Mar 312008
 

अभी प्रशांत ऑफिस पहुंचा था और मेल चैक कर रहा था.साथ साथ यह भी प्लानिंग कर रहा था कि आज किस किस से चैट करनी है और फिर अपनी ऑर्कुट की स्क्रैपबुक चैक कर सब को जबाबी स्क्रैप दागना है कि इंटरनल फोन पर घंटी बजी. उधर से कलीग प्रिया थी.

हाइ… प्रसान्त …(उफ यह लड़की कभी प्रशांत नहीं बोल सकती क्या) ..उसने अपनी मधुर आवाज में कहा.

हाई….प्रिया ..हाउ आर यू….?

आइ एम फाइन …तुम्हे बॉस ढूंढ रहा था ..तुम्हें पता है ??

बॉस !! ….बॉस आज इतना जल्दी ऑफिस कैसे ….??

अरे ऑफिस नहीं आया अभी तक.उसने फोन किया था ..और बोला है जैसे ही प्रसांत आये उसे बताऊँ.

लेकिन क्यों यार..

पता नहीं यार ..लेकिन कह रहा था कि अर्जेंट काम है.

अर्जेंट काम !!

हाँ ….तो मैं उसे बता रही हूँ कि तुम आ गये….हो सकता वो फिर तुम्हे फोन करे.

प्रशांत का दिमाग चकरा गया.वह पिछ्ले कई दिन की बातों को याद करने लगा कि बॉस ने क्या क्या करने को कहा था. कोई ऐसी चीज जो शायद छूट गयी हो उससे.पिछ्ले एक महीने से तो बॉस ने कुछ काम के लिये कहा ही नहीं था. इन-फैक्ट पिछ्ले करीब दो महीनों से अब तक उसके पास कोई काम ही नहीं था.यहाँ तक की बॉस भी अक्सर खाली ही बैठा रहता. उसकी सैकेट्री भी बताती है आजकल बॉस अपने बेटे की प्रोजेक्ट रिपोर्ट उससे टाइप करवा रहा है. कोई मीटिंग वगैरह भी आजकल नहीं हो रही फिर क्या हो सकता है. कहीं ऐसा तो नहीं कि उसको निकालने का कोई इरादा हो कंपनी का. या फिर…वह सोच ही रहा थी कि फोन की घंटी बजी.  

हैलो …

हैलो सर…

हाँ प्रशांत …मैं अभी ऑफिस पहुंच रहा हूँ . तुम ऑफिस में ही रहना ….अर्जेंट काम है.

यस सर…और फोन कट गया.

अरे इतनी सी बात के लिये फोन क्यों किया बॉस ने, फिर वो कौन सा ऑफिस से बाहर कहीं जाता है. वो तो ऑफिस में बैठ कर ही या तो चैट करता रहता है या मेल.क्या हो सकता है? वह सोच रहा था कि तभी चैट पर उसके दोस्त ने घंटी बजाई.

हाई…..आर यू देयर ?? उसने दोस्त को कहा कि अभी वह बिजी है थोड़े देर में बात करेगा और फिर सोचने लगा. तभी बॉस का बुलावा आया.वह डरते डरते बॉस के केबिन में घुसा.

देखो प्रशांत आज सुबह सुबह हैड ऑफिस से फोन आया है कि कल मंथली रिव्यू होगा. प्रेजेंटेशन भी करना है.

मंथली रिव्यू..इतने दिनों बाद…और वो भी कल ही.

हाँ …ये लोग भी ना ….लास्ट मूमेंट में फोन करते हैं. अब इतनी जल्दी प्रेजेटेशन कैसे बनेगा और फिर डाटा भी तो कलेक्ट करना होगा ना.प्रशांत तुम आई.टी डिपार्टमेंट में फोन करो और उनसे सारे डेटा मांगो.

लेकिन सर आई. टी. वाले इतनी जल्दी डेटा थोड़े दे देंगे. वो तो मिनिमम..

अरे वो तो मालूम है वो लोग मिनिमम 4-5 दिन तो लगायेंगे. पर वो आई.टी. वाला नितिन तुम्हारा फ्रैंड है उससे बात तो करो.

ठीक है सर.   

प्रशांत को मालूम था कि बात करके कुछ नहीं होना लेकिन फिर भी बॉस ने कहा है तो बात तो करनी ही थी. बात की. वही जबाब मिला. कि तीन चार दिन से पहले डेटा नहीं मिल सकता. और फिर अभी तो आई.टी के लोग खाली भी नहीं हैं सब किसी नये प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं.

प्रशांत ने यह बात बॉस को बतायी तो पहले से ही परेशान टकलू बॉस और ज्यादा परेशान हो गया.फिर बोला.

तुम नोट करो प्रशांत. अभी प्रजेंटेशन की प्लानिंग करते हैं. पहले इन्नोवेशन प्रोजेक्ट्स लिखो. यहाँ पर जो नये इन्नोवेटिव काम किये हैं उनकी डिटेल्स देंगे.

सर.

तुम बता रहे थे ना तुमने एक्सल में कुछ नया बनाया है जिसमें एक कॉलम में फीगर चेंज करने से दूसरे में ओटोमेटिक फिगर चेंज हो जाती है.

सर…. लेकिन एक्सल में यह कोई बड़ी बात है नहीं है सर. एक कॉलम में एक फॉर्मूला लगाया और हो गया.

अरे यह तुम्हे मालूम है ना. हैड ऑफिस वालों को थोड़े मालूम है.

जी… लेकिन सर यह काम तो तीन-चार महीने पहले किया था ना.

अरे अभी तक हैड ऑफिस वालों को नहीं दिखाया ना. इसलिये उन्हें क्या मालूम. इसी वाले रिव्यू में डाल दो.

यस सर..और…

और वो स्टेशनरी रिडक्सन वाला प्रोजेक्ट भी डाल दो.

कौन सा सर ??

अरे पहले हम अपनी मेल का प्रिंट आउट लेके. उसके बेसिस पर अपनी सैकेट्री को रिप्लाई डिक्टेट करवाते थे ना. लेकिन अब हम मेल को डायरैक्ट कंप्यूटर में पढ़कर ही डिक्टेट करवा देते हैं. तो हुई ना स्टेशनरी सेव.

यस सर.

तो ये तो हो गये इन्नोवेटिव प्रोजेक्ट्स ….लेकिन अब बांकी की फिगर कहाँ से लायें. ये आई.टी. वाले भी ना. इस बार में चेयरमैन से इनकी कम्प्लेन करने वाला हूँ.

यस सर.

बॉस सोचने लगा. प्रशांत भी सोचने की एक्टिंग करने लगा. हांलाकि उसके दिमाग में चैट की प्लानिंग चल रही थी. तभी बॉस को एक आइडिया आया.

अच्छा तुम्हारे पास लास्ट मंथली रिव्यू का प्रेजेंटेशन होगा ना.

सर है तो ….लेकिन वो तो छ्ह महीने पहले हुआ था सर.

अरे वो छोड़ो … प्रजेंटेशन है ना.

यस सर.

तो बस उसी की फीगर में कुछ ऊपर नीचे करके नया प्रजेंटेशन बना दो.

लेकिन सर.

अरे छ्ह महीने पहले की फीगर थोड़े हैड ऑफिस वालों को याद है.बस थोड़ी लुक चेंज कर देना. कलर कम्बीनेशन बदल देना ताकि प्रेजेंटेशन नया सा लगे.

यस सर.

मानते हो ना मेरा दिमाग.

यस सर.सचमुच सर. सही आइडिया दिया सर.

तो हो गया सारा काम. अब प्रजेंटेशन बनाओ फटाफट.शाम तक मेरे को दे देना.

राइट सर.

प्रशांत की भी जान छूटी. उसने पी.सी. पर नजर डाली. तो कई दोस्त चैट पर ‘आर यू देयर’ कहके या ‘हाई’…कहके उसका इंतजार कर रहे थे.वो फिर से चैट करने में बिजी हो गया.

Mar 302008
 

लार्ड लिजलिजी : बिशारत ने एक बार यह शिकायत की कि मुझे रोजाना धूप में तीन कि. मी. पैदल चल कर आना पड़ता है तो तहसीलदार ने उसी वक़्त एक ख़च्चर उनकी सवारी में लगाने का हुक्म दे दिया। ये अड़ियल ख़च्चर उसने नीलामी में आर्मी टांसपोर्ट से ख़रीदा थी। अब बुढ़ापे में सिर्फ़ इस लायक़ रह गया था कि उद्दण्ड जाटों, बेगार से बचने वाले चमारों तथा लगान और मुफ़्त दूध न देने वाले किसानों का मुंह काला करके इस पर क़स्बे में गश्त लगवाई जाती थी। पीछे ढोल, ताशे और मंजीरे बजवाये जाते ताकि ख़च्चर बिदकता रहे। इस पर से गिर कर एक घसियारे की रीढ़ की हड्डी टूट गई, जिसने मुफ़्त में घास देने से अनाकानी की थी। इससे उसे पूरा फ़ालिज हो गया। सवारी के बजाय बिशारत को पैदल चलना अधिक गौरवशाली और शांतिदायक लगा। यह जुरूर है कि लार्ड लिजलिजी अगर साथ न होता तो तीन मील की दूरी बहुत खलती। वो रास्ते भर उससे बातें करते जाते, उसकी तरफ़ से जवाब और हुंकारा ख़ुद ही भरते फिर जैसे ही नाजो का ध्यान आता सारी थकान दूर हो जाती। डग की लम्बाई आप-ही-आप बढ़ जाती। वो तहसीलदार के नटखट लड़कों को उस समय तक पढ़ाते रहे जब तक वो वाक़या न पेश आया जिसका जिक्र आगे आयेगा। क़स्बे में वो मास्टर साहब कहलाते थे और इस हैसियत से उनकी हर जगह आवभगत होती थी। लोगों को तहसीलदार से सिफ़ारिश करवानी होती तो लार्ड लिजलिजी तक के लाड़ करते। वो रिश्वत की दूध जलेबी खा-खा कर इतना मोटा और काहिल हो गया था कि सिर्फ़ दुम हिलाता था। भोंकने में उसे आलस आने लगा था। उसका कोट ऐसा चमकने लगा था जैसा रेस के घोड़ों का होता है। क़स्बे में वो लाट लिजलिजी कहलाता था। जलने वाले अलबत्ता बिशारत को तहसीलदार का टीपू कहते थे। नाजो ने जाड़े में लिजलिजी को अपनी सदरी काट-पीट के पहना दी तो लोग उतरन पर हाथ फेर-फेर के उसपे प्यार जताने लगे। मौली मज्जन की एक बुरी आदत थी कि मास्टर पढ़ा रहे होते तो दबे पांव, सीना ताने क्लास रूम में घुस जाते, यह देखने के लिये कि वो ठीक पढ़ा रहे हैं या नहीं। लेकिन बिशारत की क्लास में कभी नहीं आते थे इसलिये कि उनके दरवाजे पर लिजलिजी पहरा देता रहता था। परिचय बढ़ा और बिशारत शिकार में तहसीलदार के साथ रहने लगे तो लिजलिजी तैर कर घायल मुर्ग़ाबी पकड़ना सीख गया। तहसीलदार ने कई बार कहा यह कुत्ता मुझे दे दो, बिशारत हर बार अपनी तरफ़ इशारा करके टाल जाते कि यह ग़ुलाम मय अपने कुत्ते के आपका ख़ादिम है। आप कहां इसके हगने, मूतने की खखेड़ में पड़ेंगे। जिस दिन से तहसीलदार ने एक क़ीमती पट्टा लखनऊ से मंगवा कर उसे पहनाया तो उसकी गिनती शहर के मुसाहिबों में होने लगी और बिशारत शहर में इतराते फिरने लगे। उसके ख़ानदानी होने में कोई शक न था। उसका पिता इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक जज का पाला हुआ प्वांयटर था जब वो इंग्लैंड जाने लगा तो अपने रीडर को बख़्श गया। लिजलिजी उसी की औलाद था, जो धीरजगंज में आकर यूं गली-गली ख़राब हो रहा था।

मौली मज्जन को लिजलिजी जहर लगता था। फ़रमाते थे कि “पहले तो कुत्ते की जात है और फिर इसे तो ऐसी ट्रेनिंग दी गई है कि सिर्फ़ शरीफ़ों को काटता है।“ इसमें शक नहीं कि जब मौली मज्जन पे भौंकता तो बहुत ही प्यारा लगता था। अब वो वाक़ई इतना ट्रेंड हो गया था कि बिशारत हुक्म देते तो स्टाफ़ रूम से उनका रूलर मुंह में दबा कर ले आता। मौली मज्जन का बयान था कि उन्होंने अपनी आंखों से इस पलीद को हाजिरी रजिस्टर ले जाते देखा, लेकिन शायद तहसीलदार और रेबीज के डर से कुछ न बोले। एक चीनी विद्वान का कथन है कि कुत्ते पर खींच कर ढेला मारने पर पहले यह जुरूर पता कर लो कि इसका मालिक कौन है।

टीचर लोग यतीमख़ाने को खा गये : धीरे-धीरे मौली मज्जन ने क़र्ज से भी हाथ खेंच लिया और ख़ुद भी खिंचे-खिंचे रहने लगे। एक दिन बिशारत चाक में लथपथ, डस्टर हाथ में लिये और रजिस्टर बग़ल में दबाये क्लास रूम से निकल रहे थे कि मौली मज्जन उन्हें आस्तीन पकड़कर अपने दफ़्तर में ले गये और उल्टे सर हो गये। शायद “हमला करने में पहल सबसे अच्छा बचाव है” वाली पालिसी पर अमल कर रहे थे। कहने लगे, “बिशारत मियां एक मुद्दत से आपकी तनख़्वाह चढ़ी हुई है और आपके कानों पर जूं नहीं रेंगती। स्कूल इस हालत में पहुंच गया। कुछ उपाय कीजिये। यतीमख़ाने के चन्दे के मद से टीचरों की तनख़्वाह दी जाती है। टीचर तो यतीमख़ाने को खा गये। डरता हूं, कहीं आप लोगों को यतीमों की आह न लग जाये।“ बिशारत यह सुनते ही आपे से बाहर हो गये। कहने लगे, सात-आठ महीने होने को आये, कुल साठ-सत्तर रुपये मिले हैं। दो बार घर से मनीआर्डर मंगवा चुका हूं, अगर इस पर भी यतीमों की आह का अंदेशा है, तो अपनी नौकरी तह कर के रखिये’’ यह कह के उन्होंने वहीं चार्ज दे दिया। मतलब यह कि डस्टर और हाजिरी रजिस्टर मौली मज्जन को पकड़ा दिया। मौली मज्जन ने एकदम पैंतरा बदला और डस्टर उनके चार्ज में वापस दे कर, हाथ झाड़ते हुए बोले, ‘‘आप कैसी बातें कर रहे हैं। बरख़ुरदार! क़सम है अल्लाह की! वो रक़म जिसे आप अपने हिसाब से साठ-सत्तर बता रहे हैं, वो भी यतीमों का पेट काट कर जकात और सदके से निकाल कर पेश की थी। इसका आप यह बदला दे रहे हैं। सर सय्यद को भी आख़िरी उम्र में ऐसे ही सदमे उठाने पड़े थेजिससे वो उठ न पाये थे। मैं सख़्त आदमी हूं। ख़ैर! सब्र से काम लीजिये। अल्लाह ने चाहा तो बक़रा-ईद की खालों से सारा हिसाब बेबाक कर दूंगा। बर्ख़ुरदार! ये आपका स्कूल है, आपका अपना यतीमख़ाना। मैं कोई अंधा नहीं हूं। आप जिस लगन से काम कर रहे हैं, वो अंधे को भी नजर आती है। आप जिन्दगी में बहुत आगे जायेंगे। अगर इसी तरह काम करते रहे, अल्लाह ने चाहा तो बीस-पच्चीस बरस में इस स्कूल के हैड मास्टर हो जायेंगे। मैं ठहरा जाहिल आदमी, मैं तो हैडमास्टर बनने से रहा। स्कूल का हाल आपके सामने है। चंदा देने वालों की तादाद घट कर इतनी हो गई कि सर सय्यद होते तो अपना सर पीट लेते। मगर आप सब अपना ग़ुस्सा मुझी पर उतारते हैं। मैं अकेला क्या कर सकता हूं। अकेला चना भाड़ तो क्या ख़ुद को भी नहीं फोड़ सकता। जुरूरत इस बात की है कि स्कूल और यतीमख़ाने को अमीरों, रईसों,तअल्लुकेदारों और आस-पास के शहरों में परिचित कराया जाये। लोगों को किसी बहाने बुलाया जाये। एक यतीम का चेह्रा दिखाना हजार भाषणों और लाख इश्तहारों से जियादा असर रखता है। यक़ीन जानिये जबसे टीचरों की तनख़्वाह रुकी है, मेरी नींदें उड़ गई हैं। बराबर सलाह मशविरे कर रहा हूं। अल्लाह के लिये अपनी तनख़्वाह की अदायगी की कोई तरकीब निकालिये। बहुत चिन्तन-मनन के बाद अब आप ही के उपाय पर अमल करने का फ़ैसला किया है। स्कूल की प्रसिद्धि के लिये एक शानदार मुशायरा होना बहुत जुरूरी है। लोग आज भी धीरजगंज को गांव समझते हैं। अभी कल ही एक पोस्टकार्ड मिला। पते में गांव धीरजगंज लिखा था। गांव धीरजगंज! ख़ून खौलने लगा। लोग अर्से तक अलीगढ़ को भी गांव समझते रहे, जब तक कि वहां फ़िल्म नहीं आई और कार के एक्सीडेंट में पहला आदमी न मरा।

काम बांटने के सिलसिले में उन्होंने बिशारत के जिम्मे सिर्फ़ शायरों का लाना-ले जाना, ठहरने और खाने के बंदोबस्त, मुशायरे की पब्लिसिटी और मुशायरा-स्थल का इंतजाम दिया। बाक़ी काम वो अकेले कर लेंगे, जिससे अभिप्राय मुशायरे की अध्यक्षता था।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

इस भाग की अन्य कड़ियां.

1. फ़ेल होने के फायदे 2. पास हुआ तो क्या हुआ 3. नेकचलनी का साइनबोर्ड 4. मौलवी मज्जन से तानाशाह तक 5. हलवाई की दुकान और कुत्ते का नाश्ता 6. कुत्ता और इंटरव्यू 7. ब्लैक होल ऑफ़ धीरजगंज 8. कोई बतलाओ कि हम बतलायें क्या? 9. विशेष मूली और अच्छा-सा नाम 10. ज़लील करने के कायदे 11. आइडियल यतीम का हुलिया 12. ज़लील करने के अलग अलग शेड

पहला भाग

Mar 282008
 

सय्यद सय्यद लोग कहे हैं, सय्यद क्या तुम-सा होगा : अब इस रेखाचित्र में जलील होने के अलग-अलग शेड भरना हम आपकी विचार क्षमता पर छोड़ देते हैं। इन हालात में जैसा वक़्त गुजर सकता था, गुजर रहा था। दिसम्बर में स्कूल का सालाना जलसा होने वाला था जिसकी तैय्यारियां इतनी जोर-शोर से हो रही थीं कि मौली मज्जन को इतनी फ़ुरसत भी न थी कि मास्टरों की तनख़्वाहों की अदायगी तो दूर, इस विषय पर झूठ भी बोल सकें। दिसम्बर का महीना सालाना क़ौमी जलसों, मुर्ग़ाबी के शिकार, बड़े दिन पर साहब लोगों को डालियां भेजने, पतंग उड़ाने, कुश्ते खाने और उनके नतीजों से मायूस होने का जमाना होता था। 30 नवम्बर को मौली मज्जन ने बिशारत को बुलवाया तो वो यह समझे कि शायद निजी रूप से एकान्त में तनख़्वाह देंगे ताकि और टीचरों को कानों-कान ख़बर न हो। मगर वो छूटते ही बोले “आप अपने शेरों में पराई बहू-बेटियों के बारे में अपने मंसूबों का बयान करने के बजाय क़ौमी जज्बा क्यों नहीं उभारते। अपने मौलाना हाली पानीपती ने क्या कहा है ऐसी शायरी के बारे में? (चुटकी बजाते हुए) क्या है वो शेर? अमां! वही सन्डास वाली बात” बिशारत ने मरी-मरी आवाज में शेर पढ़ा

वो शेर और क़साइद का नापाक दफ़्तर

उफ़ूनत  में   संडास  है  जिससे    बेहतर

उनकी बीबी और मौलाना हाली की साझी ग़लतियां : शेर सुनकर फ़मार्या, “आपके हाथों में अल्लाह ने शेर गढ़ने का हुनर दिया है। इसे काम में लाइये, सालाना जलसे में यतीमों पर एक जोरदार नज्म लिखिये। मुस्लिम क़ौम में चेतना के अभाव, साइंस पर मुसलमानों के अहसानात, सर सय्यद की क़ुरबानियां, अंग्रेजी-साम्राज्य में अम्न-चैन का दौर-दौरा, चंदे की अहमीयत, तारिक़ द्वारा स्पेन की विजय और तहसीलदार साहब की क्षमता और अनुभव का जिक्र होना चाहिये। पहले मुझे सुना दीजियेगा। वक़्त बहुत कम है।”

बिशारत ने कहा “मुआफ़ कीजियेगा, मैं ग़जल का शायर हूं। ग़जल में यह विषय नहीं बांधे जा सकते।“

क्रोधित होकर बोले,”मुआफ़ कीजियेगा, क्या ग़जल में सिर्फ़ परायी बहू-बेटियां बांधी जा सकती है? तो फिर सुनिये, पिछले साल जो उर्दू टीचर था वो डिसमिस इसी बात पर हुआ था। वो भी आपकी तरह शायरी करता था। मैंने कहा, इनआम बांटने के जलसे में बड़े-बड़े लोग आयेंगे। हर दानदाता और बड़े आदमी के आने पर पांच मिनट तक यतीमख़ाने का बैंड बजेगा। यतीमों की बुरी हालत और यतीमख़ाने के फ़ायदे और ख़िदमत पर एक फ़ड़कती हुई चीज हो जाये। तुम्हारी आवाज अच्छी है गा कर पढ़ना। ऐन जलसे वाले दिन भिनभिनाता हुआ आया। कहने लगा, बहुत सर मारा, पर बात नहीं बनी। इन दिनों तबियत हाजिर नहीं है। मैंने कहा, अमां हद हो गई। अब क्या हर चपड़क़नात मुलाजिम की तबियत के लिये एक अलग रजिस्टर हाजिरी रखना पड़ेगा। कहने लगा, बहुत शर्मिन्दा हूं। एक दूसरे शायर की नज्म, मौके के हिसाब से तरन्नुम से पढ़ दूंगा। मैंने कहा, चलो कोई बात नहीं, वो भी चलेगी। बाप रे बाप! उसने तो हद ही कर दी। भरे जलसे में मौलाना हाली पानीपती की मुनाजाते-बेवा (विधवा की ईश्वर से प्रार्थना) के बन्द पढ़ डाले। डायस पर मेरे पास ही खड़ा था। मैंने आंख से, कुहनी के टहूके से, खंखार के, बहुतेरे इशारे किये कि अल्लाह के बंदे! अब तो बस कर। हद ये कि मैंने दायें कूल्हे पर चुटकी काटी को बायां भी मेरी तरफ़ करके खड़ा हो गया। स्कूल की बड़ी भद पिटी। सब मुंह पर रूमाल रखे हंसते रहे मगर वो आसमान की तरफ़ मुंह किये रांड-बेवाओं की जान को रोता रहा। एक मीरासी, जिसके जरिये मैंने कार्ड बंटवाये थे, ने मुझे बताया इस बेहया ने दो तीन सुर मालकोंस के भी लगा दिये। लोगों ने दिल-ही-दिल में कहा होगा कि मैं शायद मौलाना हाली की आड़ में विधवा आश्रम खोलने की जमीन तैयार कर रहा हूं। बाद को मैंने आड़े हाथों लिया तो कहने लगा, सब की किताबें खंगाल डालीं। यतीम पर कोई नज्म नहीं मिली। सितम ये है कि मीर तक़ी मीर, जो ख़ुद बचपने में यतीम हो गये थे, ने मोहनी नाम की बिल्ली और कुतिया पर तो प्रशंसा में काव्य लिखे पर मासूम यतीमों पर फ़ूटे मुंह से एक लाइन न कह के दी। इस तरह मिर्जा ग़ालिब ने सेहरे के लिये, प्रशंसा में क़सीदे लिखे। बेसनी रोटी, डोमनी की तारीफ़ में शेर कहे, दो कौड़ी की छाली को सरे-पिस्ताने-परीजाद (परी के स्तन का अगला भाग) से भिड़ा दिया मगर यतीमों के बारे में एक शेर भी नहीं कहा। अब हर किताब से मायूस हो गया तो मुझे एक दम ख़याल आया कि यतीमों और बेवाओं का चोली-दामन का साथ है। विषय एक और दुख साझा, सो ग़ुलाम ने मुनाजाते-बेवा पढ़ दी। महान रचना है। तीन साल से आठवीं के इम्तहान में इस पर बराबर सवाल आ रहे हैं। चुनांचे मैंने भी ग़ुलाम को उसकी महान रचना और चोली-दामन समेत खड़े-खड़े डिसमिस कर दिया। कुछ दिन बाद उस हरामख़ोर ने मेरे ख़िलाफ़ इंस्पेक्टर ऑफ़ स्कूल से शिकायत की। उसमें ये भी लिक्खा है कि मैंने अपने नहाने के लिये पांच मर्तबा बाल्टी में पानी मंगवाया। सरासर झूठ बोला। मैंने पन्द्रह-बीस बार मंगवाया था। घड़े में भर के छलकाता लाया था।

मौलवी मुजफ़्फ़र की बुराइयां बिल्कुल स्पष्ट और अच्छाइयां आंखों से छुपी हुई थीं। वो बिशारत के अंदाजे और अंदेशे से जियादा जहीन और काइयां निकले। ऐसे ठूंठ जाहिल नहीं थे, जैसा दुश्मनों ने मशहूर कर रखा था। रहन-सहन में एक सादगी और सादगी में इक टेढ़। कानों और जबान के कच्चे, मगर धुन के पक्के थे। उन्हीं का हौसला था कि बारह साल से बग़ैर साधन के लश्तम-पश्तम स्कूल चला रहे थे। उसे चलाने के लिये उनकी निगाह में हर क़िस्म की धांधली उचित थी। स्कूल की हालत ख़राब बताई जाती थी। आये दिन मास्टरों से दर्द भरी अपील की जाती थी कि आप दिल खोल कर चंदा और दान दें। पांच-छः महीने की नौकरी के दौरान उन्हें कुल साठ रुपये मिले थे, जो स्कूल एकाउंट की किताबों में क़र्ज के तौर पर दिखाये गये थे। अब उन्हें तनख़्वाह का तक़ाजा करते हुए भी डर लगता था कि क़र्ज बढ़ता जा रहा था। इधर न मिली तन्ख़्वाह की राशि बढ़ती जाती, उधर मौली मज्जन का लहजा रेशम और बातें लच्छेदार होती जातीं। बिशारत ने एक दिन दबे शब्दों में तक़ाजा किया तो कहने लगे, “बेटे! मैं तुम्हारे बाप की तरह हूं मेरी समझ में नहीं आता तुम इस अकेली देह में इतने रुपयों का क्या करोगे? छड़े-छटांक आदमी हो। अकेले घर में बेतहाशा नक़दी रखना जोखिम का काम है। रात को तुम्हारी तरफ़ से मुझे डर ही लगा रहता है। सुल्ताना डाकू ने तबाही मचा रखी है।“ बहरहाल इस तक़ाजे का इतना असर जुरूर हुआ कि दूसरे दिन से उन्होंने उनके घर एक मटकी छाछ की भेजनी शुरू कर दी।

तहसीलदार ने कभी रुपये-पैसे से तो कोई बर्ताव नहीं किया, अलबत्ता एक दो गड्डी पालक या चने का साग, कभी हिरन की टांग, कभी एक घड़ा गन्ने का रस या दो-चार भेलियां गुड़ की साथ कर देता। ईद पर एक हांडी सन्डीले के लड्डुओं की और बक़रईद पर एक नर बकरे का सर भी दिया। उतरती गर्मियों में चार तरबूज फटी बोरी में डलवा कर साथ कर दिये। हर क़दम पर निकल-निकल पड़ते थे। एक को पकड़ते तो दूसरा लुढ़क कर किसी और राह पर बदचलन हो जाता। जब बारी-बारी सब तड़ख़ गये तो आधे रास्ते में ही बोरी एक प्याऊ के पास पटक कर चले आये। उनके बहते रस को एक प्यासा सांड, जो पंडित जुगल किशोर ने अपने पिताजी की याद में छोड़ा था, तब तक चाव और तल्लीनता से चाटता रहा जब तक एक अल्हड़ बछिया ने उसका ध्यान उत्तम से सर्वोत्तम की ओर भटका न दिया।

जनवरी की बारिश में उनके ख़स की टट्टियों के मकान का छप्पर टपकने लगा तो तहसीलदार ने दो गाड़ी पूले मुफ़्त डलवा दिये और चार छप्पर बांधने वाले बेगार में पकड़ कर लगवा दिये। क़स्बे के तमाम छप्पर बारिश धूप और धुएं से काले पड़ गये थे, अब सिर्फ़ उनका छप्पर सुनहरा था। बारिश के बाद चमकीली धूप निकलती तो उस पर किरन-किरन अशरफ़ियों की बौछार होने लगती। इसके अलावा तहसीलदार ने लिहाफ़ के लिये बारीक धुनकी हुई रूई की एक बोरी और मुर्ग़ाबी के परों का एक तकिया भी भेजा जिसके ग़िलाफ़ पर नाजो ने एक गुलाब का फूल काढ़ा था। (बिशारत इस तकिये पर उल्टे यानी पेट के बल सोते थे……फूल पर नाक और होंठ रख कर)

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

इस भाग की अन्य कड़ियां.

1. फ़ेल होने के फायदे 2. पास हुआ तो क्या हुआ 3. नेकचलनी का साइनबोर्ड 4. मौलवी मज्जन से तानाशाह तक 5. हलवाई की दुकान और कुत्ते का नाश्ता 6. कुत्ता और इंटरव्यू 7. ब्लैक होल ऑफ़ धीरजगंज 8. कोई बतलाओ कि हम बतलायें क्या? 9. विशेष मूली और अच्छा-सा नाम 10. ज़लील करने के कायदे 11. आइडियल यतीम का हुलिया

पहला भाग

Mar 272008
 

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आज पिछ्ले अंक में की गयी छालड़ी की चर्चा को ही आगे बढ़ाते हैं और छालड़ी में गायी जाने वाली कुछ प्रमुख होलियों की चर्चा करते हैं.

होल्यार छालड़ी में तरह तरह की होली गाते हैं. कुछ होलियां ऐसी भी गायी जाती हैं जो मुख्यत: महिला पात्रों द्वारा गायी जानी चाहिये लेकिन छालड़ी में इन होलियों को पुरुष होल्यार भी गाते हैं.

बलमा घर आये कौन दिना. सजना घर आये कौन दिना…
मेरे बलम के तीन शहर हैं
मेरे बलम के तीन शहर हैं
दिल्ली, आगरा और पटना..
बलमा घर आये कौन दिना. बलमा घर आये कौन दिना .. सजना घर आये कौन दिना।
मेरे बलम की तीन रानियां – २
मेरे बलम की तीन रानियां
पूनम, रेखा और सलमा 
बलमा घर आये कौन दिना. बलमा घर आये कौन दिना .. सजना घर आये कौन दिना।

इस होली में समय और परिस्थिति के अनुसार स्थानीय मुद्दे या जिस के घर हो रही है उससे संबंधित चीजें भी जोड़ दी जाती हैं. जैसे एक बार जब मैं भी छालड़ी में भाग ले रहा था तो एक घर में जिसका मुखिया अक्सर शराब पीके आता था तो हम लोगों ने गाया.

मेरे बलम के तीन ठिकाने
मेरे बलम के तीन ठिकाने
घर, ऑफिस और दारू का भट्टा 
बलमा घर आये कौन दिना. बलमा घर आये कौन दिना .. सजना घर आये कौन दिना।

इसके अलावा एक और होली जो प्रमुख रूप से गायी जाती है वह है.

रंग में होली कैसे खेलूं री मैं सांवरियां के संग….
अबीर उड़ता गुलाल उड़ता, उड़ते सातों रंग…सखी री उड़ते सातों रंग
भर पिचकारी ऐसी मारी, अंगियां हो गयी तंग…
रंग में होली कैसे खेलूं री मैं सांवरियां के संग….
तबला बाजे, सारंगी बाजे, और बाजे मिरदंग…सखी री और बाजे मिरदंग
कान्हा जी की बंसी बाजे, राधा जी के संग…
रंग में होली कैसे खेलूं री मैं सांवरियां के संग….
कोरे कोरे माट मंगाये, तापर घोला रंग, सखी री तापर घोला रंग
भर पिचकारी सनमुख मारी, अंखिंया हो गयी बंद…
रंग में होली कैसे खेलूं री मैं सांवरियां के संग….
लंहगा तेरा घूम घुमेला, चोली तेरी तंग
खसम तुम्हारे बड़ निकट्ठू , चलो हमारे संग
रंग में होली कैसे खेलूं री मैं सांवरियां के संग….

इस होली की अंतिम लाइनों को हम लोग बहुत जोर देकर गाते थे. अगले अंक में इसकी पॉडकास्ट भी आप तक पहुचाने की कोशिश करुंगा.

किसी घर में होली खतम करने के बाद एक घर से दूसरे घर के बीच में कुछ होलियाँ गायी जाती हैं.जिसमें कुछ स्थानीय मुद्दे , कुछ ‘उन्मुक्त्तता’ ( पिछ्ले अंक में मेरे द्वारा लिखी गये शब्द ‘अश्लीलता’ को हेम पंत जी ने ‘उन्मुक्त्तता’ का नाम दिया था तो मैं उसी का प्रयोग कर रहा हूँ.) का पुट आता है. इस होली को बंजारा होली भी कहा जाता है.

आपू बनजारो बनज गयो बनजारो छ:
भाई आंगन निम्बू लगाय पिय बनजारो छ:
आपू बनजारो बनज गयो बनजारो छ:
नीम निमोड़ा पाकि जाला बनजारो छ:
भाई खैज बटोवा लौंग पिय बनजारो छ:

छालड़ि का एक प्रमुख हिस्सा होता है अशीष (आशीर्वाद) देने का. हर घर में होली गाने के बाद होली का मुखिया अपने साथियों के साथ घर के मुखिया और उसके पूरे परिवार को लाख बरस जीने का आशीर्वाद देता है. यह आशीर्वाद पहले एक गाने के रूप में सभी देवताओं को दिया जाता है.

केसरी रंग डारो भिगावन को, सांवरी रंग डारो भिगावन को
गणपति जीवै , लाख बरीषा , ब्रह्मा , विष्णु जीवे लाख बरीषा,
उनकी नारी रंग भरे , केसरी रंग डारो भिगावन को
शिवजी जीवै , लाख बरीषा , रामचन्द्र जीवे लाख बरीषा,लछ्मन जीवै लाख बरीषा
उनकी नारी रंग भरे , केसरी रंग डारो भिगावन को

इसमें अन्य देवी-देवताओं के नाम भी जोड़े जाते हैं.

इसके बाद घर के सभी पुरुष सदस्यों का नाम लेकर उनको भी आशीर्वाद दिया जाता है. 

मुख्य होलियार : मथुरादत्त ज्यू जी रौ लाख सैवरी
बांकी होल्यार :  हो हो हो लख रे.
मुख्य होलियार : उनर पूत परिवार जी रौ लाख सैवरी
बांकी होल्यार :  हो हो हो लख रे.
मुख्य होलियार : उनर गोरु बाछ, भेड़ बाकर, भान-कुन जी रौ लाख सैवरी
बांकी होल्यार :  हो हो हो लख रे.

यानि मुख्य होल्यार कह रहा है कि मथुरा दत्त जी, उनका समस्त पूत परिवार, उनके गाय-बैल , भेड़ बकरी, बर्तन सभी चीज लाख वर्ष तक जीवित रहे. बाक़ी लोग आमीन जैसी ध्वनि के साथ कहते हैं जरूर लाख वर्ष तक जियें.

जब गांव या मोहल्ले के अंतिम घर में होली की आशीष हो जाती है तो अंत में सब लोग एक दूसरे के हाथों में हाथ डाल अपनी जेब का सारा अबीर-गुलाल , रंग जमीन में फैक देते हैं, कुछ लोग अपनी टोपियाँ भी फैक देत हैं और सब मिल कर गाते हैं.

आज कन्हैया रंग भरे , रंग की गागर सर पे धरे
होली खेली खहली मथुरा को चले ,आज कन्हैया रंग भरे
आज की होली न्हैं गेछ , जी रया जाग रया कै गेछ
अब फागुन उलौ कै गेछ, जी रया जाग रया कै गेछ

कन्हैया अपने घर मथुरा की ओर गये.इस बार की होली खतम हुई.सभी लोग जीते रहें खुश रहें. अगले बरस फागुन में होली फिर आयेगी तब तक सब लोग जीते रहें और खुश रहें.

तो इस बार की छ्लड़ी खतम हुई. अगले अंक में कुछ शास्त्रीय होलियों की चर्चा करेंगें.

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संतनगर के खीम सिंह रावत जी ने दो होलियाँ और भेजी हैं. रावत जी को ढेर सारा धन्यवाद.

1.

शिव दर्शन देऊ जटाधारी , शिव दर्शन देऊ जटाधारी
ये कौन जी झूले लडिया हिनोला,ये कौन झुलावन आयो हरी.
शम्भू जी खेलें लडिया हिनोला , गौरा झुलावन आयो हरी.
राम जी खेलें लडिया हिनोला , सीता झुलावन आयो हरी.
कृष्णा जी खेलें लडिया हिनोला , राधा झुलावन आयो हरी.

2.

द्वारे जो देखूँ ठाडो देवरिया , म्यरा स्वामी परदेश रहनी हो ला.
पूरब दिशा में कालो बदरिया , पश्चिम दिशा घनघोरा हो ला.
चाला जो चमके बिजूरी जो धमके , रिमझिमे बरसे मेघा हो ला.
स्वामी की भीगे लाल पगड़िया , मेरी रेशमिया साड़ी हो ला.
बाली उमरिया तरुणी हैगेछा, म्यारा स्वामी घर कब ऐला हो ला.
तरुणी उमरिया कसिक निभानूँ , म्यारा स्वामी निर्दयी हैगी हो ला.

जारी …………………….

इस श्रंखला के अन्य लेख

1. कुमांऊनी होली : अलग रंग अलग ढंग 2. कुमांउनी होली: भक्ति भी,अश्लीलता भी

Mar 262008
 

परुली के बाबू रात को ठीक से सो भी नहीं पाये. रात भर सोचते रहे कि क्या किया जाये. एक ओर वह चाहते थे कि परुली डॉक्टर बन जाये और दूसरी ओर वह परुली के लिये इतने अच्छे संबंध को छोड़ना भी नहीं चाहते थे. यदि वह किसी तरह अपने मन को इस बात के लिये तैयार भी कर लेते कि वह परुली का ब्या अभी ना करें तो वह किस तरह से इस संबंध के लिये मना करेंगे. एक बार बिरादरी में बदनामी हो गयी तो लोग तरह तरह की बातें बनायेंगे. फिर आगे भी रिश्ते नहीं आयेंगे.इसी तरह सोचते सोचते सुबह हो गयी. घर में घड़ी तो थी नहीं. पास के शहर में एक जेल था उसमें हर घंटे घंटी बजायी जाती जिससे समय का पता चलता. अभी अभी पांच घंटे बजे तो जोसज्यू उठ गये. आज उन्हें बगल के गांव में एक जजमान के वहाँ नामकन्द (नामकरण) करवाने जाना था.

आते समय जाखनदेवी में उपाध्याय ज्यू की दुकान में बैठना जोसज्यू का लगभग रोज का ही नियम था. कभी कभी वह पास की ही भोलदा की दुकान से एक पान भी खा लेते. लेकिन उपाध्याय ज्यू की दुकान से उधार में सामान लेने के अलावा वह उन्हें अपने घर की बातें भी बता आते.उपाध्याय ज्यू जानते थे कि परुली का ब्या ठीक हो गया है. इसलिये आज जोस्ज्यू ने सोचा कि इस बारे में एक बार उपाध्याय ज्यू से भी सलाह कर ली जाये.

“आओ हो जोस्ज्यू ..आज कांबटी (आज कहाँ से) “

“बगल के गांव में खीमदत्त ज्यू के वहाँ नामकन्द था हो.”

“खूब माल-टाल मिला होगा तब तो. खीमद्त्त ज्यू का तो पांच नातनियों के बाद नाती हुआ ठहरा. खूब झर-फर कर रखी है बल.”

“हाँ पूरे गांव को खाने का न्यूता था. हमारे तो पुराने जजमान हुए क्या माल-टाल देंगे. हाँ इस बार सवा रुपये की जगह सवा पांच रुपये की दक्षिणा दी हो.”

“भल हुआ यह तो.तब तो चहा बढ़ूं पे मैं.”

“हाँ बढ़ांओ……कुछ रुककर ….उपाध्याय ज्यू..एक बात में आपकी राय लेनी थी हो.”

“क्या…चाय की केतली में पत्ती डालते हुए उपाध्याय ज्यू बोले. “

“परुली के बारे में….”

“अरे उसके ब्या में कुछ रुपये पैसे की मदद चाहिये क्या. “

“नहीं ..वो तो नहीं …पर परुली कह रही है वह यह ब्या नहीं करेगी. वह पहले डॉक्टर बनना चाहती है. “

“अरे वह तो नानतिन ठहरी.उसका क्या. आप तो ब्या कर दो जी. बनना होगा तो बन जायेगी.”

“लेकिन यार …चाहता तो मैं भी हूँ कि वह डॉक़्टर बन जाये.इसलिये सोच रहा हूँ कि इस ब्या को अभी रुकवा दूँ.”

“जोस्ज्यू तुम्हारी तो मति मारी गयी है.इतना अच्छा घर कहाँ मिलेगा परुली को. चिंन्ह भी कैसा बढिय़ा साम्य हुआ ठहरा. शादी ब्या तो अंजल (संजोग) की बात होने वाली हुई. पहले तो डॉक्टर बनना ही कितना मुश्किल हुआ फिर परुली को डॉक्टर बना भी लिया तो कौन सा उसको जनम भर अपने घर में रख लोगे. ब्या तो तब भी करना ही पड़ेगा ना.फिर अभी बिना किसी कारण के ब्या रोक दिया तो तुम्हारे जजमान ही क्या कहेंगे. कस बामण छा हो तुम ?(कैसे ब्राह्मण हो हो तुम?) …. लो चहा पियो.”

चहा पीते पीते जोसज्यू ने भविष्य की सभी संभावनाओं पर विचार किया. उनको सचमुच अपने जजमानों और बिरादरों की बातें सुनायी देने लगी.बदनामी के डर से वह थोड़े घबरा गये.लेकिन साथ साथ ही जब वह परुली के बारे में सोचते कि जब उसने कहा था ” बाबू मैं यह ब्या नहीं करुंगी” तो कितनी इच्छाऐं उसके एक वाक्य में छिपीं थी.वह कुछ भी निर्णय ले पाने में असमर्थ थे. 

घर जाके भी वह परेशान ही थे. परुली उनके सामने से गुजरी तो उसकी आंखें लाल थी.लगता था वह खूब रोयी है. अब तक उन्होने ध्यान नहीं दिया था. लेकिन अब वह सोच रहे थे कि जब से परुली के ब्या की बात शुरु हुई तब से वह उदास ही रहती थी. इसका कारण अब उनकी समझ में आ रहा था.वह परुली का बुरा थोड़े चाहते थे लेकिन वह क्या कर सकते थे.जिससे भी वह बात करते वह यही सलाह देता कि परुली का ब्या कर दो.

उन्होने निर्णय लिया कि कल वह मलगाड़ जा के एक बार पांडे ज्यू से बात करेंगे. वह भले आदमी हैं हो सकता वही कोई सलाह दें. यदि वह खुद ही परुली को डॉक्टरी पढ़ाने के लिये राजी हो जायें तो फिर परुली का ब्या भी हो जायेगा और वह डॉक्टर भी बन जायेगी. अपनी इस सोच से वह खुद भी हैरान थे कि पहले यह विचार क्यों उनके दिमाग में नहीं आया.आज वह जल्दी जल्दी खाना खा के सो गये ताकि वह कल रत्तब्याण ही मलगाड़ के लिये रवाना हो जायें.

जारी……..

पिछले भाग : 1. परुली…. 2. परुली: चिन्ह साम्य होगा क्या ?? 3. परूली : शादी की तैयारी 4. परुली:आखिर क्या होगा ? 5. परुली: हिम्मत ना हार ..6. परुली : ब्या कैसे टलेगा

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पिछ्ले अंक में मैने बताया था कि आज वाले भाग में कहानी का अंत कर दुंगा. एक अंत सोचा भी था.लेकिन मुझे खुद भी लग रहा था वह कुछ कुछ फिल्मी अंत हो रहा है  और फिर  पिछ्ले भाग में आयी टिप्पणीयों से हौसला मिला कि मुझे कहानी का अंत फिल्मी करने की कोई आवश्यकता नहीं है. आज सुबह लिखने बैठा तो इसी उहापोह में रहा कि कहानी का अंत करूं या फिर इसे इसी रफ्तार से आगे बढ़ने दूँ. कही ऐसा ना हो कि लगे कि कहानी जबरदस्ती खींची जा रही है. फिर लिखते लिखते लिख ही गया. अभी लगता है कि कहानी जारी रहेगी. तो अगले हफ्ते भी आइयेगा पढ़ने.

कल कुमांऊनी होली का अगला अंक प्रस्तुत किया जायेगा कृपया जरूर पधारें.

1. कुमांऊनी होली : अलग रंग अलग ढंग 2. कुमांउनी होली: भक्ति भी,अश्लीलता भी

Mar 232008
 

आइडियल यतीम का हुलिया : यतीम जमा करना बिशारत को चंदा जमा करने से भी मुश्किल नजर आया, इसलिये कि मौली मज्जन ने यह पख़ लगा दी कि यतीम तन्दरुस्त और मुस्टण्डे न हों। सूरत से भी दीन, दरिद्र मालूम होने चाहिये। लम्बे-चौड़े न हों, न इतने छोटे टुइयां कि चोंच में चुग्गा देना पड़े। न इतने ढऊ के ढऊ और पेटू कि रोटियों की थई-की-थई थूर जायें और डकार तक न लें, पर ऐसे गुलबदन भी नहीं कि गाल पर एक मच्छर का साया पड़ जाये तो शहजादा गुलफ़ाम को मलेरिया हो जाये। फिर बुख़ार में दूध पिलाओ तो एक ही सांस में बाल्टी की बाल्टी डकोस जायें। बाजा-बाजा लौंडा टख़ने तक पोला होता है। लड़के बाहर से कमजोर मगर अन्दर में बिल्कुल तन्दुरुस्त होने चाहिये। न ऐसे नाजुक कि पानी भरने कुएं पर भेजो तो डोल के साथ ख़ुद भी खिंचे कुएं के अन्दर चले जा रहे हैं। भरा घड़ा सर पे रखते ही कत्थकों-नचनियों की तरह कमर लचका रहे हैं। रोज एक घड़ा तोड़ रहे हैं। जब देखो हराम की औलाद सुबूत में टूटे घड़े का मुंह लिये चले आ रहे हैं। अबे मुझे क्या दिखा रहा है! ये हंसली अपनी मय्या-बहना को पहना। छोटे क़द और बीच की उम्र के हों। इतने बड़े और ढ़ीठ न हों कि थप्पड़ मारो तो घंटे भर तक हाथ झनझनाता रहे और उन हरामियों का बाल भी बांका न हो। जाड़े में जियादा जाड़ा न लगता हो। यह नहीं कि जरा-सी सर्दी बढ़ जाये तो सारे क़स्बे में कांपते, कंपकंपाते, किटकिटाते फिर रहे हैं और यतीमखाने को मुफ़्त में बदनाम कर रहे हैं। यह जुरूर तसदीक़ कर लें कि रात को बिस्तर में पेशाब न करते हों। ख़ानदान में ऐब और सर में लीखें न हों। उठान के बारे में मौली मज्जन ने स्पष्ट किया कि इतनी संतुलित बल्कि हल्की हो कि हर साल जूते और कपड़े तंग न हों। अंधे, काने, लूले, लंगड़े, गूंगे, बहरे न हों मगर लगते हों। लौंडे सुन्दर हरग़िज न हों, मुंह पर मुंहासे और नाक लम्बी न हो। ऐसे लौंडे आगे चलकर लूती (जनख़े) निकलते हैं। वो आइडियल यतीम का हुलिया बयान करने लगे तो बार-बार बिशारत की तरफ़ इस तरह देखते कि जैसे आर्टिस्ट पोट्रेट बनाते वक़्त मॉडल का चेहरा देख-देख कर आउट लाइन उभारता है। वो बोलते रहे मगर बिशारत का ध्यान कहीं और था। उनके जहन में एक-से-एक मनहूस तस्वीरें उभर रहीं थीं, जिसमें वो ख़ुद को किसी तरह फ़िट नहीं कर पा रहे थे।

अच्छा! आप उस लिहाज से कह रहे हैं : बिशारत की नियुक्ति तो उर्दू पढ़ाने के लिये हुई थी, मगर टीचरों की कमी के कारण उन्हें सभी विषय पढ़ाने पड़ते थे, सिवाय धार्मिक विषय के। जामा मस्जिद धीरजगंज के पेश-इमाम ने यह फ़तवा दिया था कि जिस शख़्स के घर में कुत्ता हो वो धर्मशास्त्र पढ़ाये तो पढ़नेवालों को आवश्यक रूप से स्नान करना पड़ेगा। बिशारत का गणित, ज्योमेट्री और अंग्रेजी बहुत कमजोर थी, लेकिन वो इस हैंडीकैप से जरा जो परेशान हुए हों। पढ़ाने के गुर उन्होंने मास्टर फ़ाख़िर हुसैन से सीखे थे। मास्टर फ़ाख़िर हुसैन का विषय तो इतिहास था लेकिन अक्सर उन्हें मास्टर मेंडीलाल की इंग्लिश की क्लास भी लेनी पड़ती थी। मास्टर मेंडीलाल का गुर्दा और ग्रामर दोनों जवाब दे चुके थे। अक्सर देखा गया था कि जिस दिन नवीं-दसवीं की ग्रामर की क्लास होती वो घर बैठ जाता। उसके गुर्दे में ग्रामर का दर्द उठता था। सब टीचर अपने विषय के अतिरिक्त दूसरा विषय पढ़ाने में कचियाते थे। मास्टर फ़ाख़िर हुसैन अकेले शिक्षक थे जो हर विषय पढ़ाने के लिये हर वक़्त तैयार रहते, हालांकि उन्होंने बी.ए., वाया भटिंडा किया था मतलब ये कि पहले मुंशी फ़ाजिल किया था। इंग्लिश ग्रामर उन्हें बिल्कुल नहीं आती थी। वो चाहते तो अंग्रेजी ग्रामर का घंटा हँस बोल कर या नसीहत करने में गुजार सकते थे लेकिन उनकी अन्तरात्मा ऐसे समय नष्ट करने के कामों की अनुमति नहीं देती थी। दूसरे मास्टरों की तरह वो लड़कों को व्यस्त रखने के लिये इमला भी लिखवा सकते थे, मगर वो इस बहाने को अपनी विद्वता का अपमान समझते थे, इसलिये जिस भारी पत्थर को सब चूम कर छोड़ देते वो उसे अपने गले में बांध कर ज्ञान के समुद्र में कूद पड़ते। पहले ग्रामर की अहमियत पर लैक्चर देते हुए यह बुनियादी नुक्ता बयान करते कि जैसे हमारी गायकी की बुनियाद तबले पर है, गुफ़्तगू की बुनियाद गाली पर है, इसी तरह अंग्रेजी की बुनियाद ग्रामर पर है। अगर कमाल हासिल करना है तो बुनियाद मजबूत करो। मास्टर फ़ाख़िर हुसैन की अपनी अंग्रेजी, इमारत निर्माण का अद्भुत नमूना और संसार के सात आश्चर्यों में से एक थी, मतलब यह कि बग़ैर नींव के थी। कई जगह तो छत भी नहीं थी और जहां थी, उसे चमगादड़ की तरह अपने पैरों की अड़वाड़ से थाम रखा था। उस जमाने में अंग्रेजी भी उर्दू में ही पढ़ाई जाती थी, लिहाजा कुछ गिरती हुई दीवारों को उर्दू शेरों के पुश्ते थामे हुए थे। बहुत ही मंझे हुए और घिसे हुए मास्टर थे। कड़े-से-कड़े समय में आसानी से निकल जाते थे। मिसाल के तौर पर Parsing करवा रहे हैं। अपनी जानकारी में निहायत आसान सवाल से शुरूआत करते। ब्लैक बोर्ड पर ‘टू गो’ लिखते और लड़कों से पूछते, अच्छा बताओ यह क्या है? एक लड़का हाथ उठा कर जवाब देता, Simple Infinite! स्वीकार में गर्दन हिलाते हुए फ़र्माते, बिल्कुल ठीक, लेकिन देखते कि दूसरा उठा हुआ हाथ अभी नहीं गिरा। उससे पूछते, आपको क्या तकलीफ़ है? वो कहता, नहीं सर! Noun Infinite है। फ़र्माते अच्छा आप उस लिहाज से कह

रहे हैं। अब क्या देखते हैं कि क्लास का सबसे जहीन लड़का अभी तक हाथ उठाये हुए है। उससे कहते, आपका सिगनल अभी तक डाउन नहीं हुआ। कहिये! कहिये! वो कहता, ये Gerundial Infinite है जो Reflexive Verb से अलग होता है, नेस्फ़ील्ड ग्रामर में लिखा है। इस मौके पर मास्टर फ़ाख़िर हुसैन को पता चल जाता कि गहरे समन्दरों में सफ़र कर रहे हैं हम। लेकिन बहुत सहज और ज्ञानपूर्ण अन्दाज में फ़र्माते अच्छा तो आप गोया इस लिहाज के कह रहे हैं। इतने में नजर उस लड़के के उठे हुए हाथ पर पड़ी जो एक कान्वेन्ट से आया था और फ़र-फ़र अंग्रेजी बोलता था। उससे पूछा, ‘‘वेल! वेल! वेल!’’ उसने जवाब दिया, “Sir I am afraid, this is an Intransitive Verb”अच्छा! तो गोया आप उस लिहाज से कह रहे हैं’’ फिर I am afraid के मुहावरे से अपरिचित होने के कारण बहुत प्यार भरे अंदाज में पूछा, बेटे! इसमें डरने की क्या बात है? अक्सर फ़र्माते कि इंसान को ज्ञान की खोजबीन का दरवाजा हमेशा खुला रखना चाहिये। ख़ुद उन्होंने सारी उम्र बारहदरी में गुजारी। अब ऐसे टीचर कहां जिनके अज्ञान पर भी प्यार आये।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

इस भाग की अन्य कड़ियां.

1. फ़ेल होने के फायदे 2. पास हुआ तो क्या हुआ 3. नेकचलनी का साइनबोर्ड 4. मौलवी मज्जन से तानाशाह तक 5. हलवाई की दुकान और कुत्ते का नाश्ता 6. कुत्ता और इंटरव्यू 7. ब्लैक होल ऑफ़ धीरजगंज 8. कोई बतलाओ कि हम बतलायें क्या? 9. विशेष मूली और अच्छा-सा नाम 10. ज़लील करने के कायदे

पहला भाग

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

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चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: पुस्तक चर्चा, समीक्षा, काकेश, विमोचन, हिन्दी, किताब, युसूफी, व्यंग्य

Mar 212008
 

कल शाम को ऑफिस से निकलने ही वाला था कि मेरी पोस्ट पर कमेंट आया.

गूगल इंडिया के बंगलोर ऑफिस से जारी की गयी न्यूज़ के अनुसार ब्लागवाणी अब गूगल.ब्लागवाणी .कॉम हो गयी हैं ।

पहले तो कुछ समझ में नहीं आया कि यह क्या है.लेकिन फिर केवल सच का पीछा करते हुए यहां पहुंचे तो पूरी खबर के बारे में पता चला.सिरिल को फोन मिलाया तो फोन काफी देर तक बिजी मिला. सोचा अब मैथिली जी और सिरिल तो बड़े लोग हो गये हम जैसे चिरकुट के लिये उनके पास कहाँ समय है. फिर अरुण अरोरा पंगेबाज को फोन मिलाया तो उन्होने खबर की पुष्टि की. यह पुष्टि उन्होने फोन पर की थी. चैट पर की होती तो बिना उनसे पूछे पोस्ट में चिपका देते और वह फिर कितना भी सर फोड़ते तब भी नहीं हटाते. एस.एम.एस. भी किया होता तब भी ऐसे ही चिपकाना था. लेकिन फोन की बात को कैसे पोस्ट मे चिपकाते इसलिये हमने उनसे विनती की (इससे पहले तक निवेदन करते थे लेकिन अब पंगेबाज का रुतबा भी बढ़ चुका है जी) कि भाईसाहब हमारी पोस्ट पर आकर एक टिप्पणी के माध्यम से इसकी पुष्टि कर दो.

उन्होने हमारी विनती सुन ली. आजकल भगवान तो किसी को सुनते नहीं है लेकिन उन्होने सुन ली. सुबह उठकर ब्लॉग देखा तो उनकी टिप्पणी थी.

हम ब्लॉगवाणी के प्रवक्ता के नाते ऊपर वाली खबर की पुष्टि करते हैं और यह विश्वास दिलाते हैं कि गूगल ब्लॉगवाणी से जुड़े हर ब्लॉगर को एक एक लाख रुपया दिया जायेगा.काकेश जी के ब्लॉग के जरिये सभी को इस डील के बारे में पता चला इसलिये उन्हे भी सात % धन दिया जायेगा. वह चाहें तो नयी कंपनी में भी कोई उच्च पद संभाल सकते हैं.

अब अन्धा क्या चाहे दो आंख हम तो सिर्फ काने ही हैं एक से ही काम चलेगा जी. तो हम तो इस चीज की प्रतीक्षा में हैं कि हमें कौन सा उच्च पद प्रदान किया जायेगा. सुबह अरुण जी से फिर बातें हुई तो उन्होने बताया कि ब्लॉगवाणी से जुड़े सारे ब्लॉगर्स को दो दिन,दो रात का गोवा भ्रमण मुफ्त में कराया जायेगा.

यह तो हम सब के लिये बड़े काम की खबर. करना सिर्फ यह है कि जाने के इच्छुक सभी ब्लॉगर्स को इस पोस्ट पर टिप्पणी करनी है. उनके नाम का टिकट बना दिया जायेगा. दिनांक एक अप्रेल 2008 को सुबह नौ बजे की गो-एयर की फ्लाइट से हम सभी गोवा के लिये रवाना होंगे. रास्ते में सभी को भांग की ठंडाई भी सर्व की जायेगी. उम्मीद है कि सिरिल जी (अब तो जी कहना ही पड़ेगा ना) अपने मर्जर अनुभवों से हम सभी को परिचित करवाऐंगे.

इस बढिया काम के लिये ब्लॉगवाणी को बधाई. इच्छुक ब्लॉगर भांग पीने और होली खेलने से पहले अपनी टिप्पणी कर जायें. ताकि हम भांग का नशा उतरने के बाद आपके टिकट बनवा सकें.

ब्लॉगवाणी की ओर से यह अपील मैं उच्च पद प्राप्त करने के नाते आप सभी से कर रहा हूँ.

 

आपके सहयोग का आकांक्षी

काकेश

उच्च पद (गूगल-ब्लॉगवाणी)  

Mar 212008
 

यह रुत्ब-ए-बुलंद मिला जिसको मिल गया : तहसीलदार ने जनाने से अपने बेटों को बुलाया और उनसे कहा-चचाजान को आदाब करो। यह कल से तुम्हें पढ़ाने आयेंगे। बड़े और छोटे ने आदाब किया। मंझले ने दायें हाथ से ओक बनाया और झुक-झुक कर दो बार आदाब करने के बाद तीसरी बार झुका तो साथ ही मुंह भी चिढ़ाया।

अब तहसीलदार का मूड बदल चुका था। लड़के लाइन बना कर वापस चले गये तो वो बिशारत से कहने लगा ‘‘परसों ज्योग्राफ़ी की टीचर की जगह के लिये इन्टरव्यू है। मैं आपको सैलेक्शन कमेटी का मैम्बर बना रहा हूं। धार्मिक विषयों का टीचर इस लायक़ नहीं कि कमेटी का मैम्बर रहे। मौली मज्जन को ख़बर कर दी जायेगी। यह सुनते ही बिशारत को गुदगुदियां होने लगीं। उस वक़्त कोई उन्हें वायसराय बना देता तब भी इतनी ख़ुशी न होती। अब वो भी इन्टरव्यू में अच्छे-अच्छों को ख़ूब रगेदेंगे और पूछेंगे कि मियां तुम डिग्रियां बग़ल में दबाये अफ़लातून बने फिरते हो, जरा यह तो बताओ कि दुनिया गोल क्यों बनायी गयी है? बड़ा मजा आयेगा। यह इज्जत किसे नसीब होती है कि अकारण जलील होने के फ़ौरन बाद दूसरों को अकारण जलील करके हिसाब बराबर कर दे। उनके घायल स्वाभिमान के सारे घाव पल भर में भर गये।

मारे ख़ुशी के वो यह भी स्पष्ट करना भूल गये कि बन्दा हर इन्टरव्यू के बाद न आवाज लगायेगा, न घंटा बजायेगा। चलने लगे तो तहसीलदार ने मटमैले क़ानूनगो को आंखों से कुछ इशारा किया और उसने पन्द्रह सेर गेहूं और एक हांडी गन्ने के रस की साथ कर दी। उसे यह भी हिदायत दी कि कल मास्टर साहब के घर जवासे की एक गाड़ी डलवा देना और बेगार में किसी पन्नीगर को भेज देना कि हाथों-हाथ टट्टी बना दे। उस जमाने में जो लोग ख़स की क्षमता नहीं रखते थे वो जवासे के कांटों की टट्टी पर सब्र करते थे और जो इस क़ाबिल भी नहीं होते थे, वो ख़स की पंखिया पर कोरी ठिलिया का पानी छिड़क लेते। उसे झलते-झलते जब नींद का झोंका आता तो ‘‘ख़सख़ाना-ओ-बर्फ़ाब की ख़्वाबनाक ख़ुन्कियों’’ में उतरते चले जाते।

उर्दू टीचर के कर्मक्षेत्र से बाहर के दायित्व : अगले दिन बिल्कलु तडक़े बिशारत अपनी ड्यूटी पर हाजिर हो गये। मौलवी मुजफ़्फ़र ने उनसे ड्यूटी ज्वाइन करने की लिखित रिपोर्ट ली कि आज सुब्ह ग़ुलाम ने नियमानुसार चार्ज संभाल लिया।चार्ज बहुत धोके में डालने वाला शब्द है वरना हक़ीक़त सिर्फ़ इतनी थी कि जो चीजें चार्ज में दी गयी थीं वो बग़ैर चार्ज के भी कुछ ऐसी असुरक्षित न थीं।

खादी का डस्टर-डेढ़ अदद, हाथ का पंखा-एक अदद रजिस्टर हाजरी-एक अदद मिट्टी की दवात-दो अदद। मौलवी मुजफ़्फ़र ने ब्लैक बोर्ड का डस्टर उन्हें सौंपते हुए चेतावनी दी कि देखा गया है मास्टर साहिबान चाक के मुआमले में बहुत फ़ुजूलख़र्ची करते हैं, इसलिये स्कूल की कमेटी ने यह फ़ैसला किया है कि आइन्दा मास्टर साहिबान चाक ख़ुद ख़रीद कर लायेंगे। खजूर के पंखे के बारे में भी उन्होंने सूचना दी कि गर्मियों में एक ही उपलब्ध कराया जायेगा। मास्टर बिल्कुल लापरवाह साबित हुए हैं। दो ही हफ़्तों में सारी बुनाई उधड़ कर झंतूरे निकल आते हैं और अक्सर मास्टर साहिबान छुट्टी के दिन स्कूल का पंखा घर में इस्तेमाल करते हुए देखे गये हैं। कई तो इतने आरामतलब और काहिल हैं कि उसी की डंडी से लौडों को मारते हैं, हालांकि दो क़दम पर नीम का पेड़ बेकार खड़ा है। हां! मौलवी मुजफ़्फ़र ने एक होल्डर (लकड़ी का निब वाला क़लम) भी उनके चार्ज में दिया जो उनके पूर्ववर्तियों ने दातुन की तरह इस्तेमाल किया था। इसका आधे से अधिक हिस्सा चिन्तन-मनन के समय लगातार दांतों में दबे रहने के कारण झड़ गया था। बिशारत को इस ग़लत इस्तेमाल पर बहुत ग़ुस्सा आया कि वो अब इससे नाड़ा नहीं डाल सकते थे।

चार्ज पूरा होने के बाद बिशारत ने कोर्स की किताबें मांगी तो मौलवी मुजफ़्फ़र ने सूचना दी कि स्कूल कमेटी के रिजोल्यूशन नं.-5 तारीख़ 3 फ़रवरी 1935 के अनुसार मास्टर को कोर्स की किताबें अपनी जेब से खरीद कर लानी होगी। बिशारत ने जल कर पूछा “सब’’ यानी कि पहली क्लास से लेकर आठवीं तक? फ़रमाया, “तो क्या आपका ख़याल है आप पहली क्लास के क़ायदे से आठवीं का इन्तहान दिलवा देंगे।“

मौलवी मुजफ़्फ़र ने चलते-चलते यह भी सूचना दी कि स्कूल कमेटी फ़िजूल के ख़र्चे कम करने की ग़रज से ड्रिल मास्टर की पोस्ट ख़त्म कर रही है। ख़ाली घंटों में आप पड़े-पड़े क्या करेंगे? स्टाफ़-रूम ठाली मास्टरों के ऐंडने और लोटें लगाने के लिये नहीं है। खाली घंटों में ड्रिल करा दिया कीजिये, (पेट की तरफ़ इशारा करके) बादी भी छंट जायेगी। जवान आदमी को चाक-चैबंद रहना चाहिये। बिशारत ने विनम्र अस्वीकार से काम लेते हुए कहा ‘‘मुझे ड्रिल नहीं आती।’’ बहुत मीठे और धीमे लहजे में उत्तर मिला, “कोई बात नहीं, कोई भी मां के पेट से ड्रिल करता हुआ तो पैदा नहीं होता, किसी भी लड़के से कहियेगा, सिखा देगा। आप तो माशाअल्लाह से जहीन आदमी हैं। बहुत जल्द सीख जायेंगे। आप तो टीपू सुल्तान और स्पेन के जीतने वाले तारिक़ का नाम लेते हैं।“

बिशारत बड़ी मेहनत और लगन से उर्दू पढ़ा रहे थे कि दो ढाई हफ़्ते बाद मौलवी मुजफ़्फ़र ने अपने दफ़्तर में तलब किया और फ़र्माया कि आप तो मुसलमान के बेटे हैं जैसा कि आपने दरख़्वास्त में लिखा था। अब जल्दी से जनाज़े की नमाज पढ़ाना और नियाज देना सीख लीजिये। वक़्त, बेवक़्त, जुरूरत पड़ती रहती है। नमाज़े-जनाजा तो कोर्स में भी है। हमारे जमाने में तो स्कूल में शवस्नान भी कम्पलसरी था। धार्मिक विषय के टीचर की बीबी पर बाराबंकी में जिन्न दोबारा सवार हो गया है। रातों को चारपाई उलट देता है। उसे उतारने जा रहा है। पिछले साल एक पड़ौसी का जबड़ा और दो दांत तोड़ कर आया था। उसकी जगह आपको काम करना होगा। जाहिर है! उस हरामख़ोर के बदले काम करने के लिये आसमान से फ़रिश्ते तो आने से रहे।

तीन-चार दिन का भुलावा दे कर मौलवी मुजफ़्फ़र ने पूछा, ‘‘बर्ख़ुरदार आप इतवार को क्या करते रहते हैं?’’ बिशारत ने जवाब दिया, ‘‘कुछ नहीं।’’ फ़रमाया, “तो यूं कहिये! केवल सांस लेते रहते हैं। यह तो बड़ी बुरी बात है। सर मुहम्मद इकबाल ने कहा है कभी ऐ नौजवां मुस्लिम तदब्बुर भी किया तूने, जवान आदमी को इस तरह हाथ पर हाथ धरे बेकार नहीं बैठना चाहिये। जुमे को स्कूल की छुट्टी जल्दी हो जाती है। नमाज के बाद यतीमखाने की चिट्ठी-पत्री देख लीजिये। आप तो घर के आदमी हैं आप से क्या परदा, आपकी तनख़्वाहें दरअस्ल यतीमख़ाने के चंदे से ही दी जाती हैं। तीन महीने से रुकी हुई हैं। मेरे पास इलाहदीन का चराग़ तो है नहीं। दरअस्ल यतीमों पर इतना खर्च नहीं आता, जितना आप हजरात पर। इतवार को यतीमख़ाने के चंदे के लिये अपनी साइकिल ले कर निकल जाया कीजिये। पुण्य कार्य भी है और आपको बेकारी की लानत से भी छुटकारा मिल जायेगा, सो अलग। आस-पास के देहात में अल्लाह के करम से मुसलमानों के काफ़ी घर हैं। तलाश करने से ख़ुदा मिल जाता है। चंदा देने वाले किस खेत की मूली हैं।’’

बिशारत अभी सोच ही रहे थे कि चंदा देनेवाले को कैसे पहचानें और ढूंढ़ेंगे कि इतने में सर पर दूसरा बम गिरा। मौलवी मुजफ़्फ़र ने कहा कि चंदे के अलावा आस-पास के देहात से सही यतीम भी तलाश कर लाने होंगे।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

इस भाग की अन्य कड़ियां.

1. फ़ेल होने के फायदे 2. पास हुआ तो क्या हुआ 3. नेकचलनी का साइनबोर्ड 4. मौलवी मज्जन से तानाशाह तक 5. हलवाई की दुकान और कुत्ते का नाश्ता 6. कुत्ता और इंटरव्यू 7. ब्लैक होल ऑफ़ धीरजगंज 8. कोई बतलाओ कि हम बतलायें क्या? 9. विशेष मूली और अच्छा-सा नाम

पहला भाग

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

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चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: पुस्तक चर्चा, समीक्षा, काकेश, विमोचन, हिन्दी, किताब, युसूफी, व्यंग्य

Mar 202008
 

हिन्दी ब्लॉगिंग में हम अक्सर चिट्ठों के जरिये कमाई की बात करते हैं. लेकिन अभी  भी हिन्दी कंटेंट के लिये बहुत से माध्यम ऐसे नहीं हैं जिनके जरिये कमाई की जा सके. ले देकर लोग ऐडसैंस की ही बात करते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं एडसैंस के अलावा भी कुछ तरीके हैं जिनका इस्तेमाल करके भी कुछ कमाई की जा सकती है.

ऐसी ही एक सेवा के बारे में आज आपको बताने जा रहा हूँ. यह सेवा है कन्ड्यूट डॉट कॉम की. इस साइट में आप खुद को रजिस्टर करवा कर अपना टूल बार बना सकते हैं. रजिस्टर करते ही यह साइट आपके खाते में 100 डॉलर (लगभग चार हजार रुपये) डाल देती है. लेकिन यह 100 डॉलर आपको तब तक  नहीं मिलते जब तक की आप के खाते जी रकम 250 डॉलर यानि (लगभग दस हजार रुपये ) नहीं हो जाती. यह रकम आपके पे-पाल के खाते में हर महीने जमा होती रहेगी.

आपकी यह रकम आपके टूलबार के प्रयोक्ता बढ़ने पर बढ़ती रहेगी. आप कितने पैसे कमा सकते हैं वह इस बात पर निर्भर करता है कि आपके हर महीने कितने नये प्रयोक्ता बन रहे हैं और पुराने प्रयोक्ता आपके टूलबार को कितना प्रयोग में ला रहे हैं. इस साइट पर जाके आप अपनी कमाई का हिसाब भी लगा सकते हैं.

इसी हिसाब के अनुसार यदि आप हर महीने 14 डॉलर ( लगभग 560 रुपये) से लेकर 1440 डॉलर (लगभग 57,000 रुपये)  तक कमा सकते हैं.तो है ना फायदे का सौदा. ना आपको कंटेंट लिखना ना ही टिप्पणी करनी बस अपने टूलबार का प्रचार कर उसके डाउनलोड बढ़वाइये और घर बैठे पैसा कमाइये.  

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Mar 202008
 

पिछ्ले अंक में हमने होली के तीन प्रमुख रूपों की चर्चा की थी. आज हम उसी में से एक रूप खड़ी होली की चर्चा ‘छालड़ी’ के संबंध में करेंगे.जिस दिन देश, दुनिया के अन्य भागों में होली मनायी जाती है उस दिन कुमांऊ में मुख्य होली होती है जिसे “छरड़ी” या “छालड़ी” कहते हैं. यह फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनायी जाती है. इस दिन पानी और रंगों से होली खेली जाती है.

सुबह होते ही घरों में इस होली की तैयारियाँ शुरु हो जाती हैं.एक थाली में अबीर गुलाल रखा जाता है.घर के सदस्यों के लिये आमतौर पर पूरी और आलू के गुटके (आलू की सूखी सब्जी) बनाये जाते हैं. होली में अबीर लगाने वाले लोगों के लिये कुछ चिप्स,पापड़ तले जाते हैं. कुछ लोग आलू,चने या छोले,पकोड़ी आदि भी बनाते हैं. भांग की पकोड़ी भी कुछ जगह बनायी जाती है. पूरी-आलू खाने के बाद घर के पुरुष पहले अबीर लगाने के लिये निकलने की तैयारी करते हैं. अपने होली के कपड़े पहनते हैं. रुमाल की एक पोटली में सूखा अबीर गुलाल रखते हैं. आजकल रुमाल की जगह पॉलीथीन के पैकेट का इस्तेमाल भी लोग करते हैं. जो लोग गीला रंग लगाना चाहते हैं वो एक रुमाल में कोई गाढ़ा रंग रख कर उसे हल्के पानी से भिगा देते हैं और उसे भी एक पॉलीथीन के पैकेट में रख अपनी जेब में डाल लेते हैं.जब भी किसी को गीला रंग लगाना हो तो रुमाल को थोड़ा गीला किया और चुपड़ दिया मुंह में रंग.       

होली की पोशाक पहनने के बाद सबसे पहले द्य्प्ताथान (घर का मंदिर) में भगवान को अबीर-गुलाल लगाया जाता है. फिर घर के सभी सदस्य एक दूसरे को अबीर-गुलाल का टीका लगाते हैं. अपने से बड़े लोगों को पांव छूके या हाथ जोड़ कर नमस्कार किया जाता है. समवयस्क पुरुष और महिलाएं एक दूसरे के गले मिलते हैं.उसके बाद घर के पुरुष अपने अपने दोस्तों के साथ पूरे गांव, मोहल्ले या अपने नाते-रिश्तेदारों के यहाँ अबीर का टीका करने के लिये निकलते हैं.

सुबह दस – साढ़े दस बजे तक सब गांव या मोहल्ले के प्रमुख शिव मन्दिर पर एकत्र होते हैं.यह शिव मंदिर वही होता है जहां सामुहिक चीर बांधी गयी थी. ‘छलड़ी’ के पहले दिन इसी स्थान पर चीर दहन होता है.”छलड़ी’ के दिन होल्यार सबसे पहले चीर दहन की राख का टीका करते हैं और फिर  कोई ढोलक पकड़ता है, कोई मजीरा, कोई झांझर,तो कोई ढपली. होली खेलने वालों को होल्यार कहा जाता है. यह सभी होल्यार शिवमंदिर में शिव की होली से शुरुआत करते हैं.

” अरे हाँ हाँ जी शंभो तुम क्यों ना खेलो होरी लला,
अच्छा हाँ हाँ जी शंभो तुम क्यों ना खेलो होरी लला.
ब्रह्मा जी खेलें , बिष्णु जी खेलें. खेलें गणपति देव
शंभो तुम क्यों ना खेलो होरी लला.
हाँ हाँ जी शंभो तुम क्यों ना खेलो होरी लला. ”

फिर अन्य होलियां गायी जाती हैं जैसे.

“अरे अंबारी एक जोगी आया लाल झुमैला वाला वे
ओहो लाल झुमैला वाला वे ”

होल्यार अपने जुलूस का एक मुखिया चुन लेते हैं जो पूरी होली को नियंत्रित करता है. इसके बाद गांव/मोहल्ले के हर घर में होल्यार जाते हैं जहाँ उनके लिये पहले से दरियां बिछायी गयी होती हैं.सभी होल्यार पहले बैठ के होली गाते हैं. घर के लोग होल्यारों का स्वागत करते हैं. घर का मुखिया सभी होल्यारों को अबीर का टीका लगाता है. उनका स्वागत चिप्स,पापड़,कटे हुए फल, गुझिया, सौप,सुपारी, गरी आदि से किया जाता है कुछ लोग चाय भी पिलाते हैं. घर का मुखिया जुलूस के मुखिया को कुछ पैसे भी देता है. हर घर से कुछ कुछ पैसे लिये जाते हैं. इन पैसों से या तो सामुहिक भंडारा होता है या पूरे मोहल्ले में मिठाई बांटी जाती है या फिर सामुहिक महत्व की चीजें जैसे ढोलक,मजीरा आदि खरीद लिया जाता है.

अंत में होल्यार दरी से उठ कर खड़े होकर होली गाते हैं…घर के सदस्य घर के खिड़कियों जिन्हे पहाड़ में छाजा कहा जाता है उससे रंग वाला पानी डालते हैं. तब बढ़े बूढ़े आगे पीछे हो जाते हैं और युवा लोग मोर्चा संभालते हैं और भीगते भीगते चिढ़ाने के लिये होली गाते रहते हैं.इसमें थोड़ी अश्लीलता का पुट भी कभी कभी आ जाता है जैसे

“कहो तो यहीं रम जायें गोरी नैना तुम्हारे रसा भरे,
कहो तो यहीं रम जायें गोरी नैना तुम्हारे रसा भरे
उलटि पलट करि जायें  गोरी नैना तुम्हारे रसा भरे
कहो तो यहीं रम जायें गोरी तबले तुम्हारे कसे हुए

या फिर

“सिप्पय्या आंख मार गयो रात मोरे सय्यां ,
सिप्पय्या आंख मार गयो रात मोरे सय्यां “
जबहि सिपय्या ने ….. भरतपुर लुट गयो रात मोरे सय्यां
 

कुछ दिनों पहले इस गाने को किसी फिल्म में भी लिया गया था लेकिन मैने यह गाना फिल्म से बहुत पहले होलियों में सुना व गाया था.

यह सफर आगे जारी रहेगा …अभी कुछ अच्छे गाने आपको सुना दूँ….

सतरंगी रंग बहार ,  होली खेल रहे नर नारी
कोई लिये हाथ पिचकारी,कोई लिये फसल की डारी
घर घर में धूम मचाय,होली खेल रहे नर नारी
सतरंगी रंग बहार ,  होली खेल रहे नर नारी
कोई नाच रहा कोई गाये कोई ताल मृदंग बजाये
घर घर में धूम मचाय, होली खेल रहे नर नारी.

[इस गाने को mp3 फोर्मेट में डाउनलोड करने के लिये यहाँ क्लिक करें. साइज 1.7 MB]

झुकि आयो शहर में ब्यौपारी, झुकि आयो शहर में ब्यौपारी
इस ब्यौपारी को भूख बहुत है,पुरियां पकाय दे नथवाली.
झुकि आयो शहर में ब्यौपारी
इस ब्यौपारी को प्यास बहुत है,पनिया पिलाय दे नथवाली.
झुकि आयो शहर में ब्यौपारी
इस ब्यौपारी को नींद बहुत है,पलेंग बिछाय दे नथवाली.
झुकि आयो शहर में ब्यौपारी

[इस गाने को mp3 फोर्मेट में डाउनलोड करने के लिये यहाँ क्लिक करें. साइज 2.0 MB]

पिछले भाग की पॉडकास्ट यदि आप सुनना चाहें तो वह भी सुनें. इस पॉडकास्ट के अंत में दो होलियाँ भी गायी गयी हैं जिसका अनुरोध संजू भाई ने किया था.

[इस पॉडकास्ट को mp3 फोर्मेट में डाउनलोड करने के लिये यहाँ क्लिक करें. साइज 4.28 MB]

 

पिछ्ले अंक में दिल्ली संतनगर बुराडी से खीम सिंह रावत जी ने एक बहुत ही अच्छी होली भेजी थी. वह होली इस प्रकार थी.

प्रभु ने धारो वामन रूप , राजा बली के दुआरे हरी
राजा बली को अरज सुना दो , तेरे दुआरे अतिथि हरी
मांग रे वमणा जो मन ईच्छा , सो मन ईच्छा में देऊं हरी

हमको दे राजा तीन पग धरती, काँसे की कुटिया बनाऊं हरी
मांग रे बमणा मांगी नी ज्याण , के करमो को तू हीना हरी
दू पग नापो सकल संसारा , तिसरौ पग को धारो हरी
राजा बलि ने शीश दियो है, शीश गयो पाताल हरी

पांचाला देश की द्रोपदी कन्या, कन्या स्वयंबर रचायो हरी
तेल की चासनी रूप की मांछी, खम्बा का टूका पर बांधो हरी
मांछी की आंख जो भेदी जाले, द्रोपदी जीत लिजालो हरी
दुर्योधनज्यू उठी बाण जो मारो, माछी की आंख ना भेदो हरी
द्रौपदी उठी बोल जो मारो , अन्धो पिता को तू चेलो हरी
कर्णज्यू उठी बाण जो मारो, माछी की आंख ना भेदो हरी
द्रौपदी उठी बोल जो मारो , मैत घरौ को तू चेलो हरी
अर्जुनज्यू उठी बाण जो मारो, माछी की आंख को भेदो हरी
अर्जुनज्यू उठें द्रौपदी लै उठी, जयमालै पहनायो हरी

पैली शब्द ओमकारा भयो है, पीछे विष्णु अवतार हरी
बिष्णु की नाभी से कमलक फूला, फूला में ब्रह्मा जी बैठे हरी
ब्रह्मा जी ने सृष्टि रची है , तीनों लोक बनायो हरी
पाताल लोक में नाग बसो है , मृत्युलोक में मनुया हरी
स्वर्गालोक में देव बसे हैं , आप बसे बैकुंठ हरी

रावत जी से निवेदन है कि यदि वह पढ़ रहे हैं तो अपना ई-मेल आई डी बतायें जो आई-डी उन्होने पिछ्ली बार छोड़ा था उस पर मेल करने से मेल वापस आ गयी.

इस श्रंखला के अन्य लेख

1. कुमांऊनी होली : अलग रंग अलग ढंग

जारी …………………….

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