पिछ्ले दिनों एक सेमिनार में गया था और एअरर्पोर्ट पर एक किताब दिखायी थी “डब्बेवाले”. डब्बेवालों के बारे में काफी कुछ सुना था. सुना था कि आई-आई-एम वाले लोग उन पर अध्ययन कर चुके हैं. एक बार बंगलौर में मुझे भी एक सेमिनार में इस संस्था के लोगों द्वारा ही तैयार किया प्रजेंटेसन देखने को मिला था. जिसमें इस बात का भी जिक्र था कि किस प्रकार यह लोग सिक्स सिगमा ( Six Sigma) के मानकों को पूरा करते हैं. इसी जिज्ञासावस वह किताब खरीद ली. मात्र 110 रुपये में. डायमंड पाकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक श्रीनिवास पंडित ने लिखी है. हाँलाकि जिस जिज्ञासा के साथ यह किताब खरीदी थी वह पूरी तो नहीं हुई लेकिन कुछ बातें जरूर सीखने को मिली.

अपनी भूमिका में श्रीनिवास कहते हैं.

मैं आपको एक व्यावसायिक सफलता की कहानी की तलाश के बारे में बताने को उत्सुक हूँ. क्योंकि मैंने इस दीर्घकालीन सफलता के बीच गहरे मूल्यों की जानकारी  को जाना है. यहां मैं वही कीमती जानकारी आपके सम्मुख प्रस्तुत कर रहा हूँ जिसे पढ़कर आप इस व्यवसाय की सफलता का आनंद ले सकेंगे.जो संगठन दिमाग चकरा देने वाले बदलाव के पहलुओंdabbe-wale का सामना कर रहा हो, उसके कार्यकर्त्ताओं के रचनात्मक प्रयास सफलता की कहानी के सच्चे पात्र बनते हैं.

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इससे मुझे लाओत्से की प्रसिद्ध उक्ति याद आती है—‘‘निरंतरता की पहचान से ही निष्पक्ष नजरिया पैदा होता है.’’ इसका अर्थ है कि हमें बदलाव की इस उलझी हुई पहेली में निरंतर ‘स्थिरता’ को पहचानना चाहिए. ‘स्थिरता’ व ‘अस्थिरता’ में भेद करने के लिए हमें उन व्यवसायों व उनसे जुड़े लोगों का, जिन्होंने प्रतिवर्ष-स्थायी सफलता अर्जित की है, का अध्ययन करना आवश्यक है.

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यह 115 साल पुराने व्यवसाय की कहानी है, जिसे 5000 कम पढ़े-लिखे लोग मिलकर चलाते हैं. यहाँ मेरे सहित चार पात्रों के संवादों द्वारा कहानी प्रस्तुत की गई है. रघुनाथ मेगड़े (रघु) (48), व गंगाराम तालेकर (गंगा) (55), मुंबई के टिफिन बॉक्स कोरियर यानि डिब्बेवाले हैं. रघु कला स्नातक है जबकि गंगा आठवीं पास है. वे गांव के सीधे-साधे कृषि समुदाय में पले-बढ़े उन्होंने स्थानीय मराठी भाषा में अपनी पढ़ाई की.

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हालांकि वे ‘मराठी युक्त अंग्रेजी’ में अपने भाव आसानी से प्रकट कर देते हैं. वे बड़े जोश से अपनी कहानियाँ सुनाते हैं. फिर भी वे गप्पी नहीं हैं. जैसा कि रघु ने मुझे बताया—‘‘अंग्रेजी भाषी लोगों से मिलने के कारण हमारी बातचीत की कला में निखार आया.’’ रघु का स्वभाव थोड़ा शुष्क है जबकि गंगा का स्वभाव मस्त है.

मैं डब्बेवालों की धीमी सांस्कृतिक पर्यावरण को अच्छी तरह जानता हूँ अतः यह निरीक्षण वास्तव में काफी अद्भुत रहा कि वे किस तरह घनी आबादी वाले मुंबई की सड़कों के व्यस्त घंटों में डिब्बे ले जाते हैं.

महानगरी मुंबई के रंग-बिरंगी पोशाकों में सजे स्त्री-पुरुष व बच्चों के बीच इनकी धुंधली सफेद कमीज़, पजामा व स्काउट की तरह पहनी गई टोपी, बिल्कुल विपरीत दिखाई देती है. आप डिब्बेवालों को लगातार गाड़ियों, बसों, कारों, वैनों, ट्रकों, ऑटों, साइकिलों, ठेलों, पदयात्रियों व बर्फ लाने वाले ठेलों की मैराथन में सबसे आगे दौड़ता पाएँगे. जहाँ सारा दिन लापरवाही से सड़क क्रॉसिंग, ओवरटेकिंग, गति सीमा, भोंपू का स्वर इत्यादि कार्य ही होते रहते हैं.

यह भी एक पहेली है कि वे पिछले 115 वर्षों से किस तरह रोज-दर-रोज, सप्ताह-दर-सप्ताह, माह-दर-माह, साल-दर-साल, सारे मौसमों में अपने डिब्बों को सही समय पर पहुँचाने के लिए, अपने ठेलों को सड़क पर भगाते आ रहे हैं.
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अनीता (अ), रघु (र) गंगा (ग) व स्वयं (श्री) की बातचीत आपको एक ऐसे साधारण व्यावसायिक नमूने के बारे में बताएगी, जो एशिया की 11 करोड़ आवादी  वाली विशालतम महानगरी में शून्य वास्तविकता के आधार पर काम करता है. संवाद भी बुद्धिमत्ता व तर्क से भरपूर हैं.

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पहला अध्याय

यह जीवंत संवाद परंपरा व आधुनिकता, मनुष्य व मशीन, पर्यावरण व तकनीक तथा उपयोग व उपभोक्तावाद के शाश्वत संघर्षों पर रोशनी डालते हैं. पाने व संतुष्ट होने की लड़ाई लगातार जारी है. डिब्बेवालों ने अपने मूल्यों में ही छिपा जीवन अमृत पा लिया है. उपलब्धि, महत्ता, धरोहर व प्रसन्नता का संगम ही उन्हें कामकाजी जीवन का संतुलन देता है.

अनीता ने काव्यात्मक शैली में इस वातावरण का वर्णन किया. उसके पास विद्वतापूर्ण नजरिया है, जो उसे उत्सुकतापूर्वक अच्छी बातें बाँटने की प्रेरणा देता है. इसी बातचीत के दौरान उसने रघु व गंगा से हुई भेंट के बारे में बताया.

अ.    क्या आप इन डब्बेवालों व उनके अविश्वसनीय डिलीवरी रिकॉर्ड के बारे में जानते हैं ?

श्री. हाँ, मैं जानता हूँ.

अ.    यह अर्धशिक्षित 5000 डब्बेवाले, 60 कि.मी. के दायरे में, 2,00,000 लोगों को, केवल 3 घंटे के भीतर घर का पका भोजन पहुँचाते हैं. हर रोज 4,00,000 बार लेन-देन होता है. कार्यस्थल व आवासीय क्षेत्र किसी बिखरे हुए चित्र की तरह फैले हुए हैं. सचमुच एक अद्भुत कहानी है.

श्री. इसमें कोई शक नहीं है.

अ.    16 मिलियन लेन-देन में मूल दर 1% है. यह एक अविश्वसनीय समय प्रबंध है. मुंबई तेजी से अपने पाँव फैलाती जा रही है. इस समय इसकी जनसंख्या 10.3 मिलियन के करीब है. फास्ट-फूड, रेस्त्रां व पटरी पर खाने-पीने का सामान बेचने वाले खोमचे भी चारों ओर फैले हुए हैं. फिर भी नूतन मुंबई टिफिन बाक्स सप्लायर्स एसोसिएशन धीरे-धीरे तरक्की कर रहा है.

श्री. तुम्हारे हिसाब से इसकी खास वजह क्या है ?

अ.    घर का बना भोजन पाने की इच्छा. अगर उचित कीमत पर घर से ऑफिस तक टिफिन पहुँच जाए. अब भी ज्यादातर लोग घर के बने भोजन को ही प्राथमिकता देते हैं. दूरी, वजन या स्थान जैसी बातों को ध्यान में न रखते हुए, एक डब्बावाला ग्राहक से प्रतिमाह 200 रुपए (या 4.6 डालर) लेता है. इसके बदले में वह अपने 25-30 ग्राहकों से 5000-6000 रु. (तकरीबन 116-140 डालर) कमा लेता है. दूसरे देशों में लोगों के पास ऐसी सुविधा नहीं है. लेकिन आप किसी से भी पूछें, खासतौर पर कहीं के भी निम्न आय-वर्गीय लोग, घर का बना भोजन ही लेना पसंद करेंगे. यह इच्छा इतनी बुनियादी है कि इसमें बदलाव आ ही नहीं सकता. बाहरी भोजन की उपलब्धता व आकर्षण के बावजूद घर का पका भोजन सदैव सराहा जाता रहेगा.

पिछ्ली समीक्षा :
चयनम् : क्या साहित्य विफल है ?

6 Responses to “डब्बेवाले”

  1. डब्बेवालों की कहानी मुझे शुरु से ही बड़ी अद्भुत लगती रही है। आज भी इनकी कार्यप्रणाली मेंरे लिए आश्चर्य और कौतुहल की चीज़ है।

  2. योजनाबद्ध तरीके से काम करके अपनी पहचान बनाने वाले ये मेहनतकश सभी के लिये प्रेरणास्त्रोत हैं।

  3. मुम्बई की कल्पना बिना डिब्बेवाले के कभी नही की जा सकती है।

  4. बढ़िया किताब से परिचय कराने के लिए धन्यवाद. मुम्बई के डब्बेवालों की कहानी सचमुच में गजब है.

  5. जी, जब मैने सिक्स सिग्मा किया तब इसे देखा था. हावर्ड में भी इस पर बहुत शोध हुआ. अद्भुत है,. यह तो एक मिसाल सा बन गया है. आपने जिक्र किया..आभार.

  6. बहुत अच्छा। six sigma के बारे में थोड़ी जानकारी भी दे दें। 16 मिलियन लेन-देन में मूल दर 1% है. में भूल दर होना चाहिये शायद मूल दर की जगह।

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