डार द्रुम पलना,बिछौना नवपल्लन के
सुमन झँगूला सौहे तन छवि भारी दें
मदन महीपजू को बालक बसंत
प्रातहि जगावत गुलाब चटकारी दे.
- कविवर देव
पिछ्ले अंक में हमने होली में शास्त्रीय होली की बात की थी आज उसे ही आगे बढ़ाते हैं. कुछ लोग मानते हैं पर्वतीय क्षेत्र में और विशेषकर कुमाऊं में होली की शुरुआत बसंत पंचमी से होती है लेकिन बैठकी होली की शुरुआत इससे भी काफी पहले हो जाती है. पौष माह (जिसे पहाड़ में पूस मास कहा जाता है) के पहले रविवार से बैठी होली प्रारम्भ हो जाती है.लेकिन इस होली का स्वरूप और इसके कथ्य का स्वरूप बदलते रहता है. बसंत पंचमी तक कथ्य आध्यात्मिक रहता है, शिवरात्रि तक आते आते यह अर्ध-श्रंगारिक हो जाता है,शिवरात्रि की बाद पूर्ण श्रंगारिक होलियां गायी जाती हैं. तो बैठकी होली में भक्ति, छेड़-छाड़,वैराग्य,विरह, हंसी-ठिठोली, कृष्ण-गोपी प्रेम, कृष्ण की रास लीला, प्रेमी-प्रेमिका की रार तकरार, पति पत्नी का विरह, संयोग, देवर-भाभी की छेड़-छाड़ सभी तरह के रसों का अनोखा मिश्रण है.
बैठकी होली पर्वतीय अंचल की संस्कृति में रची-बसी होने के बावजूद ‘न्योली’ जैसे पारंपरिक लोकगीतों से भिन्न है. सबसे खास बात इस होली की है कि इसे कुमाऊंनी में नहीं गाया जाता. इसकी भाषा ब्रज की बोली है या फिर मिलीजुली है जिसमें अवध का प्रभाव भी स्पष्ट दिखता है. सभी बदिंशें राग-रागिनियों में गाई जाती हैं. यानी यह शुद्ध शास्त्रीय गायन है लेकिन यह शास्त्रीय गायन से कुछ मामलों में भिन्न भी है.यह शास्त्रीय गायन की तरह एकल गायन नहीं है और ना ही इसे सामूहिक गायन की श्रेणी में रखा जा सकता है.होली में भाग लेने वालों को होलियार कहा जाता है. मुख्य होलयार (जो अपनी अपनी बारी के हिसाब से बदल सकते हैं) गीत का मुखड़ा गाता है और बांकी लोग जो श्रोता भी है और होलियार भी वह बीच बीच में साथ देते हैं जिसे यहां ‘भाग लगाना’ कहते हैं.इस मामले में बैठक़ी होली महिलाओं की होली से अलग है जहाँ महिलाऐं समवेत स्वरों में होली गाती हैं.बैठकी होली में गीत घर की बैठक में राग रागनियों के साथ हारमोनियम और तबले पर गाए जाते हैं. इन गीतों में मीराबाई से लेकर नज़ीर और बहादुर शाह ज़फ़र की रचनाएँ सुनने को मिलती हैं.होली में जब रंग छाने लगता है तो बारी बारी से हर कोई छोड़ी गई तान उठाता है.
बैठक होली में श्रंगार है,लेकिन अश्लीलता नहीं है,भोंडापन नहीं है.प्रसिद्ध साहित्यकार मनोहर श्याम जोशी ने कहीं कहा था ‘‘होली जैसे धमाल भरे त्यौहार को ‘बैठक होली’ गरिमा प्रदान करती है.’’
इसमें मूलत: पुरुष भाग लेते हैं लेकिन आजकल महिलायें भी इसमें शामिल होती हैं. यह होली रात में शुरु होती है और अक्सर सुबह दो-तीन बजे तक चलती रहती है.होली का राग धमार से आह्वान कर पहली होली राग श्याम कल्याण में गाई जाती है. समापन राग भैरवी पर होता है. बीच में समयानुसार अलग-अलग रागों में होलियां गाई जाती हैं. सभी तरह के राग और ताल इन होलियों में प्रयोग किये जाते हैं. जैसे राग काफी, जंगला, खम्माज, साहना,जैजैवंती, झिंझोटी, भैरवी में क्रमश: जैसे जैसे थकान बढ़ती है, गाये जाते हैं. भीम पलासी, कलावती, हमीर राग भी चलता है.दादरा,कहरवा ताल सभी में होलियां गायी जाती हैं.होली को लोकप्रिय बनाने के भी प्रयास हुए.इसे लोकप्रिय बनाने के लिए जानकारों ने होली की धमार और चांचर ताल में परिवर्तन किया. सो, 14 मात्रा की धमार और चांचर तालें 16 मात्रा की हो गईं. रागों के अंग या चलन में भी थोड़ा-सा परिवर्तन किया गया. इससे होली गायन की एक नई शैली विकसित हुई और वह सहज आम जन की हो गई.
यहाँ आपको अलग अलग रंग की होली देखने को मिलती है. जैसे
” ये कैसी होरी खिलाई श्याम तुम बड़े हरजाई “
” जगाय दीन्हो रे मोहे निंदिया में आके “
” मोहे छेर अकेली आज जमुना किनारे “
” साकी लिये सागरे मुश्क बू है.
गुलिस्तां में जाकर हरेक गुल को देखा,
न तेरी सी रंगत न तेरी सी बू है”
और नजीर की होली तो खैर गायी ही जाती है.
“जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की।
और दफ़ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की।
परियों के रंग दमकते हों तब देख बहारें होली की।
ख़म शीशए* जाम छलकते हों तब देख बहारें होली की।
महबूब नशे में छकते हो तब देख बहारें होली की।
गुलज़ार* खिलें हों परियों के और मजलिस की तैयारी हो।
कपड़ों पर रंग के छीटों से खुश रंग अजब गुलकारी हो।
मुँह लाल, गुलाबी आँखें हो और हाथों में पिचकारी हो।
उस रंग भरी पिचकारी को अंगिया पर तक कर मारी हो।
सीनों से रंग ढलकते हों तब देख बहारें होली की। “
- नजीर अकबराबादी
* शीशए : सागर / * गुलजार : बाग
गंगोलीहाट, लोहाघाट, चंपावत, पिथौरागढ़ , अल्मोड़ा, नैनीताल अपनी शास्त्रीय होलियों के लिये प्रसिद्ध हैं. लोहाघाट अपनी खड़ी होलियों के लिये भी प्रसिद्ध है.
बैठकी होली के कुछ गायकों की बात करें तो “चंचल प्रसाद जी” अभी भी होली गायक के रूप में विख्यात है. दिल्ली और उत्तरांचल के कद्रदानों में होली गायन के लिए खासे लोकप्रिय चंचल प्रसाद अपनी वंश परंपरा में तीसरी पीढ़ी के गायक हैं. कहते हैं, उनके दादा उस्ताद कालिया को नेपाल की राजशाही का वरदहस्त प्राप्त था, तो पिता राम गुलाम रामपुर के सहसवान घराने के पारंगत गायक और सारंगी वादक थे.कहा जाता है कि होली की बैठकों में जान डालने वाले “गुलाम उस्ताद की” आवाज और अंगुली दोनों में जादू था. उनके बाद यहां किसी को ‘उस्ताद’ नहीं कहा गया.इन सबके अलावा जो नाम होली गायन से जोड़े जाते हैं उनमें रामप्यारी, अमानत खां, शिवलाल वर्मा, कांती लला, मोहन रईस, तारा प्रसाद पांडे, नारायण दत्त जोशी जैसे कलाकारों को ‘बैठक होली’ के दिग्गजों के रूप में याद किया जाता है.
अल्मोड़ा में ही एक प्रमुख क्लब है “हुक्का क्लब”. 1907 में स्थापित यह क्लब सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र रहा है.यह क्लब हर साल कुमाऊं की प्रसिद्ध रामलीला भी करवाता है. यहां नियमित रूप से होली की बैठकें आयोजित होती रही हैं. पिछले दशक से यह क्लब हर वर्ष अल्मोड़ा में ‘होलिकोत्सव’ का आयोजन कर रहा है, जिसमें उत्तरांचल के अलावा देश के कई भागों जैसे मथुरा, वृंदावन, जम्मू, कोलकाता इत्यादि की टीमें भी भाग लेती हैं.
अल्मोड़ा की शास्त्रीय होली की बात हो और स्वर्गीय तारा प्रसाद पांडे यानि तारी मास्साब की बात ना हो ऐसा कैसे हो सकता है. मेरा यह सौभाग्य रहा है दर्जा सात-आठ में वो हमारे संगीत के मास्साब थे. मुझे एक बैठी होली में बैठने का सौभाग्य भी मिला है जिसके तारी मास्साब ने भी होली गायी थे. संगीत में तारी मास्साब की पकड़ तो थी ही वो बहुत मजाकिया भी थे. अपना गायन खत्म करने के बाद वह ऐसी चुटकी लेते कि आसपास बैठे लोग हँसते रहते और वह “चहा लाओ हो” (चाय लाओ जी) या “आलू-गुटुक कां छ्न” (आलू के गुटके कहाँ हैं) कह के दूसरी होली शुरु कर देते.उस जमाने में सीडी या एम.पी.3 तो चला नहीं था. रिकॉर्डिग की उन्नत सुविधायें भी नहीं थी और ना ही लोग रिकॉर्ड करने या व्यवसायिक उद्देशय के लिये होली गाते थे. यह सब तो एक स्वांत: सुखाय संस्कृति का हिस्सा था.इसलिये तारी मास्साब या उन जैसे कई अच्छे गायको की होलीयां समय के साथ खो गयीं.तारी मास्साब की कुछ कैसेट उनके चाहने वालों ने बनाये थे जो एक जमाने में अल्मोड़ा में बिके भी. ऐसा ही काफी पुराना कैसेट मेरे पास भी है. आइये उसी में से एक होली आपको सुनवाते चलूं.
मोहे छेर अकेली आज जमुना किनारे, मोहे छेर अकेली आज जमुना किनारे,
सब सखियन संग मैं भी गयी थी , सब सखियन संग मैं भी गयी थी
रंग की भरी मोरि उमंग नयी थी , रंग की भरी मोरि उमंग नयी थी
ऐसी ढीढ डंगर देखो रंग के रंगीलो , ऐसी ढीढ डंगर देखो रंग के रंगीलो
मोरि नरम कलाई मरोड़ गयो रे, धक्का मार गयो रे मोहे नंद को दुलारो
मोहे छेर अकेली आज जमुना किनारे, मोहे छेर अकेली आज जमुना किनारे,
मोरि नयी सी चुनरिया फार गयो रे, मोरि नयी सी चुनरिया फार गयो रे
धक्का मार गयो रे मोहे नंद को दुलारो,मोहे छेर अकेली आज जमुना किनारे
सरका के अंगरुवा देखे मोरे अंग रे, सरका के अंगरुवा देखे मोरे अंग रे,
लाज से सिमटी कोई नहीं संग रे , लाज से सिमटी कोई नहीं संग रे
सांवरों कान्ह कैसो छैल छ्बीलो देखो ,सांवरों कान्ह कैसो छैल छ्बीलो देखो
देखो अंगिया मोरी उतार गयो रे, देखो अंगिया मोरी उतार गयो रे
धक्का मार गयो रे मोहे नंद को दुलारो
मोहे छेर अकेली आज जमुना किनारे, मोहे छेर अकेली आज जमुना किनारे,
मोरि नयी सी चुनरिया फार गयो रे, मोरि नयी सी चुनरिया फार गयो रे
धक्का मार गयो रे मोहे नंद को दुलारो,मोहे छेर अकेली आज जमुना किनारे
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होली को बीते हुए महीने गुजर गये. फ़िर से याद कराने के लिये शुक्रिया. होली के बहाने कुमाउ के सांस्क्रतिक इतिहास को जानकर अच्छा लगा. खूब ही ठहरा दाज्यू.
वाह! बहुत रोचक जानकारी. नजीर अकबराबादी को पढ़कर आनन्द आ गया. अभी सुन न्हीं पाये हैं. बाद में सुनते हैं.
रोचक लगा यह सब पढना। मै वनस्पतियाँ खोज रहा था। उम्मीद है आगे के लेखो मे कुछ मिलेगा।
बहुत ही सुन्दर लेख है. काकेश दा लगता है आपने भारी रिसर्च की है इस विषय पर. तभी तो होली से संबन्धित सभी बिन्दुओं पर इतना ज्ञानपरक लेख लिख दिया आपने. साधुवाद…
काकेश दा,
जै हो तुमरी, इतुक बढि़या जानकारी दी भै,
उस्सी कुमय्यां होली की रंगते और भै, अति सुन्दर चित्रण किया, आपके लेख उत्तराखण्ड की आने वाली पीढी के लिये एक आनलाइन सांस्कृतिक संग्रहालय के रुप में मार्गदर्शन करेंगे।
जै हो तुमरी, इतुक बढि़या जानकारी दी भै,
उस्सी कुमय्यां होली की रंगते और भै, अति सुन्दर चित्रण किया, आपके लेख उत्तराखण्ड की आने वाली पीढी के लिये एक आनलाइन सांस्कृतिक संग्रहालय के रुप में मार्गदर्शन करेंगे।