जैसा मैने कहा था कि शनिवार का दिन पाठकों से संवाद और टिप्पणीचर्चा का है.तो मैं उपस्थित हूँ अपनी खिचड़ी पोस्ट लेकर.

सबसे पहले उन सभी सुधी पाठको का धन्यवाद जिन्होनें मुझे तरकश पुरस्कारों के लिये नामांकित किया. हालांकि नामांकन में साथ में अ वर्ग के प्रमुख हस्ताक्षरों अजदक,अभय,अनिल,अनामदास,अविनाश को ना देख यह लगा कि इस पुरस्कार का महत्व वैसे ही कम हो गया है और रही सही कसर फुरसतिया जी ने पूरी कर दी.. ईनाम का फतवा जारी करके. लेकिन मेरे लिये नामांकन भी एक बहुत बड़ी उपलब्धि है. यह सही है कि हिन्द युग्म की एक तरफा लहर में मेरी भी जमानत जब्त हो गयी लेकिन फिर भी कुछ पाठक ऎसे हैं जिन्होने मुझे वोट किया. यदि मैं स्वयं का मत हटा दूँ तो 54 लोगों ने मुझे मत दिया.आपके मतों के लिये मैं तहेदिल से आप सभी का आभारी हूँ.

पिछ्ले दो हफ्तों से नियमित लिख पा रहा हूँ. इतनी ठंड में भी सुबह पांच बजे उठकर लिखना तकलीफदेह तो है ही लेकिन इस बात का संतोष है कि हर दिन पोस्ट कर पा रहा हूँ. मेरी मधुशाला वाली श्रंखला अगले सप्ताह समाप्त हो रही है. खोया पानी की पांच कहानियों में पहली कहानी भी इस रविवार समाप्त हो जायेगी.अब कुछ नया करने की इच्छा है. देखिये समय मिलता है तो कोई नयी श्रंखला प्रारम्भ करता हूँ.

इस हफ्ते मेरा मिर्ची शोध काफी हिट रहा. उसी पोस्ट पर विनय जी की टिप्पणी आयी.

आपका मिर्ची शोध अदभुत है
तीनो मिर्चियों पर आपके कुछ नोट्स मेरे पास रह गए हैं
इन्हे छिड़क कर परोसें.

यूस्ड इन : पहली किचन में, दूसरी जेहन में, तीसरी टशन में.
बेस्ट विद : पहली समोसे के साथ, दूसरी भरोसे के साथ, तीसरी पान के खोखे के पास.
सिम्बल : सी सी $$$, आई सी $$$, सी टी $$$
प्री-काशन : पहली लाल न हो, दूसरी से बवाल न हो, तीसरी बेताल न हो.
फिसिकल प्रापर्टी : गर्म साँसे, बेशर्म आँखें, नर्म बातें
रिसल्ट्स इन : (पहली से स्वाद, दूसरी से दिमाग, तीसरी से मिजाज़) गेट्स कम्पलीटली स्प्वाइल्ड.
मिर्ची आइडल : चाट वाला, करिश्मा कपूर, गटर मैन

दिल्ली में विश्व पुस्तक मेला चल रहा है. पिछ्ले हफ्ते भी वहाँ गया था तो अजदक जी बोले एक बुद्धिमान गधा पुस्तक मेले में टहल रहा है.जब उन्हें पता चला कि हमें पता चल चुका है और हम खुश हो रहे हैं कि चलो इसी बहाने लोगों को यह तो पता चलेगा कि गधे भी किताब पढ़ते हैं तो उन्होने “गधा” हटाकर “पदा” कर दिया. पुस्तक मेले में मेरा आज या कल भी जाने का विचार है. क्या आप सुझा सकते हैं ..उन किताबों का नाम जो मुझे खरीदनी चाहिये…

 

जो लोग इस श्रंखला को पढ़ रहे होंगे वो किबला के बारे में जानते हैं कि वह कैसे हैं. उन्होने किबला के अपनी पत्नी के प्रति वफादारी निभाने वाले मानवीय रूप को भी देखा है. आज किबला टूट रहे हैं. यह बहुत ही मार्मिक है और इसमें जीवन का पूरा दर्शन भी है. ऎसी कई अवस्थाऎं कईयों की जीवन में अक्सर आती है. आदमी जब टूटता है तो कैसे बदलता है? कैसे उसका अभिमान नष्ट होता है. आइये पढें….

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कौन कैसे टूटता है

दस पंद्रह मिनट बाद वो दुकान में ताला डाल कर घर चले आये और बीबी से कह दिया, अब हम दुकान नहीं जायेंगे। कुछ देर बाद मोहल्ले की मस्जिद से इशा (रात की नमाज़) की आवाज़ बुलन्द हुई और वो दूसरे ही “अल्ला हो अकबर” पर हाथ-पांव धो कर कोई चालीस साल बाद नमाज़ के लिये खड़े हुए तो, बीबी धक से रह गयीं कि खैर तो है। वो खुद भी धक से रह गये। इसलिये कि उन्हें दो सूरतों के अलावा कुछ याद नहीं रहा था। वितरे भी अधूरे छोड़ कर सलाम फेर लिया कि यह तक याद नहीं आ रहा था कि दुआये-क़ुनूत (नमाज़ में पढ़ी जाने वाली दुआ) के शुरू के शब्द क्या हैं।

वो सोच भी नहीं सकते थे कि आदमी अंदर से टूट भी सकता है और यूं टूटता है। और जब टूटता है तो अपनों, बेगानों से, हद यह कि अपने सबसे बड़े दुश्मन से भी सुल्ह कर लेता है यानी अपने-आप से। इसी मंज़िल पर अंत:दृष्टि खुलती है, बुद्धि और चेतना के दरवाज़े खुलते हैं।

ऐसे भी लोग हैं जो ज़िंदगी की सख्त़ियों, परेशानियों से बचने की खातिर खुद को अकर्मण्यता के घेरे में कैद रखते हैं। ये भारी और क़ीमती पर्दों की तरह लटके-लटके ही लीर-लीर हो जाते हैं। कुछ गुम-सुम गम्भीर लोग उस दीवार की तरह तड़ख़ते हैं जिसकी महीन-सी दरार, जो उम्दा पेंट या किसी सजावटी तस्वीर से आसानी से छुप जाती है, इस बात की चुगल़ी खाती है कि नींव अंदर ही अंदर सदमे से ज़मीन में ध्ंस रही है। कुछ लोग चीनी के बर्तन की तरह टूटते हैं कि मसाले से आसानी से जुड़ तो जाते हैं, मगर बाल और जोड़ पहले नज़र आता है, बर्तन बाद में। कुछ ढीठ और चिपकू लोग ऐसे अटूट पदार्थ के बने होते हैं कि च्विगंम की तरह कितना ही चबाओ टूटने का नाम नहीं लेते। ”खींचने से खिंचते हैं छोड़े से जाते हैं सुकड़” आप उन्हें हिक़ारत से थूक दें तो जूते से इस बुरी तरह चिपकते हैं कि छुटाये नहीं छूटते। रह-रह कर ख्याल आता है कि इससे तो दांतों तले ही भले थे कि पपोल तो लेते थे। ये च्विंगम लोग खुद आदमी नहीं पर आदमी की पहचान रखने वाले लोग हैं। यह कामयाब लोग हैं। इन्होंने इंसान को देखा, परखा और बरता है और उसे खोटा पाया तो खुद भी खोटे हो गये, और कुछ ऐसे भी हैं कि कार के विंड स्क्रीन की तरह होते हैं। साबुत और ठीक हैं तो ऐसे पारदर्शी कि दुनिया का नज़ारा कर लो और एकाएक टूटे तो ऐसे टूटे कि न बाल पड़ा न दरके, न तड़खे ऐसे रेज़ा रेज़ा हुए कि न वो पहचान रही, न दुनिया की जलवागरी रही, न आईने का पता कि कहां था, किधर गया।

और एक अभिमान है कि यूं टूटता है जैसे राजाओं का प्रताप। हज़रत सुलेमान छड़ी की टेक लगाये खड़े थे कि मृत्यु आ गयी लेकिन उनका बेजान शरीर एक मुद्दत तक उसी तरह खड़ा रहा और किसी को शक तक न गुज़रा कि वो इंतक़ाल फ़र्मा चुके हैं। वो उसी तरह बेरूह खड़े रहे और उनके रोब व दबदबे से कारोबारे-सल्तनत नियम के अनुसार चलता रहा। उधर छड़ी को धीरे-धीरे घुन अंदर से खाता रहा। यहां तक कि एक दिन वो चटाख से टूट गई और हज़रत सुलेमान की नश्वर देह ज़मीन पर आ गई। उस समय उनकी प्रजा पर खुला कि वो दुनिया से पर्दा फ़र्मा चुके हैं।

सो वो दीमक लगी गुरूर-गुस्से की छड़ी, जिसके बल क़िबला ने ज़िंदगी गुज़ारी थी, आज शाम टूट गयी और जीने का वो जोश और हंगामा भी खत़्म हो गया।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जायेगी]

[ रविवार को किबला की कहानी का अंतिम भाग प्रस्तुत किया जायेगा ]

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पिछले अंक : 1. खोया पानी-1:क़िबला का परिचय 2. ख़ोया पानी 2: चारपाई का चकल्लस 3. खोया पानी-3:कनमैलिये की पिटाई 4. कांसे की लुटिया,बाली उमरिया और चुग्गी दाढ़ी़ 5. हवेली की पीड़ा कराची में 6. हवेली की हवाबाजी 7. वो तिरा कोठे पे नंगे पांव आना याद है 8. इम्पोर्टेड बुज़ुर्ग और यूनानी नाक 9. कटखने बिलाव के गले में घंटी 10. हूँ तो सज़ा का पात्र, पर इल्ज़ाम ग़लत है 11. अंतिम समय और जूं का ब्लड टैस्ट 12. टार्जन की वापसी 13. माशूक के होंठ 14. मीर तकी मीर कराची में 15. दौड़ता हुआ पेड़ 16. क़िबला का रेडियो ऊंचा सुनता था 17. बीबी! मिट्टी सदा सुहागन है. 18. खरबूजा खुद को गोल कर ले तब भी तरबूज नहीं बन सकता

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

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हरिवंशराय बच्चन और मधुशाला को जानने वाले बहुत कम लोग जानते होंगे कि उन्होने मधुशाला पर दो पुस्तकें लिखी. पहली पुस्तक जो 1933 में लिखी वह थी “खैयाम की मधुशाला” . इस पुस्तक में जॉन फिट्ज़राल्ड की पुस्तक के प्रत्येक पद का अनुवाद था. दूसरी पुस्तक जो लिखी गयी वो थी “मधुशाला”. अधिकांश लोग इस पुस्तक के बारे में ही जानते हैं. सामान्यत: जब हम बच्चन की मधुशाला की चर्चा करते हैं या उनका कोई पद उदघृत करते हैं तो इसी किताब से करते हैं.मन्नाडे की आवाज में जो कैसेट भी निकला वह भी दूसरी किताब मधुशाला पर था.

khaiyyam-madhushalaआइये पहले “खैयाम की मधुशाला “की चर्चा करें. यह किताब 1933 में आयी और इसमें जॉन के प्रत्येक पद का हिन्दी अनुवाद था .

एक उदाहरण देखिये

The Moving Finger writes; and, having writ,
Moves on: nor all your Piety nor Wit
Shall lure it back to cancel half a Line,
Nor all your Tears wash out a Word of it

किसी की लौह लेखनी भाल शिला पर लिख जाती कुछ लेख
न फिर फिरती पीछे की ओर, लिखा क्या , इतना तो ले देख
न  कम  कर  देगी  आधी पंक्ति देख सब तेरी भक्ति , विवेक ,
न  तेरे  आंसू  की  ही  धार  सकेगी  धो   लघु  अक्षर    एक ! 

इस प्रकार जॉन के 75 पदों का अनुवाद बच्चन ने 1933 में किया. khaiyyam-madhushala1इस पुस्तक के तीसरे संस्करण में हिन्दी के प्रत्येक पद के साथ मूल पुस्तक का अंग्रेजी पद भी दिया गया. यह पहले व दूसरे संस्करण में नहीं था. तीसरे संस्करण ने बच्चन ने एक भूमिका भी लिखी जिसमें उन्होंने मधुशाला के रचे जाने के बारे में उनकी सोच का परिचय देते हुए उमर खैय्याम और जॉन फिट्जराल्ड की रचना प्रक्रिया और उस समय की परिस्थितियों पर विशद टिप्पणी की थी.

दूसरी पुस्तक 1934 में आयी जो इन्ही भावों पर अधारित एक स्वतंत्र पुस्तक थी. इसमें 135 रुबाइयाँ हैं. इसका सस्वर पाठ भी बच्चन कई कार्यक्रमों और कवि-सम्मेलनों में करते रहे. मधुशाला की रूबाइयो का प्रथम पाठ बच्चन ने सन् 1934-35 में बनारस में किया था. अपने प्रथम पाठ से अब तक मधुशाला स्वर्ण जयंती से गुजर के हीरक जयंती मना चुकी है. 1984 में इसकी स्वर्ण जयंती के अवसर पर उन्होंने एक नई रुबाई भी लिखी थी

घिस-घिस जाता कालचक्र में हर मिट्टी के तनवाला
पर अपवाद बनी बैठी है मेरी यह साक़ी बाला
जितनी मेरी उम्र वृद्ध मैं, उससे ज़्यादा लगता हूँ
अर्धशती की होकर के भी षोडष वर्षी मधुशाला

कवि सम्मेलनों में मधुशाला के साथ साथ इस पर बनी पैरोडियाँ भी खूब चलीं. प्रोफेसर मनोरजंन प्रसाद सिन्हा, जो कि उस कवि सम्मेलन में सभापति थे जिसमें बच्चन से मधुशाला का पाठ किया था,  ने अपने एक संस्मरण में खुद उन्ही के द्वारा बनायी गयी कुछ पैरोडियों की चर्चा की ही.वह पैरोडियां कुछ ऎसी हैं. 

भूल गया तस्बीह नमाजी, पंडित भूल गया माला,
चला दौर जब पैमानों का, मग्न हुआ पीनेवाला।
आज नशीली-सी कविता ने सबको ही बदहोश किया,
कवि बनकर महफ़िल में आई चलती-फिरती मधुशाला।

रूपसि, तूने सबके ऊपर कुछ अजीब जादू डाला
नहीं खुमारी मिटती कहते दो बस प्याले पर प्याला,
कहाँ पड़े हैं, किधर जा रहे है इसकी परवाह नहीं,
यही मनाते हैं, इनकी आबाद रहे यह मधुशाला।

भर-भर कर देता जा, साक़ी मैं कर दूँगा दीवाला,
अजब शराबी से तेरा भी आज पड़ा आकर पाला,
लाख पिएँ, दो लाख पिएँ, पर कभी नहीं थकनेवाला,
अगर पिलाने का दम है तो जारी रख यह मधुशाला।

इसी संस्मरण में वह कहते हैं.

उस शाम बच्चन को सुनकर नवयुवक पागल हो रहे थे। पागल मैं भी हो रहा था किन्तु वह पागलपन उसी प्रकार का न रहा। यह गिलहरी कुछ दूसरा ही रंग लाई; और वह रंग प्रकट हुआ दूसरे दिन के कवि-सम्मेलन में जो केवल ‘मधुशाला’ का सम्मेलन था-बच्चन का और मेरा सम्मेलन था-‘मधुशाला’ का सर्वप्रथम कवि सम्मेलन-केवल ‘मधुशाला’ का। बच्चन  ने अपनी अनेकानेक रुबाइयाँ सुनाई थीं और मैंने केवल आठ। बच्चन आदि और अन्त में थे और मैं था मध्य में, इण्टरवल में, जब सुनाते-सुनाते वे थक-से गए थे और शीशे के गिलास में सादे पानी से गले की खुश्की मिटा रहे थे।

‘मधुशाला’ की चुनी हुई बीस रूबाइयों का रेकार्ड दि ग्रामोफ़ोन कम्पनी आफ इंडिया लिमिटेड द्वारा तैयार किया गया.इसका संगीत जयदेव ने दिया.पहली रुबाई बच्चन के स्वर में है, शेष रुबाइयाँ मन्ना डे के स्वर में हैं.

[यह श्रंखला कुछ खास चल नहीं रही. ऎसा टिप्पणीयाँ और आंकड़े बताते हैं. इसलिये अगले अंक में इसे समाप्त कर रहा हूँ]

क्रमश :….

[इस श्रंखला का अंतिम भाग  अगले गुरुवार को प्रकाशित किया जायेगा]

इस श्रंखला के पिछ्ले लेख.

1. खैयाम की मधुशाला.. 2. उमर खैयाम की रुबाइयों के अनुवाद.. 3. मधुशाला में विराम..टिप्पणी चर्चा के लिये 4. उमर की रुबाइयों के अनुवाद भारतीय भाषाओं में  5. मैथिलीशरण गुप्त का अनुवाद 6. खैयाम की रुबाइयाँ रघुवंश गुप्त की क़लम से 7. मधुज्वाल:मैं मधुवारिधि का मुग्ध मीन 8.कभी सुराही टूट,सुरा ही रह जायेगी,कर विश्वास !! 9. उमर की मधुशाला के निहितार्थ

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: उमर खैय्याम, मधुशाला, रुबाई, बच्चन, हरिवंश, फिट्जराल्ड, मदिरा, रधुवंश गुप्त, सुमित्रानंदन पंत

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दिल्ली की बढ़ती ठंड को देख मुझे इच्छा हुई कि मैं कका से पूछूं कि पहाड़ में जब कड़ाके की ठंड पड़ती थी या बरफ पड़ती थी तो कैसा माहौल होता था और कैसे लोग उस ठंड का सामना करते थे.

क्या बताऊँ भुला… पहाड़ में ठंड तो यहाँ की ठंड से भौते ज्यादा हुई लेकिन वहाँ इस तरह के इनजाम हुए कि इतनी ठंड लगने वाली ही नहीं ठहरी. हां हम जैसे बुड़-बाड़ियों (वृद्ध) के लिये थोड़ी परेशानी होने वाली हुई लेकिन बुड़-बाड़ियों के लिये घर में मेथी के लाड़ू (लड्डू) बन जाने वाले हुए जो ठंड में बहुत काम आने वाले हुए और बुड़बाड़ी एक सगड़ (छोटी अंगीठी) में आग तापते हुए क्वीड़ करने वाले हुए.पीतल के गिलास में गुड़ की टपुक के साथ सुड़ुक सुड़ुक चहा पीने वाले ठहरे. जाड़ों में पुरानी लोहे वाली बाल्टियों को काटकर लोग अंगीठी बना लेने वाले हुए और उसी में कोयले जला लेने वाले हुए.ऑफिसों में भी वही अंगीठी जलने वाली हुई. जाड़ों का खाना भी गरम तासीर वाला हुआ.अधिकतर सब्जियों में भांगा पड़ने वाला हुआ.गडेरी की भांगा डाली हुई सब्जी या लाई की भांगा डाली हुई सब्जी बहुत खायी जाने वाली हुई. घर भी ऎसे हुए कि उनमें उतनी ठंड थोड़े लगने वाली हुई.पटाल की तिरछी छ्त,बड़ी सी खोली, खोली का मोटे लकड़ी वाला दरवाजा,चाख, मिट्टी के फर्श,कम ऊंचाई वाले गोठ.अब ऎसे में ठंड कहां लगने वाली हुई.गोरु-बल्दों के लिये पिरूल बिछा देने वाले हुए गोठ में.

पहनने के लिये बास्कट हुआ और दो टांग का पजामा (इनर) हुआ..टोपी हुई..दस्ताने, ऊनी मौजे , मफलर हुआ.एक मेरा दगड़िया ठहरा पदम सिंह.उसके लिये तो जाड़े और भी अच्छे हुए.उसने तो एक चिलम जलाई. कभी कभी उसमें अत्तर (चरस) भी डाल देने वाला हुआ -अत्तर तो तब घर घर में रहने वाली हुई,आज का जैसा जो क्या ठहरा.लेकिन लोग उसे दवा की तरह इस्तेमाल करने वाले हुए.अत्तर तो कभी कटे-फटे में खून को रोकने के काम आने वाले हुई. हां तो पदमुवा बम बम भोले कहते हुए चिलम पीने वाला हुआ. मेरे से कहने वाला हुआ “दाज्यू एक सूट्टा मारो हो सब ठंड गोल हो जायेगी”. अब पता नहीं उससे ठंड गोल होने वाली हुई या नहीं लेकिन पदम सिंह का कहना हुआ भोलनाथ ज्यू की बूटी है सारी ठंड भगा देती है.

जब भी ह्यूं (बरफ) पड़ने का माहौल होता था उससे पहले कुछ दिनों द्यो (बारिश) होने वाला हुआ. ह्यूं से पहले बजरी जैसी गिरने वाली हुई जिसे बड़े लोग “बरम्याऊ” कहने वाले हुए तब जा के ह्यूं पड़ने वाला हुआ.उस समय माहौल एक दम शांत हो जाने वाला हुआ.आकाश से रुई के गोले जैसे गिरने वाले हुए. धिनाई (ब्याई हुई गाय) तो तब सभी घरों में होने वाली हुई. हम लोग एक कान्से की थाली में थोड़ा मलाई वाला दूध लेकर बाहर रख देने वाले हुए वह जब जम जाने वाला हुआ तो उसे ही खाने वाले हुए. कैसा तो दिखने वाला हुआ पूरा शहर तब.सब कुछ सफेद सफेद हो जाने वाला हुआ.पेड़,पहाड़,जमीन,छ्त सब एक दम सफेद. जैसे सब जगह सफेद चादर बिछी हो. बरफ के रुक जाने पर नानातिना (बच्चे) बरफ के गोले बनाने वाले हुए…एक दूसरे पर फैकने वाले हुए. कोई कोई कलाकार लोग बरफ की मूर्तियां भी बना लेने वाले हुए.ये मुर्तियां पन्द्रह पन्द्रह दिन तक नहीं गलने वाली हुई.

बरफ पड़ने के बाद धूप निकलने वाली हुई.तब ठंडा बढ़ जाने वाला हुआ. लेकिन नौले का पानी उस समय भी गरम लगने वाला हुआ.तब कोई आज की तरह बाथरूम जो क्या हुए.बाहर पटागंण में ही नहाने वाले हुए.हम जनेऊ पहनने वालों को तो नहाना जरूर पड़ने वाला हुआ.बिना नहाये हुए तो खाना ही नहीं खाना ठहरा तो चाहे ह्यूं पड़े चाहे द्यो रोज नहाना हुआ.देवी कवच का पाठ करते करते नहा ही लेने वाले हुए.

तुम लोग तो इस दिल्ली की ठंड से परेशान हो जाते हो.हमने देखी ठहरी यार वो पहाड़ वाली ठंड. तुम तो बस टीवी में ही ह्यूं देखकर कांपने लगते हो. जिसने पहाड़ में रहकर पहाड़ का ह्यूं नहीं देखा क्या देखा. जब हम लोग जवान थे तो एक कमीज पहनके निकल जाने वाले हुए फावड़ा ले के ह्यूं साफ करने.. तब गरम खून हुआ आजकल के छोकरों की तरह थोड़े…

मुझे लगा कि कका अभी अपनी फसक-फराल (गप) शुरु करेंगे तो मुझ समेत मेरी पूरी जनरेशन की ऎसी तैसी करने लगेंगें..इसलिये मैं उन्हे प्रणाम कर वहां से धीरे से कट लिया..कका हीटर में हाथ सेंकते सेंकते पुरानी यादों में खो गये……

अब देखिये इस साल के हिमपात का वीडियो सुभाष कांडपाल जी के सौजन्य से.

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आप कहीं यह अनुमान ना लगा लें कि मैं किसी कविता नामक सुकन्या के प्रेमपाश में बंधकर कवि बनना चाहता हूँ इसलिये मैं यह घोषणा करना चाहता हूँ कि मुझ बाल बच्चेदार को किसी से प्यार व्यार नहीं है (अपनी पत्नी से भी नहीं :-) ) बल्कि मैं तो लिखी जाने वाली कविता से प्रेम की पींगे बढ़ाना चाह रहा हूँ और ऎसा मैं इसलिये कर रहा हूँ क्योंकि आज के जमाने में मुझे कविता का महत्व पता चल गया है.

मैं अक्सर कुडकुड़ करता हूँ और दिन में एक बार ही इस कुड़कुड़ को करना मेरे को बड़ा भारी लगता है. मेरे पूरे लेख को पढ़ने के बाद लोगों के समझ में भी नहीं आता कि  आखिर मैं क्या कहना चाह रहा हूँ.इसका एक  फायदा तो यह है ही कि भविष्य में मुझमें नेता बनने के पूरे गुण हैं लेकिन अभी हाल फिलहाल मैं कवि भी बन सकता हूँ. जिस लेख के लिये मैं तीन सौ चार सौ शब्दों का जाल बुनूँ वह बात महज पचास साठ शब्दों में भी कह सकता हूँ. बात वह तब भी समझ में नहीं आयेगी लेकिन मैं तो कवि बन ही जाऊंगा.

कविता भले की किसी भी अर्थ में उपयोगी ना हो पर उस पर वाह वाही मिलने के भरपूर तत्व होने चाहिये. वह भले ही किसी के समझ में ना आये लेकिन आप का लहजा और व्यक्तित्व का प्रभाव ऎसा हो कि सामने वाला चाहे वह आपकी कविता पढ़ रहा हो या सुन रहा हो वो वाह वाह कहने को विवश हो जाये. कविता एक कला है और कला किसी काम की भी हो यह जरूरी नहीं. कला में कोई तथ्य हों या वह हर किसी के पल्ले पड़ जाये यह भी आवश्यक नहीं है. कविता शब्द सम्मोहन की विधा है जो किसी भी कवि सम्मेलन में पहलवान की धोबी पछाड़ सी चलती है और सामने बैठे लोगों को चारों खाने चित्त कर देती है. वाह वाह…क्या बात है .. मजा आ गया .. जैसे प्रोत्साहनी वाक्य हवा में तैरने लगें तो समझिये कविता ने मैदान मार लिया.

उर्दू वालों ने कविता की बहुत सेवा की है. ग़ालिब से लेकर मीर ने ऎसे ऎसे शेर लिखे कि वो आज भी किसी महफिल की जान बने रहते हैं. हर मौके और हर अवसर के लिये एक शेर हाजिर हो जायेगा. लेकिन कौन ऎसा माई का लाल होगा जिसने पूरा उर्दू साहित्य पढ़ा होगा इसलिये आप उर्दू शायरी से कुछ भी लेके (वैसे हिन्दी से भी ले सकते हैं लेकिन थोड़ा रिस्क है) उसमें अपने शब्दों का थोड़ा छोंक लगाकर झोंक दीजिये फिर देखिये….शत प्रतिशत सफलता आपके चरण चूमेगी यदि आप जारी रहे तो यही सफलता चरणों से होंठों तक भी जा सकती है फिर भले ही बांकियों के सर में दर्द हो पर आपके होंठों पर मुस्कान रहेगी.  

कविता सामुहिक चेतना की संस्थापक है. आप अपने जैसे बेकार कवियों को ढूंढने निकलिये… एक को ढूंढेंगे हजार मिलेंगे और फिर आप सामुहिक रूप से कविता कीजिये.वाह वाही बिना ब्याज का कर्ज है. यानि आप कविता करें तो अगला वाह वाह कर आपको कर्ज दे और उसकी कविता में आप वाह वाह कर उस कर्ज को उतार दें. समूह में कविता से कई फायदे हैं आप एक पूरे समूह को मूर्ख बना सकते हैं और बार बार बना सकते हैं. सब घुलमिल कर कविता करें… वाह वाही लूटें.

सामुहिक कविताओं के श्रोता और पाठक बड़े पारखी हैं. भले ही आपकी कविता उनके समझ ना आये. भले ही आप सदियों से कही जा रही बात को बिना किसी आधार के फिर फिर कहें. भले ही आपको ना शब्दों की समझ हो ना उनके अर्थों की. लेकिन यदि आप एक नेता की तरह भीड़ को मूर्ख बनाना जानते हैं तो वह वाह वाह करेंगे ही. आप सफल कवि हैं. आपकी जय जयकार होगी.आप खुश रहिये. आपके स्थायी चमचे आपके साथ हैं. अभी आपको पार्टी बदलने की जरूरत नहीं.

मैं सोच रहा हूँ कि मैं भी कवि बन ही जाऊं और पकड़ूं अपने जैसे कुछ और मूर्खों को….. आप क्या कहते हैं ???..आप साथ आना चाहेंगे… :-)

 

किसी को मिर्ची लगे तो कैसा लगता होगा मतलब खुशी होती होगी या गुस्सा आता होगा,दुख होता होगा या खीझ होती होगी, यह जीवन मिथ्या लगने लगता होगा या बदले में दूसरों को गाली देने का मन करता होगा, खुद को सयाना मान लेने लगते होंगे या दूसरों को नादान समझने लगते होंगे,खुद को बुद्धीजीवी और दूसरों को बुद्धू मानने लगते होंगे या अपने बचे खुचे सर के बाल नोचने लगते होंगे.अब यह तो वही बता सकता है जिसको मिर्ची लगी हो लेकिन खाकसार ने मिर्ची पर एक शोध किया है जो शीघ्र ही अफ्रीकन देश बुर्गुंडी की प्रतिष्ठित पत्रिका “खामोश लब” में छ्पने वाला है. प्रस्तुत हैं उसी के कुछ संपादित अंश. 

मिर्ची मुख्यत: तीन प्रकार की होती है. एक वह मिर्ची जो आप खाओ तो आपको ही लगती है दूसरी वह जो आपके खाने से नहीं वरन कुछ करने या ना करने से दूसरों को लगती है तीसरी मिर्ची वह होती है जो खायी नहीं जाती वरन सुनी जाती है.आइये इन्ही तीनों प्रकार जी मिर्ची पर एक विस्तृत नजर डालें.

पहली मिर्ची वह होती है जो आमतौर पर हरे या लाल रंग की होती है यह आकार में लंबी होती है.इस प्रकार की मिर्ची खाने के काम आती है लेकिन अधिकांशत: खाते ही यह अपना रंग दिखाना चालू कर देती है.इसके लगने के लक्षणों में मुंह का लाल होना, आंखों या नाक से पानी आना प्रमुख हैं. इस प्रकार की मिर्ची खाते समय तो केवल मुँह में ही लगती है लेकिन खाने के बाद और भी कई जगहों पर लगती है.कई बार इसका असर चौबीस से अड़तालीस घंटो तक रहता है.ज्यादा मिर्ची लगने पर लोग पानी का प्रयोग करते हैं कई बार कुछ लोग बरफ का प्रयोग भी करते पाये जाते हैं.आप अपनी इच्छानुसार मिर्ची का प्रयोग कम या ज्यादा कर सकते हैं.यह मिर्ची आमतौर पर सबको समान रूप से लगती है हालांकि स्त्रियाँ इस प्रकार की मिर्ची का प्रयोग ज्यादा करती है पर उन पर इसका असर कम होता देखा गया है. 

दूसरी प्रकार की मिर्ची सबसे खतरनाक टाइप की होती है.इस मिर्ची का असर सब पर समान रूप से नहीं होता. यह शरीर के किस हिस्से में लगती है इस पर अभी शोध जारी है. इसका असर अलग अलग परिस्थितियों में अलग अलग समय तक रहता है.जैसे कांग्रेस कुछ करती है तो लैफ़्ट को मिर्ची लग जाती है और यह तब तक लगती रहती है जब तक की उनकी धमकियों से कांग्रेस वाले लोग उसी तरह से मिमियाने ना लगें जैसे कुत्तों के भौंकने पर बिलौटे मिमियाने लगते हैं. हमारे देश के एक महान कलाकार गोविंदा जी के जीवन वृतांत का अध्ययन करें तो आप पायेंगे कि अपने जमाने में जब वह रस्ते से जा रहे थे,भेल पूरी खा रहे थे और साथ में लड़की भी घुमा रहे थे तो करिश्मा जी को मिर्ची लगी थी. खाकसार का मानना है कि यह मिर्ची इसलिये लगी होगी क्योंकि गोविंदा जी खुद तो भेल पूरी खा रहे थे लेकिन लड़की को सिर्फ घुमा रहे थे तो यह बात तो किसी भी भिन्नाटी टाइप नारीवादी महिला  को बुरी लगेगी ही ना.एक स्त्री के शोषण का सवाल है यह कोई मजाक या मौज का विषय नहीं.इस मिर्ची के लगने के लक्षण भी अलग अलग व्यक्तियों पर अलग अलग पड़ते हैं.इस मिर्ची का प्रभाव भी परिस्थितियों के अनुसार अलग अलग समय तक रहता है. यह मिर्ची आमतौर पर सबको समान रूप से नहीं लगती है जैसे स्त्रियों को यह मिर्ची थोड़ी जल्दी लग जाती है. अपने लैफ़्ट वाले भी आये दिन इस मिर्ची का शिकार बनते रहते हैं.

तीसरी प्रकार की मिर्ची सुनने के काम आती है और शास्त्रों के अनुसार इस प्रकार की मिर्ची सुनने वाले आल्वेज खुश रहते हैं यहाँ तक की ये लोग गटर में गिरे होने के बाबजूद सुहाने मौसम के गाने गा सकते हैं. इससे यह सिद्ध होता है कि तीनों प्रकार की मिर्चियों में इस मिर्ची को ज्यादा प्राथमिकता देनी चाहिये लेकिन आंकड़ों के मुताबिक व्यवहार में दूसरे टाइप की मिर्ची ज्यादा प्रयुक्त होती है.

आप भी इस बारे में अपनी राय से अवगत करायें ताकि आपकी राय भी शोध पत्र में शामिल की जा सके.

 

किबला वाली कहानी का अंत अब निकट है. इसमें व्यंग्य के साथ साथ करुणा भी है और जीवन की सच्चाई भी. अब आप आगे पढ़िये.

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हम जिधर जायें दहकते जायें

कराची में दुकान तो फिर भी थोड़ी बहुत चली, मगर क़िबला बिल्कुल नहीं चले। ज़माने की गर्दिश पर किसका ज़ोर चला है जो उनका चलता। हादसों को रोका नहीं जा सकता, हां, सोच से हादसों का ज़ोर तोड़ा जा सकता है। व्यक्तित्व में पेच पड़ जायें तो दूसरों के अतिरिक्त खुद अपने-आप को भी तकलीफ़ देते हैं, लेकिन जब वो निकलने लगें तो और अधिक कष्ट होता है। कराची आने के बाद अक्सर कहते कि डेढ़ साल जेल में रह कर जो बदलाव मुझमें न आया, वो यहां एक हफ्ते में आ गया। यहां तो बिज़नेस करना ऐसा है जैसे सिंघाड़े के तालाब में तैरना। कानपुर ही के छुटे हुए छाकटे यहां शेर बने दनदनाते फिरते हैं और अच्छे-अच्छे शरीफ़ हैं कि गीदड़ की तरह दुम कटवा के भट में जा बैठे। ऐसा बिजागे पडा कि ”ख़ुद-ब- ख़ुद बिल में है हर शख्श समाया जाता” जो बुद्धिमान हैं वो अपनी दुमें छुपाये बिलों में घुसे बैठे हैं , बाहर निकलने की हिम्मत नहीं पड़ती। इस पर मिर्ज़ा ने हमारे कान में कहा:

‘अनीस ‘दुम“ का भरोसा नहीं, ठहर जाओ’

एक दोस्त ने अपनी इज़्जत-आबरू जोखिम में डालकर क़िबला से कहा कि गुज़रा हुआ ज़माना लौट कर नहीं आ सकता। हालात बदल गये हैं, आप भी खुद को बदलिये, मुस्कुरा के बोले खरबूजा खुद को गोल कर ले तब भी तरबूज नहीं बन सकता। बात यह थी कि ज़माने का रुख पहचानने की शक्ति, क्षमता, नर्मी और लचक न उनके स्वभाव में थी और न ज़मींदाराना माहौल और समाज में इनकी गिनती गुणों में होती थी। सख्त़ी, अभिमान, गुरूर और गुस्सा अवगुण नहीं बल्कि सामंती चरित्र की मजबूती की दलील समझे जाते थे और जमींदार तो एक तरफ़ रहे, उस जमाने के धर्मिक स्कॉलर तक इन गुणों पर गर्व करते थे।

क़िबला के हालात तेजी से बिगड़ने लगे तो उनके हमदर्द मियां इनआम इलाही ने, जो छोटे होने के बावजूद उनके स्वभाव और मामलात में दख्ल़ रखते थे, कहा कि दुकान खत्म करके एक बस खरीद लीजिये। घर बैठे आमदनी होगी। रूट परमिट मेरा ज़िम्मा। आजकल इस धन्धे में बड़ी चांदी है, एकदम जलाल (तेज गुस्सा) आ गया। फ़र्माया चांदी तो तबला सारंगी बजाने में भी है। एक रख-रखाव की रीत बुजुर्गों से चली आ रही है, जिसका तकाजा है कि बरबाद होना ही मुक़द्दर में लिखा है तो अपने पुराने और आज़माये हुए तरीके से होंगे, बंदा ऐसी चांदी पर लात मारता है।

आख़िरी गाली

कारोबार मन्दा बल्कि बिल्कुल ठंडा, तबीयत में उदासी। दुकानदारी अब उनकी आर्थिक नहीं, मानसिक आवश्यकता थी। समझ में नहीं आता था कि दुकान बंद कर दी तो घर में पड़े क्या करेंगे, फिर एक दिन यह हुआ कि उनका नया पठान मुलाज़िम ज़र्रीन गुल खान कई घंटे देर से आया। वो हर प्रकार से गुस्से को पीने की कोशिश करते थे लेकिन पुरानी आदत कहीं जाती है। चन्द माह पहले उन्होंने एक साठ साला मुंशी आधी तनख्व़ाह पर रखा था, जो गेरुवे रंग का ढीला-ढाला लबादा पहने, नंगे पैर ज़मीन पर आल्थी-पाल्थी मारे हिसाब किताब करता था। कुर्सी या किसी भी ऊंची चीज पर बैठना उसके सम्प्रदाय में मना था।

वारसी सिलसिले के किसी बुजुर्ग से दीक्षा ली थी। मेहनती, ईमानदार, रोजे नमाज का पाबन्द, तुनकमिजाज और काम में चौपट था। क़िबला ने तैश में आकर एक दिन उसे हरामखोर कह दिया। सफ़ेद दाढ़ी का लिहाज़ भी न किया। उसने आराम से कहा ”दुरुस्त! हज़ूर के यहां जो चीज़ मिलती है वही तो फ़कीर खायेगा।सलाम अलैकुम” और ये जा वो जा। दूसरे दिन से मुंशी जी ने नौकरी पर आना और क़िबला ने हरामखोर कहना छोड़ दिया, लेकिन हरामखोर के अलावा और भी तो दिल दुखाने वाले बहुतेरे शब्द हैं। ज़र्रीन गुल खान को सख्त़ सुस्त कहते-कहते उनके मुंह से रवानी और गुस्से में वही गाली निकल गयी जो अच्छे दिनों में उनका तकिया कलाम हुआ करती थी। गाली की भयानक गूंज दर्रा-आदम खो़ल के पहाड़ों तक ठनठनाती पहुंची, जहां ज़र्रीन गुल की विधवा मां रहती थी। वो छ: साल का था जब मां ने वैध्व्य की चादर ओढ़ी थी। बारह साल का हुआ तो उसने वादा किया था कि मां! मैं बड़ा हो जाउंफगा तो नौकरी करके तुझे पहली तनख्व़ाह से बगै़र पैवंद की चादर भेजूंगा। उसे आज तक किसी ने यह गाली नहीं दी थी। जवान खून,गुस्सैल स्वभाव, पठान के स्वाभिमान का सवाल था। ज़र्रीन गुल खान ने उनकी तिरछी टोपी उतार कर फ़ैंक दी और चाक़ू तान कर खड़ा हो गया। कहने लगा ”बुड्ढे! मेरे सामने से हट जा, नहीं तो अभी तेरा पेट फाड़ के कलेजा कच्चा चबा जाऊंगा। तेरा पलीद मुर्दा बल्ली पे लटका दूंगा।“

एक ग्राहक ने बढ़कर चाकू छीना। बुड्ढे ने झुक कर ज़मीन से अपनी मख़मली टोपी उठायी और गर्द झाड़े बगै़र सर पर रख ली।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जायेगी]

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पिछले अंक : 1. खोया पानी-1:क़िबला का परिचय 2. ख़ोया पानी 2: चारपाई का चकल्लस 3. खोया पानी-3:कनमैलिये की पिटाई 4. कांसे की लुटिया,बाली उमरिया और चुग्गी दाढ़ी़ 5. हवेली की पीड़ा कराची में 6. हवेली की हवाबाजी 7. वो तिरा कोठे पे नंगे पांव आना याद है 8. इम्पोर्टेड बुज़ुर्ग और यूनानी नाक 9. कटखने बिलाव के गले में घंटी 10. हूँ तो सज़ा का पात्र, पर इल्ज़ाम ग़लत है 11. अंतिम समय और जूं का ब्लड टैस्ट 12. टार्जन की वापसी 13. माशूक के होंठ 14. मीर तकी मीर कराची में 15. दौड़ता हुआ पेड़ 16. क़िबला का रेडियो ऊंचा सुनता था 17. बीबी! मिट्टी सदा सुहागन है.

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किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

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चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: पुस्तक चर्चा, समीक्षा, काकेश, विमोचन, हिन्दी, किताब, युसूफी, व्यंग्य

 

कल रामचन्द्र मिश्र जी ने ऎडसैन्स से अपनी पहली कमाई को सार्वजनिक किया. इससे पहले रवि जी भी कह चुके हैं उनके ब्रॉडबैन्ड का खर्चा पानी भी ऎडसैन्स से निकल जाता है. यह अच्छे संकेत हैं और यह आशा जगाते हैं कि ऎडसैंस से कुछ कमाई की जा सकती है. मुझे लगता है कुछ और चिट्ठाकार भी होंगे जो कुछ कमाई कर पा रहे होंगे. यदि वह भी इस बात को सार्वजनिक करें तो यह अन्य चिट्ठाकारों के लिये प्रोत्साहन का काम कर सकता है.

अब मैं अपनी बात करता हूँ. मैने पिछ्ले साल हिन्दी ब्लॉगिंग प्राम्भ की थी. पहले मैं वर्डप्रेस पर लिखता था बाद में मैने एक चिट्ठा ब्लॉग्स्पॉट पर भी बनाया. वर्डप्रेस पर आप विज्ञापन नहीं लगा सकते तो मैने भी केवल ब्लॉग्स्पॉट वाले चिट्ठे पर ही विज्ञापन लगाये. चार महीने में तीन डालर भी नहीं बन सके. फिर मैं एक डॉट कॉम हो गया :-) यानि सितंबर में इस चिट्ठे पर अपने डोमेन पर शिफ्ट हो गया. विज्ञापन भी लगाये.लेकिन नतीजा ढाक के वही तीन पात. जनवरी तक यानि पहले पांच महीनों में सिर्फ सत्रह डॉलर. इसलिये मोह भंग सा हो गया. इसी बीच एक “सुभ चिंतक” ने कहा कि आपके पोस्ट में विज्ञापन की वजह से पढ़ने में दिक्कत होती है. तो पोस्ट में जो विज्ञापन थे उनको भी हटा लिया.

मिश्रा जी ने जो चित्र दिखाया था उसके अनुसार उनका पेज सी टी आर  (Page CTR) तीन प्रतिशत से ज्यादा था जो मेरे हिसाब से काफी अच्छा है. क्योंकि मेरा  पेज सी टी आर (Page CTR) केवल 0.9 % है. मेरे गूगल खाते के अनुसार मेरे अबतक पिछ्ले पांच महीनों में चौदह हजार से ज्यादा क्लिक हुए जिसमें से केवल 129 लोगों ने ही विज्ञापनों में क्लिक किया. इसका कारण शायद यह भी रहा कि ना मैने अपने लेखन को और ना अपनी थीम को विज्ञापनों के अनुसार ऑप्टिमाइज  किया.

ब्लॉग प्रारम्भ करने का मेरा ल्क्ष्य था कि मैं हिन्दी में नियमित लिखता रहूँ और यह लक्ष मैने काफी हद तक पा लिया है. ऎडसैंस से कमाई मेरा लक्ष नहीं है (नहीं तो अंग्रेजी में ही लिखता) लेकिन यदि ब्रॉडबैंड का खर्चा निकल सकता है तो क्यों ना ब्रॉडबैंड लगा ही लिया जाय. तो अब मैं कुछ दिनों में ब्रॉडबैंड लगवा रहा हूँ इस आशा में कि शायद अगले साल तक इसका खर्चा निकल ही जाय.

कल संजय तिवारी जी ने कहा कि हम एक दूसरे के विज्ञापनों पर क्लिक कर सकते हैं. मेरे विचार से यह मूर्खता होगी क्योंकि गूगल बाबा की तकनीक बहुत तेज है वो लोग जैन्युइन क्लिक और नॉन जैन्युइन क्लिक को आसानी से पहचान लेते हैं और फिर अकांउंट कैंसल करने में बिल्कुल भी देरी नहीं करते.

रवि जी से निवेदन ही कि वह भी केवल हिन्दी के विज्ञापनों से होने वाली आय का कुछ आइडिया दे सकें तो यह और कई लोगों को प्रोत्साहित करेगा.

 

व्यंग्य हो और उसमें छिपा हुआ ग़म ना हो तो फिर कैसा व्य़ंग्य. अब कौन कहेगा कि क़िबला जो इतने गुस्सैल हैं वो दिल के कितने पाक-साफ हैं. आप भी देखिये क्या है उनकी ज़िन्दगी का ग़म.

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अपाहिज बीबी और गश्ती चिलम

उनकी जिंद़गी का एक पहलू ऐसा था जिसके बारे में किसी ने उन्हें इशारों में भी बात करते नहीं सुना। हम शुरु में बता चुके हैं कि उनकी शादी बड़े चाव-चोंचले से हुई थी। बीबी बहुत खूबसूरत, नेक और सुघड़ थीं। शादी के कुछ साल बाद एक ऐसी बीमारी हुई कि कलाइयों तक दोनों हाथों से अपंग हो गयीं। क़रीबी रिश्तेदार भी मिलने से बचने लगे। रोज़मर्रा की मुलाक़ातें, शादी-गम़ी में जाना, सभी सिलसिले आहिस्ता-आहिस्ता टूट गये। घर का सारा काम आया और नौकर तो नहीं कर सकते। क़िबला ने जिस मुहब्बत और दर्दमंदी से तमाम उम्र उनकी सेवा और देख-रेख की, इसका उदाहरण मुश्किल से मिलेगा। कभी ऐसा नहीं हुआ कि उनकी चोटी बेगुंथी और दुपट्टा बेचुना हो, या जुमे को कासनी रंग का न हो। साल गुज़रते चले गये, समय ने सर पर कासनी दुपट्टे के नीचे रुई के गाले जमा दिये। मगर उनकी सेवा और प्यार में जरा जो फर्क आया हो। विश्वास नहीं होता था कि दोस्ती और मुहब्बत का यह रूप उसी गुस्सैल आदमी का है जो घर के बाहर एक चलती हुई तलवार है। ज़िंदगी भर का साथ हो तो सब्र और स्वभाव की परीक्षा के हज़ार मोड़ आते हैं, मगर उन्होंने उस बीबी से कभी ऊंची आवाज में भी बात नहीं की। कहने वाले कहते हैं कि उनकी झल्लाहट और गुस्से की शुरुआत इसी बीमारी से हुई। वो बीबी तो मुसल्ले (नमाज़ पढ़ने का कपड़ा) पर ऐसी बैठीं कि दुनिया ही में जन्नत मिल गयी। क़िबला को नमाज़ पढ़ते किसी ने नहीं देखा, लेकिन ज़िन्दगी भर जैसी सच्ची मुहब्बत और रातों को उठ-उठ कर जैसी रियाज़त (तपस्या) उन्होंने की, वही उनका दुरूद वज़ीफ़ा (एक तरह की दुआ) और वही उनकी आधी रात की दुआयें थीं। वह बड़ा बख्श़न-हार है, शायद यही उनकी मुक्ति का वसीला बन जाये। एक दौर ऐसा भी आया कि बीबी से उनकी परेशानी देखी न गयी। खुद कहा, किसी रांड बेवा से शादी कर लो। बोले, हां! भगवान! करेंगे। कहीं दो गज़ ज़मीन का एक टुकड़ा है जो न जाने कब से हमारी बरात की राह देख रहा है। वहीं चार कांधें पर डोला उतरेगा। बीबी! मिट्टी सदा सुहागन है

सो जायेंगे इक रोज़ ज़मीं ओढ़ के हम भी

बीबी की आंखों में आंसू देखे तो बात का रुख़ फेर दिया। वो अपनी सारी इमेजिरी लकड़ी, हुक्के और तम्बाकू से लिया करते थे। बोले, बीबी! यह रांड बेवा की कैद तुमने क्या सोच के लगायी? तुमने शायद वो पूरबी कहावत नहीं सुनी: “पहले पीवे भकुवा, फिर पीवे तमकुवा, पीछे पीवे चिलम चाट” यानी जो आदमी पहले हुक्का पीता है वो बुद्धू है कि दरअस्ल वो तो चिलम सुलगाने और ताव पर लाने में ही जुटा रहता है। तम्बाकू का अस्ल मजा तो दूसरे आदमी के हिस्से में आता है और जो अन्त में पीता है वो जले हुए तम्बाकू से खाली भक-भक करता है।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जायेगी]

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पिछले अंक : 1. खोया पानी-1:क़िबला का परिचय 2. ख़ोया पानी 2: चारपाई का चकल्लस 3. खोया पानी-3:कनमैलिये की पिटाई 4. कांसे की लुटिया,बाली उमरिया और चुग्गी दाढ़ी़ 5. हवेली की पीड़ा कराची में 6. हवेली की हवाबाजी 7. वो तिरा कोठे पे नंगे पांव आना याद है 8. इम्पोर्टेड बुज़ुर्ग और यूनानी नाक 9. कटखने बिलाव के गले में घंटी 10. हूँ तो सज़ा का पात्र, पर इल्ज़ाम ग़लत है 11. अंतिम समय और जूं का ब्लड टैस्ट 12. टार्जन की वापसी 13. माशूक के होंठ 14. मीर तकी मीर कराची में 15. दौड़ता हुआ पेड़ 16. क़िबला का रेडियो ऊंचा सुनता था

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किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

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