछ जातियाँ है जो दलित जातियां है…”

    “जैसे….”

    “जैसे…माली,कहार,जुलाहा,मोची,सुनार,कचरा साफ करने वाला,गंदगी उठाने वाला…”

    “लेकिन ये सब तो व्यवसाय हैं ना…”

    “लेकिन यह दलित व्यवसाय हैं….जैसे मैं जुलाहा जाति का दलित हूँ…”

    “मतलब आप कपड़ा बुनते हैं…”

    “नहीं मैं तो पत्रकार हूँ…लेकिन…”

    “तो आपके पिताजी होंगे…”

    “नहीं वो तो किसी राज्य में अंडर सैक्रेटरी हैं….”

    “तो फिर आप दलित कैसे हो गये…आप तो दलित नहीं हो सकते..”

    “नहीं मेरे पूर्वज कपड़ा बुनते थे…”

    “तो आपके पूर्वज दलित हुए …आप तो पत्रकार हुए ना…”

    “लेकिन… मेरे पास जाति प्रमाण पत्र भी है…”

    “यानि जाति प्रमाण पत्र निर्धारित करता है कि आप दलित हैं कि नहीं और ये प्रमाण पत्र कौन देता है..

    “ये सरकार देती है…”

    “यनि कोई भी एक प्रमाण पत्र लेकर यह प्रमाणित करदे कि वह मोची है तो वह मोची हो जायेगा…भले ही वह काम कुछ भी करे…”

    “लेकिन यह तो सरकार का नियम है…”

    “हाँ सरकार का नियम तो है ही कि मलाई खाने वाले को मलाई खाने दो…”

    “देखिये आप दलितविरोधी बात कर रहे हैं.”

    “लेकिन……”

    वो अपनी पर उतर आये थे.

    आपको तो बिल्कुल भी समझ नहीं है… मैं पूरे मोहल्ले में प्रचार करुंगा कि आप दलित विरोधी है. अपने चंपुओं की फौज आपके पीछे लगा दुंगा…बचके रहियेगा”

    वो बड़बड़ाते हुए निकल गये…मैं खुश था कि चलो पीछा छूटा…

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