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	<title>Comments on: परुली: आज शादी है.</title>
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	<description>Kakesh's KudKud</description>
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		<title>By: rajendra bhatt</title>
		<link>http://kakesh.com/2008/parulee-10/comment-page-1/#comment-6051</link>
		<dc:creator>rajendra bhatt</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 16 Jul 2009 11:54:17 +0000</pubDate>
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		<description>kakesh da,aaj to aapne apne dostoun ke sath dhokha kiya hai,story mein jaise hi more aaya hi tha,the end ho gaye,kakesh da next time koi aisi story banana jismein kuch interest ho...</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>kakesh da,aaj to aapne apne dostoun ke sath dhokha kiya hai,story mein jaise hi more aaya hi tha,the end ho gaye,kakesh da next time koi aisi story banana jismein kuch interest ho&#8230;</p>
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		<title>By: परुली तुमने मुझे गुनहगार बना दिया</title>
		<link>http://kakesh.com/2008/parulee-10/comment-page-1/#comment-2431</link>
		<dc:creator>परुली तुमने मुझे गुनहगार बना दिया</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 26 Apr 2008 00:50:29 +0000</pubDate>
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		<description>[...] कहानी को लिखना भारी पड़ने लगा. इसलिये पिछ्ले बुधवार मुझे लगा कि इस कहानी को फास्ट ट्रैक [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] कहानी को लिखना भारी पड़ने लगा. इसलिये पिछ्ले बुधवार मुझे लगा कि इस कहानी को फास्ट ट्रैक [...]</p>
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		<title>By: hem pandey</title>
		<link>http://kakesh.com/2008/parulee-10/comment-page-1/#comment-2418</link>
		<dc:creator>hem pandey</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 23 Apr 2008 11:02:22 +0000</pubDate>
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		<description>किरण जी कम्प्लिमेंट के लिए धन्यवाद.मैंने अतुल पन्त नाम काकेश जी की अन्तिम कड़ी से लिया है.उसको तारा दत्त जी (केमिस्ट्री के टीचर ) का लड़का बता दिया है. टी.पी. नाम कहानी में कहीं नहीं है.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>किरण जी कम्प्लिमेंट के लिए धन्यवाद.मैंने अतुल पन्त नाम काकेश जी की अन्तिम कड़ी से लिया है.उसको तारा दत्त जी (केमिस्ट्री के टीचर ) का लड़का बता दिया है. टी.पी. नाम कहानी में कहीं नहीं है.</p>
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		<title>By: kiran</title>
		<link>http://kakesh.com/2008/parulee-10/comment-page-1/#comment-2417</link>
		<dc:creator>kiran</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 23 Apr 2008 10:10:59 +0000</pubDate>
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		<description>वाह हेम भाइ मजा आ गया, कहानी मै ट्विस्ट बडा जोरदार लगा. इससे यह पता लगता है कि आप परुली से कितना लगाव रखते है. ळेकिन ये अन्त मै टी पी मास्साब का बेटा वाली बात समझ नही आयी और वो भी पन्त? इस पर कुछ प्रकाश डालिये.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>वाह हेम भाइ मजा आ गया, कहानी मै ट्विस्ट बडा जोरदार लगा. इससे यह पता लगता है कि आप परुली से कितना लगाव रखते है. ळेकिन ये अन्त मै टी पी मास्साब का बेटा वाली बात समझ नही आयी और वो भी पन्त? इस पर कुछ प्रकाश डालिये.</p>
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		<title>By: hem pandey</title>
		<link>http://kakesh.com/2008/parulee-10/comment-page-1/#comment-2416</link>
		<dc:creator>hem pandey</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 22 Apr 2008 13:43:12 +0000</pubDate>
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		<description>&#039;परुली&#039; की अन्तिम कड़ी  ने मुझे भी अन्य की तरह निराश किया. अपने आक्रोश को व्यक्त करने के लिए मैंने अन्तिम कड़ी को इस प्रकार लिख डाला है:-

परुली की दशा देख कर उसकी ईज़ा ने निश्चय कर लिया कि वह फूल जैसी अपनी बेटी की भावनाओं का खून नहीं होने देगी.उसे लगने लगा था कि इस ब्या से परुली सुखी तो  नहीं ही होगी. परुली के बाबू से फुरसत में बात करने पर  जोस्ज्यु को भी यही ठीक लगा कि यह रिश्ता टूट जाए.
अब इसे पूरे परिवार कि प्रबल सामूहिक  इच्छा का प्रभाव समझिए या संजोग कि घटनाक्रम भी कुछ अनुकूल रहे.खान्तोली के गणेश दत्त जी, जो &#039;ब्याकर&#039; (शादियाँ तै कराने वाला) कहलाते थे, ने अपनी भतीजी की जुगाड़ गोपाल के लिए लगा ली और पांडे ज्यू के दिमाग में यह बात भी बिठा दी  कि परुली तो ज्यादा ही बीमार ठैरी, ज्यादा दिन बचने वाली भी नहीं हुई.जोस्ज्यु की भी हालत ऐसी नहीं हुई कि वे गोपाल को कुछ ज्यादा दे सकें.पिठ्याँ अभी लगा नहीं है.इस लिए ये रिश्ता ख़तम करने में कोई हर्ज़ भी नहीं हुआ.

इसी बीच जोस्ज्यु के क़का का लड़का महेश, जो चालीस साल से  हैदराबाद में था,इष्टदेव की पूजा के लिए पहली बार गाँव आया. उसके दोनों बेटे विदेश में थे और दोनों ने ही अंतर्जातीय विवाह कर रखे थे .महेश रिटायर हो गया था और उसने अपने मौसेरे भाई हरीश के मार्फ़त लखनऊ कुर्मांचल नगर में मकान खरीद लिया था.अब वह लखनऊ में ही रहने वाला था.वह हफ्ते भर जोस्ज्यु के घर में  रहा. उसने भी जोस्ज्यु को प्रेरित किया  कि  वे परुली को आगे पढाएँ और यथासंभव आर्थिक सहायता का भी भरोसा दिलाया.वापस जाते समय वह पाँच सौ रुपये परु के और पाँच सौ रुपये बोजी के हाथ में रख गया.जीवन में पहली बार जोस्ज्यु ने इतनी बड़ी रकम किसी मेहमान या यजमान से एक बार में प्राप्त की थी.
 
महेश के जाने के बाद परुली भी तेजी से स्वास्थ्य लाभ करने लगी.डॉक्टर पुनेठा की दवा के साथ-साथ महेशकका की आशाजनक बातों से भी वह जल्दी ही बीमारी  से उबर गयी.परीक्षा आते आते वह पूर्ण स्वस्थ हो चुकी थी.संभवतः गोल्ज्यु ने महेश कका को परुली के जीवन में एक नया मोड़ लाने के लिए भेजा था.ये महेश कका की बातों का ही असर था कि परुली का आत्मविश्वास बढ़ रहा था.इसी आत्मविश्वास के चलते उसने   परीक्षा दी और ५७% अंकों से उत्तीर्ण की.

अब तो जोस्ज्यु भी परुली की पढ़ाई को ले कर उत्साहित थे. परुली गाँव की लड़कियों में ही नहीं, लड़कों में भी सबसे प्रतिभावान सिद्ध हो रही थी.परुली ने इंटर में बायोलोजी ले ली थी.उसकी ड्राइंग अच्छी थी.इसलिए उसे चित्र बनाने में परेशानी नहीं होती थी.प्रायः चित्रों में उसे गुड भी मिलता था,जिसे वह जोस्ज्यु को दिखाती थी और जोस्ज्यु मन ही मन खुश होते थे.हाँ शुरू शुरू में मेढक का डायसेक्शन करते समय उसे घिन जरूर आई थी.
परुली ,जिसे अब ईजा-बाबू परु ही कहते थे,न केवल पढ़ाई में ज्यादा मन लगा रही थी वरन् घर के काम में भी ज्यादा ध्यान देने लगी थी और इस बात का विशेष ध्यान रखती थी कि ईजा के काम का बोझ कम हो जाए. यद्यपि ईजा-बाबू छोटे भाई चंदू से काम नहीं कराते थे,किंतु परु उसे काम के लिए उत्साहित करती थी.वह सोचती थी कि वह स्वयं पढ़ने के लिए बाहर चली जायेगी तो ईजा के लिए  अत्ती काम हो जायेगा.
  जोस्ज्यु और जोस्याणी कभी बैठे बातें करते तो उनकी बातों में परु की चिंता जरूर झलकती. 
जोस्ज्यु कहते :- हँ वे, हमने कहीं परु का ब्या टाल कर ग़लत तो नहीं किया.
जोस्याणी कहती - नैं हो, चुप रौ.अब मन कैं झन गजबजाओ. गोल्ज्यु ने जो किया भल ही किया होगा. देखते नहीं पढ़ने में हमेशा फस्ट ठैरी.घर का काम भी भली कै संभालने वाली ठैरी.
फ़िर कुछ शरमा कर बोलती - आज कल देखण-चाण भी खूब हो गयी है.

 इसे परुली का भाग्य कहो या गोल्ज्यु की कृपा कि केमिस्ट्री के टीचर तारा दत्त जी अल्मोड़ा से ट्रांसफर होकर परु के इंटर कालेज में आ गए.केमिस्ट्री पढाने के लिए अल्मोड़ा में तारा दत्त जी का बहुत नाम था.तारा दत्त जी की ही कृपा से परु केमिस्ट्री का कीडा बन गयी.उसे अधिकांश फार्मूले और एक्वेशन कंठस्थ थे.केमिस्ट्री ही वह विषय था जिसके बूते परु ने इंटर भी ५८% नंबरों से पास कर लिया.      

 परु पिछले दो सालों से पत्रों द्वारा महेश कका के सम्पर्क में थी.महेश कका अब लखनऊ में निवास कर रहे थे.उन्हें भी परु से लगाव हो आया था.तीज त्यौहार परु को कुछ रुपये भे भेज दिया करते थे. 

 डाक्टरी के लिए परु ने पी.एम.टी. की तैयारी महेश कका के निर्देशन में ही की थी.उसका सेंटर भी लखनऊ था.अब जा के लगा कि स्कूल की पढाई में अच्छे नंबर लाना और बात है,लेकिन पी.एम.टी. क्लीअर करना उतना आसान नहीं.पी. एम.टी.देने के बाद परु को डर लगने लगा.उसे लगा कि वह शायद पी.एम.टी.में न निकल पाये.वो अब ज्यादा ही भक्त हो गयी थी.देवी के थान नित्य दिया लगाना उसका नियम हो गया था और उसकी एक ही मन्नत होती-  देवी माता! मेंके डाक्टर बणे दिए.   
रिजल्ट आ गया.परु को काउन्सेलिंग के लिए बुलाया गया.परु की खुशी का पारावार न था.उसने सोचा वह अब डाक्टर बन ही जायेगी.परू के पूरे परिवार में जश्न था.इजा बाबू ने उसे खुशी-खुशी लखनऊ के लिए विदा किया.पडोस के जमुना दत्त जी का लड़का कैलाश छुट्टी बिता कर फौज की ड्यूटी में वापस जा रहा था,उसका साथ भी मिल गया.महेश कका के लिए गडेरी,भांगा,भट,घौत और दो दाने निमु के भेंट में भेजे.जोस्ज्यु खत्याड़ी वाले खेत को बेचने की तैयारी कराने लगे  ताकि परु की पढाई का खर्च निकल सके. 

 लखनऊ में फाइनल काउन्सेलिंग के बाद पता चला की परु का एडमिशन नहीं होगा.वह कट ऑफ़ को छूने से रह गयी थी. परु के कल्पनाओं का महल भरभरा कर गिर पड़ा.उसे जबरदस्त सदमा लगा.वह गाँव वालों को क्या मुंह दिखायेगी?सभी कहेंगे -बहुत फलफला रही थी.सुद्दै जो क्या ठहरा डाक्टर बनना!एक बार उसे लगा की उसे आत्महत्या कर लेनी चाहिए,लेकिन यह विचार ज्यादा देर तक हावी न हो सका.ईजा- बाबू और चंदू के ख्याल ने उसे सकारात्मक विचारों की ओर मोड़ दिया.        
  
    काउन्सेलिंग के कुछ दिन बाद ही महेश कका ख़बर लाये कि आरक्षित कोटे की सीटें पूरी नहीं भर पायीं हैं और शासन इस बार ये सीटें सामान्य सीटों से भरने पर विचार कर रहा है.शायद परु का नंबर भी आ जाए क्योंकि परु ज्यादा पीछे नहीं थी.हुआ भी वही.नई सूची मैं परु का नाम आ गया.   
परु के जीवन का यह सबसे महत्वपूर्ण दिन था.बचपन से पाले सपने को साकार करने के लिए यह पहला पक्का कदम था.परु की खुशी देख कर महेश कका के भी आंसू निकल आए.

गाँव में जोस्ज्यु अब तक के घटनाक्रम से अवगत न थे.वे तो परु को डाक्टर मान चुके थे.परु की चिट्ठी आयी- मेरा एडमिशन हो गया है.गोल्ज्यु के थान प्रसाद चढ़ा देना. जोस्ज्यु उपाध्यायजी के यहाँ से मिसिरी ले आए. परु की ईजा ने गोल्ज्यु के थान परसाद चढा कर पूरे गाँव मे बांटा.ज्यादातर लोगों का एक ही जवाब था -भल भै हो तुमेरी परुलि डाक्धर बण गे.लेकिन कुछ ज्यादा समझदार लोग यह भी कह रहे थे-अल्ले काँ(अभी कहाँ) आई त पाँच साल तक पढाई करनी पड़ने वाली ठैरी.तब जो बनेगी डाकटर.

      पढाई का कुछ खर्च खत्याड़ी वाला खेत बेचने से चल गया था.महेश कका ने भी  काफी मदद की. उन्होंने  परु को होस्टल न भेजकर अपने घर पर रख लिया जिससे रहने खाने का खर्च बच जाए.

एडमिशन होने तक परु को उतनी मुश्किल नहीं हुई जितनी एडमिशन के बाद. मेडिकल कालेज की जबरदस्त रैगिंग से परु विचलित हो गयी. उसने रैगिंग का नाम तो सुना था लेकिन इस प्रकार की रैगिंग होगी,उसे अनुमान नहीं था.उसे कालेज जाना किसी यातना झेलने जैसा लगने लगा.महेश कका उसकी परेशानी को भाँप गए.उन्होंने परु की चाची से बात की. परु की चाची ने उसे रैगिंग के आतंक से उबरने में मदद की.  
परु जब पी.एम.टी. देने पहली बार लखनऊ आयी थी तो इतनी बड़ी ट्रेन देखकर,इतना बड़ा शहर देख कर,इतनी चहल पहल,इतनी भागमभाग देख कर जहाँ चमत्कृत हुई थी वहीं घबराई भी.उसे लगा था कि इतने बड़े शहर में रहकर पढाई करना कितना मुश्किल होगा.लेकिन अब इस चकाचौंध से उसकी घबराहट दूर होने लगी और उसे इसमें रस आने लगा.कालेज में भी उसका ग्रुप बन गया था.वहाँ भी उसे अच्छा लगता था. 

 यह परु का फर्स्ट इअर था.कालेज में एनुअल फंक्शन चल रहे थे.उसके ग्रुप की रीमा भाटिया बोली-
&#039;प्रिया तुम इतनी क्यूट हो. ब्यूटी कम्पीटिशन में पार्टिसिपेट क्यों नहीं करतीं?&#039; 
अमित और दूसरे साथियों ने भी इस बात पर जोर दिया.प्रिया ने कुछ शर्माते हुए कहा-
&#039;ठीक है,मैं आज अंकल से परमिशन लूंगी.&#039;
&#039;परमिशन!&#039;नेहा बोली&#039;भला इसमें उन्हें क्या ऐतराज़ हो सकता है?तुम्हें एक चांस मिल रहा है.हो सकता है आज मिस मेडिकल कालेज,कल मिस लखनऊ फ़िर मिस इंडिया और मिस वर्ल्ड भी तुम बनो.एक्सपोजर ऐसे ही तो होता है.&#039;
परु चुप रही.नेहा की बातों से परु को लगने लगा था कि महेश कका उसे अनुमति दे देंगे क्योंकि वे उसे हमेशा प्रोत्साहित करते थे.         

लेकिन जब महेश कका से इस बारे में बात हुई तो उन्होंने परु को प्यार से समझाते हुए मना कर दिया.हालांकि उनकी बातों से ऐसा लग रहा था कि डिबेट या स्पोर्ट्स में पार्टिसिपेट करने की  अनुमति दे देते.महेश  कका की इस बात पर परु को बुरा लगा और वह अनमनी हो गयी.  

उसके दोस्तों ने इस बात पर उसके अंकल-आंटी का मजाक भी बनाया.मारिया तो यहाँ तक कहने लगी-
&#039;ये तुम्हारे पेरेंट्स होते तो मना नहीं करते.तुम्हें तो होस्टल ज्वाइन कर लेना चाहिए.वहाँ कम से कम फ्रीली रह तो सकोगी.&#039;  

निपट गाँव से एक अत्यन्त सरल प्रतिभावान लडकी शहरी चकाचौंध भरे बनावटी माहौल में ठीक से तारतम्य नहीं बिठा पा रही थी.इसी लिए जब महेश कका ने उसे न्यू इअर पार्टी में होटल में रात भर जश्न मनाने के लिए मना कर दिया तो वह भड़क उठी और बोली-
&#039;कका क्या आप समझते हैं कि मैं वहाँ जा कर कोई ग़लत काम करूंगी या शराब पियूंगी?क्या सभी लडकियां जो वहाँ जा रही हैं इसी लिए जा रहे हैं?उनके पेरेंट्स उनको क्यों नहीं रोक रहे?&#039; 
इसी रौ में उसने होस्टल ज्वाइन करने की इच्छा भी जाहिर कर दी.वह यह भी भूल गयी कि महेश कका उसका आधा खर्च वहन कर रहे हैं.होस्टल का खर्च वह कहाँ से लाएगी?  
उसके तेवर देख कर चाची तो तमक उठी और बोल दिया-
&#039;जाने दीजिये इसको होस्टल.जब उसे आपकी इज्ज़त नहीं करनी तो आप क्यों इसकी फिक्र करते हैं?हम इसके लिए कितना कर रहे हैं इसे उसकी भी परवाह नहीं.बेशर्म हो गयी है.पर निकल गए हैं इसके.&#039;
महेश कका को  भी काफी सदमा लगा.दुखी हो कर बोले-
&#039;बेटा मैंने तो तुझे अपनी बेटी मान लिया था.तेरा भला बुरा सोचना मेरा फ़र्ज़ था. लेकिन तुझे मेरी बातें बुरी लग रही हैं तो अपने मन की कर ले .हाँ,इतना जरूर कहूंगा कि तेरे बाबू की स्थिति ऐसी नहीं कि होस्टल का खर्च उठा सकें.अभी तो तेरा फर्स्ट इअर ही है.&#039;
लेकिन प्रिया पर उनकी बातों का कोई असर नहीं हुआ.वह गुस्से में थी और उसने होस्टल जाने का निश्चय कर लिया था.दूसरे दिन वह इस बारे में दोस्तों से बात करने वाली थी.आज की पार्टी में शामिल न हो पाने का भी उसे बहुत मलाल था.
कालेज पहुँचने पर कुछ और ही चर्चा थी.रात की पार्टी में स्टूडेंट्स के दो गुटों में जम कर हाथापाई हुई थी.बोतलें और कुर्सियाँ चली थीं.पुलिस आ गयी थी.अमित, नेहा और सुष्मिता को रात भर थाने में रहना पड़ा था.सुबह पेरेंट्स को बुला कर उन्हें चेतावनी दी गयी थी.
प्रिया के लिए ऐसी घटना अकल्पनीय थी वह महेश कका से कुतर्क करने के लिए शर्मिन्दा थी.दूसरे दिन के न्यूज़ पेपर में घटना की ख़बर फोटो सहित थी.उसके ग्रुप के कुछ स्टूडेंट्स के फोटो और नाम भी थे..
इस घटना के बाद प्रिया को अहसास हो गया कि महेश कका सदा उसके भले की ही बातें करते हैं.उसे आश्चर्य भी हुआ कि उसने किस दम पर होस्टल ज्वाइन करने का विचार बना लिया था.महेश कका से मुंह्जोरी करने का भी उसे बहुत दुःख था. उनसे आँखें मिलाने में भी उसको शर्म आ रही थी.हाँ एक फायदा जरूर हुआ,इसके बाद कभी परु महेश कका से पूछे बिना एक कदम भी नहीं चली.इसी का परिणाम था कि प्रिया ने अपनी मेडिकल के पढाई सफलता पूर्वक पूरी की.
आज परु को इस बात का अहसास है कि महेश कका ने ही उसके जीवन की दिशा बदली है.उनका बहुत बड़ा अहसान है जिसे जिंदगी भर नहीं भूल सकती-डाक्टर प्रिया जोशी

कहानी यहीं समाप्त होती है.इससे आगे जहाँ तक मुझे मालूम है बता दूँ-प्रिया,उसकी माँ और जोस्ज्यु ने कभी ऐसा व्यवहार नहीं किया जिससे गाँव वाले यह कह सकें कि ये लोग ओच्छि गए हैं.हाँ चंदू को अपनी दीदी के डाक्टर होने पर जरूर गर्व है और इसे वह अपने दोस्तों पर प्रकट भी कर देता है.
डाक्टर प्रिया की नौकरी भी पहाड़ के एक प्राईमरी अस्पताल मे लग गई.सुना है उसका चिह्न किसी डाक्टर अतुल पन्त के लिए गया है.चिह्न साम्य हो गया तो ब्याह पक्का ही समझो क्योंकि दोनों ही समकक्ष संबंधों वाले ठहरे और डाक्टर अतुल के पिताजी केमिस्ट्री के मास्टर तारा दत्त जी हुए जिन्होंने पारु को पढाया था और उसे पसंद भी करते थे.
समाप्त..........</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>&#8216;परुली&#8217; की अन्तिम कड़ी  ने मुझे भी अन्य की तरह निराश किया. अपने आक्रोश को व्यक्त करने के लिए मैंने अन्तिम कड़ी को इस प्रकार लिख डाला है:-</p>
<p>परुली की दशा देख कर उसकी ईज़ा ने निश्चय कर लिया कि वह फूल जैसी अपनी बेटी की भावनाओं का खून नहीं होने देगी.उसे लगने लगा था कि इस ब्या से परुली सुखी तो  नहीं ही होगी. परुली के बाबू से फुरसत में बात करने पर  जोस्ज्यु को भी यही ठीक लगा कि यह रिश्ता टूट जाए.<br />
अब इसे पूरे परिवार कि प्रबल सामूहिक  इच्छा का प्रभाव समझिए या संजोग कि घटनाक्रम भी कुछ अनुकूल रहे.खान्तोली के गणेश दत्त जी, जो &#8216;ब्याकर&#8217; (शादियाँ तै कराने वाला) कहलाते थे, ने अपनी भतीजी की जुगाड़ गोपाल के लिए लगा ली और पांडे ज्यू के दिमाग में यह बात भी बिठा दी  कि परुली तो ज्यादा ही बीमार ठैरी, ज्यादा दिन बचने वाली भी नहीं हुई.जोस्ज्यु की भी हालत ऐसी नहीं हुई कि वे गोपाल को कुछ ज्यादा दे सकें.पिठ्याँ अभी लगा नहीं है.इस लिए ये रिश्ता ख़तम करने में कोई हर्ज़ भी नहीं हुआ.</p>
<p>इसी बीच जोस्ज्यु के क़का का लड़का महेश, जो चालीस साल से  हैदराबाद में था,इष्टदेव की पूजा के लिए पहली बार गाँव आया. उसके दोनों बेटे विदेश में थे और दोनों ने ही अंतर्जातीय विवाह कर रखे थे .महेश रिटायर हो गया था और उसने अपने मौसेरे भाई हरीश के मार्फ़त लखनऊ कुर्मांचल नगर में मकान खरीद लिया था.अब वह लखनऊ में ही रहने वाला था.वह हफ्ते भर जोस्ज्यु के घर में  रहा. उसने भी जोस्ज्यु को प्रेरित किया  कि  वे परुली को आगे पढाएँ और यथासंभव आर्थिक सहायता का भी भरोसा दिलाया.वापस जाते समय वह पाँच सौ रुपये परु के और पाँच सौ रुपये बोजी के हाथ में रख गया.जीवन में पहली बार जोस्ज्यु ने इतनी बड़ी रकम किसी मेहमान या यजमान से एक बार में प्राप्त की थी.</p>
<p>महेश के जाने के बाद परुली भी तेजी से स्वास्थ्य लाभ करने लगी.डॉक्टर पुनेठा की दवा के साथ-साथ महेशकका की आशाजनक बातों से भी वह जल्दी ही बीमारी  से उबर गयी.परीक्षा आते आते वह पूर्ण स्वस्थ हो चुकी थी.संभवतः गोल्ज्यु ने महेश कका को परुली के जीवन में एक नया मोड़ लाने के लिए भेजा था.ये महेश कका की बातों का ही असर था कि परुली का आत्मविश्वास बढ़ रहा था.इसी आत्मविश्वास के चलते उसने   परीक्षा दी और ५७% अंकों से उत्तीर्ण की.</p>
<p>अब तो जोस्ज्यु भी परुली की पढ़ाई को ले कर उत्साहित थे. परुली गाँव की लड़कियों में ही नहीं, लड़कों में भी सबसे प्रतिभावान सिद्ध हो रही थी.परुली ने इंटर में बायोलोजी ले ली थी.उसकी ड्राइंग अच्छी थी.इसलिए उसे चित्र बनाने में परेशानी नहीं होती थी.प्रायः चित्रों में उसे गुड भी मिलता था,जिसे वह जोस्ज्यु को दिखाती थी और जोस्ज्यु मन ही मन खुश होते थे.हाँ शुरू शुरू में मेढक का डायसेक्शन करते समय उसे घिन जरूर आई थी.<br />
परुली ,जिसे अब ईजा-बाबू परु ही कहते थे,न केवल पढ़ाई में ज्यादा मन लगा रही थी वरन् घर के काम में भी ज्यादा ध्यान देने लगी थी और इस बात का विशेष ध्यान रखती थी कि ईजा के काम का बोझ कम हो जाए. यद्यपि ईजा-बाबू छोटे भाई चंदू से काम नहीं कराते थे,किंतु परु उसे काम के लिए उत्साहित करती थी.वह सोचती थी कि वह स्वयं पढ़ने के लिए बाहर चली जायेगी तो ईजा के लिए  अत्ती काम हो जायेगा.<br />
  जोस्ज्यु और जोस्याणी कभी बैठे बातें करते तो उनकी बातों में परु की चिंता जरूर झलकती.<br />
जोस्ज्यु कहते :- हँ वे, हमने कहीं परु का ब्या टाल कर ग़लत तो नहीं किया.<br />
जोस्याणी कहती &#8211; नैं हो, चुप रौ.अब मन कैं झन गजबजाओ. गोल्ज्यु ने जो किया भल ही किया होगा. देखते नहीं पढ़ने में हमेशा फस्ट ठैरी.घर का काम भी भली कै संभालने वाली ठैरी.<br />
फ़िर कुछ शरमा कर बोलती &#8211; आज कल देखण-चाण भी खूब हो गयी है.</p>
<p> इसे परुली का भाग्य कहो या गोल्ज्यु की कृपा कि केमिस्ट्री के टीचर तारा दत्त जी अल्मोड़ा से ट्रांसफर होकर परु के इंटर कालेज में आ गए.केमिस्ट्री पढाने के लिए अल्मोड़ा में तारा दत्त जी का बहुत नाम था.तारा दत्त जी की ही कृपा से परु केमिस्ट्री का कीडा बन गयी.उसे अधिकांश फार्मूले और एक्वेशन कंठस्थ थे.केमिस्ट्री ही वह विषय था जिसके बूते परु ने इंटर भी ५८% नंबरों से पास कर लिया.      </p>
<p> परु पिछले दो सालों से पत्रों द्वारा महेश कका के सम्पर्क में थी.महेश कका अब लखनऊ में निवास कर रहे थे.उन्हें भी परु से लगाव हो आया था.तीज त्यौहार परु को कुछ रुपये भे भेज दिया करते थे. </p>
<p> डाक्टरी के लिए परु ने पी.एम.टी. की तैयारी महेश कका के निर्देशन में ही की थी.उसका सेंटर भी लखनऊ था.अब जा के लगा कि स्कूल की पढाई में अच्छे नंबर लाना और बात है,लेकिन पी.एम.टी. क्लीअर करना उतना आसान नहीं.पी. एम.टी.देने के बाद परु को डर लगने लगा.उसे लगा कि वह शायद पी.एम.टी.में न निकल पाये.वो अब ज्यादा ही भक्त हो गयी थी.देवी के थान नित्य दिया लगाना उसका नियम हो गया था और उसकी एक ही मन्नत होती-  देवी माता! मेंके डाक्टर बणे दिए.<br />
रिजल्ट आ गया.परु को काउन्सेलिंग के लिए बुलाया गया.परु की खुशी का पारावार न था.उसने सोचा वह अब डाक्टर बन ही जायेगी.परू के पूरे परिवार में जश्न था.इजा बाबू ने उसे खुशी-खुशी लखनऊ के लिए विदा किया.पडोस के जमुना दत्त जी का लड़का कैलाश छुट्टी बिता कर फौज की ड्यूटी में वापस जा रहा था,उसका साथ भी मिल गया.महेश कका के लिए गडेरी,भांगा,भट,घौत और दो दाने निमु के भेंट में भेजे.जोस्ज्यु खत्याड़ी वाले खेत को बेचने की तैयारी कराने लगे  ताकि परु की पढाई का खर्च निकल सके. </p>
<p> लखनऊ में फाइनल काउन्सेलिंग के बाद पता चला की परु का एडमिशन नहीं होगा.वह कट ऑफ़ को छूने से रह गयी थी. परु के कल्पनाओं का महल भरभरा कर गिर पड़ा.उसे जबरदस्त सदमा लगा.वह गाँव वालों को क्या मुंह दिखायेगी?सभी कहेंगे -बहुत फलफला रही थी.सुद्दै जो क्या ठहरा डाक्टर बनना!एक बार उसे लगा की उसे आत्महत्या कर लेनी चाहिए,लेकिन यह विचार ज्यादा देर तक हावी न हो सका.ईजा- बाबू और चंदू के ख्याल ने उसे सकारात्मक विचारों की ओर मोड़ दिया.        </p>
<p>    काउन्सेलिंग के कुछ दिन बाद ही महेश कका ख़बर लाये कि आरक्षित कोटे की सीटें पूरी नहीं भर पायीं हैं और शासन इस बार ये सीटें सामान्य सीटों से भरने पर विचार कर रहा है.शायद परु का नंबर भी आ जाए क्योंकि परु ज्यादा पीछे नहीं थी.हुआ भी वही.नई सूची मैं परु का नाम आ गया.<br />
परु के जीवन का यह सबसे महत्वपूर्ण दिन था.बचपन से पाले सपने को साकार करने के लिए यह पहला पक्का कदम था.परु की खुशी देख कर महेश कका के भी आंसू निकल आए.</p>
<p>गाँव में जोस्ज्यु अब तक के घटनाक्रम से अवगत न थे.वे तो परु को डाक्टर मान चुके थे.परु की चिट्ठी आयी- मेरा एडमिशन हो गया है.गोल्ज्यु के थान प्रसाद चढ़ा देना. जोस्ज्यु उपाध्यायजी के यहाँ से मिसिरी ले आए. परु की ईजा ने गोल्ज्यु के थान परसाद चढा कर पूरे गाँव मे बांटा.ज्यादातर लोगों का एक ही जवाब था -भल भै हो तुमेरी परुलि डाक्धर बण गे.लेकिन कुछ ज्यादा समझदार लोग यह भी कह रहे थे-अल्ले काँ(अभी कहाँ) आई त पाँच साल तक पढाई करनी पड़ने वाली ठैरी.तब जो बनेगी डाकटर.</p>
<p>      पढाई का कुछ खर्च खत्याड़ी वाला खेत बेचने से चल गया था.महेश कका ने भी  काफी मदद की. उन्होंने  परु को होस्टल न भेजकर अपने घर पर रख लिया जिससे रहने खाने का खर्च बच जाए.</p>
<p>एडमिशन होने तक परु को उतनी मुश्किल नहीं हुई जितनी एडमिशन के बाद. मेडिकल कालेज की जबरदस्त रैगिंग से परु विचलित हो गयी. उसने रैगिंग का नाम तो सुना था लेकिन इस प्रकार की रैगिंग होगी,उसे अनुमान नहीं था.उसे कालेज जाना किसी यातना झेलने जैसा लगने लगा.महेश कका उसकी परेशानी को भाँप गए.उन्होंने परु की चाची से बात की. परु की चाची ने उसे रैगिंग के आतंक से उबरने में मदद की.<br />
परु जब पी.एम.टी. देने पहली बार लखनऊ आयी थी तो इतनी बड़ी ट्रेन देखकर,इतना बड़ा शहर देख कर,इतनी चहल पहल,इतनी भागमभाग देख कर जहाँ चमत्कृत हुई थी वहीं घबराई भी.उसे लगा था कि इतने बड़े शहर में रहकर पढाई करना कितना मुश्किल होगा.लेकिन अब इस चकाचौंध से उसकी घबराहट दूर होने लगी और उसे इसमें रस आने लगा.कालेज में भी उसका ग्रुप बन गया था.वहाँ भी उसे अच्छा लगता था. </p>
<p> यह परु का फर्स्ट इअर था.कालेज में एनुअल फंक्शन चल रहे थे.उसके ग्रुप की रीमा भाटिया बोली-<br />
&#8216;प्रिया तुम इतनी क्यूट हो. ब्यूटी कम्पीटिशन में पार्टिसिपेट क्यों नहीं करतीं?&#8217;<br />
अमित और दूसरे साथियों ने भी इस बात पर जोर दिया.प्रिया ने कुछ शर्माते हुए कहा-<br />
&#8216;ठीक है,मैं आज अंकल से परमिशन लूंगी.&#8217;<br />
&#8216;परमिशन!&#8217;नेहा बोली&#8217;भला इसमें उन्हें क्या ऐतराज़ हो सकता है?तुम्हें एक चांस मिल रहा है.हो सकता है आज मिस मेडिकल कालेज,कल मिस लखनऊ फ़िर मिस इंडिया और मिस वर्ल्ड भी तुम बनो.एक्सपोजर ऐसे ही तो होता है.&#8217;<br />
परु चुप रही.नेहा की बातों से परु को लगने लगा था कि महेश कका उसे अनुमति दे देंगे क्योंकि वे उसे हमेशा प्रोत्साहित करते थे.         </p>
<p>लेकिन जब महेश कका से इस बारे में बात हुई तो उन्होंने परु को प्यार से समझाते हुए मना कर दिया.हालांकि उनकी बातों से ऐसा लग रहा था कि डिबेट या स्पोर्ट्स में पार्टिसिपेट करने की  अनुमति दे देते.महेश  कका की इस बात पर परु को बुरा लगा और वह अनमनी हो गयी.  </p>
<p>उसके दोस्तों ने इस बात पर उसके अंकल-आंटी का मजाक भी बनाया.मारिया तो यहाँ तक कहने लगी-<br />
&#8216;ये तुम्हारे पेरेंट्स होते तो मना नहीं करते.तुम्हें तो होस्टल ज्वाइन कर लेना चाहिए.वहाँ कम से कम फ्रीली रह तो सकोगी.&#8217;  </p>
<p>निपट गाँव से एक अत्यन्त सरल प्रतिभावान लडकी शहरी चकाचौंध भरे बनावटी माहौल में ठीक से तारतम्य नहीं बिठा पा रही थी.इसी लिए जब महेश कका ने उसे न्यू इअर पार्टी में होटल में रात भर जश्न मनाने के लिए मना कर दिया तो वह भड़क उठी और बोली-<br />
&#8216;कका क्या आप समझते हैं कि मैं वहाँ जा कर कोई ग़लत काम करूंगी या शराब पियूंगी?क्या सभी लडकियां जो वहाँ जा रही हैं इसी लिए जा रहे हैं?उनके पेरेंट्स उनको क्यों नहीं रोक रहे?&#8217;<br />
इसी रौ में उसने होस्टल ज्वाइन करने की इच्छा भी जाहिर कर दी.वह यह भी भूल गयी कि महेश कका उसका आधा खर्च वहन कर रहे हैं.होस्टल का खर्च वह कहाँ से लाएगी?<br />
उसके तेवर देख कर चाची तो तमक उठी और बोल दिया-<br />
&#8216;जाने दीजिये इसको होस्टल.जब उसे आपकी इज्ज़त नहीं करनी तो आप क्यों इसकी फिक्र करते हैं?हम इसके लिए कितना कर रहे हैं इसे उसकी भी परवाह नहीं.बेशर्म हो गयी है.पर निकल गए हैं इसके.&#8217;<br />
महेश कका को  भी काफी सदमा लगा.दुखी हो कर बोले-<br />
&#8216;बेटा मैंने तो तुझे अपनी बेटी मान लिया था.तेरा भला बुरा सोचना मेरा फ़र्ज़ था. लेकिन तुझे मेरी बातें बुरी लग रही हैं तो अपने मन की कर ले .हाँ,इतना जरूर कहूंगा कि तेरे बाबू की स्थिति ऐसी नहीं कि होस्टल का खर्च उठा सकें.अभी तो तेरा फर्स्ट इअर ही है.&#8217;<br />
लेकिन प्रिया पर उनकी बातों का कोई असर नहीं हुआ.वह गुस्से में थी और उसने होस्टल जाने का निश्चय कर लिया था.दूसरे दिन वह इस बारे में दोस्तों से बात करने वाली थी.आज की पार्टी में शामिल न हो पाने का भी उसे बहुत मलाल था.<br />
कालेज पहुँचने पर कुछ और ही चर्चा थी.रात की पार्टी में स्टूडेंट्स के दो गुटों में जम कर हाथापाई हुई थी.बोतलें और कुर्सियाँ चली थीं.पुलिस आ गयी थी.अमित, नेहा और सुष्मिता को रात भर थाने में रहना पड़ा था.सुबह पेरेंट्स को बुला कर उन्हें चेतावनी दी गयी थी.<br />
प्रिया के लिए ऐसी घटना अकल्पनीय थी वह महेश कका से कुतर्क करने के लिए शर्मिन्दा थी.दूसरे दिन के न्यूज़ पेपर में घटना की ख़बर फोटो सहित थी.उसके ग्रुप के कुछ स्टूडेंट्स के फोटो और नाम भी थे..<br />
इस घटना के बाद प्रिया को अहसास हो गया कि महेश कका सदा उसके भले की ही बातें करते हैं.उसे आश्चर्य भी हुआ कि उसने किस दम पर होस्टल ज्वाइन करने का विचार बना लिया था.महेश कका से मुंह्जोरी करने का भी उसे बहुत दुःख था. उनसे आँखें मिलाने में भी उसको शर्म आ रही थी.हाँ एक फायदा जरूर हुआ,इसके बाद कभी परु महेश कका से पूछे बिना एक कदम भी नहीं चली.इसी का परिणाम था कि प्रिया ने अपनी मेडिकल के पढाई सफलता पूर्वक पूरी की.<br />
आज परु को इस बात का अहसास है कि महेश कका ने ही उसके जीवन की दिशा बदली है.उनका बहुत बड़ा अहसान है जिसे जिंदगी भर नहीं भूल सकती-डाक्टर प्रिया जोशी</p>
<p>कहानी यहीं समाप्त होती है.इससे आगे जहाँ तक मुझे मालूम है बता दूँ-प्रिया,उसकी माँ और जोस्ज्यु ने कभी ऐसा व्यवहार नहीं किया जिससे गाँव वाले यह कह सकें कि ये लोग ओच्छि गए हैं.हाँ चंदू को अपनी दीदी के डाक्टर होने पर जरूर गर्व है और इसे वह अपने दोस्तों पर प्रकट भी कर देता है.<br />
डाक्टर प्रिया की नौकरी भी पहाड़ के एक प्राईमरी अस्पताल मे लग गई.सुना है उसका चिह्न किसी डाक्टर अतुल पन्त के लिए गया है.चिह्न साम्य हो गया तो ब्याह पक्का ही समझो क्योंकि दोनों ही समकक्ष संबंधों वाले ठहरे और डाक्टर अतुल के पिताजी केमिस्ट्री के मास्टर तारा दत्त जी हुए जिन्होंने पारु को पढाया था और उसे पसंद भी करते थे.<br />
समाप्त&#8230;&#8230;&#8230;.</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: Ashish</title>
		<link>http://kakesh.com/2008/parulee-10/comment-page-1/#comment-2415</link>
		<dc:creator>Ashish</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 22 Apr 2008 07:24:39 +0000</pubDate>
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		<description>Kakesh ji,
      Muje umeed nahi thi ki aap es kahani ka aant itne chote roup main kar denge.
      Muje laga ki aap pahadi ladke ki dasa ko or samne layenge jis se kuch or honsle mile aage badne ke .......
       Pata nahi sirf is baag ko pad kar mera man nahi mana .........


Ashish</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>Kakesh ji,<br />
      Muje umeed nahi thi ki aap es kahani ka aant itne chote roup main kar denge.<br />
      Muje laga ki aap pahadi ladke ki dasa ko or samne layenge jis se kuch or honsle mile aage badne ke &#8230;&#8230;.<br />
       Pata nahi sirf is baag ko pad kar mera man nahi mana &#8230;&#8230;&#8230;</p>
<p>Ashish</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: समीर लाल</title>
		<link>http://kakesh.com/2008/parulee-10/comment-page-1/#comment-2402</link>
		<dc:creator>समीर लाल</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 19 Apr 2008 15:55:16 +0000</pubDate>
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		<description>ऐसी भी क्या जल्दी-शार्ट कट लगा लिया. :)</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>ऐसी भी क्या जल्दी-शार्ट कट लगा लिया. <img src='http://kakesh.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: Sanjay Pujari</title>
		<link>http://kakesh.com/2008/parulee-10/comment-page-1/#comment-2400</link>
		<dc:creator>Sanjay Pujari</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 19 Apr 2008 09:02:31 +0000</pubDate>
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		<description>Nahi kakesh ji........dil tod diya main to aapko acha lekakh samajh raha tha  aap lekhakh ho hi nahi sakte sirf apna likhne ka shok pura kar rahe ho or net par logo ko bewkoof bana rahe ho......[apne man ke mutabik kuch bhi likha ...or jab is bare main jyada socha nahi gaya to kahani 15 laino main khatam kar di...bhai sahab ye kahani agar aise hi khatam karni thi to jis din suru hui usi din khatam kar sakte the ...khali itne dino tak apna dimag lagaya or baki logo ka time kharab kiya]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>Nahi kakesh ji&#8230;&#8230;..dil tod diya main to aapko acha lekakh samajh raha tha  aap lekhakh ho hi nahi sakte sirf apna likhne ka shok pura kar rahe ho or net par logo ko bewkoof bana rahe ho&#8230;&#8230;[apne man ke mutabik kuch bhi likha ...or jab is bare main jyada socha nahi gaya to kahani 15 laino main khatam kar di...bhai sahab ye kahani agar aise hi khatam karni thi to jis din suru hui usi din khatam kar sakte the ...khali itne dino tak apna dimag lagaya or baki logo ka time kharab kiya]</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: PUSHPENDRA SINGH</title>
		<link>http://kakesh.com/2008/parulee-10/comment-page-1/#comment-2399</link>
		<dc:creator>PUSHPENDRA SINGH</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 19 Apr 2008 07:44:25 +0000</pubDate>
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		<description>are kakesh ji yeh kya? itni jaldi khatam kae diya, paruli itni aasani se doctor ban gayi, uske struggle ki to vyakhya hui hi nahi. agle 5-7 saal ki kahaani aapne itni jaldi khatam kar dee. khar BHAGWAAN GORIYA ke darbaar mein paruli dwara maangi gayi mannat puri hui. ab aapki aglikahaani kaa mughe besabri se intezaarhai.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>are kakesh ji yeh kya? itni jaldi khatam kae diya, paruli itni aasani se doctor ban gayi, uske struggle ki to vyakhya hui hi nahi. agle 5-7 saal ki kahaani aapne itni jaldi khatam kar dee. khar BHAGWAAN GORIYA ke darbaar mein paruli dwara maangi gayi mannat puri hui. ab aapki aglikahaani kaa mughe besabri se intezaarhai.</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: Lalit Mohan Pandey</title>
		<link>http://kakesh.com/2008/parulee-10/comment-page-1/#comment-2393</link>
		<dc:creator>Lalit Mohan Pandey</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 18 Apr 2008 03:20:53 +0000</pubDate>
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		<description>Nahi kakesh ji nahi.. ye to poori kahani ki maja hi khatam kar gaya.. paruli ek struggle karti ladki ki kahani thi..or aapne shukhad aant ke chakar mai struggle ko hi chupa diya.. ye to yu hua ki chutki bajayi or paruli doctor ban gayi or chutki bajayi or paruli ko atul mil gaya or shadi ho gayi.. sahi batau to maja nahi aya or pahle je parts mai jo maja aya tha wo bhi chala gaya... mere hishad se paruli ko doctor to banana tha per with lot more struggle..mai sochta tha uski shadi usi ladke se hogi.. or fir wo doctor banane ke liye sasural mai struggle karegi..finally uska pati use delhi le ke ayega or fir jake ke kahi wo apne husband ko convince kar payegi apne dream ko le ke..  chalo koe nahi..agli kahani ka intzar rahega per please usme aesa mat keeziyega...</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>Nahi kakesh ji nahi.. ye to poori kahani ki maja hi khatam kar gaya.. paruli ek struggle karti ladki ki kahani thi..or aapne shukhad aant ke chakar mai struggle ko hi chupa diya.. ye to yu hua ki chutki bajayi or paruli doctor ban gayi or chutki bajayi or paruli ko atul mil gaya or shadi ho gayi.. sahi batau to maja nahi aya or pahle je parts mai jo maja aya tha wo bhi chala gaya&#8230; mere hishad se paruli ko doctor to banana tha per with lot more struggle..mai sochta tha uski shadi usi ladke se hogi.. or fir wo doctor banane ke liye sasural mai struggle karegi..finally uska pati use delhi le ke ayega or fir jake ke kahi wo apne husband ko convince kar payegi apne dream ko le ke..  chalo koe nahi..agli kahani ka intzar rahega per please usme aesa mat keeziyega&#8230;</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: anitakumar</title>
		<link>http://kakesh.com/2008/parulee-10/comment-page-1/#comment-2390</link>
		<dc:creator>anitakumar</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 17 Apr 2008 17:37:03 +0000</pubDate>
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		<description>लिजिए आज ही हमने परुली की कहानी पढ़ने का मन बनाया तो आज ही खत्म हो गई कहानी, चलिए अब अगली कहानी शुरु से पढ़ेगें।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>लिजिए आज ही हमने परुली की कहानी पढ़ने का मन बनाया तो आज ही खत्म हो गई कहानी, चलिए अब अगली कहानी शुरु से पढ़ेगें।</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: नवीन पाठक</title>
		<link>http://kakesh.com/2008/parulee-10/comment-page-1/#comment-2388</link>
		<dc:creator>नवीन पाठक</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 17 Apr 2008 15:02:02 +0000</pubDate>
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		<description>काकेश दा,
ये जो आज आपने अपने सारे दोस्तो के साथ धोखा किया है, आपको कुछ लगा कि नही...
पर आपने कहानी का अन्त तो सुखद कर दिया, लेकिन अन्त ऐसा होता नही है..कि डा. प्रिया का डा. अतुल के साथ दिल मिल गया और शादी हो गयी...
पहाड के इस माहौल मे लड्किया डाक्टर नही बन सकती है, ,,,
खैर अब नयी परूली का इन्तजार रहेगा... कब  अगले गुरुवार से या कोइ और शुभ मुहुर्त...</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>काकेश दा,<br />
ये जो आज आपने अपने सारे दोस्तो के साथ धोखा किया है, आपको कुछ लगा कि नही&#8230;<br />
पर आपने कहानी का अन्त तो सुखद कर दिया, लेकिन अन्त ऐसा होता नही है..कि डा. प्रिया का डा. अतुल के साथ दिल मिल गया और शादी हो गयी&#8230;<br />
पहाड के इस माहौल मे लड्किया डाक्टर नही बन सकती है, ,,,<br />
खैर अब नयी परूली का इन्तजार रहेगा&#8230; कब  अगले गुरुवार से या कोइ और शुभ मुहुर्त&#8230;</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: mala telang</title>
		<link>http://kakesh.com/2008/parulee-10/comment-page-1/#comment-2387</link>
		<dc:creator>mala telang</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 17 Apr 2008 12:01:34 +0000</pubDate>
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		<description>काकेश भाई, ये आपने हमारे साथ बहुत बड़ा धोखा किया है । माना कि समयाभाव है , आप हमसे समय और मांग लेते .. हम खुशी खुशी दे देते ,लेकिन आपने तो हमसे ऐसा पीछा छुड़ाया जैसे सारे गाँव के कुत्ते आपके पीछे पड़ गये हों... जाइये ,इस तरह परुली का डॉक्टर बनना हमें जरा भी रास नहीं आया ,आप हमें बताएं ,कौन इलाज करवायेगा परुली से ? माफ करें मैं तो नहीं ।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>काकेश भाई, ये आपने हमारे साथ बहुत बड़ा धोखा किया है । माना कि समयाभाव है , आप हमसे समय और मांग लेते .. हम खुशी खुशी दे देते ,लेकिन आपने तो हमसे ऐसा पीछा छुड़ाया जैसे सारे गाँव के कुत्ते आपके पीछे पड़ गये हों&#8230; जाइये ,इस तरह परुली का डॉक्टर बनना हमें जरा भी रास नहीं आया ,आप हमें बताएं ,कौन इलाज करवायेगा परुली से ? माफ करें मैं तो नहीं ।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: Amit Prakash Bhatt</title>
		<link>http://kakesh.com/2008/parulee-10/comment-page-1/#comment-2386</link>
		<dc:creator>Amit Prakash Bhatt</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 17 Apr 2008 03:37:28 +0000</pubDate>
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		<description>एक रिश्ता सा बन गया था परुली के साथ ... 

आपने आज इतना जल्दी निबटा दिया सब कुछ... जाने क्यों आज पहली बार कहानी से रिश्ता नही जोड़ पाए हम...</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>एक रिश्ता सा बन गया था परुली के साथ &#8230; </p>
<p>आपने आज इतना जल्दी निबटा दिया सब कुछ&#8230; जाने क्यों आज पहली बार कहानी से रिश्ता नही जोड़ पाए हम&#8230;</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: mamta</title>
		<link>http://kakesh.com/2008/parulee-10/comment-page-1/#comment-2383</link>
		<dc:creator>mamta</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 16 Apr 2008 07:47:13 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://kakesh.com/?p=379#comment-2383</guid>
		<description>आज की कड़ी मे कुछ ज्यादा ही जल्दी कहानी ख़त्म हो गई।
पर खुशी है  परुली के डॉक्टर बनने और परुली की शादी होने की।

तो अब अगली कहानी का इंतजार है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आज की कड़ी मे कुछ ज्यादा ही जल्दी कहानी ख़त्म हो गई।<br />
पर खुशी है  परुली के डॉक्टर बनने और परुली की शादी होने की।</p>
<p>तो अब अगली कहानी का इंतजार है।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: kiran</title>
		<link>http://kakesh.com/2008/parulee-10/comment-page-1/#comment-2382</link>
		<dc:creator>kiran</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 16 Apr 2008 07:07:01 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://kakesh.com/?p=379#comment-2382</guid>
		<description>kakesh bhai,
aaj thora late post ki aapne kahani. Mai to bahut intjar kar raha tha....lekin ye kya aapne to 6-7 sal ki kahani bahut hi jaldi nibta di.
Chalo paruli doctor to ban hi gayi...at last!! aur love marriage bhi ho gayi..gr8..

kiran</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>kakesh bhai,<br />
aaj thora late post ki aapne kahani. Mai to bahut intjar kar raha tha&#8230;.lekin ye kya aapne to 6-7 sal ki kahani bahut hi jaldi nibta di.<br />
Chalo paruli doctor to ban hi gayi&#8230;at last!! aur love marriage bhi ho gayi..gr8..</p>
<p>kiran</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: अरूण्</title>
		<link>http://kakesh.com/2008/parulee-10/comment-page-1/#comment-2380</link>
		<dc:creator>अरूण्</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 16 Apr 2008 06:55:53 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://kakesh.com/?p=379#comment-2380</guid>
		<description>हम इसे नही पढते ये तो हमारे साथ धोखा है ,पहले रायता मन मर्जी का फ़ैलाया और फ़िर फ़टाफ़ट निपटा दिया क्या आप फ़िल्म लेखन ट्राई कर रहे थे क्या जी  ? जो पहले फ़ैलाते चले गये और जब पता चला कि फ़िल्म दो घंटे की बन गई है तो  बस पन्द्रह मिनट मे निपटाने मे लग गये ,दुबारा लिखा /(मिटा कर) जाये इसे :)</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>हम इसे नही पढते ये तो हमारे साथ धोखा है ,पहले रायता मन मर्जी का फ़ैलाया और फ़िर फ़टाफ़ट निपटा दिया क्या आप फ़िल्म लेखन ट्राई कर रहे थे क्या जी  ? जो पहले फ़ैलाते चले गये और जब पता चला कि फ़िल्म दो घंटे की बन गई है तो  बस पन्द्रह मिनट मे निपटाने मे लग गये ,दुबारा लिखा /(मिटा कर) जाये इसे <img src='http://kakesh.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: Sanjeet Tripathi</title>
		<link>http://kakesh.com/2008/parulee-10/comment-page-1/#comment-2379</link>
		<dc:creator>Sanjeet Tripathi</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 16 Apr 2008 06:24:23 +0000</pubDate>
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		<description>वाकई यार, ये तो बड़ी जल्दी ही समेट दिया आपने, कुछ ऐसे जैसे त्रस्त से हो गए हों आप इस सीरिज़ के लेखन से और सब कुछ बस निपटाना चाहते हों
आई ऑब्जेक्ट ;)

&lt;em&gt;[सहमत हूँ आप सबसे लेकिन समय की व्यस्तता में सचमुच त्रस्त सा ही हो गया था/हूँ. अब किसी नई परुली की कहानी शुरु करुंगा. ]  &lt;/em&gt;</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>वाकई यार, ये तो बड़ी जल्दी ही समेट दिया आपने, कुछ ऐसे जैसे त्रस्त से हो गए हों आप इस सीरिज़ के लेखन से और सब कुछ बस निपटाना चाहते हों<br />
आई ऑब्जेक्ट <img src='http://kakesh.com/wp-includes/images/smilies/icon_wink.gif' alt=';)' class='wp-smiley' /> </p>
<p><em>[सहमत हूँ आप सबसे लेकिन समय की व्यस्तता में सचमुच त्रस्त सा ही हो गया था/हूँ. अब किसी नई परुली की कहानी शुरु करुंगा. ]  </em></p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: ज्ञानदत्त पाण्डेय</title>
		<link>http://kakesh.com/2008/parulee-10/comment-page-1/#comment-2378</link>
		<dc:creator>ज्ञानदत्त पाण्डेय</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 16 Apr 2008 06:15:40 +0000</pubDate>
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		<description>हाई स्पीड निकल गयी कथा गाड़ी।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>हाई स्पीड निकल गयी कथा गाड़ी।</p>
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		<title>By: सुजाता</title>
		<link>http://kakesh.com/2008/parulee-10/comment-page-1/#comment-2377</link>
		<dc:creator>सुजाता</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 16 Apr 2008 06:04:15 +0000</pubDate>
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		<description>अरे ! आज तो आपने बड़ी जल्दी में निबटा दिया कहानी को । हम तो हाथ मलते रह गये !अभी तो स्वाद आना शुरु हुआ था ।  क्या सचमुच कहानी खत्म ? जाएँ ?</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अरे ! आज तो आपने बड़ी जल्दी में निबटा दिया कहानी को । हम तो हाथ मलते रह गये !अभी तो स्वाद आना शुरु हुआ था ।  क्या सचमुच कहानी खत्म ? जाएँ ?</p>
]]></content:encoded>
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