ईजा ने अपने सर के ऊपर से हरी घास का गट्ठा भीणे (चबूतरा) में रखा तो उसकी आवाज से परुली और उसके बाबू दोनों की सोच टूटी. शाम अब पहाड़ों से उतरकर पेड़ों के रास्ते होते हुए आंगन में आ चुकी. पर्याप्त अन्धेरा हो चुका था. गोठ में गोरु-बाछ भी भूख के मारे अड़ाट कर रहे थे. उनको भी अभी तक घास नहीं डाली थी. ईजा के आते ही परुली हाथ के झूठे गिलास को लेकर उठी.
मर्द ऐसे मौक़ों पर ख़ून कर देते हैं और नामर्द ख़ुदकुशी कर लेते हैं। उन्होंने यह सब कुछ नहीं किया, नौकरी की जो क़त्ल और ख़ुदकुशी दोनों से कहीं जियादा मुश्किल है।
चमगादड़ सब्जियां वायु खोलने वाली होती हैं। इससे उनका तात्पर्य उन पौधों से था जो अपने पैर आसमान की तरफ़ किये रहते हैं। जैसे गाजर, गोभी, शलग़म। फिर उन्होंने पत्ते देख कर यह पहचानना बताया कि कौन-सी मूली तीखी फुफ्फुस निकलेगी और कौन-सी जड़ेली और मछेली।
होली का त्यौहार मस्ती,उल्लास और मौज मजे का पर्व है. दुनिया में सभी जगह होली बड़ी ही धूमधाम से मनाई जाती है.लेकिन कुमाऊंनी होली का अपना एक अलग ही रंग है, पूरे विश्व में इस होली की अलग पहचान है. यहाँ होली मात्र एक दिन का त्यौहार नहीं बल्कि कई दिनों तक चलने वाला [आगे पढ़ें.....]
आज पहली बार उसे गोल्ज्यू का ध्यान आया. उसने सुना था गोल्ज्यू से कुछ भी मांगो वह मिल जाता है. उसने सवा रुपये का उचैण (करार) अलग रखा और मन ही मन गोल्ज्यू से कहा कि गोल्ज्यू मुझे डॉक्टर बना देना.आपके थान आके एक घंटी जरूर चढ़ाउंगी.
दिखने से कुछ नहीं होता। सरकार को दिखना चाहिए। सरकार इस बात की जांच करेगी कि मेरा मुण्डन हुआ है या नहीं। एक सदस्य ने कहा- इसकी जांच अभी हो सकती है। मंत्री महोदय अपना हाथ सिर पर फेरकर देख लें। मंत्री ने जवाब दिया- मैं अपना हाथ सिर पर फेरकर हर्गिज नहीं देखूंगा। सरकार इस मामले में जल्दबाजी नहीं करती।
इंटरव्यू दोबारा शुरू हुआ तो जिस शख़्स को चपरासी समझे थे, वो खाट की अदवायन पर आ कर बैठ गया। वो धार्मिक विषयों का मास्टर निकला जो उन दिनों उर्दू टीचर की जिम्मेदारी भी निभा रहा था। इन्टरव्यू में सबसे जियादा धर-पटक उसी ने की।
हवा में हुक़्के, पान के बनारसी तम्बाक़ू, कोरी ठिलिया, कोने में पड़े हुए खरबूज़े के छिलकों, ख़स के इत्र और गोबर की लिपाई की ताजा गंध बसी हुई थी और उन पर हावी भबका था जिसके बारे में विश्वास से नहीं कहा जा सकता था कि यह देसी जूतों की बू है जो पैरों से आ रही है या पैरों की सड़ांध है जो जूतों से आ रही है।
दूर पहाड़ों को देखते देखते ही तो उसने कल्पना की थी कि इन्ही पहाड़ों के उस पार होगा कोई एक शहर. जहाँ यह लाइट टिम टिम करती हैं. उसके घर में तो लम्फू (मिट्टी तेल का लैम्प) का उजाला होता है या छिलुके का. वह सोचती थी कि कभी वह उस पार जायेगी. एक बड़े शहर में कदम रखेगी.बिजली के लैप देखेगी. न जाने कितनी कल्पनाऎं.
स्वामी जी और गब्बर सिंह
ये हमारा बाप हरी सिंह हमारा नाम पूरा मिटटी में मिला दिए हैं….अरे क्या जरूरत थी उनको टिपियाने की? और सबको बताने की, की उनकी माली हालत ख़राब है… ई का नाम है हाँ…अलोक पुराणिक का ब्लॉग पढने का जुगाड़ कर लिए वो और नमक का जुगाड़ नहीं कर पाए ..धिक्कार है….