शाही सवारी

उन्हें इस घोड़े से पहली नजर में मुहब्बत हो गयी और मुहब्बत अंधी होती है, चाहे घोड़े से ही क्यों न हो। उन्हें यह तक सुझायी न दिया कि घोड़े की प्रशंसा में उस्तादों के जो शेर वो ऊटपटांग पढ़ते फिरते थे, उनका संबंध तांगे के घोड़े से नहीं था। यह मान लेने में कोई हरज नहीं कि घोड़ा शाही सवारी है। शाही रोब और राजसी आन-बान की कल्पना घोड़े के बिना अधूरी, बल्कि आधी रह जाती है।

बादशाह के क़द में घोड़े का क़द भी बढ़ाया जाये, तब कहीं जा के वो क़द्दे-आदम दिखाई पड़ता है। परंतु जरा ध्यान से देखा जाये तो शाही सवारियों में घोड़ा दूसरे नंबर पर आता है। इसलिए कि बादशाहों और तानाशाहों की मनपसंद सवारी दरअस्ल जनता होती है। ये एक बार उस पर सवारी गांठ लें तो फिर उन्हें सामने कोई कुआं, खाई, बाड़ और रुकावट दिखाई नहीं देती। जोश में वो दीवार भी फलांग जाते हैं। ये लेख वो तब तक नहीं पढ़ सकते जब तक वो Braille में न लिखा हो।

जिसे वो अपना दरबार समझते हैं, वो वास्तव में उनका घेराव होता है, जो उन्हें यह समझने नहीं देता कि जिस मुंहजोर, सरकश घोड़े को केवल हिनहिनाने की इजाजत दे कर सरलता के साथ आगे से क़ाबू किया जा सकता है, उसे वो पीछे से क़ाबू करने की चेष्टा करते हैं, अर्थात लगाम की बजाय दुम मरोड़ते हैं। लेकिन इस सीधी-सादी लगने वाली सवारी का भरोसा नहीं, क्योंकि यह अबलक़ा सदा एक चाल नहीं चलती। परन्तु जो शासक होशियार, पारखी, और शासन में भले-बुरे के भेद से परिचित होते हैं वो पहले ही दिन ग़रीबों का सर कुचल कर सभी को पाठ समझा देते हैं।

वैसे बड़े और विशिष्ट व्यक्तियों को किसी और अंकुश की आवश्यकता नहीं होती। जो भी उन पर सोने का हौल, चांदी की घंटियां, जरबफ़्त की झूल और तम्ग़ों की माला डाल दे, उसी के निशान का हाथी बनने के लिये कमर बांधे रहते हैं। चार दिन की जिंदगी मिली थी, सो दो-जीहुजूरी की इच्छा में कट गये, दो जीहुजूरी में।

हमारा क़जावा

हमने एक दिन घोड़ों की शान में कुछ कह दिया तो बिशारत भिन्ना गये। हमने तो ठिठोली के उद्देश्य से एक ऐतिहासिक हवाला दिया कि जब मंगोल हजारों के झुण्ड बना कर घोड़ों पर निकलते तो बदबू के ऐसे भभके उठते थे कि बीस मील दूर से पता चल जाता था। कहने लगे, क्षमा कीजिये, आपने राजस्थान में, जहां आपने जवानी गंवाई, ऊंट ही ऊंट देखे। जिनकी पीठ पर क़लफ़दार राजपूती साफ़े,चढ़वां दाढ़ियां और दस फ़ुट लम्बी नाल वाली तोड़ेदार बंदूकें सजी होती थीं और नीचे…कंधे पर रखी लाठी के सिरे पर तेल पिलाये हुए कच्चे चमड़े के जूतों को लटकाये अर्दली में नंगे पैर जाट।

कमर बांधे, और हाथ पैर बांधे, फिर मुंह बांधे’’

घोड़ा तो आपने यहां आन के देखा है। मियां अहसान इलाही गवाह हैं, उन्हीं के सामने आपने उन ठाकुर साहब का क़िस्सा सुनाया था जो महाराजा की ऊंटों की पल्टन में रिसालदार थे। जब रिटायर होकर अपने पुरखों के क़स्बे… क्या नाम था उसका-उदयपुर तोरावाटी-पहुंचे तो अपनी गढ़ी में भेंट करने आने वालों के लिए दस-बारह मोढ़े डलवा दिये और अपने लिये अपने सरकारी ऊंट जंग बहादुर का पुराना क़जावा, उसी पर अपनी पल्टन का लाल रंग का साफ़ा बांधे, सीने पर तम्ग़े सजाये, सुब्ह से शाम तक बैठे हिलते रहते। एक दिन हिल-हिल कर जंग बहादुर के कारनामे बयान कर रहे थे और मैडल झन-झन कर रहे थे कि दिल का दौरा पड़ा। क़जावे पर ही आत्मा का पंछी पंचभूत-रूपी पिंजड़े से उड़ कर अपनी यात्रा पर रवाना हो गया। वापसी के क्षणों में होंठों पर मुस्कान और जंग बहादुर का नाम, क्षमा कीजिये, ये सब आप ही के द्वारा लिये गये स्नेप शाट्स हैं, आप भी तो अपने क़जावे से नीचे नहीं उतरते। न उतरें! मगर यह क़जावा इस अधम की पीठ पर रखा हुआ है। साहब! आप घोड़े का मूल्य क्या जानें। आप तो यह भी नहीं जानते कि खच्चर का ‘क्रास’ कैसे होता है? खरेरा किस शक्ल का होता है? कनौतियां कहां होती है? बैल के आर कहां चुभोई जाती हैं? चिल्ग़ोजा किस भाषा का शब्द है? अन्तिम दो प्रश्न आवश्यक और निर्णायक थे क्योंकि इनसे पता चलता था कि बहस किस नाजुक मोड़ पर आ चुकी है।

यह बहस हमें इसलिए और अधिक नागवार गुजरी कि हमें एक भी सवाल का जवाब नहीं आता था। स्वभाव के लिहाज से वो टेढ़े नहीं, बड़े धीमे और मीठे आदमी हैं, लेकिन जब इस प्रकार पटरी से उतर जायें तो हमें दूर तक कच्चे में खदेड़ते, घसीटते ले जाते हैं। कहने लगे जो व्यक्ति घोड़े पर न बैठा हो वो कभी संतुष्ट स्वाभिमानी और शेर, दिलेर नहीं हो सकता। ठीक ही कहते होंगे क्योंकि वो स्वयं भी कभी घोड़े पर नहीं बैठे थे।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शनिवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की तीसरे भाग “स्कूल मास्टर का ख़्वाब से " ]

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

इस भाग की पिछली कड़ियां

1. हमारे सपनों का सच 2. क़िस्सा खिलौना टूटने से पहले का 3. घोड़े को अब घोड़ी ही उतार सकती है

पहला और दूसरा भाग

4 Responses to “सवारी हो तो घोड़े की”

  1. बढ़िया रहा.जारी रहिये. मगर हमें आपने किताब गिफ्ट नहीं की और हम भी अड़े हैं कि काकेश जी देंगे तभी पढ़ेंगे वरना खरीदेंगे भी नहीं. यहीं ब्लॉग पर बंटा हुआ पढ़ेंगे. :) आगे आपकी जैसी इच्छा,

  2. अरे वाह जी ये तो बिशरत मिया है, हम समझे की आप को कोई फ़ैलोशिप मिल गई है घोडे और ब्लोगिंग के उपर रिसर्च करने के लिये :)

  3. अजी ये किताब तो हम ऐसे ही पढ़ेंगे जैसे आप पढ़ाए जा रहे हैं, शुक्रिया

  4. पढ़ तो रहें ही है पर इस कसक के साथ कि किताब अभी तक गिफ्ट नही मिली.
    शानदार है.

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