April 2008
You are browsing the archive for April 2008.
तिरे कूचे से हम निकले
एक बंदर वाला भी अपने बंदर और बंदरिया की रस्सी पकड़े ये तमाशा देखने खड़ा हो गया। बंदर और लड़के बार-बार तरह-तरह के मुंह बनाकर एक दूसरे पर खोंखियाते हुए लपकते थे। ये कहना मुश्किल था कि कौन किसकी नक़ल उतार रहा है।
परुली तुमने मुझे गुनहगार बना दिया
मैने सुना था कि कभी कभी लेखक द्वारा रचा गया कोई काल्पनिक चरित्र लेखक से भी आगे निकल जाता है और लेखक को पाठकों के हिसाब से फिर उस चरित्र को ढालना पड़ता है. जैसे जब हैरी पॉटर की लेखिका ने अपनी किताब में हैरी पॉटर को मारने की बात की तो कई पाठकों ने [...]
अजब-गजब मुशायरा
अरुण जी इस सिरीज पर नियमित टिपियाकर इसे जारी रखने का हौसला दे रहे हैं. वह पिछ्ले कई अंकों से मुशायरे के इंतजार में हैं.पिछ्ले अंक में उन्होने कहा “शेर के नाम पर गीदड तक के दर्शन नही कराये” . तो ज़नाब आज उनका और आपका भी इंतजार खत्म होता है.पेश है एक रोचक मुशायरा. [...]
और मुशायरा लुट गया
तो ख़ुदा आपका भला करे और मुझे माफ करे… मूलगंज रंडियों का चकला था।उस जमाने में भी लोगों का चाल-चलन इतना ही ख़राब था,जितना अब है। मगर निगाह अभी उतनी ख़राब नहीं हुई थी कि तवायफ़ों को बस्ती को आजकल की तरह ‘बाजारे हुस्न’ कहने लगें। चकले को चकला ही कहते थे। दुनिया में कहीं [...]
मूलगंज: तवायफों का जिक्र
मूलगंज का जिक्र ऊपर की पंक्तियों और कानपुर से संबंधित दूसरे चित्रों में जगह-जगह बल्कि जगह-बेजगह आया है। इस मुहल्ले में तवायफें रहती थी। ये विशारत का पसंदीदा विषय है,जिससे हमारे पाठक पूरी तरह से परिचित हो चुके होंगे।हांलाकि बिना संदेह के वे दूसरे ग्रुप के आदमी हैं।
जैसा जबाब वैसा सवाल
प्रवचन सुनकर लौटते हुए मनोहर और श्याम बातें करते हुए जा रहे थे.वह दोनों स्वामी जी की भक्तिपूर्ण बातों से बहुत प्रभावित थे. तभी मनोहर के मन में एक प्रश्न उठा कि क्या पूजा करते समय सिगरेट पीना उचित है ? उसने श्याम से पूछा. श्याम ने कहा कि तुम यह सवाल स्वामी जी से [...]
तवायफ़ के किस्से
बात साठ-सत्तर साल पुरानी लगती है , मगर आज भी उतनी ही सच है। अलग-अलग तबक़ों के लोग तवायफ़ को ज़लील औए नफ़रत के क़ाबिल समझते थे, मगर साथ ही साथ उसकी चर्चा और चिंतन में एक लज़्ज़त महसूस किये बिना नहीं रहते थे। समाज और तवायफ़ में सुधार के बहाने उसकी ज़िन्दगी की तस्वीर बनाने में उनकी प्यास की संतुष्टि हो जाती थी।
मुशायरे की तैयारी
शेर मुशायरे में सुनने-सुनाने की चीज नहीं। एकान्त में पढ़ने, समझने, सुनने और सहने की चीज है। शायरी किताब की शक्ल में हो तो लोग शायर का कुछ नहीं बिगाड़ सकते। मैं ‘मीर’ की किताब से एक-दो नहीं, सौ-दो सौ शेर ऐसे निकाल कर दिखा सकता हूं जो वो किसी मुशायरे में पढ़ देते तो इज्जत और पगड़ी ही नहीं, सर भी सलामत नहीं रहता।