होली का त्यौहार मस्ती,उल्लास और मौज मजे का पर्व है. दुनिया में सभी जगह होली बड़ी ही धूमधाम से मनाई जाती है.लेकिन कुमाऊंनी होली का अपना एक अलग ही रंग है, पूरे विश्व में इस होली की अलग पहचान है. यहाँ होली मात्र एक दिन का त्यौहार नहीं बल्कि कई दिनों तक चलने वाला त्यौहार है. इसके साथ जो एक और चीज जुड़ी है वह है संगीत. बिना संगीत के कुमांऊनी होली की कल्पना करना भी मुश्किल है. संगीत के साथ साथ होली से जुड़े गीतों में कथ्य का भी बहुत महत्व है. होली यहाँ सिर्फ होली ही नहीं बल्कि एक सामुहिक अभिव्यक्ति का माध्यम है. इसमें सामाजिक चेतना से जुड़े मुद्दे भी हैं और तात्कालिक परिस्थितियों का चित्रण भी है.

कुमांऊनी होली एक पर्व ही नहीं है बल्कि इसकी एक सांस्कृतिक विशेषता है. यहाँ की होली मुख्यत: तीन तरह की होती है. 1. बैठी होली 2. महिला होली 3. खड़ी होली. इसके अलावा खड़ी होली का ही एक हिस्सा बंजारा होली कहलाता है. इन सब होलियों की चर्चा विस्तार से इस लेख के आगे के हिस्सों में की जायेगी.

मुख्य होली की शुरुआत फाल्गुन मास की एकादसी से होती है. जिसे आमलकी एकादशी भी कहा जाता है. इस दिन भद्रा-रहित काल में देवी-देवताओं में रंग डालकर पुन: अपने कपड़ों में रंग छिड़कते हैं, और गुलाल डालते हैं. होली के लिये विशेष कपड़े बनवाये जाते हैं जो मुख्यत: सफेद रंग के होते हैं. पुरुष सफेद रंग के कुर्ता पायजामा पहनते हैं और कुछ लोग सर पर गान्धी टोपी पहनते हैं .महिलाऎं सफेद धोती या सफेद सलवार कमीज पहनती हैं. एकादशी के दिन जब रंग पड़ता है तो इन्ही कपड़ो में रंग डाल दिया जाता है. यह कपड़े अब मुख्य होली के दिन तक बिना धोये पहने जाते हैं. जिस दिन देश-दुनिया के अन्य जगहों में होली मनायी जाती है उस दिन कुमाऊं में पानी और रंगो से होली खेली जाती है. इस दिन को “छरड़ी” या “छलड़ी” कहा जाता है.

एकादशी के ही दिन चीर बंधन होता है. इस दिन व्यक्तिगत रूप से या सामुहिक रूप से एक जगह चीर बांधा जाता है. इसके लिये “पद्म” की टहनी (इसे पहाड़ में “पैय्यां” या “पईंया” कहा जाता है) पर रंग बिरंगे कपडों की चीर बांधी जाती है. इसके अलावा सामुहिक रूप से जो चीर बांधी जाती है वह बांस के डंडे में बांधी जाती है लेकिन उसमें पद्म की एक टहनी, जौं की कुछ बालीयां और खीशे का फूल होना जरूरी होता है.पुराने जमाने में इस तरह की सामुहिक चीर को बांधने की अनुमति कुछ ही गांवों को होती थी.जिस गांव के लोग इस चीर को बांधते थे वो लोग रात भर इस चीर का पहरा भी करते थे ताकि कोई इस चीर को चुरा ना पाये. यदि किसी साल यह चीर किसी अन्य गांव के लोगों ने चोरी कर ली तो इस गांव से चीर बांधने का अधिकार छिन जाता था.फिर से इस अधिकार को प्राप्त करने के लिये गांव वालों को किसी अन्य गांव की चीर चुराना जरूरी होता था. इसी का सन्दर्भ होली के गानों में भी आता है कि “चीर चुराय कदम्ब चढ़ी बैठो, यो छो ऐसो मतवालो”. यह शायद इसी ओर इंगित करता है.        

अगले भागों में गीतों के कथ्य की भी चर्चा करेंगे अभी एक गाना जो मुझे याद आ रहा है उसके बोल आप को बता दूँ.यह मुख्यत: महिलाओं की होली है,

जल कैसे भरूं जमुना गहरी,

जल कैसे भरूं जमुना गहरी,

ठाड़े भरूं राजा राम देखत हैं,

बैठी  भरूं  भीजे  चुनरी.

जल कैसे भरूं जमुना गहरी.

धीरे चलूं घर सास बुरी है,   

धमकि चलूं छ्लके गगरी.

जल कैसे भरूं जमुना गहरी.

गोदी में बालक सर पर गागर,

परवत से उतरी गोरी.

जल कैसे भरूं जमुना गहरी.

 

जारी ………………………………..

 

  52 Responses to “कुमांऊनी होली : अलग रंग अलग ढंग”

  1. MUJHE YAH PARHAKAR BAHUT KHUSHEE HUEE KYONKI YAH HAMARI PRACHEEN SANSAKIRT HAI IAS BIRASAT KO HAME SAJOKAR KAR RAKHANA HAI ……//////////

  2. Hmar dil bhte kush h go tumri holi sun be koe nae holi dal dyo almadeki holi nae wali

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