Article written by काकेश

मैं एक परिन्दा….उड़ना चाहता हूँ….नापना चाहता हूँ आकाश…

12 responses to “मैं कहीं कवि ना बन जाऊं….”

  1. दिनेशराय द्विवेदी

    सोचिए मत बन जाइए. घोषणा की जरुरत भी क्या थी। अब समझा, एक पोस्ट तो पैदा हुई।

  2. Shiv Kumar Mishra

    मुबारक हो. कवि बनने के ‘भाव’ मन में आने के लिए. आप जरूर बनिए कवि. वाह वाह करने के लिए हम हैं न. लेकिन हो सके तो ऐसी कवितायें लिखियेगा जो समझ में आयें…..:-)

    भविष्य में नेता भी बनिए. कवि अगर नेता बन जाए तो कॉम्बिनेशन बड़ा ‘डेडली’ होता है……:-)

  3. sujata

    kavi zaroor baniye par apana e mail deejiye bhaii !!

  4. alok puranik

    कवि तो आप हैं
    पहाड़ चिडिया
    तूफान बर्फ
    शीं शीं शीं
    शूं शूं शूं
    हा हा हा हा
    तटक करतचरत ातकरतचर
    गहदहद3 हचतज
    इस कविता का अर्थ बताइये। तो मैं आपको ब्रह्मांड का सबसे वड्डा कवि घोषित कर दूंगा।

  5. प्रियंकर

    देखो कवि काकेश!

    कविता के फायदे देखो . साथी कवि मिलते हैं . दोस्त मिलते हैं . वोटर मिलते हैं . वोटर मिलने से मिलता है पुरस्कार . स्वर्णकलम का काव्य-हथियार . लगे हाथ कविता पा जाती है विस्तार .

    सो कवि हो जाओ . इसी में सार है . बाकी सब निस्सार है– नश्वर है . सिर्फ़ कविता में अमरता है . उसी से यह भुवन वाह-वाह से भरता है .

    सो कविकुसुम दल जॉइन कर लो .

  6. अतुल शर्मा

    अब तो मैं भी सोच रहा हूँ कवि बनने का :) आप तो बस कविता लिखें वाह वाह करने वाले तो हम है ना…….. और जब हम लिखें आप तो वाहवाही का कर्ज़ तो उतारेंगे ही ;)

  7. Sanjeet Tripathi

    अजी कवि तो आप मन में ऐसा विचार आते ही बन गए हैं ;)

  8. Manoj Joshi

    Kavi ya kavita sochkar nahin banate. Wo to maanav man ke bhavon ko abhibyakta karane ke maadhyam hain. Aap kavi hain to hain, ban nahin sakate. Phir bhi koshish karane main kya harz hai.

  9. neeraj

    कवि आप जरूर बनिए प्रभु लेकिन ये बताईये आप का इशारा किस और है??? ये तीर हम पे तो नहीं चला रहे…..नहीं यूँ ही पूछ रहे हैं, धनुष आप के हाथ है चाहे जिस पर चलाईये…अगर हम पर चलाये हैं तो आप का शुक्रिया की हम जैसों को आपने कवि माना…. आप लिखिए बिंदास.
    नीरज

  10. ranjana singh

    Bhai ji ,aapke vyangya ka yah haal hai to kavita ka kya hoga.Ham to ekdam se dera gaye.

  11. अरूण अरोरा

    आप खुब कवि बने,हमे कोइ लेना देना नही है ,पर कविता से दूर ही रहे..वो हमारे साथ हमारे आफ़िस मे होती है और ये हम कतई बर्दाश्त नही करेगे कि आप उसका नाम भी ले दुबारा ये नाम भी आपके ब्लोग पर नही दिखना चाहिये…

  12. डा० अमर कुमार

    सरजी,
    मेरा एक अनुभव शेयर कर लीजिये । जिससे आपको पीछा छुड़ाना हो
    और वह अपना दर्द आपके हवाले करने की गरज़ से आपको चाट रहा
    हो, बस पकड़ कर एक कविता सुना दीजिये । अगली बार से आपके
    गिर्द नहीं फटकेगा ।
    मैं तो उसको पकड़ कर दोनों आँखें बंद कर जो जो भी शब्द वाक्य
    दिमाग में आता है, उन्हें एक लय के साथ बोलने लग पड़ता हूँ ।
    आँख खुलने पर मुसीबत नदारद !
    बहुत कारगर वैक्सीन है, इसीलिये मेरे कवितापाठ की ज़रूरत
    ज़िन्दा है !

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