Jul 182008
 

कोई दीवार सी गिरी है अभी

कुछ देर बाद मौलाना आते हुए दिखाई दिये। कीचड़ में डगमग-डगमग करती ईंटों पर संभल-संभल कर क़दम रख रहे थे। इस डांवाडोल पगडंडी पर इस तरह चलना पड़ता था जैसे सरकस में करतब दिखाने वाली लड़की तने हुए तार पर चलती है। लेकिन क्या बात है, वो तो अपने आप को खुली छतरी से संतुलित करती रहती है। जरा डगमगा कर गिरने लगती है तो दर्शक पलकों पर झेल लेते हैं। मौलाना ख़ुदा जाने बिशारत को देखकर बौखला गये या संयोग से उनकी खड़ाऊं ईंट पर फिसल गई, वो दायें हाथ के बल जिसमें नमाजियों की फूकें मारे हुए पानी का गिलास था-गिरे। उनका तहबंद और दाढ़ी कीचड़ में लथपथ हो गई और हाथ पर कीचड़ की जुराब-सी चढ़ गई। एक बच्चे ने बिना क़लई के लोटे से पानी डालकर उनका मुंह हाथ धुलाया, बिना साबुन के। उन्होंने अंगोछे से तस्बीह, मुंह और हाथ पोंछकर बिशारत से हाथ मिलाया और सर झुका कर खड़े हो गये। बिशारत ढह चुके थे, इस कीचड़ में डूब गये। अनायास उनका जी चाहा कि भाग जायें, मगर दलदल में इंसान जितनी तेजी से भागने का प्रयास करता है उतनी ही तेजी से धंसता चला जाता है।

उनकी समझ में न आया कि अब शिकायत और चेतावनी की शुरुआत कहां से करें, इसी सोच एवं संकोच में उन्होंने अपने दाहिने हाथ से जिससे कुछ देर पहले हाथ मिलाया था, होंठ खुजाया तो उबकाई आने लगी। इसके बाद उन्होंने उस हाथ को अपने शरीर और कपड़ों से एक बालिश्त की दूरी पर रखा। मौलाना आने का उद्देश्य भांप गये। ख़ुद पहल की। यह मानने के साथ कि मैं आपके कोचवान रहीमबख़्श से पैसे लेता रहा हूं-लेकिन पड़ोसन की बच्ची के इलाज के लिये। उन्होंने यह भी बताया कि मेरी नियुक्ति से पहले यह नियम था कि आधी रक़म आपका कोचवान रख लेता था। अब जितने पैसे आपसे वसूल करता है, वो सब मुझ तक पहुंचते हैं। उसका हिस्सा समाप्त हुआ। हुआ यूं कि एक दिन वो मुझसे अपनी बीबी के लिये तावीज ले गया। अल्लाह ने उसका रोग दूर कर दिया। उसके बाद वो मेरा भक्त हो गया। बहुत दुखी आदमी है। मौलाना ने यह भी बताया कि पहले आप चालान और रिश्वत से बचने के लिये जब भी उसे रास्ता बदलने का आदेश देते थे, वो महकमे वालों को इसका एडवांस नोटिस दे देता था। वो हमेशा अपनी इच्छा, अपनी मर्जी से पकड़ा जाता था। बल्कि यहां तक हुआ कि एक बार इंस्पेक्टर को निमोनिया हो गया और वो तीन सप्ताह तक ड्यूटी पर नहीं आया तो रहीम बख़्श हमारे आफ़िस में ये पता करने आया कि इतने दिन से चालान क्यों नहीं हुआ, खैरियत तो है? बिशारत ने कोचवान से संबंधित दो-तीन प्रश्न तो पूछे, परंतु मौलाना को कुछ कहने सुनने का साहस अब उनमें न था। उनका बयान जारी था, वो चुपचाप सुनते रहे।

मेरे वालिद के कूल्हे की हड्डी टूटे दो बरस हो गये। वो सामने पड़े हैं। बैठ भी नहीं सकते। चारपाई काट दी है। लगातार लेटे रहने से नासूर हो गये हैं। पड़ोसी आये दिन झगड़ता है कि ‘‘तुम्हारे बुढ़ऊ दिन भर तो ख़र्राटे लेते हैं और रातभर चीख़ते-कराहते हैं, नासूरों की सड़ांध के मारे हम खाना नहीं खा सकते।

वो भी ठीक ही कहता है। ख़ाली चटाई की दीवार ही तो बीच में है। चार माह पहले एक और बेटे ने जन्म लिया। अल्लाह की देन है। बिन मांगे मोती मिले, मांगे मिले न भीख। जापे के बाद ही पत्नी को Whiteleg हो गई। मौला की मर्जी! रिक्शा में डालकर अस्पताल ले गया। कहने लगे, तुरंत अस्पताल में दाखिल कराओ, मगर कोई बेड ख़ाली नहीं था। एक महीने बाद फिर ले गया। अब की बार बोले-अब लाये हो, लम्बी बीमारी है, हम ऐसे मरीज को दाखिल नहीं कर सकते। फ़ज्र और मग़रिब की नमाज से पहले दोनों का गू-मूत करता हूं। नमाज के बाद स्वयं रोटी डालता हूं तो बच्चों के पेट में कुछ जाता है। एक बार नूरजहां ने मां के लिये बकरी का दूध गर्म किया तो कपड़ों में आग लग गयी थी। अल्लाह का लाख-लाख शुक्र है, मेरे हाथ-पांव चलते हैं।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार/शनिवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की तीसरे भाग “स्कूल मास्टर का ख़्वाब से " ]

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

इस भाग की पिछली कड़ियां

1. हमारे सपनों का सच 2. क़िस्सा खिलौना टूटने से पहले का 3. घोड़े को अब घोड़ी ही उतार सकती है 4. सवारी हो तो घोड़े की 5. जब आदमी अपनी नजर में गिर जाये 6. अलाहदीन अष्टम 7. शेरे की नीयत और बकरी की अक़्ल में फ़ितूर 8.महात्मा बुद्ध बिहारी थे 9.घोड़े का इलाज जादू से 10.कुत्तों के चाल चलन की चौकीदारी 11. कौन किसका खाना है? 12.मुगल वंश हो तो ऐसा

पहला और दूसरा भाग

Jul 162008
 

कका बालकनी में बैठे हुए सामने पार्क में खेलते हुए बच्चों को देख रहे थे.साथ ही पातड़ा (पंचाग) भी देख रहे थे. मैने उनसे पूछा.

"कका.. पंचाग में क्या देख रहे हो..? "

"अरे देख रहा था हरेला कब है. भोल (कल) हरेला है."

"ओ..कल है! कका बताइये कल क्या क्या करना है. "

"अरे यहां शहर में क्या हुआ. पहाड़ में होते तो कल बोया हुआ हरेला काटते,सर में हरेला लगाते, डिकारे बनाते, मातृका पट्टा पूजते. यहां ये सब जो क्या होने वाला ठहरा. बस शगुन का बड़ा बना देंगें. अपनी ईजा को बोल कि कल बड़ा बनाने के लिये रात से मास (उड़द की दाल) भिगो देना."

कका की बातों से थोड़ी निराशा झलक रही थी. मैने उनसे पूछा.

harela

"कका बताओ ना… ये हरेला क्या होता और पहाड़ में हरेला कैसे मनाते है. "

कका तो जैसे तैयार ही बैठे थे.

"अब क्या बताऊं भुला.पहाड़ की बात ही कुछ और हुई. हरेला साल में तीन बार मनाया जाने वाला हुआ. एक तो चैत (चैत्र) के महीने में,दूसरा सौण (श्रावण) में और तीसरा असोज (आस्विन) में. जिस दिन हरेला होता है उसके नौ-दस दिन पहले पांच या सात प्रकार के बीजों को एक टोकरी,थाली या पुराने मिठाई के डब्बे में मिटटी डाल के बो दिया जाता है."

"कका ये कौन कौन से बीज होते हैं."

"अरे घरपन जो बीज मिल गये सबको बो दिया जाने वाला हुआ. जैसे गेहूं, धान, जौ, भट्ट,जुनाव (मक्का),मादिरा, राई, गहत, मास (उड़द),चना, सरसों. जो हाथ पड़ गया.इसका कोई खास विधान नहीं हुआ. लेकिन यह विषम संख्या पांच या सात होने चाहिये. फिर इन सबके ऊपर मिटटी डाल के उस टोकरी या थाली को घर में ही द्याप्ताथान (मन्दिर) में रख दिया जाता है. हर दिन पूजा करते समय थोड़ा थोड़ा पानी छिड़का जाता है. तीन-चार दिन के बाद उन बीजो में से अंकुर निकल जाते है.इन्हे ही हरयाव (हरेला) कहा जाता है.नौवे या दसवे दिन इनको काटा जाता है.जैसे चैत वाला हरेला चैत के पहले दिन बोया जाता है और नवमी को काटा जाता है. सौण का हरेला सौण लगने से नौ दिन पहले अषाड़ में बोया जाता है और दस दिन बाद काटा  जाता है. असोज (आश्विन) वाला हरेला नवरात्र के पहले दिन बोया जाता है और दशहरे  के दिन काटा जाता है."

"ओ…लेकिन हरेला मनाया क्यों जाता है कका."

"भुला हमारी लोक-संस्कृति में बहुत सी चीजें.. वो क्या कहते हैं… साइंटिफिक तरीके से बनायी गयी ठहरी."

"वाह कका आप तो अंग्रेजी भी बोलने लगे."

"तीन हरेले तीन मौसमों के आने की सूचना देने वाले हुई. चैत का हरेला मतलब गरमी आ गयी,सौण का हरेला मतलब बरसा का मौसम आ गया और असोज का हरेला मतलब …"

"ठंड का मौसम शुरु हो गया."

"बिल्कुल सही."

"लेकिन आप कह रहे थे ना आप लोग डिकारे बनाते थे. वह क्या होता है कका."

"बताता हूँ चेला वह भी बताता हूँ. पहले अपनी ईजा को बोल ना एक गिलास चहा बणै दे."

"ठीक है."… मैंने माँ को चाय बनाने को कहा और आकर फिर कका के पास बैठ गया.

"सौण (श्रावण) महीने के हरेले का विशेष महत्व होने वाला हुआ. यह महीना तो शंकर जी का महीना हुआ. इसलिये इस हरेले को कही कही हर-काली के नाम से भी जाना जाता है.तो सौण वाले हरेले में मिट्टी से शिव ज्यू का पूरा परिवार बनाया जाने वाला हुआ और फिर उसकी पूजा की जाने वाली हुई."

"मिट्टी से! ..मिट्टी से कैसे."

"अरे डिकारे का मतलब ही हुआ प्राकृतिक चीजों का प्रयोग कर मूर्तियाँ बनाना…. तो डिकारे ऐसी ही चीजों के बनाये जाने वाले ठहरे.बचपन में हम लोग लाल मिट्टी लेकर आने वाले ठहरे और फिर महीन कर उसमें रुई मिला कर सानने वाले हुए.उसे थोड़ी देर छोड़ देने वाले हुई. फिर उसी मिट्टी से शिव ज्यू, पार्वती ज्यू और गणेश बनने वाले हुए.बांकी तो लोग अपनी मर्जी से देवी-देवता बना लेने वाले हुए.कुछ लोग केले के तने और पत्तों से भी मूर्ति बनाने वाले हुए. डिकारे बनाकर उनको हलकी धूप या छाया में सुखाया जाने वाला हुआ ताकि उसके चटकने का डर ना हो.सूखने के बाद चावल के विश्वार (घोल) से हल्के सफेद रंग का लेप करने वाले हुए.कई बार गोंद मिले रंग भी लगाये जाने वाले हुए. पहले से तो रंग भी घर में बन जाने वाले हुए.ये रंग किलमोड़े के फूल, अखरोट व पांगर के छिलकों से बनने वाले हुए.काला रंग बनाने के लिये कोयला पीस देने वाले हुए.आजकल तो बाजार में मिलने वाले सिन्थेटिक रंग ही प्रयोग में लाये जाते हैं.फिर उन रंगों से देवी-देवताओं के आंख,नाक,मुँह बनाने वाले हुए."

"तो फिर डिकारों में नाक,मुँह बनाने के लिये कोई ब्रश वगैरह यूज करते हैं क्या." ..मुझे जिज्ञासा हुई.

"बुरुश कहां मिलने वाला हुआ.हम या तो लकड़ी की तीलियों से रंग करने वाले हुए या माचिस की तीली में रुई लगाकर उससे रंग भरने वाले हुए."

"और हरेले के दिन क्या क्या होता है ?"

"हरेले वाले दिन घर में पूरी,पकवान जैसे पुआ,बड़ा बनाये जाते हैं.हरेला काटने के बाद इसमे अक्षत-चंदन डालकर भगवान को लगाया जाता है.मंत्रोच्चार किया जाता है रोग शोक निवारणार्थ प्राण रक्षक वनस्पते, इदा गच्छ नमस्तेस्तु हर देव नमोस्तुते. फिर घर के सभी सदस्यों को हरेला लगाया जाता है. हरेला लगाने के लिये सर व कान पर हरेले के तिनके रखे जाते है.एक दूसरे को "जी रया, जागि रया यो दिन यो मास भेटने रैया" कह के आशीर्वाद दिया जाता है. छोटे बच्चो को हरेला पैर से ले जाकर सर तक लगाया जाता है."

"हाँ मुझे याद है जब में छोटा था तो आमा ऐसे ही लगाती थी और साथ में कुछ मंत्र जैसा भी कहती थी."

"हाँ सबके दीर्घायू होने की कामना की जाती है और कहा जाता है."

लाग हरेला, लाग बग्वाई,
जी रए, जाग रए.
स्याव जस बुद्धि हैजो, सूर्ज जस तरान हैजो 
आकाश बराबर उच्च है जै, धरती बराबर चकाव है जै
दूब जस फलिये
हिमाल में ह्यूं छन तक, गंग ज्यू में पानी छन तक
सिल पिसि भात खाये, जांठि टेकि झाड़ जाये

"इसका मतलब क्या हुआ कका."

इसका मतलब हुआ कि "तुझे यह हरेला मिले,जीते रहो,जागरूक रहो,तुम्हारी सियार के समान तेज बुद्धि हो,सूर्य के समान त्राण हो,तुम आकाश के समान ऊंचाइयां छुओ, पृथ्वी के समान धैर्ययुक्त बनो, दूर्वा के तृणों के समान पनपो,जब तक हिमालय में हिम रहे गंगा नदी में पानी रहे तब तक जियो,इतने दीर्घायु हो कि तुम्हें भात भी पीस कर खाना पड़े (दांत टूट जाने पार) और शौच जाने के लिए भी लाठी का उपयोग करना पड़े."

"वाह यह तो बहुत अच्छी कामना है."

"और हरेले के पीछे एक मतलब और भी है कि हम प्रकृति का सम्मान करें,आदर करें.कुछ इलाकों में हरेले के दिन नये पेड़ लगाये जाते हैं.हरेला वैसे तो कुमाऊं का मुख्य त्यौहार है लेकिन यह गढ़वाल में भी मनाया जाता है,वहां इसे हरियाली पर्व कहा जाता है."

"मुझे याद है बेटा… बचपन में तो हरेले के दिन गोठ के जानवरों को भी हम हरेला लगाने वाले हुए.अपने नाते-रिश्तेदारों को लिफाफे में सूखा पिठ्या,अक्षत और हरेले के तिनड़े (तिनके) भेजने वाले हुए.साथ में लिखने वाले हुए "आज हरेला भेज रहे हैं सिरोधार्य करना".चिट्ठी मिलने पर हरेला सिर पर रखने वाले भी हुए.हरेले के दिन कान में हरेला लगा कर बढ़े-बूढ़ों का आशीर्वाद लेकर स्कूल जाने वाले हुए."

तब तक चाय आ गयी.कका चाय लेकर पीने लगे और पुरानी यादों में खो गये.मैं भी कका को उन यादों के साथ छोड़कर चल दिया.मुझे हरेले के बारे में कई नई बातें पता चल गयीं थी. 

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आप सभी को हरेले की शुभकामनाऐं.