अंग्रेजी बनाम हिन्दी
रंजना जी अक्सर मेरे ब्लॉग पर आती रहती हैं और अपनी लंबी टिप्पणीयों का आशीर्वाद हमें प्रदान करती रहती हैं. उनकी टिप्पणी पर बनी मेरी पोस्ट स्त्रियां क्या खुद से सवाल पूछती हैं? अब तक की मेरी सबसे हिट और बहसात्मक पोस्ट रही है. पिछ्ले हफ्ते उन्होने मेरी एक पोस्ट भारत की राष्ट्रभाषा अंग्रेजी क्यों नहीं है?? पर एक लंबी टिप्पणी की. आप भी पढ़ें.
एक लंबे अरसे बाद ब्लॉग पर आ पाई हूँ.जो विषय आपने उठाया है,हमेशा ही इस तरह मुझे सालता रहा है कि वर्तमान परिस्थिति देख मन बड़ा ही आहत होता है. आहत अंग्रेजी के दिनो-दिन बढ़ते प्रभाव को देखकर नही, बल्कि अपनी हिन्दी भाषा, जो आज भी अपने देश के एक बहुत बड़े भाग मे आमजनों की भाषा है,गाँवों और कस्बों मे प्रादेशिक भाषा के बाद सबसे महत्वपूर्ण स्थान रखती है, दिनोदिन आज की पीढ़ी द्वारा उपेक्षित त्याज्य होती जा रही है.यह सही है की अंग्रेजी एक ऐसी भाषा है जो विश्व मे सर्वाधिक प्रचलित भाषा है,पर हमारे मातृभाषा का हमारे अपने देश मे जो निरादर बढ़ता जा रहा है,विश्व के और कोई भी देश अपनी मातृभाषा के प्रति यह रवैया नही रखते. हिन्दीभाषी क्षेत्र मे कुछेक सरकारी विद्यालयों को छोड़ हिन्दी माध्यम के स्कूल लुप्तप्राय होते जा रहे हैं.करें भी तो क्या आज गावों कस्बों मे भी गरीबी से मुहाल वो अभिभावक जो अपने बच्चों के शिक्षा के प्रति जागरूक है हिन्दी माध्यम से अपने बच्चों को पढ़वा पाने की हिम्मत नही जुटा पता. कारण सबको पता है जीविकोपार्जन का कोई माध्यम नही जहाँ की अनिवार्यता यह भाषा न हो गई हो.
किंतु समस्या भाषा मे नही समस्या वह सोच पैदा करती है जो अंग्रेजी भाषा को ही सभ्रान्तता का मानक मानती है.और हिन्दीभाषी को हेय दृष्टि से देखती है. भाषा की परिभाषा जो हमने पढी जानी वह यही थी कि ” भाषा अपने भावों को सामने वाले तक पहुँचाने का,अपने विचारों को अभिव्यक्त करने का माध्यम है” और यह ऐसी ही होनी चाहिए जिसके माध्यम से हम अधिक से अधिक सुगमता और प्रभावी ढंग से सामने वाले तक अपने उदगार संप्रेषित कर पाएं.भाषा एक ऐसा जरिया है जिसके माधयम से हम सामने वाले के ह्रदय मे अपना स्थान बना सकते हैं.फ़िर यह चाहे अंग्रेजी,फ्रेंच,जर्मन,हिन्दी या और कोई भी भाषा हो.अंग्रेजी ही क्यों, देश विदेश के अधिक से अधिक जितने भाषाओं का ज्ञान हो उतना अच्छा है.इस बात से कोई असहमत नही हो सकता कि जो सम्बन्ध मातृभाषा के जरिये बन सकती है वह अन्य भाषा के जरिये नही.फ़िर बात तो आपसी सम्पर्क को सुदृढ़ बनाने की ही हुई न. इसमे यह उच्च निम्न की बात क्यों.
एक दिन मेरी एक सहेली बड़े ही गर्व से बता रही थी कि उसकी बेटी के अंग्रेजी माध्यम स्कूल मे अंग्रेजी बोलने पर जितना ध्यान दिया जाता है और जिस प्रकार से बच्चों को ट्रेंड किया जाता है,वह लाजवाब है.एक घटना उसने बताई कि,आज सुबह उसकी ६ वर्ष की बेटी की क्लास टीचर ने एक दूसरी छात्र को क्लास मे हिन्दी मे बात करने पर उसकी बेटी से उस छात्र की जमकर पिटाई करवाई.यही नही क्योंकि उसकी बेटी सबसे अच्छे ढंग से अंग्रेजी मे बात कर पाती है इसलिए उसे यह अधिकार दिया गया है कि कभी भी किसी सहपाठी को हिन्दी मे बात करते हुए सुने तो उसे पीट सकती है. घटना सुन मुझे इतना क्षोभ हुआ कि सहेली को लताडे बिना न रह पाई.एक नन्हें से कोमल मन को क्या संस्कार दिए गए?यही न कि पहले तो हिन्दी एक हीन भाषा है और उसके प्रति इस तरह अहिष्णु हुआ जा सकता है कि अपने सहपाठी या आस पास बोलने वाले को प्रताड़ना भी दी जा सकती है.
यह केवल एक घटना नही,एक पूरी कौम तैयार की जा रही है जो -सी ऐ टी कैट से शुरू होकर अंग्रेजी भाषा खान पान संस्कार को ओढ़कर जीना जीवन की अपरिहार्यता और सफलता के लिए आवश्यक सिद्ध करती है. योग्यता का मानक ही एक भाषा की बंधक हो चुकी है. तकलीफ उन बच्चों को देखकर होती है जो हर प्रकार से योग्य होते हुए भी केवल अंग्रेजी न लिख बोल पाने के कारण रोजी रोटी के दौड़ मे पिछड़ जाते हैं. आज की पढी लिखी सभ्रांत मानी जाने वाली युवा पीढ़ी ने केवल भाषा को ही नही बल्कि एक पूरे पश्चिमी सभ्यता,संस्कृति का ही अपने संस्कारों का त्याग कर अंगीकार,अंधानुकरण करने का बीडा उठा रखा है.यह कोई शुभ संकेत नही.बहुत बड़ी बात नही जब हिन्दी भी संस्कृत की तरह केवल एक किताबी भाषा बनकर रह जाए.
इतनी लंबी टिप्प्णी करने के लिये उनका धन्य्वाद. रंजना जी से मेरा अनुरोध है कि वह जल्दी ही अपना ब्लॉग बनायें और हमें नियमित अपने विचारों से परिचित करवाते रहें.





‘khamosh lub’ kehate hain ki-
कुछ दोस्तों से वैसे मरासिम नहीं रहे,
कुछ दुश्मनों से वैसी अदावत नहीं रही.
– दुष्यंत कुमार
काकेश जी, अब आप रंजना जी के विचारों से इस से बेहतर तरीके से कैसे रू-ब-रू हो सकते हैं…ऐसा दिल से लिखने वाले लोग अपना ब्लाग बनायें या ना बतायें क्या फर्क पड़ता है ,दोस्त….हमारे ब्लाग हाजिर है ना इन विचारकों के लिये। बहुत अच्छा लिखती हैं , मुझे तो यही लगता रहा कि मैं तो उन की कोई बढ़िया सी पोस्ट ही पढ़ रहा हूं। यकीन मानिये, रंजना जी की सहेली की बेटी वाली बात कर हमें भी इतना गुस्सा आया कि क्या कहूं……पता नहीं हम कब सुधरेंगे, काकेश..
रंजनाजी का ब्लाग शुरू करने का अनुरोध हम भी करते हैं।
हिन्दी नहीं मरेगी
न ही बन्द होगी किताबों में
वह दिलों में बसती है
वह दिलों में जीती है
इस टिप्पणी से कोई भी बिना प्रभावित हुए कैसे रह सकता है. उनको अपना ब्लॉग शीघ्र ही बनाना चाहिये, यह निवेदन है. हिन्दी लिखने और ब्लॉग बनाने में जो भी मदद चाहिये, वो मुहैय्या कराई जाये. उनसे व्य्क्तिगत संपर्क साध कर इस निवेदन को प्रेषित किया जाये.
इन्तजार है उनके ब्लॉग शुरु होने की घोषणा का.
रंजना दीदी के ब्लॉग न बनने के पीछे मेरी गलती है. मैं सार्वजनिक तौर पर इस गलती को स्वीकार करता हूँ. एक महीना बीत गया, जब उन्होंने मुझे उनका ब्लॉग बनाने की बात कही थी. मैं आलस्य से पीड़ित उनका ब्लॉग नहीं बना सका..
आज ही उनका ब्लॉग बनकर तैयार हो जायेगा.
बहुत सही!!
रंजना जी के ब्लॉग के लिए शिवकुमार जी से पहले ही अनुरोध कर चुका हूं!
चलो शिव आलस्य त्याग रहे हैं इस बहाने!
हिन्दी है युग-युग की भाषा
हिन्दी है युग-युग का पानी
सदियों में जो बन पाती है
हिन्दी है वह अमर कहानी
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हिन्दी को उसके सिंहासन से
कोई अपदस्थ नहीं कर सकता.
हिन्दी में जीना और हिन्दी का जीना
निरंतर है….रहेगा.
यह मेरा अटल मत है.
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आपकी प्रस्तुति और रंजना जी व अन्य महानुभावों की
टिप्पणियाँ ,विमर्श और चिंतन का पथ प्रशस्त कर रही हैं.
धन्यवाद.
डा.चंद्रकुमार जैन
शिव भाई को लापरवाही के लिये दंडित किया जाये्गा, इसके लिये एक कमेटी का गठन किया जा रहा है, जो छै महीने के अंदर अपना फ़ैसला सुनायेगी, सद्स्य बनने के इच्छुक तुरंत अपना नाम काकेश जी को भेजे,कमेटी के मुखिया हम ही रहेगे .अत: शिव कुमार जी कुछ लेदे कर निपटाने की बात हमारे अलावा किसी से ना करे
दिल की बात कही है रंजना जी ने !
आदरणीय काकेश भाई,
आपके सहृदयता और विनम्रता से मैं अभिभूत हुई.एक साधारण सी टिपण्णी को जो आपलोगों ने मान दिया अब क्या कहूँ.एक बात कहना चाहूंगी कि जब से ब्लॉग जगत से परिचय हुआ और आपलोगों का लिखा पढने का सौभाग्य मिला,इस बेरस के तकनीकी दुनिया से जुड़े होने का अफ़सोस जाता रहा,बल्कि यह लग रहा है कि यदि आई टी फिल्ड से न जुड़ी होती तो कदाचित यह सब देखने पढने कसुअवासर ही न मिलता और मैं इस सुंदर दुनिया से अछूती अनजान रह जाती..हिन्दी ब्लॉग की दुनिया मे आज के दिन मे जितने भी लोग लेखन कार्य मे संलग्न हैं,अधिकांश का लिखा पढने पर लगता है जैसे अपने ही मन की बात किसी और के द्वारा लिखी गई पढ़ रही हूँ,इसलिए अलग से ख़ुद का ब्लॉग बना लिखना शुरू करूँ यह बहुत अधिक नही लगता कभी.फ़िर भी शिव से कुछ दिनों पहले मैंने कहा था कि मेरा एक ब्लॉग बना दे ताकि मैं भी नियमित पढने लिखने मे लग जाऊँ.अभी तो जब कभी कार्य की अधिकता होती है या किसी इतर समस्याओं मे फंस जाती हूँ तो यह नियमित रूप से नही हो पाता.
संवेदना की भूमि दरअसल प्रत्येक ह्रदय मे कमोबेश एक सी ही होती है और उसमे भी जमीन और मिट्टी से जुडाव जिसका जितना अधिक होता है उसकी सोच भी मिलती जुलती होती है और एक धरातल पर जब मनुष्य एक दूसरे से लेखन के मध्यम से जुड़ता है तो अपनापन का सहज बोध प्रतीत होने लगता है,इसके लिए किसी प्रयास की आवश्यकता नही होती.इसलिए भले आप सब सुधि जानो के साथ व्यक्तिगत सम्पर्क हो न हो ,सगे संबंधियों से अधिक अपनापन अनुभूत होता है.प्रवीण जी ,अनूपजी ,दिनेश जी, समीर जी,संजीत जी और ज्ञान भइया सबों का मेरी हौसला अफजाई के लिए कोटिशः धन्यवाद और भाई शिव को स्नेह.
अपनी माता के ह्रदय से लगे रहना और मातृभाषा को ह्रदय से लगाये रहना ,एक ही बात है.हमारी अगली पिछली पीढ़ी ने क्या किया या क्या करेगी अपनी इस हिन्दी भाषा का इस पर विचार मंथन तो चलता रहेगा.पर जब तक हमारे शरीर मे प्राण है,इसकी समृद्धि के लिए सतत प्रयत्नशील हो इसका मान बनाये रखें तो यही हमारी अपनी माता और मातृभाषा के लिए सेवा होगी.कहते हैं माँ का क़र्ज़ कोई कुछ भी करे नही उतार सकता,हम भी नही उतार पाएंगे,पर उसका मान रखें कहीं उसका सर न झुकने दें इसके प्रति क्रिताग्याँ रहें तो कुछ हद तक इसके प्रति कर्तब्य अर्पण कर पाएंगे.