कभी सुराही टूट,सुरा ही रह जायेगी,कर विश्वास !!

मैने उमर के रुबाइयों के बहुतेरे अनुवाद पढ़े..हिन्दी में भी अंग्रेजी में भी. हिन्दी में मुझे ‘मधुशाला’ (जो कि अनुवाद नहीं है पर इसकी चर्चा बाद में) और ‘मधुज्वाल‘ ने बहुत प्रभावित किया.हाँलाकि रघुवंश गुप्त जी का अनुवाद भी काफी अच्छा है….पर ‘मधुज्वाल’ मुझे उसके नये प्रतिमानों और छंद के नये नये प्रयोगो की वजह से ज्यादा सुन्दर प्रतीत होता है. बांकी अनुवाद एक ही शैली में बँध गये से लगते हैं. हाँलाकि बच्चन की ‘मधुशाला’ जितनी लोकप्रिय हुई उतना लोकप्रिय इसके समवर्ती रुबाइयों का कोई भी अनुवाद हिन्दी में नहीं हुआ.. लेकिन मुझे लगता है इसका मूल कारण यह रहा कि मधुशाला एक गेय रचना है.जो लोगों की जबान पर तुरंत चढ़ जाती है इस कारण इसको याद रखना ज्यादा आसान होता है.

आइये आज आपको मधुज्वाल से मेरे पसंद के कुछ छंदो से परिचित करवाता हूँ.

यह जग मेघों की चल माया
भावी, स्वप्नों की छ्ल छाया !
तू बहती सरिता के जल पर
देख रहा अपनी प्रतिछवि नर !

उठ रे , कल के दुख से व्याकुल,
जीवन सतरँग वाष्पों का पुल !
कल का दुख केवल पागलपन,
पल पल बहता स्वप्निल जीवन !
ले, उर में हाला ज्वाला भर ,
सुरा पान कर , सुधा पान कर !

स्वर्गिक अप्सरि सी प्रिय सहचरि
हो हँसमुख संग ,
मधुर गान हो ,सुरा पान हो
लज्जारुण रंग !
कल कल छ्ल छ्ल बहता हो जल
तट हो कुसुमित
कोमल शाद्वल चूमे पद तल
साकी हो स्मित !
इससे अतिशय स्वर्ग न सुखमय
यही सुर सदन ,
छोड़ मोह भय , मदिरा में लय
हो विमूढ़ मन!

वह ह्रदय नहीं
जिसमें प्रियतम की चाह नहीं!
वह प्रणय नहीं
जिसमें विरहानल दाह नहीं !
वह दिवस नहीं
यदि अविरत सुरा प्रवाह नहीं !
वह वयस नहीं
जो बाला के गल बाँह नहीं !

वह मनुष्य जिसके रहने को
हो छोटा आंगन , गृह द्वार ,
खाने को रोटी का टुकड़ा ,
पीने को मदिरा की धार !
जो न किसी का सेवक शासक ,
हँसमुख हों जिसके सहचर ,
कहता उमर सुखी है वह नर ,
स्वर्ग उसे है यह संसार !

मदिर नयन की , फूल बदन की
प्रेमी को ही चिर पहचान ,
मधुर गान का , सुरा पान का
मौजी ही करता सम्मान !
स्वर्गोत्सुक जो , सुरा विमुख जो
क्षमा करें उनको भगवान ,
प्रेयसि का मुख , मदिरा का सुख
प्रणयी के , मद्यप के प्राण !

उमर न कभी हरित होगा फिर
पलित बयस का गलित लिबास,
मेरे मन अनुकूल फिरेगा
भाग्य चक्र ,यह व्यर्थ प्रयास !
पान पात्र भर ले मदिरा से
शोक न कर , मदिरा कर पान ,
कभी सुराही टूट , सुरा ही
रह जायेगी , कर विश्वास! 

धर्म चक्रों को यदि मुझसे
कभी मित्रता हो स्वीकार
वो मेरे दुखों के बदले
इतना मात्र करें उपकार-
मेरे मरने बाद देह की
रज से ईंटे कर तैयार
चुनवा दें वे मदिरालय के
खँडहर की टूटी दीवार !

surahi-toot

 

क्रमश :….

[अब यह श्रंखला अब प्रत्येक गुरुवार को प्रकाशित की जायेगी]

इस श्रंखला के पिछ्ले लेख.

1. खैयाम की मधुशाला.. 2. उमर खैयाम की रुबाइयों के अनुवाद.. 3. मधुशाला में विराम..टिप्पणी चर्चा के लिये 4. उमर की रुबाइयों के अनुवाद भारतीय भाषाओं में  5. मैथिलीशरण गुप्त का अनुवाद 6. खैयाम की रुबाइयाँ रघुवंश गुप्त की क़लम से 7. मधुज्वाल:मैं मधुवारिधि का मुग्ध मीन

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Article written by काकेश

मैं एक परिन्दा….उड़ना चाहता हूँ….नापना चाहता हूँ आकाश…

3 responses to “कभी सुराही टूट,सुरा ही रह जायेगी,कर विश्वास !!”

  1. Shiv Kumar Mishra

    बहुत बढ़िया प्रस्तुति. मन प्रसन्न हो गया.

  2. balkishan

    बहुत ही बढ़िया प्रस्तुति.
    पढ़कर खुशी हुई.
    एक बात कहना चाहूँगा कि गेयता तो इस रचना मे भी भरपूर है. और सुर मे पढने से एक अलग ही आनंद की प्राप्ति होती है.
    आपको धन्यवाद.

  3. ranjana singh

    sadhuwaad! bahut bahut dhanyawaad.

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