Article written by काकेश

मैं एक परिन्दा….उड़ना चाहता हूँ….नापना चाहता हूँ आकाश…

One response to “उमर की मधुशाला के निहितार्थ”

  1. Gyan Dutt Pandey

    मैं सहमत हूं – रुबाइयां मात्र सुरा वंदना कदापि नहीं हैं। उनमें मेरे जैसे न पीने वाले के लिये भी डूबने को पर्याप्त है।

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