Jun 272008
 

समुद्र तल और ग़रीबी रेखा से नीचे

आये दिन के चालान, तावान से वो तंग आ चुके थे। कैसा अंधेर है। सारे देश में यही एक जुर्म रह गया है! बहुत हो चुकी। अब वो इसका दो टूक फ़ैसला करके छोड़ेंगे। मौलाना करामत हुसैन से वो एक बार मिल चुके थे और सारी दहशत निकल चुकी थी। पौन इंच कम पांच फ़ुट का पोदना! उसकी गर्दन उनकी कलाई के बराबर थी। गोल चेहरे और तंग माथे पर चेचक के दाग़ ऐसे चमकते थे, जैसे तांबे के बर्तन पर ठुंके हुए खोपरे। आज वो घर का पता मालूम करके उसकी खबर लेने जा रहे थे। पूरा डायलॅाग हाथ के इशारों और आवाज के उतार-चढ़ाव के साथ तैयार था। उन्हें मौलाना करामत हुसैन की झुग्गी तलाश करने में काफ़ी परेशानी हुई। हालांकि बताने वाले ने बिल्कुल सही पता बताया था कि झुग्गी बिजली के खंबे नं.-23 के पीछे कीचड़ की दलदल के उस पार है। तीन साल से खंबे बिजली के इंतजार में खड़े हैं। पते में उसके दायीं ओर एक ग्याभिन भैंस बंधी हुई बतायी गयी थी। सड़कें, न रास्ते, गलियां, न फुटपाथ। ऐसी बस्तियों में घरों के नंबर या नाम का बोर्ड नहीं होता। प्रत्येक घर का एक इंसानी चेहरा होता है, उसी के पते से घर मिलता है। खंबा तलाश करते-करते उन्हें अचानक एक झुग्गी के टाट के पर्दे पर मौलाना का नाम सुर्ख़ रोशनाई से लिखा नजर आया। बारिश के पानी के कारण रोशनाई बह जाने से नाम की लकीरें खिंची रह गई थीं। चारों ओर टख़नों-टख़नों बजबजाता कीचड़, सूखी जमीन कहीं दिखायी नहीं पड़ती थी। चलने के लिये लोगों ने पत्थर और ईंटें डालकर पगडंडियां बना लीं थीं। एक नौ-दस साल की बच्ची सर पर अपने से अधिक भारी घड़ा रखे अपनी गर्दन तथा कमर की हरकत से पैरों को डगमगाते पत्थरों और घड़े को सर पर संतुलित करती चली आ रही थी। उसके चेहरे पर पसीने के रेले बह रहे थे। रास्ते में जो भी मिला, उसने बच्ची को संभल कर चलने का मशवरा दिया। थोड़ी-थोड़ी दूरी पर पांच-छः ईंटों का ट्रैफ़िक आईलैंड आता था, जहां जाने-वाला आदमी खड़े रह कर आने-वाले को रास्ता देता था। झुग्गियों के भीतर भी कुछ ऐसा ही नक़्शा था। बच्चे, बुजुर्ग और बीमार दिन भर ऊंची-ऊंची खाटों और खट्टों पर टंगे रहते। क़ुरान-शरीफ़, लिपटे हुए बिस्तर, बर्तन-भांडे, मैट्रिक के सर्टिफ़िकेट, बांस के मचान पर तिरपाल तले और तिरपाल के ऊपर मुर्ग़ियां। मौलाना करामत हुसैन ने झुग्गी के एक कोने में खाना पकाने के लिये एक टीकरी पर चबूतरा बना रखा था। एक खाट के पाये से बकरी भी बंधी थी। कुछ झुग्गियों के सामने भैंसे चड़ में धंसी थीं और उनकी पीठ पर कीचड का प्लास्टर पपड़ा रहा था। यह भैंसों की जन्नत थी। इनका गोबर कोई नहीं उठाता था। क्योंकि उपले थापने के लिये कोई दीवार या सूखी जमीन नहीं थी। गोबर भी इंसानी गंदगी के साथ इसी कीचड़ में मिल जाता था। इन्हीं झुग्गियों में टीन की चादर के सिलेंडर नुमा डिब्बे भी दिखायी दिये। जिनमें दूध भरने के बाद सदर की सफ़ेद टाइलों वाली डेरी की दुकानों में पहुंचाया जाता था। एक लंगड़ा कुत्ता झुग्गी के बाहर खड़ा था। उसने अचानक ख़ुद को झड़झड़ाया तो उसके घाव पर बैठी हुई मक्खियों और अध-सूखे कीचड़ के छर्रे उड़-उड़ कर बिशारत की क़मीज और चेहरे पर लगे।

मुग़ल वंश का पतन

बिशारत ने झुग्गी के बाहर खड़े होकर मौलाना को आवाज दी। हालांकि उसके ‘अंदर’ और ‘बाहर’ में कुछ ऐसा अंतर नहीं था। बस चटाई, टाट और बांसों से अंदर के कीचड़ और बाहर के कीचड़ के बीच हद बंदी करके एक काल्पनिक एकांत, एक संपत्ति की लक्ष्मण रेखा खींच ली गई थी। कोई जवाब न मिला तो उन्होंने हैदराबादी अंदाज से ताली बजायी, जिसके जवाब में अंदर से छः बच्चों का तले ऊपर की पतीलियों का-सा सेट निकल आया। इनकी आयु में नौ-नौ महीने से भी कम का अंतर दिखायी दे रहा था। सबसे बड़े लड़के ने कहा, मग़रिब की नमाज पढ़ने गये हैं। तशरीफ़ रखिये। बिशारत की समझ में न आया, कहां तशरीफ़ रखें। उनके पैरों-तले ईंटें डगमगा रही थीं। सड़ांध से दिमाग़ फटा जा रहा था। ‘‘जहन्नुम अगर इस धरती पर कहीं हो सकता है तो, यहीं है, यहीं है, यहीं है।’’

वो दिल-ही-दिल में मौलाना को डांटने का रिहर्सल करते हुए आये थे-यह क्या अंधेर है मौलाना? किचकिचा कर मौलाना कहने के लिये उन्होंने बड़े कटाक्ष और कड़वाहट से वह स्वर कम्पोज किया था-जो बहुत सड़ी गाली देते समय अपनाया जाता है, लेकिन झुग्गी और कीचड़ देखकर उन्हें अचानक ख़याल आया कि मेरी शिकायत पर इस व्यक्ति को अगर जेल हो भी जाये तो इसके तो उल्टे ऐश हो जायेंगे। मौलाना पर फेंकने के लिये लानत-मलामत के जितने पत्थर वो जमा करके आये थे, उन सब पर दाढ़ियां लगाकर नमाज की चटाइयां लपेट दी थीं ताकि चोट भले ही न आये, शर्म तो आये-वो सब ऐसे ही धरे रह गये। उनका हाथ जड़ हो गया था। इस व्यक्ति को गाली देने से फ़ायदा? इसका जीवन तो ख़ुद एक गाली है। उनके गिर्द बच्चों ने शोर मचाना शुरू किया तो सोच का सिलसिला टूटा। उन्होंने उनके नाम पूछने शुरु किये। तैमूर, बाबर, हुमायूं, जहांगीर, शाहजहां, औरंगज़ेब, या अल्लाह! पूरा मुग़ल वंश इस टपकती झुग्गी में ऐतिहासिक रूप से सिलसिलेवार उतरा है। ऐसा लगता था कि मुग़ल बादशाहों के नामों का स्टॉक समाप्त हो गया, मगर औलादों का सिलसिला समाप्त नहीं हुआ। इसलिये छुटभैयों पर उतर आये थे।

मिसाल के तौर पर एक जिगर के टुकड़े का प्यार का नाम मिर्जा कोका था जो अकबर का दूध-शरीक भाई था, जिसको उसने क़िले की दीवार पर से नीचे फिंकवा दिया था। अगर सगा भाई होता तो इससे भी कड़ी सजा देता यानी समुद्री डाकुओं के हाथों क़त्ल होने के लिये हज पर भेज देता या आंखें निकलवा देता। वो रहम की अपील करता तो भाई होने के नाते दया और प्रेम की भावना दिखाते हुए जल्लाद से एक ही वार में सर क़लम करवा कर उसकी मुश्किल आसान कर देता।

हम अर्ज यह कर रहे थे कि तैमूरी ख़ानदान के जो बाक़ी कुलदीपक झुग्गी के अंदर थे, उनके नाम भी तख़्त पर बैठने, बल्कि तख़्ता उलटने के क्रम के लिहाज से ठीक ही होंगे, इसलिये कि मौलाना की स्मरणशक्ति और इतिहास का अध्ययन बहुत अच्छा प्रतीत होता था। बिशारत ने पूछा तुममें से किसी का नाम अकबर नहीं? बड़े लड़के ने जवाब दिया, नहीं जी, वो तो दादा जान का शायरी का उपनाम है।

बातचीत का सिलसिला कुछ उन्होंने कुछ बच्चों ने शुरू किया। उन्होंने पूछा, तुम कितने भाई-बहन हो? जवाब में एक बच्चे ने उनसे पूछा, आपके कितने चचा हैं? उन्होंने पूछा, तुम में से कोई पढ़ा हुआ भी है? बड़े लड़के तैमूर ने हाथ उठा कर कहा, जी हां, मैं हूं। मालूम हुआ यह लड़का जिसकी उम्र तेरह-चौदह साल होगी, मस्जिद में बग़दादी क़ायदा पढ़ कर कभी का निबट चुका। तीन साल तक पंखे बनाने की एक फ़ैक्ट्री में मुफ़्त काम सीखा। एक साल पहले दायें हाथ का अंगूठा मशीन में आ गया, काटना पड़ा। अब एक मौलवी साहब से अरबी पढ़ रहा है। हुमायूं अपने हमनाम की भांति अभी तक आवारागर्दी की मंजिल से गुजर रहा था। जहांगीर तक पहुंचते-पहुंचते पाजामा बार-बार हो रहे राजगद्दी परिवर्तन की भेंट चढ़ गया। हां! शाहजहां का शरीर फोड़ों, फुँसियों पर बंधी पट्टियों से अच्छी तरह ढंका हुआ था। औरंगज़ेब के तन पर केवल अपने पिता की तुर्की टोपी थी। बिशारत को उसकी आंखें और उसे बिशारत दिखायी न दिये। सात साल का था, मगर बेहद बातूनी। कहने लगा, ऐसी बारिश तो मैंने सारी जिंदगी में नहीं देखी। हाथ पैर माचिस की तीलियां, लेकिन उसके ग़ुब्बारे की तरह फूले हुए पेट को देखकर डर लगता था कि कहीं फट न जाये। कुछ देर बाद नन्हीं नूरजहां आयी। उसकी बड़ी-बड़ी आंखों में काजल और कलाई पर नजर-गुजर का डोरा बंधा था। सारे मुंह पर मैल, काजल, नाक, और धूल लिपी हुई थी। केवल वो हिस्से इससे अलग थे जो अभी-अभी आंसुओं से धुले थे। उन्होंने उसके सर पर हाथ फेरा। उसके सुनहरे बालों में गीली लकड़ियों के कड़वे-कड़वे धुएं की गंध बसी हुई थी। एक भोली-सी सूरत का लड़का अपना नाम शाह आलम बता कर चल दिया। आधे रास्ते से लौट कर कहने लगा कि मैं भूल गया था। शाह आलम तो बड़े भाई का नाम है। ये सब मुग़ल शहजादे कीचड़ में ऐसे मजे से फचाक-फचाक चल रहे थे जैसे इनकी वंशावली अमीर तैमूर के बजाये किसी राजहंस से मिलती हो। हर कोने-खुदरे से बच्चे उबले पड़ रहे थे। एक कमाने वाला और यह टब्बर! दिमाग़ चकराने लगा।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार/शनिवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की तीसरे भाग “स्कूल मास्टर का ख़्वाब से " ]

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

इस भाग की पिछली कड़ियां

1. हमारे सपनों का सच 2. क़िस्सा खिलौना टूटने से पहले का 3. घोड़े को अब घोड़ी ही उतार सकती है 4. सवारी हो तो घोड़े की 5. जब आदमी अपनी नजर में गिर जाये 6. अलाहदीन अष्टम 7. शेरे की नीयत और बकरी की अक़्ल में फ़ितूर 8.महात्मा बुद्ध बिहारी थे 9.घोड़े का इलाज जादू से 10.कुत्तों के चाल चलन की चौकीदारी

पहला और दूसरा भाग 11. कौन किसका खाना है?

Jun 202008
 

कुछ समय पहले समकाल में संजय तिवारी जी का लेख छ्पा था जिसमें उन्होने हिन्दी ब्लॉग जगत के बारे में लिखा था. उसके बाद भी वह कुछ समय तक समकाल में लिखते रहे. पिछ्ले कई महीनों से वह अपने अलग डोमेन पर चले गये हैं और अपनी पत्रिका विस्फोट के द्वारा कई सामयिक मुद्दों को उठाते रहे हैं.

कल दैनिक भास्कर (इन्दौर) ने उनकी इस पहल की सराहना की है. आप भी पढ़ें.

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Jun 152008
 

अकेलेपन का साथी

इस क़िस्से से हमने उन्हें सीख दिलायी। क़िबला ने दूसरे पैंतरे से घोड़ी खरीदने का विरोध किया। वो इस बात पर ग़ुस्से से भड़क उठते थे कि बिशारत को उनके चमत्कारी वजीफ़े पर विश्वास नहीं। वो ख़ासे गलियर थे। बेटे को खुल कर तो गाली नहीं दी। बस इतना कहा कि अगर तुम्हें अपना वंश चलाने के लिये पेडिग्री घोड़ी ही रखनी है तो शौक़ से रखो, मगर मैं ऐसे घर में एक मिनट नहीं रह सकता। उन्होंने यह धमकी भी दी कि जहां बलबन घोड़ा जायेगा वो भी जायेंगे।

क़िस्सा दरअस्ल यह था कि क़िबला और घोड़ा एक दूसरे से इस हद तक घुल-मिल चुके थे कि अगर घर वाले न रोकते तो वे उसे ड्राइंग रूम में अपनी चारपाई के पाये से बंधवा कर सोते। वो भी उनके पास आकर अपने-आप सर नीचा कर लेता ताकि वो उसे बैठे-बैठे प्यार कर सकें। वो घंटों मुंह-से-मुंह भिड़ाये उससे घर वालों और बहुओं की शिकायतें और बुराइयां करते रहते। बच्चों के लिये वो जीता-जागता खिलौना था। क़िबला कहते थे जब से यह आया है, मेरे हाथ का कंपकंपाना कम हो गया है और बुरे सपने आने बंद हो गये हैं। वो अब उसे बेटा कहने लगे थे। सदा के रोगी से अपने-पराये सब उकता जाते हैं। एक दिन वो चार-पांच घंटे दर्द से कराहते रहे, किसी ने खबर न ली। शाम को घबराहट और मायूसी अधिक बढ़ी तो रसोइये से कहा कि बलबन बेटे को बुलाओ। बुढ़ापे और बीमारी के भयानक सन्नाटे में यह दुखी घोड़ा उनका अकेला साथी था।

इक तर निवाले की सूरत

घोड़े को जोत नहीं सकते, बेच नहीं सकते, मरवा नहीं सकते, खड़े खिला नहीं सकते, फिर करें तो क्या करें। जब ब्लैक मूड आता तो अंदर-ही-अंदर खौलते और अक्सर सोचते कि सेठ, सरमायेदार, वडेरे, जागीरदार और बड़े अफ़सर अपनी सख़्ती और करप्शन के लिये जमाने-भर में बदनाम हैं। मगर, यह “अत्याचार वाले” दो टके के आदमी किससे कम हैं। उन्हें इससे पूर्व ऐसे प्रतिक्रियावादी और आक्रांतकारी विचार कभी नहीं आये थे। उनकी सोच में इंसानों से परेशान व्यक्ति की झुंझलाहट उतर आयी। ये लोग तो ग़रीब हैं, दुःखी हैं, मगर यह किसको छोड़ते हैं। संतरी बादशाह भी तो ग़रीब है, वो रेहड़ी वाले को कब छोड़ता है और ग़रीब रेहड़ी वाले ने कल शाम आंख बचाकर एक सेर सेबों में दो दाग़दार सेब मिलाकर तोल दिये। उसकी तराजू एक छटांक कम तोलती है। केवल एक छटांक इसलिये कि एक मन कम तोलने की गुंजाइश नहीं। स्कूल मास्टर दया और आदर के योग्य हैं। मास्टर नजमुद्दीन बरसों से चीथड़े लटकाये जालिम समाज को कोसते फिरते हैं। उन्हें साढ़े-चार सौ रुपये खिलाये, तब जा के भांजे के मैट्रिक के नंबर बढ़े और रहीमबख़्श कोचवान से बढ़कर बदहाल कौन होगा? जुल्म, जालिम और जुल्म सहने वाले दोनों को खराब करता है। जुल्म का पहिया जब अपना चक्कर पूरा कर लेता है और मजलूम की बारी आती है तो वो भी वही सब करता है जो उसके साथ किया गया था। अजगर पूरे का पूरा निगलता है, शार्क दांतों से ख़ूनम-ख़ून करके खाती है। शेर डॉक्टरों के बताये नियमों के अनुसार अच्छी तरह चबा-चबा के खाता है। बिल्ली, छिपकली, मकड़ी और मच्छर अपनी-अपनी हिम्मतानुसार ख़ून की चुस्की लगाते हैं। वो यहां तक पहुंचे थे कि सहसा उन्हें अपने इन्कमटैक्स के डबल बहीखाते याद आ गये और वो अनायास मुस्कुरा उठे। भाई मेरे! छोड़ता कोई नहीं, हम सब एक-दूसरे का खाना हैं। बड़े जतन से एक-दूसरे को चीरते-फाड़ते हैं। ‘तब नजर आती है इक लुक़्म-ए-तर की सूरत’

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार/शनिवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की तीसरे भाग “स्कूल मास्टर का ख़्वाब से " ]

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

इस भाग की पिछली कड़ियां

1. हमारे सपनों का सच 2. क़िस्सा खिलौना टूटने से पहले का 3. घोड़े को अब घोड़ी ही उतार सकती है 4. सवारी हो तो घोड़े की 5. जब आदमी अपनी नजर में गिर जाये 6. अलाहदीन अष्टम 7. शेरे की नीयत और बकरी की अक़्ल में फ़ितूर 8.महात्मा बुद्ध बिहारी थे 9.घोड़े का इलाज जादू से 10.कुत्तों के चाल चलन की चौकीदारी

पहला और दूसरा भाग

Jun 132008
 

एक घोड़ा भरेगा कितने पेट ?

जिस दिन से दाढ़ी वाले मौलाना नियुक्त हुए, रहीमबख़्श हर चौथे-पांचवें दिन आ के सर पे खड़ा हो जाता। “चंदा दीजिये।“ परन्तु ढाई – तीन रुपये या अधिक-से-अधिक पांच में आयी बला टल जाती। उससे जिरह की तो पता चला कि कराची में तांगे अब केवल इसी इलाक़े में चलते हैं। तांगे वालों का हाल घोड़ों से भी खराब है। उन्होंने पुलिस और ‘‘अत्याचार’’ वालों का नाम-मात्र को महीना बांध रखा है, जो उनकी गुजर बसर के लिये बिल्कुल अपर्याप्त है। उधर नंगे, भूखे गधा गाड़ी वाले मकरानी सर फाड़ने पर उतर आते हैं। घायल गधा, पसीने में तर-ब-तर गधागाड़ी वाला और फटे हाल ‘‘अत्याचार’’ का इंस्पेक्टर। यह निर्णय करना मुश्किल था कि इनमें कौन अधिक बदहाल और जुल्म का शिकार है। यह तो ऐसा ही था जैसे एक सूखी-भूखी जोंक, दूसरी सूखी-भूखी ज़ोंक का ख़ून पीना चाहे। नतीजा यह कि ‘‘अत्याचार वाले’’ तड़के ही इकलौती मोटी आसामी यानी उनके तांगे की प्रतीक्षा में गली के नुक्कड़ पे खड़े हो जाते और अपने पैसे खरे करके चल देते। अकेला घोड़ा सारे स्टाफ़ के बाल-बच्चों का पेट पाल रहा था। लेकिन करामत हुसैन (दाढ़ी वाले मौलाना का यही नाम था) का मामला कुछ अलग था। वो अपने हुलिये और फटे-हाल होने के कारण ऐसे दिखायी पड़ते थे कि लगता था उन्हें रिश्वत देना पुण्य का काम है और वो रिश्वत लेकर वास्तव में रिश्वत देने वाले को पुण्य कमाने का अवसर प्रदान कर रहे हैं। वो रिश्वत मांगते भी ऐसे थे जैसे दान मांग रहे हों। ऐसा प्रतीत होता था कि उनके भाग का सारा अन्न घोड़े की लंगड़ी टांग के माध्यम से ही उतरता है। ऐसे फटीचर रिश्वत लेने वाले के लिये उनके भीतर न कोई सहानुभूति थी न डर।

कुत्तों के चाल चलन की चौकीदारी

दोस्तों ने सलाह दी कि घोड़े को इंजेक्शन से ठिकाने लगवा दो, लेकिन उनका मन नहीं मानता था। क़िबला तो सुनते ही रुआंसे हो गये। कहने लगे आज लंगड़े घोड़े की बारी है, कल अपाहिज बाप की होगी। शरीफ़ घरानों में आयी हुई दुल्हन और जानवर तो मर कर ही निकलते हैं। वो स्वयं तीन दुल्हनों के जनाज़े निकाल चुके थे, इसलिये घोड़े के बारे में भी ठीक ही कहते होंगे। रहीम बख़्श भी घोड़े की हत्या कराने का कड़ा विरोध करता था। जैसे ही बात चलती, अपना तीस वर्ष के अनुभव बताने बैठ जाता। यह तो हमने भी सुना था कि इतिहास अस्ल में बड़े लोगों की बायोग्राफ़ी है परंतु रहीमबख़्श कोचवान की सारी आटोबायोग्राफ़ी दरअस्ल घोड़ों की बायोग्राफ़ी थी। उसके जीवन से एक घोड़ा पूरी तरह निकल नहीं पाता था कि दूसरा आ जाता। कहता था कि उसके तीन पूर्व-मालिकों ने ‘‘वैट’’ से घोड़ों को जहर के इंजेक्शन लगवाये थे। पहला मालिक तीन दिन के भीतर चटपट हो गया। दूसरे का चेहरा लक़वे से ऐसा टेढ़ा हुआ कि दायीं बांछ कान की लौ से जा मिली। एक दिन ग़लती से आईने में ख़ुद पर नजर पड़ी तो घिग्घी बंध गयी। तीसरे की पत्नी जॅाकी के साथ भाग गई। देखा जाये तो इन तीनों में-जो तुरंत मर गया, उसीका अंत सम्मानजनक मालूम होता है।

उन्हीं दिनों एक साईस ने सूचना दी कि लड़काना में एक घोड़ी तेलिया कुमैत बिलकुल मुफ़्त यानी तीन सौ रुपये में मिल रही है। बस वडेरे के दिल से उतर गई है। गन्ने की फ़स्ल की आमदनी से उसने गन्ने ही से लम्बाई नाप कर एक अमरीकी कार ख़रीद ली है। आपकी सूरत पसंद आ गई तो हो सकता है मुफ़्त ही दे दे। इसका विरोध पहले हमने और बाद में क़िबला ने किया। उन दिनों कुत्ते पालने का नया-नया शौक़ हुआ था। हर बात उन्हीं के संदर्भ में करते थे। कुत्तों के लिये अचानक मन में इतना आदर-भाव पैदा हो गया था कि कुतिया को मादा-कुत्ता कहने लगे थे।

हमने बिशारत को समझाया कि ख़ुदा के लिये मादा घोड़ा न ख़रीदो। आमिल कालोनी में दस्तगीर साहब ने एक मादा-कुत्ता पाल लिया है। किसी शुभचिंतक ने उन्हें सलाह दी थी कि जिस घर में कुत्ते हों, वहां फ़रिश्ते, बुजुर्ग और चोर नहीं आते। उस जालिम ने यह न बताया कि फिर सिर्फ़ कुत्ते ही आते हैं। अब सारे शहर के बालिग़ कुत्ते उनकी कोठी का घेराव करे पड़े रहते हैं। शहजादी स्वयं शत्रु से मिली हुई है।

ऐसी तनदाता नहीं देखी। जो ब्वॅाय स्काउट का ‘‘मोटो’’ है-वही उसका-Be Prepared-मतलब यह कि हर आक्रमणकारी से सहयोग के लिये पूरे तन-मन से तैयार रहती है। फाटक खोलना असंभव हो गया है। महिलाओं ने घर से निकलना छोड़ दिया। पुरुष स्टूल रखकर फाटक और कुत्ते फलांगते हैं। दस्तगीर साहब इन कुत्तों को दोनों वक़्त नियमित रूप से खाना डलवाते हैं, ताकि आने-जाने वालों की पिंडलियों से अपना पेट न भरें। एक बार खाने में जहर डलवा कर भी देख लिया। गली में मुर्दा कुत्तों के ढेर लग गये। अपने ख़र्च पर उनको दफ़्न किया। एक साहब का पालतू कुत्ता जो बुरी संगत में पड़ गया था, उस रात घर वालों की नजर बचा कर सैर-तमाशे को चला आया था, वो भी वहीं खेत रहा। इन चंद कुत्तों के मरने से जो रिक्त-स्थान पैदा हुआ, वो इसी प्रकार पूरा हुआ जैसा साहित्य और राजनीति में होता है। हम तो इतना जानते हैं कि स्वयं को Indispensable समझने वालों के मरने से जो रिक्त-स्थान पैदा होता है, वह वास्तव में केवल दो गज जमीन में होता है, जो उन्हीं के पार्थिव शरीर से उसी समय पूरा हो जाता है। ख़ैर! यह एक अलग क़िस्सा है। कहना यह था कि अब दस्तगीर साहब सख़्त परेशान हैं। ख़ानदानी मादा है। नीच जात के कुत्तों से वंशावली बिगड़ने का डर है। मैंने तो दस्तगीर साहब से कहा था कि इनका ध्यान बंटाने के लिये कोई मामूली जात की कुतिया रख लीजिये ताकि कम-से-कम यह धड़का तो न रहे, रातों की नींद तो हराम न हो। इतिहास में आप पहले व्यक्ति हैं जिसने कुत्तों के चाल-चलन की चौकीदारी का बीड़ा उठाया है।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार/शनिवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की तीसरे भाग “स्कूल मास्टर का ख़्वाब से " ]

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

इस भाग की पिछली कड़ियां

1. हमारे सपनों का सच 2. क़िस्सा खिलौना टूटने से पहले का 3. घोड़े को अब घोड़ी ही उतार सकती है 4. सवारी हो तो घोड़े की 5. जब आदमी अपनी नजर में गिर जाये 6. अलाहदीन अष्टम 7. शेरे की नीयत और बकरी की अक़्ल में फ़ितूर 8.महात्मा बुद्ध बिहारी थे 9.घोड़े का इलाज जादू से

पहला और दूसरा भाग

Jun 082008
 

जादू मंत्र द्वारा उपचार

रिश्वत और मालिश की रक़म अब घोड़े की क़ीमत और उनकी सहनशक्ति की सीमा को पार कर चुकी थी। पकड़-धकड़ का सिलसिला किसी प्रकार समाप्त होने में नहीं आता था। तंग आकर उन्होंने रहीम बख़्श की जबानी इंस्पेक्टर को यह तक कहलाया कि तुम मेरी दुकान में उगाही की नौकरी कर लो। तुम्हारी तनख़्वाह से अधिक दूंगा। उसने कहला भेजा “सेठ को मेरा सलाम बोलना और कहना कि हम तीन हैं।“ उन्होंने घोड़ा-तांगा बेचना चाहा तो किसी ने सौ रुपये भी न लगाये। अंततः अपने वालिद से इस बारे में बात की। वो सारा हाल सुनकर कहने लगे “इसमें परेशानी की कोई बात नहीं। हम दुआ करेंगे। तांगे में जोतने से पहले एक गिलास फूंक मारा हुआ दूध पिला दिया करो। अल्लाह ने चाहा तो लंग जाता रहेगा और चालानों का सिलसिला भी बंद हो जायेगा। एक बार वजीफ़े का असर तो देखो। आदरणीय ने उसी समय रहीमबख़्श से बिस्तर पर हार्मोनियम मंगाया। वो धोंकनी से हवा भरता रहा और आदरणीय कांपती-कंपकंपाती आवाज में हम्द (ईश्वर की स्तुति) गाने लगे। आंख जहां पड़ती, वहां उंगली नहीं पड़ रही थी और जिस पर्दे पर उंगली पड़ती, उस पर पड़ी ही रह जाती। एक पंक्ति गाने और बजाने के बाद यह कहकर लेट गये कि इस हार्मोनियम के काले पर्दे के जोड़ अकड़ गये हैं। मास्टर बाक़र अली ने क्या ख़ाक मरम्मत की है!

दूसरे दिन आदरणीय की चारपाई ड्राइंग रूम में आ गई। क्योंकि यही ऐसा कमरा था जहां घोड़ा रोज सुब्ह अपने माथे पर "अल्लाह" लिखवाने और फ़ूंक मारने के लिये अंदर लाया जा सकता था। तड़के आदरणीय ने नमाज के बाद गुलाब जल में उंगली डुबो कर घोड़े के माथे पर "अल्लाह" लिखा और खुरों को लोबान की धूनी दी। कुछ देर बाद उस पर साज कसा जाने लगा तो बिशारत दौड़े-दौड़े क़िबला के पास आये और कहने लगे घोड़ा दूध नहीं पी रहा। क़िबला हैरान हुए। फिर आंखें बंद करके सोच में पड़ गये। कुछ पलों के बाद आंखें अधखुली करके बोले, कोई हरज नहीं कोचवान को पिला दो, घोड़ा दांतों के दर्द से पीड़ित है। इसके बाद यह नियम बन गया कि दुआ पढ़कर फ़ूंका गया दूध रहीमबख़्श पीने लगा। ऐसी अरुचि के साथ पीता जैसे उन दिनों यूनानी दवाओं के पियाले पिये जाते थे अर्थात् नाक पकड़ के, मुंह बना बना के। दूध के लिये न जाने कहां से धातु का बहुत लम्बा गिलास ले आया जो उसकी नाभि तक पहुंचता था। क़िबला के उपचार का प्रभाव पहले ही दिन नजर आ गया। वह इस प्रकार कि उस दिन चालान एक दाढ़ी वाले ने किया। रहीमबख़्श अपना लहराता हुआ चाबुक़ हाफ़ मास्ट करके कहने लगा “सरकार! बावजूद धर लिया” फिर उसने विस्तार से बताया कि एक दाढ़ी वाला आज ही जमशेद रोड के हल्क़े से तबादला होकर आया है। बड़ा ही दयालु, अल्लाह-वाला व्यक्ति है। इसलिए केवल साढ़े तीन रुपये लिये, वह भी चंदे के तौर पर। पड़ोस में एक विधवा के बच्चे के इलाज के लिये, आप चाहें तो चल के मिल लीजिये। मिल के बहुत ख़ुश होंगे। हर समय भीतर ही भीतर जाप करता रहता है। अंधेरी रात में सिजदे के निशान से ऐसी रौशनी निकलती है कि सुई पिरो लो। (अपने बाजू से तावीज खोलते हुए) घोड़े के लिये ये तावीज दिया है।

कहां पच्चीस रुपये, कहां साढ़े तीन रुपये! क़िबला ने रिश्वत में कमी को अपने आशीर्वाद और उसके चमत्कार का परिणाम समझा और कहने लगे कि तुम देखते जाओ। इंशाल्लाह चालीसवें दिन “अत्याचार” के इंस्पेक्टर को घोड़े की टांग नजर आनी बंद हो जायेगी। उनकी चारपाई के चारों ओर उनका सामान भी ड्राइंग रूम में सजा दिया गया। दवायें, बैडपैन, हुक़्क़ा, सिलफ़्ची, हार्मोनियम, आग़ा हश्र के ड्रामे, एनीमा का उपकरण और कज्जन एक्ट्रेस का फ़ोटो। ड्राइंग रूम अब इस योग्य नहीं रहा था कि उसमें घोड़े, क़िबला और इन दोनों का पाख़ाना उठाने वाली मेहतरानी के अतिरिक्त कोई और पांच मिनट भी ठहर सके। बिशारत के दोस्तों ने आना छोड़ दिया परंतु वो घोड़े की ख़ातिर क़िबला को सहन कर रहे थे।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार/शनिवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की तीसरे भाग “स्कूल मास्टर का ख़्वाब से " ]

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

इस भाग की पिछली कड़ियां

1. हमारे सपनों का सच 2. क़िस्सा खिलौना टूटने से पहले का 3. घोड़े को अब घोड़ी ही उतार सकती है 4. सवारी हो तो घोड़े की 5. जब आदमी अपनी नजर में गिर जाये 6. अलाहदीन अष्टम 7. शेरे की नीयत और बकरी की अक़्ल में फ़ितूर

पहला और दूसरा भाग

Jun 062008
 

महात्मा बुद्ध बिहारी थे

सेठ ने घोड़े के लंग के बारे में एकदम अज्ञानता व्यक्त की। उल्टा उन्हीं के सर हो गया कि ‘‘तुम घोड़े को देखने हाफ़-डजन टाइम तो आये होगे। घोड़ा तलक तुम को पिछानने लगा था। दस-दफ़े घोड़े के दांत गिने….क्या? तुमने हमको यहां तलक बोला कि घोड़ा नौ हाथ लम्बा हैं उस समय तुम्हें यह नौ-गजा दिखलाई पड़ता था। आज चार-पांच दिन बाद घोड़े के ग़ॉगल्ज ख़ुद पहन के इल्जाम लगाने आये हो….क्या? तीन दिन में तो क़ब्र में मुर्दे का भी हिसाब-किताब बरोबर खल्लास हो जाता है। उस टेम आपको माल में यह डिफ़ेक्ट दिखलायी नहीं पड़ा। तांगे में जोत के ग़रीबख़ाने ले गये तब भी नजर नहीं आया।" बिशारत सेठ के सामने अपने घर को इतनी बार ग़रीबख़ाना कह चुके थे कि वो यह समझा कि यह उनके घर का नाम है।

बिशारत ने कुछ कहना चाहा तो बात काटते हुए बोला-अरे बाबा! घोड़े का कोई पार्ट, कोई पुर्जा ऐसा नहीं बचा, जिसपे तुमने दस-दस दफ़े हाथ नहीं फेरा हो! क्या? तुम बिजनेसमेन हो के ऐसी कच्ची बात मुंह से निकालेगा तो हम किधर को जायेंगा? बोलो जी! हल्कट मानुस के माफ़िक़ बात नहीं करो….क्या?’’ सेठ जिम्मेदारी से बरी हो गया।

बिशारत ने तंग आकर कहा, ‘‘हद तो यह कि सौदा करने से पहले यह भी न बताया कि घोड़ा जनाजा उलट चुका है। आप ख़ुद को मुसलमान कहते हैं’’ सीने पर हाथ रखते हुए सेठ बोला तो क्या तुम्हारे को बुद्धिस्ट दिखलायी पड़ता हूं? हमने जूनागढ़ काठियावाड़ से माइग्रेट किया है….क्या? अपने पास बरोबर सिंध का डोमेसाइल है। महात्मा बुद्ध तो बिहारी था। (अपने मुंह के पान की ओर संकेत करते हुए) मेरे मुंह में रोजी है। तुम भी बच्चों की क़सम खा के बोलो। जब तुमने पूछा-घोड़ा काये को बेच रहे हो, हमने तुरंत बोल दिया। सौदा पक्का करने से पहले पूछते तो हम पहले बोल देते। तुम लकड़ी बेचते हो तो क्या ग्राहक को लक्कड़ की हर गांठ, हर दाग़ पे उंगली रख-रख के बताते हो कि पहले इसे देखो? हम साला अपना व्यापार करे कि तुम्हारे को घोड़े की बयाग्राफ़ी (बायोग्राफ़ी) बताये। फ़ादर मेरे को हमेशा बोलता था कि ग्राहक 420 हो तो पहले देखो भालो, फिर सौदे की टेम बोलो कम, तोलो जियादा। पर तुम्हारे ऊपर तो-खोलो, अभी खोलो!-की धुन सवार थी। तुम्हारे मुंह में पैसे बज रहे थे। गुजराती में कहावत है कि पैसा तो शेरनी का दूध है! इसे हासिल करना और पचाना दोनों बराबर मुश्किल है। पर तुम तो साला शेर को ही दुहना मांगता है । हम करोड़ों का बिजनेस करेला है। आज दिन-तलक जबान दे-के नईं फिरेला। अच्छा अगर तुम क़ुरान पर हाथ रख के बोल दो कि तुम घोड़ा ख़रीदते टेम पियेला था तो हम तुरंत एक-एक पाई रिफ़ंड कर देगा।’’

बिशारत ने मिन्नतें करते हुए कहा ‘‘सेठ, सौ-डेढ़ सौ कम में घोड़ा वापस ले लो। मैं बीबी-बच्चों वाला आदमी हूं। जिंदगी भर अहसानमंद रहूंगा।’’ सेठ आपे-से बाहर हो गया, ‘‘अरे बाबा! ख़च्चर के माफ़िक हमसे अड़ी नईं करो। हमसे एक दम कड़क उर्दू में डायलाग मत बोलो। तुम फ़िलम के विलन के माफ़िक़ गॉगल्ज लगा के इधर काये को तड़ी देता पड़ा हैं। भाई साहब! तुम पढ़ेला मानुस हो। कोई फ़ड्डेबाज मवाली, मल्बारी नईं, जो शरीफ़ों से दादागीरी करे। तुमने साइन-बोर्ड नईं पढ़ा। बाबा! यह री-रोलिंग मिल है। इसटील री-रोलिंग मिल। इधर घोड़े का धन्धा नईं होता…..क्या? कल को तुम बोलेंगा कि तांगा भी वापस ले लो। हम साला अक्खा उम्र इधर बैठा घोड़े-तांगे का धन्धा करेंगा तो हमारा फ़ेमिली क्या घर में बैठा क़व्वाली करेंगा? भाई साब! अपुन का घर तो गिरस्तियों का घर है, किसी बुजुर्ग का मजार नईं कि बाई लोग गज-गज भर के लम्बे बाल खोल के धम्माल डाल दें। धमा धम मस्त क़लन्दर!"

बिशारत ने तांगा स्टील री-रोलिंग मिल के बाहर खड़ा कर दिया और स्वयं एक थड़े पर पैर लटकाये प्रतीक्षा करने लगे कि अंधेरा जरा गहरा हो जाये तो वापस जायें, ताकि नौ घंटे में तीसरी बार चालान न हो। ग़ुस्से से अभी तक उनके कानों की लवें तप रही थीं और हल्क़ में कैक्टस उग रहे थे। बलबन गुलमोहर के पेड़ से बंधा सर झुकाये खड़ा था। उन्होंने पान की दुकान से एक लोमोनेड की गोली वाली बोतल ख़रीदी। एक ही घूंट में उन्होंने अनुमान लगा लिया कि उनकी प्रतीक्षा में यह बोतल कई महीनों से धूप में तप रही थी। फिर अचानक याद आया कि इस परेशानी में आज दोपहर बलबन को चारा और पानी भी नहीं मिला। उन्होंने बोतल रेत पर उंडेल दी और गॉगल्ज उतार दिये।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार/शनिवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की तीसरे भाग “स्कूल मास्टर का ख़्वाब से " ]

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

इस भाग की पिछली कड़ियां

1. हमारे सपनों का सच 2. क़िस्सा खिलौना टूटने से पहले का 3. घोड़े को अब घोड़ी ही उतार सकती है 4. सवारी हो तो घोड़े की 5. जब आदमी अपनी नजर में गिर जाये 6. अलाहदीन अष्टम 7. शेरे की नीयत और बकरी की अक़्ल में फ़ितूर

पहला और दूसरा भाग

Jun 052008
 

इंजी पेन्नू का अपराध सिर्फ इतना था कि उन्होने http://kerals.com/ पर एक मलयालम ब्लॉग द्वारा सामग्री को चुराने का आरोप लगाते हुए एक ई-मेल लिखा था. बदले में इस साइट की ओर से उन्हे धमकी भरे ई-मेल भेजे गये. उन्हे शारीरिक क्षति पहुंचाने की धमकी दी गयी. उनके प्रोफाइल को एक पोर्न साइट से लिंक कर दिया गया. उन्हे झूठा कानूनी नोटिस भेजा गया. और यह सब उस साइट के द्वारा किया गया जिसके मालिक, इंजी के अनुसार, शादी की साइट व पोर्न साइट एक साथ चलाते हैं. यह सारी बात इंजी अपनी इस पोस्ट में विस्तार से बता रही हैं.

इस बात से यह भी लगता है कि शादी की साइट पर अपना फोटो देना,विशेषकर महिलाओं के लिये,कितना खतरनाक है.इंटरनैट पर भी हमारे वास्तविक समाज की तरह गुंडे बैठे हुए हैं. जो खुद को फायदा पहुचाने के कुछ भी कर सकते हैं.  आप इनका कुछ नहीं बिगाड़ सकते. फिर भी मैं इंजी पेन्नू के साहस को सलाम करता हूँ.

इंजी आपकी इस लड़ाई में मैं आपके साथ हूँ.

इंजी के बारे में मुझे यहां से पता चला.

Jun 012008
 

शेरे की नीयत और बकरी की अक़्ल में फ़ितूर

उसी समय एक सलोतरी को बुलाकर घोड़े को दिखाया। उसने बायीं नली हाथ से सूंती तो घोड़ा चमका। पता चला कि पुराना लंग है। सारा घपला अब कुछ-कुछ समझ में आने लगा। संभवतः, नहीं निःसंदेह, घोड़ा इसी कारण रेस में डिसक्वालिफ़ाई हुआ होगा। ऐसे घोड़े को तो उसी समय गोली मार दी जाती है और यह उसके लिये तांगे में जुतकर जलील होने से कई गुना बेहतर सूरत होती है, लेकिन सलोतरी ने उम्मीद दिलाई कि छः महीने तक मुर्ग़ाबी के तेल की मालिश करायें। मालिश का मेहनताना पांच रुपये रोज! यानी डेढ़ सौ रुपया माहवार। छह महीने के नौ सौ रुपये हुए। नौ सौ का घोड़ा, नौ सौ की मालिश अर्थात टाट की गुदड़ी में मखमल का पैवंद! अभी कुछ दिन हुए अपने अब्बा की मालिश और पैर दबाने के लिये एक आदमी को अस्सी रुपये माहवार पर रखा था। इसका मतलब तो यह हुआ कि उनकी कमाई का आधा हिस्सा तो इन्कम टैक्स वाले रखवा लेंगे और एक-तिहाई चम्पी मालिश वाले खा जायेंगे। हलाल की कमाई के बारे में उन्होंने कभी नहीं सुना था कि वो इस अनुपात से ग़ैर हक़दारों में बंटती है। चार बजे तांगा जुतवा कर वो सेठ से निपटने के लिये रवाना हो गये। तांगे में बैठने से पहले उन्होंने गहरे रंग का धूप का चश्मा लगा लिया, ताकि कड़ी, खरी, खोटी सुनाने में झिझकें नहीं और चेहरे पर एक रहस्यमय ख़ूंख़ारी का भाव आ जाये। आधा रास्ता ही तय किया होगा कि एक व्यक्ति ने बम पकड़ कर तांगा रोक लिया। कहने लगा, आपका घोड़ा बुरी तरह लंगड़ा रहा है, चालान होगा। बिशारत भौंचक्के रह गये। पता चला ‘‘अत्याचार’’ वाले आजकल बहुत सख़्ती कर रहे हैं। हर मोड़ पर बात-बेबात चालान हो रहा है। वो किसी प्रकार न माना तो बिशारत ने क़ानूनी पेंच निकाला कि आज सुब्ह ही इसका चालान हो चुका है। सात घंटे में एक ही अपराध में दो चालान नहीं हो सकते। इंस्पेक्टर ने यह बात भी चार्जशीट में टांक ली और कहा कि इससे तो अपराध और संगीन हो गया। बचने का कोई रास्ता न सूझा तो बिशारत ने कहा, ‘‘अच्छा बाबा! तुम्हीं सच्चे सही, दस रुपये पे मामला रफ़ा-दफ़ा करो। ब्रांड न्यू घोड़ा है, खरीदे हुए तीसरा दिन है। ‘‘यह सुनते ही वो व्यक्ति आग बबूला हो गया।’’ कहने लगा ‘‘बड़े साब! गागल्ज के बावजूद आप भले आदमी मालूम होते हैं, मगर आपको पता होना चाहिये कि आप पैसे से लंगड़ा घोड़ा खरीद सकते हैं’’, आदमी नहीं ख़रीद सकते। चालान हो गया।

स्टील री-रोलिंग मिल पहुंचे तो सेठ घर जाने की तैयारी कर रहा था। आज इसके यहां एक पीर की याद में डेढ़-दो सौ फ़क़ीरों को पुलाव खिलाया जा रहा था। उसका मानना था कि इससे महीने-भर की कमाई पाक हो जाती है और यह संनदकमतपदह कोई अनोखी बात नहीं थी। एक बैंक में पंद्रह बीस वर्ष तक यह नियम रहा कि प्रत्येक ब्रांच में जितने नये खाते खुलते, शाम को उतने ही फ़क़ीर खिलाये जाते। यह पता नहीं चल पाया कि यह खाना, खाते खुलने की ख़ुशी में खिलाया जाता था या ब्याज के व्यापार में बढ़ोतरी के प्रायश्चित में। हमारा एक बार मुल्तान जाना हुआ। वहां उस दिन बैंक के मालिकों में से एक बहुत सीनियर सेठ इंस्पेक्शन पर आये हुए थे। शाम को ब्रांच में बराबरी का यह दृश्य देखकर हमारी ख़ुशी की सीमा न रही कि सेठ साहब पंद्रह-बीस फ़क़ीरों के साथ जमीन पर पंजों के बल बैठे पुलाव खा रहे हैं और हर फ़क़ीर और उसके बीबी-बच्चों का अकुशल-अमंगल पूछ रहे हैं। परन्तु मिर्जा अब्दुल वुदूद बेग को ग़ुब्बारे पंक्चर करने की बड़ी बुरी आदत है। उन्होंने यह कहकर हमारी सारी ख़ुशी किरकिरी कर दी कि जब शेर और बकरी एक ही घाट पानी पीने लगें तो समझ लो कि शेर की नीयत और बकरी की अक़्ल में फ़ितूर है। महमूद व अयाज का एक ही पंक्ति में बैठकर खाना भी ‘‘ऑडिट एंड इंस्पेक्शन’’ का हिस्सा है। सेठ साहब वास्तव में यह पता लगाना चाहते हैं कि खाने वाले अस्ली फ़क़ीर हैं या मैनेजर ने अपने यारों-रिश्तेदारों की पंगत बिठा दी है।

हम कहां से कहां आ गये। बात स्टील मिल वाले सेठ की थी, जो सात-आठ वर्ष से काले धन को प्रत्येक महीने नियाज के लोबान की धूनी से पाक और ‘व्हाइट’ करता रहता था।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार/शनिवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की तीसरे भाग “स्कूल मास्टर का ख़्वाब से " ]

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1. हमारे सपनों का सच 2. क़िस्सा खिलौना टूटने से पहले का 3. घोड़े को अब घोड़ी ही उतार सकती है 4. सवारी हो तो घोड़े की 5. जब आदमी अपनी नजर में गिर जाये 6. अलाहदीन अष्टम

पहला और दूसरा भाग