घोड़े के साथ वीरता भी गयी

मिर्जा अब्दुल वुदूद बेग कहते हैं कि मनुष्य जब बिल्कुल भावुक हो जाये तो उससे बुद्धिमानी की कोई बात कहना ऐसा ही है जैसे बगूले में बीज बोना। इसलिए बिशारत को इस फ़िजूल शौक़ से दूर रखने के बजाय उन्होंने उल्टा ख़ूब चढ़ाया। एक दिन आग को पेट्रोल से बुझाते हुए कहने लगे कि जबसे घोड़ा रुखसत हुआ, संसार से बहादुरी, जांबाजी और दिलेरी की रीत भी उठ गयी। जानवरों में कुत्ता और घोड़ा इंसान के सबसे पहले और पक्के मित्र हैं जिन्होंने उसकी खातिर हमेशा के लिये जंगल छोड़ा। कुत्ता तो खैर अपने कुत्तेपन के कारण चिपटा रहा, लेकिन इंसान ने घोड़े के साथ बेवफ़ाई की। घोड़े के जाने से मानव-संस्कृति का एक सामंती-अध्याय समाप्त होता है। वो अध्याय जब योद्धा अपने शत्रु को ललकार कर आंखों में आंखें डाल के लड़ते थे। मौत एक भाले की दूरी पर होती थी और यह भाला दोनों के हाथ में होता था। मृत्यु का स्वाद अजनबी सही, पर मरने वाला और मारने वाला दोनों एक-दूसरे का चेहरा पहचान सकते थे। बेखबर सोते हुए, बेचेहरा शहरों पर मशरूम-बादल की ओट से आग और एटमी मौत नहीं बरसती थी। घोड़ा केवल उस समय बुजदिल हो जाता है, जब उसका सवार बुजदिल हो। बहादुर घोड़े की टाप के साथ दिल धक- धक करते और धरती थर्राती थी। पीछे दौड़ते हुए बगूले,नालों से उड़ती चिंगारियां, भालों की नोक पर किरण-किरण बिखरते सूरज और सांसों की हांफती आंधियां कोसों दूर से शहसवारों के आक्रमण की घोषणा कर देती थीं। घोड़ों के एक साथ दौड़ने की आवाज से आज भी लहू में हजारों साल पुराने उन्माद के अलाव भड़क उठते हैं।

हमारी सवारीः केले के छिलका

फ़िटन और घोड़े से बिशारत के लगाव की चर्चा करते-करते हम कहां आ गये। मिर्जा अब्दुल वुदूद बेग ने एक बार बड़े अनुभव की बात कही कि ‘‘जब आदमी केले के छिलके पर फिसल जाये तो फिर रुकने, ब्रेक लगाने का प्रयास कदापि नहीं करना चाहिये, क्योंकि इससे और अधिक चोट आयेगी। बस आराम से फिसलते रहना चाहिये और फिसलने का आनन्द लेना चाहिये। तुम्हारे उस्ताद जौक़ के कथनानुसार-

तुम भी चले चलो ये जहां तक चली चले

केले का छिलका जब रुक जायेगा तो स्वयं रुक जायेगा। Just Relax इसलिये केवल क़लम ही नहीं क़दम या कल्पना भी फिसल जाये तो हम इसी नियम पर अमल करते हैं। बल्कि साफ़-साफ़ क्यों न मान लें कि इस लम्बी जीवन-यात्रा में केले का छिलका ही हमारी एक मात्र सवारी रहा है। ये जो कभी-कभी हमारी चाल में जवानों की-सी तेजी और स्वस्थ प्रकार की चलत-फिरत आ जाती है तो यह उसी के कारण है। एकबार रपट जायें तो फिर यह क़दम चाल जो भी कुएं झंकवाये और जिन गलियों-गलियारों में ले जाये, वहां बिना इरादे के, लेकिन बड़े शौक़ से जाते हैं। ख़ुद को रोकने-थामने का जरा भी प्रयास नहीं करते और जब दवात फूट कर काग़ज पर बिखर जाती है, तो हमारी मिसाल उस बच्चे की-सी होती है, जिसकी ठसाठस-भरी जेब के सारे राज कोई अचानक निकालकर सबके सामने मेज पर नुमाइश लगा दे। सबसे अधिक संकोच बड़ों को होता है, क्योंकि उन्हें अपना भूला-बिसरा बचपन और अपनी वर्तमान मेज की दराज़ें याद आ जाती हैं। जिस दिन बच्चे की जेब से फ़िजूल चीजों की बजाय पैसे बरामद हों तो समझ लेना चाहिये कि अब उसे चिंता-मुक्त नींद कभी नसीब नहीं होगी।

रेसेकोर्स से तांगे तक

जैसे-जैसे बिजनेस में मुनाफ़ा बढ़ता गया, फ़िटन की इच्छा भी तीव्र होती गई। बिशारत महीनों घोड़े की तलाश में भटकते रहे। ऐसा लगता था जैसे घोड़े के बिना उनके सारे काम बंद हैं और राजा रिचर्ड तृतीय की भांति घोड़े के लिए वह हर चीज का त्याग करने के लिए तैयार हैं-

“ A horse! A horse! My kingdom for horse!”

उनके पड़ौसी चौधरी करम इलाही ने सलाह दी कि जिला सरगोधा के पुलिस स्टड-फ़ार्म से संपर्क कीजिये। वहां पुलिस की निगरानी में धारू ब्रीड और ऊंची जात के घोड़ों से नस्ल बढ़वाते हैं। घोड़ों का बाप, विशुद्ध और अस्ली हो तो बेटा उसी पर पड़ेगा। कहावत है कि बाप पर पूत, घोड़े पर घोड़ा, बहुत नहीं तो थोड़ा-थोड़ा। मगर बिशारत कहने लगे, ‘‘मेरा दिल नहीं ठुकता। बात यह है कि जिस घोड़े की पैदाइश में पुलिस का हस्तक्षेप बल्कि गर्भक्षेप हो, वो विशुद्ध हो ही नहीं सकता। वो घोड़ा पुलिस पर पड़ेगा।’’

घोड़े के बारे में यह बातचीत सुनकर प्रोफ़ेसर क़ाजी अब्दुल क़ुद्दूस एम.ए.बी.टी. ने वो मशहूर शेर पढ़ा और हमेशा की तरह ग़लत अवसर पर पढ़ा, जिसमें देखने वाले की पैदाइश में होने वाली पेचीदगियों के डर से नर्गिस हजारों साल रोती है। मिर्जा कहते हैं कि प्रोफ़ेसर क़ाजी अब्दुल क़ुद्दूस अपनी समझ में कोई बहुत ही बुद्धिमानी की बात कहने के लिए अगर बीच में बोलें तो बेवक़ूफ़ लगने लगते हैं,अगर न बोलें तो अपने चेहरे के सामान्य भाव के कारण और अधिक बेवक़ूफ़ दिखाई पड़ते हैं।

प्रोफ़ेसर साहब के सामान्य-भाव से तात्पर्य चेहरे पर वो रंग हैं जो उस समय आते और जाते हैं जब किसी की जिप अध-बीच में अटक जाती है।

ख़ुदा-ख़ुदा करके एक घोड़ा पसंद आया जो एक स्टील री-रोलिंग मिल के सेठ का था। तीन-चार बार उसे देखने गये और हर बार पहले से अधिक संतुष्ट लौटे। उसका सफ़ेद रंग ऐसा भाया कि उठते-बैठते उसी के चर्चे, उसी की स्तुति।

हमने एक बार पूछा ‘‘पंच-कल्याण है?’’

‘पंच-कल्याण तो भैंस भी हो सकती है। केवल चेहरा और हाथ-पैर सफ़ेद होने से घोड़े की दुम में सुर्ख़ाब का पर नहीं लग जाता। घोड़ा वो, जो आठों-गांठ कुमैत हो, चारों टख़नों और चारों घुटनों के जोड़ मजबूत होने चाहिए। यह भाड़े का टट्टू नहीं, रेस का खानदानी घोड़ा है। यह घोड़ा उनके दिमाग़ पर इस बुरी तरह सवार था कि अब उसे उन पर से कोई घोड़ी ही उतार सकती थी।

सेठ ने उन्हें ऐसोसिएटिड प्रिंटर्ज में प्रकाशित कराची रेस क्लब की वो किताब भी दिखाई जो उस रेस से संबंधित थी, जिसमें उस घोड़े ने हिस्सा लिया और प्रथम आया था। इसमें उसकी तस्वीर और स्थिति पूरी वंशावली के साथ दर्ज थी।

नाम-व्हाइट रोज, पिता-वाइल्ड ओक, दादा ओल्ड डेविल। जब से यह ऊंची-नस्ल का घोड़ा देखा, उन्होंने अपने पुरखों पर गर्व करना छोड़ दिया। उनके कथनानुसार, इसके दादा ने मुंबई में तीन रेसें जीतीं। चौथी में दौड़ते हुए हार्ट फ़ेल हो गया। इसकी दादी बड़ी नरचुग थी। अपने समय के नामी घोड़ों से उसका संबंध रह चुका था। उनसे फ़ायदा उठाने के नतीजे में उसकी छः पुत्र संतानें हुई। प्रत्येक अपने संबंधित बाप पर पड़ी। सेठ से पहले व्हाइट रोज एक बिगड़े रईस की संपत्ति था। जो बाथ आइलैंड में ‘वंडर-लैंड’ नाम की एक कोठी अपनी एंग्लो इंडियन पत्नी ऐलिस के लिए बनवा रहा था। री-रोलिंग मिल से जो सरिया खरीद कर ले गया, उसकी रक़म कई महीने से उसके नाम खड़ी थी। रेस और सट्टे में दीवाला निकलने के कारण वंडर-लैंड का निर्माण रुक गया और एलिस उसे वंडर की लैंड में छोड़ कर, मुल्तान के एक जमींदार के साथ यूरोप की सैर को चली गई। सेठ को एक दिन जैसे ही यह खबर मिली कि एक क़र्ज लेने वाला अपनी रक़म के बदले प्लाट पर पड़ी सीमेंट की बोरियां और सरिया उठवा के ले गया, उसने अपने मैनेजर को पांच लट्ठ-बंद चैकीदारों को साथ लेकर बाथ-आइलैंड भेजा कि भागते भूत की जो भी चीज हाथ लगे खसोट लायें। इसलिए वो यह घोड़ा अस्तबल से खोल लाये। वहीं एक सियामी बिल्ली नजर आ गई, उसे भी बोरी में भर कर ले आये। घोड़े की ट्रेजडी की पूरी तरह समझाने के लिए बिशारत ने हमसे हमदर्दी जताते हुए कहा ‘‘यह घोड़ा तांगे में जुतने के लिए तो पैदा नहीं हुआ था। सेठ ने बड़ी जियादती की, मगर भाग्य की बात है। साहब! तीन साल पहले कौन कह सकता था कि आप यूं बैंक में जोत दिये जाएंगे। कहां डिप्टी कमिश्नर और डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट की कुर्सी और कहां बैंक का चार फ़ुट ऊंचा स्टूल!’’

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की तीसरे भाग “स्कूल मास्टर का ख़्वाब से " ]

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

इस भाग की पिछली कड़ियां

1. हमारे सपनों का सच 2. क़िस्सा खिलौना टूटने से पहले का

पहला और दूसरा भाग

2 Responses to “घोड़े को अब घोड़ी ही उतार सकती है”

  1. वाह जी, पढ़ते जा रहे हैं-मजा पा रहे हैं. जारी रखें.

  2. वाहजी, अब तो हन्टर से भी काम चलने वाला नही है । बस , जो कुछ करना है , घोडी ही कर सकति है ।

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