Apr 272008
 

तिरे कूचे से हम निकले : हंगामे के बाद किसी को मेहमान शायरों का होश न था। जिसके, जहां सींग समाये वहीं चला गया और जो ख़ुद इस लायक़ न था उसे दूसरे अपने सींगों पर उठा ले गये। कुछ रात की हड़बोंग की शर्मिन्दगी, कुछ रुपया न होने के कारण अव्यवस्था, बिशारत इस लायक़ न रहे कि शायरों को मुंह दिखा सकें। मौली मज्जन के दिये दस रुपये कभी के चटनी हो चुके थे बल्कि वो अपनी जेब के बहत्तर रुपये ख़र्च कर चुके थे और अब इतनी क्षमता न थी कि शायरों को वापसी का टिकिट दिलवा सकें। मुंह पर अंगोछा डाल कर छुपते छुपाते धार्मिक-शिक्षा टीचर के ख़ाली घर में गये। वेलेजली उनके साथ लगा था। ताला तोड़ कर घर में घुसे और दिन भर मुंह छुपाये पड़े रहे। तीसरे पहर वेलेजली को जंजीर उतार कर बाहर कर दिया कि बेटा जा, आज ख़ुद ही घूम आ। बिफरे हुए कानपुर के शायरों का झुण्ड उनकी तलाश में घर-घर झांकता फिरा, आख़िर थक हार-कर पैदल स्टेशन के लिये रवाना हुआ। सौ-दौ सौ क़दम चले होंगे कि लोग साथ आते गये और बाक़ायदा जुलूस बन गया। क़स्बे के तमाम अधनंगे बच्चे, एक पूरा नंगा पागल, म्यूनिस्पिल बोर्ड की हद में काटने वाले तमाम कुत्ते उन्हें स्टेशन छोड़ने गये। जुलूस के आख़िर में एक साधू भभूत रमाये, भंग पिये और तीन कटखनी बत्तख़ें भी अकड़े हुई फ़ौजियों की Ceremonial चाल यानी अपनी ही चाल…Goose Step ……में चलती हुई साथ थीं। रास्ते में घरों में आटा गूंधती, सानी बनाती, रोते हुए बच्चे का मुंह दूध के ग्लैंड से बंद करती और लिपाई-पुताई करती औरतें अपना-अपना काम छोड़कर, सने हुए हाथों के तोते से बनाये जुलूस देखने खड़ी हो गईं। एक बंदर वाला भी अपने बंदर और बंदरिया की रस्सी पकड़े ये तमाशा देखने खड़ा हो गया। बंदर और लड़के बार-बार तरह-तरह के मुंह बनाकर एक दूसरे पर खोंखियाते हुए लपकते थे। ये कहना मुश्किल था कि कौन किसकी नक़ल उतार रहा है।

आते वक़्त जिन शायरों ने इस बात पर नाक-भौं चढ़ाई थी कि बैलगाड़ी में लाद कर लाया गया, अब इस बात से नाराज थे कि पैदल खदेड़े गये। चलती ट्रेन में चढ़ते वक़्त हैरत कानपुरी एक क़ुली से ये कह गये कि उस कमीन (बिशारत) से कह देना, जरा धीरजगंज से बाहर निकले, तुझसे कानपुर में निमट लेंगे। सब शायरों ने अपनी जेब से वापसी के टिकिट ख़रीदे, सिवाय उस शायर के जो अपने साथ पांच मिसरे उठाने वाला लाया था। ये साहब अपने मिसरा उठाने वालों समेत आधे रास्ते में ही बिना टिकिट सफ़र करने के जुर्म में उतार लिये गये। प्लेटफार्म पर कुछ दर्दमंद मुसलमानों ने चंदा करके टिकिटचेकर को रिश्वत दी तब कहीं जा के छुटे। टिकिटचेकर मुसलमान था वरना कोई और होता तो छहों के हथकड़ी डलवा देता।

बात एक रात की : सिर्फ़ बेइज्जत हुए शायर ही नहीं, कानपुर की सारी शायर बिरादरी बिशारत के ख़ून की प्यासी थी। उन शायरों ने बिशारत के ख़िलाफ़ इतना प्रोपेगंडा किया कि कुछ गद्य लेखक भी इनको कच्चा चबा जाने के लिये तैयार बैठे थे। कानपुर में हर जगह इस मुशायरे के चर्चे थे। धीरजगंज जाने वाले शायरों ने अपनी जिल्लत और परेशानी की दास्तानें बढ़ा-चढ़ाकर बयान कीं। वो अगर सच नहीं भी थीं तो सुनने वाले दिल से चाहते थे कि ख़ुदा करे सच हों कि वो इसी लायक़ थे।लोग कुरेद कुरेद के विस्तार से सुनते थे। एक शिकायत हो तो बयान करें अब खाने को ही लीजिये, हर शायर को शिकायत थी कि रात का खाना हमें दिन दहाड़े चार बजे उसी किसान के यहां खिलाया गया जिसके यहां सुलाया गया। ज़ाहिर है किसान ने अलग किस्म का खाना खिलाया, चुनांचे जितनी किस्म के खाने थे उतनी ही किस्म की पेट की बीमारियों में शायरों ने खुद को उलझा पाया।हैरत कानपुरी ने शिकायत की कि मैने नहाने के लिये गर्म पानी मांगा तो चौधराइन बे घूंघट उठा कर मुझे सबसे पास के कुंए का रास्ता बता दिया और ये भरोसा दिलाया कि उसमें से गर्मियों में ठंडा और सर्दियों में गर्म पानी निकलता है।चौधरी ने तो नहाने का कारण भी जानना चाहा और जब मैने नहाये बगैर अचकन पहन ली और मुशायरे में जाने लगा तो चौधरी ने मेरी गोद मे दो महीने का नंग धड़ंग बेटा दे कर जबरदस्ती पुष्टि करनी चाही कि नवजात अपने बाप पर गया है। मेरा क्या जाता था मैने कह दिया हाँ और बड़े प्यार से बच्चे के सर पर हाथ फेरा जिससे बैचेन होके उसने मेरी अचकलन पे पेशाब कर दिया। उसी अचकन को पहने पहने मैने लोकल शायरों को गले लगाया।

फिर कहा कि बन्दा आबरू हथेली पर रखे एक बजे मुशायरे से लौटा। तीन बजे तक चारपायी के ऊपर खटमल और नीचे चूहे कुलेले करते रहे। तीन बजते ही घर में “सुबह हो – सुबह हो गयी “ का शोर मच गया। और ये शिकायत तो सबने की कि चार बजे हमें झिंझोड़-झिंझोड़ कर उठाया और एक एक लोटा हाथ में पकड़ा के झड़बेरी की झाड़ियों के पीछे भेज दिया।

कुछ ने शिकायत की हमें “ठोस” नाश्ता नहीं दिया गया। निहार मुँह फुट भर लम्बे गिलास में छाछ पिलाकर विदा कर दिया। एक साहब कहने लगे कि उनकी खाट के पाये से बंधी हुई एक बकरी सारी रात मींगनी करती रही। मुँह अन्धेरे उसका दूध दूह कर उन्हे पेश कर दिया गया। उनका ख़्याल था कि ये सुलुक तो कोई बकरी भी बर्दास्त नहीं कर सकती। ख़रोश शाहजहांपुरी ने कहा कि उनके सिरहाने रात के ढाई बजे से चक्की चलनी शुरु हो गयी। चक्की पीसने वाली दोनों लड़कियां हँस हँस कर जो गीत गा रही थी वो देवर-भावज और नंदोई-सलहज की छेड़छाड़ से संबंधित था, जिससे उनकी नींद और नीयत दोनों में खलल पड़ा। एज़ाज अमरोही ने कहा कि भांति भांति के परिन्दों ने सुबह चार बजे से ही शोर मचाना शुरु कर दिया। ऐसे में कोई भी शरीफ आदमी सो नहीं सकता। मजज़ूब मथरावी की शिकायत थी कि उन्हे कच्चे सहन में जामुन के पेड़ तले मच्छरों की छांव में सुलाया गया। पुरवा के हर चैन देने वाले झोंके कि साथ रात भर उनके सर जामुनें टपकती रहीं। सुबह उठकर उन्होने शिकायत की तो मकान मालिक के मैट्रिक फेल लौंडे ने कहा, ग़लत ! जामुनें नहीं , फलेंदे थे। मैने खुद लखनऊ वालों को फलेंदे कहते सुना है। मजज़ूब मथरावी के बयान के मुताबिक़ उनकी चारपायी के पास खूंटे से बंधी हुई भैस रात-भर डकराती रही। तडके उसने एक बच्चा दिया जो सीधा उनकी छाती पर आ गिरता , अगर वो कमाल की फुरती से बीच में ही कैच न लेते। शैदा जारचवी ने अपनी बेइज़्ज़ती में भी अनूठेपन और गर्व का पहलू निकाल लिया। उन्होने दावा किया कि जैसी बेमिसाल बेइज़्ज़ती उनकी हुई वैसी तो एशिया भर में कभी भी किसी शायर की नहीं हुई। राअना सीतापुरी ने शगुफ़ा छोड़ा कि जिस घर में मुझे सुलाया गया बल्कि रात-भर जगाया गया, उसमें जिद्दी बच्चा सारी रात मां के दूध और उसका बाप चर्चा के पहले विषय के लिये मचलता रहा। अख़गर कानपुरी बोले कि उनका किसान मेज़वान हर आध घंटे बाद उठ-उठकर उनसे पूछ्ता रहा कि “जनाबे-आली कोई तकलीफ़ तो नहीं, नींद तो ठीक आ रही है ना? “ हर शायर इस तरह शिकायत कर रहा था कि जैसे उसके साथ किसी व्यवस्थित षडयंत्र के तहत निजी ज़ुल्म हुआ है। हांलाकि हुआ-हवाया कुछ नहीं। हुआ सिर्फ ये कि उन शहरी शायरों ने देहात की ज़िन्दगी को पहली बार..और वो भी चंद घंटो के लिये …जरा करीब से देख लिया और बिलबिला उठे। उनपर पहली बार खुला कि शहर से सिर्फ़ चंद मील की ओट में इंसान कैसे जीते हैं और अब उनकी समझ में ये नहीं आ रहा था कि यही कुछ है तो किसलिये जीते हैं.

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

इस भाग की अन्य कड़ियां.

1. फ़ेल होने के फायदे 2. पास हुआ तो क्या हुआ 3. नेकचलनी का साइनबोर्ड 4. मौलवी मज्जन से तानाशाह तक 5. हलवाई की दुकान और कुत्ते का नाश्ता 6. कुत्ता और इंटरव्यू 7. ब्लैक होल ऑफ़ धीरजगंज 8. कोई बतलाओ कि हम बतलायें क्या? 9. विशेष मूली और अच्छा-सा नाम 10. ज़लील करने के कायदे 11. आइडियल यतीम का हुलिया 12. ज़लील करने के अलग अलग शेड 13.कुत्ते की तारीफ और मुशायरा 14. शायरों की खातिरदारी 15. इक्के का आविष्कार घोड़े ने किया 16.मुशायरे की तैयारी 17. तवायफ़ के किस्से 18. मूलगंज: तवायफों का जिक्र 19. और मुशायरा लुट गया 20. अजब-गजब मुशायरा

पहला भाग

Apr 262008
 

मैने सुना था कि कभी कभी लेखक द्वारा रचा गया कोई काल्पनिक चरित्र लेखक से भी आगे निकल जाता है और लेखक को पाठकों के हिसाब से फिर उस चरित्र को ढालना पड़ता है. जैसे जब हैरी पॉटर की लेखिका ने अपनी किताब में हैरी पॉटर को मारने की बात की तो कई पाठकों ने उसका विरोध किया. कई जगह प्रदर्शन भी हुए और अंतत: लेखिका को झुकना पड़ा. वैसे मुझे खुशफहमी नहीं है कि मैने हैरी पॉटर जैसा कोई चरित्र निर्मित किया है लेकिन फिर भी मैं अपने उन पाठको के प्रति नतमस्तक हूँ जिन्होने मेरे एक चरित्र को इस तरह से अपनाया कि उसे वह मुझसे ज्यादा पहचानने लगे.

जब मैने परुली कहानी का पहला भाग लिखा था तो मैं उसे एक लघु कथा के रूप में पहले ही भाग में समाप्त मान रहा था. लेकिन पाठकों की उत्सुकता “आगे क्या होगा?से लगा कि पाठक इसके आगे की कहानी जानना चाहते हैं. तो मैं हर बुधवार की सुबह परुली का भाग्यविधाता बनता रहा. जिसे लोगों ने काफी पसंद भी किया.कई पाठक बुधवार को कहानी डालने में देरी होने पर मेल करने लगे कि परुली का क्या हुआ. मुझे भी इसमें आनंद आ रहा था. लेकिन फिर ऑफिस में व्यस्तता बड़ी तो मुझे बुधवार की सुबह इस कहानी को लिखना भारी पड़ने लगा. इसलिये पिछ्ले बुधवार मुझे लगा कि इस कहानी को फास्ट ट्रैक में रखकर समाप्त कर दूँ. ताकि हर बुधवार को लिखने का झंझट ना रहे. लेकिन मुझे क्या मालूम था कि परुली के दीवाने इस कदर नाराज हो जायेंगे.

देखिये क्या कहते हैं पाठक

सुजाता जी ने April 16th, 2008 ,11:34 am पर टिपियाया

अरे ! आज तो आपने बड़ी जल्दी में निबटा दिया कहानी को । हम तो हाथ मलते रह गये !अभी तो स्वाद आना शुरु हुआ था । क्या सचमुच कहानी खत्म ? जाएँ ?

संजीत जी और अरुण जी का ऑबजेक्शन

Sanjeet Tripathi जी ने April 16th, 2008 ,11:54 am पर टिपियाया

वाकई यार, ये तो बड़ी जल्दी ही समेट दिया आपने, कुछ ऐसे जैसे त्रस्त से हो गए हों आप इस सीरिज़ के लेखन से और सब कुछ बस निपटाना चाहते हों
आई ऑब्जेक्ट ;)

अरूण् जी ने April 16th, 2008 ,12:25 pm पर टिपियाया

हम इसे नही पढते ये तो हमारे साथ धोखा है ,पहले रायता मन मर्जी का फ़ैलाया और फ़िर फ़टाफ़ट निपटा दिया क्या आप फ़िल्म लेखन ट्राई कर रहे थे क्या जी ? जो पहले फ़ैलाते चले गये और जब पता चला कि फ़िल्म दो घंटे की बन गई है तो बस पन्द्रह मिनट मे निपटाने मे लग गये ,दुबारा लिखा /(मिटा कर) जाये इसे :)

इस कहानी के बहुत से पाठक ऐसे भी थे जो ब्लॉगर नहीं थे. सबसे तीखी प्रतिक्रिया उन्ही पाठकों की थी.माला जी ने कहा

mala telang जी ने April 17th, 2008 ,5:31 pm पर टिपियाया

काकेश भाई, ये आपने हमारे साथ बहुत बड़ा धोखा किया है । माना कि समयाभाव है , आप हमसे समय और मांग लेते .. हम खुशी खुशी दे देते ,लेकिन आपने तो हमसे ऐसा पीछा छुड़ाया जैसे सारे गाँव के कुत्ते आपके पीछे पड़ गये हों… जाइये ,इस तरह परुली का डॉक्टर बनना हमें जरा भी रास नहीं आया ,आप हमें बताएं ,कौन इलाज करवायेगा परुली से ? माफ करें मैं तो नहीं ।

नवीन पाठक जी बोले.

नवीन पाठक जी ने April 17th, 2008 ,8:32 pm पर टिपियाया

काकेश दा,
ये जो आज आपने अपने सारे दोस्तो के साथ धोखा किया है, आपको कुछ लगा कि नही…
पर आपने कहानी का अन्त तो सुखद कर दिया, लेकिन अन्त ऐसा होता नही है..कि डा. प्रिया का डा. अतुल के साथ दिल मिल गया और शादी हो गयी…
पहाड के इस माहौल मे लड्किया डाक्टर नही बन सकती है, ,,,

संजय पुजारी जी सबसे ज्यादा नाराज दिखे.

Sanjay Pujari जी ने April 19th, 2008 ,2:32 pm पर टिपियाया

नहीं काकेश जी … दिल तोड़ दिया. मैने तो आपको अच्छा लेखक समझा था लेकिन आप लेखक हो ही नहीं सकते. सिर्फ अपने लिखने का शौक पूरा कर रहे हो और नैट पर लोगों को बेवकूफ बना रहे हो. [अपने मन के मुताबिक कुछ भी लिखा और जब इस बारे में ज्यादा सोचा नहीं गया तो कहानी को 15 लाइनों में खतम कर दिया. भाई साहब ये कहानी अगर ऐसी ही खतम करनी थी तो जिस दिन शुरु हुई उसी दिन खतम क्लर देते..खाली इतने दिनों तक अपना टाइम लगाया और बांकी लोगों को बेवकूफ बनाया.]

और हेम पांडे जी ने तो अपना आक्रोश व्यक्त करने के लिये कहानी का अंतिम भाग ही लिख भेजा.

hem pandey जी ने April 22nd, 2008 ,7:13 pm पर टिपियाया

‘परुली’ की अन्तिम कड़ी ने मुझे भी अन्य की तरह निराश किया. अपने आक्रोश को व्यक्त करने के लिए मैंने अन्तिम कड़ी को इस प्रकार लिख डाला है:-

परुली की दशा देख कर उसकी ईज़ा ने निश्चय कर लिया कि वह फूल जैसी अपनी बेटी की भावनाओं का खून नहीं होने देगी.उसे लगने लगा था कि इस ब्या से परुली सुखी तो नहीं ही होगी. परुली के बाबू से फुरसत में बात करने पर जोस्ज्यु को भी यही ठीक लगा कि यह रिश्ता टूट जाए.
अब इसे पूरे परिवार कि प्रबल सामूहिक इच्छा का प्रभाव समझिए या संजोग कि घटनाक्रम भी कुछ अनुकूल रहे.खान्तोली के गणेश दत्त जी, जो ‘ब्याकर’ (शादियाँ तै कराने वाला) कहलाते थे, ने अपनी भतीजी की जुगाड़ गोपाल के लिए लगा ली और पांडे ज्यू के दिमाग में यह बात भी बिठा दी कि परुली तो ज्यादा ही बीमार ठैरी, ज्यादा दिन बचने वाली भी नहीं हुई.जोस्ज्यु की भी हालत ऐसी नहीं हुई कि वे गोपाल को कुछ ज्यादा दे सकें.पिठ्याँ अभी लगा नहीं है.इस लिए ये रिश्ता ख़तम करने में कोई हर्ज़ भी नहीं हुआ.

इसी बीच जोस्ज्यु के क़का का लड़का महेश, जो चालीस साल से हैदराबाद में था,इष्टदेव की पूजा के लिए पहली बार गाँव आया. उसके दोनों बेटे विदेश में थे और दोनों ने ही अंतर्जातीय विवाह कर रखे थे .महेश रिटायर हो गया था और उसने अपने मौसेरे भाई हरीश के मार्फ़त लखनऊ कुर्मांचल नगर में मकान खरीद लिया था.अब वह लखनऊ में ही रहने वाला था.वह हफ्ते भर जोस्ज्यु के घर में रहा. उसने भी जोस्ज्यु को प्रेरित किया कि वे परुली को आगे पढाएँ और यथासंभव आर्थिक सहायता का भी भरोसा दिलाया.वापस जाते समय वह पाँच सौ रुपये परु के और पाँच सौ रुपये बोजी के हाथ में रख गया.जीवन में पहली बार जोस्ज्यु ने इतनी बड़ी रकम किसी मेहमान या यजमान से एक बार में प्राप्त की थी.

महेश के जाने के बाद परुली भी तेजी से स्वास्थ्य लाभ करने लगी.डॉक्टर पुनेठा की दवा के साथ-साथ महेशकका की आशाजनक बातों से भी वह जल्दी ही बीमारी से उबर गयी.परीक्षा आते आते वह पूर्ण स्वस्थ हो चुकी थी.संभवतः गोल्ज्यु ने महेश कका को परुली के जीवन में एक नया मोड़ लाने के लिए भेजा था.ये महेश कका की बातों का ही असर था कि परुली का आत्मविश्वास बढ़ रहा था.इसी आत्मविश्वास के चलते उसने परीक्षा दी और ५७% अंकों से उत्तीर्ण की.

अब तो जोस्ज्यु भी परुली की पढ़ाई को ले कर उत्साहित थे. परुली गाँव की लड़कियों में ही नहीं, लड़कों में भी सबसे प्रतिभावान सिद्ध हो रही थी.परुली ने इंटर में बायोलोजी ले ली थी.उसकी ड्राइंग अच्छी थी.इसलिए उसे चित्र बनाने में परेशानी नहीं होती थी.प्रायः चित्रों में उसे गुड भी मिलता था,जिसे वह जोस्ज्यु को दिखाती थी और जोस्ज्यु मन ही मन खुश होते थे.हाँ शुरू शुरू में मेढक का डायसेक्शन करते समय उसे घिन जरूर आई थी.
परुली ,जिसे अब ईजा-बाबू परु ही कहते थे,न केवल पढ़ाई में ज्यादा मन लगा रही थी वरन् घर के काम में भी ज्यादा ध्यान देने लगी थी और इस बात का विशेष ध्यान रखती थी कि ईजा के काम का बोझ कम हो जाए. यद्यपि ईजा-बाबू छोटे भाई चंदू से काम नहीं कराते थे,किंतु परु उसे काम के लिए उत्साहित करती थी.वह सोचती थी कि वह स्वयं पढ़ने के लिए बाहर चली जायेगी तो ईजा के लिए अत्ती काम हो जायेगा.
जोस्ज्यु और जोस्याणी कभी बैठे बातें करते तो उनकी बातों में परु की चिंता जरूर झलकती.
जोस्ज्यु कहते :- हँ वे, हमने कहीं परु का ब्या टाल कर ग़लत तो नहीं किया.
जोस्याणी कहती – नैं हो, चुप रौ.अब मन कैं झन गजबजाओ. गोल्ज्यु ने जो किया भल ही किया होगा. देखते नहीं पढ़ने में हमेशा फस्ट ठैरी.घर का काम भी भली कै संभालने वाली ठैरी.
फ़िर कुछ शरमा कर बोलती – आज कल देखण-चाण भी खूब हो गयी है.

इसे परुली का भाग्य कहो या गोल्ज्यु की कृपा कि केमिस्ट्री के टीचर तारा दत्त जी अल्मोड़ा से ट्रांसफर होकर परु के इंटर कालेज में आ गए.केमिस्ट्री पढाने के लिए अल्मोड़ा में तारा दत्त जी का बहुत नाम था.तारा दत्त जी की ही कृपा से परु केमिस्ट्री का कीडा बन गयी.उसे अधिकांश फार्मूले और एक्वेशन कंठस्थ थे.केमिस्ट्री ही वह विषय था जिसके बूते परु ने इंटर भी ५८% नंबरों से पास कर लिया.

परु पिछले दो सालों से पत्रों द्वारा महेश कका के सम्पर्क में थी.महेश कका अब लखनऊ में निवास कर रहे थे.उन्हें भी परु से लगाव हो आया था.तीज त्यौहार परु को कुछ रुपये भे भेज दिया करते थे.

डाक्टरी के लिए परु ने पी.एम.टी. की तैयारी महेश कका के निर्देशन में ही की थी.उसका सेंटर भी लखनऊ था.अब जा के लगा कि स्कूल की पढाई में अच्छे नंबर लाना और बात है,लेकिन पी.एम.टी. क्लीअर करना उतना आसान नहीं.पी. एम.टी.देने के बाद परु को डर लगने लगा.उसे लगा कि वह शायद पी.एम.टी.में न निकल पाये.वो अब ज्यादा ही भक्त हो गयी थी.देवी के थान नित्य दिया लगाना उसका नियम हो गया था और उसकी एक ही मन्नत होती- देवी माता! मेंके डाक्टर बणे दिए.
रिजल्ट आ गया.परु को काउन्सेलिंग के लिए बुलाया गया.परु की खुशी का पारावार न था.उसने सोचा वह अब डाक्टर बन ही जायेगी.परू के पूरे परिवार में जश्न था.इजा बाबू ने उसे खुशी-खुशी लखनऊ के लिए विदा किया.पडोस के जमुना दत्त जी का लड़का कैलाश छुट्टी बिता कर फौज की ड्यूटी में वापस जा रहा था,उसका साथ भी मिल गया.महेश कका के लिए गडेरी,भांगा,भट,घौत और दो दाने निमु के भेंट में भेजे.जोस्ज्यु खत्याड़ी वाले खेत को बेचने की तैयारी कराने लगे ताकि परु की पढाई का खर्च निकल सके.

लखनऊ में फाइनल काउन्सेलिंग के बाद पता चला की परु का एडमिशन नहीं होगा.वह कट ऑफ़ को छूने से रह गयी थी. परु के कल्पनाओं का महल भरभरा कर गिर पड़ा.उसे जबरदस्त सदमा लगा.वह गाँव वालों को क्या मुंह दिखायेगी?सभी कहेंगे -बहुत फलफला रही थी.सुद्दै जो क्या ठहरा डाक्टर बनना!एक बार उसे लगा की उसे आत्महत्या कर लेनी चाहिए,लेकिन यह विचार ज्यादा देर तक हावी न हो सका.ईजा- बाबू और चंदू के ख्याल ने उसे सकारात्मक विचारों की ओर मोड़ दिया.

काउन्सेलिंग के कुछ दिन बाद ही महेश कका ख़बर लाये कि आरक्षित कोटे की सीटें पूरी नहीं भर पायीं हैं और शासन इस बार ये सीटें सामान्य सीटों से भरने पर विचार कर रहा है.शायद परु का नंबर भी आ जाए क्योंकि परु ज्यादा पीछे नहीं थी.हुआ भी वही.नई सूची मैं परु का नाम आ गया.
परु के जीवन का यह सबसे महत्वपूर्ण दिन था.बचपन से पाले सपने को साकार करने के लिए यह पहला पक्का कदम था.परु की खुशी देख कर महेश कका के भी आंसू निकल आए.

गाँव में जोस्ज्यु अब तक के घटनाक्रम से अवगत न थे.वे तो परु को डाक्टर मान चुके थे.परु की चिट्ठी आयी- मेरा एडमिशन हो गया है.गोल्ज्यु के थान प्रसाद चढ़ा देना. जोस्ज्यु उपाध्यायजी के यहाँ से मिसिरी ले आए. परु की ईजा ने गोल्ज्यु के थान परसाद चढा कर पूरे गाँव मे बांटा.ज्यादातर लोगों का एक ही जवाब था -भल भै हो तुमेरी परुलि डाक्धर बण गे.लेकिन कुछ ज्यादा समझदार लोग यह भी कह रहे थे-अल्ले काँ(अभी कहाँ) आई त पाँच साल तक पढाई करनी पड़ने वाली ठैरी.तब जो बनेगी डाकटर.

पढाई का कुछ खर्च खत्याड़ी वाला खेत बेचने से चल गया था.महेश कका ने भी काफी मदद की. उन्होंने परु को होस्टल न भेजकर अपने घर पर रख लिया जिससे रहने खाने का खर्च बच जाए.

एडमिशन होने तक परु को उतनी मुश्किल नहीं हुई जितनी एडमिशन के बाद. मेडिकल कालेज की जबरदस्त रैगिंग से परु विचलित हो गयी. उसने रैगिंग का नाम तो सुना था लेकिन इस प्रकार की रैगिंग होगी,उसे अनुमान नहीं था.उसे कालेज जाना किसी यातना झेलने जैसा लगने लगा.महेश कका उसकी परेशानी को भाँप गए.उन्होंने परु की चाची से बात की. परु की चाची ने उसे रैगिंग के आतंक से उबरने में मदद की.
परु जब पी.एम.टी. देने पहली बार लखनऊ आयी थी तो इतनी बड़ी ट्रेन देखकर,इतना बड़ा शहर देख कर,इतनी चहल पहल,इतनी भागमभाग देख कर जहाँ चमत्कृत हुई थी वहीं घबराई भी.उसे लगा था कि इतने बड़े शहर में रहकर पढाई करना कितना मुश्किल होगा.लेकिन अब इस चकाचौंध से उसकी घबराहट दूर होने लगी और उसे इसमें रस आने लगा.कालेज में भी उसका ग्रुप बन गया था.वहाँ भी उसे अच्छा लगता था.

यह परु का फर्स्ट इअर था.कालेज में एनुअल फंक्शन चल रहे थे.उसके ग्रुप की रीमा भाटिया बोली-
‘प्रिया तुम इतनी क्यूट हो. ब्यूटी कम्पीटिशन में पार्टिसिपेट क्यों नहीं करतीं?’
अमित और दूसरे साथियों ने भी इस बात पर जोर दिया.प्रिया ने कुछ शर्माते हुए कहा-
‘ठीक है,मैं आज अंकल से परमिशन लूंगी.’
‘परमिशन!’नेहा बोली’भला इसमें उन्हें क्या ऐतराज़ हो सकता है?तुम्हें एक चांस मिल रहा है.हो सकता है आज मिस मेडिकल कालेज,कल मिस लखनऊ फ़िर मिस इंडिया और मिस वर्ल्ड भी तुम बनो.एक्सपोजर ऐसे ही तो होता है.’
परु चुप रही.नेहा की बातों से परु को लगने लगा था कि महेश कका उसे अनुमति दे देंगे क्योंकि वे उसे हमेशा प्रोत्साहित करते थे.

लेकिन जब महेश कका से इस बारे में बात हुई तो उन्होंने परु को प्यार से समझाते हुए मना कर दिया.हालांकि उनकी बातों से ऐसा लग रहा था कि डिबेट या स्पोर्ट्स में पार्टिसिपेट करने की अनुमति दे देते.महेश कका की इस बात पर परु को बुरा लगा और वह अनमनी हो गयी.

उसके दोस्तों ने इस बात पर उसके अंकल-आंटी का मजाक भी बनाया.मारिया तो यहाँ तक कहने लगी-
‘ये तुम्हारे पेरेंट्स होते तो मना नहीं करते.तुम्हें तो होस्टल ज्वाइन कर लेना चाहिए.वहाँ कम से कम फ्रीली रह तो सकोगी.’

निपट गाँव से एक अत्यन्त सरल प्रतिभावान लडकी शहरी चकाचौंध भरे बनावटी माहौल में ठीक से तारतम्य नहीं बिठा पा रही थी.इसी लिए जब महेश कका ने उसे न्यू इअर पार्टी में होटल में रात भर जश्न मनाने के लिए मना कर दिया तो वह भड़क उठी और बोली-
‘कका क्या आप समझते हैं कि मैं वहाँ जा कर कोई ग़लत काम करूंगी या शराब पियूंगी?क्या सभी लडकियां जो वहाँ जा रही हैं इसी लिए जा रहे हैं?उनके पेरेंट्स उनको क्यों नहीं रोक रहे?’
इसी रौ में उसने होस्टल ज्वाइन करने की इच्छा भी जाहिर कर दी.वह यह भी भूल गयी कि महेश कका उसका आधा खर्च वहन कर रहे हैं.होस्टल का खर्च वह कहाँ से लाएगी?
उसके तेवर देख कर चाची तो तमक उठी और बोल दिया-
‘जाने दीजिये इसको होस्टल.जब उसे आपकी इज्ज़त नहीं करनी तो आप क्यों इसकी फिक्र करते हैं?हम इसके लिए कितना कर रहे हैं इसे उसकी भी परवाह नहीं.बेशर्म हो गयी है.पर निकल गए हैं इसके.’
महेश कका को भी काफी सदमा लगा.दुखी हो कर बोले-
‘बेटा मैंने तो तुझे अपनी बेटी मान लिया था.तेरा भला बुरा सोचना मेरा फ़र्ज़ था. लेकिन तुझे मेरी बातें बुरी लग रही हैं तो अपने मन की कर ले .हाँ,इतना जरूर कहूंगा कि तेरे बाबू की स्थिति ऐसी नहीं कि होस्टल का खर्च उठा सकें.अभी तो तेरा फर्स्ट इअर ही है.’
लेकिन प्रिया पर उनकी बातों का कोई असर नहीं हुआ.वह गुस्से में थी और उसने होस्टल जाने का निश्चय कर लिया था.दूसरे दिन वह इस बारे में दोस्तों से बात करने वाली थी.आज की पार्टी में शामिल न हो पाने का भी उसे बहुत मलाल था.
कालेज पहुँचने पर कुछ और ही चर्चा थी.रात की पार्टी में स्टूडेंट्स के दो गुटों में जम कर हाथापाई हुई थी.बोतलें और कुर्सियाँ चली थीं.पुलिस आ गयी थी.अमित, नेहा और सुष्मिता को रात भर थाने में रहना पड़ा था.सुबह पेरेंट्स को बुला कर उन्हें चेतावनी दी गयी थी.
प्रिया के लिए ऐसी घटना अकल्पनीय थी वह महेश कका से कुतर्क करने के लिए शर्मिन्दा थी.दूसरे दिन के न्यूज़ पेपर में घटना की ख़बर फोटो सहित थी.उसके ग्रुप के कुछ स्टूडेंट्स के फोटो और नाम भी थे..
इस घटना के बाद प्रिया को अहसास हो गया कि महेश कका सदा उसके भले की ही बातें करते हैं.उसे आश्चर्य भी हुआ कि उसने किस दम पर होस्टल ज्वाइन करने का विचार बना लिया था.महेश कका से मुंह्जोरी करने का भी उसे बहुत दुःख था. उनसे आँखें मिलाने में भी उसको शर्म आ रही थी.हाँ एक फायदा जरूर हुआ,इसके बाद कभी परु महेश कका से पूछे बिना एक कदम भी नहीं चली.इसी का परिणाम था कि प्रिया ने अपनी मेडिकल के पढाई सफलता पूर्वक पूरी की.
आज परु को इस बात का अहसास है कि महेश कका ने ही उसके जीवन की दिशा बदली है.उनका बहुत बड़ा अहसान है जिसे जिंदगी भर नहीं भूल सकती-डाक्टर प्रिया जोशी

कहानी यहीं समाप्त होती है.इससे आगे जहाँ तक मुझे मालूम है बता दूँ-प्रिया,उसकी माँ और जोस्ज्यु ने कभी ऐसा व्यवहार नहीं किया जिससे गाँव वाले यह कह सकें कि ये लोग ओच्छि गए हैं.हाँ चंदू को अपनी दीदी के डाक्टर होने पर जरूर गर्व है और इसे वह अपने दोस्तों पर प्रकट भी कर देता है.
डाक्टर प्रिया की नौकरी भी पहाड़ के एक प्राईमरी अस्पताल मे लग गई.सुना है उसका चिह्न किसी डाक्टर अतुल पन्त के लिए गया है.चिह्न साम्य हो गया तो ब्याह पक्का ही समझो क्योंकि दोनों ही समकक्ष संबंधों वाले ठहरे और डाक्टर अतुल के पिताजी केमिस्ट्री के मास्टर तारा दत्त जी हुए जिन्होंने पारु को पढाया था और उसे पसंद भी करते थे.

आप सभी का हार्दिक धन्यवाद. मैं आप लोगों की सोच को नमन करता हूँ. मैं आपका गुनहगार हूँ. इसलिये क्षमा प्रार्थी भी हूँ. मैं समय मिलते ही कहानी के अंतिम भाग को लंबा करके लिखने की कोशिश करुंगा. ब्लॉग पर छापूं ना छापूं लेकिन इससे कमसे कम मेरा अपराधबोध तो कम होगा ही. आप आते रहें और मेरा मार्ग दर्शन करते रहें यही कामना है.

Apr 252008
 

अरुण जी इस सिरीज पर नियमित टिपियाकर इसे जारी रखने का हौसला दे रहे हैं. वह पिछ्ले कई अंकों से मुशायरे के इंतजार में हैं.पिछ्ले अंक में उन्होने कहा “शेर के नाम पर गीदड तक के दर्शन नही कराये” . तो ज़नाब आज उनका और आपका भी इंतजार खत्म होता है.पेश है एक रोचक मुशायरा. आनंद लें.आनंद आये तो टिपिया दें बस.

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साग़र जालौनवी : रात के बारह बजे थे चारों ओर श्रोताओं की तूती बोल रही थी।मुशायरे के शोर से सहम कर गांव की सरहद पर गीदड़ों ने बोलना बन्द कर दिया था। एक स्थानीय शायर ख़ुद को हर शेर पर हूट करवा कर सर झुकाये जा रहा था कि एक साहब चांदनी पर चलते हुए मुशायरे के अध्यक्ष तक पहुंचे, दायें हाथ से आदाब किया और बायें हाथ से अपनी मटन-चाप मूंछ जो खिचड़ी हो चली थी, ताव देते रहे। उन्होंने प्रार्थना की कि मैं एक ग़रीब परदेसी हूं, मुझे भी शेर पढ़ने की इजाजत दी जाये। उन्होंने ख़बरदार किया कि अगर पढ़वाने में देर की गई तो उनका दर्जा ख़ुद-ब-ख़ुद ऊंचा होता चला जायेगा और वो उस्तादों से पहलू मारने लगेंगे। उन्हें इजाजत दे दी गयी। उन्होंने खड़े हो कर दर्शकों को दायें, बायें और सामने घूम कर तीन-बार आदाब किया। उनकी क्रीम रंग की अचकन इतनी लम्बी थी कि भरोसे से नहीं कहा जा सकता था कि उन्होंने पाजामा पहन रक्खा है या नहीं। काले मख़मल की टोपी को जो भीड़-भड़क्के में सीधी हो गई थी, उन्होंने उतार कर फूंक मारी और अधिक टेढ़े एंगिल से सर पर जमाया। मुशायरे के दौरान यह साहब छटी लाइन में बैठे अजीब अन्दाज से “ऐ सुब्हानल्ला-सुब्हानअल्ला” कह कर दाद दे रहे थे। जब सब ताली बजाना बन्द कर देते तो यह शुरू हो जाते और इस अन्दाज में बजाते जैसे रोटी पका रहे हैं। फ़र्शी आदाब करने के बाद वो अपनी डायरी लाने के लिये अचकन इस तरह ऊपर उठाये अपनी जगह पर वापस गये जैसे कुछ औरतें भरी बरसात और चुभती नजरों की सहती-सहती बौछारों में, सिर्फ़ इतने गहरे पानी से बचने के लिये जिसमें चींटी भी न डूब सके, अपने पांयचे दो-दो बालिश्त ऊपर उठाये चलती हैं और देखने वाले क़दम-क़दम पे दुआ करते हैं कि “इलाही ये घटा दो दिन तो बरसे”।

अपनी जगह से उन्होंने अपनी डायरी उठाई, जो दरअस्ल स्कूल का एक पुराना हाजिरी रजिस्टर था जिसमें इम्तिहान की पुरानी कापियों के ख़ाली पन्नों पर लिखी हुई ग़जलें रखी थीं। उसे सीने से लगाये वो साहब वापस मुशायरे के अध्यक्ष के पास पहुंचे। हूटिंग किसी तरह बन्द होने का नाम ही नहीं लेती थी। ऐसी हूटिंग नहीं देखी कि शायर के आने से पहले और शायर के जाने के बाद भी जोरों से जारी रहे। अपनी जेबी घड़ी एक बार बैठने से पहले और बैठने के बाद ध्यान से देखी। फिर उसे डमरू की तरह हिलाया और कान लगा कर देखा कि अब भी बन्द है या धक्कमपेल से चल पड़ी है। जब फ़ुरसत पाई तो श्रोताओं से बोले, ‘‘हजरात! आपके चीख़ने से मेरे तो गले में ख़राश पड़ गई है।’’

इन साहब ने अध्यक्ष और श्रोताओं से कहा कि वे एक ख़ास कारण से ग़ैर-तरही ग़जल पढ़ने की इजाजत चाहते हैं, मगर कारण नहीं बताना चाहते। इस पर श्रोताओं ने शोर मचाया। हल्ला जियादा मचा तो उन साहब ने अपनी अचकन के बटन खोलते हुए ग़ैर-तरही ग़जल पढ़ने का यह कारण बताया कि मिसरा ‘तरह’ दिया गया है उसमें ‘सकता’ (छन्द दोष) पड़ता है, ‘मरज’ शब्द को ‘फ़र्ज’ के ढ़ंग पर बांधा गया है। श्रोताओं की आख़िरी पंक्ति से एक दाढ़ी वाले बुजुर्ग ने उठ कर न सिर्फ़ सहमति व्यक्त की बल्कि ये चिंगारी भी छोड़ी कि अलिफ़ (आ की ध्वनि को अ बांधना) भी गिरता है।

यह सुनना था कि शायरों पर अलिफ़ ऐसे गिरा जैसे फ़ालिज गिरता है। सकते में आ गये। श्रोताओं ने आसमान, मिसरा-तरह और शायरों को अपने सींगों पर उठा लिया। एक हुल्लड़ मचा हुआ था। जौहर इलाहाबादी कुछ कहना चाहते थे मगर अब शायरों के कहने की बारी ख़त्म हो चुकी थी। फब्तियों, ठठ्ठों और गालियों के सिवा कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। ऐसा स्थिति थी कि अगर उस समय जमीन फट जाती तो बिशारत स्वयं को, मय कानपुर के शायरों और मौलवी मज्जन को गावतकिये समेत उसमें समा जाने के लिये ख़ुशी से ऑफ़र कर देते।

उस एतराज करने वाले शायर ने अपना उपनाम साग़र जलौनवी बताया, लोग बड़ी देर से उकताये बैठे थे। साग़र जलौनवी के धमाकेदार एतराज से ऊंघते मुशायरे में जान ही नहीं, तूफ़ान आ गया। दो गैस की लालटेनों का तेल पन्द्रह मिनट पहले खत्म हो चुका था। कुछ में वक़्त पर हवा नहीं भरी गयी। वो फुस्स हो कर बुझ गईं। साग़र जलौनवी के एतराज के बाद किसी शरारती ने बाक़ी लालटेनों को झड़झड़ाया, जिससे उनके मेंटल झड़ गये और अंधेरा हो गया। अब मारपीट शुरू हुई, लेकिन ऐसा घुप्प अंधेरा था कि हाथ को शायर सुझायी नहीं दे रहा था इसलिये बेक़सूर श्रोता पिट रहे थे। इतने में किसी ने आवाज लगाई, भाइयो! हटो! भागो! बचो! रण्डियों वाले हकीम साहब की भैंस रस्सी तुड़ा गई है। यह सुनते ही घमासान की भगदड़ पड़ी। अंधेरी रात में काली भैंस तो किसी को दिखाई नहीं दी लेकिन लाठियों से लैस मगर घबराये हुए देहातियों ने एक दूसरे की, भैंस समझ कर ख़ूब धुनाई की। लेकिन आज तक यह समझ न आया कि चुराने वालों ने ऐसे घुप अंधेरे में नये जूते कैसे पहचान लिये और जूते की क्या, हर चीज जो चुरायी जा सकती थी चुरा ली गयी। पानों की चांदी की थाली, दर्जनों अंगोछे, साग़र जलौनवी की दुगनी साइज की अचकन, जिसके नीचे कुरता या बनियान नहीं था। एक जाजम, तमाम चांदनियां, यतीमख़ाने के चंदे की सन्दूक़ची, उसका फ़ौलादी ताला, यतीमख़ाने का काला बैनर, मुशायरे के अध्यक्ष का गाव-तकिया और आंखों पर लगा चश्मा, एक पटवारी के गले में लटकी हुई दांत कुरेदनी और कान का मैल निकालने की डोई, ख़्वाजा क़मरूद्दीन की जेब में पड़े आठ रुपये, इत्र में बसा रेशमी रूमाल और पड़ौसी की बीबी के नाम महकता ख़त (यही एक चीज थी जो दूसरे दिन बरामद हुई और इसकी नक़्ल घर-घर बंटी), हद ये कि कोई बदतमीज उनकी टांगों में फंसे चूड़ीदार का रेशमी नाड़ा एक ही झटके में खींचकर ले गया। एक शख़्स बुझा हुआ हंडा सर पर उठा के ले गया। माना कि अंधेरे में किसी ने सर पर ले जाते हुए तो नहीं देखा, मगर हंडा ले जाने का सिर्फ़ यही एक तरीक़ा था। बीमार मुर्ग़ियों के केवल कुछ पर पड़े रह गये। साग़र जलौनवी का बयान था कि

एक बदमाश ने उसकी मूंछ तक उखाड़ कर ले जाने की कोशिश की जिसे उसने अपनी चीख से नाकाम कर दिया। यानी इस बात की चिंता किये बिना कि उपयोगी है या नहीं, जिसका जिस चीज पर हाथ पड़ा उसे उठा कर, उतार कर, नोच कर, फाड़ कर, उखाड़ कर ले गया। हद यह कि तहसीलदार के पेशकार मुंशी बनवारी लाल माथुर के इस्तेमाल में आते डेंचर्स भी। केवल एक चीज ऐसी थी जिसे किसी ने हाथ नहीं लगाया। शायर अपनी डायरियां जिस जगह छोड़ कर भागे थे वो दूसरे दिन तक वहीं पड़ी रहीं।

बाहर से आये देहातियों ने यह समझकर कि शायद यह भी मुशायरे का हिस्सा है, मार-पीट और लूट-खसोट में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया और बाद को बहुत दिन तक हर आये-गये से बड़े चाव से पूछते रहे कि अगला मुशायरा कब होगा।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

इस भाग की अन्य कड़ियां.

1. फ़ेल होने के फायदे 2. पास हुआ तो क्या हुआ 3. नेकचलनी का साइनबोर्ड 4. मौलवी मज्जन से तानाशाह तक 5. हलवाई की दुकान और कुत्ते का नाश्ता 6. कुत्ता और इंटरव्यू 7. ब्लैक होल ऑफ़ धीरजगंज 8. कोई बतलाओ कि हम बतलायें क्या? 9. विशेष मूली और अच्छा-सा नाम 10. ज़लील करने के कायदे 11. आइडियल यतीम का हुलिया 12. ज़लील करने के अलग अलग शेड 13.कुत्ते की तारीफ और मुशायरा 14. शायरों की खातिरदारी 15. इक्के का आविष्कार घोड़े ने किया 16.मुशायरे की तैयारी 17. तवायफ़ के किस्से 18. मूलगंज: तवायफों का जिक्र 19. और मुशायरा लुट गया

पहला भाग

Apr 202008
 

तो ख़ुदा आपका भला करे और मुझे माफ करे… मूलगंज रंडियों का चकला था।उस जमाने में भी लोगों का चाल-चलन इतना ही ख़राब था,जितना अब है। मगर निगाह अभी उतनी ख़राब नहीं हुई थी कि तवायफ़ों को बस्ती को आजकल की तरह ‘बाजारे हुस्न’ कहने लगें। चकले को चकला ही कहते थे।

दुनिया में कहीं और बदसूरत रंडियों के कोठों और बेडौल , विहंगम जिस्म के साथ यौन रोग बेचने वालियों की चीकट कोठरियों को इस तरह ग्लैमराइज़ नहीं किया गया।‘ बाजारे हुस्न’ की रोमांटिक उपमा आगे चलकर उन साहित्यकारों ने प्रचलित की जो कभी तुरंत उपलब्ध होने वाली औरतों की बकरमंडी के पास भी नहीं गुजरे थे , लेकिन निजी तजरुबा इतना आवश्यक भी नहीं। ‘रियाज खैराबादी’ सारी उम्र शराब की तारीफ़ में शेर कहते रहे , जब कि उनकी तरल पदार्थों की बदपरहेज़ी कभी शरबत और सिकंजी से आगे नहीं बढ़ी। दूर क्यों जायें , खुद हमारे शायर मक़तल , फांसी घाट,ज़ल्लाद और रस्सी के बारे में ललचाने वाली बातें करते रहे हैं। इसके लिये फांसी पे झुला होना जुरुरी नहीं।

ऐश की दाद देने और रात की गलियों में चक्कर लगाने की हिम्मत या ताकत न हो तो “हवस सीनों में छुप-छुप कर बना लेती है तस्वीरें” और सच तो ये है कि ऐसी ही तसवीरों के रंग जियादा चोखे और लकीरें जियादा दिलकश होती हैं। क्यों? केवल इसलिये कि ख़याली होती हैं। अजंता और ऐलोरा की गुफाओं के Frescos ( भित्ति-चित्र) और मूर्तियां इसके क्लासिक उदाहरण हैं। कैसे भरे पूरे बदन बनायें हैं बनाने वालों ने,और बनाने पर आये तो बनाते ही चले गये। मांसल मुर्ति बनाने चले तो हर Sensuous लकीर बल खाती,गदराती चली गयी। सीधी सादी लकीरें आपको मुश्किल से दिखायी पड़ेंगी। हद ये कि नाक तक सीधी नहीं। भारी बदन की इन औरतों और अप्सराओं की मूर्तियां अपने मूर्तिकार के विचारों की चुगली खाती हैं। नारंगी के फांक जैसे होंठ। बर्दाश्त से ज़ियादा भरी भरी छातियां जो खुद मूर्तिकार से भी संभाले नहीं संभलती।बाहर को निकलते हुए भारी कूल्हे, जिन पर गागर रख दें तो हर कदम पर पानी, देखने वालों के दिल की तरह उछ्लता चला जाये। उन गोलाइयों के खमों के बीच बलखाती कमर और जैसे ज्वारा भाटे के पीछे हटती लहर, फिर वो टांगे जिनकी उपमा के लिये संस्कृत शायर को केले के तने का सहारा लेना पड़ा। इस मिलन से अपरिचित और अनुपलब्ध बदन को और उसकी इच्छा की सीमा तक Exaggerated लकीरों और खुल-खेलते उभारों को उन तरसे हुए ब्रह्मचारियों और भिक्षुओं ने बनाया और बनवाया है जिन पर भोग-विलास वर्जित था और जिन्होने औरतों को सिर्फ फ़ैंटेसी और सपने में देखा था और जब कभी सपने में वो इतने करीब आ जाती कि उसके बदन की आंच से अपने लहू में अलाव भड़क उठता तो फौरन आंख खुल जाती और वो हथेली से आंखें मलते हुए पथरीली चट्टानों पर अपने सपने लिखने शुरु कर देते।

मुशायरा किसने लूटा : जौहर इलाहाबादी, काशिफ़ कानपुरी और नुशुर वाहिदी को छोड़कर बाक़ी स्थानीय और बाहरी शायरों को काव्य पाठ में आगे-पीछे पढ़वाने का मसअला बड़ा टेढ़ा निकला, क्योंकि सभी एक-दूसरे के बराबर थे और ऐसी बराबर की टक्कर थी कि यह कहना मुश्किल था कि उनमें कम बुरे शेर कौन कहता है ताकि उसको बाद में पढ़वाया जाये। इस समस्या का हल यह निकाला गया कि शायरों को अक्षरक्रम के उल्टी तरफ़ से पढ़वाया गया यानी पहले यावर नगीनवी को अपनी हूटिंग करवाने की दावत दी गई। अक्षरक्रम के सीधी तरफ़ से पढ़वाने में ये मुश्किल थी उनके उस्ताद जौहर इलाहाबादी को उनसे भी पहले पढ़ना पड़ता।

मुशायरा स्थल पर एक अजब हड़बोंग मची थी। उम्मीद के विपरीत आस-पास के देहात से लोग झुण्डों में आये। दरियां और पानी कम पड़ गया। सुनने में आया कि मौली मज्जन के दुश्मनों ने ये अफ़वाह फैलायी कि मुशायरा खत्म होने के बाद लड्डुओं, खजूर का प्रसाद और मलेरिया तथा रानीखेत (मुर्गियों की बीमारी) की दवा की पुड़ियां बटेंगी। एक देहाती अपनी दस बारह मुर्गियां झाबे में डाल के लेकर आया था कि सुब्ह तक बचने की उम्मीद नहीं थी। इसी तरह एक किसान अपनी जवान भैंस को नहला धुला कर बड़ी उम्मीदों से साथ लाया था, उसके कट्टे ही कट्टे होते थे, मादा बच्चा नहीं होता था। उसे किसी ने ख़बर दी थी कि शायरों के मेले में तवायफ़ों वाले हकीम अहसानुल्लाह ‘तस्लीम’ आने वाले हैं। श्रोताओं की बहुसंख्या ऐसी थी जिन्होंने इससे पहले मुशायरा और शायर नहीं देखे थे।

मुशायरा ख़ासी देर से यानी दस बजे शुरू हुआ, जो देहात में दो बजे रात के बराबर होते हैं। जो नौजवान वॉलंटियर रौशनी के इंतिजाम के इंचार्ज थे, उन्होंने मारे जोश के छह बजे ही गैस की लालटेनें जला दीं जो नौ बजे तक अपनी बहारें दिखा कर बुझ गयीं। उनमें दोबारा तेल और हवा भरने और काम के दौरान आवारा लौंडों को उनकी शरारत और जुरूरत के मुताबिक़ बड़ी, और बड़ी गावदुम गाली देकर परे हटाने में एक घंटा लग गया। तहसीलदार को उसी दिन कलैक्टर ने बुला लिया था। उसकी अनुपस्थिति से लौंडों-लहाड़ियों को और शह मिली। रात के बारह बजे तक कुल सत्ताईस शायरों का भुगतान हुआ। मुशायरे के अध्यक्ष मौली मज्जन को किसी जालिम ने दाद का अनोखा तरीक़ा सिखाया था। वो वाह वाह! कहने के बजाय हर शेर पर मुकर्रर इरशाद (दुबारा पढ़िये) कहते थे, नतीजा सत्ताईस शायर चव्वन के बराबर हो गये। हूटिंग भी दो से गुणा हो गई। क़ादिर बाराबंकवी के तो पहले शेर पर ही श्रोताओं ने तम्बू सर पर उठा लिया। वो परेशान हो कर कहने लगा, “हजरात! सुनिये तो! शेर पढ़ा है, गाली तो नहीं दी।’’ इस पर श्रोता और बेक़ाबू हो गये, मगर उसने हिम्मत नहीं हारी, बल्कि एक शख़्स से बीड़ी मांग कर बड़े इत्मीनान से सुलगा ली और ऊंची आवाज में बोला, ‘‘आप हजरात को जरा चैन आये तो अगला शेर पढूं।” मिर्जा के अनुसार मुशायरों के इतिहास में यह पहला मुशायरा था जो श्रोताओं ने लूट लिया।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

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किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

इस भाग की अन्य कड़ियां.

1. फ़ेल होने के फायदे 2. पास हुआ तो क्या हुआ 3. नेकचलनी का साइनबोर्ड 4. मौलवी मज्जन से तानाशाह तक 5. हलवाई की दुकान और कुत्ते का नाश्ता 6. कुत्ता और इंटरव्यू 7. ब्लैक होल ऑफ़ धीरजगंज 8. कोई बतलाओ कि हम बतलायें क्या? 9. विशेष मूली और अच्छा-सा नाम 10. ज़लील करने के कायदे 11. आइडियल यतीम का हुलिया 12. ज़लील करने के अलग अलग शेड 13.कुत्ते की तारीफ और मुशायरा 14. शायरों की खातिरदारी 15. इक्के का आविष्कार घोड़े ने किया 16.मुशायरे की तैयारी 17. तवायफ़ के किस्से 18. मूलगंज: तवायफों का जिक्र

पहला भाग

Apr 182008
 

हकीम अहसानुल्लाह ‘तस्लीम’ का दावा था कि उन्होंने इमामत, हकीमी और शायरी बुजुर्गों से पाई है। गर्व से कहते थे कि उनके दादा हकीम अहतिशाम हुसैन राना की क़न्नौज में इतनी बड़ी जमींदारी थी कि एक नक़्शे में नहीं आती थी। अब नक़्शे उनके क़ब्जे में और जमींदारी महाजन के क़ब्जे में थी।हकीम साहब के पास एक ऐसा ख़ानदानी नुस्ख़ा था कि शर्तिया लड़की पैदा होती। यह एक भस्म थी जो तवायफ़ उस रात के राजा या विशेष अतिथि को चुपके से पान में डाल कर खिला देती। इस नुस्ख़े के ठीक होने की प्रसिद्धि इस क़दर थी कि कानपुर में किसी गृहस्थ के भी लड़की पैदा होती तो वो मियां के सर हो जाती हो न हो तुम वहीं से पान खा कर आये थे। तवायफ़ कितनी भी हसीन हो उनकी नीयत सिर्फ़ उसके पैसे पर बिगड़ती थी। तवायफ़ें उनसे बड़ी आस्था और श्रद्धा रखती थीं। कहने वाले तो यहां तक कहते थे कि उनके मरने का बड़ी बेचैनी से इंतजार कर रही हैं ताकि संगे-मरमर का मजार बनवायें और हर साल धूमधाम से उर्स मनायें।

मूलगंज का जिक्र ऊपर की पंक्तियों और कानपुर से संबंधित दूसरे चित्रों में जगह-जगह बल्कि जगह-बेजगह आया है। इस मुहल्ले में तवायफें रहती थी। ये विशारत का पसंदीदा विषय है,जिससे हमारे पाठक पूरी तरह से परिचित हो चुके होंगे।हांलाकि बिना संदेह के वे दूसरे ग्रुप के आदमी हैं।

बाजार से गुजरा हूँ खरीददार नहीं हूँ

जैसे कई एलर्जिक कारणों से लोगों की पित्ती उछ्ल जाती है. उसी तरह उनकी बातचीत में तवायफ …अवसर देखे न जगह …छ्न से आन खड़ी होती थी।संयमी हैं, कभी के नाना-दादा बन गये , मगर तवायफ़ है कि किसी तरह से उनके सिस्टम से निकलने के लिये राज़ी ही नहीं होती। एक बार हमने आड़े हाथों लिया। हमने कहा , हज़रत! पुरानी कहानियों में हीरो की और राक्षस की जान किसी तोते में अटकी होती है। कहने लगे, मेरी कहानी में मिट्टी डालिये। ये देखिये कि आजकल की फ़िक्शन और फ़िल्मों में हीरो और हीरोईन से कौन से धर्मग्रंथ पढ़्वाये जा रहे हैं।जिस सोच के मुताबिक पहले तवायफ़ कहानी में डाली जाती थी, अब इस काम के लिये शरीफ़ घराने की बहू-बेटियों को तकलीफ़ दी जाती है। पढ़ने वाले और फ़िल्म देखने वाले आह भी तवायफ़ को उस तरह उचक लेते हैं जैसे मरीज हकीमों के नुस्ख़े में से मुनक्क़ा।

और विशारत कुछ ग़लत नहीं कहते थे। शायद आज उस मनस्थिति का अन्दाजा करना मुश्किल हो लेकिन तवायफ़ उस डगमग़ाते हुए समाज के सम्पन्न वर्ग की इन्द्रियों पर वर्जित सुख की तरह छायी हुई थी, और ये कुछ उस दौर से ही संबंधित नहीं।औरंगजेब के बारे में मशहूर है कि उसने दुनिया के सबसे पुराने पेशे को समाप्त करने के लिये एक फ़रमान जारी किया था कि एक निश्चित तारीख़ तक सारी तवायफ़ें शादी कर लें , वरना उन सबको नाव में भरकर यमुना में डुबो दिया जायेगा। अधिकतर तवायफ़ें डूबने को हांडी-चूल्हे पर और मगरमच्छ के जबड़े को ऐसे लफंगों पर प्रमुखता देती थीं जो प्यार भी करते थे तो इबादत की तरह , यानी बड़ी पाबंदी के साथ और पूरी बेदिली के साथ। बहुत से तवायफ़ों ने इस धन्धे से तौबा कर ली और निकाह कर लिये।

हो चुकीं ग़ालिब बलायें सब तमाम

एक  अक़्दे-नागहानी      और      है

अब ज़रा इसके दौ सौ बरस बाद की एक झलक ‘तज़किरा-ए-ग़ौसिया’ में मुलाहिज़ा फ़रमायें। इसके लेखक मौलवी महम्मद एस्माईल मेरठी अपने श्रद्धास्पद पीरो-मुर्शिद (गुरु) के बारे में एक घटना लिखते हैं “ एक रोज आदेश हुआ , कि जब हम दिल्ली की मस्जिद में ठहरे हुए थे, हमारे दोस्त कम्बलपोश ने हमारी दावत की। शाम की नमाज़ के बाद हमको लेकर चले। चांदनी चौक में पहुंच एक तवायफ़ के कोठे पएअ हमको बैठा दिया और आप चंपत हो गये। पहले तो हमने सोचा कि खाना इसी जगह पकवाया होगा, मगर मालूम हुआ कि यूं ही बिठा कर चल दिया है। हम बहुत घबराये भला ऐसी जगह कमबख़्त क्यों लाया। दो घड़ी बाद हँसता हुआ आया और कहने लगा मियां साहब! मैं आपकी भड़क मिटाने यहां बैठा गया था।बाद में अपने घर ले गया और खाना खिलाया।

यद रहे कि कम्बलपोश एक आजाद और मनमौजी आदमी था, ये घटना उस समय की है जब गुरु की सोहबत में उनका दिल बदल चुका था। सोचिये , जिसकी पतझड़ का ये रंग हो उसकी बहार कैसी रही होगी।

जोश जैसा शब्दों का जादूगर , ख़ानदानी , सुरुचि सम्पन्न और नफ़ासत पसंद शायर जब जीवन के स्वर्ग और असीमित सुख की तसवीर खींचता है तो देखिये इसका क़लम क्या गुल खिलाता है

“ कूल्हे पे हाथ रखकर थिरकने लगी हयात “

कूल्हे पे हाथ रखकर थिरकने में कोई हरज नहीं , बशर्ते कूल्हा अपना ही हो। दूसरे, थिरकना पेशेवर काम हो शौक़िया ना हो। मतलब ये कि कोई कूल्हे पे हाथ रख के थिरकने लगे तो किसी को क्या एतराज हो सकता है , मगर इससे जात पहचानी जाती है।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

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किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

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कीमत-200 रुपये मात्र

इस भाग की अन्य कड़ियां.

1. फ़ेल होने के फायदे 2. पास हुआ तो क्या हुआ 3. नेकचलनी का साइनबोर्ड 4. मौलवी मज्जन से तानाशाह तक 5. हलवाई की दुकान और कुत्ते का नाश्ता 6. कुत्ता और इंटरव्यू 7. ब्लैक होल ऑफ़ धीरजगंज 8. कोई बतलाओ कि हम बतलायें क्या? 9. विशेष मूली और अच्छा-सा नाम 10. ज़लील करने के कायदे 11. आइडियल यतीम का हुलिया 12. ज़लील करने के अलग अलग शेड 13.कुत्ते की तारीफ और मुशायरा 14. शायरों की खातिरदारी 15. इक्के का आविष्कार घोड़े ने किया 16.मुशायरे की तैयारी 17. तवायफ़ के किस्से

पहला भाग

Apr 162008
 

आज परुली बहुत खुश थी.आज उसकी बारात जो आने वाली थी. उसकी सखियाँ उसे तैयार करते करते बार बार उसे चिढ़ाती और परु इस बात का बुरा भी नहीं मानती.सर में माँगटीका, नाक में नथ, हाथों में पहुंची और पिछोड़ा ओढ़ी हुई परु बहुत सुन्दर लग रही थी. बारात आने में अभी देर थी. परुली सोच में डूब गयी.

जब वह बीमार हुई थी तब उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि इतनी खुशियाँ उसे एक साथ मिल जायेंगी. वह समय दुख, क्षोभ और किस्मत को कोसने वाला समय था. उस समय तो उसकी बीमारी की बात सब जगह फैल गयी थी. पहाड़ों में बातें छिपती कहाँ है.बिना टेलीफोन, मोबाइल जैसे संचार के साधनो के बिना भी सभी बातें आसानी से एक जगह से दूसरी जगह पहुंच जाती. यह बात और थी कि मूल बात में नमक मिर्च की मात्रा बताने वाले की योग्यता और सुनने वाले की क्षमता के आधार पर घटती बढ़ती जाती. परुली की बीमारी की चर्चा मलगाड़ भी पहुंच गयी. पांडे जी को जब पता चला तो वह बेचैन हो गये. अभी तक वह मंगसीर में शादी करने के लिये जोस्ज्यू को तैयार कर रहे थे.लेकिन अब उन्होने सोच लिया कि वह इस बारे में और जोर नहीं देंगे बल्कि वह तो ऐसे मौके की तलाश में थे जिससे की वह किसी तरह इस ब्या के लिये मना कर सकें.

इधर जोस्ज्यू को जब परुली की ईजा ने परुली की सारी बात बतायी तो वह और चिंतित हो गये.उन्होने निश्चय किया कि वह पांडे ज्यू से सीधे सीधे कहेंगे कि वह परुली की शादी अभी नहीं करना चाहते.साथ ही वह परुली को दिखाने के लिये शहर भी ले गये जहाँ कोई डाक्टर पुनेठा थे. वह सप्ताह में दो दिन नंदादेवी मंदिर के पास बैठते थे.पहाड़ की चढ़ाई को चढ़ना कमजोर परुली के लिये काफी मुश्किल था फिर भी किसी तरह उसने उसे पार किया. रास्ते में बाबू ने उसे बताया कि उन्होने अभी उसका ब्या ना करने का फैसला लिया है.

पुनेठा डाक्टर की दवाई से परुली को काफी फायदा हुआ. एक महीने के अन्दर परुली स्कूल जाने लायक और घर के छोटे छोटे काम करने लायक हो गयी. वह मन लगाकर पढ़ाई भी करती.ब्या टूटने के कारण उन लोगों की कुछ बदनामी तो हो ही चुकी थी.गांव में उसके बारे में भी लोग तरह तरह की बाते करते लेकिन परुली इन बातों को अनसुना कर देती. बोर्ड का रिज़ल्ट आया तो परुली अच्छे नम्बरों से सैकेंड डिवीजन में पास हो गयी.आगे की पढ़ाई के लिये उसने बायलॉजी ले ली. उसका एक ही लक्ष्य था कि उसे डॉक्टर बनना है. जो विश्वास उस पर उसके ईजा बोज्यू ने दिखाया था उसे वह तोड़ना नहीं चाहती थी.

आखिर वह दिन आ ही गया जब मेडिकल की प्रवेश परीक्षा में उसका नाम आ ही गया.पहली बार वह शहर से बहुत दूर लखनऊ गयी, बाबू के साथ. कितना बड़ा शहर. इतना बड़ा शहर देखकर ही उसे घबराहट सी होने लगी लेकिन उसने अपनी घबराहट को किसी तरह काबू किया और वह बाबू को विश्वास दिलवाते रही कि वह हॉस्टल में आराम से रहेगी. जोस्ज्यू ने भी अपनी खत्याड़ी वाली जमीन बेच दी थी ताकि परुली की पढ़ाई के लिये पैसे का इंतजाम हो सके.

परुली की पढ़ाई पूरी हो गयी. वह अपरेंटिस के लिये अपने गांव के पास वाले शहर के बेस अस्पताल में आ गयी. यहीं उसकी मुलाकात डाक्टर अतुल से हुई. डाक्टर प्रिया जोशी और डाक्टर अतुल पंत की आपस में बहुत अच्छी बनती थी. इसके पीछे एक कारण यह भी था कि दोनों ही बहुत गरीब परिवार से आये थे और दोनों के दिल में काम करने और अपने पहाड़ के लिये बहुत कुछ करने के सपने बसे थे. विधाता को भी उनका मेल शायद मंजूर था इसलिये जब प्रिया का चिन्ह ,अतुल के चिन्ह के साथ मिलाया गया तो वह मिल गया और दोनों का शादी पक्की हो गयी.

“बारात बस पहुचने वाली ही है दुल्यर्घ की तैयारी करो हो.” किसी ने कहा तो जैसे उसकी तंद्रा टूटी.वहा भाग कर अन्दर वाले कमरे में जाकर अपनी नथ ठीक करने लगी. इधर पटांगण में ऐपण से दुल्यर्घ चौकी बनायी गयी थी. वहाँ पर सारी तैयारी पूरी थी. परु का छोटा भाई भी बारात का स्वागत करने के लिये रंग बिरंगी छाता लेकर तैयार खड़ा था.बाहर की लाइट में चमक रहा था. प्रिया वैड्स अतुल…….

समाप्त……

पिछले भाग : 1. परुली…. 2. परुली: चिन्ह साम्य होगा क्या ?? 3. परूली : शादी की तैयारी 4. परुली:आखिर क्या होगा ? 5. परुली: हिम्मत ना हार ..6. परुली : ब्या कैसे टलेगा 7. परुली:ब्या टालने की उहापोह 8. परुली : अभी नानतिन ही हुई हो 9. परुली : यह कैसी बीमारी?

Apr 152008
 

communication प्रवचन सुनकर लौटते हुए मनोहर और श्याम बातें करते हुए जा रहे थे.वह दोनों स्वामी जी की भक्तिपूर्ण बातों से बहुत प्रभावित थे. तभी मनोहर के मन में एक प्रश्न उठा कि क्या पूजा करते समय सिगरेट पीना उचित है ? उसने श्याम से पूछा. श्याम ने कहा कि तुम यह सवाल स्वामी जी से ही क्यों नहीं पूछ्ते.

मनोहर स्वामी जी के पास गया और उसने पूछा.

“स्वामी जी, क्या मैं पूजा करते समय सिगरेट पी सकता हूँ.”

स्वामी जी ने जबाब दिया. “नहीं बेटा, बिल्कुल नहीं, यह तो ईश्वर के प्रति अप्रेम और अश्रद्धा दिखाना है.”

मनोहर ने आकर श्याम को बताया कि स्वामी जी ने उससे क्या कहा. श्याम ने कहा ठीक ही तो है तुमने सवाल गलत पूछा तो तुम्हें जबाब भी गलत मिला. रुको मैं कोशिश करता हूँ. अब श्याम स्वामी जी के पास गया और उसने पूछा.

“स्वामी जी, क्या मैं सिगरेट पीते समय पूजा कर सकता हूँ.”

स्वामी जी ने जबाब दिया. “क्यों नहीं बेटा, बिल्कुल कर सकते हो. यह तो ईश्वर के प्रति प्रेम और श्रद्धा का सूचक है”

शिक्षा: जैसा जबाब चाहते हो वैसा सवाल पूछो. 

[मुझे यह कहानी अंग्रेजी में एक ई-मेल से मिली जिसे मैने हिन्दी में भावानुवाद कर दिया]

Apr 132008
 

देखा गया है कि जिस शायर को दूसरे नालायक़ शायरों से दाद लेने की उम्मीद हो वो उन्हें हूट नहीं करता। चोरियां बंद करने का आजमाया हुआ तरीक़ा यह बताया गया है कि चोर को थानेदार बना दो। हमें इसमें इस फ़ायदे के अलावा कि वो दूसरों को चोरी नहीं करने देगा एक फ़र्क़ और नजर आता है। वो ये कि पहले जो माल वो अंधेरी रातों में सेंध लगाकर बड़ी मुसीबतों से हासिल करता था, अब दिन-दहाड़े रिश्वत की शक्ल में थाने में धरवा लेगा। इसी प्रोग्राम के तहत पांच ताजा ग़जलें हकीम अहसानुल्लाह ‘तस्लीम’ से इस वादे पर लिखवा कर लाये कि जाड़े में उनके कुश्तों के लिये पचास तिलेर, बीस तीतर, पांच हरियल और बक़रईद पर पांच ख़स्सी बकरे आधे दामों धीरजगंज से ख़रीदकर भिजवायेंगे।

हकीम अहसानुल्लाह ‘तस्लीम’ मूलगंज की तवायफ़ों के ख़ास हकीम तो थे ही, गाने के लिये उन्हें फ़रमाइशी ग़जल भी लिखकर देते थे। किसी तवायफ़ के पैर भारी होते तो उसके लिये ख़ास तौर से छोटी बहर (छंद) में ग़जल कहते ताकि ठेका और ठुमका न लगाना पड़े। हकीम ‘तस्लीम’ तवायफ़ों के उच्चारण के दोष भी ठीक करते, बाक़ी चीजें ठीक होने से परे थीं। मतलब ये कि वैसे दोष सुधार चाहती थीं लेकिन सुधार से परे थी। उस जमाने में तवायफ़ों और उनके श्रद्धालुओं के दोष सुधारना अदबी फ़ैशन में शामिल था।वास्तव में ये समाजी से जियादा खुद सुधारक का ऐन्द्रिय विषय होता था, जिसका catharsis संभव ना हो, उसका बयान लज़्जत भरा था। गुनाह का जिक्र गुनाह से कहीं जियादा लज़ीज हो सकता है बशर्ते की विस्तृत हो और बयान करने वाला मानसिक और शारिरिक दोनों प्रकार से बूढ़ा हो।एमली जोला की Nana , रुसवा की उमराव जान अदा, टोलार्ज ट्रेक और देगा (Degas) की तवायफ़ों और चकलों की तस्वीरें शारिरिक वास्तविकता के सिलसिले की पहली कड़ी हैं, जबकि क़ारी सरफ़राज़ हुसैन की “शाहिदे-राअना” से रंगीनी के एक दूसरे लज़ीज़ सिलसिले की शुरुआत होती है, जिसकी कड़ियां क़ाजी अब्दुल ग़फ़्फ़ार के लैला के ख़त , गुलाम अब्बास की आनंदी की भरपूर सादगी और मंटो की प्रकट रूप में खुरदरी वास्तविकता लेकिन Inverted Romanticism से जा मिलती है|हमारे यहां तवायफ़ों से संबंधित तमाम बचकाना आश्चर्यों,खुमगुमानियों, सुनी सुनायी बातों और रोमांटिक सोचों …जिससे मिले , जहां से मिले , जिस कदर मिले ….. सबका बोझल अम्बार इस तरह लगाया जाता है कि हर तरफ़ लफ़्जों के तोता मैना फुदकते-चहकते दिखायी देते हैं। जिन्दा तवायफ़ कहीं नजर नहीं आती। रोमेंटिक मलबे तले उसके घुंघरू की आवाज़ तक सुनायी नहीं देती, इस तवाय़फ की निर्माण सामग्री उठती जवानी के मुंहासों भरे अधकचरे ज़जबात से ली गयी है, जिसकी महक रिसर्च स्कॉलरों के रगों में दौड़ती फिरती रौशनाई को मुद्दतों गरमाती रहेगी। इस इच्छा भरे शहर की तवायफ़ ने अपनी Chastity Belt की चाबी दरिया में फेंक दी है और अब उसे किसी से…हद है कि खुद लेखक और अपने आप से भी कोई खतरा नहीं है।

वो सर से है ता नाखूने-पा , नामे-खुदा , बर्फ

बात साठ-सत्तर साल पुरानी लगती है , मगर आज भी उतनी ही सच है। अलग-अलग तबक़ों के लोग तवायफ़ को ज़लील औए नफ़रत के क़ाबिल समझते थे, मगर साथ ही साथ उसकी चर्चा और चिंतन में एक लज़्ज़त महसूस किये बिना नहीं रहते थे। समाज और तवायफ़ में सुधार के बहाने उसकी ज़िन्दगी की तस्वीर बनाने में उनकी प्यास की संतुष्टि हो जाती थी। इस शताब्दी के पहले आधे भाग का साहित्य , विशेष रूप से फ़िक्शन , तवायफ़ के साथ इसी Love-hate यानि दुलार-दुत्कार के ओलते-बदलते संबंध का परिचायक है। उसने एक द्विअर्थी बयान-शैली को जन्म दिया। जिसमें बुरा भला कहना भी मजे लेने का माध्यम बन जाता है। भोगे हुए यथार्थ के पर्दे में जितनी दाद तवायफ़ को उर्दू फ़िक्शन लिखने वालों से मिली उतनी अपने रात के ग्राहको से भी न मिली होगी।

क़िबला चूं पीर शुद्ध

मूलगंज मे वहीदन बाई के कोठे पर एक बुजुर्ग जो हिल-हिल कर सिल पर मसाला पीसते हुए देखे जाते थे , उनके बारे में यार लोगों ने मशहूर कर रखा था कि तीस बरस पहले जुमे की नमाज़ के बाद वहीदन बाई के चाल-चलन के सुधार के नीयत से कोठे के जीने पर चढ़े थे, मगर उस वक़्त इस छ्प्पन छूरी की भरी जवानी थी। लिहाजा इनका मिशन बहुत तूल खींच गया।

कारे-ज़वां दराज़ है , अब मेरा इंतज़ार कर

वहीदन बाई जब फ़र्स्ट क्लास क्रिकेट से रिटायर हुई और गुनाहों से तौबा करने का तक़्ल्लुफ़ किया, जिसके लायक अब वह वैसे भी नहीं रही थी तो क़िबला आलम की दाढ़ी पेट तक आ गयी थी। अब वो उसकी बेटियों कि बावर्ची-खाने के इंतजाम तथा ग़ज़लों और ग्राहकों के चयन मे मदद करते थे।1931 में वो हज को गयी तो ये नौ सौ चूहों के अकेले प्रतिनिधि की हैसियत से उसके साथ थे.

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

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इस भाग की अन्य कड़ियां.

1. फ़ेल होने के फायदे 2. पास हुआ तो क्या हुआ 3. नेकचलनी का साइनबोर्ड 4. मौलवी मज्जन से तानाशाह तक 5. हलवाई की दुकान और कुत्ते का नाश्ता 6. कुत्ता और इंटरव्यू 7. ब्लैक होल ऑफ़ धीरजगंज 8. कोई बतलाओ कि हम बतलायें क्या? 9. विशेष मूली और अच्छा-सा नाम 10. ज़लील करने के कायदे 11. आइडियल यतीम का हुलिया 12. ज़लील करने के अलग अलग शेड 13.कुत्ते की तारीफ और मुशायरा 14. शायरों की खातिरदारी 15. इक्के का आविष्कार घोड़े ने किया 16, मुशायरे की तैयारी

पहला भाग

Apr 112008
 

इन्हीं पत्थरों पे चल कर….

अट्ठारह शायरों का जुलुस स्कूल के सामने से गुजरा तो एक रहकले से 18 तोपों की सलामी उतारी गई। ये एक छोटी सी पंचायती तोप थी जो नार्मल हालात में पैदाइश और ख़त्नों के मौके पर चलाई जाती थी। चलते ही सारे क़स्बे के कुत्ते, बच्चे, कव्वे, मुर्ग़ियां और मोर कोरस में चिंघाड़ने लगे। बड़ी बूढ़ियों ने घबरा कर ‘दीन जागे, कुफ़्र भागे’ कहा। ख़ुद वो मिनी तोप भी अपने चलने पर इतनी आश्चर्यचकित और घबरायी हुई थी कि देर तक नाची-नाची फिरी। शायरों को खाते-पीते किसानों के घर ठहराया गया, जो अपने-अपने मेहमान को स्कूल से घर ले गये। एक किसान तो अपने हिस्से केमेहमान की सवारी के लिये टट्टू और रास्ते के लिये नारियल की गुड़गुड़ी भी लाया था। क़स्बे में जो गिने-चुने सम्पन्न घराने थे, उनसे मौली मज्जन की नहीं बनती थी, इसलिये शायरों के ठहरने और खाने का बन्दोबस्त किसानों और चौधरियों के यहां किया गया, जिसकी कल्पना ही शायरों की नींद उड़ाने के लिये काफ़ी थी। शेरो-शायरी या नॉविलों में देहाती जिन्दगी को रोमेंटिसाइज करके उसकी निश्छलता,सादगी, सब्र और प्राकृतिक सौन्दर्य पर सर धुनना और धुनवाना और बात है लेकिन सचमुच किसी किसान के आधे पक्के या मिट्टी गारे के घर में ठहरना किसी शहरी इन्टेलेक्चुअल के बस का रोग नहीं। किसान से मिलने से पहले उसके ढोर-डंगर, घी के फिंगर प्रिन्ट वाले धातु के गिलास, जिन हाथों से उपले पाथे उन्हीं हाथों से पकाई हुई रोटी, हल, दरांती, मिट्टी से खुरदुराये हुए हाथ, बातों में प्यार और प्याज की महक, मक्खन पिलायी हुई मूंछ….इस सबसे एक ही वक़्त में गले मिलना पड़ता है।

इस क़स्बे के मुशायरे में, जो धीरजगंज का अंतिम यादगार मुशायरा साबित हुआ, बाहर के 18 शायरों के अलावा 33 स्थानीय तथा सम्बन्धित शायर भी सम्मिलित होने के लिये बुलाये गये, या बिन बुलाये आये। बाहर से आने वालों में कुछ ऐसे भी थे जो इस लालच में आये थे कि नक़द न सही, गांव है, कुछ नहीं तो सब्जियां, फ़स्ल के मेवे, फल-फलवारी के टोकरे, पांच-छह मुर्ग़ियों का झाबा तो मुशायरा कमेटी वाले जुरूर साथ कर देंगे। धीरजगंज में कुछ शरारती नौजवान ऐसे थे जिनके बारे में मशहूर था कि वो पास-पड़ोस के तीन-चार मुशायरे चौपटकर चुके हैं। उनके एक पुराने लंगोटिये थे जिन्होंने मैट्रिक में चार-पांच बार फ़ेल होने और परीक्षकों की छात्रों के गुणों को पहचानने के अयोग्यता से तंग आकर चुंगी विभाग में नौकरी कर ली थी। इसमें इन्द्रिय-दमन के अलावा इस बदनाम महकमे को सजा देना भी छुपा हुआ था। चुंगी के वातावरण को उन्होंने शायरी के लिये हद से जियादा उपयुक्त पाया। अपनी वर्तमान स्थिति से इतने संतुष्ट और आनंदित थे कि इसी पोस्ट से रिटायर होने के इच्छुक थे। अधिक संतान वाले थे और आशु कविता करते थे। जो शेरों के आने का क्रम था वही औलाद का भी, यानी कि दोनों के अवतरण का आरोप ऊपर वाले पर लगाते थे। आम-सा वाक्य भी उन पर कविता बन कर उतरता था। गद्य बोलने और लिखने में उन्हें उतनी ही उलझन होती थी जितनी एक आम आदमी को कविता लिखने में।

वो शायरी करते थे मगर मुशायरों से विरक्त और उदास थे। फ़रमाते थे, “आज कल जिस तरह शेर कहा जाता है बिल्कुल उसी तरह दाद दी जाती है, यानी मतलब समझे बग़ैर। सही दाद देना तो दूर अब लोगों को ढंग से हूट करना भी नहीं आता। शेर मुशायरे में सुनने-सुनाने की चीज नहीं। एकान्त में पढ़ने, समझने, सुनने और सहने की चीज है। शायरी किताब की शक्ल में हो तो लोग शायर का कुछ नहीं बिगाड़ सकते। मैं ‘मीर’ की किताब से एक-दो नहीं, सौ-दो सौ शेर ऐसे निकाल कर दिखा सकता हूं जो वो किसी मुशायरे में पढ़ देते तो इज्जत और पगड़ी ही नहीं, सर भी सलामत नहीं रहता। उन्हें ‘मीर’ के सिर्फ़ यही शेर याद थे। दूसरे उस्ताद शायरों के भी उन्होंने सिर्फ़ वही शेर याद कर रखे थे जिनमें कोई कमी या ग़लती थी। उन साहब से बिशारत पांच छह ग़जलें कहलवा कर ले आये और उन मुशायरा बिगाड़ नौजवानों में बांट दीं कि तुम भी पढ़ना। यह तरकीब काम कर गई।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

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लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
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सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

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1. फ़ेल होने के फायदे 2. पास हुआ तो क्या हुआ 3. नेकचलनी का साइनबोर्ड 4. मौलवी मज्जन से तानाशाह तक 5. हलवाई की दुकान और कुत्ते का नाश्ता 6. कुत्ता और इंटरव्यू 7. ब्लैक होल ऑफ़ धीरजगंज 8. कोई बतलाओ कि हम बतलायें क्या? 9. विशेष मूली और अच्छा-सा नाम 10. ज़लील करने के कायदे 11. आइडियल यतीम का हुलिया 12. ज़लील करने के अलग अलग शेड 13.कुत्ते की तारीफ और मुशायरा 14. शायरों की खातिरदारी 15. इक्के का आविष्कार घोड़े ने किया

पहला भाग

Apr 092008
 

“परु तो जर से हणक रही है हो.” (परु को तेज बुखार है). परुली की ईजा ने जजमानी के लिये निकलते हुए जोस्ज्यू से कहा.

“ठीक है मैं गड़वा बॉज्यू के वहां से ब्याव को (शाम को) मिक्सचर लेते आउंगा.”

परुली स्कूल भी नहीं गयी. दिन भर बुखार से तपती रही. उसकी ईजा ने ही घर के अधिकतर काम किये. फिर उसे बुखार में तड़पता छोड़कर ही वण (जंगल) चले गयी. परुली सोचती रही अपने संभावित भविष्य के बारे में.ब्या होने पर उसे हमेशा धोती पहनकर ही रहना होगा. सास-ससुर के आगे बड़ा सा घूंघट निकाल कर रखना होगा.पांच पांच गोरुओं का सारा काम करना होगा.उनका दूध लगाना होगा.उन्हें वण हंकाने जाना होगा. लकड़ियाँ,पिरूल,घास,पानी सब ही कुछ तो लाना होंगा, गुपटाले बनाने होंगे. कई सारे काम. इन कामों के बीच वह पढ़ तो नहीं ही पायेगी. यानि यदि ब्या हुआ तो उसे डॉक्टर तो क्या पढ़ाई के बारे में भी भूलना ही पड़ेगा.सोचते सोचते उसकी तबियत और खराब हो गयी.  

शाम को बाबू आये तो मिक्सचर लेते आये. उससे परुली को कुछ आराम तो मिला लेकिन पूरी तरह बुखार नहीं उतरा.लेकिन फिर भी उसने ईजा के साथ घर का काम कराया. ईजा के मना करने के बाबजूद भी वह गोरु-बाछों को घास डाल आयी. आटा ओल दिया और फिर चूल्हे में रोटी सैंकती रही. खाना खा चुकने के बाद बुखार फिर बढ़ गया लेकिन वह ईजा को कुछ बताये बिना वह सो गयी.

आज परु की बीमारी का सातवां दिन था. इस दौरान वह स्कूल भी नहीं गयी थी. हाँ जब भी बीच बीच मे आराम मिलता वह अपनी किताबों से कुछ कुछ पढ़ती रहती.मिक्सचर से फायदा ना होते देख बाबू प्रकाश मेडिकल से दूसरी दवाई भी लाये. दवाई खाने से बुखार कम होता लेकिन फिर आ जाता.जोस्ज्यू भी उसे मोरपंख से एक दो बार झाड़ चुके थे. कुछ लोगों ने कहा परु को नजर लग गयी है,पूछ कराओ. ईजा घर से थोड़े चावल लेकर पंडित जी से पूछ भी करवा आयी. पंडित जी ने भोलनाथज्यू थान की धूणी से कुछ भभूत भी दी. लेकिन उससे भी कुछ फायदा नहीं हुआ.

परु की आंखें एक्दम गड्ढे में चलीं गयी थी. फूल सा सुन्दर चेहरा एक्दम मुरझा गया था. बालों में इतने दिन ना नहाने की वजह से गांठे पड़ गयी थी.वह कुछ भी खाती तो उलटी हो जाती. शरीर भी धीरे धीरे सूख जैसा रहा था. किसी ने कहा कि इससे छॉ (भूत) लग गया है.किसी ने कहा कि किसी ने जादू कर दिया है परु पर, किसी ने कहा कि जागर लगाओ. किसी ने कहा वो शिब्बन पानवाला है वह कुछ दवाई देता है. परु के बाबू वह दवाई भी लाये लेकिन नतीजा वही रहा. पूरे गांव में तरह तरह की बातें होने लगी. कोई कहता कि परु को टी.बी. हो गयी है.ज्यादा थोड़े बचेगी अब यह. इसे भवाली सैनिटोरियम में भरती करो. उन दिनों टीबी से कई मौतें होती भी थीं. कोई कहता कि परुली तो हमेशा से ही बीमार रहती थी. इसीलिये तो ये लोग इसकी शादी जल्दी जल्दी करना चाहते थे. सामने अच्छी अच्छी बातें करने वाले भी पीठ पीछे तरह तरह की बातें बनाते.

परुली जब तेज बुखार में होती तो नीम-बेहोशी की जैसी हालत में कुछ बड़बड़ाती रहती.उसकी यह हालत देख उसकी ईजा भी बहुत दुखी थी.घर भी बिखरा ही रहता क्योंकि पहले घर की साफ सफाई का जिम्मा परू के ऊपर था.वह सुबह सुबह ही चीड़ की पत्तियों के बने झाडू से पूरे घर की सफाई करती. सारा सामान सही जगह पर रखती. अब वही बीमार थी तो घर को साफ करने की किसे सुध.ईजा परु के सिराने पर बैठी थी…और परु के सिर पर हाथ फेरे रही थी. परुली बेहोसी की जैसी हालत में पड़ी थी.वह कुछ बड़बड़ा रही थी. परु की ईजा ने ध्यान से सुनना चाहा. परु बड़बड़ा रही थी. मेरा ब्या मत करो ईजा….. बाबू मुझे डाक्टर बनने दो बाबू….. ईजा ..मैं ब्या नहीं करुंगी ईजा…मैं मर जाउंगी ईजा….ब्या नहीं करुंगी…..

ईजा ने सब कुछ साफ साफ सुना तो उसकी आंखों से आँसुओं की धारा बह निकली. वह फिर परु के सिर पर हाथ फेरने लगी. हाथ फेरते फेरते उसने मन ही मन कुछ निश्चय किया.   

जारी……..

पिछले भाग : 1. परुली…. 2. परुली: चिन्ह साम्य होगा क्या ?? 3. परूली : शादी की तैयारी 4. परुली:आखिर क्या होगा ? 5. परुली: हिम्मत ना हार ..6. परुली : ब्या कैसे टलेगा 7. परुली:ब्या टालने की उहापोह 8. परुली : अभी नानतिन ही हुई हो