रंजना जी अक्सर मेरे ब्लॉग पर आती रहती हैं और अपनी लंबी टिप्पणीयों का आशीर्वाद हमें प्रदान करती रहती हैं. उनकी टिप्पणी पर बनी मेरी पोस्ट स्त्रियां क्या खुद से सवाल पूछती हैं? अब तक की मेरी सबसे हिट और बहसात्मक पोस्ट रही है. पिछ्ले हफ्ते उन्होने मेरी एक पोस्ट भारत की राष्ट्रभाषा अंग्रेजी क्यों नहीं है?? पर एक लंबी टिप्पणी की. आप भी पढ़ें.

एक लंबे अरसे बाद ब्लॉग पर आ पाई हूँ.जो विषय आपने उठाया है,हमेशा ही इस तरह मुझे सालता रहा है कि वर्तमान परिस्थिति देख मन बड़ा ही आहत होता है. आहत अंग्रेजी के दिनो-दिन बढ़ते प्रभाव को देखकर नही, बल्कि अपनी हिन्दी भाषा, जो आज भी अपने देश के एक बहुत बड़े भाग मे आमजनों की भाषा है,गाँवों और कस्बों मे प्रादेशिक भाषा के बाद सबसे महत्वपूर्ण स्थान रखती है, दिनोदिन आज की पीढ़ी द्वारा उपेक्षित त्याज्य होती जा रही है.यह सही है की अंग्रेजी एक ऐसी भाषा है जो विश्व मे सर्वाधिक प्रचलित भाषा है,पर हमारे मातृभाषा का हमारे अपने देश मे जो निरादर बढ़ता जा रहा है,विश्व के और कोई भी देश अपनी मातृभाषा के प्रति यह रवैया नही रखते. हिन्दीभाषी क्षेत्र मे कुछेक सरकारी विद्यालयों को छोड़ हिन्दी माध्यम के स्कूल लुप्तप्राय होते जा रहे हैं.करें भी तो क्या आज गावों कस्बों मे भी गरीबी से मुहाल वो अभिभावक जो अपने बच्चों के शिक्षा के प्रति जागरूक है हिन्दी माध्यम से अपने बच्चों को पढ़वा पाने की हिम्मत नही जुटा पता. कारण सबको पता है जीविकोपार्जन का कोई माध्यम नही जहाँ की अनिवार्यता यह भाषा न हो गई हो.

किंतु समस्या भाषा मे नही समस्या वह सोच पैदा करती है जो अंग्रेजी भाषा को ही सभ्रान्तता का मानक मानती है.और हिन्दीभाषी को हेय दृष्टि से देखती है. भाषा की परिभाषा जो हमने पढी जानी वह यही थी कि ” भाषा अपने भावों को सामने वाले तक पहुँचाने का,अपने विचारों को अभिव्यक्त करने का माध्यम है” और यह ऐसी ही होनी चाहिए जिसके माध्यम से हम अधिक से अधिक सुगमता और प्रभावी ढंग से सामने वाले तक अपने उदगार संप्रेषित कर पाएं.भाषा एक ऐसा जरिया है जिसके माधयम से हम सामने वाले के ह्रदय मे अपना स्थान बना सकते हैं.फ़िर यह चाहे अंग्रेजी,फ्रेंच,जर्मन,हिन्दी या और कोई भी भाषा हो.अंग्रेजी ही क्यों, देश विदेश के अधिक से अधिक जितने भाषाओं का ज्ञान हो उतना अच्छा है.इस बात से कोई असहमत नही हो सकता कि जो सम्बन्ध मातृभाषा के जरिये बन सकती है वह अन्य भाषा के जरिये नही.फ़िर बात तो आपसी सम्पर्क को सुदृढ़ बनाने की ही हुई न. इसमे यह उच्च निम्न की बात क्यों.

एक दिन मेरी एक सहेली बड़े ही गर्व से बता रही थी कि उसकी बेटी के अंग्रेजी माध्यम स्कूल मे अंग्रेजी बोलने पर जितना ध्यान दिया जाता है और जिस प्रकार से बच्चों को ट्रेंड किया जाता है,वह लाजवाब है.एक घटना उसने बताई कि,आज सुबह उसकी ६ वर्ष की बेटी की क्लास टीचर ने एक दूसरी छात्र को क्लास मे हिन्दी मे बात करने पर उसकी बेटी से उस छात्र की जमकर पिटाई करवाई.यही नही क्योंकि उसकी बेटी सबसे अच्छे ढंग से अंग्रेजी मे बात कर पाती है इसलिए उसे यह अधिकार दिया गया है कि कभी भी किसी सहपाठी को हिन्दी मे बात करते हुए सुने तो उसे पीट सकती है. घटना सुन मुझे इतना क्षोभ हुआ कि सहेली को लताडे बिना न रह पाई.एक नन्हें से कोमल मन को क्या संस्कार दिए गए?यही न कि पहले तो हिन्दी एक हीन भाषा है और उसके प्रति इस तरह अहिष्णु हुआ जा सकता है कि अपने सहपाठी या आस पास बोलने वाले को प्रताड़ना भी दी जा सकती है.

यह केवल एक घटना नही,एक पूरी कौम तैयार की जा रही है जो -सी ऐ टी कैट से शुरू होकर अंग्रेजी भाषा खान पान संस्कार को ओढ़कर जीना जीवन की अपरिहार्यता और सफलता के लिए आवश्यक सिद्ध करती है. योग्यता का मानक ही एक भाषा की बंधक हो चुकी है. तकलीफ उन बच्चों को देखकर होती है जो हर प्रकार से योग्य होते हुए भी केवल अंग्रेजी न लिख बोल पाने के कारण रोजी रोटी के दौड़ मे पिछड़ जाते हैं. आज की पढी लिखी सभ्रांत मानी जाने वाली युवा पीढ़ी ने केवल भाषा को ही नही बल्कि एक पूरे पश्चिमी सभ्यता,संस्कृति का ही अपने संस्कारों का त्याग कर अंगीकार,अंधानुकरण करने का बीडा उठा रखा है.यह कोई शुभ संकेत नही.बहुत बड़ी बात नही जब हिन्दी भी संस्कृत की तरह केवल एक किताबी भाषा बनकर रह जाए.

इतनी लंबी टिप्प्णी करने के लिये उनका धन्य्वाद. रंजना जी से मेरा अनुरोध है कि वह जल्दी ही अपना ब्लॉग बनायें और हमें नियमित अपने विचारों से परिचित करवाते रहें.

 

घोड़े के साथ वीरता भी गयी

मिर्जा अब्दुल वुदूद बेग कहते हैं कि मनुष्य जब बिल्कुल भावुक हो जाये तो उससे बुद्धिमानी की कोई बात कहना ऐसा ही है जैसे बगूले में बीज बोना। इसलिए बिशारत को इस फ़िजूल शौक़ से दूर रखने के बजाय उन्होंने उल्टा ख़ूब चढ़ाया। एक दिन आग को पेट्रोल से बुझाते हुए कहने लगे कि जबसे घोड़ा रुखसत हुआ, संसार से बहादुरी, जांबाजी और दिलेरी की रीत भी उठ गयी। जानवरों में कुत्ता और घोड़ा इंसान के सबसे पहले और पक्के मित्र हैं जिन्होंने उसकी खातिर हमेशा के लिये जंगल छोड़ा। कुत्ता तो खैर अपने कुत्तेपन के कारण चिपटा रहा, लेकिन इंसान ने घोड़े के साथ बेवफ़ाई की। घोड़े के जाने से मानव-संस्कृति का एक सामंती-अध्याय समाप्त होता है। वो अध्याय जब योद्धा अपने शत्रु को ललकार कर आंखों में आंखें डाल के लड़ते थे। मौत एक भाले की दूरी पर होती थी और यह भाला दोनों के हाथ में होता था। मृत्यु का स्वाद अजनबी सही, पर मरने वाला और मारने वाला दोनों एक-दूसरे का चेहरा पहचान सकते थे। बेखबर सोते हुए, बेचेहरा शहरों पर मशरूम-बादल की ओट से आग और एटमी मौत नहीं बरसती थी। घोड़ा केवल उस समय बुजदिल हो जाता है, जब उसका सवार बुजदिल हो। बहादुर घोड़े की टाप के साथ दिल धक- धक करते और धरती थर्राती थी। पीछे दौड़ते हुए बगूले,नालों से उड़ती चिंगारियां, भालों की नोक पर किरण-किरण बिखरते सूरज और सांसों की हांफती आंधियां कोसों दूर से शहसवारों के आक्रमण की घोषणा कर देती थीं। घोड़ों के एक साथ दौड़ने की आवाज से आज भी लहू में हजारों साल पुराने उन्माद के अलाव भड़क उठते हैं।

हमारी सवारीः केले के छिलका

फ़िटन और घोड़े से बिशारत के लगाव की चर्चा करते-करते हम कहां आ गये। मिर्जा अब्दुल वुदूद बेग ने एक बार बड़े अनुभव की बात कही कि ‘‘जब आदमी केले के छिलके पर फिसल जाये तो फिर रुकने, ब्रेक लगाने का प्रयास कदापि नहीं करना चाहिये, क्योंकि इससे और अधिक चोट आयेगी। बस आराम से फिसलते रहना चाहिये और फिसलने का आनन्द लेना चाहिये। तुम्हारे उस्ताद जौक़ के कथनानुसार-

तुम भी चले चलो ये जहां तक चली चले

केले का छिलका जब रुक जायेगा तो स्वयं रुक जायेगा। Just Relax इसलिये केवल क़लम ही नहीं क़दम या कल्पना भी फिसल जाये तो हम इसी नियम पर अमल करते हैं। बल्कि साफ़-साफ़ क्यों न मान लें कि इस लम्बी जीवन-यात्रा में केले का छिलका ही हमारी एक मात्र सवारी रहा है। ये जो कभी-कभी हमारी चाल में जवानों की-सी तेजी और स्वस्थ प्रकार की चलत-फिरत आ जाती है तो यह उसी के कारण है। एकबार रपट जायें तो फिर यह क़दम चाल जो भी कुएं झंकवाये और जिन गलियों-गलियारों में ले जाये, वहां बिना इरादे के, लेकिन बड़े शौक़ से जाते हैं। ख़ुद को रोकने-थामने का जरा भी प्रयास नहीं करते और जब दवात फूट कर काग़ज पर बिखर जाती है, तो हमारी मिसाल उस बच्चे की-सी होती है, जिसकी ठसाठस-भरी जेब के सारे राज कोई अचानक निकालकर सबके सामने मेज पर नुमाइश लगा दे। सबसे अधिक संकोच बड़ों को होता है, क्योंकि उन्हें अपना भूला-बिसरा बचपन और अपनी वर्तमान मेज की दराज़ें याद आ जाती हैं। जिस दिन बच्चे की जेब से फ़िजूल चीजों की बजाय पैसे बरामद हों तो समझ लेना चाहिये कि अब उसे चिंता-मुक्त नींद कभी नसीब नहीं होगी।

रेसेकोर्स से तांगे तक

जैसे-जैसे बिजनेस में मुनाफ़ा बढ़ता गया, फ़िटन की इच्छा भी तीव्र होती गई। बिशारत महीनों घोड़े की तलाश में भटकते रहे। ऐसा लगता था जैसे घोड़े के बिना उनके सारे काम बंद हैं और राजा रिचर्ड तृतीय की भांति घोड़े के लिए वह हर चीज का त्याग करने के लिए तैयार हैं-

“ A horse! A horse! My kingdom for horse!”

उनके पड़ौसी चौधरी करम इलाही ने सलाह दी कि जिला सरगोधा के पुलिस स्टड-फ़ार्म से संपर्क कीजिये। वहां पुलिस की निगरानी में धारू ब्रीड और ऊंची जात के घोड़ों से नस्ल बढ़वाते हैं। घोड़ों का बाप, विशुद्ध और अस्ली हो तो बेटा उसी पर पड़ेगा। कहावत है कि बाप पर पूत, घोड़े पर घोड़ा, बहुत नहीं तो थोड़ा-थोड़ा। मगर बिशारत कहने लगे, ‘‘मेरा दिल नहीं ठुकता। बात यह है कि जिस घोड़े की पैदाइश में पुलिस का हस्तक्षेप बल्कि गर्भक्षेप हो, वो विशुद्ध हो ही नहीं सकता। वो घोड़ा पुलिस पर पड़ेगा।’’

घोड़े के बारे में यह बातचीत सुनकर प्रोफ़ेसर क़ाजी अब्दुल क़ुद्दूस एम.ए.बी.टी. ने वो मशहूर शेर पढ़ा और हमेशा की तरह ग़लत अवसर पर पढ़ा, जिसमें देखने वाले की पैदाइश में होने वाली पेचीदगियों के डर से नर्गिस हजारों साल रोती है। मिर्जा कहते हैं कि प्रोफ़ेसर क़ाजी अब्दुल क़ुद्दूस अपनी समझ में कोई बहुत ही बुद्धिमानी की बात कहने के लिए अगर बीच में बोलें तो बेवक़ूफ़ लगने लगते हैं,अगर न बोलें तो अपने चेहरे के सामान्य भाव के कारण और अधिक बेवक़ूफ़ दिखाई पड़ते हैं।

प्रोफ़ेसर साहब के सामान्य-भाव से तात्पर्य चेहरे पर वो रंग हैं जो उस समय आते और जाते हैं जब किसी की जिप अध-बीच में अटक जाती है।

ख़ुदा-ख़ुदा करके एक घोड़ा पसंद आया जो एक स्टील री-रोलिंग मिल के सेठ का था। तीन-चार बार उसे देखने गये और हर बार पहले से अधिक संतुष्ट लौटे। उसका सफ़ेद रंग ऐसा भाया कि उठते-बैठते उसी के चर्चे, उसी की स्तुति।

हमने एक बार पूछा ‘‘पंच-कल्याण है?’’

‘पंच-कल्याण तो भैंस भी हो सकती है। केवल चेहरा और हाथ-पैर सफ़ेद होने से घोड़े की दुम में सुर्ख़ाब का पर नहीं लग जाता। घोड़ा वो, जो आठों-गांठ कुमैत हो, चारों टख़नों और चारों घुटनों के जोड़ मजबूत होने चाहिए। यह भाड़े का टट्टू नहीं, रेस का खानदानी घोड़ा है। यह घोड़ा उनके दिमाग़ पर इस बुरी तरह सवार था कि अब उसे उन पर से कोई घोड़ी ही उतार सकती थी।

सेठ ने उन्हें ऐसोसिएटिड प्रिंटर्ज में प्रकाशित कराची रेस क्लब की वो किताब भी दिखाई जो उस रेस से संबंधित थी, जिसमें उस घोड़े ने हिस्सा लिया और प्रथम आया था। इसमें उसकी तस्वीर और स्थिति पूरी वंशावली के साथ दर्ज थी।

नाम-व्हाइट रोज, पिता-वाइल्ड ओक, दादा ओल्ड डेविल। जब से यह ऊंची-नस्ल का घोड़ा देखा, उन्होंने अपने पुरखों पर गर्व करना छोड़ दिया। उनके कथनानुसार, इसके दादा ने मुंबई में तीन रेसें जीतीं। चौथी में दौड़ते हुए हार्ट फ़ेल हो गया। इसकी दादी बड़ी नरचुग थी। अपने समय के नामी घोड़ों से उसका संबंध रह चुका था। उनसे फ़ायदा उठाने के नतीजे में उसकी छः पुत्र संतानें हुई। प्रत्येक अपने संबंधित बाप पर पड़ी। सेठ से पहले व्हाइट रोज एक बिगड़े रईस की संपत्ति था। जो बाथ आइलैंड में ‘वंडर-लैंड’ नाम की एक कोठी अपनी एंग्लो इंडियन पत्नी ऐलिस के लिए बनवा रहा था। री-रोलिंग मिल से जो सरिया खरीद कर ले गया, उसकी रक़म कई महीने से उसके नाम खड़ी थी। रेस और सट्टे में दीवाला निकलने के कारण वंडर-लैंड का निर्माण रुक गया और एलिस उसे वंडर की लैंड में छोड़ कर, मुल्तान के एक जमींदार के साथ यूरोप की सैर को चली गई। सेठ को एक दिन जैसे ही यह खबर मिली कि एक क़र्ज लेने वाला अपनी रक़म के बदले प्लाट पर पड़ी सीमेंट की बोरियां और सरिया उठवा के ले गया, उसने अपने मैनेजर को पांच लट्ठ-बंद चैकीदारों को साथ लेकर बाथ-आइलैंड भेजा कि भागते भूत की जो भी चीज हाथ लगे खसोट लायें। इसलिए वो यह घोड़ा अस्तबल से खोल लाये। वहीं एक सियामी बिल्ली नजर आ गई, उसे भी बोरी में भर कर ले आये। घोड़े की ट्रेजडी की पूरी तरह समझाने के लिए बिशारत ने हमसे हमदर्दी जताते हुए कहा ‘‘यह घोड़ा तांगे में जुतने के लिए तो पैदा नहीं हुआ था। सेठ ने बड़ी जियादती की, मगर भाग्य की बात है। साहब! तीन साल पहले कौन कह सकता था कि आप यूं बैंक में जोत दिये जाएंगे। कहां डिप्टी कमिश्नर और डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट की कुर्सी और कहां बैंक का चार फ़ुट ऊंचा स्टूल!’’

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की तीसरे भाग “स्कूल मास्टर का ख़्वाब से " ]

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

इस भाग की पिछली कड़ियां

1. हमारे सपनों का सच 2. क़िस्सा खिलौना टूटने से पहले का

पहला और दूसरा भाग

 

यह क़िस्सा खिलौना टूटने से पहले का है

उन दिनों वो नये-नये स्कूल मास्टर नियुक्त हुए थे और फ़िटन उनकी सर्वोच्च आकांक्षा थी। सच तो यह है कि इस यूनिफ़ार्म यानी सफ़ेद अचकन, सफ़ेद जूते,सफ़ेद कुर्ते-पाजामे और सफ़ेद कमरबंद की खखेड़ केवल अपने आपको सफ़ेद घोड़े से मैच करने के लिए थी। वरना इस बत्तखा भेस पर कोई बत्तख ही आशिक़ हो सकती थी। उन्हें चूड़ीदार से सख़्त चिढ़ थी। केवल सुंदर कन्या के हाथ के बुने सफ़ेद कमरबंद का प्रयोग करने के लिए यह सितार का ग़िलाफ़ टांगों पर चढ़ाना पड़ा। इस हवाई क़िले की हर ईंट सामंती गारे से निर्मित हुई थी, जो संपन्न सपनों से गुंथा था। केवल इतना ही नहीं कि प्रत्येक ईंट का साइज और रंग भिन्न था, बल्कि उनकी आकृति भी उकेरी हुई थी। कुछ ईंटें गोल भी थीं। बारीक-से-बारीक बात यहां तक कि शालीनता की उस सीमा को भी तय कर दिया गया था कि उनकी उपस्थिति में सफ़ेद घोड़े की दुम कितनी डिग्री के कोण तक उठ सकती है और उनकी सवारी के रूट पर किस-किस खिड़की की चिक़ के पीछे किस कलाई में किस रंग की चूंड़ियां छनक रही हैं, किसकी हथेली पर उनका नाम मय बी.ए. की डिग्री, मेंहदी से लिखा है और किस-किस की सुरमई आंखें पर्दे से लगी राह तक रही हैं कि कब इंक़लाबी शाहजादा ये दावत देता हुआ आता है कि-

तुम परचम लहराना साथी मैं बरबत पर गाऊंगा

यहां ये निवेदन करता चलूं कि इससे बढ़िया तथा सुरक्षित कार्य विभाजन क्या होगा कि घमासान के रण में परचम (युद्ध ध्वज) तो साथी उठाये, कटता-मरता फिरे और ख़ुद शायर दूर किसी संगे-मरमर के मीनार पर बैठा एक फटीचर और वाहियात वाद्य ‘बरबत’ पर वैसी ही कविता यानी ख़ुद अपनी-ही कविता गा रहा है। गद्य में इसी सिचुएशन को ‘चढ़ जा बेटा सूली पर भली करेंगे राम’ में जियादा फूहड़ ईमानदारी से बयान किया गया है।

लीजिये! प्रारंभ में ही गड़बड़ हो गयी, वरना कहना सिर्फ़ इतना था कि मज़े की बात यह थी कि इस सोते जागते सपने के दौरान बिशारत ने स्वयं को स्कूल मास्टर के ही ‘शैल’ में देखा, पद बदलने का साहस सपने में भी न हुआ! संभवतः इसलिए भी कि फ़िटन और रेशमी कमरबंद से केवल स्कूल मास्टरों पर ही रोब डाल सकते थे। जमींदारों और जागीरदारों के लिए इन चीजों की क्या हैसियत थी।

अपनी पीठ पर बीस वर्ष बाद भी उस आग की लकीर की जलन वो अनुभव करते थे जो चाबुक़ लगने से उस समय उभरी थी जब मुहल्ले के लौंडों के साथ शोर मचाते और चाबुक़ खाते वो एक रईस की सफ़ेद घोड़े वाली फ़िटन का पीछा कर रहे थे।

चौराहे बल्कि संकोच-राहे पर

शेरो-शायरी छोड़कर स्कूल-मास्टरी अपनायी। स्कूल मास्टरी को धता बताकर दुकानदारी की और अंततः दुकान बेच खोंच कर कराची आ गये, जहां हरचंद राय रोड पर दोबारा लकड़ी का कारोबार शुरू किया। नया देश, बदला-बदला सा रहन-सहन, एक नयी और व्यस्त दुनिया में क़दम रखा, मगर उस सफ़ेद घोड़े और फ़िटन वाली फैंटेसी ने पीछा नहीं छोड़ा। Day Dreaming और फ़ेटेंसी से दो ही सूरतों में छुटकारा मिल सकता है। पहली जब वह फ़ेंटेसी न रहे, वास्तविकता बन जाये, दूसरे इंसान किसी चौराहे बल्कि संकोच-राहे पर अपने सारे सपने माफ़ करवा के विदा हो जाये Heart breaker, dream maker, thank you for the dream और उस खूंट निकल जाये, जहां से कोई नहीं लौटा यानी घर-गृहस्थी की ओर, परंतु बिशारत को इससे भी लाभ नहीं हुआ। वो भरा-पूरा घर औने-पौने बेचकर अपने हिसाब से लुटे-पिटे आये थे। यहां एक-दो साल में ख़ुदा ने ऐसी कृपा की कि कानपुर तुच्छ लगने लगा। सारी इच्छायें पूरी हो गयीं, अर्थात घर अनावश्यक वस्तुओं से अटाअट भर गया। बस एक कमी थी।

सब कुछ अल्लाह ने दे रक्खा है घोड़े के सिवा!

अब वो चाहते तो नयी न सही, सेकेंड-हैंड कार आसानी से ख़रीद सकते थे। जितनी रक़म में आज कल चार टायर आते हैं, इससे कम में उस जमाने में कार मिल जाती थी, लेकिन कार में उन्हें वह रईसाना ठाट और जमींदाराना ठस्सा नजर नहीं आता था, जो फ़िटन और बग्घी में होता है। घोड़े की बात ही कुछ और है।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की तीसरे भाग “स्कूल मास्टर का ख़्वाब से " ]

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लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

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कीमत-200 रुपये मात्र

इस भाग की पिछली कड़ियां

1. हमारे सपनों का सच

पहला और दूसरा भाग

 

खोया पानी में जहां हास्य और व्यंग्य के नायाम ज़ुमले हैं वहीं उसमें जीवन का फलसफा भी बिखरा पड़ा है. आइये तीसरे भाग की शुरुआत ज़िन्दगी के इसी फ़लसफे से करें.आप पायेंगे कि यूसूफ़ी साहब ने कितनी सच्ची बात इन शब्दों में उतार दी है.

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हर व्यक्ति के मन में ऐश्वर्य और भोग-विलास का एक नक़्शा होता है। ये नक़्शा दरअस्ल उस ठाट-बाट की नक़्ल होता है जो दूसरों के हिस्से में आया है, परन्तु जो दुख आदमी सहता है वो अकेला उसका अपना होता है, बिना किसी साझेदारी के, एकदम निजी, एकदम अनोखा। हड्डियों को पिघला देने वाली जिस आग से वो गुजरता है, उसका अनुमान कौन लगा सकता है। नर्क की आग में यह गर्मी कहां। जैसा दाढ़ का दर्द मुझे हुआ है, वैसा किसी और को न कभी हुआ, न होगा। इसके विपरीत ठाट-बाट का ब्लू-प्रिंट हमेशा दूसरों से चुराया हुआ होता है। बिशारत के दिमाग़ में ऐश्वर्य और विलास का जो सौ-रंगा और हजार पैवंद लगा चित्र था, वो बड़ी-बूढ़ियों की उस रंगारंग रल्ली की भांति था जो वो भिन्न-भिन्न रंगों की कतरनों को जोड़-जोड़ कर बनाती हैं। उसमें, उस समय का जागीरदाराना दबदबा और ठाट, बिगड़े रईसों का जोश और ठस्सा, मिडिल-क्लास दिखावा, क़स्बाती-उतरौनापन, नौकरी- पेशा हुस्न, सादा-दिली और नदीदापन सब बुरी तरह गडमड हो गये। उन्हीं का कहना है कि बचपन में मेरी सबसे बड़ी इच्छा थी कि तख़्ती फेंक-फांक, किताब फाड़-फूड़ मदारी बन जाऊं, शहर-शहर डुगडुगी बजाता, बंदर, भालू, जमूरा नचाता और “बच्चा लोग” से ताली बजवाता फिरूं। जब जरा अक़्ल आई अर्थात बुरे और बहुत बुरे की समझ पैदा हुई तो मदारी की जगह स्कूल मास्टर ने ले ली और जब धीरजगंज में सच में मास्टर बन गया तो मेरी राय में अय्याशी की चरम-सीमा ये थी कि मक्खन जीन की पतलून, दो-घोड़ा बोस्की की क़मीज, डबल कफ़ों में सोने के छटांक-छटांक भर के बटन, नया सोला हैट और पेटेंट लैदर के पम्प-शूज पहनकर स्कूल जाऊं और लड़कों को केवल अपनी ग़जलें पढ़ाऊं। सफ़ेद सिल्क की अचकन जिसमें बिदरी के काम वाले बटन गले तक लगे हों, जेब में गंगा-जमनी काम की पानों की डिबिया, सर पर सफ़ेद किमख़्वाब की रामपुरी टोपी, तिरछी मगर जरा शरीफ़ना ढंग से, लेकिन ऐसा भी नहीं कि निरे शरीफ़ ही हो के रह जायें। छोटी बूटी की चिकन का सफ़ेद कुर्ता जो मौसम के लिहाज से हिना या खस की ख़ुशबू में बसा हो। चूड़ीदार पाजामे में सुंदर लड़की के हाथ का बुना हुआ रेशमी कमरबंद। सफ़ेद सलीमशाही जूता। पैरों पर डालने के लिये इटालियन कम्बल, जो फ़िटन में जुते हुए सफ़ेद घोड़े की दुम और उससे दूर तक उड़ने वाले पेशाब-पाखाने के छींटों से पाजामे को सुरक्षित रखे। फ़िटन के पिछले पायदान पर ‘‘हटो! बचो!’’ करते और उस पर लटकने का प्रयास करने वाले बच्चों को चाबुक़ मारता हुआ साईस। जिसकी कमर पर जरदोजी के काम की पेटी और टखने से घुटने तक खाकी नम्दे की पट्टियां बंधी हों। बच्चा अब सयाना हो गया था। बचपन विदा हो गया था, पर बचपना नहीं गया था।

बच्चा अपने खेल में जिस उत्साह और सच्ची लगन के साथ तल्लीन होता है कि अपने-आप को भूल जाता है, बड़ों के किसी मिशन और मुहिम में इसका दसवें का दसवां भाग भी दिखाई नहीं पड़ता। इसमें शक नहीं कि संसार का बड़े-से-बड़ा दार्शनिक भी किसी खेल में मग्न बच्चे से अधिक गंभीर नहीं हो सकता। खिलौना टूटने पर बच्चे ने रोते-रोते अचानक रौशनी की ओर देखा तो आंसू में इंद्रधनुष झिलमिल-झिलमिल करने लगा। फिर वो सुबकियां लेते-लेते सो गया। वही खिलौना बुढ़ापे में किसी जादू के जोर से उसके सामने लाकर रख दिया जाये तो वो भौंचक्का रह जायेगा कि इसके टूटने पर भला कोई इस तरह जी-जान से रोता है। यही हाल उन खिलौनों का होता है, जिनसे आदमी जीवन भर खेलता रहता है। हां, उम्र के साथ-साथ यह भी बदलते और बड़े होते रहते हैं। कुछ खिलौने  अपने-आप टूट जाते हैं, कुछ को दूसरे तोड़ देते हैं। कुछ खिलौने प्रमोट होकर देवता बन जाते हैं और कुछ देवियां दिल से उतरने के बाद गूदड़ भरी गुड़ियां निकलती हैं। फिर एक अभागिन घड़ी ऐसी आती है, जब वो इन सबको तोड़ देता है। उस घड़ी वो खुद भी टूट जाता है।

‘‘तराशीदम, परस्तीदम, शिकस्तम’’

(मैने तराशा, मैने पूजा मैने तोड़ दिया )

आज इन बचकानी इच्छाओं पर स्वयं उनको हँसी आती है। मगर यह उस समय की हक़ीक़त थीं। बच्चे के लिये उसके खिलौने से अधिक ठोस और अस्ल हक़ीक़त पूरे ब्रह्मांड में कुछ और नहीं हो सकती। सपना, चाहे वह आधी रात का सपना हो या जागते में देखा जाने वाला सपना हो, देखा जा रहा होता है तो वही और केवल वही उस क्षण की एकमात्र वास्तविकता होती है। यह टूटा खिलौना, यह आंसुओं में भीगी पतंग और उलझी डोर, जिस पर अभी इतनी मार-कुटाई हुई, यह जलता-बुझता जुगनू, यह तना हुआ ग़ुब्बारा जो अगले पल रबड़ के लिजलिजे टुकड़ों में बदल जायेगा, मेरी हथेली पर सरसराती यह मखमली बीरबहूटी, आवाज की रफ़्तार से भी तेज चलने वाली यह माचिस की डिब्बियों की रेलगाड़ी, यह साबुन का बुलबुला-जिसमें मेरा सांस थर्रा रहा है, इंद्रधनुष पर यह परियों का रथ-जिसे तितलियां खींच रही हैं इस पल, इस क्षण बस यही और केवल यही हक़ीक़त है।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की तीसरे भाग “स्कूल मास्टर का ख़्वाब से " ]

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

पहला और दूसरा भाग

 

ये कौन हज़रते-‘आतिश’ का हम जबां निकला

इसमें कोई शक नहीं कि सागर जालौनवी के कई शेर बड़े दमपुख्त निकलते थे. कुछ शेर तो वाकई ऐसे थे कि “मीर” और “आतिश” भी उन पर गर्व करते,जिसका एक कारण यह भी था कि ये खुद उन्ही के थे. खुद को एक विद्यार्थी और अपनी शायरी को वो देवीय अवतरण बताता था. चुनांचे एक अरसे तक तो उसके भक्त और शिष्यगण इसी खुशगमानी में रहे कि चोरी नहीं अवतरण में साम्य हो गया. रुदौली में अपनी ग़ज़ल पढ़ रहा था कि किसी गुस्ताख़ ने भरे मुशायरे में टोक दिया कि ये तो नासिख़ का है.चोरी हओ चोरी! ज़रा जो घबराया हो. उलटा मुस्कुराया , बिल्कुल ग़लत! आतिश का है.

फिर अपनी डायरी मुशायरे के अध्यक्ष की नाक के नीचे बढ़ाते हुए बोला “हुज़ूर देख लें, ये शेर डायरी में Inverted Commas में लिखा है और आगे आतिश का नाम भी लिख दिया है.” मुशायरे के अध्यक्ष ने इसकी पुष्टि की और एतराज़ करने वाला अपना-सा मुँह ले के रह गया.

सागर अपने छोड़े हुए वतन जालौन के कारण प्यार से छोटा सागर (जाम) कहलाता था,मगर वो खुद अपना रिश्ता शायरी के लखनऊ स्कूल से जोड़ता था और ज़बान के मामले में दिल्ली वालों और पंजाब वालों से पक्षपात करता था ,चुनांचे केवल लखनऊ के शायरों के कलाम चोरी करता था.

माई डियर मौलवी मज्जन : दिन तो जैसे तैसे काटा लेकिन शाम पड़ते ही बिशारत एक क़रीबी गांव सटक गये। वहां अपने एक परिचित के यहां (जिसने कुछ महीने पहले एक यतीम तलाश करने में मदद दी थी) अंडरग्राउंड हो गये। अभी जूतों के फ़ीते ठीक से खोले भी नहीं थे कि हर जानने वाले को अलग-अलग लोगों के जरिये, अपने गोपनीय भूमिगत स्थान की जानकारी भिजवाई। उन्होंने धीरजगंज में सवा साल रो-रो कर गुजारा था। देहात में वक़्त भी बैलगाड़ी में बैठ जाता है। उन्हें अपनी सहनशक्ति पर आश्चर्य हुआ। नौकरी के सब रास्ते बंद नजर आयें तो असहनीय भी सहन हो जाता है। उत्तरी भारत में कोई स्कूल ऐसा नहीं बचा जिसका नाम उन्हें पता हो और उन्होंने वहां दरख़्वास्त न भेजी हो। आसाम के एक मुस्लिम स्कूल में उन्हें जिम्नास्टिक मास्टर तक की नौकरी न मिली। चार-पांच जगह अपने ख़र्च पर जा कर इंटरव्यू में नाकाम हो चुके थे। हर असफलता के बाद उन्हें समाज में एक नयी ख़राबी नजर आती थी, जिसे सिर्फ़ रक्त-क्रांति से ही दूर किया जा सकता था। लेकिन जब कुछ दिन एक दोस्त की मेहरबानी से सन्डीला के हाईस्कूल में एप्वाइंटमेंट लेटर मिला तो अनायास मुस्कुराने लगे। दस-बारह बार ख़त पढ़ने और हर बार नई ख़ुशी अनुभव करने के बाद उन्होंने चार लाइन वाले काग़ज पर इस्तीफ़ा लिख कर मौली मज्जन को भिजवा दिया। एक ही झटके में बेड़ी उतार फैंकी। इस्तीफ़ा लिखते हुए वो आजादी के भक-से उड़ा देने वाले नशे में डूब गये अतः इस्तीफ़े की इ की टांग त के पेट में घुस गई। लिफ़ाफ़े को थूक कर ऐसे चिपकाया जैसे मौली मज्जन के मुंह पर थूक रहे हों। लिफ़ाफ़ा मौलवी मज्जन को थमाया तो जो कांटा सवा साल से उनके तलवे को छेदता हुआ तालू तक पहुंच चुका था एक झटके से निकल गया। उन्हें इस बात पर हैरत थी कि वो सवा साल ऐसे फटीचर आदमी से इस तरह अपनी औक़ात ख़राब क्यों करवा रहे थे।

मौलवी मज्जन को भी शायद इसका अहसास था उन्होंने विदा के समय हाथ तो मिलाया आंखें न मिला सके।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

[दूसरा भाग यहीं पर समाप्त होता है. अगले शुक्रवार से तीसरा भाग प्रस्तुत किया जायेगा.दूसरे भाग में बीच बीच बीच में कुछ छोटे छोटे अंश काट दिये गये हैं.]

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

इस भाग की अन्य कड़ियां.

1. फ़ेल होने के फायदे 2. पास हुआ तो क्या हुआ 3. नेकचलनी का साइनबोर्ड 4. मौलवी मज्जन से तानाशाह तक 5. हलवाई की दुकान और कुत्ते का नाश्ता 6. कुत्ता और इंटरव्यू 7. ब्लैक होल ऑफ़ धीरजगंज 8. कोई बतलाओ कि हम बतलायें क्या? 9. विशेष मूली और अच्छा-सा नाम 10. ज़लील करने के कायदे 11. आइडियल यतीम का हुलिया 12. ज़लील करने के अलग अलग शेड 13.कुत्ते की तारीफ और मुशायरा 14. शायरों की खातिरदारी 15. इक्के का आविष्कार घोड़े ने किया 16.मुशायरे की तैयारी 17. तवायफ़ के किस्से 18. मूलगंज: तवायफों का जिक्र 19. और मुशायरा लुट गया 20. अजब-गजब मुशायरा 21. तिरे कूचे से हम निकले 22. कई पुश्तों की नालायकी का निचोड़

पहला भाग

 

कई पुश्तों की नालायकी का निचोड़

ये शायर जो भूचाल लाया बल्कि जिसने मुशायरा अपनी मूंछों पर उठा लिया, बिशारत का ख़ानसामा निकला. पुरानी टोपी और उतरन की अचकन का तोहफ़ा उसे पिछ्ली ईद पर मिला था. राह चलतों को पकड़-पकड़ के अपना कलाम फ़रमाता. सुनने वाला दाद देता तो उसे खींच कर लिपटा लेता, और दाद ना देता तो खुद आगे बढ़कर उससे लिपट जाता. अपने कलाम के दैवीय होने में उसे कोई शक ना था.शक औरों को भी नहीं था क्योंकि केवल अक़्ल या खाली-ख़ूली इल्म के ज़ोर से कोई शख़्स ऐसे ख़राब शेर नहीं कह सकता. दो पंक्तियों में इतनी सारी गलतियां और झोल आसानी से सुमो देना दैवीय मदद के बग़ैर मुमकिन ना था. काव्य चिंतन में अक्सर यह भी हुआ कि अभी पंक्ति पे ठीक से दूसरी पंक्ति भी नहीं लगी थी कि हंडिया धुंआ देने लगी. सालन के भुट्टे लग गये. पांचवी क्लास तक पढ़ाई की थी, जो उसकी निजी जुरुरत और बर्दाश्त से कहीं जियादा थी.वो अपनी संक्षिप्त सी अंग्रेजी और ताजा शेर को रोक नहीं सकता था. अगर आप उससे दस मिनट भी बात करें तो उसे अंग्रेजी के जितने भी लफ्ज आते थे वो सब आप पर दाग देता. अपने को सागर साहब कहलवाता लेकिन घर में जब ख़ानसमा का काम अंज़ाम दे रहा होता तो अपने नाम अब्दुल क़य्यूम से पुकारा जाना पसंद करता. सागर कहके बुलायें तो बहुत बुरा मानता.कहता था, नौकरी में हाथ बेचा है, उपनाम नहीं बेचा. ख़ानसामागिरी में भी शायराना तूल ना देने से बाज ना आता. ख़ुद को वाजिद अली शाह, अवध के नबाब का ख़ानदानी ख़ानसामा बताता था. कहता था, कि मैं फ़ारसी में लिखी डेढ़ सौ साल पुरानी डायरी देख-देख कर खाना पकाता हूँ. उसके हाथ का अस्वादिष्ट खाना दरअस्ल कई पुस्तों की जमा की गयी नालायक़ी का निचोड़ होता था.

मगर इसमें पड़ती है मेहनत ज़ियादा

उसका दावा था कि मैं एक सौ एक क़िस्म के पुलाव पका सकता हूँ और ऐसा ग़लत भी न था.बिशारत हर इतवार को पुलाव पकवाते थे. साल भर में करीब बावन बार जुरुर पकवाया होगा. हर बार हर अलग तरीके से ख़राब करता था. सिर्फ वो खाने ठीक पकाता था जिनको और ख़राब करना मामूली क़ाबिलियत रखने वाले आदमी के बस का काम नहीं.उदाहरण के तौर पर खिचड़ा,आलू का भुरता,लगी हुई खीर, रात भर की पकी देग,खिचड़ा,अरहर की दाल और मुतनजन जिसमें मीठे चावलों के साथ गोस्त और नींबू की खटायी डाली जाती थी. फूहड़ औरतों की तरह खाने की तमाम ख़राबियों को मिर्च से और शायरी की ख़राबियों को तरन्नुम से दूर कर देता था. मीठा बिल्कुल नहीं पका सकता था, इसलिये कि इसमें मिर्च डालने का रिवाज नहीं.अक्सर चांदनी रातों में जियोग्राफी टीचर को उसी बैजो पर अपनी ग़जलें गा के सुनाता,जिन्हें सुनकर वो अपनी महबूबा को ,जिसकी शादी मुरादाबाद में एक पीतल के पीकदान बनाने वाले से हो गयी थी, याद कर-कर षणज में रोता था.

बिशारत ने एक दिन छेड़ा कि भई, तुम ऐसी मुश्किल जमीनों में ऐसे अच्छे शेर निकालते हो , फिर ख़ानसामागिरी क्यों करते हो? कहने लगा आपने मेरे दिल की बात पूछ ली. अच्छा खाना पकाने के बाद जो रूह को खुशी मिलती है वो शेर के बाद नहीं मिलती. किस वास्ते कि खाना पकाने में वज्न का कहीं ज़ियादा ख़याल रखना पड़ता है. खाने वाले जिसे बुरा कह दे उसे बुरा मानना पड़ता है. खाना पकाने में मेहनत भी ज़ियादा पड़ती है. इसीलिये तो आज तक किसी शायर ने बावर्ची का पेशा नहीं पकड़ा.

शायरी को सागर जालौनवी ने कभी ज़रिया-ए-इज़्ज़त नहीं समझा, जिसका एक कारण ये था कि शायरी के कारण अक्सर उसकी बेइज़्ज़ती होती रहती थी.खाना पकाने में जितना दिमागदार था,शेर कहने में उतनी ही उदारता से काम लेता था. अक्सर बड़ खुले दिल से स्वीकार करता था कि ग़ालिब उर्दू में मुझसे बेहतर कह लेता था.”मीर” को मुझसे कहीं जियादा तनख्वाह और दाद मिली. उदारता से इतना मानने के बाद ये जुरुर कहता, हुजुर वो जमाने और थे,उस्ताद सिर्फ शेर कहते और शागिर्दों की ग़ज़ले बनाते थे, कोई उनसे चपाती नहीं बनवाता था.

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

इस भाग की अन्य कड़ियां.

1. फ़ेल होने के फायदे 2. पास हुआ तो क्या हुआ 3. नेकचलनी का साइनबोर्ड 4. मौलवी मज्जन से तानाशाह तक 5. हलवाई की दुकान और कुत्ते का नाश्ता 6. कुत्ता और इंटरव्यू 7. ब्लैक होल ऑफ़ धीरजगंज 8. कोई बतलाओ कि हम बतलायें क्या? 9. विशेष मूली और अच्छा-सा नाम 10. ज़लील करने के कायदे 11. आइडियल यतीम का हुलिया 12. ज़लील करने के अलग अलग शेड 13.कुत्ते की तारीफ और मुशायरा 14. शायरों की खातिरदारी 15. इक्के का आविष्कार घोड़े ने किया 16.मुशायरे की तैयारी 17. तवायफ़ के किस्से 18. मूलगंज: तवायफों का जिक्र 19. और मुशायरा लुट गया 20. अजब-गजब मुशायरा 21. तिरे कूचे से हम निकले

पहला भाग

 

“गिरीश तिवारी जी” अर्थात गिरदा पर ना जाने कब से लिखना चाहता था.लेकिन समय ही नहीं मिल पा रहा था. शाम को जब युनुस भाई की पोस्ट पर फैज की रचना का जिक्र सुना तो अपना खजाना देखा कि यह रचना तो मेरे पास थी ही और वह भी ‘गिरदा’ की आवाज में. ‘गिरदा’ ने यह रचना पिछ्ले साल दिल्ली में एक कार्यक्रम में गाई थी और सौभाग्य से उस कार्यक्रम में मैं भी शामिल था. मैने तब वह रचना रिकॉर्ड कर ली थी. उसे सहेज कर तो रखा था कि गिरदा पर पूरी एक श्रंखला के लिये लेकिन आज युनुस भाई ने जब अपनी पोस्ट डाली तो मुझे लगा कि मुझे इसे डाल देना चाहिये.

तो लीजिये पेश है गिरदा की आवाज में फैज की रचना जिसे गिरदा ने हिन्दी और कुमांऊनी दोनों में गाया है.

हिन्दी में

हम मैहनतकश जग वालों से जब अपना हिस्सा मांगेंगे,
एक खेत नहीं,एक देश नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे.
यहां पर्वत पर्वत हीरे हैं, यहां सागर सागर मोती हैं,
ये सारा माल हमारा है, हम सारा खजाना मांगेंगे
जो खून बहे, जो बाग उजड़े, जो गीत दिलों में कत्ल हुए,
हर कतरे का,हर गूंचे का,हर ईंट  का  बदला मांगेगे
हम मैहनतकश जग वालों से जब अपना हिस्सा मांगेंगे,
एक खेत नहीं,एक देश नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे.

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कुमांऊनी में

हम ओढ़, बारुड़ी,ल्वार, कुल्ली-कफाड़ी,जै दिन यो दुनी धैं हिसाब ल्यूंलो,
एक हांग नि मांगूं, एक भांग नि मांगू, सब खसरा खतौनी किताब ल्यूंलो.
यां डाना काना हीरा हरया छ्न,यां गाढ़ गध्यारा मोत्यूं भरया छ्न,
यो माल खजान सब हमरै तो छू, हम एक एक पाई को हिसाब ल्यूंलो
जो ल्वै को सिखा जो मौकु गुजरी, जौ मन सुकू मन मे कतल भईं
हर ल्वै को तोपक, हर धुरि को ढुंगक, हर एक कतल को जबाब ल्यूंलों
हम ओढ़, बारुड़ी,ल्वार, कुल्ली-कफाड़ी,जै दिन यो दुनी धैं हिसाब ल्यूंलो,
एक हांग नि मांगूं, एक भांग नि मांगू, सब खसरा खतौनी किताब ल्यूंलो.

कैसी लगी यह रचना मज़दूर दिवस पर टिप्पणी द्वारा बतायें.

 

तिरे कूचे से हम निकले : हंगामे के बाद किसी को मेहमान शायरों का होश न था। जिसके, जहां सींग समाये वहीं चला गया और जो ख़ुद इस लायक़ न था उसे दूसरे अपने सींगों पर उठा ले गये। कुछ रात की हड़बोंग की शर्मिन्दगी, कुछ रुपया न होने के कारण अव्यवस्था, बिशारत इस लायक़ न रहे कि शायरों को मुंह दिखा सकें। मौली मज्जन के दिये दस रुपये कभी के चटनी हो चुके थे बल्कि वो अपनी जेब के बहत्तर रुपये ख़र्च कर चुके थे और अब इतनी क्षमता न थी कि शायरों को वापसी का टिकिट दिलवा सकें। मुंह पर अंगोछा डाल कर छुपते छुपाते धार्मिक-शिक्षा टीचर के ख़ाली घर में गये। वेलेजली उनके साथ लगा था। ताला तोड़ कर घर में घुसे और दिन भर मुंह छुपाये पड़े रहे। तीसरे पहर वेलेजली को जंजीर उतार कर बाहर कर दिया कि बेटा जा, आज ख़ुद ही घूम आ। बिफरे हुए कानपुर के शायरों का झुण्ड उनकी तलाश में घर-घर झांकता फिरा, आख़िर थक हार-कर पैदल स्टेशन के लिये रवाना हुआ। सौ-दौ सौ क़दम चले होंगे कि लोग साथ आते गये और बाक़ायदा जुलूस बन गया। क़स्बे के तमाम अधनंगे बच्चे, एक पूरा नंगा पागल, म्यूनिस्पिल बोर्ड की हद में काटने वाले तमाम कुत्ते उन्हें स्टेशन छोड़ने गये। जुलूस के आख़िर में एक साधू भभूत रमाये, भंग पिये और तीन कटखनी बत्तख़ें भी अकड़े हुई फ़ौजियों की Ceremonial चाल यानी अपनी ही चाल…Goose Step ……में चलती हुई साथ थीं। रास्ते में घरों में आटा गूंधती, सानी बनाती, रोते हुए बच्चे का मुंह दूध के ग्लैंड से बंद करती और लिपाई-पुताई करती औरतें अपना-अपना काम छोड़कर, सने हुए हाथों के तोते से बनाये जुलूस देखने खड़ी हो गईं। एक बंदर वाला भी अपने बंदर और बंदरिया की रस्सी पकड़े ये तमाशा देखने खड़ा हो गया। बंदर और लड़के बार-बार तरह-तरह के मुंह बनाकर एक दूसरे पर खोंखियाते हुए लपकते थे। ये कहना मुश्किल था कि कौन किसकी नक़ल उतार रहा है।

आते वक़्त जिन शायरों ने इस बात पर नाक-भौं चढ़ाई थी कि बैलगाड़ी में लाद कर लाया गया, अब इस बात से नाराज थे कि पैदल खदेड़े गये। चलती ट्रेन में चढ़ते वक़्त हैरत कानपुरी एक क़ुली से ये कह गये कि उस कमीन (बिशारत) से कह देना, जरा धीरजगंज से बाहर निकले, तुझसे कानपुर में निमट लेंगे। सब शायरों ने अपनी जेब से वापसी के टिकिट ख़रीदे, सिवाय उस शायर के जो अपने साथ पांच मिसरे उठाने वाला लाया था। ये साहब अपने मिसरा उठाने वालों समेत आधे रास्ते में ही बिना टिकिट सफ़र करने के जुर्म में उतार लिये गये। प्लेटफार्म पर कुछ दर्दमंद मुसलमानों ने चंदा करके टिकिटचेकर को रिश्वत दी तब कहीं जा के छुटे। टिकिटचेकर मुसलमान था वरना कोई और होता तो छहों के हथकड़ी डलवा देता।

बात एक रात की : सिर्फ़ बेइज्जत हुए शायर ही नहीं, कानपुर की सारी शायर बिरादरी बिशारत के ख़ून की प्यासी थी। उन शायरों ने बिशारत के ख़िलाफ़ इतना प्रोपेगंडा किया कि कुछ गद्य लेखक भी इनको कच्चा चबा जाने के लिये तैयार बैठे थे। कानपुर में हर जगह इस मुशायरे के चर्चे थे। धीरजगंज जाने वाले शायरों ने अपनी जिल्लत और परेशानी की दास्तानें बढ़ा-चढ़ाकर बयान कीं। वो अगर सच नहीं भी थीं तो सुनने वाले दिल से चाहते थे कि ख़ुदा करे सच हों कि वो इसी लायक़ थे।लोग कुरेद कुरेद के विस्तार से सुनते थे। एक शिकायत हो तो बयान करें अब खाने को ही लीजिये, हर शायर को शिकायत थी कि रात का खाना हमें दिन दहाड़े चार बजे उसी किसान के यहां खिलाया गया जिसके यहां सुलाया गया। ज़ाहिर है किसान ने अलग किस्म का खाना खिलाया, चुनांचे जितनी किस्म के खाने थे उतनी ही किस्म की पेट की बीमारियों में शायरों ने खुद को उलझा पाया।हैरत कानपुरी ने शिकायत की कि मैने नहाने के लिये गर्म पानी मांगा तो चौधराइन बे घूंघट उठा कर मुझे सबसे पास के कुंए का रास्ता बता दिया और ये भरोसा दिलाया कि उसमें से गर्मियों में ठंडा और सर्दियों में गर्म पानी निकलता है।चौधरी ने तो नहाने का कारण भी जानना चाहा और जब मैने नहाये बगैर अचकन पहन ली और मुशायरे में जाने लगा तो चौधरी ने मेरी गोद मे दो महीने का नंग धड़ंग बेटा दे कर जबरदस्ती पुष्टि करनी चाही कि नवजात अपने बाप पर गया है। मेरा क्या जाता था मैने कह दिया हाँ और बड़े प्यार से बच्चे के सर पर हाथ फेरा जिससे बैचेन होके उसने मेरी अचकलन पे पेशाब कर दिया। उसी अचकन को पहने पहने मैने लोकल शायरों को गले लगाया।

फिर कहा कि बन्दा आबरू हथेली पर रखे एक बजे मुशायरे से लौटा। तीन बजे तक चारपायी के ऊपर खटमल और नीचे चूहे कुलेले करते रहे। तीन बजते ही घर में “सुबह हो – सुबह हो गयी “ का शोर मच गया। और ये शिकायत तो सबने की कि चार बजे हमें झिंझोड़-झिंझोड़ कर उठाया और एक एक लोटा हाथ में पकड़ा के झड़बेरी की झाड़ियों के पीछे भेज दिया।

कुछ ने शिकायत की हमें “ठोस” नाश्ता नहीं दिया गया। निहार मुँह फुट भर लम्बे गिलास में छाछ पिलाकर विदा कर दिया। एक साहब कहने लगे कि उनकी खाट के पाये से बंधी हुई एक बकरी सारी रात मींगनी करती रही। मुँह अन्धेरे उसका दूध दूह कर उन्हे पेश कर दिया गया। उनका ख़्याल था कि ये सुलुक तो कोई बकरी भी बर्दास्त नहीं कर सकती। ख़रोश शाहजहांपुरी ने कहा कि उनके सिरहाने रात के ढाई बजे से चक्की चलनी शुरु हो गयी। चक्की पीसने वाली दोनों लड़कियां हँस हँस कर जो गीत गा रही थी वो देवर-भावज और नंदोई-सलहज की छेड़छाड़ से संबंधित था, जिससे उनकी नींद और नीयत दोनों में खलल पड़ा। एज़ाज अमरोही ने कहा कि भांति भांति के परिन्दों ने सुबह चार बजे से ही शोर मचाना शुरु कर दिया। ऐसे में कोई भी शरीफ आदमी सो नहीं सकता। मजज़ूब मथरावी की शिकायत थी कि उन्हे कच्चे सहन में जामुन के पेड़ तले मच्छरों की छांव में सुलाया गया। पुरवा के हर चैन देने वाले झोंके कि साथ रात भर उनके सर जामुनें टपकती रहीं। सुबह उठकर उन्होने शिकायत की तो मकान मालिक के मैट्रिक फेल लौंडे ने कहा, ग़लत ! जामुनें नहीं , फलेंदे थे। मैने खुद लखनऊ वालों को फलेंदे कहते सुना है। मजज़ूब मथरावी के बयान के मुताबिक़ उनकी चारपायी के पास खूंटे से बंधी हुई भैस रात-भर डकराती रही। तडके उसने एक बच्चा दिया जो सीधा उनकी छाती पर आ गिरता , अगर वो कमाल की फुरती से बीच में ही कैच न लेते। शैदा जारचवी ने अपनी बेइज़्ज़ती में भी अनूठेपन और गर्व का पहलू निकाल लिया। उन्होने दावा किया कि जैसी बेमिसाल बेइज़्ज़ती उनकी हुई वैसी तो एशिया भर में कभी भी किसी शायर की नहीं हुई। राअना सीतापुरी ने शगुफ़ा छोड़ा कि जिस घर में मुझे सुलाया गया बल्कि रात-भर जगाया गया, उसमें जिद्दी बच्चा सारी रात मां के दूध और उसका बाप चर्चा के पहले विषय के लिये मचलता रहा। अख़गर कानपुरी बोले कि उनका किसान मेज़वान हर आध घंटे बाद उठ-उठकर उनसे पूछ्ता रहा कि “जनाबे-आली कोई तकलीफ़ तो नहीं, नींद तो ठीक आ रही है ना? “ हर शायर इस तरह शिकायत कर रहा था कि जैसे उसके साथ किसी व्यवस्थित षडयंत्र के तहत निजी ज़ुल्म हुआ है। हांलाकि हुआ-हवाया कुछ नहीं। हुआ सिर्फ ये कि उन शहरी शायरों ने देहात की ज़िन्दगी को पहली बार..और वो भी चंद घंटो के लिये …जरा करीब से देख लिया और बिलबिला उठे। उनपर पहली बार खुला कि शहर से सिर्फ़ चंद मील की ओट में इंसान कैसे जीते हैं और अब उनकी समझ में ये नहीं आ रहा था कि यही कुछ है तो किसलिये जीते हैं.

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

इस भाग की अन्य कड़ियां.

1. फ़ेल होने के फायदे 2. पास हुआ तो क्या हुआ 3. नेकचलनी का साइनबोर्ड 4. मौलवी मज्जन से तानाशाह तक 5. हलवाई की दुकान और कुत्ते का नाश्ता 6. कुत्ता और इंटरव्यू 7. ब्लैक होल ऑफ़ धीरजगंज 8. कोई बतलाओ कि हम बतलायें क्या? 9. विशेष मूली और अच्छा-सा नाम 10. ज़लील करने के कायदे 11. आइडियल यतीम का हुलिया 12. ज़लील करने के अलग अलग शेड 13.कुत्ते की तारीफ और मुशायरा 14. शायरों की खातिरदारी 15. इक्के का आविष्कार घोड़े ने किया 16.मुशायरे की तैयारी 17. तवायफ़ के किस्से 18. मूलगंज: तवायफों का जिक्र 19. और मुशायरा लुट गया 20. अजब-गजब मुशायरा

पहला भाग

 

मैने सुना था कि कभी कभी लेखक द्वारा रचा गया कोई काल्पनिक चरित्र लेखक से भी आगे निकल जाता है और लेखक को पाठकों के हिसाब से फिर उस चरित्र को ढालना पड़ता है. जैसे जब हैरी पॉटर की लेखिका ने अपनी किताब में हैरी पॉटर को मारने की बात की तो कई पाठकों ने उसका विरोध किया. कई जगह प्रदर्शन भी हुए और अंतत: लेखिका को झुकना पड़ा. वैसे मुझे खुशफहमी नहीं है कि मैने हैरी पॉटर जैसा कोई चरित्र निर्मित किया है लेकिन फिर भी मैं अपने उन पाठको के प्रति नतमस्तक हूँ जिन्होने मेरे एक चरित्र को इस तरह से अपनाया कि उसे वह मुझसे ज्यादा पहचानने लगे.

जब मैने परुली कहानी का पहला भाग लिखा था तो मैं उसे एक लघु कथा के रूप में पहले ही भाग में समाप्त मान रहा था. लेकिन पाठकों की उत्सुकता “आगे क्या होगा?से लगा कि पाठक इसके आगे की कहानी जानना चाहते हैं. तो मैं हर बुधवार की सुबह परुली का भाग्यविधाता बनता रहा. जिसे लोगों ने काफी पसंद भी किया.कई पाठक बुधवार को कहानी डालने में देरी होने पर मेल करने लगे कि परुली का क्या हुआ. मुझे भी इसमें आनंद आ रहा था. लेकिन फिर ऑफिस में व्यस्तता बड़ी तो मुझे बुधवार की सुबह इस कहानी को लिखना भारी पड़ने लगा. इसलिये पिछ्ले बुधवार मुझे लगा कि इस कहानी को फास्ट ट्रैक में रखकर समाप्त कर दूँ. ताकि हर बुधवार को लिखने का झंझट ना रहे. लेकिन मुझे क्या मालूम था कि परुली के दीवाने इस कदर नाराज हो जायेंगे.

देखिये क्या कहते हैं पाठक

सुजाता जी ने April 16th, 2008 ,11:34 am पर टिपियाया

अरे ! आज तो आपने बड़ी जल्दी में निबटा दिया कहानी को । हम तो हाथ मलते रह गये !अभी तो स्वाद आना शुरु हुआ था । क्या सचमुच कहानी खत्म ? जाएँ ?

संजीत जी और अरुण जी का ऑबजेक्शन

Sanjeet Tripathi जी ने April 16th, 2008 ,11:54 am पर टिपियाया

वाकई यार, ये तो बड़ी जल्दी ही समेट दिया आपने, कुछ ऐसे जैसे त्रस्त से हो गए हों आप इस सीरिज़ के लेखन से और सब कुछ बस निपटाना चाहते हों
आई ऑब्जेक्ट ;)

अरूण् जी ने April 16th, 2008 ,12:25 pm पर टिपियाया

हम इसे नही पढते ये तो हमारे साथ धोखा है ,पहले रायता मन मर्जी का फ़ैलाया और फ़िर फ़टाफ़ट निपटा दिया क्या आप फ़िल्म लेखन ट्राई कर रहे थे क्या जी ? जो पहले फ़ैलाते चले गये और जब पता चला कि फ़िल्म दो घंटे की बन गई है तो बस पन्द्रह मिनट मे निपटाने मे लग गये ,दुबारा लिखा /(मिटा कर) जाये इसे :)

इस कहानी के बहुत से पाठक ऐसे भी थे जो ब्लॉगर नहीं थे. सबसे तीखी प्रतिक्रिया उन्ही पाठकों की थी.माला जी ने कहा

mala telang जी ने April 17th, 2008 ,5:31 pm पर टिपियाया

काकेश भाई, ये आपने हमारे साथ बहुत बड़ा धोखा किया है । माना कि समयाभाव है , आप हमसे समय और मांग लेते .. हम खुशी खुशी दे देते ,लेकिन आपने तो हमसे ऐसा पीछा छुड़ाया जैसे सारे गाँव के कुत्ते आपके पीछे पड़ गये हों… जाइये ,इस तरह परुली का डॉक्टर बनना हमें जरा भी रास नहीं आया ,आप हमें बताएं ,कौन इलाज करवायेगा परुली से ? माफ करें मैं तो नहीं ।

नवीन पाठक जी बोले.

नवीन पाठक जी ने April 17th, 2008 ,8:32 pm पर टिपियाया

काकेश दा,
ये जो आज आपने अपने सारे दोस्तो के साथ धोखा किया है, आपको कुछ लगा कि नही…
पर आपने कहानी का अन्त तो सुखद कर दिया, लेकिन अन्त ऐसा होता नही है..कि डा. प्रिया का डा. अतुल के साथ दिल मिल गया और शादी हो गयी…
पहाड के इस माहौल मे लड्किया डाक्टर नही बन सकती है, ,,,

संजय पुजारी जी सबसे ज्यादा नाराज दिखे.

Sanjay Pujari जी ने April 19th, 2008 ,2:32 pm पर टिपियाया

नहीं काकेश जी … दिल तोड़ दिया. मैने तो आपको अच्छा लेखक समझा था लेकिन आप लेखक हो ही नहीं सकते. सिर्फ अपने लिखने का शौक पूरा कर रहे हो और नैट पर लोगों को बेवकूफ बना रहे हो. [अपने मन के मुताबिक कुछ भी लिखा और जब इस बारे में ज्यादा सोचा नहीं गया तो कहानी को 15 लाइनों में खतम कर दिया. भाई साहब ये कहानी अगर ऐसी ही खतम करनी थी तो जिस दिन शुरु हुई उसी दिन खतम क्लर देते..खाली इतने दिनों तक अपना टाइम लगाया और बांकी लोगों को बेवकूफ बनाया.]

और हेम पांडे जी ने तो अपना आक्रोश व्यक्त करने के लिये कहानी का अंतिम भाग ही लिख भेजा.

hem pandey जी ने April 22nd, 2008 ,7:13 pm पर टिपियाया

‘परुली’ की अन्तिम कड़ी ने मुझे भी अन्य की तरह निराश किया. अपने आक्रोश को व्यक्त करने के लिए मैंने अन्तिम कड़ी को इस प्रकार लिख डाला है:-

परुली की दशा देख कर उसकी ईज़ा ने निश्चय कर लिया कि वह फूल जैसी अपनी बेटी की भावनाओं का खून नहीं होने देगी.उसे लगने लगा था कि इस ब्या से परुली सुखी तो नहीं ही होगी. परुली के बाबू से फुरसत में बात करने पर जोस्ज्यु को भी यही ठीक लगा कि यह रिश्ता टूट जाए.
अब इसे पूरे परिवार कि प्रबल सामूहिक इच्छा का प्रभाव समझिए या संजोग कि घटनाक्रम भी कुछ अनुकूल रहे.खान्तोली के गणेश दत्त जी, जो ‘ब्याकर’ (शादियाँ तै कराने वाला) कहलाते थे, ने अपनी भतीजी की जुगाड़ गोपाल के लिए लगा ली और पांडे ज्यू के दिमाग में यह बात भी बिठा दी कि परुली तो ज्यादा ही बीमार ठैरी, ज्यादा दिन बचने वाली भी नहीं हुई.जोस्ज्यु की भी हालत ऐसी नहीं हुई कि वे गोपाल को कुछ ज्यादा दे सकें.पिठ्याँ अभी लगा नहीं है.इस लिए ये रिश्ता ख़तम करने में कोई हर्ज़ भी नहीं हुआ.

इसी बीच जोस्ज्यु के क़का का लड़का महेश, जो चालीस साल से हैदराबाद में था,इष्टदेव की पूजा के लिए पहली बार गाँव आया. उसके दोनों बेटे विदेश में थे और दोनों ने ही अंतर्जातीय विवाह कर रखे थे .महेश रिटायर हो गया था और उसने अपने मौसेरे भाई हरीश के मार्फ़त लखनऊ कुर्मांचल नगर में मकान खरीद लिया था.अब वह लखनऊ में ही रहने वाला था.वह हफ्ते भर जोस्ज्यु के घर में रहा. उसने भी जोस्ज्यु को प्रेरित किया कि वे परुली को आगे पढाएँ और यथासंभव आर्थिक सहायता का भी भरोसा दिलाया.वापस जाते समय वह पाँच सौ रुपये परु के और पाँच सौ रुपये बोजी के हाथ में रख गया.जीवन में पहली बार जोस्ज्यु ने इतनी बड़ी रकम किसी मेहमान या यजमान से एक बार में प्राप्त की थी.

महेश के जाने के बाद परुली भी तेजी से स्वास्थ्य लाभ करने लगी.डॉक्टर पुनेठा की दवा के साथ-साथ महेशकका की आशाजनक बातों से भी वह जल्दी ही बीमारी से उबर गयी.परीक्षा आते आते वह पूर्ण स्वस्थ हो चुकी थी.संभवतः गोल्ज्यु ने महेश कका को परुली के जीवन में एक नया मोड़ लाने के लिए भेजा था.ये महेश कका की बातों का ही असर था कि परुली का आत्मविश्वास बढ़ रहा था.इसी आत्मविश्वास के चलते उसने परीक्षा दी और ५७% अंकों से उत्तीर्ण की.

अब तो जोस्ज्यु भी परुली की पढ़ाई को ले कर उत्साहित थे. परुली गाँव की लड़कियों में ही नहीं, लड़कों में भी सबसे प्रतिभावान सिद्ध हो रही थी.परुली ने इंटर में बायोलोजी ले ली थी.उसकी ड्राइंग अच्छी थी.इसलिए उसे चित्र बनाने में परेशानी नहीं होती थी.प्रायः चित्रों में उसे गुड भी मिलता था,जिसे वह जोस्ज्यु को दिखाती थी और जोस्ज्यु मन ही मन खुश होते थे.हाँ शुरू शुरू में मेढक का डायसेक्शन करते समय उसे घिन जरूर आई थी.
परुली ,जिसे अब ईजा-बाबू परु ही कहते थे,न केवल पढ़ाई में ज्यादा मन लगा रही थी वरन् घर के काम में भी ज्यादा ध्यान देने लगी थी और इस बात का विशेष ध्यान रखती थी कि ईजा के काम का बोझ कम हो जाए. यद्यपि ईजा-बाबू छोटे भाई चंदू से काम नहीं कराते थे,किंतु परु उसे काम के लिए उत्साहित करती थी.वह सोचती थी कि वह स्वयं पढ़ने के लिए बाहर चली जायेगी तो ईजा के लिए अत्ती काम हो जायेगा.
जोस्ज्यु और जोस्याणी कभी बैठे बातें करते तो उनकी बातों में परु की चिंता जरूर झलकती.
जोस्ज्यु कहते :- हँ वे, हमने कहीं परु का ब्या टाल कर ग़लत तो नहीं किया.
जोस्याणी कहती – नैं हो, चुप रौ.अब मन कैं झन गजबजाओ. गोल्ज्यु ने जो किया भल ही किया होगा. देखते नहीं पढ़ने में हमेशा फस्ट ठैरी.घर का काम भी भली कै संभालने वाली ठैरी.
फ़िर कुछ शरमा कर बोलती – आज कल देखण-चाण भी खूब हो गयी है.

इसे परुली का भाग्य कहो या गोल्ज्यु की कृपा कि केमिस्ट्री के टीचर तारा दत्त जी अल्मोड़ा से ट्रांसफर होकर परु के इंटर कालेज में आ गए.केमिस्ट्री पढाने के लिए अल्मोड़ा में तारा दत्त जी का बहुत नाम था.तारा दत्त जी की ही कृपा से परु केमिस्ट्री का कीडा बन गयी.उसे अधिकांश फार्मूले और एक्वेशन कंठस्थ थे.केमिस्ट्री ही वह विषय था जिसके बूते परु ने इंटर भी ५८% नंबरों से पास कर लिया.

परु पिछले दो सालों से पत्रों द्वारा महेश कका के सम्पर्क में थी.महेश कका अब लखनऊ में निवास कर रहे थे.उन्हें भी परु से लगाव हो आया था.तीज त्यौहार परु को कुछ रुपये भे भेज दिया करते थे.

डाक्टरी के लिए परु ने पी.एम.टी. की तैयारी महेश कका के निर्देशन में ही की थी.उसका सेंटर भी लखनऊ था.अब जा के लगा कि स्कूल की पढाई में अच्छे नंबर लाना और बात है,लेकिन पी.एम.टी. क्लीअर करना उतना आसान नहीं.पी. एम.टी.देने के बाद परु को डर लगने लगा.उसे लगा कि वह शायद पी.एम.टी.में न निकल पाये.वो अब ज्यादा ही भक्त हो गयी थी.देवी के थान नित्य दिया लगाना उसका नियम हो गया था और उसकी एक ही मन्नत होती- देवी माता! मेंके डाक्टर बणे दिए.
रिजल्ट आ गया.परु को काउन्सेलिंग के लिए बुलाया गया.परु की खुशी का पारावार न था.उसने सोचा वह अब डाक्टर बन ही जायेगी.परू के पूरे परिवार में जश्न था.इजा बाबू ने उसे खुशी-खुशी लखनऊ के लिए विदा किया.पडोस के जमुना दत्त जी का लड़का कैलाश छुट्टी बिता कर फौज की ड्यूटी में वापस जा रहा था,उसका साथ भी मिल गया.महेश कका के लिए गडेरी,भांगा,भट,घौत और दो दाने निमु के भेंट में भेजे.जोस्ज्यु खत्याड़ी वाले खेत को बेचने की तैयारी कराने लगे ताकि परु की पढाई का खर्च निकल सके.

लखनऊ में फाइनल काउन्सेलिंग के बाद पता चला की परु का एडमिशन नहीं होगा.वह कट ऑफ़ को छूने से रह गयी थी. परु के कल्पनाओं का महल भरभरा कर गिर पड़ा.उसे जबरदस्त सदमा लगा.वह गाँव वालों को क्या मुंह दिखायेगी?सभी कहेंगे -बहुत फलफला रही थी.सुद्दै जो क्या ठहरा डाक्टर बनना!एक बार उसे लगा की उसे आत्महत्या कर लेनी चाहिए,लेकिन यह विचार ज्यादा देर तक हावी न हो सका.ईजा- बाबू और चंदू के ख्याल ने उसे सकारात्मक विचारों की ओर मोड़ दिया.

काउन्सेलिंग के कुछ दिन बाद ही महेश कका ख़बर लाये कि आरक्षित कोटे की सीटें पूरी नहीं भर पायीं हैं और शासन इस बार ये सीटें सामान्य सीटों से भरने पर विचार कर रहा है.शायद परु का नंबर भी आ जाए क्योंकि परु ज्यादा पीछे नहीं थी.हुआ भी वही.नई सूची मैं परु का नाम आ गया.
परु के जीवन का यह सबसे महत्वपूर्ण दिन था.बचपन से पाले सपने को साकार करने के लिए यह पहला पक्का कदम था.परु की खुशी देख कर महेश कका के भी आंसू निकल आए.

गाँव में जोस्ज्यु अब तक के घटनाक्रम से अवगत न थे.वे तो परु को डाक्टर मान चुके थे.परु की चिट्ठी आयी- मेरा एडमिशन हो गया है.गोल्ज्यु के थान प्रसाद चढ़ा देना. जोस्ज्यु उपाध्यायजी के यहाँ से मिसिरी ले आए. परु की ईजा ने गोल्ज्यु के थान परसाद चढा कर पूरे गाँव मे बांटा.ज्यादातर लोगों का एक ही जवाब था -भल भै हो तुमेरी परुलि डाक्धर बण गे.लेकिन कुछ ज्यादा समझदार लोग यह भी कह रहे थे-अल्ले काँ(अभी कहाँ) आई त पाँच साल तक पढाई करनी पड़ने वाली ठैरी.तब जो बनेगी डाकटर.

पढाई का कुछ खर्च खत्याड़ी वाला खेत बेचने से चल गया था.महेश कका ने भी काफी मदद की. उन्होंने परु को होस्टल न भेजकर अपने घर पर रख लिया जिससे रहने खाने का खर्च बच जाए.

एडमिशन होने तक परु को उतनी मुश्किल नहीं हुई जितनी एडमिशन के बाद. मेडिकल कालेज की जबरदस्त रैगिंग से परु विचलित हो गयी. उसने रैगिंग का नाम तो सुना था लेकिन इस प्रकार की रैगिंग होगी,उसे अनुमान नहीं था.उसे कालेज जाना किसी यातना झेलने जैसा लगने लगा.महेश कका उसकी परेशानी को भाँप गए.उन्होंने परु की चाची से बात की. परु की चाची ने उसे रैगिंग के आतंक से उबरने में मदद की.
परु जब पी.एम.टी. देने पहली बार लखनऊ आयी थी तो इतनी बड़ी ट्रेन देखकर,इतना बड़ा शहर देख कर,इतनी चहल पहल,इतनी भागमभाग देख कर जहाँ चमत्कृत हुई थी वहीं घबराई भी.उसे लगा था कि इतने बड़े शहर में रहकर पढाई करना कितना मुश्किल होगा.लेकिन अब इस चकाचौंध से उसकी घबराहट दूर होने लगी और उसे इसमें रस आने लगा.कालेज में भी उसका ग्रुप बन गया था.वहाँ भी उसे अच्छा लगता था.

यह परु का फर्स्ट इअर था.कालेज में एनुअल फंक्शन चल रहे थे.उसके ग्रुप की रीमा भाटिया बोली-
‘प्रिया तुम इतनी क्यूट हो. ब्यूटी कम्पीटिशन में पार्टिसिपेट क्यों नहीं करतीं?’
अमित और दूसरे साथियों ने भी इस बात पर जोर दिया.प्रिया ने कुछ शर्माते हुए कहा-
‘ठीक है,मैं आज अंकल से परमिशन लूंगी.’
‘परमिशन!’नेहा बोली’भला इसमें उन्हें क्या ऐतराज़ हो सकता है?तुम्हें एक चांस मिल रहा है.हो सकता है आज मिस मेडिकल कालेज,कल मिस लखनऊ फ़िर मिस इंडिया और मिस वर्ल्ड भी तुम बनो.एक्सपोजर ऐसे ही तो होता है.’
परु चुप रही.नेहा की बातों से परु को लगने लगा था कि महेश कका उसे अनुमति दे देंगे क्योंकि वे उसे हमेशा प्रोत्साहित करते थे.

लेकिन जब महेश कका से इस बारे में बात हुई तो उन्होंने परु को प्यार से समझाते हुए मना कर दिया.हालांकि उनकी बातों से ऐसा लग रहा था कि डिबेट या स्पोर्ट्स में पार्टिसिपेट करने की अनुमति दे देते.महेश कका की इस बात पर परु को बुरा लगा और वह अनमनी हो गयी.

उसके दोस्तों ने इस बात पर उसके अंकल-आंटी का मजाक भी बनाया.मारिया तो यहाँ तक कहने लगी-
‘ये तुम्हारे पेरेंट्स होते तो मना नहीं करते.तुम्हें तो होस्टल ज्वाइन कर लेना चाहिए.वहाँ कम से कम फ्रीली रह तो सकोगी.’

निपट गाँव से एक अत्यन्त सरल प्रतिभावान लडकी शहरी चकाचौंध भरे बनावटी माहौल में ठीक से तारतम्य नहीं बिठा पा रही थी.इसी लिए जब महेश कका ने उसे न्यू इअर पार्टी में होटल में रात भर जश्न मनाने के लिए मना कर दिया तो वह भड़क उठी और बोली-
‘कका क्या आप समझते हैं कि मैं वहाँ जा कर कोई ग़लत काम करूंगी या शराब पियूंगी?क्या सभी लडकियां जो वहाँ जा रही हैं इसी लिए जा रहे हैं?उनके पेरेंट्स उनको क्यों नहीं रोक रहे?’
इसी रौ में उसने होस्टल ज्वाइन करने की इच्छा भी जाहिर कर दी.वह यह भी भूल गयी कि महेश कका उसका आधा खर्च वहन कर रहे हैं.होस्टल का खर्च वह कहाँ से लाएगी?
उसके तेवर देख कर चाची तो तमक उठी और बोल दिया-
‘जाने दीजिये इसको होस्टल.जब उसे आपकी इज्ज़त नहीं करनी तो आप क्यों इसकी फिक्र करते हैं?हम इसके लिए कितना कर रहे हैं इसे उसकी भी परवाह नहीं.बेशर्म हो गयी है.पर निकल गए हैं इसके.’
महेश कका को भी काफी सदमा लगा.दुखी हो कर बोले-
‘बेटा मैंने तो तुझे अपनी बेटी मान लिया था.तेरा भला बुरा सोचना मेरा फ़र्ज़ था. लेकिन तुझे मेरी बातें बुरी लग रही हैं तो अपने मन की कर ले .हाँ,इतना जरूर कहूंगा कि तेरे बाबू की स्थिति ऐसी नहीं कि होस्टल का खर्च उठा सकें.अभी तो तेरा फर्स्ट इअर ही है.’
लेकिन प्रिया पर उनकी बातों का कोई असर नहीं हुआ.वह गुस्से में थी और उसने होस्टल जाने का निश्चय कर लिया था.दूसरे दिन वह इस बारे में दोस्तों से बात करने वाली थी.आज की पार्टी में शामिल न हो पाने का भी उसे बहुत मलाल था.
कालेज पहुँचने पर कुछ और ही चर्चा थी.रात की पार्टी में स्टूडेंट्स के दो गुटों में जम कर हाथापाई हुई थी.बोतलें और कुर्सियाँ चली थीं.पुलिस आ गयी थी.अमित, नेहा और सुष्मिता को रात भर थाने में रहना पड़ा था.सुबह पेरेंट्स को बुला कर उन्हें चेतावनी दी गयी थी.
प्रिया के लिए ऐसी घटना अकल्पनीय थी वह महेश कका से कुतर्क करने के लिए शर्मिन्दा थी.दूसरे दिन के न्यूज़ पेपर में घटना की ख़बर फोटो सहित थी.उसके ग्रुप के कुछ स्टूडेंट्स के फोटो और नाम भी थे..
इस घटना के बाद प्रिया को अहसास हो गया कि महेश कका सदा उसके भले की ही बातें करते हैं.उसे आश्चर्य भी हुआ कि उसने किस दम पर होस्टल ज्वाइन करने का विचार बना लिया था.महेश कका से मुंह्जोरी करने का भी उसे बहुत दुःख था. उनसे आँखें मिलाने में भी उसको शर्म आ रही थी.हाँ एक फायदा जरूर हुआ,इसके बाद कभी परु महेश कका से पूछे बिना एक कदम भी नहीं चली.इसी का परिणाम था कि प्रिया ने अपनी मेडिकल के पढाई सफलता पूर्वक पूरी की.
आज परु को इस बात का अहसास है कि महेश कका ने ही उसके जीवन की दिशा बदली है.उनका बहुत बड़ा अहसान है जिसे जिंदगी भर नहीं भूल सकती-डाक्टर प्रिया जोशी

कहानी यहीं समाप्त होती है.इससे आगे जहाँ तक मुझे मालूम है बता दूँ-प्रिया,उसकी माँ और जोस्ज्यु ने कभी ऐसा व्यवहार नहीं किया जिससे गाँव वाले यह कह सकें कि ये लोग ओच्छि गए हैं.हाँ चंदू को अपनी दीदी के डाक्टर होने पर जरूर गर्व है और इसे वह अपने दोस्तों पर प्रकट भी कर देता है.
डाक्टर प्रिया की नौकरी भी पहाड़ के एक प्राईमरी अस्पताल मे लग गई.सुना है उसका चिह्न किसी डाक्टर अतुल पन्त के लिए गया है.चिह्न साम्य हो गया तो ब्याह पक्का ही समझो क्योंकि दोनों ही समकक्ष संबंधों वाले ठहरे और डाक्टर अतुल के पिताजी केमिस्ट्री के मास्टर तारा दत्त जी हुए जिन्होंने पारु को पढाया था और उसे पसंद भी करते थे.

आप सभी का हार्दिक धन्यवाद. मैं आप लोगों की सोच को नमन करता हूँ. मैं आपका गुनहगार हूँ. इसलिये क्षमा प्रार्थी भी हूँ. मैं समय मिलते ही कहानी के अंतिम भाग को लंबा करके लिखने की कोशिश करुंगा. ब्लॉग पर छापूं ना छापूं लेकिन इससे कमसे कम मेरा अपराधबोध तो कम होगा ही. आप आते रहें और मेरा मार्ग दर्शन करते रहें यही कामना है.

 

अरुण जी इस सिरीज पर नियमित टिपियाकर इसे जारी रखने का हौसला दे रहे हैं. वह पिछ्ले कई अंकों से मुशायरे के इंतजार में हैं.पिछ्ले अंक में उन्होने कहा “शेर के नाम पर गीदड तक के दर्शन नही कराये” . तो ज़नाब आज उनका और आपका भी इंतजार खत्म होता है.पेश है एक रोचक मुशायरा. आनंद लें.आनंद आये तो टिपिया दें बस.

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साग़र जालौनवी : रात के बारह बजे थे चारों ओर श्रोताओं की तूती बोल रही थी।मुशायरे के शोर से सहम कर गांव की सरहद पर गीदड़ों ने बोलना बन्द कर दिया था। एक स्थानीय शायर ख़ुद को हर शेर पर हूट करवा कर सर झुकाये जा रहा था कि एक साहब चांदनी पर चलते हुए मुशायरे के अध्यक्ष तक पहुंचे, दायें हाथ से आदाब किया और बायें हाथ से अपनी मटन-चाप मूंछ जो खिचड़ी हो चली थी, ताव देते रहे। उन्होंने प्रार्थना की कि मैं एक ग़रीब परदेसी हूं, मुझे भी शेर पढ़ने की इजाजत दी जाये। उन्होंने ख़बरदार किया कि अगर पढ़वाने में देर की गई तो उनका दर्जा ख़ुद-ब-ख़ुद ऊंचा होता चला जायेगा और वो उस्तादों से पहलू मारने लगेंगे। उन्हें इजाजत दे दी गयी। उन्होंने खड़े हो कर दर्शकों को दायें, बायें और सामने घूम कर तीन-बार आदाब किया। उनकी क्रीम रंग की अचकन इतनी लम्बी थी कि भरोसे से नहीं कहा जा सकता था कि उन्होंने पाजामा पहन रक्खा है या नहीं। काले मख़मल की टोपी को जो भीड़-भड़क्के में सीधी हो गई थी, उन्होंने उतार कर फूंक मारी और अधिक टेढ़े एंगिल से सर पर जमाया। मुशायरे के दौरान यह साहब छटी लाइन में बैठे अजीब अन्दाज से “ऐ सुब्हानल्ला-सुब्हानअल्ला” कह कर दाद दे रहे थे। जब सब ताली बजाना बन्द कर देते तो यह शुरू हो जाते और इस अन्दाज में बजाते जैसे रोटी पका रहे हैं। फ़र्शी आदाब करने के बाद वो अपनी डायरी लाने के लिये अचकन इस तरह ऊपर उठाये अपनी जगह पर वापस गये जैसे कुछ औरतें भरी बरसात और चुभती नजरों की सहती-सहती बौछारों में, सिर्फ़ इतने गहरे पानी से बचने के लिये जिसमें चींटी भी न डूब सके, अपने पांयचे दो-दो बालिश्त ऊपर उठाये चलती हैं और देखने वाले क़दम-क़दम पे दुआ करते हैं कि “इलाही ये घटा दो दिन तो बरसे”।

अपनी जगह से उन्होंने अपनी डायरी उठाई, जो दरअस्ल स्कूल का एक पुराना हाजिरी रजिस्टर था जिसमें इम्तिहान की पुरानी कापियों के ख़ाली पन्नों पर लिखी हुई ग़जलें रखी थीं। उसे सीने से लगाये वो साहब वापस मुशायरे के अध्यक्ष के पास पहुंचे। हूटिंग किसी तरह बन्द होने का नाम ही नहीं लेती थी। ऐसी हूटिंग नहीं देखी कि शायर के आने से पहले और शायर के जाने के बाद भी जोरों से जारी रहे। अपनी जेबी घड़ी एक बार बैठने से पहले और बैठने के बाद ध्यान से देखी। फिर उसे डमरू की तरह हिलाया और कान लगा कर देखा कि अब भी बन्द है या धक्कमपेल से चल पड़ी है। जब फ़ुरसत पाई तो श्रोताओं से बोले, ‘‘हजरात! आपके चीख़ने से मेरे तो गले में ख़राश पड़ गई है।’’

इन साहब ने अध्यक्ष और श्रोताओं से कहा कि वे एक ख़ास कारण से ग़ैर-तरही ग़जल पढ़ने की इजाजत चाहते हैं, मगर कारण नहीं बताना चाहते। इस पर श्रोताओं ने शोर मचाया। हल्ला जियादा मचा तो उन साहब ने अपनी अचकन के बटन खोलते हुए ग़ैर-तरही ग़जल पढ़ने का यह कारण बताया कि मिसरा ‘तरह’ दिया गया है उसमें ‘सकता’ (छन्द दोष) पड़ता है, ‘मरज’ शब्द को ‘फ़र्ज’ के ढ़ंग पर बांधा गया है। श्रोताओं की आख़िरी पंक्ति से एक दाढ़ी वाले बुजुर्ग ने उठ कर न सिर्फ़ सहमति व्यक्त की बल्कि ये चिंगारी भी छोड़ी कि अलिफ़ (आ की ध्वनि को अ बांधना) भी गिरता है।

यह सुनना था कि शायरों पर अलिफ़ ऐसे गिरा जैसे फ़ालिज गिरता है। सकते में आ गये। श्रोताओं ने आसमान, मिसरा-तरह और शायरों को अपने सींगों पर उठा लिया। एक हुल्लड़ मचा हुआ था। जौहर इलाहाबादी कुछ कहना चाहते थे मगर अब शायरों के कहने की बारी ख़त्म हो चुकी थी। फब्तियों, ठठ्ठों और गालियों के सिवा कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। ऐसा स्थिति थी कि अगर उस समय जमीन फट जाती तो बिशारत स्वयं को, मय कानपुर के शायरों और मौलवी मज्जन को गावतकिये समेत उसमें समा जाने के लिये ख़ुशी से ऑफ़र कर देते।

उस एतराज करने वाले शायर ने अपना उपनाम साग़र जलौनवी बताया, लोग बड़ी देर से उकताये बैठे थे। साग़र जलौनवी के धमाकेदार एतराज से ऊंघते मुशायरे में जान ही नहीं, तूफ़ान आ गया। दो गैस की लालटेनों का तेल पन्द्रह मिनट पहले खत्म हो चुका था। कुछ में वक़्त पर हवा नहीं भरी गयी। वो फुस्स हो कर बुझ गईं। साग़र जलौनवी के एतराज के बाद किसी शरारती ने बाक़ी लालटेनों को झड़झड़ाया, जिससे उनके मेंटल झड़ गये और अंधेरा हो गया। अब मारपीट शुरू हुई, लेकिन ऐसा घुप्प अंधेरा था कि हाथ को शायर सुझायी नहीं दे रहा था इसलिये बेक़सूर श्रोता पिट रहे थे। इतने में किसी ने आवाज लगाई, भाइयो! हटो! भागो! बचो! रण्डियों वाले हकीम साहब की भैंस रस्सी तुड़ा गई है। यह सुनते ही घमासान की भगदड़ पड़ी। अंधेरी रात में काली भैंस तो किसी को दिखाई नहीं दी लेकिन लाठियों से लैस मगर घबराये हुए देहातियों ने एक दूसरे की, भैंस समझ कर ख़ूब धुनाई की। लेकिन आज तक यह समझ न आया कि चुराने वालों ने ऐसे घुप अंधेरे में नये जूते कैसे पहचान लिये और जूते की क्या, हर चीज जो चुरायी जा सकती थी चुरा ली गयी। पानों की चांदी की थाली, दर्जनों अंगोछे, साग़र जलौनवी की दुगनी साइज की अचकन, जिसके नीचे कुरता या बनियान नहीं था। एक जाजम, तमाम चांदनियां, यतीमख़ाने के चंदे की सन्दूक़ची, उसका फ़ौलादी ताला, यतीमख़ाने का काला बैनर, मुशायरे के अध्यक्ष का गाव-तकिया और आंखों पर लगा चश्मा, एक पटवारी के गले में लटकी हुई दांत कुरेदनी और कान का मैल निकालने की डोई, ख़्वाजा क़मरूद्दीन की जेब में पड़े आठ रुपये, इत्र में बसा रेशमी रूमाल और पड़ौसी की बीबी के नाम महकता ख़त (यही एक चीज थी जो दूसरे दिन बरामद हुई और इसकी नक़्ल घर-घर बंटी), हद ये कि कोई बदतमीज उनकी टांगों में फंसे चूड़ीदार का रेशमी नाड़ा एक ही झटके में खींचकर ले गया। एक शख़्स बुझा हुआ हंडा सर पर उठा के ले गया। माना कि अंधेरे में किसी ने सर पर ले जाते हुए तो नहीं देखा, मगर हंडा ले जाने का सिर्फ़ यही एक तरीक़ा था। बीमार मुर्ग़ियों के केवल कुछ पर पड़े रह गये। साग़र जलौनवी का बयान था कि

एक बदमाश ने उसकी मूंछ तक उखाड़ कर ले जाने की कोशिश की जिसे उसने अपनी चीख से नाकाम कर दिया। यानी इस बात की चिंता किये बिना कि उपयोगी है या नहीं, जिसका जिस चीज पर हाथ पड़ा उसे उठा कर, उतार कर, नोच कर, फाड़ कर, उखाड़ कर ले गया। हद यह कि तहसीलदार के पेशकार मुंशी बनवारी लाल माथुर के इस्तेमाल में आते डेंचर्स भी। केवल एक चीज ऐसी थी जिसे किसी ने हाथ नहीं लगाया। शायर अपनी डायरियां जिस जगह छोड़ कर भागे थे वो दूसरे दिन तक वहीं पड़ी रहीं।

बाहर से आये देहातियों ने यह समझकर कि शायद यह भी मुशायरे का हिस्सा है, मार-पीट और लूट-खसोट में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया और बाद को बहुत दिन तक हर आये-गये से बड़े चाव से पूछते रहे कि अगला मुशायरा कब होगा।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

इस भाग की अन्य कड़ियां.

1. फ़ेल होने के फायदे 2. पास हुआ तो क्या हुआ 3. नेकचलनी का साइनबोर्ड 4. मौलवी मज्जन से तानाशाह तक 5. हलवाई की दुकान और कुत्ते का नाश्ता 6. कुत्ता और इंटरव्यू 7. ब्लैक होल ऑफ़ धीरजगंज 8. कोई बतलाओ कि हम बतलायें क्या? 9. विशेष मूली और अच्छा-सा नाम 10. ज़लील करने के कायदे 11. आइडियल यतीम का हुलिया 12. ज़लील करने के अलग अलग शेड 13.कुत्ते की तारीफ और मुशायरा 14. शायरों की खातिरदारी 15. इक्के का आविष्कार घोड़े ने किया 16.मुशायरे की तैयारी 17. तवायफ़ के किस्से 18. मूलगंज: तवायफों का जिक्र 19. और मुशायरा लुट गया

पहला भाग

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