निहारी, रसावल, जली और धुआं लगी खीर, मुहावरे, सावन के पकवान, अमराइयों में झूले, दाल, रेशमी दुलाई, ग़रारे, दोपल्ली टोपी, आल्हा-ऊदल और जबान के शेर की तरह इक्का भी यू. पी. की ख़ास चीजों में गिना जाता है। हमारा ख़याल है कि इक्के का अविष्कार किसी घोड़े ने किया होगा, इसीलिये इसके डिजाइन में इस बात का ध्यान रखा गया है कि घोड़े से अधिक सवारी को परेशानी उठानी पड़े। इक्के की विशेषता यह है कि अधिक सवारियों का बोझ घोड़े पर नहीं पड़ता बल्कि उन सवारियों पर पड़ता है जिनकी गोद में वो आ-आ कर बैठती है। जोश मलीहाबादी साहब ऐसे इक्कों के बारे में लिखते हैं कि, तमाम के तमाम इस क़दर जलील हैं कि उन पर सिकन्दर महान को भी बिठा दिया जाये तो वो भी किसी देहाती रंडी के भड़वे नजर आने लगेंगे

धीरजगंज के प्लेटफ़ार्म को स्कूल के बच्चों ने रंग-बिरंगी झंडियों से इस तरह सजाया था जैसे फूहड़ मां बच्ची का मुंह धुलाये बग़ैर बालों में शोख़ रिबन बांध देती है। ट्रेन से उतरते ही हर शायर को गेंदे का हार पहना कर गुलाब का एक-एक फूल और औटते दूध का कांसे का गिलास पेश किया गया जिसे थामते ही वो बिलबिला कर पूछता था कि इसे कहां रक्खूं? स्वागत करने वालों ने पच्चीस मील और एक घण्टे दूर, कानपुर से आने वालों से पूछा, ‘‘सफ़र कैसा रहा! कानपुर का मौसम कैसा है! हाथ मुंह धो के तीन चार घण्टे सो लें तो सफ़र की थकान उतर जायेगी।’’ प्रत्युत्तर में मेहमानों ने पूछा, ‘‘यहां मग़रिब (शाम की नमाज) किस वक़्त होती है’’ धीरजगंज वाले तो मेहमाननवाजी के लिये मशहूर हैं;यहां की कौन सी चीज मशहूर है;क्या यहां के मुसलमान भी उतने ही बुरे हाल में हैं, जितने बाक़ी हिन्दुस्तान के।’’ अट्ठारह शायर और पांच मिसरा उठाने वाले जो एक शायर अपने साथ लाया था, दो बजे की ट्रेन से धीरजगंज पहुंचे। ट्रेन पहुंचने से तीन घण्टे पहले ही यतीमख़ाना शम्स-उल-इस्लाम का बैंड बजना शुरु हो गया था, लेकिन जैसे ही ट्रेन आ कर रुकी तो कभी ढोल, कभी बांसुरी, कभी हाथी की सूंड जैसा बाजा बंद हो जाता और कभी तीनों ही मौन हो जाते, सिर्फ़ बैंड मास्टर छड़ी हिलाता रह जाता। वो इस कारण कि इन बाजों को बजाने वाले बच्चों ने इससे पहले इंजन को इतने पास से नहीं देखा था। वो उसे देखने में इतने तल्लीन हो जाते कि बजाने की सुध ही न रहती, इंजन उनके इतने पास आ कर रुका था कि उसका एक-एक प्रभावी पुरजा दिखाई दे रहा था……सीटी बजाने वाला उपकरण, कोयला झोंकने वाला बेलचा, बॅायलर दहकते- चटख़ते कोयलों का ताप और अंग्रेजी दवाओं की बू जैसा भभकता झोंका। शोलों की आंच से ऐंग्लो इन्डियन ड्राइवर का तमतमाता लाल चुक़न्दर चेहरा और कलाई पर गुदी नीली मेम, मुसलमान ख़लासी के सर पर बंधा हरा रूमाल और चेहरे पर कोयले की जैबरा धारियां, पहिये से जुड़ी हुई लम्बी सलाख़ जो बिल्कुल उनके हाथ की तरह चलती जिसे वो आगे पीछे करते हुए छुक-छुक रेल चलाते थे, इंजन की टोंटी से उबलती, शोर मचाती स्टीम का चेहरे पर स्प्रे। इन बच्चों ने धुंए के मरग़ोलों को मटियाले से हल्का सुरमई, सुरमई से गाढ़ा-गाढ़ा काला होते देखा। गले में उसकी कड़वाहट उन्हें अच्छी लग रही थी। घुंघराले धुंए का काला अजगर फुफकारें मारता आख़िरी डब्बे से भी आगे निकल कर अब आसमान की तरफ उठ रहा था। बैंड बजाने वाले बच्चे बिल्कुल चुप हो कर पास, बिल्कुल पास से इंजन की सीटी को बजता हुआ देखना चाहते थे। उनका बस चलता तो जाते समय अपनी आंखें वहीं छोड़ जाते। अगर उन बच्चों से बैंड बजवाना ही था तो ट्रेन बग़ैर इंजन के लानी चाहिये थी।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

इस भाग की अन्य कड़ियां.

1. फ़ेल होने के फायदे 2. पास हुआ तो क्या हुआ 3. नेकचलनी का साइनबोर्ड 4. मौलवी मज्जन से तानाशाह तक 5. हलवाई की दुकान और कुत्ते का नाश्ता 6. कुत्ता और इंटरव्यू 7. ब्लैक होल ऑफ़ धीरजगंज 8. कोई बतलाओ कि हम बतलायें क्या? 9. विशेष मूली और अच्छा-सा नाम 10. ज़लील करने के कायदे 11. आइडियल यतीम का हुलिया 12. ज़लील करने के अलग अलग शेड 13.कुत्ते की तारीफ और मुशायरा 14. शायरों की खातिरदारी

पहला भाग

 

आज दिन तो था कुमांऊनी होली श्रंखला के अगले भाग का लेकिन कुछ तकनीकी कारणों से गाने अपलोड नहीं हो पाये. इसलिये आज खोया-पानी का अगला भाग प्रस्तुत कर रहा हूँ. कुमांऊनी होली का अगला भाग कल प्रस्तुत किया जायेगा.

खोया पानी का आज का अंश बिशारत द्वारा की जा रही मुशायरे की तैयारी से संबंधित है. इसमें हास्य के ऐसे नमूने हैं जो आपको निश्चय ही हँसने पर मजबूर कर देंगे. तो लीजिये प्रस्तुत है अगला भाग.

****************

धीरजगंज का पहला और आख़िरी मुशायरा : मुशायरे की तारीख तय हो गई। धीरजगंज के आस-पास के लोगों को निमंत्रित करना, तरह की पंक्ति तय करना (किसी उस्ताद शायर की पंक्ति को आधार बनाकर ग़जल कहना) और शायरों का चयन करना, शायरों को कानपुर से आख़िरी ट्रेन से लाना और मुशायरे के बाद पहली ट्रेन से दफ़ा करना। मुशायरे से पहले और ग़जल पढ़ने तक उनकी मुफ़्त ख़ातिर किसी और से करवाना….इसी क़िस्म के कार्य जो सजा का दर्जा रखते थे, बिशारत के सुपुर्द किये गये। शायरों और उनके अपने आने-जाने का रेल और इक्के का किराया, शायरों का धीरजगंज में खाने और रहने का ख़र्च, पान सिगरेट इत्यादि के ख़र्च के लिये मौली मज्जन ने दस रुपये दिये और ताकीद की कि अंत में जो राशि बच जाये वो उनको मय रसीद मुशायरे के अगले दिन वापस कर दी जाये। उन्होंने सख़्ती से यह भी हिदायत की कि शायरों को आठ आने का टिकिट ख़ुद ख़रीद कर देना। नक़द किराया हरगिज न देना। बिशारत यह पूछने ही वाले थे कि शायरों के हाथ-ख़र्च और नजराने का क्या होगा कि मौली मज्जन ने स्वयं ही सवाल हल कर दिया। फ़रमाया कि शायरों से यतीमख़ाने और स्कूल के चंदे के लिये अपील जुरूर कीजियेगा। उन्हें शेर सुनाने में जरा भी शर्म नहीं आती तो आपको इस पुण्यकार्य में काहे की शर्म। अगर आपने फूहड़पन से काम न लिया तो हर शायर से कुछ न कुछ वसूल हो सकता है, मगर जो कुछ वसूल करना है मुशायरे से पहले ही धरवा लेना। ग़जल पढ़ने के बाद हरगिज क़ाबू में नहीं आयेंगे। ‘रात गयी, बात गयी’ वाला मुआमला है और जो शायर ये कहे कि वो अठन्नी भी नहीं दे सकता तो उसे तो हमारे यतीमख़ाने में होना चाहिये। कानपुर में बेकार पड़ा क्या कर रहा है।

पाठक सोच रहे होंगे इन व्यवस्थाओं के संदर्भ में स्कूल के हैडमास्टर का कहीं जिक्र नहीं आया। इसका एक उचित कारण यह था कि हैडमास्टर को नौकरी पर रखते समय उन्होंने केवल एक शर्त लगाई थी-वो यह कि हैडमास्टर स्कूल के मुआमलों में बिल्कुल हस्तक्षेप नहीं करेंगे। इस आत्मश्लाघा कहिये या अनुभवहीनता, बिशारत ने मुशायरे के लिये तरह की जो पंक्ति चुनी वो अपनी ही ग़जल से ली। इसका सबसे बड़ा फ़ायदा तो यह नजर आया कि मुफ़्त में प्रसिद्धि मिल जायेगी। दूसरे उन्हें मुशायरे के लिए अलग ग़जल पर माथापच्ची नहीं करनी पड़ेगी। यह सोच-सोच के उनके दिल में गुदगुदी होती रही कि अच्छे-अच्छे शायर उनकी पंक्ति पर गिरह लगायेंगे। बहुत जोर मारेंगे। घंटों काव्य-चिंतन में कभी पैर पटकेंगे, कभी दिल को, कभी सर को पकड़ेंगे और शेर होते ही एक-दूसरे को पकड़ के बैठ जायेंगे। उन्होंने अट्ठारह शायरों को सम्मिलित होने के लिये तैयार कर लिया, जिनमें जौहर चुग़ताई इलाहाबादी, काशिफ़ कानपुरी और नुशूर वाहिदी भी शामिल थे, जो इसलिये तैयार हो गये थे कि बिशारत की नौकरी का सवाल था। नुशूर वाहिदी और जौहर इलाहाबादी तो उन्हें पढ़ा भी चुके थे। उन दोनों को उन्होंने तरह नहीं दी बल्कि दूसरी ग़जल पढ़ने की प्रार्थना की। ऐसा लगता था कि उन्होंने बाक़ी शायरों के चयन में यह ध्यान रक्खा था कि कोई भी शायर ऐसा न हो जो उनसे बेहतर शेर कह सकता हो। इन सब शायरों को दो इक्कों में बिठा कर वो कानपुर के रेलवे स्टेशन पर लाये। जिन पाठकों को दो इक्कों में अट्ठारह शायरों की बात में अतिशयोक्ति लगे, शायद उन्होंने न तो इक्के देखे हैं न शायर। यह तो कानपुर था वरना अलीगढ़ होता तो एक ही इक्का काफ़ी था। पाठकों की आसानी के लिये हम इस लाजवाब सवारी का सरसरी वर्णन किये देते हैं। पहले ग़ुस्ले-मय्यत के तख़्ते को काट कर चौकोर और चौरस कर लें। फिर उसमें दो अलग साइज के बिल्कुल चौकोर पहिये इस भरोसे के साथ जोत दें कि इनके चलने से अलीगढ़ की सड़कें समतल हो जायेंगी और इस प्रक्रिया में ये ख़ुद भी गोल हो जायेंगे। तख़्ता सड़क के गड्ढ़ों की ऊपरी सत्ह से छह, साढ़े छह फ़िट ऊंचा होना चाहिये ताकि सवारियों के लटके हुए पैरों और पैदल चलने वालों के सरों की सतह एक हो जाये। पहिये में सूरज की किरणों की शक्ल की जो लकड़ियां लगी होती है वो इतनी मजबूत होनी चाहिये कि नई सवारी इन पर पांव रख कर तख़्ते तक हाई जम्प कर सके। पांव के धक्के से पहिये को स्टार्ट मिलेगा। इसके बाद तख़्ते में दो बांसों के बम (इक्के और तांगों के आगे लगाये जाने वाली लकड़ी जिसमें घोड़ा जोता जाता है) लगा कर एक कमजोर घोड़े को लटका दें, जिसकी पसलियां दूर से ही गिनकर सवारियां संतोष कर लें कि पूरी हैं। लीजिये इक्का तैयार है।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

इस भाग की अन्य कड़ियां.

1. फ़ेल होने के फायदे 2. पास हुआ तो क्या हुआ 3. नेकचलनी का साइनबोर्ड 4. मौलवी मज्जन से तानाशाह तक 5. हलवाई की दुकान और कुत्ते का नाश्ता 6. कुत्ता और इंटरव्यू 7. ब्लैक होल ऑफ़ धीरजगंज 8. कोई बतलाओ कि हम बतलायें क्या? 9. विशेष मूली और अच्छा-सा नाम 10. ज़लील करने के कायदे 11. आइडियल यतीम का हुलिया 12. ज़लील करने के अलग अलग शेड 13.कुत्ते की तारीफ और मुशायरा

पहला भाग

 

मलगाड़ से लौटते समय जोसज्यू सोच रहे थे कि पांडे ज्यू का कहना भी सही ही ठहरा. परुली तो अभी नानतिन ही हुई. उसे अभी अकल जो क्या हुई अरे हम लोगो को ही उतनी अकल जो क्या ठहरी. पांडे ज्यू की रिश्तेदारी तो लखनऊ, दिल्ली सभी जगह ठहरी. वह बराबर दिल्ली, लखनऊ जाते रहने वाले ठहरे. उनकी बहन दसोली के पाठकों के वहाँ हुई.बहन का पूरा परिवार दिल्ली में ही ठहरा. गोपाल को भी उन्होने ही दिल्ली में नौकरी में लगाया ठहरा बल.वह ठीक ही कह रहे ठहरे. घर जाके परु की ईजा को भी समझाता हूँ.

रात को परुली की ईजा आई तो उसे जोसज्यू पूरी घटना बताने लगे और साथ समझाने भी लगे. 

पांडे ज्यू कह रहे थे. ‘परुली को कुछ मालूम जो क्या हुआ. डॉक्टरी करना इतना सित्तिल (सरल) नहीं हुआ जोसज्यू. उसका कोई ट्रेंस (इंट्रैंस) एग्जाम होता है बल. उसमें तो बाजे बाजे लोग ही निकलने वाले हुए. परु थोड़े निकलेगी.” वो कह रहे थे “अरे बोर्ड का इंत्यान भी बहुत टफ ठहरा. उसमें ही परु का पास होना मुश्किल हुआ.”

“ठीक ही कह रहे होंगे फिर.” …ईजा कुछ समझी कुछ नहीं.

वो कह रहे थे कि उनके घर का कारबार ही इतना बढ़ा हुआ. परुली को और कुछ करने जी क्या जरूरत ठहरी. वो तो गोपाल यहाँ रहकर बिगड़ जायेगा करके उसे उन्होने दिल्ली भेजा ठहरा. नहीं तो वो तो यहीं उसके लिये दुकान खोलने की सोच रहे थे बल.

जोस्ज्यू आगे बोले “फिर मैन कौ (मैने कहा) कि यदि परू की इंटर तक पढ़ाई पूरी करवा दें तो जैसा उसकी किस्मत होगी वैसा कर लेगी. तो वो कहने लगे.”

“घरपन के काम से फुरसत कहाँ मिलेगी परु को जोसज्यू. पांच पांच गोरु हैं. उनका घास-पात, मोव निकालना, गुपटाले पाथना,दूध निकालना, ठेकी में दही जमाना कितने तो काम हुए घर में.”

“तो घर के सारे काम क्या हमारी परु करेगी??” …ईजा की आवाज में थोड़ी चिंता थी.

“अब पांडे ज्यू की सैणी तो बीमार रहने वाली हुई. पिछ्ले बार तो दिल्ली तक दिखाया था बल.कुछ दिन वहाँ भरती भी रही ठहरी लेकिन वहाँ की दवाई से भी कोई खास फरक नहीं पड़ा बल. इसीलिये तो पांडे ज्यू जल्दी जलदी ब्वारी लाना चाह रहे हैं.”

“पर परु तो अभी नानि ही हुई हो इत्ती बड़ी घर गृस्थी संभाल पायेगी वो.”

“अरे संभाल लेगी. यहाँ भी तो सारा काम करने वाली हुई. तू उसे दूध लगाना और सिखा देना.”

उसकी ईजा का मन थोड़ा भारी हो गया. “उ तो सिखे द्यून (वो तो सिखा दुंगी) लेकिन परु अभी भौ (बच्ची) ही हुई. इतना बोझ उसके सर पर देना ठीक होगा क्या हो.”

“अरे परु सब कर लेगी. फिर संबंध भी तो देखो. इनके संबंध अल्मोड़ा गल्ली के दीवानों से भी हुए बल.”

परुली लेटे लेटे सब सुन रही थी.आमतौर पर यह सब सुनकर उसकी रुलाई फूट पड़ती थी. लेकिन आज ना जाने क्यों वो नहीं रोई बल्कि वह जितना सुनती जाती उतनी उसकी हिम्मत बढ़ते जाती. इस अवस्था में वह क्या करे वह यही सोच रही थी.

वह उठी और बिचाखंड से चाख में आ गयी जहाँ उसके ईजा बाबू बात कर रहे थे और ईजा के पास जाकर उससे बोली.

“ईजा मुझे मारना है तो वैसे ही गला घोट के मार दे ईजा. ब्या करके क्यों मारना चाहती है.” उसके आवाज में गुस्सा भी था , निरीहता भी और हल्की सी रुलाई भी.

“यो के कुणेछी ? (ये क्या कह रही है)”.ईजा ने पूछा

” क्या हुआ परू  ??” अंगीठी में  हाथ सेकते हुए बाबू बोले.उन्होने पूरी बात ठीक से नहीं सुनी थी.

” सही कह रही हूँ ईजा. मैं भार हूँ ना तुम लोगों …  ” . वह बात पूरी भी नहीं कर पायी और ईजा के गोद में सर रख कर रोने लगी.

“नहीं परु. “उसके सर पर हाथ फेरते हुए ईजा बोली.तू पड़ जा (सो जा) . मैं आती हूँ अभी.

परुली चले गयी. बाबू को पूरी तरह से बात समझ में नहीं आयी. क्योकि यह बात इतने धीरे धीरे बोली गयी कि उनके कान में पूरी बात नहीं पड़ी.

” के भौ…(क्या हुआ) “. परुली के जाने के बाद बाबू ने पूछा.

” के नै (कुछ नहीं) ..तुम ले पड़ जाओ (तुम भी सो जाओ)…भोल बतून (कल बताऊंगी).”

परुली की ईजा भी उठकर बिचाखंड में आकर परुली के पास लेट गयी जहाँ परुली अभी भी सिसकियाँ भर रही थी. 

जारी……..

पिछले भाग : 1. परुली…. 2. परुली: चिन्ह साम्य होगा क्या ?? 3. परूली : शादी की तैयारी 4. परुली:आखिर क्या होगा ? 5. परुली: हिम्मत ना हार ..6. परुली : ब्या कैसे टलेगा 7. परुली:ब्या टालने की उहापोह

 

अभी ऑफिस के लिये तैयार हो रहा था कि अनूप जी उर्फ फुरसतिया का फोन आया. कहने लगे.. छा गये काकेश..क्या झक्कास ईमानदार चिरकुटई की है. अभी हमारे साथ वाले कानपुर हॉस्टल के किस्से भी लिखोगे. ज्यादा ना लिखें वरना वैसा ही कंटाप पड़ेगा जैसा रैगिंग के समय में पड़ा था.यह तो उन्होने मजाक में ही कहा था. (यहाँ पर मैं यह बताता चलूँ कि कानपुर के हॉस्टल में अनूप जी ,जिन्हे तब हम सभी सीनियरों की तरह “अनूप भाईसाहब” कहते थे, हमारे सीनियर होते थे. जब इन्हें पता चला कि हम भी कुछ कविता वगैरह करते हैं तो इन्होंने रात रात भर बैठाकर अपनी ढेर सारी कविताऐं हमें सुनायी थीं.कई बार हमारी कई कविताओं को इन्होने हम से ले लिया था और कॉलेज की मैगजीन में अपने नाम से छ्पवाया था.) हम सोचे कि अनूप जी सुबह सुबह किस मूड में हैं. हमने पूछा आखिर बात क्या हुई.बोले वो अजीत जी के ब्लॉग पर तुम्हारे बकलमखुद का पहला भाग पढ़ा था.तो अनूप जी का फोन तो रखवाया लेकिन हमारे भेजे में हमेशा की तरह उनकी बात कुछ समझ में ना आयी.

आपकी जानकारी के लिये बता दें कि हम तीन दिन से पंगेबाज पुरस्कारों की तैयारियों में व्यस्त थे. कल रात बारह बजे तक कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग खतम कर वीडियो बनाया. इसमें हमने वॉयस चेंजर सोफ्टवेयर का प्रयोग भी किया.सॉफ्ट्वेयर तो अच्छा है लेकिन हिन्दी में अभी भी इसकी वॉयस क्वालिटी उतनी अच्छी नहीं है. हो सकता है अगले वर्जनों में इसे सुधारा जाय. खैर हमने कार्यक्रम की सी डी बना के तीन सी डी एक खास चैनल को दी. यदि यह चैनल वालों ने भुगतान समय पर कर दिया तो हिन्दी ब्लॉगरों को यह सी डी मुफ्त प्रदान की जायेगी. अभी तो इस सी डी की पांच मिनट की झलकियां कल मैं पंगेबाज जी के ब्लॉग पर चढ़ाउंगा.

कंप्यूटर ऑन करने की सोच ही रहे थे कि एक टी वी चैनल से फोन आया. बतचीत कुछ ऐसी हुई.

हैलो क्या आप काकेश बोल रहे हैं?

हांज्जी, मैं काकेश

हाय काकेश ,हमें आपका नम्बर अजीत ने दिया है. हम अपने कल एयर होने वाले प्रोग्राम ये जिन्दगी कितनी टेड़ी है के लिये आपसे कुछ बात करना चाहते हैं. क्या आप आज दोपहर तीन बजे से लेकर चार बजे तक फौन पर उपलब्ध है?.

हांज्जी, ..न…नहीं जी ..हम दिलकार नेगी को पढ़ चुके हैं जी.

और तुरंत फोन कट गया.

तब तक हम समझ चुके थे कि आज अप्रेल फूल है और सब मिलकर हमें अप्रेल फूल बना रहे हैं. क्योंकि जब अजीत जी ने बकलमखुद शुरु किया था तो उनकी एक मेल हमारे पास आयी थी. उसके कुछ अंश ऐसे थे.(बिना उनसे अनुमति लिये छाप रहा हूँ)

काकेश जी आपसे साधिकार आग्रह है कि  ******बकलमखुद् की तैयारी कर लीजिए। ************अपने शौक, ब्लागमेनिया, परिजन, यारी-दुश्वारी, मस्ती की पाठशाला,नौकरी, बेकारी-बेज़ारी जैसे नगीने जड़े हो तो बढ़िया न हो तो भी जो लिखेंगे, रंग तो भी जमेगा ही।

आतुरता से प्रतीक्षारत…

अजीत

हम सोच रहे थे कि अपने बारे में क्या लिखें ??…कुछ तो है ही नहीं …या फिर कि लिखें भी कि नहीं लिखें और सोचते सोचते अनामदास जी का यह लेख आ गया. इससे हमें प्रेरणा मिल ही रही थी कि हमको तो सरकलमखुद नहीं ही लिखना है कि दो बातें हो गयीं. एक तो अजदक मियां का लेख आ गया और दूसरे अजीत जी का तकाजा. तो हमने तो अजीत जी को साफ साफ कह दिया कि हम अपनी व्यस्तताओं के चलते अभी सरकलमखुद बकलमखुद नहीं लिख पायेंगे.उनका जबाब तो क्या आता विमल भाई की चिट्ठी आ गयी लेकिन विमल भाई की चिट्ठी भी हमें अपने इरादे से नहीं डिगा पायी.

इसलिये हमें अनूप जी की बात पर भी यकीन नहीं हुआ.लेकिन फिर भी हमने कंप्यूटर ऑन किया और अजीत जी के ब्लॉग पर पहुंचे. वहाँ पहुंचे तो क्या देखते हैं कि हमारे बारे में ना जाने क्या अगड़म बगड़म लिखा है. अगड़म बगड़म लिखने का अधिकार या तो आलोक जी को है या फिर पंगेबाज को. अजीत जी ने आज अप्रेल फूल के दिन हमारे बारे में गलत सलत लिख कर पूरी ब्लॉग-जनता को बेवकूफ बनाया है. इस बात का अन्दाजा इस बात से भी मिलता है कि एक तो उन्होने हमें ईमानदार लिखा है. जो हमें जानते हैं वो तो अब तक हँस हँस कर लोटपोट हो गये होंगे और फिर उन्होने लिखा

हम यह बता देना चाहते हैं कि वे (यानि काकेश) ब्लाग दुनिया के उन लोगों में हैं जिनसे हमारी पिछले जन्म की रिश्तेदारी है।

अजीत जी आप किसे बेवकूफ बना रहे हैं. आज के दिन में जब लोग इस जनम की रिश्तेदारी नहीं निभाते तो पिछ्ले जनम की रिश्तेदारी क्या निभायेंगे. जनता बेवकूफ जरूर है पर इतनी भी नहीं जनाब. तो जनता को पक्का पता चल गया है कि यह आप हमारी मान-हानि करने के लिये हमारे बारे में कुछ भी छाप रहे हैं.

इसलिये सभी लोगों से अपील है वह इस पोस्ट को ना पढ़ें और जिन्होने पढ़ ली हो तो इसे सच ना माने.

सभी लोग जो बेवकूफ नहीं बने या जिन्हें पता है कि वह बेवकूफ नहीं है वह यहाँ जरूर टिप्पणी करें.जो वेवकूफ हैं वो भी यहाँ टिप्पणी करके बेवकूफ ना होने का सार्टिफेकेट ले सकते हैं. जिस हिन्दी ब्लॉगर की टिप्पणी हमारी पोस्ट पर नहीं आयेगी उसे बेवकूफ मान लिया जायेगा और अगले पंगेबाज पुरस्कारों में उसका नाम महामूर्ख पुरस्कार के लिये स्वत: नामांकित हो जायेगा. 

तो फिर देरी कैसी??? और क्यों…???

 

world-record

हम पंगेबाज को गिनीज बुक ऑफ रिकार्डस में जगह बनाने के लिये बधाई देते हैं.

   
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