यूसूफी साहब शब्द चित्र खीचने में माहिर हैं. एक छोटा सा उदाहरण देखिये जहाँ सत्तर साल के किबला अपने गांव की पुराने दिनों की याद में खो जाते हैं.

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सत्तर साल के बच्चे की सोच में तस्वीरें गडमड होने लगतीं। खुशबुऐं, नरमाहटें और आवाजें भी तस्वीरें बन-बन कर उभरतीं। उसे अपने गांव में मेंह बरसने की एक-एक आवाज अलग सुनाई देती। टीन की छत पर तड़-तड़ बजते हुए ताजे, सूखे पत्तों पर करारी बूंदों का शोर, पक्के फ़र्श पर जहां उंगल भर पानी खड़ा हो जाता, वहां मोटी बूंद गिरती तो मोतियों का एक ताज-सा हवा में उछल पड़ता, तपती खपरैलों पर उड़ती बदली के झाले की सनसनाहट, गर्मी के दानों से उपेड़ बालक-बदन पर बरखा की पहली फुहार, जैसे किसी ने मेंथोल में नहला दिया हो, जवान बेटे की कब्र पर पहली बारिश और मां का नंगे सर आंगन में आ-आ कर आसमान की तरपफ़ देखना, फबक उठने के लिये तैयार मिट्टी पर टूट के बरसने वाले बादल की हरावल गरम लपट, ढोलक पर सावन के गीत की ताल पर बजती चूड़ियां और बेताल ठहाके, सूखे तालाब के पेंदे की चिकनी मिट्टी में पड़ी हुई दराड़ों के जाल में तरसा-तरसा कर बरसने वाली बारिश के सरसराते रेले। खम्बे से लटकी हुई लालटेन के सामने जहां तक रोशनी थी, मोतियों की रिमझिम झालर, हुमक-हुमक कर पराये आंगन में गिरते परनाले। आमों के पत्तों पर मंजीरे बजाती नर्सल बौछार और झूलों पर पींगे लेती लड़कियां और फिर रात के सन्नाटे में, पानी थमने के बाद, सोते जागते ओलती की टपाटप। ओलती की टपाटप तक पहुंचते-पहुंचते

क़िबला की आंखें जल-थल हो जातीं। बारिश तो हम उन्हें लाहौर और नथैया गली की ऐसी दिखा सकते थे कि बीती उम्र की सारी टपाटप भूल जाते। पर ओलती कहां से लाते? इसी तरह आम तो हम मुलतान का एक से एक पेश कर सकते थे। दसहरी, लंगड़ा, समर बहिश्त, अनवर रटौल, लेकिन हमारे पंजाब में तो ऐसे पेड़ हैं ही नहीं जिनमें आमों की जगह लड़कियां लटकी हुई हों।

इसलिये ऐसे अवसर पर हम खामोश, हमातन-गोश (पूरा शरीर कान बन जाता) बल्कि खरगोश बने ओलती की टपाटप सुनते रहते।

जारी………………       

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पिछले अंक : 1. खोया पानी-1:क़िबला का परिचय 2. ख़ोया पानी 2: चारपाई का चकल्लस 3. खोया पानी-3:कनमैलिये की पिटाई 4. कांसे की लुटिया,बाली उमरिया और चुग्गी दाढ़ी़ 5. हवेली की पीड़ा कराची में 6. हवेली की हवाबाजी 7. वो तिरा कोठे पे नंगे पांव आना याद है 8. इम्पोर्टेड बुज़ुर्ग और यूनानी नाक 9. कटखने बिलाव के गले में घंटी 10. हूँ तो सज़ा का पात्र, पर इल्ज़ाम ग़लत है 11. अंतिम समय और जूं का ब्लड टैस्ट 12. टार्जन की वापसी 13. माशूक के होंठ 14. मीर तकी मीर कराची में 15. दौड़ता हुआ पेड़

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khoya_pani_front_coverकिताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

 

 

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6 Responses to “खोया पानी: ओलती की टपाटप”

  1. चलो बन्धु, बहुत समय बाद पटरी पर आ गये हो। रेगुलर पोस्ट ठेल रहे हो। किबला जी भी आ लिये हैं अपने राग दरबारी के साथ। बस अब चलाते रहना यह प्रवाह – टप्प से गायब न हो जाना।

  2. मैं तुफैल’ चतुर्वेदी की इस बात से सहमत नहीं था की युसुफी साहेब ज्ञान जी जैसा लिख सकते हैं या उनसे भी एक कदम आगे…आख़िर उन्होंने ने मुझे इस किताब को मंगवा कर पढने को मजबूर किया और ये कहने में मुझे कोई शर्म नहीं है की वो सही थे.ये किताब हर लिहाज़ से विलक्षण है. शब्द यहाँ जादू से जगाते लगते हैं…हैरानी होती है पढ़ के की इंसान के जेहन में ऐसे जुमले आ कहाँ से जाते हैं…ये किताब हर समझदार इंसान को पढ़नी चाहिए…
    नीरज

  3. वाकई शानदार शब्द चित्र।
    अभी तक आपने इस किताब के जितने भी अंश उपलब्ध करवाए उन्हे पढ़कर तो यही कहा जा सकता है कि वाकई अद्भुत!!

  4. बहुत बढ़िया….इस सीरीज़ का इंतजार रहता है.

  5. पक्के फ़र्श पर जहां उंगल भर पानी खड़ा हो जाता, वहां मोटी बूंद गिरती तो मोतियों का एक ताज-सा हवा में उछल पड़ता… क्या छवियां हैं!!! मोतियों के इस ताज को मैंने भी कई बार महसूस किया था, लेकिन वह छवि या शब्दों में नहीं ढल पाया था। इसीलिए कहते हैं कि दमदार लेखक गूंगों को जुबान दे देता है।

  6. bahut badhiya kiblaji.

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