March 2008

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लड़ाई खतम हो गयी क्या?

ऐसा नहीं मुझे गालियां देनी नहीं आती या मैं किसी से फोन या चैट पर बात नहीं करता लेकिन फिर भी सार्वजनिक उल्लूपना दिखाने से बचता रहा हूँ. कुछ लोग इसीलिये मुझे नेतागिरी या हिन्दी साहित्य के लिये अनुपयोगी मानते रहे हैं.

कुत्ता और इंटरव्यू

बिशारत जब प्रतीक्षालय यानी नीम की छांव तले पहुंचे तो कुत्ता उनके साथ था। उन्होंने इशारों में कई बार उससे विदा चाही, मगर वो किसी तरह साथ छोड़ने को तैयार न हुआ। नीम के नीचे वो एक पत्थर पर बैठ गये तो वो भी उनके क़दमों में आ बैठा और अत्यधिक उचित अंतराल से दुम हिला-हिला कर उन्हें कृतज्ञ आंखों से टुकर-टुकर देख रहा था।