बाबू से बात करने के बाद परुली सोच में पड़ गयी.वह ऐसा क्या करे कि उसका ब्या रुक जाये. उसके सामने बहुत से विकल्प नहीं थे. वह एक दो बार मना जरूर कर सकती थी कि वह ब्या नहीं करेगी.लेकिन फिर भी उसके ईजा बाबू ना माने तो उसके हाथ में कुछ नहीं था और यदि उसका स्कूल जाना बंद हो गया तब…तब तो जैसे सारे रास्ते ही बंद हो जायेंगे. परुली का मन हुआ कि वह कहीं भाग जाये लेकिन कहाँ जायेगी वह उसे तो कुछ भी नहीं मालूम. वह तो अपने गांव और पास के शहर के रास्ते के अलावा कुछ भी नहीं जानती.

सामने के पहाड़ों के ऊपर से शाम धीरे धीरे उतर रही थी. घर के बहुत से काम पड़े थे. लेकिन परुली चाख के छाजे में बैठ कर सामने के पहाडों को ताक रही थी. उसके अन्दर एक तूफान उठ रहा था. वह सोच रही थी कि कितनी विवश है वह. वह जो चाहती है उसे पूरा भी नहीं कर सकती.सामने के पहाड़ों पर कुछ बत्तियां अब जलने लगीं थी लेकिन अभी परुली के घर में अंधेरा ही था. शाम को चिमनी वाला लैम्प और लम्फू जलाने की जिम्मेवारी परुली की ही थी.लेकिन आज उसे कुछ भी याद ना था. 

इधर उसके बाबू गुस्से में थे.बीढ़ी पीते हुए वह सोच रहे थे कि किसी तरह से यह ब्या हो जाये तो उनकी सांस में सांस आये.मन ही मन वह यह भी सोच रहे थे कि यदि परुली डॉक्टर बन जाये तो पूरे गांव में उनका नाम तो हो ही जायेगा. लेकिन डॉक्टर बनना कोई आसान काम तो है नहीं. छ्ह सात साल तो लगेंगे ही. फिर डाक्टर बनने के बाद बिरादरी में लड़का कहाँ मिलेगा. कोई भी लड़का यहाँ इतना पढ़ा लिखा होता ही नहीं है. बहुत से बहुत  इंटर कर लिया और लग गये कहीं नौकरी में या चले गये लखनऊ, दिल्ली. कोई ज्यादा ही अच्छा हुआ पढ़ने में तो बी.ए. कर लिया, बी.टी.सी. कर लिया और बन गये किसी स्कूल के मास्टर.परुली डाक्टर बन भी गयी तो सारी उमर कुंवारा बैठना पड़ेगा.बदनामी होगी सो अलग.लोग तरह तरह की बातें बनायेगें कि लड़की में पक्का कोई खोट होगा तभी तो इसका ब्या नहीं हो रहा.ना हो ना … इससे तो अच्छा है कि किसी तरह से ब्या हो जाये तो पिंड छूटे. 

ईजा ने अपने सर के ऊपर से हरी घास का गट्ठा भीणे (चबूतरा) में रखा तो उसकी आवाज से परुली और उसके बाबू दोनों की सोच टूटी. शाम अब पहाड़ों से उतरकर पेड़ों के रास्ते होते हुए आंगन में आ चुकी. पर्याप्त अन्धेरा हो चुका था. गोठ में गोरु-बाछ भी भूख के मारे अड़ाट कर रहे थे. उनको भी अभी तक घास नहीं डाली थी. ईजा के आते ही परुली हाथ के झूठे गिलास को लेकर उठी.

“परुली …के हगो रे तुकु (क्या हो गया रे तुझे) ..अभी तक घर में उजेला नहीं किया.”

“हाँ ..ईजा ..कर रही हूँ …”.परुली उठते हुई बोली और जल्दी जल्दी घर के सारे काम निपटाने लगी .परुली को खुद अपनी सोच पर गुस्सा आया कि घर के इतने सारे काम पड़े थे और वह ना जाने क्या सोच रही थी.

“जा ..भ्योल घुरी जा … (गुस्से में एक गाली की तरह इस्तेमाल किया जाता है) .. अभी तक गोर-बाछों को घास भी नहीं डाली.अब मैं दूध क्या तेरे कपाव से निकालूं. तेरी पढाई के चक्कर में घर का सत्यानाश हो रहा है. रुक… कहती हूँ तेरे बाबू से कि इसका स्कूल बन्द करवा दो”

जिसको देखो उसके स्कूल के पीछे पड़ा है. छारे (राख) से चाय के बर्तन मांजते हुए वह सोच रही थी कि उसका ब्या हो जायेगा तो फिर ये सब काम कौन करेगा. तब तो ईजा को ही यह सब करना पड़ेगा तो फिर अभी क्यों उसकी ईजा उस पर इतना चिल्लाती है. ठीक है …हो जाने दो मेरा ब्या …फिर पता चलेगा कि मैं कितना काम करती हूँ.वह बड़बड़ाई. 

उसके बाबू शाम से ही ईजा से एकांत में बात करने का मौका ढूंढ रहे थे.लेकिन ईजा आते ही सारे कामों व्यस्त हो गयी.रात का खान भी हो गया लेकिन बात करने का मौका ही नहीं मिला.बाबू चाख में बड़बाज्यू के साथ सोते थे. बड़बाज्यू जल्दी सो जाते थे और उनको कान भी कम ही सुनाई पड़ता था. तो आमतौर पर सोने से पहले ईजा-बाबू थोड़ी देर बात करते. तब तक बच्चे बिचाखंड (बीच वाला कमरा) में सो जाते. आज भी वही हुआ.

“हवे… सुणो त्वील (सुना तुमने) ..कि परुली क्या कह रही थी आज “

गरम दूध को ठंडा करने के लिये गिलास से लोटे में डाल कर गिलास में फूँक मारते हुए ईजा बोली…” ना हो …के कुणेछि ? ( क्या कह रही थी)”

” कह रही थी कि मैं ब्या नहीं करुंगी ..”

“किलै (क्यों) ?? ” दूध से ध्यान हटा कर बाबू की ओर हल्की से नजर उठा कर देखते हुए ईजा चौंकते हुए बोली.

” कुणै (कह रही है) कि मैं डाक्टर बनुंगी”

ईजा की जान में जान आयी.वह तो सोच रही थी कि कोई गंभीर बात है. वह फिर से दूध के काम में व्यस्त हो गयी.

“हाँ वो तो मेरे को भी कह रही थी…कहने दो हो उसे …अभी नानतिन ठहरी ..किसी टीचर ने कुछ बोल दिया तो उसके दिमाग में बात बैठ गयी….ब्या हो जायेगा तो धीरे धीरे सब भूल जायेगी….” 

” लेकिन …उसने सब पता कर रखा है कि डॉक्टरी कैसे होती है …कौन सा इम्तान देना पड़ता है…”

“अच्छा”

” और आज बता रही थी कि कोई बैक से पैसा भी मिल जाता है बल डॉक्टरी पढ़ने के लिये.”

” होश्यार तो परु हुई ही .. शिबौ-शिब ..कितनी हौस (शौक) हो रही ठहरी उसे डॉक्टर बनने की. बन जाती तो पूरे गौं (गांव) में अपना नाम तो हो ही जाता…”. दूध का गिलास और मिसरी बाबू को पकड़ाते हुए ईजा बोली.

” वो तो ठीक ही ठहरा…मन तो मेरा भी यही कह रहा है.. लेकिन डॉक्टरी करने में छ: सात साल लगने वाले हुए ..फिर कौन करेगा इससे शादी… ” . मिसरी का टपुका लगाते हुए बाबू ने कहा.

“अरे हमारी परु इतनी देखण-चाण है ..इससे तो कोई भी ब्या कर लेगा हो …”

“तू भी पगली है… अरे डॉक्टरी करने के बाद कोई इंटर पास लड़के से जो क्या कर देंगे शादी. पढ़ा लिखा लड़का भी तो चाहियेगा ना ….वह कां (कहाँ) मिलेगा.. ”

” तो फिर ….यदि पांडे ज्यू से बात करें कि वो ब्या के बाद इसे पढ़ायें तो ब्या के बाद भी तो डॉक्टर बन सकती है …परु….”

” अरे पांडे ज्यू की इतनी खेतीबाड़ी है …चार चार गोरु हैं.. उनको कौन संभालेगा. उनकी घरवाली से अब नहीं संभलता इसीलिये तो वो काम करने वाली ब्वारी (बहू) लाना चाह रहे ठहरे…ब्या हो गया तो फिर थोड़ी होने वाली हुई पढ़ाई …घर के कामों में लगी रहेगी ये तो ..और फिर ब्या के बाद तो उनकी अमानत हुई ना ….हम जोर जो क्या डाल सकने वाले हुए…जैसा वो ठीक समझेंगे करेंगे…”    

” तब तो परु को डॉक्टर बनाने के लिये उसके ब्या को रोकना ही होगा…”

“तू भी ना क्या भ्यास (मूर्खों) जैसे बात करती है…सारे बिरादरी में सबको मालूम है परु के ब्या के बारे में ..यदि अब हम मना करेंगे तो  बिरादरी में नाक कट जायेगी.. सब लोग थू थू करेंगे..परु का जीना भी मुश्किल कर देंगे… ”

“तो के करी जौ (तो क्या किया जाय ) …”

“करना क्या है … जैसे गोल्ज्यू की दया से ब्या ठीक हुआ है …ब्या कर देते हैं…उसकी किस्मत में होगा तो बन जायेगी डॉक्टर… ”

” लेकिन किसी वजह से पांडे ज्यू राठ ही ब्या के लिये मना कर दें तो बात आयी गयी हो जायेगी. ”

” लेकिन वह मना क्यों करने वाले हुए अब तो चिन्ह भी साम्य हो गया ठहरा…बस लगन निकलना बांकी है ..वह भी कुछ दिनों में निकल जायेगा”

” के तो करौ हो (कुछ तो करो जी) “

” तू पड़ जा …मैं कुछ सोचुं.. ( तू सो जा मैं सोचता हूँ )

जारी……..

पिछले भाग : 1. परुली…. 2. परुली: चिन्ह साम्य होगा क्या ?? 3. परूली : शादी की तैयारी 4. परुली:आखिर क्या होगा ? 5. परुली: हिम्मत ना हार ..

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पिछ्ले अंक में नवीन पाठक जी ने कहा कि ” काकेश दा इसको लम्बा खीच रहे है…काकेश दा…… एक दिन पुरा बुद्दवार बैठ के कहानी को अन्जाम दे दो…” तो उनसे मैने कहा था कि इस इतवार इसको पूरा लिखने की कोशिश करुंगा लेकिन इतवार को समय ही नहीं मिल पाया. इसलिये आज सुबह चार बजे उठकर लिखने बैठा. काफी हद तक कहानी लाइन पर आ रही है. सोचता हूँ कि अगले अंक में इसे खतम कर ही  दूँ. जो भी होगा परुली का देखा जायेगा. हाँलाकि पाठकों का दबाब है कि परुली डाक्टर बन जाये लेकिन जैसा पिछ्ले अंक में मनीष सिंह बिष्ट ने कहा कि वह देखना चाहते हैं कि कैसे एक पहाड़ी लड़की संघर्ष करते हुए आगे बढ़ती है. तो सच कहूँ तो मुझे इस बात की बहुत कम संभावना लगती है कि परुली डॉक्टर बन पायेगी. लेकिन कहानी में एक लेखक के पास यह शक्ति होती है कि वह परिस्थितियों में सकारात्मक परिवर्तन कर पाये. तो देखें अगले बुधवार क्या होता है.

कल कुमांऊनी होली का अगला अंक प्रस्तुत किया जायेगा कृपया जरूर पधारें.

हुजूर फैजगंजूरू तहसीलदार साहब : दूसरे दिन बिशारत अपनी सारी दुनिया टीन के ट्रंक में समेट कर धीरजगंज आ गये। ट्रंक पर उन्होने एक पेंटर को चार आने दे कर अपना नाम, डिग्री, तख़्ल्लुस सफ़ेदे से पेंट करवा लिये। जो बड़ी कठिनाई से दो लाइनों में (बक्से की) समा पाये। यह ट्रंक उनकी पैदाइश से पहले का था, मगर उसमें चार लीवर वाला नया पीतली ताला डाल कर लाये थे। इसमें कपड़े इतने कम थे कि रास्ते भर, अन्दर रखा हुआ मुरादाबादी लोटा ढोलक बजाता आया। इसके शोर मचाने की एक वजह यह भी हो सकती है कि उनके ख़जाने में यह ताजा क़लई किया हुआ लोटा ही सबसे क़ीमती चीज था। अभी उन्होंने मुंह भी नहीं धोया था कि तहसीलदार का चपरासी एक लट्ठ और यह पैग़ाम ले कर आ धमका कि तहसीलदार साहब बहादुर ने याद फ़र्माया है। उन्होंने पूछा, “अभी!” बोला “और क्या! फ़ौरन से पेश्तर! बिलमवाजा, असालतन” चपरासी के मुंह से यह मुंशियाना जबान सुन कर उन्हें हैरत हुई और ख़ुशी भी, जो उस वक़्त ख़त्म हुई जब उसने यह पैग़ाम लाने का इनाम, दोपहर का खाना और सफ़रख़र्च इसी जबान में तलब किया। कहने लगा तहसील में यही दस्तूर है। बन्दा तो चाकर है। जब तक वो इन इच्छाओं पर ग़ौर करें, वो लट्ठ की चांदी की शाम को मुंह की भाप और अंगोछे से रगड़-रगड़ कर चमकाता रहा।

झुलसती, झुलसाती दोपहर में बिशारत डेढ़-दो मील पैदल चलकर हांपते-कांपते तहसीलदार के यहां पहुंचे तो वो दोपहर की नींद ले रहा था। एक-डेढ़ घंटे इंतजार के बाद वो अंदर बुलाये गये तो ख़स की ट्टटी की महकती ठंडक जिस्म में उतरती चली गई। लू से झुलसती हुई आंखों में एक दम ठंडी-ठंडी रौशनी-सी आ गयी। ऊपर छत से लटका हुआ झालरदार पंखा हाथी के कान की तरह हिल रहा था। फ़र्श पर बिछी चांदनी की उजली ठंडक उनकी जलती हुई हथेली को बहुत अच्छी लगी। जब इसकी तपिश से चांदनी गर्म हो जाती तो वो हथेली खिसका कर दूसरी जगह रख देते। तहसीलदार बड़े तपाक और प्यार से पेश आया। बर्फ़ में लगे हुए तरबूज की एक फांक और छिले हुए सिंघाड़े पेश करते हुए बोला, “तो अब अपने कुछ शेर सुनाइये जो बेतुके न हों, छोटी बहर में न हों, वज्न और तहजीब से गिरे हुए न हों।“ बिशारत शेर सुना कर दाद पा चुके तो उसने अपनी एक ताजा नज्म सुनाई।

वो अपनी रान खुजाये चला जा रहा था। टांगों पर मढ़े हुए चूड़ीदार पाजामे में न जाने कैसे एक भुनगा घुस गया था और वो ऊपर ही ऊपर चुटकी से मसलने की बार-बार कोशिश कर रहा था। कुछ देर बाद एक सुन्दर कमसिन नौकरानी नाजो ताजा तोड़े हुए फ़ालसों का शर्बत लायी। तहसीलदार कनखियों से बराबर बिशारत को देखता रहा कि नाजो को देख रहे हैं या नहीं। मोटी मलमल के सफ़ेद कुरते में क़यामत ढा रही थी। वो गिलास देने के लिए झुकी तो उसके बदन से जवान पसीने की महक आई और उनका हाथ उसके चांदी के बटनों के घुंघरूओं को छू गया। उसका आड़ा पाजामा रानों पर से कसा हुआ था और पैवंद के टांके दो-एक जगह इतने बिकसे हुए थे कि नीचे चंमेली बदन खिलखिला रहा था। शरबत पी चुके तो तहसीलदार कहने लगा कि आज तो ख़ैर आप थके हुए होंगे,

कल से मेरे बच्चों को उर्दू पढ़ाने आइये। जरा खिलन्दड़े हैं। तीसरे ने तो अभी क़ायदा शुरू ही किया है। बिशारत ने अनाकानी की तो एकाएक उसके तेवर बदल गये। लहजा कड़ा और कड़वा होने लगा। कहने लगा, जैसा कि आपको बख़ूबी मालूम था, है और हो जायेगा, आपकी अस्ल तनख़्वाह पच्चीस रुपये ही है। मैंने जो स्वयं पन्द्रह रुपये बढ़ाकर चालीस कर दिये तो दरअस्ल पांच रुपये फ़ी बच्चा ट्यूशन थी, वरना मेरा दिमाग़ थोड़े ही ख़राब हुआ था कि कालेज के निकले हुए नये बछड़े को मुसलमानों की गाढ़ी कमाई के चन्दे से पन्द्रह रुपये की नजर पेश करता। आख़िर को ट्रस्टी की कुछ जिम्मेदारी होती है। आपको मालूम होना चाहिए कि ख़ुद स्कूल के हैडमास्टर की तनख़्वाह चालीस रुपये है और वो तो बी.ए., बी. टी. (अलीगढ़) सैकिण्ड डिवीजन है। अमरोहे का है मगर निहायत शरीफ़ सय्यद है। अलावा, आप की तरह “सर मुंडवा के इश्क़िया शेर नहीं कहता।“

अंतिम सात शब्दों में उसने उनके व्यक्तित्व का ख़ुलासा निकाल कर रख दिया और वो ढह गये। उन्होंने बड़ी विनम्रता से गिड़गिड़ा कर पूछा, ‘‘क्या कोई Alternative बन्दोबस्त नहीं हो सकता।’’ तहसीलदार चिढ़ावनी हंसी हंसा। कहने लगा, ‘‘जुरूर हो सकता है। वो ऑल्टरनेटिव बन्दोबस्त ये है कि आपकी तनख़्वाह वही पच्चीस रुपये रहे और आप इसी में मेरे बच्चों को भी पढ़ायेंगे। आया ख़याले-शरीफ़ में? बर्ख़ुरदार, अभी आपने दुनिया नहीं देखी। मैं आपके हाथ में दो कबूतर देता हूं, आप यह तक तो बता नहीं सकते कि इनमें मादा कौन सी है?

उनके जी में तो बहुत आया कि पलट कर जवाब दें कि कोलम्बस साहब, अगर इसी डिस्कवरी का नाम दुनिया देखना है, तो यह काम कबूतर कहीं बेहतर तरीके से अंजाम दे सकते हैं। इतने में तहसीलदार दो-तीन बार जोर-जोर से खांसा तो थोड़ी दूर एक कोने में दुबका धूल में अटा क़ानूनगो लपक कर बिशारत के पास आया और उनकी ठुड्डी में हाथ देते हुए कहने लगा, आप सरकार के सामने कैसी बचकानी बातें कर रहे हैं। यह इज्जत किसे नसीब होती है। सरकार झूठों भी इशारा कर दें तो लखनऊ यूनिवर्सिटी के सारे प्रोफ़ेसर हाथ बांधे सर के बल चल कर आयें। सरकार को तीन बार डिप्टी कलेक्टरी ऑफ़र हो चुकी है मगर सरकार ने हर बार हिक़ारत से ठोकर मार दी कि मैं स्वार्थी हो जाऊं और डिप्टी कलेक्टर बन कर चला जाऊं तो तहसील धीरजगंज का स्टाफ़ और प्रजा कहेगी कि सरकार हमें बीच मंझधार में किस पर छोड़े जाते हो।

बिशारत स्तब्ध रह गये, मर्द ऐसे मौक़ों पर ख़ून कर देते हैं और नामर्द ख़ुदकुशी कर लेते हैं। उन्होंने यह सब कुछ नहीं किया, नौकरी की जो क़त्ल और ख़ुदकुशी दोनों से कहीं जियादा मुश्किल है।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

इस भाग की अन्य कड़ियां.

1. फ़ेल होने के फायदे 2. पास हुआ तो क्या हुआ 3. नेकचलनी का साइनबोर्ड 4. मौलवी मज्जन से तानाशाह तक 5. हलवाई की दुकान और कुत्ते का नाश्ता 6. कुत्ता और इंटरव्यू 7. ब्लैक होल ऑफ़ धीरजगंज 8. कोई बतलाओ कि हम बतलायें क्या? 9. विशेष मूली और अच्छा-सा नाम

पहला भाग

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

Technorati Tags: पुस्तक चर्चा, समीक्षा, काकेश, विमोचन, हिन्दी, किताब, युसूफी, व्यंग्य, humour, satire, humor, kakesh, hindi blogging, book, review, mustaq, yusufi, hindi satire, book review

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: पुस्तक चर्चा, समीक्षा, काकेश, विमोचन, हिन्दी, किताब, युसूफी, व्यंग्य

बिशारत ने दोपहर का खाना यतीमख़ाने के बजाय मौलवी बादल (इबादुल्ला) के यहां खाया जो इसी स्कूल में फ़ारसी पढ़ाते थे। मक्खन में चुपड़ी हुई गरम रोटी के साथ आलू का भुरता और लहसुन की चटनी मजा दे गई। मौलवी बादल ने अपनी आत्मीयता और सहयोग का यक़ीन दिलाते हुए कहा कि बरख़ुरदार! मैं तुम्हें खोंते रफ़ू करना, आटा गूंधना और हर तरह का सालन पकाना सिखा दूंगा। ख़ुदा की क़सम! बीबी की जुरूरत ही महसूस न होगी। लगे हाथ उन्होंने मूली की भुजिया बनाने की जो तरकीब बताई वो ख़ासी पेचीदा और खतरनाक थी। इसलिये कि इसकी शुरूआत मूली के खेत में पौ फटने से पहले जाने से होती थी। उन्होंने हिदायत की कि देहात की तहजीब के ख़िलाफ़ लहलहाते खेत में तड़के मुंह उठाये न घुस जाओ, बल्कि मेंड़ पर पहले इस तरह खांसो-खंखारो जिस तरह बेकिवाड़ या टाट के परदे वाले पाख़ाने में दाख़िल होने से पहले खंखारते हैं। इसके बाद यह हिदायत की कि टख़ने से एक बालिश्त ऊंचा लहंगा और हंसली से दो बालिश्त नीची चोली पहनने वाली खेत की मालकिन से ताजा गदरायी हुई मूली की जगह और उसे तोड़ने की इजाजत कैसे ली जाये कि नजर देखने वाली पर न पड़े। यह भी इरशाद फ़रमाया कि चमगादड़ सब्जियां वायु खोलने वाली होती हैं। इससे उनका तात्पर्य उन पौधों से था जो अपने पैर आसमान की तरफ़ किये रहते हैं। जैसे गाजर, गोभी, शलग़म। फिर उन्होंने पत्ते देख कर यह पहचानना बताया कि कौन-सी मूली तीखी फुफ्फुस निकलेगी और कौन-सी जड़ेली और मछेली। ऐसी तेजाबी कि खाने वाला खाते वक़्त मुंह पीटता फिरे और खाने के बाद पेट पीटता फिरे और कोई ऐसी सुडौल चिकनी और मीठी कि बेतहाशा जी करे कि काश गज भर की होती। उन्होंने यह भी बताया कि कभी ग़लती से तेजाबी मूली उखाड़ लो तो फेंको मत। इसका अर्क़ निकाल कर ऊंट की खाल की कुप्पी में भर लो। चालीस दिन बाद जहां दाद या एक्जीमा हो वहां फुरैरी से लगाओ। अल्लाह ने चाहा तो खाल ऐसी आयेगी जैसी नवजात बच्चे की। कुछ अर्से बाद जैसे ही बिशारत ने अपने मामू की एग्जिमा की फुन्सियों पर इस अर्क़ की फुरेरी लगाई, तो बुर्जुगवार बिल्कुल नवजात बच्चे की तरह चीख़ें मारने लगे।

बिशारत इंटरव्यू से फ़ारिग़ हो कर प्रसन्नचित निकले तो कुत्ता उनके साथ नत्थी था। उन्होंने हलवाई से तीन पूरियां और रबड़ी खरीद कर उसे खिलायी। वो उनके साथ लगा-लगा मौलवी बादल के यहां गया। इंटरव्यू में आज जो चमत्कार उनके साथ हुआ उसे उन्होंने उसी के दम-क़दम का जहूरा समझा। कानपुर वापस जाने के लिये वो बस में सवार होने आये तो वो उनसे पहले छलांग लगा कर बस में घुस गया, जिससे मुसाफ़िरों में पहले खलबली, फिर भगदड़ मच गयी। क्लीनर उसे इंजन स्टार्ट करने वाले हैंडिल से मारने दौड़ा तो उन्होंने लपक कर उसकी कलाई मरोड़ी। कुत्ता लारी की छत पर खड़ा उनके साथ कानपुर आया। ऐसे वफ़ादार कुत्ते को कुत्ता कहते उन्हें शर्म आने लगी। उन्होंने उसी वक़्त उसका नाम बदल कर लार्ड डलहौजी रखा, जो उस जनरल का नाम था जिससे मुक़ाबला करते हुए टीपू की मृत्यु हुई थी। कानपुर पहुंकर उन्होंने पहली बार उस पर हाथ फेरा। उन्हें अंदाजा नहीं था कि कुत्ते का जिस्म इतना गर्म होता है। उस पर जगह-जगह लड़कों के पत्थरों से पड़े हुए जख़्मों के निशान थे। उन्होंने उसके लिये एक ख़ूबसूरत कालर और जंजीर ख़रीदी।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

इस भाग की अन्य कड़ियां.

1. फ़ेल होने के फायदे 2. पास हुआ तो क्या हुआ 3. नेकचलनी का साइनबोर्ड 4. मौलवी मज्जन से तानाशाह तक 5. हलवाई की दुकान और कुत्ते का नाश्ता 6. कुत्ता और इंटरव्यू 7. ब्लैक होल ऑफ़ धीरजगंज 8. कोई बतलाओ कि हम बतलायें क्या?

पहला भाग

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

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कीमत-200 रुपये मात्र

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होली का त्यौहार मस्ती,उल्लास और मौज मजे का पर्व है. दुनिया में सभी जगह होली बड़ी ही धूमधाम से मनाई जाती है.लेकिन कुमाऊंनी होली का अपना एक अलग ही रंग है, पूरे विश्व में इस होली की अलग पहचान है. यहाँ होली मात्र एक दिन का त्यौहार नहीं बल्कि कई दिनों तक चलने वाला त्यौहार है. इसके साथ जो एक और चीज जुड़ी है वह है संगीत. बिना संगीत के कुमांऊनी होली की कल्पना करना भी मुश्किल है. संगीत के साथ साथ होली से जुड़े गीतों में कथ्य का भी बहुत महत्व है. होली यहाँ सिर्फ होली ही नहीं बल्कि एक सामुहिक अभिव्यक्ति का माध्यम है. इसमें सामाजिक चेतना से जुड़े मुद्दे भी हैं और तात्कालिक परिस्थितियों का चित्रण भी है.

कुमांऊनी होली एक पर्व ही नहीं है बल्कि इसकी एक सांस्कृतिक विशेषता है. यहाँ की होली मुख्यत: तीन तरह की होती है. 1. बैठी होली 2. महिला होली 3. खड़ी होली. इसके अलावा खड़ी होली का ही एक हिस्सा बंजारा होली कहलाता है. इन सब होलियों की चर्चा विस्तार से इस लेख के आगे के हिस्सों में की जायेगी.

मुख्य होली की शुरुआत फाल्गुन मास की एकादसी से होती है. जिसे आमलकी एकादशी भी कहा जाता है. इस दिन भद्रा-रहित काल में देवी-देवताओं में रंग डालकर पुन: अपने कपड़ों में रंग छिड़कते हैं, और गुलाल डालते हैं. होली के लिये विशेष कपड़े बनवाये जाते हैं जो मुख्यत: सफेद रंग के होते हैं. पुरुष सफेद रंग के कुर्ता पायजामा पहनते हैं और कुछ लोग सर पर गान्धी टोपी पहनते हैं .महिलाऎं सफेद धोती या सफेद सलवार कमीज पहनती हैं. एकादशी के दिन जब रंग पड़ता है तो इन्ही कपड़ो में रंग डाल दिया जाता है. यह कपड़े अब मुख्य होली के दिन तक बिना धोये पहने जाते हैं. जिस दिन देश-दुनिया के अन्य जगहों में होली मनायी जाती है उस दिन कुमाऊं में पानी और रंगो से होली खेली जाती है. इस दिन को “छरड़ी” या “छलड़ी” कहा जाता है.

एकादशी के ही दिन चीर बंधन होता है. इस दिन व्यक्तिगत रूप से या सामुहिक रूप से एक जगह चीर बांधा जाता है. इसके लिये “पद्म” की टहनी (इसे पहाड़ में “पैय्यां” या “पईंया” कहा जाता है) पर रंग बिरंगे कपडों की चीर बांधी जाती है. इसके अलावा सामुहिक रूप से जो चीर बांधी जाती है वह बांस के डंडे में बांधी जाती है लेकिन उसमें पद्म की एक टहनी, जौं की कुछ बालीयां और खीशे का फूल होना जरूरी होता है.पुराने जमाने में इस तरह की सामुहिक चीर को बांधने की अनुमति कुछ ही गांवों को होती थी.जिस गांव के लोग इस चीर को बांधते थे वो लोग रात भर इस चीर का पहरा भी करते थे ताकि कोई इस चीर को चुरा ना पाये. यदि किसी साल यह चीर किसी अन्य गांव के लोगों ने चोरी कर ली तो इस गांव से चीर बांधने का अधिकार छिन जाता था.फिर से इस अधिकार को प्राप्त करने के लिये गांव वालों को किसी अन्य गांव की चीर चुराना जरूरी होता था. इसी का सन्दर्भ होली के गानों में भी आता है कि “चीर चुराय कदम्ब चढ़ी बैठो, यो छो ऐसो मतवालो”. यह शायद इसी ओर इंगित करता है.        

अगले भागों में गीतों के कथ्य की भी चर्चा करेंगे अभी एक गाना जो मुझे याद आ रहा है उसके बोल आप को बता दूँ.यह मुख्यत: महिलाओं की होली है,

जल कैसे भरूं जमुना गहरी,

जल कैसे भरूं जमुना गहरी,

ठाड़े भरूं राजा राम देखत हैं,

बैठी  भरूं  भीजे  चुनरी.

जल कैसे भरूं जमुना गहरी.

धीरे चलूं घर सास बुरी है,   

धमकि चलूं छ्लके गगरी.

जल कैसे भरूं जमुना गहरी.

गोदी में बालक सर पर गागर,

परवत से उतरी गोरी.

जल कैसे भरूं जमुना गहरी.

 

जारी ………………………………..

 

परुली मन में सोच चुकी थी कि अब उसे हिम्मत से काम लेना है.मन ही मन उसने कुछ सोचा और अपने अन्दर बैठे हुए डर से लड़ने की कोशिश करने लगी.आज पहली बार उसे गोल्ज्यू का ध्यान आया. उसने सुना था गोल्ज्यू से कुछ भी मांगो वह मिल जाता है. उसने सवा रुपये का उचैण (करार) अलग रखा और मन ही मन गोल्ज्यू से कहा कि गोल्ज्यू मुझे डॉक्टर बना देना.आपके थान आके एक घंटी जरूर चढ़ाउंगी. स्कूल जाते समय भी वह चुप ही थी. उसकी सहेलियां उसे छेड़ रहीं थी.

“क्यों परु भिंन्ज्यू के साथ दिल्ली कब जा रही है रे…” …परुली चुप

“अरे ये तो इंतजार ही कर रही है कब इसका ब्या हो और यह यहाँ से भागे.”

“परु तेरी किस्मत बहुत अच्छी है रे. बहुत पुन्न किये होंगे तूने.कौन कौन से बर्त (व्रत) रखे रे तू ने हमको भी बता ना”

“दिल्ली जा के हमें भूल मत जान रे…” उसकी सहेलिया उसे अंगाव लगाती और हँसती लेकिन परुली चुपचाप अपनी सोच में चली जा रही थी.

स्कूल में भी हाफ-टाइम (इंटरवल) में परुली सीधे अपनी मैम के पास पहुंची.उसने विस्तार से अपनी मैम से पूछा कि डॉक्टर बनने के लिये क्या क्या करना पड़ता है. यह पढ़ाई कहाँ कहाँ से होती है और इसमें लगभग कितना खर्चा आता है. मैम ने भी उसे पूरी बात बतायी.

शाम को बाबू घर आये तो उनको चाय बनाके देते हुए वह बोली.

“बाबू आज मैने अपनी एक मैडम से बात की थी.”

“क्या बात की थी परु…”..बड़े प्यार से जोस्ज्यू ने पूछा. जब से उसका ब्या ठीक हुआ है तब से वह उससे ऐसे ही प्यार से बात करने लगे थे.

“यही कि डॉक्टर बनने के लिये क्या क्या करना पड़ता है.”

“डॉक्टर….?? “. जोसज्यू भी मुस्कुराये बिना न रह सके. “कौन डॉक्टर बन रहा है …तू… तू डॉक्टर बनेगी ?” उपहासात्मक लहजे में जोस्ज्यू ने कहा….

“हाँ बाबू ” उसकी आवाज में दृढ़ता थी.

“तो बन जाना बेटा पहले तेरा ब्या हो जाये फिर जो चाहे बन जाना.” जोस्ज्यू ने बबाल टालने के लहजे में कहा.

“नहीं बाबू मैं यह ब्या नहीं करुंगी …” उसी दृढ़ता से परुली ने जबाब दिया.

अब जोस्ज्यू चौंके….”क्या कहा ब्या नहीं करेगी… क्यों नहीं करेगी…”. अपने हाथ की चाय को जमीन में रखते हुए वह बोले.

“मुझे डॉक्टर बनना है बाबू…”

“अरे डॉक़्टर बनना इतना आसान नहीं है बेटा…”

“मुझे मालूम है बाबू उसके लिये पी.एम.टी का इमत्यान देना पड़ता है. मैं वह इम्त्यान पास कर लुंगी बाबू…”

“लेकिन डॉक्टरी में तो ढेर सारे डबल भी लगेंगे ना.”

“मेरी मैम कह रही थी कि मेरे बोर्ड में अच्छे नम्बर आये तो मुझे वजीफ़ा (स्कॉलरशिप) मिल जायेगा. फिर किसी बैंक से बात करने से वहाँ से भी कुछ डबल मिल सकते है. जब मेरी नौकरी लग जायेगी तो बैक का पैसा तार (चुका) देंगे.”

जोस्ज्यू के पास उसकी बातों का कोई जबाब ना था उनको गुस्सा आ गया उनकी समझ में आ गया था कि यह सारा किया धराया उसकी किसी टीचर का ही है.

“तो तू स्कूल में जाके पढ़ने की बजाय यही सब करती है. यही सिखाते हैं तुझे स्कूल में.रुक मैं तेरी टीचर से बात करुंगा. कौन टीचर है उसका नाम बताना तो. “     

परुली तो बाबू के गुस्से को देख के डर गयी.

नहीं बाबू…मैं तो….

” ज्यादा करेगी तो तेरा स्कूल जाना बंद करा दुंगा.वैसे भी अब तेरा ब्या ठीक हो गया है अब तुझे पढ़ने की क्या जरूरत है.  “

“नहीं बाबू ….लेकिन …”

“आने दे तेरी ईजा को आज…उसने ही तुझे कपाव (सर) पर चढ़ा रखा है ”

जोस्ज्यू गुस्से में उठकर चले गयी. परुली बाबू के गुस्से को देख के डर तो गयी लेकिन इस बात से उसकी हिम्मत और बढ़ गयी. उसने सोच लिया कि अब जो भी हो वह साफ साफ कह देगी उसे यह ब्या नहीं करना फिर बदनामी हो तो हो….

जारी……..

पिछले भाग : 1. परुली…. 2. परुली: चिन्ह साम्य होगा क्या ?? 3. परूली : शादी की तैयारी 4. परुली:आखिर क्या होगा ?

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पिछले भाग को पढ़कर मेरे को एक पाठक ने मेल किया कि मैं उन्हे परुली की पूरी कहानी मेल पर भेज दूँ क्योंकि उनको इतना इंतजार करना अच्छा नहीं लगता.मैं उनकी भावना की कद्र करता हूँ.उनको तो मैने उत्तर दे दिया लेकिन बाँकी पाठको की जानकारी के लिये बता दूँ मैने परुली की कहानी अभी लिखी नहीं है. मैं इसके प्रत्येक भाग को बुधवार की सुबह ही लिखता हूँ. उस समय जैसे भाव मन में आते हैं वैसा ही लिख देता हूँ. कभी कभी सोचता हूँ कि यदि पूरी तरह सोच समझ के इस कहानी को लिखता तो शायद और अच्छा लिख पाता लेकिन फिर यह भी लगता है कि ऐसे लिख भी पाता कि नहीं. तो परुली का क्या होगा यह मेरे को भी नहीं मालूम. कभी कभी लगता है उस परिस्थिति में वह डॉक्टर नहीं बन पायेगी तो शायद वह भी गाढ़ में कूद मार दे या फिर ब्या कर के गोपाल के साथ ही चले जाये…लेकिन फिर लगता है उसने गोल्ज्यू से मन्नत मांगी है तो वह डॉक्टर बन ही जायेगी. …लेकिन क्या होगा यह तो अभी मेरे को भी नहीं मालूम …मेरी तरह आप भी इंतजार कीजिये.

मेरी व्यस्तता कम होने का नाम नहीं ले रही है. ज्ञान जी ने तो पहले ही इन कारणों से लिखना कम कर दिया. हमारे रोल मॉडल तो ज्ञान जी ही हैं तो जब उन्होने लिखना कम किया तो लाज़मी है हमको भी करना ही पड़ेगा.तो अभी नियमित लिखना संभव नहीं हो पायेगा. हाँ चिट्ठे पढ़्ना जारी रहेगा लेकिन हर जगह टिपियाना संभव नहीं होगा. मेरे ब्लॉग में आज का दिन व्यंग्य का है. तो चलिये आपको परसाई जी का एक व्यंग्य पढ़वाते हैं.

किसी देश की संसद में एक दिन बड़ी हलचल मची। हलचल का कारण कोई राजनीतिक समस्या नहीं थी, बल्कि यह था कि एक मंत्री का अचानक मुण्डन हो गया था। कल तक उनके सिर पर लंबे घुंघराले बाल थे, मगर रात में उनका अचानक मुण्डन हो गया था। सदस्यों में कानाफूसी हो रही थी कि इन्हें क्या हो गया है। अटकलें लगने लगीं। किसी ने कहा- शायद सिर में जूं हो गयी हों। दूसरे ने कहा- शायद दिमाग में विचार भरने के लिए बालों का पर्दा अलग कर दिया हो। किसी और ने कहा- शायद इनके परिवार में किसी की मौत हो गयी। पर वे पहले की तरह प्रसन्न लग रहे थे। आखिर एक सदस्य ने पूछा- अध्यक्ष महोदय! क्या मैं जान सकता हूं कि माननीय मंत्री महोदय के परिवार में क्या किसी की मृत्यु हो गयी है?

मंत्री ने जवाब दिया- नहीं। सदस्यों ने अटकल लगायी कि कहीं उन लोगों ने ही तो मंत्री का मुण्डन नहीं कर दिया, जिनके खिलाफ वे बिल पेश करने का इरादा कर रहे थे। एक सदस्य ने पूछा- अध्यक्ष महोदय! क्या माननीय मंत्री को मालूम है कि उनका मुण्डन हो गया है? यदि हां, तो क्या वे बतायेंगे कि उनका मुण्डन किसने कर दिया है?

मंत्री ने संजीदगी से जवाब दिया- मैं नहीं कह सकता कि मेरा मुण्डन हुआ है या नहीं!

कई सदस्य चिल्लाये- हुआ है! सबको दिख रहा है। मंत्री ने कहा- सबको दिखने से कुछ नहीं होता। सरकार को दिखना चाहिए। सरकार इस बात की जांच करेगी कि मेरा मुण्डन हुआ है या नहीं। एक सदस्य ने कहा- इसकी जांच अभी हो सकती है। मंत्री महोदय अपना हाथ सिर पर फेरकर देख लें। मंत्री ने जवाब दिया- मैं अपना हाथ सिर पर फेरकर हर्गिज नहीं देखूंगा। सरकार इस मामले में जल्दबाजी नहीं करती। मगर मैं वायदा करता हूं कि मेरी सरकार इस बात की विस्तृत जांच करवाकर सारे तथ्य सदन के सामने पेश करेगी। सदस्य चिल्लाये- इसकी जांच की क्या जरूरत है? सिर आपका है और हाथ भी आपके हैं। अपने ही हाथ को सिर पर फेरने में मंत्री महोदय को क्या आपत्ति है?

मंत्री बोले- मैं सदस्यों से सहमत हूं कि सिर मेरा है और हाथ भी मेरे हैं। मगर हमारे हाथ परंपराओं और नीतियों से बंधे हैं। मैं अपने सिर पर हाथ फेरने के लिए स्वतंत्र नहीं हूं। सरकार की एक नियमित कार्यप्रणाली होती है। विरोधी सदस्यों के दबाव में आकर मैं उस प्रणाली को भंग नहीं कर सकता। मैं सदन में इस संबंध में एक वक्तव्य दूंगा।

शाम को मंत्री महोदय ने सदन में वक्तव्य दिया-अध्यक्ष महोदय! सदन में ये प्रश्न उठाया गया कि मेरा मुण्डन हुआ है या नहीं? यदि हुआ है तो किसने किया है? ये प्रश्न बहुत जटिल हैं। और इस पर सरकार जल्दबाजी में कोई निर्णय नहीं दे सकती। मैं नहीं कह सकता कि मेरा मुण्डन हुआ है या नहीं। जब तक जांच पूरी न हो जाए, सरकार इस संबंध में कुछ नहीं कह सकती। हमारी सरकार तीन व्यक्तियों की एक जांच समिति नियुक्त करती है, जो इस बात की जांच करेगी। जांच समिति की रिपोर्ट मैं सदन में पेश करूंगा। सदस्यों ने कहा- यह मामला कुतुब मीनार का नहीं जो सदियों जांच के लिए खड़ी रहेगी। यह आपके बालों का मामला है, जो बढ़ते और कटने रहते हैं। इसका निर्णय तुरंत होना चाहिए। मंत्री ने जवाब दिया- कुतुब मीनार से हमारे बालों की तुलना करके उनका अपमान करने का अधिकार सदस्यों को नहीं है। जहां तक मूल समस्या का संबंध है, सरकार जांच के पहले कुछ नहीं कह सकती। जांच समिति सालों जांच करती रही। इधर मंत्री के सिर पर बाला बढ़ते रहे। एक दिन मंत्री ने जांच समिति की रिपोर्ट सदन के सामने रख दी। जांच समिति का निर्णय था कि मंत्री का मुण्डन नहीं हुआ था। सत्ताधारी दल के सदस्यों ने इसका स्वागत हर्ष-ध्वनि से किया। सदन के दूसरे भाग से ‘शर्म-शर्म’ की आवाजें उठीं। एतराज उठे- यह एकदम झूठ है। मंत्री का मुण्डन हुआ था। मंत्री मुस्कुराते हुए उठे और बोले- यह आपका ख्याल हो सकता है। मगर प्रमाण तो चाहिए। आज भी अगर आप प्रमाण दे दें तो मैं आपकी बात मान लेता हूं। ऐसा कहकर उन्होंने अपने घुंघराले बालों पर हाथ फेरा और सदन दूसरे मसले सुलझाने में व्यस्त हो गया।

: हरिशंकर परसाई

इंटरव्यू से पहले तहसीलदार ने गला साफ़ करके सबको खामोश किया तो ऐसा सन्नाटा छाया कि दीवार पर लटके हुए क्लाक की टिक-टिक और मौलवी मुजफ़्फ़र के हांफने की आवाज साफ़ सुनाई देने लगी। फिर इंटरव्यू शुरू हुआ और सवालों की बौछार। इतने में क्लाक ने ग्यारह बजाये तो सब दोबारा खामोश हो गये। धीरजगंज में कुछ अर्से रहने के बाद बिशारत को मालूम हुआ कि देहात की तहजीब के मुताबिक़ जब क्लाक कुछ बजाता है तो सब खामोश और बाअदब हो कर सुनते और गिनते हैं कि ग़लत तो नहीं बजा रहा।

इंटरव्यू दोबारा शुरू हुआ तो जिस शख़्स को चपरासी समझे थे, वो खाट की अदवायन पर आ कर बैठ गया। वो धार्मिक विषयों का मास्टर निकला जो उन दिनों उर्दू टीचर की जिम्मेदारी भी निभा रहा था। इन्टरव्यू में सबसे जियादा धर-पटक उसी ने की। मौलवी मुजफ़्फ़र और एक मैम्बर ने भी, जो मुंसिफ़ी अदालत से रिटायर्ड पेशकार थे, ऐंडे-बेंडे सवाल किये। तहसीलदार ने अलबत्ता छिपे-तौर पर मदद और तरफ़दारी की और सिफ़ारिश की लाज रखी। चंद सवालात नक़्ल किये जा रहे हैं। जिससे सवाल करने और जवाब देने वाले दोनों की योग्यता का अंदाजा हो जायेगा।

मौलवी मुजफ़्फ़रः ( कुल्लियाते-मख़मूर’ पर चुमकारने के अंदाज से हाथ फेरते हुए ) शेर कहने के फ़ायदे बयान कीजिये।

बिशारतः (चेहरे पर ऐसा एक्सप्रेशन जैसे आउट आफ़ कोर्स सवाल पूछ लिया हो) शायरी……….मेरा मतलब है, शेर….यानी उसका मक़सद….बात दरअस्ल ये है कि. …शौक़िया…..।

मौलवी मुजफ़्फ़रः अच्छा ख़ालिके-बारी का कोई शेर सुनाइये।

बिशारतः ख़ालिके -बारी सर्जनहार, वाहिद एक बिदा करतार।

पेशकारः आपके बाप, दादा और नाना किस विभाग में नौकर थे?

बिशारतः उन्होंने नौकरी नहीं की।

पेशकारः फिर आप कैसे नौकरी कर सकेंगे। चार पीढ़ियां एक के बाद एक अपना पित्ता मारें तो कहीं जा कर नौकरी की क़ाबिलियत पैदा होती है।

बिशारतः (सीधेपन से) मेरा पित्ता आप्रेशन के जरिये निकाला जा चुका है।

धार्मिक शिक्षकः आप्रेशन का निशान दिखाइये।

तहसीलदारः आपने कभी बेंत का इस्तेमाल किया है?

बिशारतः जी नहीं।

तहसीलदारः कभी आप पर बेंत का इस्तेमाल हुआ है?

बिशारतः अक्सर।

तहसीलदारः तब आप डिसीप्लिन क़ायम कर सकेंगे।

पेशकारः अच्छा यह बताइये दुनिया गोल क्यों बनाई गई है?

बिशारतः (पेशकार को ऐसे देखते हैं जैसे चारों ख़ाने चित्त होने पर पहलवान अपने प्रतिद्वन्द्वी को देखता है)…

तहसीलदारः पेशकार साहब! इन्होंने उर्दू टीचर की दरख़्वास्त दी है, भूगोल वालों के इंटरव्यू परसों होंगे।

धार्मिक शिक्षकः ब्लैक-बोर्ड पर अपनी राइटिंग का नमूना लिख कर दिखाइये।

पेशकारः दाढ़ी पर आपको क्या ऐतराज है?

बिशारतः कुछ नहीं।

पेशकारः फिर रखते क्यों नहीं?

धार्मिक शिक्षकः आपको चचा से जियादा मुहब्बत है या मामू से।

बिशारतः कभी ग़ौर नहीं किया।

धार्मिक शिक्षकः अब कर लीजिये।

बिशारतः मेरे कोई चचा नहीं हैं।

धार्मिक शिक्षकः आपको नमाज आती है? अपने पिता के जनाजे की नमाज पढ़ कर दिखाइये।

बिशारतः वो जिन्दा हैं।

धार्मिक शिक्षकः लाहौल विला क़ुव्वत, मैंने तो अंदाजा लगाया। तो फिर अपने दादा की पढ़ कर दिखाइये। या आप अभी उनकी कृपा से भी वंचित नहीं हुए हैं।

बिशारतः (भरी आवाज में) उनका इंतक़ाल हो गया है।

मौलवी मुजफ़्फ़रः मुसद्दसे-हाली का कोई बन्द सुनाइये।

बिशारतः मुसद्दस का तो कोई बन्द इस वक़्त याद नहीं आ रहा। हाली की ही मुनाजाते-बेवा के कुछ शेर पेश करता हूं।

तहसीलदारः अच्छा, अब अपना कोई पसन्दीदा शेर सुनाइये जिसका विषय बेवा न हो।

बिशारतः

तोड़ डाले जोड़ सारे बांध कर बन्दे-कफ़न
गोर की बग़ली से चित है पहलवां, कुछ भी नहीं

तहसीलदारः किसका शेर है?

बिशारतः जबान का शेर है।

तहसीलदारः ऐ सुब्हानल्ला! क़ुर्बान जाइये, कैसी-कैसी लफ़्जी रिआयतें और क़यामत के तलामजो बांधे हैं। तोड़ की टक्कर पे जोड़। एक तरफ़ बांधना दूसरी तरफ़ बंद। वाह! वाह! इसके बाद बग़ली क़ब्र और बग़ली दांव की तरफ़ ख़ूबसूरत इशारा, फिर बग़ली दांव से पहलवान का चित होना। आखिर में चित पहलवान और चित मुर्दा और कुछ भी नहीं, कह के दुनिया की नश्वरता को तीन शब्दों में भुगता दिया। ढ़ेर सारे अलंकारों को एक शेर में बंद कर देना चमत्कार नहीं तो और क्या है। ऐसा ठुका हुआ, इतना पुख़्ता और इतना ख़राब शेर कोई उस्ताद ही कह सकता है।

मौलवी मुजफ़्फ़रः आप सादगी पसंद करते हैं या दिखावा।

बिशारतः सादगी।

मौलवी मुजफ़्फ़रः शादीशुदा हैं या छड़े दम।

बिशारतः जी, गैर शादीशुदा।

मौलवी मुजफ़्फ़रः फिर आप इतनी सारी तनख़्वाह का क्या करेंगे? यतीमख़ाने को कितना मासिक चंदा देंगे?

तहसीलदारः आपने शायरी कब शुरू की? अपना पहला शेर सुनाइये।

बिशारतः

है इंतजारे-दीद में लाशा उछल रहा
हालांकि कू-ए-यार अभी कितनी दूरूर है

तहसीलदारः वाह वा! ‘हालांकि’ का जवाब, नहीं वल्लाह ऊसर जमीन में ‘लाशा’ ने जान डाल दी और ‘इतनी दूर’ में कुछ न कह कर कितना कुछ कह दिया।

बिशारतः आदाब बजा लाता हूं।

तहसीलदारः छोटी बहर में क्या क़यामत का शेर निकाला है। शेर में शब्दों की मितव्ययिता के अलावा विचार की भी कृपणता पाई जाती है।

बिशारतः आदाब।

तहसीलदारः (कुत्ता भौंकने लगता है) मुआफ़ कीजिये, मैं आपके कुत्ते के भौंकने में ख़लल डाल रहा हूं। यह बताइये कि जिन्दगी में आपकी क्या Ambition है?

बिशारतः यह नौकरी मिल जाये।

तहसीलदारः तो समझिये मिल गई। कल सुब्ह अपना सामान बर्तन-भाण्डे ले आइयेगा। साढ़े ग्यारह बजे मुझे आपकी Joining Report मिल जानी चाहिये। तन्ख़्वाह आपकी चालीस रुपये माहवार होगी।

मौलवी मुजफ़्फ़र चीख़ते और पैर पटकते रह गये कि सुनिये तो। ग्रेड पच्चीस रुपये का है, तहसीलदार ने उन्हें झिड़क कर ख़ामोश कर दिया और फ़ाइल पर अंग्रेजी में यह नोट लिखा कि इस उम्मीदवार में वो तमाम अच्छे गुण पाये जाते हैं जो किसी भी लायक़ और Ambitious नौजवान को एक कामयाब पटवारी या क्लास का टीचर बना सकते हैं, बशर्ते कि मुनासिब निगरानी और रहनुमाई मिले। मैं अपनी सारी व्यस्तताओं के बावजूद इसे अपना कुछ वक़्त और ध्यान देने के लिये तैय्यार हूं। शुरू में मैंने इसे 100 में से 80 नम्बर दिये थे मगर बाद में पांच नम्बर सुलेख के बढ़ाये लेकिन पांच नम्बर शायरी के काटने पड़े।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

इस भाग की अन्य कड़ियां.

1. फ़ेल होने के फायदे 2. पास हुआ तो क्या हुआ 3. नेकचलनी का साइनबोर्ड 4. मौलवी मज्जन से तानाशाह तक 5. हलवाई की दुकान और कुत्ते का नाश्ता 6. कुत्ता और इंटरव्यू 7. ब्लैक होल ऑफ़ धीरजगंज

पहला भाग

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

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चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: पुस्तक चर्चा, समीक्षा, काकेश, विमोचन, हिन्दी, किताब, युसूफी, व्यंग्य

पिछ्ले दो हफ्ते से शनिवार-टिप्पणी-चर्चा बंद है.एक कारण तो यह है कि मेरी व्यस्तता काफी बढ़ गयी है और दूसरा यह कि चर्चा लायक कोई टिप्पणी आई भी नहीं थी. लेकिन इस बार कुछ टिप्पणीयाँ है जिन्हें आपके साथ बांटना जरूरी समझता हूँ.. 

मेरी पोस्ट भारत की राष्ट्रभाषा अंग्रेजी क्यों नहीं है?? पर ‘स्वामीजी अर्धनारेश्वेर महाप्रभु संत गिरिमहाराज फ्रॉम हिमालयाज’ की टिप्पणी आयी जो रोमन में थी. लेकिन यह सौभाग्य की बात है स्वामी जी की नजरें इस नाचीज़ पर इनायत हुईं. अपने अनुभवों से स्वामी जी बताते हैं.

मेरा जन्म,उत्तराखंड की वादियों मे हुआ और 18 साल वहाँ रहने के बाद, मै पर्यावरण और पर्वतारोहण की ऊपर अपना ध्यान लगाने लगा, बिदेशियों के साथ मेरा संपर्क 1969 से होने लगा जब मैं, सिक्किम, दार्जिलिंग,डलहौजी, उत्तरकाशी आदि आदि स्थानों में पर्वतारोही बिदेशियों को घूमाता रहा.संयोग से, मेरा विदेश मे आना हुआ और अब तक इन पिछले 36 सालों में मैने लगभग 38 देशों की यात्रा की है और अब स्कैंडैविया मे रह रहा हूँ.यहां पर, मैने देखा की अँग्रेज़ी भाषा बोलने से देश तरक्की नही करता है. स्वीडन के लोग स्वीडिश बोलते हैं, फिनलैंड के लोग फिनिश बोलते हैं, नॉर्वे के लोग नॉर्वेजियन बोलते हैं, डेनमार्क के लोग डैनीश बोलते हैं, जर्मन के लोग जर्मन बोलते हैं, फ्रांस के लोग फ्रैंच बोलते है,बॉल्टिक देशौं के लोग बॉल्टिक भाषा बोलते हैं, रशियन रुसी बोलते हैं,इटॅलियन इटली और स्पॅनिश स्पेन और पुर्तगाली पुर्तगाली बोलते हैं और लगभग, ये सभी देश तरक्की कर रहे हैं.  तो मेरा मतलब यह है की हमें भी हिन्दी ही बोलनी चाहिए भारत में.

जब कभी मे 4-5 साल मे एक दो हफ्ते के लिए भारत आता हूँ ,तो मुझे बड़ा अचंभा होता हे की वहां अब लोग सिर्फ़ अँग्रेज़ी बोल रहे हैं और हिन्दी बोलने में उन्हें कुछ झिझक सी महसूस होती है.मेरी प्रार्थना है की हिन्दी बोलो क्योंकि वो हमारी मातृबोली है फिर अँग्रेज़ी आदि भाषा भी बोलो,वह कोई गंदी बात नहीं हे,परंतु देश की तरक्की अपनी भाषा बोलने से होगी और मेरा सुझाव हे की हर हिन्दुस्तानी बच्चा-बच्ची कम से कम 12 कक्षा तक विद्यालयों में ज्ञान ले. ज्ञान अपनी भाषा मे होना बहुत ज़रुरी हे.

अच्छा तो आपके हृदय मे बैठे उस परमात्मा को मेरा प्रणाम और आप सब को मेरा स्नेह भरा आशीष. स्वामीजी गिरिमहारज़ फ्रॉम केदारनाथ उत्तराखंड.

स्वामी जी की तरह ही कुछ और लोग हमारे द्वारे आकर अपने विचारों से परिचित कराते हैं.  जैसे गब्बर सिंह के ख़त पर दनदनाती टिप्पणीयां पर शोले के कई किरदार अपनी छाप छोड़ गये.कालिया जी आये और बोले

कालिया (जो पहले नमक खाता था)

शिव कुमार जी ( देखिये हम लोग कितने सुधर गए हैं. अब लोगों के नाम के साथ जी लगाने लगे हैं) ने पुराणिक जी की पोस्ट पर मेरी हाजिरी भूल से लगा दी. मैं यह हलफनामा देता हूँ कि मैंने पुराणिक जी की पोस्ट पर कोई कमेंट नहीं किया. इसलिए यहाँ कमेंट लिख रहा हूँ.

सरदार की हालत बिल्कुल वैसी ही हो गई है जैसा उन्होंने वित्त मंत्री को लिखी गई चिट्ठी में दिया है. हमलोग उनसे सचमुच में बहुत तंग हैं. एक दिन जब हमलोग आटा, चावल, दाल वगैरह नहीं ले आए तो उन्होंने हम तीनों को लाइन में खड़ा कर दिया. फिर मुझसे अपना वही वर्ल्ड फेमस डायलाग बोले कि तेरा क्या होगा कालिया. मैंने कहा सरदार मैंने आपका शेयर खाया था. जानते हैं क्या कहा उन्होंने? बोले शेयर खाया था अब गोली खा. अब दो ही चीज सस्ती बची है. शेयर और गोली. तुम शेयर पहले ही खा चुके हो इसलिए अब गोली खा.

हमसब धन्यवाद देते हैं उन साहित्यकार को जिन्होंने हमारी तकलीफ न केवल जनता के सामने रखी अपितु जनता के दिल में हमारे लिए हमदर्दी जगाई. उड़ती ख़बर सुनी है कि हम डाकुओं के लिए अब स्पेशल ‘डाकू कार्ड’ बनाने पर वित्त मंत्री राजी हो गए हैं. इन कार्ड के जरिये हमें अब सस्ता चावल, गेंहू, दाल, आलू, प्याज वगैरह मिल जायेगा.

यहाँ केवल एक ही लोचा है, हम लोग चाहते हैं कि हमें गोली, बंदूक, ए के ४७ वगैरह भी इसी कार्ड के जरिये सस्ते में मिले. अभी तो सरकार हमारी बातें मानने से इनकार कर रही है लेकिन हमें आशा है कि एक-दो मीटिंग के बाद मान जायेगी. हमने सरकार को भरोसा दिला दिया है कि अगले चुनाव तक डाकुओं की आवादी में करीब चालीस प्रतिशत की बढोतरी की उम्मीद है. नेता लोग इस बात से खुश हैं कि उन्हें एक नया वोट बैंक मिलेगा. और नए नेता भी.

पुनश्च:

हरी चचा प्रणाम.

ये चरित्र देश की घटनाओं से तो परिचित हैं ही मेरी पोस्ट भी पढते हैं. जैसे गब्बर सिंह के वालिद साहब हरि सिंह ने उसी पोस्ट पर कहा.

हरी सिंह

काकेश जी,

आपने हाल ही में शंका व्यक्त की थी कि साहित्य क्रांति लाने में सक्षम है या नहीं. मेरा व्यक्तिगत अनुभव कहता है कि निश्चित तौर पर साहित्य क्रांति लाने में सक्षम है. और मेरे जीवन में इस क्रांति के लिए मैं आलोक पुराणिक जी को और उनके साहित्य को धन्यवाद देता हूँ.

देखिये न, मैंने उनकी पोस्ट पर टिपण्णी लिखते हुए अपने पुत्र गब्बर से डाक द्वारा रुपये भेजने के लिए कहा था. आज ही मुझे पन्द्रह हजार का मनीआर्डर मिला है. मेरे जीवन में इस क्रांति के लिए मैं पूरा का पूरा श्रेय आलोक पुराणिक जी को देता हूँ. गाँव के बनिए का उधार चुकाने के बाद अगर कुछ पैसा बच गया तो मैं इंस्टालमेंट पर एक कंप्यूटर लूंगा. मैंने निश्चय किया है कि अब मैं ख़ुद साहित्य का सृजन करूंगा. मुझे आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि मैं अपना एक ब्लॉग बनाऊँगा जिसका नाम होगा ‘लूट-पाट’.

अलोक पुराणिक जी के ब्लॉग पर मैंने कमेंट किया ही था. आपके ब्लॉग पर इसलिए कर रहा हूँ जिससे आप भी मेरे ब्लॉग ‘लूट-पाट’ पर आयें और कमेंट करें.

हरी सिंह
गब्बर सिंह के वालिद

हरी सिंह की टिप्पणी पर नीरज जी ने गब्बर के अड्डे से गब्बर और सांभा की कुछ अंतरंग बातें बतायीं.

neeraj

जब से हरी सिंह जी की टिप्पणी पोस्ट पर आयी तब से क्या हुआ रामगढ के पास के गब्बर के अड्डे पर सुनिए:

गब्बर : “यहाँ से पचास पचास कोस दूर जब कोई बच्चा रोता था तो उसकी माँ कहती थी की बेटा सो जा नहीं तो गब्बर आ जाएगा….और ये हमारा बाप हरी सिंह हमारा नाम पूरा मिटटी में मिला दिए हैं….अरे क्या जरूरत थी उनको टिपियाने की? और सबको बताने की, की उनकी माली हालत ख़राब है… ई का नाम है हाँ…अलोक पुराणिक का ब्लॉग पढने का जुगाड़ कर लिए वो और नमक का जुगाड़ नहीं कर पाए ..धिक्कार है…. इसकी सज़ा जरूर मिलेगी..बराबर मिलेगी…अरे ओ साम्भा जरा बता तो सज़ा किसको दें? अपने बाप को की उस बनिए को या आलोक पुराणिक को?

साम्भा: सरकार अभी हम मोबाइल पे एस एम् एस पोल ले के बता देते हैं…आज कल इस धंधे में खूब कमाई है सरकार. जनता बिल्कुल तैयार ही रहती है. होली तक का टाइम देते हैं सरकार…हरी सिंह के लिए एच , बनिए के लिए बी और आलोक पुराणिक के लिए ऐ टाइप करें अपना नाम लिखें और ४२०४२०४२०० पर भेज दें.

(आप क्या पढ़ रहे हैं? उठाइये अपना मोबाइल और शुरू हो जाईये ….)

अभी हाल ही कि पोस्ट लड़ाई खतम हो गयी क्या? पर हरी सिंह जी फिर आये और बोले.

हरी सिंह (आशा है अब बताने की जरूरत नहीं कि मैं गब्बर का वालिद हूँ) |

एक दम ठीक कहा है जी. बिना लड़ाई के सब सूना-सूना लगता है. देखिये न, मेरे पुत्र गब्बर ने अगर बलदेव ठाकुर के दोनों पुत्रों को नहीं मारा होता तो आगे चलकर दोनों जायदाद वगैरह के लिए लड़ते. मेरा गब्बर बलदेव ठाकुर से लड़ाई नहीं करता तो आपको शोले पसंद आती क्या? नहीं न. आजकल तो बिना लड़ाई के क्रिकेट जैसा मनोरंजक खेल भी नहीं चलता जी तो ये नीरस जीवन कैसे चलेगा. और ब्लागिंग तो एक दम्मे नहीं चलेगी.

पुनश्च:

जैसा की मैंने आपको बताया था, मैंने इन्स्टालमेन्ट पर एक कंप्यूटर खरीद लिया है. अभी तक ब्लॉग तो नहीं बना सका लेकिन एक-दो दिन में ही ये काम भी कर डालूँगा. गब्बर ने फिर दस हज़ार भेजा था. जीवन अब कुछ ठीक लग रहा है तो सोच रहा हूँ कि ब्लागिंग भी कर ही डालूँ. बोरियत से छुटकारा मिलेगा. एक बार ब्लागिंग शुरू कर ली तो फिर लड़ाई वगैरह से आपलोगों को कृतज्ञ भी करता ही रहूँगा.

दुविधा केवल एक बात की है. कहीं ऐसा न हो कि मेरे ब्लॉग के समर्थन में रामगढ के नौजवान सड़क पर उतर आयें और धीरे-धीरे मेरे समर्थन की आगा चारों तरफ़ फ़ैल जाए. लेकिन छोटी-मोटी लड़ाइयां तो करता ही रहूँगा जी. आख़िर बोरियत से छुटकारा पाने का इससे अच्छा रास्ता नहीं है.

हरी सिंह

आशा है अब रामगढ़ के लोग भी पोस्ट पढ़ेंगे और टिप्पणी देंगे.

बिशारत इन्टरव्यू के अन्दर दाखिल हुए तो कुछ नजर न आया।इसलिये कि केवल एक गोल मोखे के अतिरिक्त, रौशनी आने के लिए कोई खिड़की या रौशनदान नहीं था। फिर धीरे-धीरे इसी अंधेरे में हर चीज की आउट लाइन उभरती, उजलती चली गई। यहां तक कि दीवारों पर पीली मिट्टी और गोबर की ताजा लिपाई में मजबूती और पकड़ के लिये जो कड़बी की छीलन और भुस के तिनके डाले गये थे, उनका क़ुदरती वार्निश अंधेरे में चमकने लगा। दायीं तरफ़ कम-अंधेरे कोने में दो बटन चमकते नजर आये। वो चलकर उनकी तरफ़ बढ़े तो उन्हें डर महसूस हुआ। ये उस बिल्ली की आंखें थीं जो किसी अनदेखे चूहे की तलाश में थी।

बायीं तरफ़ एक चार फ़ुट ऊंची मकाननुमा खाट पड़ी थी जिसके पाये शायद साबुत पेड़ के तने से बनाये गये थे। बिसौले से छाल उतारने का कष्ट भी नहीं किया गया था। उस पर सलेक्शन कमेटी के तीन मैम्बर टांगें लटकाये बैठे थे। उसके पास ही एक और मेम्बर बिना पीठ के मूढ़े पर बैठे थे। दरवाज़े की तरफ़ पीठ किये मौलवी मुजफ़्फ़र एक टेकीदार मूढ़े पर विराजमान थे। एक बिना हत्थे वाली लोहे की कुर्सी पर एक बहुत हंसमुख व्यक्ति उल्टा बैठा था यानी उसकी पीठ से अपना सीना मिलाये और किनारे पर अपनी ठोढ़ी रखे। उसका रंग इतना सांवला था कि अंधेरे में सिर्फ़ दांत नजर आ रहे थे। यह तहसीलदार था जो इस कमेटी का चेयरमैन था। एक मैम्बर ने अपनी तुर्की टोपी खाट के पाये को पहना रखी थी। कुछ देर बाद जब बिल्ली उसके फ़ुंदने से तमाचे मार-मार कर खेलने लगी तो उसने पाये से उतार कर सर पर रख ली। सबके हाथों में खजूर के पंखे थे। मौली मज्जन पंखे की डंडी गर्दन के रास्ते शेरवानी में उतार कर बार-बार अपनी पीठ खुजाने के बाद डंडी की नोक को सूंघते थे। तहसीलदार के हाथ में जो पंखा था, उसके किनारे पर लाल गोटा और बीच में गुर्दे की शक्ल का छेद था जो उस काल में सब स्टूलों में होता था। इसका उपयोग एक अरसे तक हमारी समझ में न आया। कई लोग गर्मियों में इस पर सुराही या घड़ा रख देते थे ताकि सूराख़ से पानी रिसता रहे और पैंदे को ठंडी हवा लगती रहे। बिशारत अंत तक ये फ़ैसला न कर सके कि वो ख़ुद नर्वस हैं या स्टूल लड़खड़ा रहा है।

तहसीलदार पेड़े की लस्सी पी रहा था और बाक़ी मैम्बर हुक़्क़ा। सबने जूते उतार रखे थे। बिशारत को ये पता होता तो निःसंदेह साफ़ मोज़े पहन कर आते। मूढ़े पर बैठा हुआ मैम्बर अपने बायें पैर को दायें घुटने पर रखे, हाथ की उंगलियों से पांव की उंगलियों के साथ पंजा लड़ा रहा था। एक उधड़ी हुई क़लई का पीकदान घूम रहा था। हवा में हुक़्के, पान के बनारसी तम्बाक़ू, कोरी ठिलिया, कोने में पड़े हुए खरबूज़े के छिलकों, ख़स के इत्र और गोबर की लिपाई की ताजा गंध बसी हुई थी और उन पर हावी भबका था जिसके बारे में विश्वास से नहीं कहा जा सकता था कि यह देसी जूतों की बू है जो पैरों से आ रही है या पैरों की सड़ांध है जो जूतों से आ रही है।

जिस मोखे की चर्चा पहले की जा चुकी है उसके बारे में यह फ़ैसला करना कठिन था कि वो रौशनी के लिये बनाया गया है या अंदर के अंधेरे को कन्ट्रास्ट से और अधिक अंधेरा दिखाने के लिये रखा गया है। अंदर के धुंए को बाहर फेंकने के लिये है या बाहर की धूल को अंदर का रास्ता दिखाने के इरादे से बनाया गया। बाहर के दृश्य देखने के लिये झरोखा है या बाहर वालों को अंदर की ताक-झांक के लिये झांकी उपलब्ध कराई गई है। रौशनदान, हवादान, दर्शनी-झरोखा, धुंए की चिमनी, पोर्ट होल….बिशारत के कथानुसार यह एशिया का सर्वाधिक बहुउद्देशीय छेद था जो बेहद ओवरवर्कड था और चकराया हुआ था। इसलिये इनमें से कोई भी काम ठीक से नहीं कर पा रहा था। इस समय इसमें हर पांच मिनट बाद एक नया चेहरा फ़िट हो जाता था। हो यह रहा था कि बाहर दीवार तले एक लड़का घोड़ा बनता और दूसरा उस पर खड़ा हो कर उस वक़्त तक तमाशा देखता रहता जब तक घोड़े के पैर न लड़खड़ाने लगते और वो कमर को कमानी की तरह लचका-लचका कर यह मांग न करने लगता कि यार! उतर, मुझे भी तो देखने दे।

यदा-कदा यह मोखा ऑक्सीजन और गालियों की निकासी के रास्ते के रूप में भी इस्तेमाल होता था। इस संक्षिप्त विवरण का विस्तार यह है कि मौली मज्जन दमे के मरीज थे। जब खांसी का दौरा पड़ता और ऐसा लगता कि शायद दूसरा सांस नहीं आयेगा तो वो दौड़ कर मोखे में अपना मुंह फ़िट कर देते थे और जब सांस का पूरक रेचक ठीक हो जाता तो सस्वर अल्हम्दुलिल्लाह कह कर लौंडों को सड़ी-सड़ी गालियां देते। थोड़ी देर बाद धूप का कोण बदला तो सूरज का एक चकाचैंध लपका कमरे का अंधेरा चीरता चला गया। इसमें धुंए के बल खाते मरग़ोलों और धूलकणों का नाच देखने लायक़ था। बायीं दीवार पर दीनियात (धार्मिक विषय) के छात्रों के बनाये हुए इस्तंजे (पेशाब के बाद क़तरों को सुखाने के लिये मुसलमान मिट्टी के ढेले इस्तेमाल करते हैं, उन्हें इस्तंजा कहा जाता है) के निहायत सुडौल ढेले क़रीने से तले ऊपर सजे थे जिन पर अगर मक्खियां बैठी होतीं तो बिल्कुल बदायूं के पेड़े मालूम होते।

दायीं दीवार पर जार्ज-पांचवें की फ़ोटो पर गेंदे का सूखा खड़ंक हार लटक रहा था। उसके नीचे मुस्तफ़ा पाशा का फ़ोटो और मौलाना मुहम्मद अली जौहर की तस्वीर जिसमें वो चोग़ा पहने और समूरी टोपी पर चांद-तारा लगाये खड़े हैं। इन दोनों के बीच मौलवी मज्जन का बड़ा-सा फ़ोटो और उसके नीचे फ़्रेम किया हुआ मान-पत्र जो अध्यापकों और चपरासियों ने उनकी सेवा में हैजे से ठीक होने की ख़ुशी में लम्बी उम्र की प्रार्थना के साथ अर्पित किया था। उनकी तनख़्वाह पांच महीने से रुकी हुई थी।

ये बात तो रह ही गई। जब बिशारत इन्टरव्यू के लिये उठ कर जाने लगे तो कुत्ता भी साथ लग गया। उन्होंने रोका मगर वो न माना। चपरासी ने कहा, “आप इस पलीद को अन्दर नहीं ले जा सकते।“ बिशारत ने जवाब दिया, “यह मेरा कुत्ता नहीं है”। चपरासी बोला, “तो आप इसे दो घंटे से बांहों में लिये क्यों बैठे थे?” उसने एक ढेला उठा कर मारना चाहा तो कुत्ते ने झट पिण्डली पकड़ ली। चपरासी चीख़ने लगा। बिशारत के मना करने पर उसने फ़ौरन पिण्डली छोड़ दी। शुक्रिया अदा करने के बजाये चपरासी कहने लगा, “और आप इस पर भी कहते हैं कि कुत्ता मेरा नहीं है।“ जब वो अन्दर दाख़िल हुआ तो कुत्ता भी उनके साथ घुस गया। रोकना तो बड़ी बात, चपरासी में इतना हौसला भी नहीं रहा कि टोक भी सके। उसके अंदर घुसते ही भूचाल आ गया। कमेटी के मेम्बरों ने चीख-चीख़ कर छप्पर सर पर उठा लिया। लेकिन जब वो उनसे भी जियादा जोर से भौंका तो सब सहम कर अपनी-अपनी पिंडलियां गोद में ले कर बैठ गये। बिशारत ने कहा कि अगर आप हजरात बिल्कुल शांत और स्थिर हो जायें तो यह भी चुप हो जायेगा। इस पर एक साहब बोले आप इंटरव्यू में अपना कुत्ता लेकर क्यों आये हैं? बिशारत ने क़सम खा कर कुत्ते से अपनी असम्बद्धता प्रकट कि तो वही साहब बोले “अगर आपका दावा है कि यह कुत्ता आपका नहीं है तो आप इसकी बुरी आदतों से इतने परिचित कैसे हैं?”

बिशारत इंटरव्यू के लिये अपनी जगह बैठ गये तो कुत्ता उनके पैरों से लग कर बैठ गया। उनका जी चाहा कि वो यूं ही बैठा रहे। अब वो नर्वस महसूस नहीं कर रहे थे, इंटरव्यू के दौरान दो बार मौलवी मज्जन ने बिशारत की किसी बात पर बड़ी तुच्छता से जोरदार क़हक़हा लगाया तो कुत्ता उनसे भी जियादा जोर से भौंकने लगा और वो सहम कर क़हक़हा बीच में ही स्विच ऑफ़ करके चुपके बैठ गये। बिशारत को कुत्ते पर बेतहाशा प्यार आया।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

इस भाग की अन्य कड़ियां.

1. फ़ेल होने के फायदे 2. पास हुआ तो क्या हुआ 3. नेकचलनी का साइनबोर्ड 4. मौलवी मज्जन से तानाशाह तक 5. हलवाई की दुकान और कुत्ते का नाश्ता 6. कुत्ता और इंटरव्यू

पहला भाग

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

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चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: पुस्तक चर्चा, समीक्षा, काकेश, विमोचन, हिन्दी, किताब, युसूफी, व्यंग्य

आज परुली ने सोच के रखा था कि आज ईजा से वह बात करके रहेगी. उसने जल्दी जल्दी घर के काम करने शुरु किये. लाई की सब्जी काट के छौंक  दी,आटा ओल दिया, नौले से पानी लेकर आयी, गोरु-बल्दों को घास डाल दी,बड़बाज्यू का हुक्का सुलगा दिया. ईजा खेतों से आयी तो परुली घर के आधे काम कर चुकी थी. ईजा को गुड़ की डली के साथ चाय देकर वह पास ही बैठ गयी.

हिम्मत ही नहीं कर पा रही थी परुली कि कैसे अपनी बात शुरु करे.उसे लग रहा था कि ईजा उसकी बात सुनकर क्या सोचेगी. लेकिन परुली ने हिम्मत जुटायी और नजरें नीची करके बोली.

“ईजा…., मेरा ब्या ठीक हो गया ना.”

“हाँ चेली. गोल्ज्यू की आशीरवाद से हो गया चेली. नहीं तो इतना अच्छा संबंध कैसा मिलता. तेरी किसमत अच्छी ठहरी.तू बहुत भागवान हुई..”

“लेकिन ईजा मुझे तो अभी और पढना है.”

“अरे पढ़ना लिखना तो जिनगी भर लगा ही रहने वाला ठहरा.एक बार शादी हो जाय फिर जैसा पांडेज्यू राठ बोलें वैसा करना.मन हो तो पढ़ लेना लेकिन लड़कियों को पढ़ लिख के क्या करना हुआ… ”

“ईजा…. , मेरी मैडम कह रही थी कि मैं डाक्टरी का इन्तेहान दूँ.”

ईजा को परुली के बचपने पर हँसी आ गयी. “चेली डाक्टर बनना हम लोगों के भाग में जो क्या ठहरा. बहुत मुश्किल होने वाला ठहरा बल. और फिर डाक्टरी की पढ़ाई यहाँ जो क्या होने वाली हुई …बाहर होने वाली ठहरी.हमारे गाँव से तो कोई डाक्टर ठहरा भी नहीं.पारगाँव के मुरुलीदत्त जी का लड़का हुआ. कहाँ से तो किया ठहरा वह डाक्टरी की पढ़ाई. नखलऊ …ना …लखनऊ …क्या तो कहने वाले हुए हो मुझे तो बोलना भी नहीं आने वाले हुआ.” ईजा अपनी ही बात पर हँस दी.परुली के अन्दर कोई शीशा सा दरक गया. एक रुलाई फूट पड़ी.वो खुद को संयत करते हुए बोली.

“लेकिन ईजा…. बहुत सी लड़कियां तो करने वाली हुई डाक्टरी की पढ़ाई.मुझे भी भेज देना शहर.मैं कर लुंगी ईजा..”.. परुली ने बोल तो दिया लेकिन अन्दर ही अन्दर वह खुद भी डर रही थी कि कैसे वह अकेले रह पायेगी.  

“अब ज्वान जवान लड़की को कैसे भेज देंगे हो बाहर.कोई जान न पहचान. तेरे को सार भी तो नहीं ठहरी.हम लोग तो भुस्स (गँवार) हुए बेटा. इतना बड़ा शहर हमारे लिये तो क्याप्प हुआ. ना हो ना. तू भी कहाँ के चक्कर में पड़ गयी. अभी तू बोर्ड के इंत्यान दे.ब्या कर ले फिर जैसी गोल्ज्यू की इच्छा होगी.” ईजा की चाय खतम हो गयी थी. वो उठते हुए बोली. “परु ये गिलास भान माँज दे और दूध की बाल्टी ला मैं दूध लगा लेती हूँ.अभी कितने सारे काम पड़े हैं. “

परुली की बात फिर अधूरी रह गयी.उसने ईजा के बताये काम किये और सोच में पड़ गयी.दूर पहाड़ों को देखते देखते ही तो उसने कल्पना की थी कि इन्ही पहाड़ों के उस पार होगा कोई एक शहर. जहाँ यह लाइट टिम टिम करती हैं. उसके घर में तो लम्फू (मिट्टी तेल का लैम्प) का उजाला होता है या छिलुके का. वह सोचती थी कि कभी वह उस पार जायेगी. एक बड़े शहर में कदम रखेगी.बिजली के लैप देखेगी. न जाने कितनी कल्पनाऎं.

वह चाहती तो थी डाक्टर बनना लेकिन उसे इसके बारे में कुछ भी जानकारी नहीं थी. उस दिन चमुली ने कहा था कि ढेर सारे डबल लगते हैं और आज ईजा कहती है कि बाहर जाना पड़ता है बल. इतना तो उसे विश्वास हो गया कि इस घर से अकेले तो उसे कोई भी बाहर नहीं भेजने वाला.और फिर गांव वाले भी तो क्या क्या बातें बनाऐंगे. तलखाऊ की बिट्टू बुआ जो आंगनबाड़ी में काम करती हैं उनके बारे में ही जाने क्या क्या बोलते हैं. और फिर पैसे का सवाल तो है ही…. सचमुच ..कहाँ से लायेंगे उसके बाबू इत्ता पैसा. तो क्या करे परुली. क्या शादी कर ले. वो सोचने लगी…वैसे यदि मैं शादी कर लूँ और इनके साथ दिल्ली चले जाऊँ तो शायद वहाँ से डाक्टरी हो सकती है. लेकिन उसने देखा है शादी के बाद जो ब्योली आती हैं उन्हें घर के कित्ते तो काम करने पड़ते हैं. और जब उसके ईजा बाबू उसे बाहर नहीं भेज रहे तो सास ससुर तो बिल्कुल ही नहीं भेजेंगे.तो क्या करे? शादी करके जुत जाये घर के जुए में कोल्हू के बैल की तरह. या फिर बगल की माया दीदी की तरह गाढ़ में कूद मार दे…. हाँ वह भी कूद मार देगी.खतम कर देगी खुद को. सारा बबाल खतम…

लेकिन फिर उसके अन्दर से जैसे किसी ने पुकारा ..नहीं परु तू इतनी कमजोर नहीं हो सकती.उसकी मैम भी तो उस दिन उसे समझा रही थी. कि इंसान को हर परिस्थिति का हिम्मत से सामना करना चाहिये… और फिर परुली ने सोच लिया कि वह अब हिम्मत के साथ इस परिस्थिति का सामना करेगी.

जारी…..[ अगले अंक में देखिये परुली का बदला हुआ रूप]

पिछले भाग : 1. परुली…. 2. परुली: चिन्ह साम्य होगा क्या ?? 3. परूली : शादी की तैयारी

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